Fodder Machines : यह है सुरक्षित चारा मशीन

Fodder Machines: देश में पशुपालन पुराने समय किया जाता रहा है और छोटे और मंझले किसानों का यह एक सह रोजगार रहा है. वह एक अलग समय था जब संसाधन नहीं थे तो पशुओं का चारा गंडासे का इस्तेमाल कर हाथ से काटा जाता था, जिसमें समय भी अधिक लगता था और सभी तरह के चारे भी नहीं काटे जा सकते थे. हर आदमी यह काम कर भी नहीं सकता था, क्योंकि हाथ कटने का डर अलग रहता था. उसके बाद चारा काटने की मशीनें आने लगी थीं जो पूरी तरह सुरक्षित नहीं थीं, क्योंकि उनमें भी दुर्घटना होने का डर था.

इस समय भारत में लगभग एक करोड़ से अधिक हस्त चालित और 27 लाख शक्ति चालित चारा मशीनें हैं

चारा मशीन द्वारा दुर्घटनाएं

-इन मशीनों से खेलते हुए बच्चे दुर्घटना ग्रस्त हो सकते हैं.

-हाथ कटने का डर और तरह की चोटें भी मशीन में चारा डालते समय हो जाती हैं.

-ढीले कपड़े गरारियों में फंसकर दुर्घटना का कारण बनते हैं.

-मशीन पर कार्य करने वाले व्यक्ति की ज्यादा थकावट या अस्वस्थता भी व्यक्ति की चोट का कारण हो सकती है.

-इसके अलावा मशीन पर किसी भी प्रकार का प्रशिक्षण या जानकारी न होना भी व्यक्ति को चोटिल कर सकता है.

सुरक्षित चारा मशीन

इस समय आपके पास विकल्प मौजूद हैं. अब चारा काटने की ऐसी मशीनें आ रही हैं जो अब पूरी तरह सुरक्षित हैं और पशुपालकों का काम सरल और सुरक्षित कर रही हैं. इन मशीनों में अब सुरक्षा के वे सारे इंतजाम है जिससे चोटिल होने का खतरा नहीं के बराबर रहता है.

ब्लेड गार्ड : ब्लेड (फरसे) से होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने के लिए ब्लेड गार्ड बनाए गए हैं. इसे मशीनों के बोल्टों पर लगाया जा सकता है. ये बच्चों में खेलते समय होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने का काम करते हैं

फ्लाई व्हील का ताला : फ्लाई व्हील (पहिए) को घूमने से रोकने के लिए एक ताले को विकसित किया गया है, जो काम न करने के समय घूमने से रोके रखता है. इसे भी मशीन पर उपलब्ध बोल्टों पर लगाया जा सकता है.

चेतावनी रोलर : एक लकड़ी का खुरदरा रोलर पतनाले के आगे लगाया जा सकता है जो कि हाथ के मशीन के पास असुरक्षित क्षेत्र में आने पर खतरे की चेतावनी देने का काम काम करता है.

आजकल सब उपकरण लगे हुए भी आते हैं जो आपको खतरे से बचाते हैं और सुरक्षित चारा कटाई का काम करते हैं

इसके अलावा इस तरह के उपकरण गांव या शहर के कारीगर द्वारा भी बनाये जा सकते हैं और इनकी लागत भी बहुत कम आती है, इसलिए अगर आप चारा कटाई मशीन खरीदने जा रहे हैं तो सुरक्षा का ध्यान पहले रखें.

Union Budget 2026 : अब आसान होगा पशुपालन

Union Budget 2026: केंद्रीय बजट 2026 में डेयरी क्षेत्र को विशेष प्राथमिकता दी गई है. यह बजट पशुपालकों की आमदनी कहीं ज्यादा बढ़ाने वाला होगा और ग्रामीण आजीविका को भी मजबूत देगा Union Budget 2026. किसानों की पशुधन की सुरक्षा और आधुनिक तरीके से पशुपालन सुनिश्चित करने के लिए नस्ल सुधार कार्यक्रमों, पशु चिकित्सा सेवाओं के विस्तार दिया जाएगा.

घर-घर पहुंचेगी मोबाइल पशु चिकित्सा

पशुओं के इलाज के लिए चल रही मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयों का विस्तार किया जाएगा जिससे हर पशुपालक को घर बैठे पशु चिकित्सा का लाभ मिल सके.

सहकारी समितियों और पशुधन किसान उत्पादक संगठनों को मिलेगा लाभ

बजट में बेहतर दुग्ध संग्रहण, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन अवसंरचना के माध्यम से डेयरी क्षेत्र को सुदृढ़ करने पर भी विशेष जोर दिया गया है. दुग्ध उत्पादन और उससे संबंधित गतिविधियों में लगे सहकारी समितियों और पशुधन किसान उत्पादक संगठनों (एलएफपीओ) को समर्थन देने पर विशेष ध्यान दिया गया है. ‘आत्मनिर्भर भारत’ की परिकल्पना के अनुरूप, बजट पशुपालन में नवाचार, प्रौद्योगिकी के उपयोग और निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देने के साथ-साथ चारा विकास, पशु आहार सुरक्षा पर भी अनेक लाभान्वित करने वाली योजनाओं का लाभ पशुपालकों को मिलेगा. Union Budget 2026

अधिक दुग्ध उत्पादन, अधिक रोजगार

पशुपालन और दुग्ध उत्पादन बढ़ने पर अतिरिक्त लोगों को मिलेगा रोजगार और पोषण सुरक्षा में होगा सुधार.

