Silage : इन चारा फसलों से करें साइलेज तैयार, सालभर मिलेगा हरा चारा

Silage: पशुपालन में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है साल भर गुणवत्ता वाला हरा चारा (Silage) उपलब्ध कराना. पहले जहां हरे चारे की कमी को केवल गर्मी या सर्दी के कुछ महीनों की समस्या माना जाता था, वहीं अब मौसम के बदलते मिजाज और अनियमित बारिश के कारण यह परेशानी पूरे साल बनी रहती है. खासतौर पर मानसून के दिनों में अच्छी गुणवत्ता का हरा चारा या तो मिलता नहीं है, और अगर मिलता भी है तो वह नमी और फफूंद की वजह से पशुओं के स्वास्थ्य के लिए जोखिम भरा हो सकता है.

ऐसे में साइलेज (Silage) पशुपालकों के लिए एक भरोसेमंद समाधान बनकर उभरा है. यह हरे चारे को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की वैज्ञानिक और किफायती तकनीक है, जिसे घर पर भी तैयार किया जा सकता है. सही समय पर बनाया गया साइलेज बरसात और चारे की कमी के मौसम में पशुओं को पौष्टिक आहार उपलब्ध कराता है.

मई-जून क्यों है सही समय

चारा विशेषज्ञों के अनुसार मई-जून का समय साइलेज (Silage) बनाने की तैयारी के लिए सबसे उपयुक्त होता है. इस दौरान चार प्रमुख चारा फसलें ज्वार, बाजरा, लोबिया और मक्का कटाई के लिए तैयार हो जाती हैं. ये चारों फसलें पौष्टिक तत्वों से भरपूर होती हैं और पशुओं के दूध उत्पादन तथा स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी मानी जाती हैं. यदि इनकी कटाई के समय थोड़ी योजना बना ली जाए, तो इन्हें साइलेज के रूप में संग्रहित कर पूरे मानसून और चारे की कमी वाले महीनों में इस्तेमाल किया जा सकता है.

साइलेज बनाने की आसान प्रक्रिया

साइलेज बनाना कोई बहुत जटिल तकनीक नहीं है, लेकिन इसमें साफ-सफाई और नमी नियंत्रण सबसे महत्वपूर्ण है. सबसे पहले जिस हरे चारे का साइलेज (Silage) बनाना हो, उसकी कटाई सुबह के समय करें. इससे पूरे दिन का समय चारे को हल्का सुखाने के लिए मिल जाता है.

ध्यान रखें कि चारे को सीधे जमीन पर न सुखाएं, क्योंकि इससे फफूंद लगने का खतरा बढ़ जाता है. बेहतर होगा कि इसे लोहे की जाली, स्टैंड या छोटे-छोटे गठ्ठर बनाकर लटकाकर सुखाया जाए. जब चारे में लगभग 15–18 प्रतिशत नमी रह जाए, तभी उसे साइलेज की प्रक्रिया में शामिल करना चाहिए.

इसके बाद चारे को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर गड्ढे, ड्रम या प्लास्टिक बैग में अच्छी तरह दबाकर भर दिया जाता है, ताकि अंदर हवा न रह जाए. हवा की अनुपस्थिति में किण्वन की प्रक्रिया होती है, जिससे चारा लंबे समय तक सुरक्षित रहता है.

पतले तने वाली फसल क्यों बेहतर

विशेषज्ञों का मानना है कि पतले तने वाली चारा फसल का साइलेज (Silage) अधिक अच्छा बनता है. इसका कारण यह है कि पतले तने जल्दी सूखते हैं और उनमें नमी कम रहती है, जिससे फफूंद का खतरा घट जाता है.

इसलिए फसल को पूरी तरह पकने से पहले काट लेना बेहतर रहता है. तने को हाथ से तोड़कर उसकी नमी का अंदाजा लगाया जा सकता है. यदि तना आसानी से टूट जाए, तो यह साइलेज के लिए उपयुक्त माना जाता है.

पशुपालकों के लिए क्या है फायदा

साइलेज का सबसे बड़ा लाभ यह है कि बरसात और सूखे के दिनों में भी पशुओं को पौष्टिक हरा चारा मिलता रहता है. इससे दूध उत्पादन में गिरावट नहीं आती और पशुओं का स्वास्थ्य बेहतर बना रहता है.

इसके अलावा, मौसम के दौरान महंगे दामों पर खराब गुणवत्ता का चारा खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे लागत कम होती है. छोटे और मध्यम पशुपालकों के लिए यह तकनीक कम लागत में अधिक लाभ का जरिया बन सकती है.

बदलते मौसम और चारे की बढ़ती लागत के दौर में साइलेज बनाना अब विकल्प नहीं, बल्कि स्मार्ट पशुपालन की जरूरत बनता जा रहा है. मई-जून में कटने वाली ज्वार, बाजरा, लोबिया और मक्का जैसी फसलों का सही तरीके से साइलेज (Silage) बनाकर पशुपालक सालभर हरे चारे की समस्या से राहत पा सकते हैं.

