Farmer : एमए पास बना कामयाब किसान

Farmer : हाजीपुर, वैशाली, बिहार के रहने वाले अंजित ने राजनीति शास्त्र से एमए करने करने के बाद अचानक कृषि को अपना पेशा बना लिया. उन के पास जमीन नहीं थी, न ही कृषि का कोई ज्ञान था. इस के बाद भी कृषि को पेशा बनाने का इरादा हैरान करने वाला था.

उन के आसपास के लोगों को यह बात कुछ समझ में नहीं आई. उन्हें लगा कि अगर यही करना था तो फिर उन्होंने राजनीति शास्त्र की शिक्षा क्यों ली. घर वालों ने यह बात जाननी चाही, तो अंजित ने कहा कि भले ही उन्होंने राजनीति शास्त्र की तालीम ली है, लेकिन उन्हें राजनीति नहीं करनी.

इस के बाद शुरू हुआ सिलसिला कृषि कार्य का. पास में जमीन नहीं थी, लिहाजा सब से पहले अंजित ने घर के पास खाली पड़े एक जमीन के टुकड़े को अपना कार्य क्षेत्र बनाने का फैसला लिया.

उन्होंने जमीन के मालिक से इस बारे में बात की. बातचीत के बाद उन्होंने लगभग 1 एकड़ जमीन के लिए 20 हजार रुपए सालाना किराया देना तय किया.

अब उन के पास एक खुला आकाश था. उन्होंने फौरन जमीन ले ली. अकेले दम पर कोई भी काम नहीं हो सकता, इसलिए अंजित ने 2 लोगों को अपने साथ जोड़ा. उन दोनों ने भी उन के काम में पूरे दिल के साथ मदद शुरू कर दी.

अंजित ने यह पहले ही सोच रखा था कि वे रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं करेंगे. उसी सोच के मुताबिक  जैविक खाद को ही पूरे खेत में डाला गया. नतीजतन खेत में फसल लहलहा उठी.

अब बाजार की चिंता शुरू हुई. इस समस्या से निबटने के लिए उन्होंने खुद बाजार में बिक्री शुरू कर दी. आसपास के गांवों के हाट उन के बाजार बन गए. मांग बढ़ने लगी तो अंजित ने अपनी फसल दूसरी जगहों पर भी भेजनी शुरू कर दी.

अंजित कहते हैं कि वे धीरेधीरे पूरे इलाके में अपनी फसल के उत्पाद बेचने की तैयारी कर रहे हैं. अब तक अंजित के इस काम से कई लोग जुड़ चुके हैं, जिस से उन्हें एक रोजगार मिल गया है. जो लोग कल तक यह सोचते थे कि अब क्या होगा, वे इस रोजगार से प्रसन्न हैं.

अंजित कहते हैं कि खेती कभी भी घाटे का सौदा नहीं रही है. बस उसे मन से करने की जरूरत है. यही एक ऐसा रोजगार है, जिस में मांग कभी नहीं घटती.

मसाला तथा औषधिय फसल मैथी (Fenugreek)

दुनिया में मसाला उत्पादन और मसाला निर्यात के हिसाब से भारत का प्रथम स्थान है, इसलिए भारत को मसालों का घर भी कहा जाता है. मसाले हमारे खाद्य पदार्थों को स्वादिष्ठता तो प्रदान करते ही हैं, साथ ही हम इस से विदेशी पैसा भी कमाते हैं.

मसाले की एक प्रमुख फसल मेथी है. इस की हरी पत्तियों में प्रोटीन, विटामिन सी और भरपूर मात्रा में खनिज तत्त्व पाए जाते हैं. मेथी के बीज मसाले और दवा के रूप में काफी उपयोगी है.

भारत में मेथी की खेती व्यावसायिक स्तर पर राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश तथा पंजाब राज्यों में की जाती है. भारत मेथी का मुख्य उत्पादक और निर्यातक देश है. इस का उपयोग औषधि के रूप में भी किया जाता है.

भूमि और जलवायु

मेथी को अच्छे जल निकास एवं पर्याप्त जीवांश वाली सभी प्रकार की भूमि में उगाया जा सकता है, परंतु दोमट मिट्टी इस के लिए उत्तम रहती है. यह ठंडे मौसम की फसल है. पाले व लवणीयता को भी यह कुछ स्तर तक सहन कर सकती है.

मेथी की प्रारंभिक वृद्धि के लिए मध्यम आर्द्र जलवायु और कम तापमान उपयुक्त है, परंतु पकने के समय गरम व शुष्क मौसम उपज के लिए लाभप्रद होता है. पुष्प व फल बनते समय अगर आकाश बादलों से घिरा हो, तो फसल पर कीड़ों व बीमारियों के प्रकोप की संभावना बढ़ जाती है.

उन्नत किस्में

आरएमटी 305 : यह एक बहुफलीय किस्म है. इस का औसत बीज भार और कटाई सूचकांक अधिक है. फलियां लंबी और अधिक दानों वाली होती हैं, जिस के दाने सुडौल, चमकीले पीले होते हैं. इस किस्म में छाछ्या रोग के प्रति अधिक प्रतिरोधकता है. इस किस्म के पकने की अवधि 120-130 दिन है. औसत उपज 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

आरएमटी 1 : समूचे राजस्थान के लिए यह उपयुक्त किस्म है. इस के पौधे अर्ध सीधे एवं मुख्य तना नीचे की ओर गुलाबीपन लिए होता है. बीमारियों एवं कीटों का प्रकोप कम होता है. पकने की अवधि 140-150 दिन है. इस की औसत उपज 14-15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

हरी पत्तियों के लिए

पूसा कसूरी : यह छोटे दाने वाली मेथी होती है. इस की खेती हरी पत्तियों के लिए की जाती है. कुल 5-7 हरी पत्तियों की कटाई की जा सकती है. इस की औसत उपज 5-7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

खेत की तैयारी : भारी मिट्टी में खेत की 3-4 और हलकी मिट्टी में 2-3 जुताई कर के पाटा लगा देना चाहिए और खरपतवार को निकाल देना चाहिए.

खाद एवं उर्वरक : प्रति हेक्टेयर 10 से 15 टन सड़ी गोबर की खाद खेत को तैयार करते समय डालें. इस के अलावा 40 किलोग्राम नाइट्रोजन एवं 40 किलोग्राम फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई से पहले खेत में ऊपर से दें.

बीज की बोआई एवं मात्रा : इस की बोआई अक्तूबर माह के अंतिम सप्ताह से नवंबर माह के पहले सप्ताह तक की जाती है. बोआई में देरी करने से फसल के पकने की अवस्था के समय तापमान अधिक हो जाता है. इस वजह से फसल शीघ्र पक जाती है और उपज में कमी आती है. पछेती फसल में कीट व बीमारियों का प्रकोप अधिक बढ़ जाता है.

इस के लिए 20-25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की जरूरत होती है. बीजों को 30 सैंटीमीटर की दूरी पर कतारों में 5 सैंटीमीटर की गहराई पर बोएं. बीजों को राइजोबियम कल्चर से उपचारित कर बोने से फसल अच्छी मिलती है.