बढ़ेंगे पशुओं के डाक्टर, पशु रहेंगे स्वस्थ

पशु चिकित्सा पेशेवरों की संख्या बढ़ाकर 20,000 से अधिक करने के उद्देश्य से निजी क्षेत्र के पशु चिकित्सा और अर्ध-पशु चिकित्सा महाविद्यालयों, पशु अस्पतालों, निदान प्रयोगशालाओं और पशु प्रजनन केंद्रों की स्थापना के लिए ऋण-आधारित पूंजी सब्सिडी सहायता योजना शुरू करने की तैयारी है. इसके अलावा भारतीय एवं विदेशी संस्थानों के बीच सहयोग को भी सुगम बनाया जाएगा.

डेयरी फार्मिंग के लिए सब्सिडी

केंद्रीय बजट 2026-27 में पशुपालन में उद्यमिता/डेयरी फार्मिंग और आधुनिकीकरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ऋण-आधारित सब्सिडी योजना का प्रस्ताव है, जिससे पशुधन, दुग्ध उत्पादन और मुर्गीपालन उद्यमों को लाभ होगा. इस उपाय का उद्देश्य किसानों को आधुनिक उपकरण अपनाने, उत्पादकता बढ़ाने और ग्रामीण क्षेत्रों में मूल्य श्रृंखला विकसित करने में सहायता करना है. Union Budget 2026

‘भारत विस्तार’ प्लेटफॉर्म जैसे एआई-आधारित कृषि उपकरण, जिनका उद्देश्य दुग्ध उत्पादन और पशुधन उत्पादकों सहित किसानों के लिए निर्णय लेने की प्रक्रिया को बेहतर बनाना है. ग्रामीण आय विविधीकरण प्रयासों के अंतर्गत दुग्ध उत्पादन और पशुधन किसानों के लिए ऋण और उद्यमिता सहायता पर जोर दिया गया है.

प्राथमिक सहकारी समितियों के लिए छूट का दायरा बढ़ा

प्राथमिक सहकारी समितियों द्वारा पशुओं के चारे और कपास के बीज की आपूर्ति अब कर कटौती के लिए पात्र होगी, जिससे दुग्ध उत्पादकों और पशुपालकों को बेहतर सहायता और कम लागत सुनिश्चित होगी.

नई कर व्यवस्था के तहत एक सहकारी समिति द्वारा दूसरी सहकारी समिति से अर्जित लाभांश आय को कटौती के रूप में अनुमति दी जाएगी, जिससे दुग्ध एवं पशुधन सहकारी समितियों के भीतर वित्तीय प्रवाह मजबूत होगा. Union Budget 2026 इन उपायों से सहकारी समितियों की वित्तीय स्थिति मजबूत होगी और दुग्ध उत्पादक किसानों को सहायता मिलेगी.

लगेंगे नए बायोगैस प्लांट

बायोगैस मिश्रित सीएनजी पर देय केंद्रीय उत्पाद शुल्क की गणना करते समय बायोगैस के संपूर्ण मूल्य को इसमें शामिल नहीं किया जाएगा. इससे डेयरी क्षेत्र में सतत विकास को बढ़ावा मिलेगा और देश में नए बायोगैस संयंत्रों की स्थापना को प्रोत्साहन मिलेगा.

First Aid Box for Animals: पशुओं का करे जरूरी उपचार

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मवेशियों को किसी भी समय चोट, बीमारी या तकलीफ हो सकती है. लेकिन हर वक्त पशु अस्पताल पहुँचना संभव नहीं होता — क्योंकि न तो हर गाँव में वेटनरी हॉस्पिटल पास में होता है, न ही हमेशा डॉक्टर उपलब्ध रहते हैं.ऐसे में फर्स्ट एड बॉक्स ही काम आता है, जो आकस्मिक स्थिति में तुरंत उपचार करने में मदद करता है.

क्यों आवश्यक है फर्स्ट एड बॉक्स

पशुपालकों की आजीविका उनके मवेशियों पर निर्भर होती है. इसलिए पशुओं की सेहत और देखभाल अत्यंत महत्वपूर्ण है. मानव की तरह मवेशियों को भी छोटी-मोटी चोटें या हल्की बीमारियाँ होती रहती हैं. अगर घर में फर्स्ट एड बॉक्स मौजूद है तो किसान तुरंत उपचार कर सकता है और पशु का जीवन बचाया जा सकता है.

प्राथमिक उपचार

मवेशियों में अक्सर ये समस्याएँ देखने को मिलती हैं —
• कब्ज
• पेट फूलना
• दस्त
• घाव या चोट
• हड्डी टूटना
• सांप का काटना
• जहरीला चारा या कीटनाशक खा लेना
• लू या ठंड लगना

अगर इनका समय पर प्राथमिक उपचार (First Aid Treatment) न किया जाए, तो ये जानलेवा साबित हो सकती हैं.पशुपालकों को अपने मवेशियों की चाल, खानपान, मलमूत्र और दूध उत्पादन में बदलाव पर ध्यान देना चाहिए.

