फसल भेदक कीट (हेलिकोवर्पा आर्मीजेरा) : इस कीड़े की मादा पत्तियों की निचली सतह पर हलके पीले रंग के खरबूजे की तरह धारियों वाले अंडे देती है.

1 मादा अपने जीवनकाल में करीब 500 से 1000 तक अंडे देती है. ये अंडे 3 से 10 दिनों के अंदर फूट जाते हैं और उन से चमकीले हरे रंग की सूडि़यां निकलती हैं. शुरू में सूडि़यां चने की पत्तियों, कलियों और फूलों की खाती हैं, बाद में ये विकसित हो रही चने की फली के अंदर घुस कर दानों को खा जाती हैं. फली खोखली होने पर पीली पड़ कर सूख जाती है, जिस से पैदावार पर सीधा असर पड़ता है.

रोकथाम

* खेत में 20 फेरोमोन ट्रैप प्रति हेक्टेयर की दर से लगाएं.

* सूंड़ी की पहली अवस्था दिखाई देते ही 250 एलई के एचएएनपीवी को 1 किलोग्राम गुड़ और 0.1 फीसदी टीपोल में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से 10-12 दिनों के फासले पर छिड़काव करें.

* इस के अलावा 1 किलोग्राम बीटी या 5 फीसदी एनएसकेई का छिड़काव करें.

* प्रकोप बढ़ने पर क्विनोलफास 25 ईसी या क्लोरोपायरीफास 20 ईसी का 2 मिलीलीटर प्रति लीटर या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल का 1 मिलीलीटर प्रति लीटर की दर से छिड़काव करें.

* स्पाइनोसैड 45 एससी व थायोमेंक्जाम 70 डब्ल्यूएससी की 1 मिलीलीटर मात्रा का प्रति लीटर की दर से इस्तेमाल करें.

कर्तन कीट (एग्राटिस एप्सिलान) : इन का असर देश के हर भाग में होता है. रात में निकल कर नर व मादा संभोग कर के पत्तियों पर अंडे देते हैं. इन का जीवनचक्र वातावरण के हिसाब से 1-2 महीने में पूरा होता है. इस की सूडि़यां जमीन में चने के पौधों के पास मिलती हैं. ये जमीन की सतह से सटे पौधों को काटती हैं.

रोकथाम

* खेतों के पास प्रकाश प्रपंच 20 फेरोमोन ट्रैप प्रति हेक्टेयर की दर से लगा कर प्रौढ़ कीटों को लुभा कर खत्म किया जा सकता है.

* खेतों के बीचबीच में घासफूस के छोटेछोटे ढेर शाम के समय लगा देने चाहिए. रात में जब सूंडि़यां खाने को निकलती हैं, तो बाद में इन्हीं में छिपेंगी, जिन्हें घास हटा कर आसानी से खत्म किया जा सकता है.

* सूंडि़यां ज्यादा होने पर क्लोरोपायरीफास 20 ईसी 1 लीटर प्रति हेक्टेयर या नीम का तेल 3 फीसदी की दर से छिड़कें.

सेमीलूपर (प्लूसिया ओरिचेल्सिया) : इस कीट की सूंडि़यां हरे रंग की होती हैं, जो पीठ को ऊपर उठा कर अर्धलूप बनाती हुई चलती हैं, इसलिए इसे सेमीलूपर कहा जाता है. ये पत्तियों को कुतर कर खाती हैं. 1 मादा अपने जीवनकाल में 400 से 500 तक अंडे देती है. अंडों से 6-7 दिनों में सूडि़यां निकलती हैं, जो 30-40 दिनों तक सक्रिय रह कर पूरी सूंड़ी बन जाती हैं. सूंडि़यां पत्तियों को लपेट कर उन्हीं के अंदर कोकुन बनाती हैं, जिन से 1-2 हफ्ते बाद सुनहरे रंग का पतंगा बाहर निकलता है.

रोकथाम

* खेत में 20 फेरोमोन ट्रैप प्रति हेक्टेयर की दर से लगाएं.

* खेत में परजीवी पक्षियों के बैठने के लिए 10 ठिकने प्रति हेक्टेयर के हिसाब से लगाएं.

* प्रकोप बढ़ने पर क्लोरोपायरीफास 20 ईसी 1 लीटर प्रति हेक्टेयर या नीम का तेल 3 फीसदी की दर से छिड़कें.

दीमक (ओडोंटोटर्मिस ओबेसेस) : बारानी दशाओं में इस का हमला ज्यादा देखा गया है. दीमक सडे़ हुए पौधों पर ही अपना जीवन बिताती है. लेकिन खाने की कमी होने के समय में जिंदा पौधों की जड़ों से अपना भोजन लेना शुरू कर देती है. श्रमिक दीमकें जिंदा पौधों से ही अपना भोजन लेती हैं. ये पौधों के तनों के सहारे सुरंग बना कर पौधों की जड़ों तक पहुंच कर उन्हें नुकसान पहुंचाती हैं, जिस की वजह से पौधे मुरझाना शुरू हो जाते हैं और आखिर में सूख जाते हैं.

रोकथाम

* 1 किलोग्राम बिवेरिया और 1 किलोग्राम मेटारिजियम को करीब 25 किलोग्राम गोबर की सड़ी हुई खाद में अच्छी तरह मिला कर छाया में 10 दिनों के लिए छोड़ दें. उस के बाद प्रभावित खेत में बोआई से पहले प्रति एकड़ की दर से इस का इस्तेमाल करें.

* सिंचाई के समय इंजन से निकले हुए तेल की 2-3 लीटर मात्रा का इस्तेमाल करें.