सिंचाई एवं निराईगुड़ाई : मेथी की खेती रबी में सिंचित फसल के रूप में की जाती है. सिंचाइयों की संख्या मिट्टी की संरचना और वर्षा पर निर्भर करती है. वैसे, रेतीली दोमट मिट्टी में अच्छी उपज के लिए तकरीबन 8 सिंचाइयों की आवश्यकता पड़ती है. परंतु अच्छे जल धारण क्षमता वाली भूमि में 4-5 सिंचाइयां पर्याप्त हैं.

फली व बीजों के विकास के समय पानी की कमी नहीं रहे. बीज बोने के बाद हलकी सिंचाई करें. उस के बाद आवश्यकतानुसार 15 से 20 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें.

बोआई के 30 दिन बाद निराईगुड़ाई कर पौधों की छंटाई कर देनी चाहिए व कतारों में बोई फसल में अनावश्यक पौधों को हटा कर पौधों के बीच की दूरी 10 सैंटीमीटर रखें.

अगर जरूरी हो, तो 50 दिन बाद दूसरी निराईगुड़ाई करें. पौधों की वृद्धि की प्राथमिक अवस्था में निराईगुड़ाई करने से मिट्टी में पूरी तरह से हवा का संचार होता है और खरपतवार रोकने में मदद मिलती है.

खरपतवार नियंत्रण

मेथी को उगने के 25 व 50 दिन बाद 2 निराईगुड़ाई कर पूरी तरह से खरपतवार से मुक्त रखा जा सकता है. इस के अलावा मेथी की बोआई के पहले 0.75 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर फ्लूक्लोरेलिन को 600 लिटर पानी में मिला कर छिड़कें. उस के बाद मेथी की बोआई करें या फिर पेंडीमिथेलीन 0.75 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर  को 600 लिटर पानी में घोल कर मेथी की बोआई के बाद, मगर उगने से पहले छिड़काव कर के खरपतवारों से मुक्त किया जा सकता है.

यह ध्यान रखें कि फ्लूक्लोरेलिन के छिड़काव के बाद खेत को खुला न छोड़ें, अन्यथा इस का वाष्पीकरण हो जाता है और पेंडीमिथेलीन के छिड़काव के समय खेत में नमी होना आवश्यक है.

मैथी (Fenugreek)

प्रमुख कीट एवं उन का प्रबंधन

फसल पर नाशीकीटों का प्रकोप कम होता है, परंतु कभीकभी माहू, तेला, पत्ती भक्षक, सफेद मक्खी, थ्रिप्स, माइट्स, फली छेदक एवं दीमक आदि का आक्रमण पाया गया है. सब से ज्यादा नुकसान माहू कीट से होता है.

माहू का प्रकोप मौसम में अधिक नमी व आकाश में बादल के रहने पर अधिक होता है. यह कीट पौधों के कोमल भागों से रस चूस कर नुकसान पहुंचाता है. दाने कम व निम्न गुणवत्ता के बनते हैं.

इस की रोकथाम के लिए जैविक विधियों का अधिकाधिक प्रयोग करें. आक्रमण बढ़ता दिखने पर नीम आधारित रसायनों निंबोली अर्क 5 फीसदी या तेल आधारित 0.03 फीसदी का 1 लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. कीटनाशी अवशेषों से उपज को बचाएं.

प्रमुख रोग और उन का प्रबंधन

छाछ्या : यह रोग ‘इरीसाईफी पोलीगोनी’ नामक कवक से होता है. रोग के प्रकोप से पौधों की पत्तियों पर सफेद चूर्ण दिखाई देने लगता है और पूरे पौधे पर फैल जाता है. इस से काफी नुकसान होता है.

प्रबंधन : गंधक चूर्ण 20-25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर भुरकाव करें या केराथेन एलसी 0.1 फीसदी घोल का छिड़काव करें. जरूरत के अनुसार 10 से 15 दिन बाद पुन: दोहराएं. रोग रोधी मेथी हिसार माधवी बोएं.

तुलासिता (डाउनी मिल्ड्यू) : यह रोग ‘पेरेनोस्पोरा स्पी. ’ नामक कवक से होता है. इस रोग से पत्तियों की ऊपरी सतह पर पीले घब्बे दिखाई देते हैं और नीचे की सतह पर फफूंद की वृद्धि दिखाई देती है. उग्र अवस्था में रोग से ग्रसित पत्तियां झड़ जाती हैं.

प्रबंधन : फसल में अधिक सिंचाई न करें. इस रोग के लगने की प्रारंभिक अवस्था में फसल पर मैंकोजेब 0.2 फीसदी या रिडोमिल 0.1 फीसदी घोल का छिड़काव करें. जरूरत के अनुसार 15 दिन बाद पुन: दोहराएं. रोग रोधी मेथी हिसार मुक्ता एचएम 346 बोएं.

जड़गलन : मेथी की फसल में जड़गलन रोग का प्रकोप भी बहुत होता है, जो बीजोपचार कर और फसलचक्र अपना कर, ट्राइकोडर्मा विरिडी मित्र फफूंद 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से सड़ी गोबर की खाद में मिला कर बोआई से पहले भूमि में दे कर कम किया जा सकता है.

कटाई एवं उपज

जब पौधों की पत्तियां झड़ने लगें व पौधे पील रंग के हो जाएं, तो पौधों को उखाड़ कर या फिर दंताली से काट कर खेत में छोटीछोटी ढेरियोंं में रखें. सूखने के बाद कूट कर या थ्रैशर से दाने अलग कर लें. साफ दानों को पूरी तरह सुखाने के बाद बोरियों मे भरें. समुचित तरीके से खेती की क्रियाओं को अपनाने से 15 से 20 क्विंटल बीज प्रति हेक्टेयर की दर से पैदावार हो सकती है.

घर के कचरे से बनाएं केंचुआ खाद (Vermicompost)

घर के जैविक कचरे जैसे सब्जियों का कचरा, बगीचे की पत्तियों, घासफूस आदि सभी का व्यवस्थित रूप से नियोजन कर के जैविक खाद बनाई जा सकती है. घर के कचरे से बहुत अच्छी वर्मी कंपोस्ट बनती है. घर के कचरे से अच्छी जैविक खाद बनाने के लिए कुछ छोटेछोटे मौडल विकसित किए गए हैं.

ये मौडल औरंगाबाद की विवम एग्रोटेक संस्था द्वारा विकसित डिजाइन है. इस का आकार 2×2×1.5 है. यह तार की जालियों और लोहे के फ्रेम से बना मौडल है. यह भीतर से चारों तरफ से हरी शेड नेट से घिरा रहता है. इस में ढक्कन भी है, जिस से यह पूरी तरह ढका रहता है. इस का बाजार मूल्य केंचुए सहित 2,500 रुपए है.

इस मौडल में पहले 2-3 इंच मोटी कचरे व पुराने गोबर की परत डाल कर करीब 200 केंचुए छोड़ देते हैं. इस के बाद रोज 200 से 500 ग्राम घर की सब्जियों व फलों से निकलने वाला कचरा डाला जा सकता है. ज्यादा मात्रा में नीबू, टमाटर, प्याज, आदि न डालें. इस से अम्लता बढ़ने पर केंचुओं को नुकसान हो सकता है. रसोई घर के कचरे के साथ जूठन अधिक मात्रा में न डालें, इस में नमक होने से केंचुओं को नुकसान होता है. इस से चीटियां भी होती हैं, जो केंचुओं को नुकसान पहुंचाती हैं. किचन वैस्ट की परत के ऊपर 2 से 3 इंच मोटी घास अथवा सूखे कचरे की परत डालें.