जख्म या चोट लगने पर क्या करें

• बर्फ या ठंडे पानी से चोट की सिंकाई करें.
• एंटीसेप्टिक क्रीम या टिंचर बैंजाइन लगाएँ.
• अगर घाव बड़ा या पुराना है तो तुरंत वेटनरी डॉक्टर से सलाह लें.

कब्ज या दस्त होने पर घरेलू उपचार

कब्ज होने पर:

60 ग्राम काला नमक + 60 ग्राम सादा नमक + 15 ग्राम हींग + 50 ग्राम सौंफ + 500 ग्राम गुड़ मिलाकर मवेशी को हर 2 घंटे पर दें.

दस्त होने पर:

गुड़, नमक और जौ के आटे का घोल पिलाएँ. इससे शरीर में पानी की कमी नहीं होती.
इसके अलावा मांड़, छाछ और तरल पदार्थ भी दें.

बीमारी के खतरे को पहचानें

अगर मवेशी की त्वचा खींचने पर अपनी जगह पर आने में 6 सेकंड से ज़्यादा समय लेती है, तो यह डिहाइड्रेशन या गंभीर बीमारी का संकेत है. ऐसे में तुरंत डॉक्टर को बुलाएँ.

जहरीला चारा या कीटनाशक खाने पर क्या करें

यदि मवेशी ने गलती से जहरीला पदार्थ खा लिया है —

• तुरंत मुंह से पानी डालें ताकि जहर पतला हो जाए.
• नमक या पीसी सरसों का घोल बनाकर पिलाएँ, ताकि उल्टी हो सके.
• मैग्नीशियम सल्फेट (Magnesium Sulphate) पानी में घोलकर दें (बड़े मवेशी को 250 ग्राम, छोटे को 100 ग्राम) यह आंतों से जहर को बाहर निकालने में मदद करता है.

गले में कुछ अटकने पर उपचार

अगर मवेशी के गले में फल, आलू या कोई चीज़ फँस जाए —

• मवेशी बेचैन होकर लार बहाता है और निगलने की कोशिश करता है.
• गले पर हल्के हाथों से दबाव दें और सहलाएँ, ताकि वस्तु नीचे चली जाए.
• अगर सुधार न हो तो तुरंत डॉक्टर बुलाएँ.

अधिक खून बहने पर क्या करें

• खून बहने वाली जगह पर कपड़ा कसकर बाँधें.
• अगर बांधना संभव न हो, तो कपड़े को फिटकिरी के घोल में भिगोकर लगाएँ.
• यह डॉक्टर आने तक अस्थायी उपचार के रूप में असरदार होता है.

सांप काटने पर तुरंत उपचार

• डसे गए हिस्से से 4–5 इंच ऊपर डोरी कसकर बाँधें.
• नई ब्लेड से हल्का चीरा लगाकर जहर को बाहर आने दें.
• मवेशी को गरम पानी या चाय पिलाएँ ताकि उसे नींद न आए.
• जल्द से जल्द डॉक्टर को दिखाएँ.

लू या ठंड लगने पर देखभाल

लू लगने पर –

• मवेशी को ठंडी जगह पर रखें.
• ठंडे पानी से शरीर धोएँ और मीठा, नमकीन पानी बार-बार पिलाएँ.
• पुदीना और प्याज का अर्क लाभकारी है.

ठंड लगने पर –

• मवेशी कांपता है या नाक से पानी बहता है.
• कुनकुने पानी में गुड़ मिलाकर पिलाएँ.
• अजवायन, सेंधा नमक और अदरक गुड़ में मिलाकर दें.
• सरसों या तारपीन के तेल में कपूर मिलाकर मालिश करें.

क्या-क्या रखें फर्स्ट एड बॉक्स में

मवेशियों के फर्स्ट एड बॉक्स में जरूरी सामान रुई, फिटकिरीबांस की खपच्ची, टिंचर बैंजाइन, एंटीसेप्टिक क्रीम, नया ब्लेड, कारबोलिक एसिड, मैग्नीशियम सल्फेट, जमालगोटा, जौ का आटा, तारपीन का तेल, कपूर, मांड़ या डिटॉल / सेवलॉन, बोरिक एसिड जरुर रखें.

साथ ही नजदीकी पशु चिकित्सक का नंबर और अस्पताल का संपर्क विवरण भी बॉक्स में रखें ताकि आपातकाल में तुरंत मदद ली जा सके.

मवेशियों के लिए तैयार किया गया फर्स्ट एड बॉक्स हर पशुपालक के लिए अनिवार्य है.यह न केवल पशुओं का जीवन बचाता है, बल्कि किसान की आजीविका की सुरक्षा भी सुनिश्चित करता है.थोड़ी सी सतर्कता और तैयारी से पशुपालक अपने मवेशियों को स्वस्थ और उत्पादक रख सकते हैं.

Mushroom Production Technology : मशरूम उत्पादन पर प्रशिक्षण

Mushroom Production Technology : चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के सायना नेहवाल कृषि प्रौद्योगिकी प्रशिक्षण एवं शिक्षा संस्थान में मशरूम उत्पादन तकनीक पर 3 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम संपन्न हुआ. प्रशिक्षण में उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, नई दिल्ली और चंडीगढ़ के 110 प्रतिभागियों ने भाग लिया.

