Safal Kisan-
उत्तर प्रदेश के बस्ती जिला मुख्यालय से तकरीबन 15 किलोमीटर दूर स्थित सदर ब्लौक क्षेत्र के चितरगढि़या के लोगों की आमदनी खेतीबारी पर ही निर्भर है. यहां के ज्यादातर परिवार गन्ना, धान, गेहूं, दलहन और तिलहन की खेती के साथसाथ पशुपालन के व्यवसाय से जुड़े हुए हैं.
इसी गांव से राम पूरन चौधरी नाम के एक ऐसे भी किसान हैं, जो कुछ साल पहले तक गांव के दूसरे किसानों की तरह पारंपरिक खेती के ऊपर ही निर्भर हुआ करते थे. लेकिन उन्होंने 3 साल पहले ‘फार्म एन फूड’ पत्रिका में प्रकाशित एक लेख पढ़ा, जिस में विदेशी और रंगीन सब्जियों की खेती से जुड़ी तकीनीकी जानकारी के साथ भारीभरकम मुनाफे के बारे में भी लिखा था.
इस लेख को पढ़ने के बाद उन्होंने भी अपनी पारंपरिक खेती को छोड़ कर रंगीन और विदेशी सब्जियों के साथ हरी और पत्तेदार सब्जियों की खेती करने का फैसला लिया.
किसान राम पूरन चौधरी के इसी फैसले ने उन की जिंदगी बदलने का काम किया. जहां उन्हें पारंपरिक तरीके से की जाने वाली खेती से मुश्किल से सालभर में एक एकड़ में 70 से 80 हजार रुपए की आमदनी होती थी, वहीं उन्होंने पहले साल ही करीब एक एकड़ खेत में 15 तरह की विदेशी और रंगीन सब्जियां उगा कर 63 हजार रुपए की लागत से 3 लाख रुपए की आय अर्जित करने में सफलता पाई. उन्होंने पहले साल 5 रंगों की गोभी के साथसाथ पार्सले, ब्रूसल्स स्प्राउट, ब्रोकली, लैट्यूस (सलाद पत्ता), स्विस चार्ड, लीक और लाल पत्तागोभी जैसी विदेशी सब्जियों का उत्पादन किया.
विश्वसनीय संस्थानों से मंगवाते हैं बीज
किसान राम पूरन चौधरी ने बताया कि किसी भी तरह की खेती करने के लिए तकनीक के साथसाथ बीज का चयन सब से महत्वपूर्ण होता है. अगर आप वाकई खेती से अच्छी कमाई करना चाहते हैं और मेहनत भी करते हैं, तो फिर बीज को ले कर बिलकुल भी लापरवाही नहीं करनी चाहिए .
उन्होंने बताया कि सब्जियों के बीज हिमाचल प्रदेश, पूसा संस्थान, नई दिल्ली से तो कुछ बीज उत्तराखंड के पंतनगर विश्वविद्यालय में आयोजित किसान मेले से क्रय करते हैं और खुद ही नर्सरी तैयार कर पौधों की रोपाई अपने खेतों में करते हैं. साथ ही, अन्य किसानों को भी रंगीन और विदेशी सब्जियों की खेती के लिए प्रोत्साहित करने के लिए पौध उपलब्ध कराते हैं.
राम पूरन चौधरी का कहना है कि विदेशी और रंगीन सब्जियों की खेती शुरुआत में जोखिम और चुनौतियां थीं, लेकिन प्रशिक्षण और वैज्ञानिक सलाह ने उन का मार्ग प्रशस्त किया.
इन रैसिपी में होता है उपयोग
किसान राम पूरन चौधरी ने बताया कि वे करीब आधा एकड़ एरिया में ब्रोकली की खेती कर रहे हैं. ब्रोकली का पौधा फूलगोभी की भांति होता है. इस में फूलों के बंद गुच्छे आपस में जुड़े हुए फूलगोभी की तरह ही निकलते हैं. इस की नरम शाखाएं 6-8 सैंटीमीटर फूलों के गुच्छों के साथ ही काटी जाती हैं.
इस के लिए नमी वाली भूमि जिस में पानी का निकास अच्छा हो, उपयुक्त रहती है.
इस की कई और भी किस्में हैं जैसे पालम हरीतिका, पालम कंचन, पालम विचित्रा, पालम समृद्धि आदि.
इस के आलावा उन के द्वारा ब्रूसल्स स्प्राउट की भी खेती व्यासायिक लैवल पर की जा रही है. स्प्राउट को कच्चे सलाद के रूप में, पका कर तथा आचार बना कर खाया जाता है.
वे विदेशी सब्जी सिलेरी की भी खेती कर रहे हैं, जिस को सलाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता हैं. इस के पत्ते व डंठल कच्चे तथा पका कर या फिर सूप में सुगंध के लिए प्रयोग किए जाते हैं. इस का प्रयोग दवा के रूप में भी किया जाता है.
राम पूरन चौधरी से प्रेरित हो रहे किसान
राम पूरन चौधरी की सफलता का प्रभाव पूरे क्षेत्र में दिखाई दे रहा है. उन के गांव के ही युवा किसान विक्रम चौधरी, बेलाड़ी गांव के अरविंद सिंह, गोटवा के अनूप मौर्य जैसे तमाम स्थानीय युवाओं ने द्वारा की जा रही खेती से सीख खुद इसे अपनाया और उन्हें रोजगार भी मिल रहा है. अब अन्य किसान भी अब परंपरागत खेती से आगे बढ़ कर बाजारोन्मुख और आधुनिक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं.
