Farmer Felicitation: कृषि विज्ञान केंद्र लखनऊ ने किया किसानों को सम्मानित

Farmer Felicitation: कृषि विज्ञान केंद्र लखनऊ किसान दिवस पर तहसील मलिहाबाद के ब्लॉक माल के ग्राम सरसंडा में किसान सम्मान दिवस के अवसर पर भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया. जिसमें किसान दिवस मनाने के साथसाथ किसानों को भी सम्मानित (Farmer Felicitation) किया गया.

कौन थे अतिथि

कार्यक्रम का उद्घाटन निदेशक डॉक्टर दिनेश सिंह भारतीय गन्ना अनुसंधान परिषद लखनऊ द्वारा किया गया और कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि वैज्ञानिक डॉ मनीष मिश्र केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान लखनऊ मौजूद रहे. कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि मंत्री का लाइव कार्यक्रम भी प्रसारित किया गया. साथ स्वच्छता पखवाडा होने पर किसानों को स्वच्छता अभियान की शपथ ग्रहण कराई गई.

Farmer Felicitation

कृषि तकनीक अपनाने से अधिक लाभ

समारोह को संबोधित करते हुए डॉक्टर दिनेश सिंह ने कहा कि, किसानों की मेहनत और उन्नत कृषि तकनीकों के प्रयोग से देश की खाद्य सुरक्षा मजबूत हुई है. चौधरी चरण सिंह ने किसानों के हितों के लिए कई महत्वपूर्ण नीतियां और सुधार लागू किए थे.

दिनेश सिंह ने किसानों को मौसम के अनुसार फसल चक्र अपनाने, जैविक खेती, ड्रिप इरिगेशन जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग करने और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए प्रेरित किया. इस आयोजन का मकसद किसानों की समस्याओं को समझना और कृषि क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देना था.

Farmer Felicitation

महिला किसान बन रहीं आत्मनिर्भर

कृषि विज्ञान केंद्र लखनऊ के वैज्ञानिक डॉ. अखिलेश कुमार दुबे ने कहा कि, महिला किसान भी कृषि क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं. महिला किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए केंद्र द्वारा कई प्रशिक्षण और योजनाएं भी चलाई जा रही हैं. उन्होंने महिला किसानों को स्वरोजगार, सब्जी उत्पादन, मशरूम की खेती तथा पशुपालन से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया.

Farmer Felicitation

किसानों को मिला सम्मान

इस कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों के योगदान को सम्मानित करना भी था. इस अवसर पर महिला किसानों के साथ आम उत्पादक किसान व tafari फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड लतीफपुर मलिहाबाद लखनऊ के निदेशक अतुल कृष्ण अवस्थी, उत्कृष्ट फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड के निदेशक सतीश सिंह, राजकुमार सिंह अमलौली,आशीष द्विवेदी, मनीष रावत आदि को आम उत्पादन व विपणन के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने के लिए सम्मानित (Farmer Felicitation) किया गया.

Bihar Agricultural University : प्रदेश का बढ़ाया गौरव

Bihar Agricultural University: बिहार एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी (BAU), सबौर ने एक बार फिर बिहार का गौरव बढ़ाया है. इस यूनिवर्सिटी का चयन ‘राज्य सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में अनुसंधान, नवाचार और उद्यमिता’ पर आधारित एक महत्त्वपूर्ण अध्ययन में प्रमुख भागीदार के रूप में किया गया है. यह अध्ययन फाउंडेशन फौर इनोवेशन एंड टैक्नोलौजी ट्रांसफर (FITT), IIT दिल्ली द्वारा नीति आयोग के सहयोग से किया गया.

इस अध्ययन का उद्देश्य यह मूल्यांकन करना है कि राज्य का यह कृषि विश्वविद्यालय किस तरह से भारत के अनुसंधान और उद्यमिता को आकार दे रहे हैं, विशेषकर प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, नवाचार आधारित शिक्षा और स्टार्टअप इनक्यूबेशन के क्षेत्र में BAU (Bihar Agricultural University) का चयन इस की निरंतर प्रगति, राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क (NIRF) में लगातार बेहतर प्रदर्शन और कृषि नवाचार व उद्यमिता संवर्द्धन के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर उभरती प्रतिष्ठा का परिणाम है.

BAU (Bihar Agricultural University) सबौर में अध्ययन दल ने विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रबंधन के साथ विस्तृत परामर्श के अतिरिक्त 32 संकाय सदस्यों और 27 छात्रों के साथ 2 फोकस्ड ग्रुप डिस्कशन (FGD) आयोजित किए. इन सत्रों का संचालन नीति आयोग से डा. बिनीत सिंह ने किया. चर्चाओं में विश्वविद्यालय की अनुसंधान अवसंरचना, नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र, बौद्धिक संपदा प्रबंधन और एग्रीप्रेन्योरशिप पहलों का आकलन किया गया.

इस उपलब्धि पर कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह ने कहा, “यह बिहार और BAU के लिए गर्व का क्षण है. IIT दिल्ली और नीति आयोग द्वारा मान्यता मिलना हमारे उस सफर की मजबूत पुष्टि है, जिस में हम कृषि प्रौद्योगिकी उत्कृष्टता के राष्ट्रीय केंद्र बनने की दिशा में अग्रसर हैं. हमारा लक्ष्य कृषि अनुसंधान और नवाचार को सशक्त बनाना है तथा एक ऐसी उद्यमशील संस्कृति का निर्माण करना है जिस से सीधे किसानों, स्टार्टअप्स और उद्योगों को लाभ मिले.”

इस कार्यक्रम का समन्वयन डा. आदित्य सिन्हा, सहायक प्राध्यापक, बिहार कृषि महाविद्यालय, सबौर द्वारा किया गया.

इस उपलब्धि के साथ BAU (Bihar Agricultural University) सबौर ने कृषि क्षेत्र में नवाचार आधारित का प्रमुख केंद्र बन कर स्वयं को स्थापित किया है. यह उपलब्धि आत्मनिर्भर भारत की राष्ट्रीय परिकल्पना से सीधे जुड़ती है और एक ज्ञान आधारित, आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है.