संस्थान के सहनिदेशक डा. अशोक कुमार गोदारा ने बताया कि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बलदेव राज कांबोज के मार्गदर्शन में संस्थान द्वारा पूरे साल किसानों और युवाओं के लिए स्वरोजगार एवं कौशल विकास से जुड़े रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण आयोजित किए जाते हैं. इन प्रशिक्षणों में मधुमक्खीपालन, केंचुआ खाद उत्पादन, फलसब्जी परिरक्षण, कृषि में ड्रोन की उपयोगिता, डेयरी फार्मिंग और सब्जियों की संरक्षित खेती शामिल हैं.

उन्होंने बताया कि प्रशिक्षण के दौरान युवाओं और किसानों को बटन मशरूम के अलावा दूसरी महत्त्वपूर्ण खाद्य और औषधि मशरूम की वैज्ञानिक तरीके से उत्पादन प्रौद्योगिकी, प्रसंस्करण, स्पान उत्पादन तकनीक आदि के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई.

विस्तार शिक्षा निदेशक डा. बलवान सिंह मंडल ने बताया कि मशरूम उत्पादन तकनीक अन्य फसलों के उत्पादन से बिल्कुल भिन्न है, जिस की वजह से इस का प्रशिक्षण लेना बहुत जरूरी है. प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को बटन मशरूम के अलावा खाद्य और औषधीय मशरूम जैसे ओयस्टर/ढींगरी, किंग ओयस्टर, दूधिया, शिटाके, कीड़ा जड़ी, गैनोडर्मा मशरूम, देशी मशरूम के बारे जानकारी दी गई.

प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र भी वितरित किए गए. प्रशिक्षण का संयोजन डा. सतीश कुमार मेहता ने किया. प्रशिक्षण के दौरान डा राकेश कुमार चुघ, डा. जगदीप सिंह, डा. विकास कांबोज, डा. सरोज यादव, डा. अमिता गिरधर, डा. डीके शर्मा, डा. संदीप भाकर, डा. भूपेंद्र सिंह, डा. विकास हुड्डा ने भी मशरूम उत्पादन तकनीक से संबंधित विभिन्न विषयों पर विस्तार से जानकारी दी.

Dairy Farming : वैज्ञानिक तरीके से करें डेयरी फार्मिंग

Dairy Farming : भारत में बड़े पैमाने पर दूध का कारोबार होता है. किसान खेती के साथसाथ पशुपालन भी करता आया है, ताकि उसे दोहरा लाभ हो. पशुपालन करने से उसे दूध उत्पादन के अलावा खेती में काम आने वाली गोबर की खाद भी मिलती है. अगर चाहे तो वह उस के गोबर से गोबर गैस प्लांट भी लगा सकता है.

भारत में छोटाबड़ा हर तबके का किसान है और डेयरी फार्मिंग (Dairy Farming) भारत में छोटे व बड़े दोनों स्तर पर सब से ज्यादा विस्तार से फैला हुआ व्यवसाय है, इसलिए डेयरी व्यवसायी वैज्ञानिक विधि से पशुपालन कर अधिक मुनाफा ले सकते हैं.

डेयरी व्यवसाय को फायदेमंद बनाने के लिए लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय हिसार द्वारा दी गई बहुत ही महत्त्वपूर्ण जानकारी बड़े ही आसान तरीके से यहां बताई गई है, जिस का लाभ निश्चित ही पशुपालकों को मिलेगा.

करें उत्तम नस्ल का चयन

डेयरी फार्मिंग (Dairy Farming ) में अधिक दूध उत्पादन के लिए अच्छी नस्ल के पशुओं का चयन करना चाहिए. देशी नस्लों में साहीवाल, रैड सिंधी, गिर, थारपारकर जबकि विदेशी नस्लों में होलस्टीन फ्रीजीयन व जर्सी अच्छी दुधारु नस्लें हैं. संकर नस्लों में हरधेनु व फ्रीजवाल अच्छी नस्लें हैं और हरियाणा नस्ल की गाय भी अपने क्षेत्र की उत्तम नस्ल है. भैसों में मुर्राह नस्ल सब से अच्छी दुधारु नस्ल है. यह सभी नस्ल अच्छा दूध उत्पादन देती हैं और पशुपालक अपनी पहुंच के हिसाब से किस्म का चयन डेयरी फार्मिंग का काम कर सकता है

पशुओं का आवास प्रबंधन

यदि पशु का आवास स्वच्छ व आरामदायक होगा तो निश्चिततौर पर पशु का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा और वह अपनी क्षमता अनुसार अधिक दूध का उत्पादन करेगा, इसलिए पशु के लिए स्वच्छ और आरामदायक आवास की व्यवस्था करें.

प्रजनन प्रबंधन

गाय/भैंसों का कृत्रिम गर्भाधान अथवा अच्छी नस्ल के प्रमाणित सांड से उचित समय पर गर्भाधान कराएं. गरमी में आने के 10-12 घंटे बाद ही पशुओं में गर्भाधान करवाएं. 2 ब्यांतों में उचित अंतराल के लिए ब्याने के 40 से 90 दिन के अंदर कृत्रिम गर्भाधान कराएं.