थोड़ी सावधानी, सही नमी और साफ-सुथरी प्रक्रिया अपनाकर तैयार किया गया साइलेज पशुपालन को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बना सकता है.

Goat Farming: व्यावसायिक बकरीपालन – गांवों का एटीएम

Goat Farming: अगर बकरीपालन करने वाले व्यावसायिक तरीके से गोट फार्मिंग (बकरीपालन) करें तो बकरियों की तादाद और आमदनी दोनों में इजाफा हो सकता है. बड़े पैमाने पर बकरीपालन शुरू करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की बकरीपालन योजनाओं और अनुदान का लाभ लिया जा सकता है.

सब से पहले यह समझना जरूरी है कि व्यावसायिक बकरीपालन (Goat Farming) क्या है? इस में 100 से 1000 बकरियों को एक ही बाड़े में रखा जाता है और बड़े नाद में सभी को एकसाथ खाना खिलाया जाता है. यह तरीका मुरगीपालन की तरह ही होता है. घर में 5-7 बकरियां पालने और बकरियों का व्यावसायिक रूप से पालन करने में फर्क है.

बकरीपालन से रोजगार

अगर एक परिवार में कम से कम 100 बकरियों का पालन करें तो उस परिवार के 6-8 लोगों को काम मिलेगा और आमदनी भी बढ़ेगी. गौरतलब है कि भारत में मांस की मांग करीब 80 लाख टन है, जबकि 60 लाख टन का ही उत्पादन हो पाता है. इस में बकरी के मांस की खपत 12 फीसदी ही है.

बकरीपालन गांवों का एटीएम’

बकरीपालन की सब से बड़ी खासीयत यह है कि बाढ़ या सूखा जैसी आपदा होने पर ये फसलों की तरह बरबाद नहीं होती हैं. दूसरी बड़ी खासीयत यह है कि अचानक पैसों की जरूरत पड़ने पर बकरियों को बेचा जा सकता है, यानी इन्हें कभी भी कैश कर लीजिए. इसलिए इन्हें ‘गांवों का एटीएम’ कहा जाता है.

मिलते हैं अच्छे दाम

बकरी की तीसरी खासीयत यह है कि वह दूसरी चीजों की तरह खराब नहीं होती. उसे कभी भी कहीं भी बेचा जा सकता है. कई अवसरों पर तो बकरियों की मुंहमांगी कीमत मिलती है. ऐसे अवसरों को भुनाने के लिए बकरीपालक बकरियों को अच्छी तरह खिलापिला कर बड़ा करते हैं.

बकरीपालन यूनिट

पशु वैज्ञानिक डा. सुरेंद्र नाथ बताते हैं कि गोट फार्मिंग की एक मिनी यूनिट में 20 बकरियां और 1 बकरा  होता है, जबकि बड़ी यूनिट में 40 बकरियां और 2 बकरे होते हैं. साधारण किस्म की बकरी 1 साल में 2 बार 2-2 बच्चे देती है. कुछ बकरियां 3-4 बच्चे भी देती हैं. इस हिसाब से 20 बकरियों वाली यूनिट से 1 साल में कम से कम 80 बच्चे मिल सकते हैं.

व्यावसायिक बकरीपालन के लिए मुख्य जरूरी चीजों के बारे में विशेषज्ञों से सलाह ले कर काम चालू करना चाहिए.

किसानों को होने वाली आमदनी का आधा हिस्सा पशुधन से ही आता है और बकरी गरीब राज्यों के लिए गाय की तरह है. बकरियों की नस्लों को सुधार कर बीपीएल परिवारों की आमदनी को आसानी से बढ़ाया जा सकता है.

Goat Farming: बकरीपालन में बरतें सावधानी, समय पर कराएं टीकाकरण

Goat Farming : कम आय वर्ग के लोग आमदनी बढ़ाने के लिए बकरीपालन का काम भी करते हैं, जो एक मुनाफा देने वाला रोजगार है, लेकिन कई बार उनके टीकाकरण में लापरवाही बरतने लगते हैं, जिससे फायदे का कारोबार घाटे का रोजगार साबित होता है. इसके लिए जरूरी है कि लोग समय पर टीकाकरण करवाएं.

थोड़ी लापरवाही, बड़ा नुकसान

अगर कोई बकरीपालन (Goat Farming) कर रहा है, तो उसे सावधान और सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि अगर थोड़ी सी भी लापरवाही बकरियों के रखरखाव और उनके टीकाकरण को लेकर के हुई तो सारी की सारी बकरियां मर सकती हैं. इस वजह से लोगों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है, क्योंकि पशुओं में बीमारी एक-दूसरे में बड़ी तेजी से फैलती है.

