Compensation Fraud-
एयरपोर्ट के नाम पर जमीन देने वाले किसानों के खातों से करोड़ों रुपए गायब होने का आरोप व्यवस्था पर बड़ा सवाल है. जमीन भी गई, मुआवजे की रकम भी लुट गई और अब किसान बैंकों व सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं. आखिर अन्नदाता के साथ इस कथित लूट की जिम्मेदारी कौन लेगा?
किसानों की जमीन विकास के नाम पर ली जाती है. उन्हें भरोसा दिलाया जाता है कि इस से इलाके की तसवीर बदलेगी, रोजगार बढ़ेगा और परिवार का भविष्य सुरक्षित होगा. लेकिन ग्रेटर नोएडा में एयरपोर्ट के लिए जमीन देने वाले किसानों के साथ जो हुआ, वह विकास के दावों पर गंभीर सवाल खड़े करता है. खबर के मुताबिक, कई किसानों के बैंक खातों से करोड़ों रुपए निकाले जाने के आरोप हैं. किसी के खाते से एक करोड़ रुपए से अधिक गायब होने की बात सामने आई है, तो किसी किसान की 80 लाख रुपए की एफडी तक खत्म हो गई.
यह महज बैंकिंग गड़बड़ी का मामला नहीं है. यह उन किसानों की मेहनत, भरोसे और भविष्य पर चोट है, जिन्होंने सार्वजनिक परियोजना के लिए अपनी जमीन दी. जमीन एक बार चली जाए तो उसे वापस पाना आसान नहीं होता. मुआवजे की रकम ही उनके लिए नई जिंदगी शुरू करने, बच्चों का भविष्य संवारने और रोजीरोटी का सहारा बनती है. यदि उसी रकम पर सेंध लग जाए, तो किसान आखिर जाए कहां?
विकास की कीमत किसान ही क्यों चुकाए?
सरकारें बड़ेबड़े हवाई अड्डों, सड़कों और औद्योगिक परियोजनाओं को विकास की पहचान बताती हैं. उद्घाटन समारोहों में चमकती तसवीरें सामने आती हैं, भाषणों में नए भारत की कहानी सुनाई जाती है. लेकिन इसी विकास की जमीन तैयार करने वाले किसान अगर अपनी ही रकम के लिए थाने और बैंक के चक्कर काटें, तो इन उपलब्धियों का जश्न अधूरा है.
सब से बड़ा सवाल यह है कि जिन खातों में जमीन का मुआवजा आया, वहां से इतनी बड़ी रकम कथिततौर पर कैसे निकल गई? क्या बैंक की सुरक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर है कि किसानों की जीवनभर की पूंजी पर हाथ साफ हो जाए? क्या संदिग्ध लेनदेन की निगरानी करने वाली व्यवस्था सो रही थी?
इन सवालों के जवाब केवल बैंक अधिकारियों के बयान से नहीं मिलेंगे. निष्पक्ष जांच और ठोस कार्रवाई से ही सच्चाई सामने आएगी.
जिम्मेदारी से बच नहीं सकती सरकार
किसानों की जमीन अधिग्रहित करने के समय सरकारी मशीनरी सक्रिय रहती है. कागजात तैयार होते हैं, मुआवजे की गणना होती है और रकम खातों तक पहुंचाने की प्रक्रिया पूरी की जाती है. फिर जब उसी रकम की सुरक्षा का सवाल उठता है, तो किसान को अकेला क्यों छोड़ दिया जाता है?
सरकार सीधेतौर पर हर बैंक खाते के संचालन की जिम्मेदार नहीं होती, लेकिन जमीन अधिग्रहण, मुआवजे के भुगतान और प्रभावित परिवारों के हितों की रक्षा के मामले में उस की जवाबदेही से इनकार नहीं किया जा सकता. खासकर तब, जब मामला बड़ी संख्या में किसानों और करोड़ों रुपए की कथित धोखाधड़ी से जुड़ा हो.
केवल जांच का आश्वासन दे कर मामले को ठंडे बस्ते में डाल देना किसानों के साथ एक और अन्याय होगा. किसानों को भाषण नहीं, उन का पैसा वापस मिलना चाहिए. बैंक और जांच एजेंसियां समयबद्ध तरीके से कार्रवाई करें. जिन अधिकारियों या अन्य लोगों की भूमिका सामने आए, उन के खिलाफ बिना भेदभाव कार्रवाई हो. साथ ही, मुआवजे की बड़ी रकम पाने वाले किसानों को सुरक्षित बैंकिंग और धोखाधड़ी से बचाव के बारे में सहायता भी दी जाए.
किसान देश का पेट भरता है. जब उस की जमीन ली जाती है, तो उसे विकास में भागीदार बनाने का दावा किया जाता है. लेकिन यदि जमीन देने के बाद वह अपनी ही पूंजी के लिए दरदर भटकने लगे, तो यह विकास की सफलता नहीं, व्यवस्था की विफलता का संकेत है.
सरकार को याद रखना चाहिए कि किसान केवल वोट बैंक नहीं है. वह नागरिक है, जिस के अधिकारों और संपत्ति की रक्षा करना शासन की जिम्मेदारी है. एयरपोर्ट की ऊंची इमारतें और चमकती हवाई पट्टियां तभी विकास का प्रतीक बनेंगी, जब उनकी नींव में अपनी जमीन देने वाले किसानों का भरोसा भी सुरक्षित रहेगा. Compensation Fraud