पशुओं का आहार प्रबंधन

पशु के कुल आहार में सूखे पदार्थ के आधार पर दोतिहाई भाग चारा और एकतिहाई भाग दाने का मिश्रण मिला कर देना चाहिए. मोटेतौर पर एक वयस्क गाय को प्रतिदिन 30-35 किलो हरा चारा, 5-6 किलो सूखा चारा (तूड़ा) व 1-1.5 किलो दाना पर्याप्त रहता है. इस के अलावा दुधारु पशुओं में गाय को प्रति 2.5 किलो दूध के लिए 1 किलो व भैंस को प्रति 2 किलो दूध के लिए 1 किलो अतिरिक्त दाना देना चाहिए. गर्भावस्था के दौरान गाय को 1.25 किलो तथा भैस को 1.75 किलो अतिरिक्त दाना देना चाहिए.

स्वच्छ दुग्ध उत्पादन

सामान्यतः हानिकारक जीवाणुओं और गंदगी रहित दूध को स्वच्छ दूध कहते हैं. इस के लिए पशुघर में साफसफाई रखनी चाहिए और अच्छी तरह से धोए हुए बरतनों का ही उपयोग करना चाहिए. दूध साफ व शांत वातावरण में निकालना चाहिए. ज्यादा पशुओं के लिए दूध निकालने की मशीन (मिल्किंग मशीन) का उपयोग भी किया जा सकता है. मिल्किंग मशीन से काम समय में अच्छी क्वालिटी का शुद्ध दूध प्राप्त होता है.

नवजात की देखभाल

नवजात बछड़ा/बछड़ी को जन्म के 20 से 30 मिनट के अंदर खीस पिलानी चाहिए. खीस नवजात पशु को रोग निरोधक शक्ति प्रदान करता है. खीस सामान्यतः नवजात के भार के 1/10 भाग के बराबर पिलाएं. साधारणतः नाल अपनेआप टूट जाती है, अगर जुड़ी रहे तो नए ब्लेड से 2.5 इंच छोड़ कर काट दें व 3 से 4 दिन तक टिंक्चर आयोडीन लगाएं.

बीमारियों से रोकथाम

संक्रामक रोगों (गलघोंटू व मुंह खुर इत्यादि) की रोकथाम के लिए नियमित टीकाकरण करवाएं. दुधारु पशुओं में होने वाले थनैला रोग से बचाव के उपाय करने चाहिए. इस के लिए पशुघर की नियमित सफाई करें व थनों और लेवटी को लाल दवा के घोल से धोएं. हर 3 से 4 महीने में पशुओं को पेट के कीड़ों से मुक्त करने की दवा दें.

इस के अलावा पशु अगर सुस्त दिखाई दे या किसी बीमारी की आशंका हो तो पशु डाक्टर को जरूर दिखाएं और पशुओं का समय पर टीकाकरण करवाएं.

Lump Disease : पशुपालकों पर भारी, पशुओं में लंपी बीमारी

Lump Disease  : पाकिस्तान से राजस्थान के रास्ते आई लंपी स्किन बीमारी की वजह से पशुपालकों को काफी परेशान होना पड़ता है. क्योंकि वायरस से फैलने वाली इस बिमारी का कोई सटीक इलाज अभी भी नहीं खोजा जा सका है. इस वजह से कभीकभी पशुओं की मौत हो जाती है. देश में लंपी बिमारी के चलते अब तक हजारों की तादाद में पशुओं की मौत हो चुकी है. राजस्थान और गुजरात सहित देश के 10 राज्यों में पशुओं में ये बीमारी पाई गई है. इस बीमारी का असर विशेषकर भैंसों की तुलना में गायों में ज्यादा पाया गया है.

लंपी (Lump Disease) एक ऐसी बिमारी है जिस का वायरस तेजी से संक्रमण फैलाता है. यदि समय पर इस की रोकथाम के उपाय नहीं किए जाएं तो इस से पशु की मौत भी हो सकती है. हालांकि, सरकार ने इस बीमारी के लिए एक देसी वैक्सीन भी लौंच कर दी है. इस के बाद भी पशुपालकों को कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए ताकि, इस बीमारी के संक्रमण को बढने से रोका जा सके.

लंपी बिमारी (Lump Disease) की पहचान

पशुओं में होने वाला लंपी त्वचा रोग कैप्रीपौक्स वायरस के कारण होता है, जो गायों और भैंसों को संक्रमित करता है. यह बीमारी मुख्य रूप से मक्खी, टिक्स और मच्छर के कारण फैलती है. यह बीमारी नमी वाले तापमान में ज्यादा तेजी से फैलती है. इस बीमारी से प्रभावित पशु के शरीर पर गांठे उभर आती है और इस में से पानी रिसने लगता है. इस से बैक्टीरिया को प्रवेश करने का मौका मिल जाता है. ये फफोले घाव का रूप ले लेते हैं, जिन पर मक्खियां बैठती हैं  और संक्रमण का प्रसार करती हैं. भारत में इस बीमारी के लक्षण प्रमुख रूप से गाय जैसे दुधारू पशुओं पर देखे जा रहे हैं. इस बीमारी से कई हजार गायों की मौत हो चुकी है. अभी फिलहाल इस बीमारी का प्रकोप सिर्फ गायों में देखा जा रहा है. भैंसों में अभी तक इस बीमारी के लक्षण नहीं पाए गए हैं.