AI Robots :खेती में किसानों का हाथ बंटाते एआई रोबोट

AI Robots: वर्तमान में दुनियाभर में ऐसा कोई क्षेत्र आज अछूता नहीं रह गया है, जहां एआई और रोबोटिक्स का इस्तेमाल न हो रहा हो. अब इसी क्रम में कृषि क्षेत्र में भी एआई रोबोट किसानों का हाथ बंटा रहे हैं, और जो काम किसानों को ज्यादातर मैन्युअल या कृषि यंत्र से करना पड़ता था, वह अब एआई रोबोट कर रहे हैं.

जहां अब खेतों में इंसानों की जगह एआई से चलने वाले रोबोट खुद ही खरपतवार की पहचान कर उसे उखाड़ने का काम कर रहे हैं. इस खरपतवार उखाड़ने वाले एआई संचालित रोबोट को अमेरिका की एक स्टार्टअप कंपनी एजिन ने बनाया है. जिस का नाम ‘एलिमेंट’ रखा गया है.

‘एलिमेंट’ नाम का यह रोबोट अभी कपास के खेतों में काम कर रहा है. इस एआई से चलने वाले रोबोट की खास बात यह है कि यह पूरी तरह से सौर ऊर्जा से चलता है. ‘एलिमेंट’ दिखने में एक सोलर पैनल लगे एक टैबल जैसा दिखता है. जिस के नीचे छोटेछोटे ब्लेड लगे हैं. ये ब्लेड खेत के बीच में चलते हुए फसल को नुकसान पहुंचाए बिना खरपतवार को पहचानने के बाद उसे काट देता है. ‘एलिमेंट’ में लगे कैमरे और एआई सिस्टम सैंसर उसे फसल और घास के बीच पहचान बताने में मदद करते हैं. जिस से यह एआई रोबोट आसानी से खेतों के बीच में से खरपतवार को उखाड़ फेंकता है.

इस को बनाने वाले स्टार्टअप के सह संस्थापक रिचर्ड वुर्डन ने कहा, कि खेतों में हर कोई जहरीले रसायनों से बचना चाहता है, क्योंकि यह जहरीले रसायन इनसानी स्वास्थ्य को काफी नुकसान पहुंचाते हैं, और हमारा रोबोट इसी का समाधान निकालता है.

दिल्ली क्षेत्र में विकसित कृषि संकल्प अभियान

Viksit Krishi Sankalp Abhiyan: 12 जून, 2025 को कृषि विज्ञान केंद्र, दिल्ली भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली एवं कृषि इकाई, विकास विभाग, दिल्ली सरकार के द्वारा विकसित कृषि संकल्प अभियान का 15 वें दिन का कारवां दिल्ली देहात के नांगल ठकरान एवं बाजितपुर गांव (अलीपुर ब्लौक, दिल्ली) में पहुंचा.

इस कार्यक्रम के शुरुआत में डा. डीके राणा, अध्यक्ष, कृषि विज्ञान केंद्र, दिल्ली ने सभी वैज्ञानिकों एवं किसानों का स्वागत करते हुए बताया कि तकनीकों एवं अनुसंधान को किसानों के खेतों पर पहुंचाने में कृषि विज्ञान केंद्रो का महत्वपूर्ण योगदान है. खेती व किसानों को समृद्ध करने के लिए “लैब टू लैंड” विजन के साथ ज्ञान की किरण आज खेतों तक पहुंच रही है और अनुसंधान पर वैज्ञानिक किसानों के साथ सीधा संवाद कर के समस्या आधारित किसानों को जानकारी दे रहे हैं.

इसी क्रम में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली के प्रधान वैज्ञानिक डा. राम स्वरूप बाना ने जल संरक्षण की तकनीकियों पर विशेष ध्यान देते हुए विस्तृत जानकारी साझा की. साथ ही, उन्होंने बताया कि जिन क्षेत्रों में पानी की कमी है उन क्षेत्र में किसान संरक्षित तकनीक अपना कर अच्छी आय प्राप्त कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि यदि युवाओं को खेती की तरफ आना है तो हमें पारंपरिक तकनीकी को छोड़ कर आधुनिक खेती को अपनाना होगा. इसी क्रम उन्होंने बाजरा की वैज्ञानिक खेती की विस्तृत जानकारी किसानों के साथ साझा की.

डा. श्रवण कुमार सिंह ने दिल्ली के आसपास क्षेत्र के लिए सब्जियों की विभिन्न प्रजातियां, जो दिल्ली क्षेत्र में अच्छा उत्पादन दे सकें के साथसाथ पोषण से संबंधित जितनी भी तकनीकियां हैं, जैसे किचन गार्डन की स्थापना करना और उस में लगने वाले मौसम के अनुसार सब्जियां और मानव पोषण के लिए संतुलित आहार आदि के साथ संरक्षित खेती की सारी जानकारी किसानों के साथ साझा की. डा. श्रवण कुमार सिंह ने संरक्षित खेती पर विशेष जोर दिया और उन्होंने बताया कि छोटे से छोटे जगह में भी आप हाईटैक नर्सरी बना कर अच्छा उत्पादन कर युवा किसान इस में अच्छी आय प्राप्त सकते हैं.

डा. श्रवण हलधर, प्रधान वैज्ञानिक (किट विज्ञान) ने किसानों को एकीकृत कीट प्रबंधन अपनाने की सलाह दी. उन्होंने कहा कि किसानों को एकीकृत कीट प्रबंधन की विभिन्न प्रथाएं जैसे कीटों की निगरानी, लाभदायक एवं हानिकारक कीटो की पहचान, प्रभावी विधियों का चयन, जैविक नियंत्रण को अपनाना,  यांत्रिक उपकरणों का उपयोग सहित रासायनिक नियंत्रण के साथ वैज्ञानिक की सलाह से कीटनाशकों का उपयोग करना चाहिए.

इसी क्रम में डा. समर पाल सिंह ने खारे पानी और लवणीय मिट्टी का किस तरह से सुधार किया जा सकता है एवं खारे पानी में होने वाली फसलें जैसे पालक, जौ, सरसों आदि के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए उन की प्रजातियों के बारे में जानकारी दी. इसी के साथ उन्होंने प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए किसानों से आग्रह किया.