* ज्यादा दीमकें होने पर क्लोरोपाइरीफास 20 ईसी की 3-4 लीटर मात्रा को बालू में मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें.

* चने के बीजों को बोआई से पहले इमिडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यूएस 0.1 फीसदी से उपचारित कर लेना चाहिए.

चने के खास रोग

उकठा (फ्यूजेरियम आक्सीस्पोरम सिसराई) : यह रोग आमतौर पर बोआई के करीब 3 हफ्ते बाद दिखाई देता है और दाने पकने तक कभीकभी पौधों को नुकसान पहुंचा सकता है. शुरुआत में पत्तियां पौधों के ऊपरी भाग से मुरझा कर नीचे लटकना शुरू कर देती हैं. बाद में जल्दी ही पूरे पौधों की पत्तियां लटक जाती हैं. पत्तियों में हरा रंग कम हो जाता है, जिस से पहले पत्तियां पीली और बाद में काले रंग की हो जाती हैं. कभीकभी पौधे की बढ़ोतरी रुक जाती है.

रोकथाम

* बोआई से पहले बीजों को बैविस्टीन और थाइरम 1:1 की 2.5 ग्राम मात्रा से 1 किलोग्राम बीज के हिसाब से शोधित कर लेना चाहिए. यदि राइजोबियम कल्चर हो तो पहले 0.1 फीसदी से बैविस्टीन शोधित कर लेना चाहिए.

* रोगी पौधों को उखाड़ कर खत्म कर देना चाहिए.

जड़ सड़न (राइजोक्टोनिया सोलेनाई) : यह बीमारी मिट्टी से पैदा होती है और पौध दशा में ही लग जाती है. रोगी पौधे धीरेधीरे पीले पड़ने लगते हैं. पत्तियां झुक जाती हैं. आमतौर पर जमे पौधे मरते नहीं. निकले पौधे के खास तने के कालर के ऊपर तक गहरा भूरा धब्बा पैदा हो जाता है. बड़े पौधों में यह धब्बा शाखाओं में फैल जाता है. तने और जड़ के निचले भाग सड़े हुए दिखाई देते हैं, जिन के ऊपर गुलाबी रंग के कवक सूत्र और सूई की नोक के बराबर कालेकाले दाने देखे जा सकते हैं.

रोकथाम

* चने की जगह पर गेहूं और जौ की फसल 2 सालों के बाद लेनी चाहिए और फसल का भूसा खेत में ही छोड़ देना चाहिए.

* बीजों को बोने से पहले थायरम और कार्बेंडाजिम 1:2 के मिश्रण की 3 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम की दर से शोधित करें या पहले वीटावैक्स की 2 ग्राम मात्रा व फिर ट्राईकोडर्मा विरीडी की 4 ग्राम मात्रा से बीजों को प्रति किलोग्राम की दर से शोधित करें.

कालर सड़न (स्क्लेरोशियम राल्फसाई) : जमीन में ज्यादा नमी होने पर वातावरण में गरमी बढ़ने की वजह से यह बीमारी जमने की दशा में दिखाई देती है. यह रोग अकसर मिट्टी से ही पैदा होता है. छोटे पौधों की कोमल पत्तियां पीली पड़ जाती हैं. पौधों के कालर वाले हिस्से में सड़न हो जाती है. सड़ा हुआ भाग सफेद कवक से ढक जाता है और उस के साथ जुड़े हुए सरसों के दाने के बराबर कई बीजाणु देखे जा सकते हैं. नवजात पौधे मर जाते हैं. बीमारी एक ही खेत में जगहजगह पर देखी जा सकती है.

रोकथाम

* बीजों को बोने से पहले थाइरम, केप्टान या पीसीएनबी से शोधित कर लेना चाहिए.

* 15-20 किलोग्राम पीसीएनबी व 15 किलोग्राम डेमोसन प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी को शोधित करने के लिए डाल देना चाहिए.

पत्ती झुलसा या चांदनी रोग (एस्कोकाइटा रविआई) : इस रोग से पत्तियों पर छोटे भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं. धब्बों के किनारे बदरंग हो जाते हैं. बाद में गोल आकार में बिंदी की तरह के काले धब्बे सड़ने वाले धब्बों के चारों ओर पैदा हो जाते हैं. पत्तियां और फूल पौधे के ऊपरी भाग में ही मुरझा कर लटक जाते हैं. रोगी पौधों के तनों और पत्तियों का रंग आमतौर पर सूखे पौधों की तरह हो जाता है.

रोकथाम

* रोगी पौधों को उखाड़ कर खत्म कर देना चाहिए.

* फसलों के ऊपर 0.2 फीसदी केप्टान या डाइथेन जेड 78 का छिड़काव करना चाहिए.

ग्रे मोल्ड (बोट्राइटिस सिनेरिया) : यह बीमारी ज्यादातर तराई वाले इलाकों, जहां मौसम ठंडा और ज्यादा नमी हो वहां पाई जाती है. इस में पौधे के तने पर मटमैले और गहरे भूरे धब्बे खड़े बाल के समान नजर आते हैं. धब्बे तने को जल्दी ही चारों ओर से घेर लेते हैं. ज्यादातर मुलायम और रोग से प्रभावित शाखाएं टूट जाती हैं.

रोकथाम

* फसल पर 2 फीसदी डाइक्लोन का छिड़काव कर के बचाया जा सकता है. 0.2 फीसदी नैबम या 0.2 फीसदी मैंकोजेब का 10 दिनों के अंतर पर छिड़काव फायदेमंद होता है.

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