गायों में होने वाली लंपी बीमारी (Lump Disease) को उस के लक्षणों को देख कर आसानी से पहचाना जा सकता है. इस बीमारी की चपेट में आने वाले पशुओं को शुरू में बुखार आता है. इस से पशु सुस्त रहने लगते हैं. इस रोग से पीड़ित पशु की आंखों और नाक से स्त्राव होता है. पशु के मुंह से लार टपकती रहती है. लंपी बीमारी से ग्रसित पशु के शरीर पर गांठ जैसे छाले हो जाते हैं जो फफोले का रूप ले लेते हैं. इस बीमारी से ग्रस्त पशुओं की अगर सही से देखभाल और बचाव न किया जाए तो पशुओं की मौत भी हो जाती है. क्योंकि रोग से ग्रसित की भूख कम हो जाती है और पशु चारा कम खाना शुरू कर देता है. इस की वजह से पशु की दूध देने की क्षमता कम हो जाती है.

लंपी स्किन रोग का इलाज

अभी तक लंपी बीमारी (Lump Disease) का कोई कारगर इलाज  नहीं खोजा जा सका है. इस के लिए हाल ही में एक वैक्सीन विकसित की गई है लेकिन उसे अभी पशुपालकों तक पहुंचाने में समय लगेगा. ऐसी दशा में अगर किसी पशु में लंपी स्किन रोग हो जाता है तो इस का इलाज  पारंपरिक आयुर्वेदिक और होमियोपैथी के जरीए किया जा सकता है. इस तरह के उपचार से संक्रमित पशुओं के ठीक होने में काफी अच्छे परिणाम देखे गए हैं.

नीम की पत्तियों को पानी में उबाल कर नीम में उबले पानी को गाय की त्वचा में लगाना. साथ ही उबाली गई पत्तियों को पीस कर त्वचा में लेप लगाना. कई मामलों में यह देखा गया है कि एलोवेरा भी लंपी वायरस के खात्मे में बढ़िया काम करता है. इसलिए पशुपालक ऐलोवेरा का लेप भी पशुओं की त्वचा में लगा सकतें हैं, जो काफी हद तक लंपी वायरस के बचाव में कारगर सिद्ध हुआ है.

लंपी से संक्रमित पशुओं के इलाज  के लिए लिए पशु आहार में आयुर्वेदिक खुराक भी जोड़ सकते हैं, जिसे बनाने के लिए 10 पान के पत्‍ते, 10 ग्राम काली मिर्च, 10 ग्राम नमक और गुड़ आदि सामानों की जरूरत होती है. इन सब को इकट्ठा करने के बाद सब से पहले 10 पान के पत्‍ते, 10 ग्राम काली मिर्च, 10 ग्राम नमक को पीस कर गाढ़ा पेस्ट बना लें और उस में गुड़ डाल कर मिश्रण बनाएं. पहले दिन में इस आयुर्वेदिक मिश्रण को हर 3 घंटे के बीच पशुओं को सीमित मात्रा में खिलाएं. दूसरे दिन से अगले 15 दिन तक 3 खुराक प्रति दिन के हिसाब से पशुओं को खिलाते रहें.

पशुओं के शरीर पर घाव और गांठों में कीड़े दिखने पर नारियल के तेल में कपूर मिला कर लगाना फायदेमंद रहता है. आप चाहें तो सीताफल की पत्तियों को पीस कर भी घाव पर लगा सकते हैं.

इस के अलावा होमियोपैथी की कुछ दवाएं काफी कारगर पाई गई हैं. पशुपालक किसी अच्छे होमियोपैथी चिकित्सक से मिल, दवाएं ले कर संक्रमित पशुओं को दें.

दूसरे पशुओं को कैसे बचाएं

लंपी स्किन रोग संक्रमण से फैलने वाला रोग है. इसलिए जो गायें इस रोग से संक्रमित हो जाए तो तुरंत ही दूसरे पशुओं में इस बिमारी के फैलाव का उपाय शुरू कर देना चाहिए. इस के लिए लंपी स्किन रोग से प्रभावित पशुओं को इस रोग से बचाने के लिए संक्रमित पशु को स्वस्थ पशु से तुरंत अलग कर देना चाहिए. जिस जगह पर संक्रमित पशुओं को रखा गया वहां और स्वस्थ्य पशुओं के बाड़े में बीमारी फैलाने वाले मक्खीमच्छर की रोकथाम के लिए आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए.

पशुओं के खाने और पीने का बरतन या पात्र साफ होना चाहिए. पशुपालक यह कोशिश करें कि  जो चारा पशुओं को खिलाया जा रहा है वह ताजा हो और संक्रमित पशु के खानेपीने की नाद स्वस्थ पशु के नाद से दूर या अलग रखें. लंपी बीमारी से संक्रमित पशुओं को एक जगह से दूसरी जगह न ले जाएं. इस से इस बीमारी के फैलने की संभावनाएं बढ़ जाती है.