डा. नीरज ने धान की सीधी बोआई, खरपतवार प्रबंधन, पोषक तत्वों के प्रबंधन आदि की जानकारी देते हुए पूसा संस्थान विभिन्न प्रजातियों के बारे में भी बताया. डा. ऋतु जैन प्रधान वैज्ञानिक (फूल विज्ञान) ने ड्रेन एवं स्वेज के पानी से फूलों की खेती के बारे में विस्तार से जानकारी दी.

डा. राकेश कुमार विज्ञानी (बागबानी) ने बागबानी की जानकारी देते हुए नए बाग की स्थापना के साथसाथ विभिन्न तकनीकियों जैसे मल्चिंग, ड्रिप सिंचाई पद्धति, कम समय में अधिक आय के साथसाथ विदेशी सब्जियों खेती की जानकारी दी.

कैलाश, कृषि प्रसार विशेषज्ञ ने कृषि में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) व डिजिटल कृषि के प्रभावी उपयोग पर विचार साझा किए, जिस से किसानों को वैज्ञानिक जानकारी समय पर मिल सके.

इसी क्रम में कृषि विज्ञान केंद्र, दिल्ली के वैज्ञानिकों ने आगामी खरीफ फसलों से संबंधित आधुनिक तकनीकों की जानकारी के साथ मृदा स्वास्थ्य कार्ड के अनुसार संतुलित खादों के प्रयोग, प्राकृतिक खेती, प्राकृतिक खेती के घटक, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की सारी जानकारी किसानों के साथ साझा की. इस कार्यक्रम के अंत में बृजेश कुमार, मृदा विशेषज्ञ ने किसानों को मिट्टी पानी जांच की जानकारी देते हुए किसानों को कार्यक्रम में शामिल होने के लिए धन्यवाद दिया व उन से आग्रह किया कि ये संदेश अधिक से अधिक किसानों तक पहुंचाए.
इस कार्यक्रम के दौरान, किसानों के प्रश्नों एवं समस्याओं के लिए विशेष सत्र का आयोजन कर के संतुष्ट जवाब एवं अमूल्य सुझाव दिए गए.

Nanotechnology : आने वाला समय नैनोटेक्नोलौजी का होगा

Nanotechnology : सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय के कौंफ्रेंस हाल में उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद ने मिल कर ‘नैनो कवकनाशीय एवं फसल सुरक्षा’ विषय पर एक दिवसीय किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया.

इस का उद्घाटन कृषि विश्वविद्यालय के कुल सचिव प्रोफैसर रामजी सिंह, निदेशक प्रसार डाक्टर पीके सिंह, निर्देशक शोध डाक्टर कमल खिलाड़ी, निदेशक ट्रेंनिंग प्लेसमैंट प्रोफैसर आरएस सेंगर व परियोजना के मुख्य अन्वेषक डा. नीलेश कपूर द्वारा किया गया.

निदेशक शोध डाक्टर कमल खिलाड़ी ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय में कई सालों से नैनो कवकनाशकों पर शोधकार्य हो रहे हैं और शुरुआती परिणाम बेहद उत्साहजनक हैं. उन्होंने बताया कि पारंपरिक कवकनाशकों की तुलना में नैनो रूपांतरित कवकनाशकों में रोग नियंत्रण की क्षमता कई गुना अधिक पाई गई है.

इस कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए मुख्य अतिथि डाक्टर रामजी सिंह ने कहा कि नैनो कवाकनाशकों की सहायता से कीट रोग नियंत्रण अब पर्यावरणीय खतरे को बचाए रखते हुए भी संभव हो सकेगा. उन्होंने कृषि में हो रहे परिवर्तन और किसानों की भूमिका पर बल देते हुए कहा कि अब समय आ गया है जब किसान वैज्ञानिकों के साथ मिल कर समस्याओं का समाधान खोजें.

इस परियोजना के मुख्य अन्वेषक डा. नीलेश कपूर ने कहा की नैनो कवकनाशियों को बनाने के लिए अनुसंधान कार्य तेजी से किया जा रहे हैं. उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद के सहयोग से इस परियोजना में नैनो कवकनाशियों के विकास के लिए कार्य किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि नैनो कवकनाशकों की विशेष सतही संरचना के कारण रोग नियंत्रण करने में बेहतर परिणाम मिलते हैं.
निदेशक प्रसार डा. पीके सिंह ने ग्रामीण क्षेत्रों में वैज्ञानिक जागरूकता की कमी को रेखांकित करते हुए कहा कि किसानों को मजबूत बनाने के लिए ऐसे प्रशिक्षण बहुत जरूरी हैं. उन्होंने कहा कि पारंपरिक रसायन की अधिकता से भूमि की उर्वरता घटती जा रही है जबकि नैनो तकनीकी पर्यावरण अनुकूलन व दीर्घकालिक समाधान प्रदान करती है.

निदेशक ट्रेंनिंग प्लेसमैंट डा. आरएस सेंगर ने कहा कि कृषि उत्पादन में टिकाऊ और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए नैनो तकनीकी एक प्रभावशाली साधन बन सकती है. उन्होंने कहा कि यह महाविद्यालय उत्तर प्रदेश में अग्रणीय भूमिका निभा रहा है और वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई यह तकनीक किसानों के लिए भविष्य में बहुत काम की  साबित हो सकती है. इस अवसर पर नैनो कवकनाशी किसान मार्गदर्शिका पुस्तक का विमोचन भी किया गया.

इस कार्यक्रम में वैज्ञानिक डा. रेखा दीक्षित ने किसानों को नैनो कवकनाशकों की संरचना क्रियाविधि और पौधों पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में जानकारी दी. उन्होंने कहा कि नैनो कण पौधों की कोशिकाओं तक पहुंच कर रोगजनकों को नष्ट कर देते हैं, जिस से रोग नियंत्रण अधिक प्रभावी होता है.
इस कार्यक्रम का संचालन प्रोफैसर पंकज चौहान और स्वागत भाषण नीलेश कपूर द्वारा दिया गया. इस अवसर पर मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, मेरठ, गाजियाबाद, बिजनौर, बागपत आदि जिलों के अलावा भमौरी, विरालसी, मैथना, पलहेड़ा, डोरली, चिरोड़ी, खेड़ा, पीरपुर, पावली, पवारसा, आदि गांव के 95 से अधिक किसान उपस्थित रहे. इस कार्यक्रम में डाक्टर बुध्यास गौतम, डा. पंकज चौहान, डाक्टर रेखा दीक्षित, डाक्टर नीलेश कपूर और अभिनव सिंह का विशेष योगदान रहा.