बकरियों में प्लेग, समय पर टीकाकरण जरूरी

बकरीपालन (Goat Farming) में लोगों को अच्छा मुनाफा होता है और अनेक परिवार छोटी-छोटी जगहों पर लोग बकरीपालन करते हैं. बकरी का दूध और उनके बच्चों को बेचकर लोग अच्छा मुनाफा कमाते हैं. खासकर मलेरिया, डेंगू होने के समय बकरी के दूध की मांग काफी बढ़ जाती है और ऐसे समय में महंगे दामों पर भी दूध बिकता है.

हाल ही में संदीप कुमार, केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान, मथुरा ने बताया कि इन दिनों बकरियां में प्लेग नामक बीमारी काफी देखने के लिए मिल रही है, जिसके लिए जरूरी है कि लोग समय पर टीकाकरण करवाएं.

क्यों लगवाना जरूरी है टीका?

-बकरी प्लेग हर 3 साल पर बकरियां में फैल जाता है.

-समय पर अगर पीपीआर का टीका नहीं लगवाया गया तो सारी की सारी बकरियां मर सकती हैं.

-यह रोग एक बकरी से दूसरी बकरी में फैल जाता है, इसलिए इसका टीका लगवाना जरूरी है.

-टीके की कीमत प्रति बकरी सिर्फ 5 रुपए होती है.

-इसके अलावा जब बकरियों में बीमारी तब फैलती है जब बकरियों के खाने-पीने में बदलाव किया जाता है.

कौन सा टीकाकरण कब करवाएं

–पीपीआर (बकरी प्लेग)- 3-4 महीने की उम्र में (जीवन में एक बार या 3 साल में पुनरावृत्ति).

– एफएमडी (खुरपका/मुंहपका)- 4 महीने से ऊपर. हर 6 महीने में (फरवरी-मार्च और सितंबर-अक्तूबर).

– ईटी (एंटरोटॉक्सिमिया/घेंघा रोग)- 3-4 महीने से ऊपर हर 6 महीने में (बारिश से पहले सबसे जरूरी).

– टीटी (टिटनेस-धनुस्तंभ)- 3-4 महीने की उम्र में फिर प्रतिवर्ष.

– बकरी चेचक- 3-4 महीने से ऊपर, हर साल.

पशु विशेषज्ञों का कहना है कि अगर आपने समय पर सभी बकरियों को इतने टीके लगवाए हैं, तो आपकी बकरी हमेशा सुरक्षित रहेगी और सेहतमंद रहेगी और बेहतर दूध उत्पादन के साथ आपको मुनाफा देने का काम करेगी.

Dairy Animals : दुधारू पशुओं का ऐसे बढ़ाएं दूध

Dairy Animals : गर्मियों के दिनों में अक्सर दुधारू पशुओं का दूध कम हो जाता है, क्योंकि इन दिनों बढ़ते तापमान के चलते हरे चारे की कमी होने लगती है. अगर आपके साथ भी कुछ ऐसा हो रहा है, तो परेशान होने की बात नहीं है. इसके लिए करने होंगे ये काम :

बरसीम से बढ़ेगा दूध

यदि आप दुधारू पशुओं के कम दूध उत्पादन से परेशान हैं तो उन्हें प्रोटीन भरपूर मात्रा में दें और हरे चारे के रूप में पशुओं को बरसीम जरूर खिलाएं, क्योंकि बरसीम पशुओं में दूध की मात्रा बढ़ाने का काम करती है.

मिनरल मिक्चर तथा कैल्शियम भी जरूरी

पशुओं को मिनरल मिक्चर तथा कैल्शियम भी दें, क्योंकि यह पशुओं को दूध बढ़ाने में मदद करता है और कई तरह की बीमारियों से दूर रखता है. कैल्शियम शरीर को ताकतवर बनाता है और पशु स्वस्थ रहता है, इसलिए दुधारू पशु स्वस्थ है तो अच्छा दूध उतपादन निश्चित है.

चारे में सफाई का रखें ध्यान

यदि दुधारू पशुओं को भरपूर मात्रा में कैल्शियम नहीं मिलता है तो उससे कई तरह की बीमारियां शुरू हो सकती हैं. ऐसी ही एक बीमारी है मिल्क फीवर. इस बीमारी में पशु का दूध नहीं बन पाता है, इसलिए दुधारू पशु को कैल्शियम और सप्लीमेंट देना जरूरी है. इसके अलावा चारा भी साफ-सुथरा होना चाहिए. अगर आप सूखे भूसे में बरसीम मिला रहे हैं तो ध्यान रखें कि भूसा में किसी प्रकार का फंगल न लगा हो, भूसा साफ और सूखा होना चाहिए.

पशु बीमार होने पर करें ये काम

मौसम बदल रहा है. बदलते मौसम में अनेक तरह की बीमारियों का डर भी लगा रहता है. इस समस्या से बचने के लिए समय-समय पर पशुओं का टीकाकरण जरूर करवाएं. आप टोल फ्री नंबर 1962 पर फोन कर अपने पशु का निशुल्क टीकाकरण करा सकते हैं.