लंपी वायरस से ग्रस्त पशुओं को जिस जगह पर रखा गया हो वहां पर साफसफाई, जीवाणु और विषाणुनाशक रसायन का प्रयोग करें. चूंकि लंपी बीमारी का प्रभाव अभी तक सिर्फ गायों में देखा गया है ऐसे में लंपी वायरस से बचाव हेतु वायरस का संक्रमण देखते ही नजदीकी पशु चिकित्सालय में या पशु चिकित्सक से संपर्क करें.

लंपी स्किन रोग से बचाव के लिए वैक्सीन तैयार

पशुओं को लंपी स्किन रोग से बचाव के लिए स्वदेशी वैक्सीन (लंपीप्रो वैकइंड) लौंच की गई है. यह वैक्सीन राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र, हिसार (हरियाणा) ने भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, इज्जतनगर (बरेली) के सहयोग से बनाई है. इस वैक्सीन को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के निर्देश के क्रम में बनाया गया है. जानकारों का कहना है कि यह वैक्सीन लंपी स्किन रोग पर 100 फीसदी कारगर है.

लंपी बिमारी से बचाव के लिए राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए तीन सालों के शोध से एक कारगर टीका विकसित किए जाने में सफलता मिली है. बायोटैक समूह की कंपनी द्वारा आईसीएआर के साथ मिल कर विकसित गांठदार त्वचा रोग के टीके को सीडीएससीओ का लाइसैंस भी मिल गया है.

बायोवेट का कहना है कि बायोलंपी वैक्सीन  लंपी स्किन रोग के लिए विश्व स्तर पर पहला मार्कर टीका है और इसे जल्द ही लौंच किया जाएगा. जो जल्द ही व्यावसायिक रूप से उपलब्ध हो जाएगी. बायोवेट के मल्लूर संयंत्र में सालाना 50 करोड़ खुराक का उत्पादन किया जा सकता है.

सीडीएससीओ लाइसैंस पशु चिकित्सा स्वास्थ्य सेवा में भारत की आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है, जिस से आयातित टीकों पर निर्भरता खत्म हो जाती है. यह डीआईवीए मार्कर वैक्सीन रोग निगरानी और उन्मूलन कार्यक्रमों के लिए पशु चिकित्सा के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी बदलाव है और डेयरी उद्योग की स्थिरता में प्रमुख भूमिका निभाने के लिए तैयार है.

बायोवेट के एक अधिकारी का कहना है कि पिछले दो सालों में, भारत में लंपी स्किन रोग के चलते तकरीबन 2 लाख मवेशियों की मौत हो गई और कई अन्य ने अपनी दूध उत्पादन क्षमता खो दी. बायोलंपी वैक्सीन , जो फ्रीजड्राई रूप में उपलब्ध है, एक एकल टीकाकरण है जो 3 महीने से अधिक उम्र के मवेशियों और भैंसों को साल में 1 बार दिया जाता है.

Livestock : पशुधन उत्पादकता बढ़ाने हेतु जागरूकता कार्यक्रम

Livestock : मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के अंतर्गत पशुपालन और डेयरी विभाग ने पिछले दिनों पशुधन (Livestock) उत्पादकता बढ़ाने हेतु वर्चुअल जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया. इस कार्यक्रम में देशभर के 2000 कौमन सर्विस सैंटर से 1 लाख से अधिक पशुपालक किसान जुड़े. इन में छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, केरल, अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह, लक्षद्वीप, दिल्ली और चंडीगढ़ जैसे राज्य और केंद्रशासित प्रदेश शामिल रहे.

इस बैठक की अध्यक्षता नई दिल्ली से केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी एवं पंचायती राज राज्य मंत्री प्रो. एसपी सिंह बघेल ने की. इस अवसर पर विभाग की अतिरिक्त सचिव वर्षा जोशी, राम शंकर सिन्हा और अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित रहे.

मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी राज्य मंत्री प्रो. बघेल ने राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में पशुपालक किसानों के अमूल्य योगदान की सराहना की. उन्होंने बताया कि पिछले 10 सालों में देश में दूध उत्पादन की सालाना वृद्धि दर 5.7 फीसदी रही है, जबकि दुनियाभर में यह केवल 2 फीसदी सालाना है.

इस उपलब्धि का श्रेय उन्होंने देश के पशुपालक किसानों को दिया. उन्होंने विभागीय पहलों जैसे टीकाकरण कार्यक्रम और सैक्स सौर्टेड सीमेन के उपयोग की भी प्रशंसा की, जिन से देश में पशुधन उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिली है. उन्होंने आगे किसानों से बातचीत की और पशु चिकित्सा सेवाओं की उपलब्धता के बारे में जानकारी ली, जिस में इलाज संबंधी मदद के लिए टोलफ्री नंबर 1962 का उपयोग शामिल है. उन्होंने पशुपालक किसानों से पशु बीमा को अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया और पशुओं का समयसमय पर टीकाकरण कराने का महत्त्व भी बताया.