किचन वैस्ट प्रतिदिन इकट्ठा होगा तो उस में मच्छर पनप सकते हैं, जो नुकसानदायक है. इसलिए उसे ढकना जरूरी है. इस तरह रोज करीब 2 माह तक घर का कचरा उस में डाला जा सकता है और उस पर हमेशा हलका पानी छिड़कें, ताकि नमी बनी रहे. 60-70 दिन के बाद ऊपर का ताजा किचन वैस्ट जो सड़ा नहीं है, वह थोड़ा हटा कर देखें, यदि नीचे खाद तैयार हो गई है तब पानी देना व अतिरिक्त कचरा डालना भी बंद कर दें. केंचुए एकदो दिन में नीचे की तरफ चले जाएंगे. ऊपर का आधा सड़ा कचरा धीरेधीरे हाथ से एक तरफ हटा कर नीचे की खाद निकाली जा सकती है.

इस मौडल को एक परिवार ने इस्तेमाल किया था. उन्होंने उपरोक्त विधि से इस का इस्तेमाल किया. उन्हें तकरीबन 3 महीने में रसोई के कचरे से साढ़े 7 किलोग्राम खाद हासिल हुई और केंचुओं की संख्या बढ़ कर 3,440 हो गई. ऐसे बहुमंजिले  घरों में जहां घर का आंगन यानी बगीचा नहीं है, वहां सिर्फ रसोई के कचरे से वर्मी कंपोस्ट बनाई जा सकती है, जो गमलों के लिए उपयोगी है. यदि कचरे के साथ बगीचे का कचरा भी हो तब 12 से 15 किलोग्राम खाद हर 3 महीने में हासिल की जा सकती है.

घर के कचरे का इस्तेमाल बागबानी में कर के हम बाग को तो सजाएंगे ही साथ ही पर्यावरण को भी दूषित होने से बचाएंगे, जिस का लाभ संसार के सभी जीवों को हासिल होगा.

आलू की खेती और बोआई मशीन (Planting Machine)

हमारे देश में आलू की अच्छीखासी पैदावार होती है. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार व गुजरात जैसे राज्य आलू की खेती करने में आगे हैं. उत्तर प्रदेश राज्य में सब से ज्यादा आलू की खेती की जाती है. कई बार आलू की खेती से किसान अच्छाखासा मुनाफा कमाते हैं, लेकिन कभीकभी यही ज्यादा पैदावार किसानों के लिए घाटे का सौदा भी बन जाती है. किसानों को चाहिए कि वे आलू की खेती करने के लिए अपने इलाके के हिसाब से बेहतर बीज का चुनाव करें और फसल समय पर बोएं. आलू की अधिकता होने पर प्रोसेसिंग की जानकारी ले कर आलू के उत्पाद बनाने की कोशिश करें. अगेती फसल बोने पर भी किसानों को मंडी से अच्छे दाम मिल जाते हैं.

उत्तर प्रदेश की जलवायु के हिसाब से आलू की तकरीबन 35 किस्में हैं, जिन में कुछ खास किस्मों के बीजों की जानकारी और फसल तैयार होने की जानकारी बाक्स में दी गई है.

खेत की तैयारी : फसल से अच्छी पैदावार लेने के लिए जमीन समतल और पानी के अच्छे निकास वाली होनी चाहिए. आलू की खेती के लिए अधिक उर्वरायुक्त बलुई दोमट व दोमट मिट्टी ठीक रहती है. खेत की 2-3 बार जुताई करें और पाटा चला कर खेत को समतल करें.

बोआई का समय : आलू की अगेती बोआई के लिए 15 सितंबर से मध्य अक्तूबर तक का समय ठीक होता है. बोने के 70-80 दिनों बाद आलू खोदने लायक हो जाते हैं. सामान्य फसल की बोआई के लिए मध्य अक्तूबर से 15 नवंबर तक का समय सही रहता है.

बोआई करने से पहले बीजोपचार जरूर करें. इस से जड़ वाली बीमारियों से छुटकारा मिलता है. इस के लिए बोरिक एसिड 3 फीसदी का घोल यानी 30 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाएं.

उर्वरकों का इस्तेमाल : आलू की फसल के लिए 150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 100 किलोग्राम फास्फोरस और 80 किलोग्राम पोटाश की जरूरत प्रति हेक्टेयर होती है. अच्छी पैदावार के लिए गोबर की खाद भी डालें. यदि आप ने फसल बोने से पहले मिट्टी की जांच कराई हो और उस में जस्ता व लोहा जैसे सूक्ष्म तत्त्वों की कमी हो, तो 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट और 50 किलोग्राम फेरस सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से उर्वरकों के साथ बोआई से पहले खेत में डालें.

बोआई मशीन (Planting Machine)

बीजों की मात्रा : बोआई के लिए आलू के रोगरहित बीज भरोसे की जगह से खरीदें. वैसे सरकारी संस्थानों, राज्य बीज निगमों या बीज उत्पादन एजेंसियों से ही बीज खरीदना चाहिए. आमतौर पर 1 हेक्टेयर फसल बोने के लिए 30 से 35 क्विंटल बीजों की जरूरत होती है.

बोआई : आलू की बोआई करने के लिए मेंड़ से मेंड़ की दूरी 50-60 सेंटीमीटर रखें और पौधे से पौधे की दूरी 15 से 20 सेंटीमीटर रखें. कई बार आलू के आकार के हिसाब से यह दूरी कम या ज्यादा भी की जाती है. आमतौर पर आलू को 8 से 10 सेंटीमीटर की गहराई पर खुरपी की सहायता से बोया जाता है, ताकि अंकुरण के लिए मिट्टी में सही नमी बनी रहे. इस के अलावा आलू बोने की मशीन पोटैटो प्लांटर से भी आलू को बोया जाता है.

पोटैटो प्लांटर से आलू की बोआई : मोगा पौटेटो प्लांटर के बारे में अमनदीप सिंह ने बताया कि मोगा इंजीनियरिंग वर्क्स के पोटैटो प्लांटर मैन्यूअल और आटोमैटिक दोनों तरह के बाजार में मौजूद हैं. पोटैटो प्लांटर 2, 3 व 4 लाइनों में आलू की बोआई करता है, लेकिन सामान्यतया 85 फीसदी लोग 2 लाइनों में बोआई करने वाले पोटैटो प्लांटर को अधिक पसंद करते हैं.

बोआई मशीन (Planting Machine)

2 लाइनों में बोआई करने वाले मैन्यूअल पोटैटो प्लांटर की कीमत तकरीबन 38000 3 लाइनों में बोआई करने वाले प्लांटर की कीमत तकरीबन 48000 और 4 लाइनों में बोआई करने वाले प्लांटर की कीमत तकरीबन 58000 रुपए होती है.

आटोमैटिक पोटैटो प्लांटर की कीमत तकरीबन 1 लाख, 20 हजार रुपए है, जिस की रोजाना आलू बोआई करने की कूवत 35 बीघे से 50 बीघे तक है. इस के अलावा 2 से 4 लाइनों तक में बोआई करने वाले आटौमेटिक प्लांटर भी मौजूद हैं.