Agricultural Exhibition : नरसिंहपुर में हुआ कृषि प्रदर्शनी का आयोजन

Agricultural Exhibition : भारत के उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़, मध्यप्रदेश के राज्यपाल मंगुभाई पटेल एवं मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव ने नरसिंहपुर, मध्यप्रदेश में कृषि उद्योग समागम-2025 में पिछले दिनों कृषि प्रदर्शनी का आयोजन किया.

इस कृषि प्रदर्शनी में आधुनिक कृषि तकनीकों, यंत्रों और नवाचारों का प्रदर्शन किया गया. प्रदर्शनी में ड्रोन आधारित कृषि तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस उपकरण, पावर स्प्रेयर, सूक्ष्म सिंचाई संयंत्र, जैविक एवं नैनो फर्टिलाइजर सहित विविध नवीनतम संसाधनों को प्रदर्शित किया गया.

उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सभी स्टालों का अवलोकन कर विकसित की गई तकनीकों की तारीफ की. उन्होंने प्रदर्शनी में किसानों से बात कर उत्पादों की क्वालिटी, तकनीक एवं विपणन के विषय में जानकारी ली और उन के नवाचारों की सराहना की. साथ ही, उन्होंने ग्रामीण महिलाओं के प्रयासों की सराहना की एवं उन्हें आत्मनिर्भर भारत अभियान के लिए मजबूत कड़ी बताया.

इस के साथ ही, पशुपालन विभाग द्वारा गोवंश संवर्धन योजना के अंतर्गत प्रदर्शनी में भारतीय उन्नत नस्ल की दुधारू गायों का प्रदर्शन भी किया गया. इस में गिर नस्ल की उस गाय को विशेष रूप से प्रस्तुत किया गया, जो हाल ही में आयोजित भारतीय उन्नत नस्ल की दुधारू गाय प्रतियोगिता, 2025 में प्रथम स्थान प्राप्त किया था.

Mango Farming : आम की सघन बागबानी

Mango Farming : भारत में आम की औसत उत्पादकता 8.11 टन प्रति हेक्टेयर है. उत्तर प्रदेश में आम की पैदावार सब से ज्यादा 34 फीसदी होती है. विश्व बाजार में भारत का आम बहुत पसंद किया जाता है. दूसरे देशों को आम भेजने के लिए हमें इस की उत्पादकता और गुणवत्ता बढ़ाना बहुत जरूरी है.

आम की कम उत्पादकता का खास कारण बाग लगाने के 8-10 सालों तक कम उपज प्राप्त होना है, क्योंकि शुरुआती साल में बौर कम आते हैं और फसल कम होती है. इस तरह शुरू के कई सालों तक फायदेमंद उपज नहीं मिलती है और बाग में पेड़ों के बीच की जमीन पर दूसरी फसल उगा कर घाटा पूरा करना पड़ता है. आम की खास किस्मों जैसे कि दशहरी, लंगड़ा, बंबई हरा, चौसा, अल्फांसो, हिमसागर, बैगनपल्ली, केसर व मलगोवा वगैरह में हर साल अच्छी उपज नहीं होती है. इन में हर दूसरे साल में अच्छी उपज होती है. लिहाजा देर से लाभकारी मूल्य प्राप्त होने के कारण आम की बागबानी बड़े किसान ही करते हैं, जो शुरू के 10-15  सालों तक आम के बाग की लाभकारी उपज की कमी को सहन करने की कूवत रखते हैं. छोटे किसान आम की बागबानी में कम रुचि रखते हैं.

पेड़ों की आपसी दूरी कम कर के इन पेड़ों से शुरू के सालों से ही अच्छी उपज ले सकते हैं.

आम में हर साल फल के लिए यह जरूरी है कि फल तोड़ने के बाद हर साल नए प्ररोह आएं. हर साल पुष्पन वाले पेड़ों पर 6 महीने तक पुष्पन व फलन होता है और हर 6 महीने तक प्ररोहों की वृद्धि का समय होता है. इस से पेड़ों पर हर साल फलन होता है. आम में वृद्धि और पुष्पन साथसाथ नहीं होता है. सघन बागबानी में दशहरी किस्म के पेड़ों की आपस में दूरी 3.0×3.0 मीटर रख कर बागबानी की जा सकती है. आम की सघन बागबानी के लिए 1111 कलमी पौधे प्रति हेक्टेयर लगाए जाते हैं, जिस में पौधों की आपस की दूरी 3.0×3.0 मीटर होती है. सघन बागबानी में साधारण बागबानी की तरह गड्ढे खोदने की जरूरत नहीं होती है. आम के कलमी पौधों को सामान्य रूप से रोपा जाता है. पौध लगाने के बाद तुरंत सिंचाई की जाती है.

पोषण व सिंचाई

सघन बागबानी के खेत में प्रति हेक्टेयर 100 क्विंटल कंपोस्ट खाद जरूर डालनी चाहिए. साथ ही 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 75 किलोग्राम फास्फोरस व 75 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से बाग लगाने से पहले मिट्टी में मिला देते हैं. दोबारा अगले साल फास्फोरस और पोटाश के उर्वरकों का प्रयोग नवंबरदिसंबर में खेत की जुताई के साथ करते हैं, लेकिन नाइट्रोजन उर्वरक को जनवरीफरवरी व जुलाई में 2 बार बराबर मात्रा में डालते हैं. जनवरीफरवरी में नाइट्रोजन फलों के विकास के लिए और जुलाई में नए प्ररोह निकलने व बढ़वार के लिए जरूरी है. गरमी के मौसम में 1 हफ्ते के अंतर पर और सर्दी के मौसम में 15-20 दिनों के अंतर पर सिंचाई करना जरूरी है.