पोषण से भरपूर होती हैं विदेशी और रंगीन सब्जियां
किसान राम पूरन चौधरी ने बताया कि विदेशी और रंगीन सब्जियां उगाने में परंपरागत खेती की तुलना में कई तरह की कठिनाइयां तो हैं, लेकिन इस में भरपूर मुनाफे के साथ कई विशेष सुविधाएं भी होती हैं. जैसे कि ये सभी सब्जियां छत पर गमलों में भी उगाई जा सकती हैं. ज्यादा डिमांड की वजह यह है कि इन में विटामिन ए, विटामिन सी के साथसाथ लौह, मैग्नेशियम, पोटाशियम, जिंक आदि बहुत मात्रा में पाए जाते हैं.
होटलों में सप्लाई होती सब्जियां
राम पूरन चौधरी के अनुसार पांचसितारा होटलों और महानगरों में इस तरह की सब्जियों डिमांड बढ़ने से इसकी काफी ऊंची कीमत मिल जाती हैं. उन्होंने बताया कि पहले इन विदेशी और रंगीन सब्जियों को या तो बाहर से आयात करना पड़ता था या पहाड़ी क्षेत्रों में से मंगाई जाती थीं, लेकिन मैदानी क्षेत्र के किसानों द्वारा इस तरह की सब्जियों की खेती की तरफ रु झान बढ़ने से बाहर की सब्जियों पर निर्भरता कम हुई है और स्थानीय किसानों की आमदनी भी बढ़ रही है.
हरी सब्जियों से भी बंपर कमाई
किसान राम पूरन हरी और पत्तेदार सब्जियों की खेती से भी मोटा मुनाफा कमा रहे हैं. वे हर साल करीब एक एकड़ में साहो किस्म का टमाटर लगाते हैं, जिस में लागत एक एकड़ में करीब 60 से 70 हजार रुपए आती है और मुनाफा करीब 2 लाख रुपए तक हो जाता है, क्योंकि टमाटर की पैदावार अच्छी आती है. इस में फल भी ज्यादा आते हैं.
इस की खेती हम मल्च विधि से करते हैं. इस से फसल तो अच्छी होती ही है, साथ ही इस में खरपतवार का जमाव भी कम होता है. रोग आदि भी कम लगते हैं और इस को एक बार लगाने के बाद 3 से 4 महीने तक फसल मिलती रहती है.
उन्होंने बताया कि टमाटर की खेती की खेती करना बहुत ही आसान है. सब से पहले टमाटर के बीजों की नर्सरी तैयार करते हैं. उस के बाद खेत की जुताई कर पूरे खेत में बैड बना कर मल्चिंग की जाती है, फिर उस में छोटेछोटे गड्ढे कर के कीचड़ विधि से टमाटर के पौधे लगाए जाते हैं. उस के बाद जब पौधा थोड़ा बड़ा हो जाता है, सहारा दिया जाता है और इस की सिंचाई करते हैं. फिर इस के पौधे में जैविक खाद व कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करना पड़ता है, जिस से पौधा अच्छा चलता है और रोग भी नहीं लगता. वहीं पौधा लगाने के 70 से 80 दिनों बाद फसल निकलनी शुरू हो जाती है.
किसान राम पूरन चौधरी टमाटर की खेती के अलावा चप्पन कद्दू, बीन्स, स्वीट कौर्न की खेती कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि सीजनल सब्जी की खेती से प्रतिवर्ष 6 से 7 लाख रुपए अर्जित करते हैं. महज सब्जी की खेती से अपनी दशा और दिशा बदल चुके किसान राम पूरन चौधरी ने बयाया कि लौकी, करेला, भिंडी, गोभी समेत कई मौसमी सब्जियों की खेती वे आधुनिक तकनीक से करते हैं.
ड्रिप सिंचाई तकनीक से बढि़या पैदावार
वे अपने खेतों में ड्रिप सिंचाई प्रणाली से ही पौधों को पानी देते हैं, जिस में पाइप और छोटेछोटे ड्रिपर लगाए जाते हैं. इन की मदद से पानी धीरेधीरे और नियंत्रित मात्रा में पौधों की जड़ों तक पहुंचता है. इस से पानी की बरबादी नहीं होती और फसल को जरूरत के अनुसार नमी मिलती रहती है.
उन्होंने बताया कि ड्रिप सिंचाई से फसल की पैदावार में काफी इजाफा होता, क्योंकि पौधों को नियमित रूप से सही मात्रा में पानी मिलता है, जिस से उन की वृद्धि अच्छी होती है. इस के साथ ही, पौधों को खाद भी पानी के साथ आसानी से दी जा सकती है.
इस तकनीक का एक और बड़ा लाभ यह है कि उन के सब्जियों की फसल में खरपतवार कम उगते हैं. चूंकि पानी केवल पौधों की जड़ों के पास दिया जाता है, इसलिए पूरे खेत में नमी नहीं फैलती और अनावश्यक घासफूस कम निकलती है. इस के अलावा, ड्रिप सिंचाई से समय और श्रम भी बचता है. एक बार सिस्टम लगाने के बाद सिंचाई का काम काफी आसान हो जाता है.
खेती का यह राम पूरन चौधरी का यह मौडल साबित करता है कि अगर सही तकनीक, वैज्ञानिक सू झबू झ और बाजार की सटीक सम झ हो, तो खेती कभी घाटे का सौदा नहीं हो सकती.
राम पूरन चौधरी ने रूढि़वादी कृषि पैमानों को तोड़ कर न सिर्फ अपनी जिंदगी बदली है, बल्कि पूर्वांचल के युवाओं के सामने आत्मनिर्भरता की एक नई इबारत भी लिख दी है. वैश्विक स्वाद और स्थानीय बाजार के इस बेहतरीन समन्वय ने चितरगढि़या गांव को कृषि विविधीकरण के एक जीवंत केंद्र के रूप में स्थापित कर दिया है. Safal Kisan