आलू बोने की इस मशीन के बारे में आप अमनदीप सिंह से उन के मोबाइल नंबर 08285325047 पर बात कर के अधिक जानकारी ले सकते हैं.

खरपतवार नियंत्रण और मिट्टी

चढ़ाना : आलू बिजाई के 20 से 25 दिनों बाद जब पौधे 8 से 10 सेंटीमीटर ऊंचाई के हो जाएं, तो लाइनों के बीच स्प्रिंग टाइन कल्टीवेटर या खुरपी से खरपतवार निकालने का काम करें.

इसी दौरान नाइट्रोजन की शेष मात्रा डाल कर खुरपी या ट्रैक्टर चालित रिजर से मिट्टी चढ़ा दें.

मैदानी इलाकों में आलू की फसल में खरपतवार का प्रकोप बिजाई के 4 से 6 हफ्ते बाद ज्यादा होता है यानी इस विधि से फसल को खरपतवार से मुक्त रखा जा सकता है. खरपतवारों के रासायनिक नियंत्रण के लिए फ्यूक्लोरेलिन, मैट्रीव्यूजीन, पैराक्लोट और प्रोपिनल खरपतवारनाशी रसायनों को 1000 लीटर पानी में घोल कर आवश्यकतानुसार दी गई विधियों को अपना कर छिड़काव करें.

उपज : जल्दी तैयार होने वाली किस्मों की पैदावार कुछ कम होती है, जबकि लंबी अवधि वाली किस्में ज्यादा उपज देती है. सामान्य किस्मों के मुकाबले संकर किस्मों से ज्यादा पैदावार (600 से 800 क्विंटल प्रति हेक्टेयर) मिलती है.

सिंचाई : फसल की पहली सिंचाई बोआई के 15-20 दिनों के अंदर कर लेनी चाहिए. सिंचाई करते समय ध्यान रखें कि मेंड़ें पानी में आधे से अधिक नहीं डूबनी चाहिए.

इस के बाद तकरीबन 15 दिनों के अंतराल पर दोबारा सिंचाई करें. आलू की फसल में तकरीबन 8 से 10 बार सिंचाई की जरूरत होती है. आलू तैयार होने पर जब उस की खुदाई करनी हो तो तकरीबन 10 दिन पहले ही उस की सिंचाई बंद कर दें.

फसल सुरक्षा : आलू की फसल को अनेक रोग व कीटों से बचाने के लिए बीमारी के हिसाब से दवाओं का इस्तेमाल करें. आलू में अनेक तरह की बीमारयिं जैसे अगेती झुलसा और पछेती झुलसा होने पर पौधे की पत्तियों पर गोल आकार के भूरे धब्बे बनने शुरू हो जाते हैं.

इन की रोकथाम के लिए 2 से ढाई किलोग्राम डाइथेन जेड 78 या डाइथेन एम 45 का 1000 लीटर पानी में घोल बना कर फसल पर छिड़काव करें. जरूरत पड़े तो 15 दिनों बाद फिर यह क्रिया अपनाएं.

आलू की दूसरी बीमारी है आलू का कोढ़ (कौमन स्कैब) इस रोग से फसल की पैदावार में तो कमी नहीं आती, लेकिन आलू भद्दे हो जाते हैं, जिस से बाजार में उन का सही दाम नहीं मिल पाता. आलू के कंदों के छिलकों पर लाल या भूरे रंग के छोटेछोटे धब्बे बन जाते हैं. इस बीमारी से बचाव के लिए बीजोपचार सब से अच्छा तरीका है.

बोआई मशीन (Planting Machine)

कीट नियंत्रण

एपीलेक्ना विटिल : इस कीट की सूंड़ी व वयस्क दोनों ही पत्तियां खाते हैं, जिस से पत्तियों में केवल नसें बचती हैं. यह कीट पीले रंग के होते हैं. इन की रोकथाम के लिए इंडोसल्फान 35 ईसी 1.25 लीटर या कार्बरिल 5 फीसदी घुलनशील चूर्ण की 2 किलोग्राम मात्रा 800 लीटर पानी में मिला कर छिड़काव करें.

कटवर्म  : यह जमीन के अंदर रहने वाला कीट है, इस की सूंड़ी रात के समय छोटेछोटे पौधों के तनों को काट देती है. इस की रोकथाम के लिए एल्ड्रिन 5 फीसदी चूर्ण अंतिम जुताई के समय मिट्टी में मिला दें.

आलू का माहूं : यह हरे रंग का कीट होता है, जो विषाणु फैलाता है. बचाव के लिए डाइमेथेएट 30 ईसी की 1 लीटर मात्रा 600 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें.

सफेद लट या गुबरेला : यह कीट जमीन के अंदर फसल को नष्ट कर देता है. फोरेट 10 जी या काबोफ्यूराल 3 जी 15 किलोग्राम बोआई से पहले इस्तेमाल करें.

खुदाई : अगेती फसल से ज्यादा कीमत हासिल करने के लिए बिजाई के 60-70 दिनों के बाद खुदाई की जा सकती है. मुख्य फसल की खुदाई तापमान 20-30 डिगरी सेंटीग्रेड तक पहुंचने से पहले कर लें, ताकि फसल ज्यादा तापमान पर मृदुगलन और काला गलन जैसे रोगों से ग्रसित न होने पाए.

ऐसे बढ़ाएं तिवड़ा की पैदावार

तिवड़ा को अलगअलग नामों से जाना जाता है, जैसे छत्तीसगढ़ में तिवड़ा को लाखड़ी या खेसारी के नाम से जाना जाता है. तिवड़ा की खेती मुख्य रूप से रबी के सीजन में की जाती है. इस की खेती दाना व चारा दोनों के लिए की जाती है.

छत्तीसगढ़ व मध्य प्रदेश राज्यों के आदिवासी बहुल होने के चलते वहां तिवड़ा को दाल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है व इस की हरी फलियों को सब्जी की तरह भी इस्तेमाल करते हैं.

तिवड़ा में 26-28 फीसदी तक प्रोटीन पाया जाता है. इस में कार्बोहाइड्रेट व मिनरल भी पाए जाते हैं. वैज्ञानिकों के शोध के मुताबिक इस के दानों में हानिकारक बीटा एन औक्सीलाइल डाई अमीनो प्रोपियोनिक अम्ल पाया जाता है जिस के चलते लगातार सेवन करने से यह पैरों की मांसपेशियों के स्नायु तंत्र पर बुरा असर डालता है और लगातार सेवन करने वाले लोगों में लंगड़ापन होने का डर बना रहता है जिसे लैथरिज्म कहते हैं. वैसे, वर्तमान में वैज्ञानिकों के द्वारा इस की नवीन किस्मों की खोज की जा चुकी है जिस में ऐसे हानिकारक तत्त्वों की मात्रा न के बराबर रह गई है.

जमीन की तैयारी : तिवड़ा की खेती सभी तरह की जमीन पर की जा सकती है लेकिन डोरसा व कन्हार जमीन अच्छी होती है. इस के अंकुरण और ज्यादा उत्पादन के लिए खरपतवार रहित भुरभुरी मिट्टी होनी चाहिए और पाटा चला कर खेत को समतल कर लेना चाहिए.