निराईगुड़ाई

सघन बाग में गुड़ाई 15-18 सेंटीमीटर से ज्यादा गहरी नहीं करते हैं. इस के लिए फावड़ा या पावर टिलर का प्रयोग किया जाता है. पहले 2-3 सालों में छोटे ट्रैक्टर द्वारा उथला हैरो चलाया जा सकता है. गुड़ाई का काम अक्तूबरनवंबर में जरूरी है. इस से बरसात में उगी बहुवर्षीय घासें आसानी से खत्म हो जाती हैं. बरसात के समय या पुष्पन और फलन के समय बाग की गुड़ाई नहीं करते हैं. इस से पौधे की बढ़वार व फलन पर असर पड़ता है. शुरू के सालों में जब तक पेड़ों की डालियां आपस में छूने के करीब नहीं आ जातीं और सूरज की रोशनी जमीन पर 50 फीसदी से अधिक पड़ती हो, पेड़ों के बीच अंत:फसल ली जा सकती है.

अंत:फसल में शुरू के 2-3 सालों तक दलहनी फसलें व सब्जियां जिन के पौधे बड़े नहीं होते हैं, ले सकते हैं. लेकिन इन के लिए फसल के अनुसार अतिरिक्त पोषण की जरूरत होती है. बाग की सिंचाई 15 दिनों के अंतर पर फरवरी से बरसात की शुरुआत तक जरूरी है, लेकिन आम के सघन बाग में अधिक सिंचाई नहीं करनी चाहिए.

कटाईछंटाई

आम के साधारण बाग में कटाईछंटाई व पेड़ के आकारप्रकार का नियंत्रण आमतौर पर नहीं किया जाता है. विकसित देशों में बड़े पेड़ों की कटाईछंटाई मशीनों द्वारा की जाती है. विकासशील देशों में इस प्रकार के यंत्रों की सुविधा नहीं है, लिहाजा हाथ से चलाए जाने वाले यंत्र द्वारा कटाईछंटाई करते हैं. इसी तरह सघन बागबानी में पौधों को एक खास आकार देने के लिए हर साल फल तोड़ने के तुरंत बाद  कटाईछंटाई जरूर करते हैं. इस के लिए पेड़ लगाने के पहले साल में हर पेड़ का मुख्य तना 50 सेंटीमीटर तक बढ़ने दिया जाता है और फरवरीमार्च में उसे लगभग 50 सेंटीमीटर की ऊंचाई से काट देते हैं. इस के बाद हर मुख्य तने के ऊपरी भाग से कई शाखाएं निकलती हैं और इन से 3 से 5 पहली शाखाओं को जो तने के चारों ओर से निकल रही हों, बढ़ने देते हैं और यदि इन की संख्या इस से अधिक है तो इन में से कमजोर शाखाओं को मुख्य तने से काट कर निकाल देते हैं. इस के लिए जरूरी है कि कली अवस्था में ही उसे तोड़ दें. इस से पेड़ चारों दिशाओं में लगभग एक ऊंचाई से समान रूप से बढ़ता है. दूसरे साल से जूनजुलाई में हर पहली शाखा के ऊपरी भाग को 3-4 पत्तियों सहित काट कर अलग कर देते हैं और इस प्रकार पेड़ चारों तरफ समान रूप से फैलता है.

कुलतार का प्रयोग

आम के पेड़ में ओज फल की किस्म पर निर्भर करती है और इसी कारण कम ओज वाले दशहरी किस्म में तीसरे साल फलन शुरू हो जाती है, जबकि लंगड़ा, चौसा फजली वगैरह किस्मों में पहले 6-7 सालों बाद फलन शुरू होती है, लेकिन ये सभी किस्में 1 साल के अंतर में फलती हैं. लिहाजा हर साल फलन व पेड़ की बढ़वार के नियंत्रण के लिए कुलतार का इस्तेमाल किया जाता है. इस के लिए हर पेड़ को उस की सालाना उम्र पर 1 मिली लीटर कुलतार को आधा लीटर पानी में मिला कर मुख्य तने के चारों ओर मिट्टी में मिला कर सिंचाई कर देते हैं, जिस से मुख्य जड़ के सहारे कुलतार पतली जड़ों तक पहुंच सके और जड़ों द्वारा सोख कर पेड़ के ऊपरी सिरे तक पहुंच सके. कुलतार के इस्तेमाल के लिए जरूरी है कि बाग की मिट्टी में 1-2 महीने तक सही नमी बनी रहे. जरूरत पड़ने पर बाग की सिंचाई भी की जा सकती है.

उत्तरी भारत में कुलतार के इस्तेमाल का सही समय 15 सितंबर से 15 नवंबर है. इस के इस्तेमाल से जुलाईअगस्त में आई नई शाखाओं पर फरवरीमार्च में पुष्पन व फलन होता है. दूसरे व तीसरे साल में कुलतार की मात्रा को क्रमश: हर पेड़ के हिसाब से आधा और एकचौथाई कर देते हैं, क्योंकि मिट्टी में इस्तेमाल किया गया कुलतार का ज्यादा समय तक असर रहता है और मिट्टी में मिलाने के दोढाई महीने बाद ही इस का असर दिखाई पड़ता है. 3 साल बाद दोबारा कुलतार की मात्रा जिस दर से पहले 2 सालों में बढ़ाई गई थी, दोबारा बढ़ाई जाए, जिस से पेड़ की बढ़वार हो और फलन भी अच्छा बना रहे.

कुलतार की उपलब्धता के लिए इंपीरियल कैमिकल इंडस्ट्रीज इंडिया, लि. 34 चौरंगी रोड कोलकाता से संपर्क करें, जो इंपीरियल कैमिकल इंडस्ट्रीज पीएसी इंगलैंड की सहायक कंपनी है.