पशुओं की मौसम के अनुसार सही देखभाल, खानपान और टीकाकरण जरुरी है, जिससे आप अपने दुधारू पशु से ब्यांत दर ब्यांत अच्छा दूध उत्पादन ले सकते हैं.

Donkey Rearing: पालें गधे, लें मुनाफे के मजे

Donkey Rearing : बेरोजगारी के दौर में लोग नए-नए मौके की तलाश में रहते हैं और इन्हीं में से एक मजेदार रोजगार है गधा पालन. यह आपको अटपटा जरूर लगेगा, लेकिन यह कम खर्च, कम जोखिम वाला फायदे का रोजगार है. आइए जानते हैं कैसे…

स्कीम सरकारी, मुनाफा आपका

सरकार की यह एक अनोखी स्कीम है. इस स्कीम के तहत आपको गधा पालने पर सरकार 50 लाख रुपए तक की मदद दे रही है. यह मजाक नहीं, एक सरकारी स्कीम है, जिसका फायदा आप भी उठा सकते हैं. दरअसल, देश में गधों की संख्या में भरी कमी हो रही है. इसी कमी को पूरा करने के लिए सरकार देश में गधों को पालने वालों को बड़ी सब्सिडी दे रही है. अगर आप भी पशुपालन कर इस अनोखी स्कीम का फायदा उठाना चाहते हैं, तो चलिए जानते हैं क्या है यह स्कीम?

गधों की हो रही कमी, सरकार दे रही सब्सिडी

देश में गधों की पशुगणना के अनुसार गधों की गिनती में भारी कमी आई है. देश के 28 राज्यों में ही गधे हैं. कुछ राज्यों में इनकी संख्या बहुत ही सीमित रह गई है, इसलिए सरकार चाहती है कि इनकी स्वदेशी नस्लें बची रहें.

राष्ट्रीय पशुधन मिशन (NML) में गधे, घोड़े शामिल

राष्ट्रीय पशुधन मिशन योजना की शुरुआत 2014-15 में शुरू हुई थी. इस योजना का मकसद रोजगार बढ़ाना, पशु नस्लों में सुधार करना और दूध, मांस, का कारोबार बढ़ाना है. अब इस योजना में गधे, घोड़े और ऊंटों को भी शामिल कर लिया गया है और सरकार चाहती है कि लोग इन जानवरों को पालें और उनकी नस्लें बचीं रहें.

क्या है योजना

इस योजना के तहत अगर कोई पशुपालक गधे, घोड़े या ऊंट पालन के लिए आवेदन करता है, तो उसे प्रोजेक्ट की कुल लागत का 50 फीसदी रकम सब्सिडी के रूप में मिलेगी. यह मदद नए प्रजनन फार्म या वीर्य स्टेशन बनाने के लिए भी दी जाएगी, जिसकी लिमिट 10 करोड़ रुपए तक हो सकती है.

क्या हैं शर्तें

गधा पालन के लिए न्यूनतम यूनिट 50 मादा और 5 नर है. घोड़े के लिए 10 मादा और 2 नर की न्यूनतम यूनिट तय है. योजना सिर्फ स्वदेशी नस्लों के लिए है और सब्सिडी दो किस्तों में दी जाती है.

गधी का दूध बिकता है हजारों रुपए प्रति लीटर

आज बाजार में गधी का दूध 5,000 से 7,000 रुपए प्रति लीटर तक बिक रहा है. इसकी डिमांड औषधीय उत्पादों, कॉस्मेटिक और ब्यूटी प्रोडक्ट्स में तेजी से बढ़ी है. कई कंपनियां इससे साबुन, क्रीम और मॉइस्चराइजर बना रही हैं. सरकार गधी के दूध और उससे बनने वाले प्रोडक्ट्स को प्रमोट कर रही है.

गधे की खास नस्लें

पशुपालन विशेषज्ञों के मुताबिक :

-हलारी और कच्छी नस्ल के गधे पालन के लिए बेहतर माने जाते हैं.

-ये मजबूत होते हैं और कम देखभाल में भी स्वस्थ रहते हैं.

-एक स्वस्थ मादा गधी साल में एक बच्चे को जन्म देती है.

कैसे करें आवेदन

अगर आप भी राष्ट्रीय पशुधन मिशन योजना के तहत गधे पालना चाहते हैं तो और 50 लाख रुपए तक की सब्सिडी पाना चाहते हैं, तो इस योजना की ऑफिशियल वेबसाइट nlm.udyamimitra.in पर जाकर अप्लाई कर सकते हैं.

ग्रामीण इलाकों में गधा पालन कमाई का नया और फायदेमंद रोजगार बन सकता है. कम निवेश में शुरू होने वाला यह व्यवसाय छोटे किसानों और भूमिहीन परिवारों के लिए भी उपयुक्त है.