सही जलवायु : यह रबी मौसम की फसल है. फसल की अच्छी बढ़वार के लिए ठंडे मौसम की जरूरत होती है. तिवड़ा की फसल सूखा व ज्यादा बारिश दोनों को सहन करने की कूवत रखती है.

उन्नत किस्मों का चयन : लोकल किस्मों में तिवड़ा के दानों में ज्यादा हानिकारक पदार्थ पाया जाता है जिस के चलते वैज्ञानिकों द्वारा नवीन किस्मों का विकास गया है. हमें उन्हें ही अपनाना चाहिए जिन में हानिकारक पदार्थों की मात्रा बहुत ही कम पाई जाती है जैसे रतन, प्रतीक महातिवड़ा वगैरह.

बीज की मात्रा व बीजोपचार : तिवड़ा बीज की मात्रा बोआई की विधि पर निर्भर करती है. यदि हम उतेरा तरीके में बीज बोना चाहते हैं तो 90 से 100 किलोग्राम और बतर बोआई में 40 से 50 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की जरूरत होती है.

बीज को बोने से पहले हम अगर बीज को उपचारित कर लेते हैं, तो कई फफूंदनाशक बीमारियों से छुटकारा मिल जाता है, इसलिए हमें 3 ग्राम थायरम या बाविस्टिन या कंटाफ फफूंदनाशक प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से बीजोपचार करना चाहिए.

उर्वरक की मात्रा : तिवड़ा फसल की अच्छी उपज लेने के लिए संतुलित मात्रा में हमें उर्वरक का इस्तेमाल करना चाहिए 15 से 20 किलोग्राम नाइट्रोजन, 30 से 40 किलोग्राम फासफोरस और 20 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई के समय देना चाहिए.

चूर्णिल आसित

लक्षण : पत्तियों में सफेद रंग के छोटेछोटे धब्बे दिखाई देते है या धब्बे धीरेधीरे आपस में मिल कर पूरी पत्तियों को सफेद कर देते हैं. कुछ समय बाद वे सूख जाती हैं.

रोकथाम के उपाय : कोई भी फफूंदनाशक कार्बंडाजिम (बाविस्टिन) 1 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल कर छिड़काव या घुलनशील गंधक (सल्फैक्स) 3 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल कर 2 से 3 बार छिड़काव करना चाहिए.

मृदुरोमिल आसित

लक्षण : पत्तियों की ऊपरी सतह पर भूरे धब्बे दिखाई देते हैं और नीचे मटमैले रंग की फफूंद की रचाएं दिखाई देती हैं. गंभीर अवस्था में पत्तियां व तना भूरा हो जाता है और बाद में पूरा सूख जाता है.

रोकथाम के उपाय : मेंकोजेब (डायथेन एम 45 या डायथेन जेड-78) 3 ग्राम दवा का प्रति लिटर पानी के साथ 2 से 3 बार छिड़काव करना चाहिए.

कीट प्रबंधन : थ्रिप्स से ज्यादा नुकसान हो जाता है. इस पर नियंत्रण के लिए डाइमेथोएट 30 ईसी का 1 लिटर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करें.

उतेरा बोनी : उतेरा फसल के बीज को धान की बड़ी फसल में छिड़क कर बो दिया जाता है और तकरीबन 15 से 20 दिन बाद धान की कटाई की जाती है. इस समय तक उतेरा फसल अंकुरित हो कर 2 से 3 पत्ती वाली अवस्था में आ जाती है.

तिवड़ा की उतेरा खेती मुख्यत: डोरसा व कन्हार जमीनों पर की जाती है. तिवड़ा में कम लागत की सफलतम फसल होने के चलते आज भी इस की खेती बड़े क्षेत्र में की जाती है जिस को छत्तीसगढ़ में किसान काफी समय से अपनाते चले आ रहे हैं.

कटाई का सही समय : फसल हलकी पीली पड़ने लगे तो तिवड़ा की कटाई करनी चाहिए. गांव में हंसिए से फसल की कटाई की जाती है. कहींकहीं पर उसे जड़ समेत उखाड़ लिया जाता है. फसल को खेत में ज्यादा पकने तक नहीं छोड़ना चाहिए, नहीं तो फलियां चटकने लगती हैं.

उपज : बतर बोआई से तिवड़ा की उपज 10 से 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और उतेरा बोआई में 4 से 6 क्विंटल प्रति हेक्टेयर.

फसल विविधीकरण, मूल्य वृद्धि और विपणन पर कार्यक्रम

उदयपुर: महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के संगठक, अनुसंधान निदेशालय के अधीनस्थ फसल विविधीकरण परियोजना के अंतर्गत 2 दिवसीय विस्तार अधिकारियों का प्रशिक्षण कार्यक्रम सहायक निदेशक, कृषि कार्यालय, बेगू, चित्तौड़गढ़ में संपन्न हुआ.

प्रशिक्षण कार्यक्रम में परियोजना अधिकारी डा. हरि सिंह ने परियोजना की जानकारी देते हुए फसल विविधीकारण एवं मूल्य संवर्धन के महत्व की जानकारी देते हुए बताया कि किसान किस प्रकार बाजार को देखते हुए अपनी फसलों का विविधीकरण व विपणन करेगा.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि शंकर लाल जाट, उपनिदेशक, उद्यान, चित्तौड़गढ़ ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए फसल विविधीकरण में मूल्य संवर्धन के महत्व को बताते हुए बताया कि मूल्य संवर्धन से किसानों की आय एवं रोजगार सृजन में वृद्धि होगी.

हरिकेश चैधरी, सहायक निदेशक कृषि, बेगू, चित्तौड़गढ़ ने प्रशिक्षणार्थियों को संबोधित करते हुए बताया कि फसल विविधीकरण से फसल की उत्पादकता, भूमि की उर्वराशक्ति बढ़ेगी एवं बाजार भाव भी ज्यादा मिलेगा.

मुकेश वर्मा, संयुक्त निदेशक, उद्यानिकी ने बताया कि बागबानी फसलों का फसल विविधीकरण में बड़ा महत्व है. बागबानी फसलों का मूल्य संवर्धन कर किसान दोगुनी आय एवं रोजगार प्राप्त कर सकता है.

जोगेंद्र सिंह, कृषि अधिकारी, उद्यान, चित्तौड़गढ़ ने बागबानी फसलों में जल प्रबंधन की तकनीकी जानकारी, उस में लगने वाले रोग एवं निदान पर विस्तार से बताया. डा. बुद्धि प्रकाश मीणा, पशु चिकित्साधिकारी, बेगू, चित्तौड़गढ़ ने पशुओं में नस्ल सुधार एवं पशुपालन प्रबंधन पर विस्तार से सरकारी योजनाओं का महत्व बताया.

कार्यक्रम में डा. हंसराज धाकड़, कृषि अधिकारी ने कृषि में सरकार की विभिन्न योजनाओं के बारे में जानकारी दी. कार्यक्रम में परियोजना से हेमंत कुमार लांबा, रामजी लाल बडसरा एवं एकलिंग सिंह उपस्थित थे. प्रशिक्षण कार्यक्रम में 40 कृषि पर्यवेक्षक एवं विस्तार अधिकारियों ने भाग लिया.