Mango Farming

कीट व बीमारियां

फल तोड़ने के बाद शाखाओं की कटाईछंटाई करने से बारिश के मौसम में नए प्ररोह आते हैं. इन पर एंथ्रेक्नोज नामक बीमारी का खास असर होता है. इस के लिए कटाईछंटाई के तुरंत बाद 2 ग्राम ताम्रयुक्त फफूंदनाशक प्रति लीटर पानी की दर से व 1 फीसदी यूरिया के घोल का छिड़काव करते हैं और 15-20 दिनों बाद जब नए प्ररोह निकल रहे हों, तब इस घोल का दोबारा छिड़काव कर देते हैं. फूल निकलने से पहले और निकलते समय आम के भुनगे की रोकथाम के लिए 15 दिनों के अंतर पर 2 बार सेविन, कार्बोरिल, मोनोक्रोटोफास या डाइमेक्रान का छिड़काव करते हैं. बौर निकलते समय कीटनाशी का छिड़काव नहीं करते हैं. इस समय केवल चूर्णिल आसिता की रोकथाम के लिए कैराथेन का

6 मिलीलीटर प्रति 10 लीटर पानी की दर से छिड़काव करते हैं. फूल निकलने के समय के तुरंत बाद जब फल सरसों के दाने के बराबर दिखाई पड़ने लगें, उस समय 2 ग्राम प्रति लीटर ताम्रयुक्त फफूंदीनाशक के साथ भुनगे व चूर्णिल आसिता की रोकथाम के लिए पहले बताए गए कीटनाशी व फफूंदीनाशक रसायनों को छिड़कने से कीड़ों व बीमारियों के प्रकोप से बचा जा सकता है. इन्हीं कीटनाशक व फफूंदीनाशक रसायनों के साथ प्लेनोफिक्स या वर्धक या नेप्थालीन एसीटिक एसिड (25-50 पीपीएम या 25-50 मिलीग्राम प्रति लीटर) का इस्तेमाल कर सकते हैं और इस का छिड़काव 15 दिनों बाद दोहराना जरूरी होता है.

तोड़ाई व उपज

सघन बाग में फलों की तोड़ाई हाथ से आसानी से 2-3 पत्तियों व बौर की डंठल सहित काट कर करने से इन पेड़ों में दोबारा कटाईछंटाई का काम नहीं करना पड़ता है और फलों की तोड़ाई के समय ही कटाईछंटाई का काम पूरा किया जा सकता है. बौर के डंठल के साथ फलों का भंडारण करने से इन्हें काफी समय तक रखा जा सकता है. लिहाजा सघन बागबानी में इस प्रकार तोड़े गए फलों को दूर के बाजारों में भेजना आसान होता है.

सघन बाग में 5 साल से ही आम की उपज मिलने लगती है. 15 साल के बाद की उम्र तक आम की उपज साधारण बाग से 12 टन और सघन बागबानी से 112 टन प्राप्त होती है, जबकि इस उम्र के साधारण बाग से 8 साल तक आम की फसल से कोई खास आमदनी नहीं होती है और अच्छी आमदनी 15 साल बाद ही मिलती है. इसीलिए साधारण दूरी पर लगाए गए बागों में अंत:सस्यन बहुत जरूरी है.

इस प्रकार साधारण बागबानी के मुकाबले सघन बागबानी से 9-10 गुना अधिक उपज प्राप्त होती है.

अधिक जानकारी के लिए सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, अनुसंधान केंद्र नगीना से संपर्क करें.

कृषि क्षेत्र में हैं अपार रोजगार

उदयपुर :  देश के सुदूर गांवोंकसबों में बसे लोगों तक विभिन्न विषयों की जानकारी मुहैया कराने का रेडियोटैलीविजन एक सशक्त माध्यम है. ‘कृषि में संकट और तनाव’ विषयक कार्यक्रमों की अवधारणा और डिजाइन तैयार करने और प्रसारण के लिए एकदिवसीय कार्यशाला पिछले दिनों 27 फरवरी को हुई. कार्यशाला में 12 राज्यों के आकाशवाणी और दूरदर्शन में कार्यरत 30 अधिकारियों ने हिस्सा लिया.

उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने कहा कि कृषि क्षेत्र लंबे समय से भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा है, जो राष्ट्रीय आय और रोजगार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. भारतीय कृषि की यात्रा 1950 में मात्र 50 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन के साथ शुरू हुई, तब से हम ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

साल 2023-24 के दौरान 137.8 मिलियन टन चावल और 113.3 मिलियन टन गेहूं का रिकौर्डतोड़ उत्पादन किया. इस से निकट भविष्य में हमारी खाद्य सुरक्षा तो मजबूत हुई, लेकिन बढ़ती हुई आबादी के मद्देनजर प्राकृतिक संसाधनों की कमी और जलवायु परिवर्तन के चलते कृषि के विकास को बनाए रखना होगा.

उन्होंने आगे कहा कि पिछले कुछ दशकों में विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों ने अर्थव्यवस्था की वृद्धि में तेजी से योगदान दिया है, जबकि कृषि क्षेत्र का योगदान कम हुआ है. भारत में अभूतपूर्व कृषि संकट काफी समय से किसानों को प्रभावित कर रहा है. इन के पीछे के कारणों पर विचार करना होगा.

हाल के वर्षों में चरम जलवायु घटनाओं के साथसाथ बाजार और मूल्य में उतारचढ़ाव के चलते किसानों को कई बार आत्महत्या तक के लिए मजबूर होना पड़ा है. सच तो यह है कि हम कहीं न कहीं अपने किसानों के आर्थिक सशक्तीकरण और कल्याण के एजेंडा से चूक गए हैं.

उन्होंने यह भी कहा कि कृषि बाजार, कोल्ड स्टोरेज, गोदाम और कृषि प्रसंस्करण सहित कृषि बुनियादी ढांचे का विकास कृषि उत्पादन में वृद्धि के अनुरूप गति से नहीं हुआ है. भारत में कृषि संकट को कम करने के लिए किसानों की आय बढ़ाने के लिए नीतियां बनानी होंगी. रोजगार के अवसर पैदा करने होंगे. डिजिटल कृषि मिशन, सतत कृषि मिशन, प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय मिशन, बीज और रोपण सामग्री पर उपमिशन की आवश्यकता है.

डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने कहा कि आकाशवाणी और दूरदर्शन प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के अग्रदूत हैं. इन में ग्रामीण लोगों की मानसिकता को ऊपर उठाने की क्षमता है. डीडी किसान दूरदर्शन का प्रमुख चैनल है.

प्रसार भारती की अतिरिक्त महानिदेशक अनुराधा अग्रवाल ने कहा कि पर्याप्त प्रचारप्रसार की कमी में किसान सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित हैं. प्रसार भारती व इस से जुड़े अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि ऐसी योजनाओं को उन लोगों तक पहुंचाए. कृषि संबंधी प्रसारण से युवा व महिलाओं का ज्ञानवर्द्धन होगा और वे कृषि से जुड़ेंगे. हर क्षेत्र की जलवायु अलगअलग है. वहां के इको सिस्टम को समझ कर कार्यक्रम तैयार करें, ताकि योजनाओं का समग्र लाभ उन्हें मिल सके. उन्होंने कहा कि किसान खुश नहीं है. परेशान हो कर वह अन्न पैदा कर रहा है, जो कभी भी किसी के अंग नही लगेगा.