Animal Treatment: घर बैठे पशु का इलाज केवल 2 रुपए में

Animal Treatment: गांव-देहात में पशुपालकों के सामने पशु के बीमार होने पर उसकी सबसे बड़ी समस्या पशु चिकित्सक तक ले जाने की होती है. ऐसी समस्या के समाधान के लिए केंद्र सरकार ने ग्रामीण इलाकों में रहने वाले पशुपालकों के लिए एक ऐसी योजना चला रखी है जिसके तहत मात्र 2 रुपए में आप अपने बीमार पशु का इलाज घर बैठे करा सकते हैं. क्या है यह योजना और कैसे होता है केवल 2 रुपए में इलाज, आइए जानते हैं.

टोल-फ्री नंबर पर करें फोन

पशु के बीमार होने पर आपको टोल-फ्री नंबर 1962 पर फोन करना है. इसके बाद पशु का इलाज करने वाली मोबाइल वेटरनरी यूनिट की पूरी टीम दवाओं सहित आपके घर तक पहुंच जाएगी. यह सेवा उत्तर प्रदेश से लेकर राजस्थान, बिहार, छत्तीसगढ़ राज्यों तक फैल चुकी है, जो पशुपालन के रूप में इस्तेमाल होने वाले पशुओं का इलाज घर बैठे करने की सुविधा दे रही है.

क्या है यह योजना

‘पशुधन स्वास्थ्य एवं रोग नियंत्रण कार्यक्रम’ के तहत लागू हुई यह योजना दूरदराज के गांवों में पशुओं को तुरंत इलाज मिल सके, इसकी सुविधा मोबाइल वैन के साथ शुरू की गई थी. इन वैनों में पशु चिकित्सक, पैरामेडिकल स्टाफ, दवाएं और बेसिक उपकरण मौजूद रहते हैं. इलाज का शुल्क नाममात्र 2 से 10 रुपए तक है, जो गरीब किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी है.

योजना का लाभ कैसे उठाएं

अगर आपका पशु बीमार है तो आप टोल-फ्री 1962 नंबर पर फोन करें. उत्तर प्रदेश में यह सेवा सुबह 10 बजे से शाम 8 बजे तक उपलब्ध है, जबकि कुछ राज्यों में 24 घंटे सातों दिन यह योजना लागू है.

फोन करने पर पशु की समस्या बताएं और अपना पूरा पता भी नोट करा दें. यह फोन आपका कंट्रोल रूम जाएगा जहां से आपके बताए गए पते के नजदीक मोबाइल यूनिट को जानकारी देगा. उसके बाद आधा से 1 घंटे के अंदर इलाज करने वाली टीम वैन के साथ आपके दिए पते पर आ जाएगी. पशु डॉक्टर आपके बीमार पशु की जांच करेंगे, उसे दवा देंगे. इसके लिए आपको केवल न्यूनतम शुल्क जो 2 रुपए से 10 रुपए तक है, वह देना है.

1962 नंबर पर पशु एंबुलेंस जैसी सुविधा उपलब्ध है. कुल मिलाकर, यह योजना पूरे देश में पशुपालन क्रांति ला रही है.

पशुपालकों को लाभकारी है यह योजना

इस पहल से पशुओं को समय पर इलाज मिल जाता है, जिससे पशु मृत्यु दर घटी है और पशुपालकों को फायदा मिल रहा है, इसलिए पशुपालकों के फोन में 1962 नंबर सेव होना चाहिए. पशु के बीमार होने पर तुरंत कॉल करें. ज्यादा जानकारी के लिए स्थानीय पशु विभाग से संपर्क कर सकते हैं.

Union Budget 2026 : अब आसान होगा पशुपालन

Union Budget 2026: केंद्रीय बजट 2026 में डेयरी क्षेत्र को विशेष प्राथमिकता दी गई है. यह बजट पशुपालकों की आमदनी कहीं ज्यादा बढ़ाने वाला होगा और ग्रामीण आजीविका को भी मजबूत देगा Union Budget 2026. किसानों की पशुधन की सुरक्षा और आधुनिक तरीके से पशुपालन सुनिश्चित करने के लिए नस्ल सुधार कार्यक्रमों, पशु चिकित्सा सेवाओं के विस्तार दिया जाएगा.

घर-घर पहुंचेगी मोबाइल पशु चिकित्सा

पशुओं के इलाज के लिए चल रही मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयों का विस्तार किया जाएगा जिससे हर पशुपालक को घर बैठे पशु चिकित्सा का लाभ मिल सके.

