सोयाबीन की पैदावार के लिए मशहूर मध्य प्रदेश में अब धान का रकबा बढ़ रहा है, जिस के चलते अब पराली जलाने (Stubble Burning) में सब से पहले नंबर पर है.
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के गृह राज्य में बढ़ती आग की घटनाएं सरकार के दावों की परीक्षा ले रही हैं.
पराली जलाने में अब पंजाब नहीं, मध्य प्रदेश पहले नंबर पर
हर साल अक्तूबर आते ही पराली जलाने को ले कर पंजाब और हरियाणा चर्चा में आ जाते हैं. दिल्ली की हवा बिगड़ती है तो किसानों पर सवाल उठने लगते हैं. लेकिन इस बार तसवीर कुछ अलग है. 10 अक्तूबर 2026 तक मध्य प्रदेश में पराली जलाने की 233 घटनाएं दर्ज हुईं, जबकि पंजाब और उत्तर प्रदेश में 118-118 घटनाएं सामने आईं.
सोयाबीन का प्रदेश धान की ओर क्यों?
मध्य प्रदेश की पहचान सोयाबीन की खेती से रही है, लेकिन राज्य के कई इलाकों में धान का रकबा भी बढ़ा है. मौसम, सिंचाई, बाजार और संभावित आमदनी जैसे कारण किसानों के फसल चयन को प्रभावित करते हैं. धान का रकबा बढ़ा तो पराली की मात्रा भी बढ़ी. सवाल यह है कि जब खेती का स्वरूप बदल रहा था, तब पराली प्रबंधन की तैयारी क्यों नहीं की गई?
पराली प्रबंधन मशीनों का अभाव
धान की कटाई के बाद किसानों के सामने खेत जल्दी खाली करने और समय पर गेहूं बोने की चुनौती होती है. मशीनें महंगी हों, किराए पर समय से न मिलें या पराली खरीदने की व्यवस्था न हो, तो किसान के विकल्प सीमित हो जाते हैं और किसान खेत में ही पराली जलाने को मजबूर हो जाता है क्योंकि उसे अगली गेहूं की फसल की तैयारी भी करनी होती है.
कृषि मंत्री के गृह राज्य में यह हाल क्यों?
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान मध्य प्रदेश से आते हैं. ऐसे में उन के गृह राज्य में पराली जलाने की बढ़ती घटनाएं गंभीर सवाल खड़े करती हैं. जब धान का रकबा बढ़ रहा था, तब किसानों को पराली प्रबंधन के लिए पर्याप्त मशीनें, सस्ती सुविधाएं और वैकल्पिक बाजार क्यों नहीं मिले?
पराली न जलाने की सलाह देना आसान है, लेकिन किसानों को उस का व्यावहारिक विकल्प देना सरकार की भी जिम्मेदारी है. राज्य सरकार और कृषि विभाग को बताना चाहिए कि पराली प्रबंधन के लिए अब तक क्या इंतजाम किए गए हैं.
पराली समस्या नहीं, कमाई का साधन बने
पराली के प्रबंधन के लिए कई विकल्प हैं. पूसा डीकंपोजर की मदद से फसल अवशेषों को खेत में गला कर मिट्टी में मिलाया जा सकता है. सुपर सीडर और मल्चर जैसी मशीनें भी उपयोगी हैं. इस के अलावा पराली का इस्तेमाल बायोफ्यूल और बायोसीएनजी बनाने में किया जा सकता है.
लेकिन इन विकल्पों का फायदा तभी मिलेगा, जब किसानों को समय पर मशीनें, सही तकनीकी जानकारी और पराली बेचने के लिए नजदीकी खरीद केंद्र मिलें.
कम अवधि में तैयार होने वाली उपयुक्त धान की किस्में भी पराली प्रबंधन और अगली फसल की बोआई के बीच समय बढ़ाने में मदद कर सकती हैं.
अब जवाबदेही जरूरी
मध्य प्रदेश में पराली जलाने की बढ़ती घटनाएं बताती हैं कि समस्या का समाधान सिर्फ जुर्माने और चेतावनी से नहीं होगा. धान का रकबा बढ़ने के साथ पराली प्रबंधन की सुविधाएं भी बढ़ानी होंगी.
सवाल सीधा है… जब किसानों को धान उगाने के लिए प्रोत्साहन मिलता है, तो फसल कटने के बाद पराली संभालने की जिम्मेदारी में उन्हें अकेला क्यों छोड़ दिया जाता है?
पराली को खाद या कमाई का साधन बनाने के लिए सरकार को ठोस व्यवस्था करनी होगी. तभी खेतों में आग कम होगी, मिट्टी की सेहत बचेगी और प्रदूषण पर लगाम लगेगी. Stubble Burning