गैरपरंपरागत नकदी फसलों की खेती

राजस्थान भारत का सब से बड़ा राज्य है और पिछड़े हुए राज्यों की कैटीगरी में आता है. यह राज्य भारत की उत्तरीपश्चिमी सीमा पर बसा है. यहां की पारिस्थितिकी और वातावरणीय हालात बहुत ही प्रतिकूल हैं और यहां पर कम और अनियमित बारिश, ज्यादा तापमान, चलायमान रेतीले टीबे, धूल भरी आंधियां वगैरह जैसे हालात आमतौर पर बने रहते हैं. यहां के ज्यादातर लोग खेती पर निर्भर रहते हैं और परंपरागत फसलों जैसे बाजरा, तिल वगैरह की खेती करते हैं.

ज्यादा गंभीर हालत और बारिश की अनियमितता के चलते इस इलाके के किसान हमेशा आशंकित और डरेसहमे रहते हैं. यहां अकाल जैसी आपदा का अंदेशा बना रहता है. कुछ गैरपरंपरागत फसलों जैसे सोनामुखी, जोजोबा, तुंबा वगैरह की खेती द्वारा इस इलाके के किसान न केवल बारिश की अनियमितता से होने वाले नुकसान से बच सकते हैं, वरना उन्हें इस से एक अच्छी आमदनी भी मिल सकती है. इन सभी के अलावा इन गैरपरंपरागत फसलों की खेती से परती जमीन में हरियाली भी लाई जा सकती है.

जोजोबा

JoJoba

 

जोजोबा या होहोबा के नाम से पुकारे जाने वाली इस मध्यम आकार की और सदा हरी रहने वाली  झाड़ी का वानस्पतिक नाम साइमोन्डीया चाइनेनसिस है और यह साइमोनडिएसी कुल का सदस्य है. यह द्विलिंगी प्रकृति की  झाड़ी मरू इलाके के विकटतम हालात में भी अच्छी तरह पनप सकती है. इस के नर व मादा पौधे में भेद महज पुष्पन के दौरान ही किया जा सकता है.

यह पादप मुख्य रूप से मैक्सिको व कैलिफोर्निया के सोनारन रेगिस्तान भूभाग का है और शुष्क अनुसंधान संस्थान, काजरी द्वारा भारत में लाया गया है. जोजोबा मुख्य रूप से इस के वसीय तेल के व्यापारिक महत्त्व के चलते उगाया जाता है.

खेती : इसे सब से पहले साल 1965 में सैंट्रल एरिड जोन रिसर्च इंस्टीट्यूट, काजरी द्वारा इजरायल से ला कर उगाया गया था. इस के पौधे रोपने के लिए बीजों का उपयोग किया जाता है.

बीजों को पौली बैग में लगा कर उगाया जाता है, परंतु कभीकभी सीधे ही रोपनी यानी नर्सरी में बीजारोपण भी किया जाता है. प्रयोगों द्वारा सीधे बीज रोपण से बहुत ही कम अंकुरण होने की पुष्टि के बाद इस की खेती के लिए पौली बैग में ही बीज रोपण किया जाता है.

बीजारोपण के लिए बीजों को ताजा पानी में 24 घंटे तक डुबो कर रखा जाता है और उस के बाद क्ले, मिट्टी व फार्मयार्ड मैन्योर यानी एफवाईएम के 1:1:1 के अनुपात के मिश्रण से भरी पौली बैग में बीजारोपण कर दिया जाता है.

बीजारोपण आमतौर पर अक्तूबर माह में किया जाता है और शुरू में दिन में 2 बार हलकी सिंचाई भी की जाती है. रोपणी में पौधे 8-9 माह में तैयार हो जाते हैं.

इस तरह रोपणी में तैयार पौधों को मानसून के दौरान 45×45×45 आकार के गड्ढों में 5 किलोग्राम फार्मयार्ड मैन्योर व कुछ कीटनाशी डाल कर रोप दिया जाता है. बडे़ पैमाने पर इस की खेती के लिए 4×3 का फासला रखा जाता है.

इस की खेती में नर व मादा पौधों का अनुपात 1:4 रखने के लिए ज्यादा पौधों नर या मादा को हटा लेते हैं.

शुरुआत में खरपतवारों को उखाड़ कर या नष्ट कर के इस की बढ़वार दर को बढ़ाया जा सकता है. जोजोबा में फल उत्पादन अप्रैलमई माह में शुरू हो जाता है. शुरूशुरू में फलोत्पादन बहुत कम होता है, पर यह धीरेधीरे बढ़ता जाता है और 10वें साल में औसत प्रति पौधे से 1 किलोग्राम बीजोत्पादन फलों से हासिल किया जा सकता है.

उपयोग : जोजोबा का मुख्य उपयोगी पदार्थ इस से मिलने वाला तेल है, जिस का इस्तेमाल कौस्मैटिक उद्योग के अलावा फार्मास्यूटिकल, स्नेहतक तेल व खाने वाले तेल के रूप में किया जाता है.

इस के अलावा विद्युत रोधी, आग प्रतिरोधी पदार्थ के साथ ही ट्रांसफार्मर में तेल के रूप में इस्तेमाल होता है. इस के तेल का उच्च क्विथनांक और गलनांक होता है और इस का श्रेय बिंदु भी 315 डिगरी सैंटीग्रेड है.

सोनामुखी

Sonamukhi

इस पौधे का वानस्पतिक नाम कैसिया अंगुस्टीफोलिया है. इसे अरब के फिजिशियनों द्वारा भारत में प्रवर्तित किया गया और इस के बाद इसे भारतीय, ब्रिटिश व दुनिया के दूसरे फार्मोकोपियास में शामिल किया गया.

यह हर तरह की जमीन में उग सकता है. इस में सेनोसाइड ए और बी ग्लाइकोसाइड नामक कैमिकल पदार्थ पाए जाते हैं. यह एक छोटी बहुवार्षिक शाकीय पादप है, जिसे पूरी फसल या मिश्रित फसल के रूप में परंपरागत फसलों के साथ उगाया जाता है.

खेती : इसे आमतौर पर बीजों द्वारा उगाया जाता है. बीजों की बोआई ड्रिलिंग द्वारा छिड़काव विधि से की जाती है, पर 30 डिगरी सैंटीग्रेड की दूरी पर बोआई करना सही रहता है. बारिश पर आधारित खेती की परिस्थितियों में आमतौर पर 27 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर और सिंचित इलाके में 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर मुफीद रहते हैं.

बीजों की बोआई से पहले बीजों की सतह को अच्छी तरह रगड़ लेना चाहिए. बीजों को बोने के बाद अंकुरित बीजों में एक से दो बार निराईगुड़ाई करनी चाहिए. पुष्प वृंत की मोटाई, पौधे के निचले हिस्से की मोटाई के बराबर होने पर उसे काट लेते हैं. इस से पौधे में ज्यादा शाखाएं निकलती हैं और बढ़वार की दर भी बढ़ जाती है.

खेती में हलकी सिंचाई करना जरूरी है. ज्यादा बारिश भी नुकसानदायक होती है. सोनामुखी फसल की 2 माह बाद कटाई की जा सकती है, पर पत्तियों की कटाई 3 माह बाद करना उपयुक्त रहता है.