सहकारी समितियों और पशुधन किसान उत्पादक संगठनों को मिलेगा लाभ

बजट में बेहतर दुग्ध संग्रहण, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन अवसंरचना के माध्यम से डेयरी क्षेत्र को सुदृढ़ करने पर भी विशेष जोर दिया गया है. दुग्ध उत्पादन और उससे संबंधित गतिविधियों में लगे सहकारी समितियों और पशुधन किसान उत्पादक संगठनों (एलएफपीओ) को समर्थन देने पर विशेष ध्यान दिया गया है. ‘आत्मनिर्भर भारत’ की परिकल्पना के अनुरूप, बजट पशुपालन में नवाचार, प्रौद्योगिकी के उपयोग और निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देने के साथ-साथ चारा विकास, पशु आहार सुरक्षा पर भी अनेक लाभान्वित करने वाली योजनाओं का लाभ पशुपालकों को मिलेगा. Union Budget 2026

अधिक दुग्ध उत्पादन, अधिक रोजगार

पशुपालन और दुग्ध उत्पादन बढ़ने पर अतिरिक्त लोगों को मिलेगा रोजगार और पोषण सुरक्षा में होगा सुधार.

बढ़ेंगे पशुओं के डाक्टर, पशु रहेंगे स्वस्थ

पशु चिकित्सा पेशेवरों की संख्या बढ़ाकर 20,000 से अधिक करने के उद्देश्य से निजी क्षेत्र के पशु चिकित्सा और अर्ध-पशु चिकित्सा महाविद्यालयों, पशु अस्पतालों, निदान प्रयोगशालाओं और पशु प्रजनन केंद्रों की स्थापना के लिए ऋण-आधारित पूंजी सब्सिडी सहायता योजना शुरू करने की तैयारी है. इसके अलावा भारतीय एवं विदेशी संस्थानों के बीच सहयोग को भी सुगम बनाया जाएगा.

डेयरी फार्मिंग के लिए सब्सिडी

केंद्रीय बजट 2026-27 में पशुपालन में उद्यमिता/डेयरी फार्मिंग और आधुनिकीकरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ऋण-आधारित सब्सिडी योजना का प्रस्ताव है, जिससे पशुधन, दुग्ध उत्पादन और मुर्गीपालन उद्यमों को लाभ होगा. इस उपाय का उद्देश्य किसानों को आधुनिक उपकरण अपनाने, उत्पादकता बढ़ाने और ग्रामीण क्षेत्रों में मूल्य श्रृंखला विकसित करने में सहायता करना है. Union Budget 2026

‘भारत विस्तार’ प्लेटफॉर्म जैसे एआई-आधारित कृषि उपकरण, जिनका उद्देश्य दुग्ध उत्पादन और पशुधन उत्पादकों सहित किसानों के लिए निर्णय लेने की प्रक्रिया को बेहतर बनाना है. ग्रामीण आय विविधीकरण प्रयासों के अंतर्गत दुग्ध उत्पादन और पशुधन किसानों के लिए ऋण और उद्यमिता सहायता पर जोर दिया गया है.

प्राथमिक सहकारी समितियों के लिए छूट का दायरा बढ़ा

प्राथमिक सहकारी समितियों द्वारा पशुओं के चारे और कपास के बीज की आपूर्ति अब कर कटौती के लिए पात्र होगी, जिससे दुग्ध उत्पादकों और पशुपालकों को बेहतर सहायता और कम लागत सुनिश्चित होगी.

नई कर व्यवस्था के तहत एक सहकारी समिति द्वारा दूसरी सहकारी समिति से अर्जित लाभांश आय को कटौती के रूप में अनुमति दी जाएगी, जिससे दुग्ध एवं पशुधन सहकारी समितियों के भीतर वित्तीय प्रवाह मजबूत होगा. Union Budget 2026 इन उपायों से सहकारी समितियों की वित्तीय स्थिति मजबूत होगी और दुग्ध उत्पादक किसानों को सहायता मिलेगी.

लगेंगे नए बायोगैस प्लांट

बायोगैस मिश्रित सीएनजी पर देय केंद्रीय उत्पाद शुल्क की गणना करते समय बायोगैस के संपूर्ण मूल्य को इसमें शामिल नहीं किया जाएगा. इससे डेयरी क्षेत्र में सतत विकास को बढ़ावा मिलेगा और देश में नए बायोगैस संयंत्रों की स्थापना को प्रोत्साहन मिलेगा.

Animal Husbandry Scheme : पशुओं के स्वास्थ्य के लिए प्रबंधन जरूरी

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान, अविकानगर ने दौसा जिले की बहरावडा तहसील स्थित गुमानपुरा गांव में पशु स्वास्थ्य शिविर एवं किसान वैज्ञानिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया. Animal Husbandry Scheme यह आयोजन संस्थान के निदेशक डा. अरुण कुमार के निर्देशन में हुआ.