अटारी, जोधपुर के निदेशक डा. जेपी मिश्रा ने कहा कि देश में वर्तमान में 731 कृषि विज्ञान केंद्र  कार्यरत हैं. रेडियो व दूरदर्शन पर भी किसान हित के अनेकों कार्यक्रम प्रसारित होते हैं, लेकिन किसान किनकिन समस्याओं का सामना कर रहा है, इस का खयाल किसी को नहीं है. कम जोत के कारण किसान बेबस है. आज वह उत्पादन, कीमतों, आय और रोजगार के चक्रव्यूह में फंस कर रह गया है.

एनएबीएम, नई दिल्ली के पाठ्यक्रम निदेशक डा. उमाशंकर सिंह ने कहा कि आकाशवाणी व दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम तार्किक हों, शोधपरक हों, ताकि जो ज्ञान किसानों तक पहुंचे, उस का पूर्ण लाभ मिल सके. जिला स्तर पर तैनात कृषि विभाग के अधिकारियों को भी अपडेट करना होगा, ताकि नवीनतम तकनीकयुक्त ज्ञान का प्रसारण हो.

इस कार्यक्रम में वरिष्ठ अधिकारी परिषद के सदस्य डा. अरविंद वर्मा, डा. आरबी दुबे, डा. सुनील जोशी, डा. वी. नेपालिया, डा. एसके इंटोदिया एवं डा. राजीव बैराठी मौजूद रहे.

कृषि उत्पादन वृद्धि (Agricultural Production) के लिए भरतपुर में कार्यशाला

भरतपुर : देश के विभिन्न क्षेत्रों में कृषि उत्पादन की वृद्धि के लिए अपनाई जा रही तकनीक व कृषि क्रियाओं पर काम कर रही विभिन्न संस्थानों के अनुभवों को साझा कर समावेशी जिला विकास मौडल बनाने की दृष्टि से भरतपुर में ‘समृद्ध भारत अभियान’ संस्था की पहल पर दोदिवसीय कार्यशाला का आयोजन हुआ.

इस आयोजन में विषय विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, चिंतक व विचारकों ने भाग लिया. कार्यशाला में विभिन्न संस्थाओं के कार्यों एवं कृषि उत्पादन वृद्धि और रसायनमुक्त खेती के संबंध में आए सुझावों को नीति आयोग को भेजा जाएगा, ताकि नीति आयोग ग्रामीण विकास अथवा आकांक्षी जिला कार्यक्रम में इन सुझावों को शामिल कर सके, ताकि किसानों की आमदनी बढ़ सके.

‘समृद्ध भारत अभियान’ के निदेशक सीताराम गुप्ता ने बताया कि कार्यशाला में ‘राष्ट्रीय रबड़ बोर्ड’ के चेयरमैन डा. सांवर धनानिया, भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी नरेंद्र सिंह परमार, वेद प्रकाश, ग्वालियर के संत स्वामी ऋषभ देवानंद, कनेरी मठ (महाराष्ट्र) के कृषि विशेषज्ञ डा. रविंद्र सिंह, ‘सर्वोदय फाउंडेशन’ की अंशु गुप्ता, ‘जीवजंतु कल्याण बोर्ड’ के सदस्य जब्बर सिंह, नोएडा, उत्तर प्रदेश के सत्येंद्र सिंह, विमल पटेल, पना (भरतपुर) के कमल सिंह, इंदौर की रीना भारतीय, जालौर (राजस्थान) के ईश्वर सिंह, ग्वालियर के डा. अंकित अग्रवाल, संजीव गोयल, आगरा के मो. हबीब, इंदौर की ध्वनि रामा, कांकरोली (राजसमंद) के विनीत सनाढ्य आदि ने कृषि एवं गोपालन के क्षेत्र में किए जा रहे अनुभवों की जानकारी दी.

कार्यशाला में सभी वक्ताओं ने सुझाव दिया कि रसायनमुक्त एवं कीटनाशकमुक्त खेती करने के लिए हमें प्राचीन परंपरागत खेती अर्थात प्राकृतिक व जैविक खेती शुरू करनी होगी. साथ ही, खेती के साथ गोपालन के काम को भी प्रोत्साहित करना होगा.

कृषि उत्पादन वृद्धि (Agricultural Production)

सभी वक्ताओं ने बताया कि रसायन एवं कीटनाशक दवाओं के उपयोग के चलते कृषि उत्पाद इतने जहरीले हो गए हैं कि इन से आज कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी सामने आ रही है. सभी वक्ताओं ने एक मत से सुझाव दिया कि केंद्र सरकार को प्राकृतिक खेती अथवा जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए सभी ग्राम पंचायत मुख्यालयों पर प्रशिक्षण शिविर व प्रदर्शन आयोजित किए जाएं.

सभी विशेषज्ञों का कहना था कि जैविक खेती की शुरुआत में कृषि उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा, किंतु मानव शरीर पर रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों के कारण पैदा होने वाली बीमारियों से जरूर नजात मिल जाएगी.

सभी वक्ताओं ने कहा कि केंद्र व राज्य सरकारों को जैविक उत्पादों के प्रमाणीकरण की जटिल प्रक्रिया को आसान बनाना होगा और प्राकृतिक अथवा जैविक खेती को प्रोत्साहन देने के लिए विशेष अनुदानित योजना लागू करनी होगी.

महिलाओं और युवाओं को मिलेंगे रोजगार (Employment)

नई दिल्ली: केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने नई दिल्ली में 10,000 नवगठित बहुद्देशीय प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS), डेयरी व मत्स्य सहकारी समितियों का शुभारंभ किया. उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपयी की जन्म शताब्दी के दिन 10,000 नई बहुद्देश्यीय प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (MPACS), डेयरी व मत्स्य सहकारी समितियों का शुभारंभ हो रहा है.