सोनामुखी की पत्तियां व्यापारिक महत्त्व की होती हैं और उन्हें उचित तरीके से सुखाना व भंडारित करना चाहिए. सोनामुखी की पत्तियां और फलियों की जैविक क्षमता 5 सालों तक बरकरार रखी जा सकती है.

भारत में पैदा होने वाला सोनामुखी विदेशों में भेजा जाता है. सोनामुखी की फसल 2-3 साल तक खेत में खड़ी रह सकती है. इस की जडें़ बहुत गहरी जाती हैं और पादप तेज गरमी में भी खड़ा रह सकता है.

लैग्युमिनस कुल का पादप होने के चलते यह नाइट्रोजन स्थिरीकरण में मददगार होता है और इस का स्वाद बहुत कड़वा होने के चलते इसे जानवर भी नहीं खाते हैं. सोनामुखी की फसल से 1-1.4 टन पत्तियां व 1.5 क्विंटल फली प्रति हेक्टेयर हासिल हो सकती है. सोनामुखी की खेती के लिए फरवरी से मार्च माह व जुलाई से अक्तूबर माह तक का समय यानी साल में 2 बार सही रहता है.

तुंबा

इसे वैज्ञानिक भाषा में सिटुलस कोलोसिंथिस कहते हैं. यह एक रेंगने वाला शाकीय पादप है, जो कुकुरबिटेसी कुल का सदस्य है. यह मूलत: अफ्रीका प्रायद्वीप का पादप है और तकरीबन पूरे भारत में पाया जाता है. यह मतीरे कुल का एक अहम सदस्य है और मरु इलाके के विकट हालात में भी अच्छी बढ़वार करने के अलावा माली रूप से भी उपयोगी है. इसी वजह से इसे मरु इलाके के रेगिस्तानी भूभाग के लिए उपयुक्त माना गया है.

तुंबा का पौधा बहुत तेजी से बढ़ता है और इस में 30 दिनों में ही पुष्पन शुरू हो जाता है और बोआई के 60 दिन बाद फलों का उत्पादन भी शुरू हो जाता है.

यह पौधा मिट्टी को बांधे रखने व रेतीले टीबों के स्थिरीकरण में मददगार है. इस के फलों में एक उपयोगी पदार्थ ग्लूकोसाइड कोलोसिंथिस होता है, जबकि बीजों में 20 फीसदी तेल व 11 फीसदी प्रोटीन होता है.

खेती : इस की बडे़ पैमाने पर खेती के लिए बीजों को 5 फीसदी सोडियम क्लोराइड घोल में डुबो देते हैं और उस में से कुछ देर बाद ऊपर तैरने वाले बीजों को जमा कर के गड्ढों में 20 सैंटीमीटर गहराई पर डाल कर 30-35 तापमान में बोआई करते हैं. 10-12 दिन बाद ही बीजों में अंकुरण शुरू हो जाता है.

बीजों की बोआई के लिए मानसून का समय उपयुक्त रहता है और देरी से बीजों की बोआई अगस्त माह के मध्य तक भी की जा सकती है. बीजों की बोआई ड्रिलिंग द्वारा खांचों में बोआई विधि से की जा सकती है या 120×120 सैंटीमीटर के गहरे गड्ढों में भी की जा सकती है. गड्ढों में बोआई के पहले 2 टन फार्मयार्ड मैन्योर और 5 किलोग्राम कीटनाशक प्रति हेक्टेयर मिट्टी में मिलाना फायदेमंद रहता है.

खेती के लिए 2 बार खरपतवार उन्मूलन 20 दिन व 45 दिन बाद करना अच्छा रहता है. इस पर किसी खास कीट या रोग का हमला नहीं होता है, लेकिन कायिक अवस्था में पत्तियों पर कीटों का हमला देखा गया है और इसे कार्बारिल 0.2 फीसदी स्प्रे द्वारा काबू कर सकते हैं.

इस  के हरे फलों को जानवरों को खिलाया जाता है, जबकि पूरी तरह से पके हुए विकसित पीले फूलों को इकट्ठा कर के सुखाया जाता है और इन के बीज निकाले जाते हैं. अनुकूल हालात में 120 से 150 क्विंटल फल प्रति हेक्टेयर हासिल किए जा सकते हैं.

उपयोग : इस के फलों का औषधीय महत्त्व है. हमारे देशी चिकित्सा शास्त्र में इसे औषधि के रूप में काफी इस्तेमाल किया जाता है.

आमतौर पर इसे जुलाव के रूप में इस्तेमाल में लिया जाता है. इस के बीजों में 20 फीसदी प्रोटीन पाया जाता है. इस के तेल का उपयोग साबुन उद्योग के अलावा मोमबत्ती बनाने वगैरह में होता है.

राजस्थान में यह साबुन उद्योग के लिए कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल होता है. इस के बीजों को साधारण नमक के साथ मिला कर रखने से इस का खारापन खत्म किया जा सकता है. सूखे बीज बाजरे के साथ मिश्रित कर पीसे जाते हैं और इस तरह का बना आटा गरीबों द्वारा अकाल में खाया जाता है.

इस तरह से इन गैरपरंपरागत नकदी फसलों की खेती कर के कम बारिश में भी उत्पाद हासिल किए जा सकते हैं. इन की खेती द्वारा इलाके में हरियाली के साथसाथ माली उन्नति भी हासिल की जा सकती है.

‘विश्व मृदा दिवस’ मनाया गया

बस्ती: कृषि विज्ञान केंद्र, बस्ती पर ‘विश्व मृदा दिवस’ मनाया गया. इस अवसर पर डा. वीबी सिंह ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, ‘विश्व मृदा दिवस 2023’ का विषय ‘‘मिट्टी और पानी जीवन का एक स्रोत‘‘ है, जिस का उद्देश्य मृदा स्वास्थ्य की जागरूकता बढ़ाने और समाज को प्रोत्साहित कर के स्वस्थ परिस्थिति की तंत्र और मानव कल्याण को बनाए रखने के महत्व के बारे में मृदा जागरूकता बढ़ाना व मिट्टी की सेहत में सुधार करना है.

केंद्र के वैज्ञानिक डा. प्रेम शंकर ने पराली जलाने से होने वाले नुकसान के बारे में बताते हुए कहा कि पराली जलाने से मिट्टी में उपलब्ध लाभदायक जीवाणु नष्ट हो जाते हैं, जिस से हमारा उत्पादन घट जाता है. वहीं केंद्र के वैज्ञानिक हरिओम मिश्र ने बताया कि लगातार बढ़ती आबादी को भोजन उपलब्ध कराने व अधिक उत्पादन लेने के लिए अंधाधुंध कृषि रसायनों का प्रयोग करना है और उर्वरकों के प्रयोग से हमारी मिट्टी की सेहत दिनोंदिन खराब होती चली जा रही है. नतीजतन, आने वाले समय में हमारी मिट्टी बंजर होने की कगार पर है.