‘मालपुरा परियोजना’ के तहत हुआ हजारों पशुओं का इलाज

‘मालपुरा परियोजना’ के तहत इस आयोजन में 178 पशुपालकों ने भाग लिया और शिविर के दौरान वैज्ञानिकों ने 1,493 पशुओं का स्वास्थ्य परीक्षण कर उन्हें मौके पर ही निःशुल्क दवाइयां उपलब्ध करवाईं.

अविकानगर से आई विशेषज्ञों की टीम ने शिविर में 1,074 मालपुरा नस्ल की भेड़ें, 408 बकरियां, 10 गायभैंस और एक ऊंट का उपचार किया. Animal Husbandry Scheme

आनुवंशिकी एवं प्रजनन विभाग के अध्यक्ष डा. सिद्धार्थ सारथी मिश्रा ने पशुपालकों को कहा :

-पशुओं के बेहतर स्वास्थ्य के लिए केवल इलाज ही नहीं, बल्कि प्रबंधन भी जरूरी है.

-किसानों को नियमित टीकाकरण, पशुओं के आहार में मिनरल मिक्सचर (खनिज लवण) शामिल करने और समय पर पेट के कीड़ों की दवा (डिवोर्मिंग) देने की सलाह दी.

इस अभियान का क्या था उद्देश्य

मालपुरा परियोजना के प्रभारी डा. पीके मल्लिक ने बताया कि इस अभियान का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र के भेड़पालकों का पंजीकरण करना और ‘संस्थान किसान सहयोग’ आधारित योजना को बढ़ावा देना है. उन्होंने क्षेत्र में मालपुरा नस्ल के शुद्ध पशुओं की संख्या को देखते हुए किसानों को वैज्ञानिक पद्धति से भेड़पालन अपनाने का सुझाव दिया.

क्या है पशु मंगला योजना

कार्यक्रम में टीएसपी नोडल अधिकारी डा. अमर सिंह मीना ने किसानों को ‘पशु मंगला योजना’ की जानकारी दी और पशुओं की टैगिंग के महत्त्व को समझाया.

वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. सुभाष कच्चावाहा और पशु चिकित्सक डा. सृष्टि सोनी ने बीमार पशुओं का उपचार किया. Animal Husbandry Scheme

क्या है टीएसपी योजना

टीएसपी-(ट्राइबल सब प्लान), यह एक सरकारी योजना है, जिस का मुख्य उद्देश्य जनजातीय और गैरजनजातीय क्षेत्रों के बीच के अंतर को कम करना, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और आय के साधन प्रदान करना है.

टीएसपी योजना की मुख्य विशेषताएं हैं :

-जनजातीय क्षेत्रों में साक्षरता बढ़ाना, स्वास्थ्य सेवाएं, बुनियादी ढांचा और गरीबी उन्मूलन (विशेष रूप से गरीबी रेखा से नीचे-बीपीएल परिवारों के लिए) सुनिश्चित करना. Animal Husbandry Scheme

यह योजना उन क्षेत्रों में लागू होती है, जहां जनजातीय आबादी 50 फीसदी या उस से अधिक है, जिस में केंद्र सरकार विशेष केंद्रीय सहायता (SCA) प्रदान करती है.

-इस के तहत कृषि क्षेत्र, पशुपालन (सूअर/भेड़बकरीपालन) और लघु उद्योग (सिलाई, बांस शिल्प) के लिए वित्तीय अनुदान दिया जाता है. आदिवासी किसानों को पशु टीकाकरण, स्वास्थ्य शिविर और कृषि प्रशिक्षण के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाया जाता है. Animal Husbandry Scheme

Livestock Farming: अधिक मेमने पैदा करने वाली भेड़ हुई रजिस्टर्ड

Livestock Farming: भाकृअनुप-केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान अविकानगर की एक से अधिक मेमने पैदा करने वाली अविशान भेड़ को भेड़ नस्ल के रूप में आईसीएआर नई दिल्ली द्वारा पंजीकृत किया गया. समारोह में केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान एवं सचिव डेयर एवं डीजी आईसीएआर डॉ. मांगीलाल जाट, उप-महानिदेशक डॉ. आर. भट्टा की उपस्थिति में निदेशक डॉ. अरुण कुमार तोमर एवं अविशान भेड़ को विकसित करने वाली वैज्ञानिक टीम द्वारा पंजीकरण प्राप्त किया गया.

अनेक राज्यों तक होगी पहुंच

डॉ. अरुण कुमार तोमर की लीडरशिप में कई वर्षों से अविशान भेड़ को देश में एक नई पहचान एवं प्रसिद्धि मिली है. उनके द्वारा अविशान भेड़ के पंजीकरण के लिए आवश्यक प्रयास किए गए हैं. अब इस अविशान भेड़ को पहचान मिलने के बाद अन्य राज्यों के किसानों तक इसकी पहुंच बढ़ेगी. निदेशक डॉ. अरुण कुमार तोमर ने बताया कि अविशान भेड़ का पंजीकरण होने से अविकानगर एवं देश के अन्य राज्यों में बढ़ावा देने के लिए नई परियोजना लाई जा सकेगी.