अमित शाह ने कहा कि 19 सितंबर, 2024 को इसी स्थान पर हम ने एक SOP बनाई थी. उस के 86 दिन के अंदर ही हम ने 10,000 पैक्स को रजिस्टर करने का काम समाप्त कर दिया है. जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सहकारिता मंत्रालय की स्थापना की, तो उन्होंने ‘सहकार से समृद्धि’ का मंत्र दिया था.

मंत्री अमित शाह ने आगे कहा कि ‘सहकार से समृद्धि’ तभी संभव है, जब हर पंचायत में सहकारिता उपस्थिति हो और वहां किसी न किसी रूप में काम करे. उन्होंने कहा कि हमारे देश के त्रिस्तरीय सहकारिता ढांचे को सब से ज्यादा ताकत प्राथमिक सहकारी समिति ही दे सकती है, इसलिए मोदी सरकार ने 2 लाख नए पैक्स बनाने का निर्णय लिया था.

केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा कि नाबार्ड (NABARD), एनडीडीबी(NDDB) और एनएफडीबी (NFDB) ने 10,000 प्राथमिक सहकारी समितियों के पंजीकरण में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है. सहकारिता मंत्रालय की स्थापना के बाद सब से बड़ा काम सभी पैक्स का कंप्यूटराइजेशन करने का काम किया गया.

उन्होंने आगे कहा कि कंप्यूटराइजेशन के आधार पर पैक्स को 32 प्रकार की नई गतिविधियों से जोड़ने का काम किया गया. हम ने पैक्स को बहुआयामी बना कर और उन्हें भंडारण, खाद, गैस, उर्वरक एवं जल वितरण के साथ जोड़ा है.

मंत्री अमित शाह ने कहा कि ट्रेंड मैनपावर न होने के कारण ये सब हम नहीं कर सकते. इस के लिए आज यहां प्रशिक्षण मौड्यूल का भी शुभारंभ हुआ है, जो पैक्स के सदस्यों और कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने का काम करेंगे.

उन्होंने आगे यह भी कहा कि ये प्रशिक्षण मौड्यूल हर जिला सहकारी रजिस्ट्रार की जिम्मेदारी बनेगी कि पैक्स के सचिव एवं कार्यकारिणी के सदस्यों का अच्छा प्रशिक्षण सुनिश्चित हो.

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि यहां 10 सहकारी समितियों को रुपे किसान क्रेडिट कार्ड (RuPay Kisan Credit Card), माइक्रो एटीएम (Micro ATM) का वितरण किया गया है. इस अभियान के तहत आने वाले दिनों में हर प्राथमिक डेयरी को माइक्रो एटीएम दिया जाएगा. माइक्रो एटीएम और रुपे किसान क्रेडिट कार्ड (RuPay Kisan Credit Card) हर किसान को कम खर्च पर लोन यानी ऋण देने का काम करेगा.

मंत्री अमित शाह ने कहा कि पैक्स के विस्तार के लिए विजिबिलिटी, रेलेवेंस, वायबिलिटी और वाइब्रेंसी का ध्यान रखा गया है. पैक्स में 32 कामों को जोड़ कर इसे विजिबल और वायबल बनाया गया है.

उन्होंने जानकारी देते हुए कहा कि गांव में कौमन सर्विस सैंटर (Common Service Centre) (CSC) का जब पैक्स बन जाता है, तो गांव के हर नागरिक को किसी न किसी रूप में पैक्स के दायरे में आना पड़ता है. इस प्रकार हम ने इस की रेलेवेंस भी बढ़ाई है.

गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि जब पैक्स गैस वितरण, भंडारण, पैट्रोल वितरण आदि का काम करते हैं, तो उन की वाइब्रेंसी अपनेआप बढ़ जाती है. साथ ही, पैक्स के बहुद्देश्यीय होने से पैक्स का जीवन भी लंबा होने की पूरी संभावना रहती है.

उन्होंने कहा कि यह एक बहुद्देशीय कार्यक्रम है, जिस से किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने का प्रयास होगा.

मंत्री अमित शाह ने कहा कि कंप्यूटराइजेशन और टैक्नोलौजी से पैक्स में पारदर्शिता आएगी, सहकारिता का जमीनी स्तर पर विस्तार होगा और ये महिलाओं और युवाओं के रोजगार का माध्यम भी बनेगा. साथ ही, पैक्स, कृषि संसाधनों की आसान उपलब्धता भी सुनिश्चित करेगा.

अमित शाह ने कहा कि हमारी 3 नई राष्ट्रीय स्तर की कोऔपरेटिव्स के माध्यम से पैक्स, और्गेनिक उत्पादों, बीजों और ऐक्सपोर्ट के साथ किसानों की समृद्धि के रास्ते भी खोलेगा. इस से सामाजिक और आर्थिक समानता भी आएगी, क्योंकि नए मौडल में महिलाओं, दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों की भागीदारी सुनिश्चित की है, जिस से सामाजिक समरसता भी बढ़ेगी.

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा कि मोदी सरकार ने लक्ष्य रखा है कि अगले 5 साल में 2 लाख नए पैक्स का गठन करेंगे. उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि 5 साल से पहले ही हम इस लक्ष्य को पूरा लेंगे.

उन्होंने आगे बताया कि पहले चरण में नाबार्ड 22,750 पैक्स और दूसरे चरण में 47,250 पैक्स बनाएगा. इसी प्रकार एनडीडीबी 56,500 नई समितियां बनाएगा और 46,500 मौजूदा समितियों को और मजबूत बनाएगा. वहीं एनएफडीबी 6,000 नई मत्स्य सहकारी समितियां बनाएगा और 5,500 मौजूदा मत्स्य सहकारी समितियों का सशक्तीकरण करेगा. इन के अलावा राज्यों के सहकारी विभाग 25,000 पैक्स बनाएंगे.

अमित शाह ने इस अवसर पर कहा कि नए मौडल के साथ अब तक 11,695 नई प्राथमिक सहकारी समितियां पंजीकृत हुई हैं, जो हमारे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है. साथ ही, 2 लाख नए पैक्स बनने के बाद फौरवर्ड और बैकवर्ड लिंकेजेस के माध्यम से किसानों की उपज को वैश्विक बाजार में पहुंचाना बड़ा आसान हो जाएगा.