उन्होंने कहा कि हम सभी की जिम्मेदारी बनती है कि अपनी मिट्टी को बिगड़ने से बचाएं और हमें मिट्टी की सेहत के प्रति ध्यान देते हुए धीरेधीरे रासायनिक उर्वरकों का विकल्प जैसे हरी खाद, गोबर की खाद, वर्मी कंपोस्ट व जैविक खाद का प्रयोग करने और साथ ही साथ प्राकृतिक खेती को भी बढ़ाना होगा, तभी हमारी मिट्टी की सेहत बेहतर हो सकती है. वैज्ञानिक डा. अंजलि वर्मा ने पराली के घरेलू उपयोग के बारे में बताया. इस अवसर पर जितेंद्र प्रताप शुक्ला, अहमद अली आदि उपस्थित रहे.

दालों से मिलेगी अधिक उपज

नई दिल्ली: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के तत्वावधान में राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली (एनएआरएस) ने दालों सहित विभिन्न फसलों की क्षेत्र विशिष्ट, उच्च उपज देने वाली और जलवायु के अनुकूल किस्में विकसित की हैं.

वर्ष 2014 के बाद से, देश में 14 दलहनी फसलों की कुल 369 किस्में जारी और अधिसूचित की गई हैं, जिन में सितंबर, 2023 तक बिहार के लिए 7 दलहनी फसलों की 24 किस्में शामिल हैं, जैसे काबुली चना की 6 किस्में, फील्डपी की 6 किस्में, अरहर की 6 किस्में, फैबाबीन की 3 किस्में, मूंग की 2 किस्में, उड़द की एक और मसूर की एक किस्में शामिल हैं.

किसानों को खेती के लिए नई उन्नत किस्मों के बीज जल्द से जल्द उपलब्ध कराने के लिए कई कदम उठाए गए हैं, जिन में उन्नत किस्मों के ब्रीडर बीज का उत्पादन और आपूर्ति. पिछले 5 वर्षों के दौरान, आईसीएआर द्वारा आधार और प्रमाणित बीज के डाउनस्ट्रीम गुणन के लिए विभिन्न सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बीज उत्पादक एजेंसियों को 15.60 लाख क्विंटल दालों के ब्रीडर बीज का उत्पादन और आपूर्ति की गई.

इस के अलावा वर्ष 2016 में ब्रीडर बीज उत्पादन बढ़ाने के लिए 150 दलहन बीज हब और 12 केंद्रों की स्थापना की गई, जिन्होंने वर्ष 2016-17 से 2022-23 के दौरान 7.09 लाख गुणवत्ता वाले बीज और 21713 क्विंटल ब्रीडर बीज का उत्पादन और आपूर्ति की है. इसी के साथ 6.39 लाख गांवों को मिला कर कुल 1587.74 लाख क्विंटल गुणवत्ता वाले बीज का उत्पादन किया गया.

ग्राम स्तर पर गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराने के लिए बीज ग्राम योजना के तहत वर्ष 2014-23 के दौरान 98.07 लाख किसानों को प्रशिक्षण दिया गया और वर्ष 2018-19 से 2022-23 के दौरान दालों के 6000 फ्रंट लाइन प्रदर्शनों और 1,51,873 क्लस्टर फ्रंटलाइन प्रदर्शनों के माध्यम से नई उच्च उपज वाली किस्मों के बीजों का वितरण किया गया.

जांच परख कर लें कृषि यंत्र

अब खेती में बोआई से कटाई तक हर कदम पर मशीनें काम आती हैं. इन के इस्तेमाल से वक्त, पैसा और मेहनत बचती है, पैदावार व कमाई बढ़ती है. खेती की मशीनें किसानों की तरक्की में मददगार साबित हुई हैं.
पहले किसान हल, बैल, कुदाल, हंसिया, खुरपी व फावड़े से खेती करते थे, जिन से काम कम होता था. धीरेधीरे खेती के तौरतरीके बदले. सुधरे हुए औजार और मशीनों का चलन बढ़ा. इन से खेती के मशक्कत भरे काम आसान हुए. लेकिन बड़ी मशीनें खरीदना सब के लिए आसान नहीं है.
बहुत से किसानों को खेती की मशीनें खरीदने के लिए तगड़े सूद पर कर्ज लेना पड़ता है. ऐसे में सम झदारी से काम लेना जरूरी है. अगर सोचसम झ कर कदम न उठाएं तो कई बार मशीनें फायदे की जगह नुकसान का सबब बन जाती हैं.
बहुत से किसानों ने बैंक से कर्ज ले कर ट्रैक्टर खरीदे और उस की किस्त चुकाने में अपनी जमीन गंवा बैठे. अपनी शान दिखाने के लिए फुजूल का दिखावा व दूसरों की देखादेखी कभी न करें. अपनी जेब व जरूरत के मुताबिक फैसला करें कि कब, कहां से कौन सी मशीन खरीदनी है.
बाजार में बहुत सी कंपनियों की मशीनें मौजूद हैं. कंपनियां किसान मेलों वगैरह में अपने स्टौल लगाती हैं, अपने इश्तिहार देती हैं. तसल्ली से पहले पूरी जानकारी करें, ताकि वाजिब दाम में सब से बेहतर मशीन खरीद सकें.
मशीन का मौडल, कूवत, कीमत व खासीयत पता करें. हमेशा किसी अच्छी साख वाली दुकान या कंपनी की एजेंसी से ही मशीन खरीदें, ताकि धोखाधड़ी की गुंजाइश न रहे.
सस्ती लोकल मशीनें हलकी होने के चलते जल्दी खराब होती हैं या वे अचानक कभी भी बीच में धोखा दे जाती हैं और काम रुक जाता है. उन में टूटफूट व मरम्मत का खर्च भी ज्यादा होता है.
आईएसआई या आईएसओ जैसे क्वालिटी निशान लगी मशीनों को तरजीह दें. खरीद के वक्त मशीन के नटबोल्ट और बौडी चैक करें. हो सके तो उसे चला कर देखें और खासकर भीतरी हिस्सों पर नजर डाल लें.
इस्तेमाल की हिदायतों का मैनुअल, तारीख, दस्तखत व मोहर लगा गारंटी कार्ड व पक्की रसीद जरूर लें और उसे संभाल कर रखें.
Machines
मशीनों की सही देखभाल
ज्यादातर किसान खेती में काम आने वाली मशीनों की खास परवाह नहीं करते और वे उन को ठीक से इस्तेमाल भी नहीं करते. धूलकीचड़ में सनी मशीनें यों ही खुले में खड़ी रहती हैं.
खुले में बारिश व धूप की मार सहती रहती हैं. उन्हें धो, पोंछ व सुखा कर, साफसुथरी पौलीथिन से ढक कर किसी छायादार जगह पर रखें. खराबी होने पर किसी अच्छे मेकैनिक को दिखाया जाए, तो मशीनें वक्त पर धोखा नहीं देतीं.
खेती में काम आने वाली मशीनों की सही देखभाल करना कोई महंगा या मुश्किल काम नहीं है. अगर किसान चाहें तो वे इसे आसानी से कर सकते हैं. पड़ोसी देश चीन के किसान इस मामले में बहुत आगे हैं. वे अपनी मशीनों का मोल पहचानते हैं. उन को जान से ज्यादा संभाल कर रखते हैं और ज्यादा फायदा उठाते हैं.
महंगाई के दौर में किसान अगर मशीनों की खरीद, उन के इस्तेमाल व रखरखाव में पूरी सावधानी बरतें, तो वे मशीनों से अपना काम करने के अलावा किराए पर चला कर और फायदा उठा सकते हैं.