बढ़ेगा भेड़ उत्पादन

भविष्य में इसको किसान वर्ग तक ले जाने के लिए संस्थान द्वारा अपनी ओर से भरपूर प्रयास किए जाएंगे, जिससे प्रति भेड़ उत्पादन (Livestock Farming) को बढ़ाया जा सके. पंजीकरण कार्यक्रम में अविकानगर के एजीबी विभाग अध्यक्ष डॉ. सिद्धार्थ सारथी मिश्रा, प्रधान वैज्ञानिक ओर पीआई डॉ. पी. के. मल्लिक के साथ अन्य वैज्ञानिक भी उपस्थित रहे.

भेड़ की इस प्रजाति से एक से अधिक मेमने मिलने के अलावा इससे अधिक दूध उत्पादन और अधिक मांस भी मिल सकेगा, जो किसानों पशुपालकों की आमदनी बढ़ाने का काम करेगा और पशुपालकों को होगा अधिक मुनाफा

Livestock Farming

Livestock Breeds: पशुपालन और मुर्गीपालन में 16 नई नस्लों को मिली मंजूरी

Livestock Breeds: पशुपालन हो या मुर्गीपालन, इस तरह के कारोबार से अगर आप अच्छा मुनाफा लेना चाहते हैं तो अपनाएं उन्नत तकनीक, उन्नत किस्में और इस्तेमाल करें उचित जानकारी. इसके लिए भाकृअनुप-राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, करनाल द्वारा अनेक पशुधन और मुर्गी नस्लों (Livestock Breeds) की जानकारी दी गई है, जो पशुपालकों के लिए लाभकारी साबित होगी.

आज अनेक लोग पशुपालन, मुर्गीपालन, बत्तख पालन जैसे काम करके अच्छा कारोबार कर रहे हैं. साथ ही, दूसरों को भी रोजगार दे रहे हैं. अनेक किसान महिलाएं भी इस काम को करके लाभ के साथ-साथ अपना नाम भी रोशन कर रही हैं. लेकिन इसके लिए आपको तकनीकी जानकारी होनी जरूरी है. कम समय में अधिक लाभ देने वाली अनेक योजनाएं हैं और नई-नई उन्नत किस्में आती हैं, जिनको अपनाना चाहिए.

पशुधन एवं मुर्गी की 16 नई किस्मों को मंजूरी

भाकृअनुप-एनबीएफजीआर ने 16 नई पशुधन एवं मुर्गीपालन नस्लों (Livestock Breeds) को रजिस्टर किया है, जो भारत के पशुपालकों को और मुर्गीपालकों के लिए अच्छी बात है. अब वे इन किस्मों को अपनाकर अपने मुनाफे को कहीं अधिक बढ़ा सकते हैं.

ब्रीड रजिस्ट्रेशन कमेटी ने नई दिल्ली में डॉ. राघवेंद्र भट्टा, उप-महानिदेशक (पशु विज्ञान), भाकृअनुप की अध्यक्षता में हुई अपनी 13वीं बैठक में देश में पशुधन एवं मुर्गीपालन की 13 स्वदेशी तथा 3 सिंथेटिक नस्लों को मंजूरी दी है.

किन नई नस्लों को मिली मंजूरी

• मेदिनी मवेशी (झारखंड),
• रोहिलखंडी मवेशी (उत्तर प्रदेश),
• मेलघाटी भैंस (महाराष्ट्र),
• पलामू बकरी (झारखंड),
• उदयपुरी बकरी (उत्तराखंड),
• नागामी मिथुन (नागालैंड),
• माला मुर्गी (झारखंड),
• कोडो बत्तख (झारखंड),
• कुडू बत्तख (ओडिशा),
• कुट्टानाड बत्तख (केरल),
• मणिपुरी बत्तख (मणिपुर),
• नागी बत्तख (असम),
• राजदिघेली हंस (असम),
• करण फ्राइज सिंथेटिक मवेशी (हरियाणा),
• वृंदावनी सिंथेटिक मवेशी (उत्तर प्रदेश),
• अविशान सिंथेटिक भेड़ (राजस्थान).

अब तक 242 स्वदेशी पशु नस्लों को किया रजिस्टर

ब्यूरो द्वारा अब तक 242 स्वदेशी पशु नस्लों को रजिस्टर किया गया है, जिसमें 55 मवेशी, 22 भैंस, 43 बकरी, 46 भेड़, 8 घोड़े और टट्टू, 9 ऊंट, 15 सुअर, 4 गधे, 5 कुत्ते, 2 याक, 21 मुर्गियां, 9 बत्तख, 2 हंस और 1 मिथुन शामिल हैं. इसके अलावा 3 सिंथेटिक मवेशी नस्लें, और 1 सिंथेटिक भेड़ नस्ल भी रजिस्टर की गई है.