इस कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों में पशुपालन के महत्त्वपूर्ण पहलुओं  जैसे नस्ल सुधार, जूनोटिक रोग नियंत्रण, जैव सुरक्षा और विभागीय योजनाओं के द्वारा उद्यमिता विकास पर जागरूकता फैलाना था. इस में कई विषयों पर जागरूकता वीडियो और विशेषज्ञ सत्र प्रस्तुत किए गए, जिस से पशुधन उत्पादकता बढ़ाने के उपायों पर विस्तार से चर्चा हुई. यह सत्र ज्ञान आदानप्रदान, नीति जागरूकता और उद्यमिता को प्रोत्साहन देने का मंच भी बना, जिस ने ग्रामीण विकास और आर्थिक वृद्धि में पशुपालकों की प्रमुख भूमिका को और मजबूती दी.

Mushroom : मशरूम उत्पादन ट्रेनिंग: रोजगार की संभावनाएं

Mushroom : मशरूम एक ऐसी खेती है जिसे बिना जमीन के भी किया जा सकता है और रोजगार का अच्छा जरीया बनाया जा सकता है. जरुरत है कि मशरूम के काम को करने से पहले इस की तकनीकी जानकारी ली जाए. उस के लिए आप को मशरूम उत्पादन की ट्रेनिंग लेनी होगी. मशरूम उत्पादन कैसे किया जाए इस की ट्रेनिंग अनेक कृषि संस्थानों में मुफ्त में दी जाती है. जिसे कर के आप अपना रोजगार भी कर सकते हैं. मशरूम की प्रोसैसिंग कर इसे कहीं अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है. इसी विषय पर चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में मशरूम उत्पादन तकनीक पर 3 दिवसीय प्रशिक्षण आयोजित किया गया. इस प्रशिक्षण में हरियाणा व राजस्थान के विभिन्न 14 जिलों के प्रतिभागियों ने भाग लिया.

कृषि प्रौद्योगिकी प्रशिक्षण एवं शिक्षा संस्थान के सहनिदेशक डा. अशोक कुमार गोदारा ने बताया कि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बीआर कंबोज के मार्गदर्शन में आयोजित किए जा रहे प्रशिक्षण कार्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य युवाओं का कौशल विकास कर के उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है. मशरूम के प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन में रोजगार की अपार संभावनाएं हैं.

उन्होंने आगे बताया कि केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा मशरूम के उत्पादन, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन पर अनुदान दे कर युवाओं को इसे एक रोजगार के रूप में अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है.

विस्तार शिक्षा निदेशक डा. बलवान सिंह मंडल ने बटन मशरूम के अलावा खाद्य और औषधीय मशरूम जैसे किंग ओयस्टर, शिटाके, कीड़ाजड़ी और गैनोडर्मा मशरूम के बारे में विस्तार से जानकारी दी. उन्होंने बताया कि प्रशिक्षण संस्थानों में युवाओं का कौशल विकास कर के उन्हें स्वावलंबी बनाने के लिए मधुमक्खीपालन, केंचुआ खाद उत्पादन, संरक्षित खेती, बेकरी, फल और सब्जी संरक्षण, डेयरी फार्मिंग, नर्सरी उत्पादन जैसे रोजगारन्मुखी प्रशिक्षण समयसमय पर आयोजित किए जाते हैं. यह प्रशिक्षण डा. सतीश कुमार महता व संस्थान के अन्य वैज्ञानिकों की देखरेख में आयोजित किया गया. प्रशिक्षण के दौरान डा. सतीश कुमार, डा. संदीप भाकर, डा विकास कंबोज, डा. राकेश कुमार चुघ, डा. प्रियंका, डा. डीके शर्मा, डा. भूपेंद्र सिंह, डा. विकाश हुड्डा ने विभिन्न विषयों पर विस्तार से जानकारी दी. प्रशिक्षण के समापन अवसर पर सभी प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र दिए गए.

दुग्ध संग्रहण और मत्स्य उत्पादन दो गुना करें

ग्वालियर : कृषि उत्पादन आयुक्त अशोक वर्णवाल ने पशुपालन ,डेयरी व मत्स्य उत्पादन को आय की प्रमुख आर्थिक गतिविधि बनाने पर जोर देते हुए निर्देश दिए कि दुग्ध संग्रहण व मत्स्य उत्पादन को दो गुना करें. उन्होंने बताया कि वर्तमान में 10 लाख लिटर दूध का प्रति दिन संग्रहण हो रहा है. इसे 20 लाख लिटर प्रति दिन किया जाए. उन्होंने दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए पशु नस्ल में सुधार व दुग्ध संग्रहण के लिए प्रभावी कार्य योजना बना कर उस पर अमल करने के निर्देश दिए.

इसी तरह उन्होंने केज कल्चर जैसी विधियां अपना कर मत्स्य उत्पादन बढ़ाने के लिए भी कहा. उन्होंने यह भी निर्देश दिए कि मत्स्य व्यवसाइयों के लिए ‘मछुआ समृद्धि योजना’ के तहत स्मार्ट फिश पार्लर बनाने के काम को अधिक महत्त्व दिया जाए. अशोक वर्णवाल ने यह भी कहा कि सांची पार्लर में सांची दूध की बिक्री अवश्य हो, ऐसा न करने वाले पार्लर निरस्त किए जाएं.

दुग्ध संग्रहण बढ़ाने के लिए पशुपालकों को बनाएं कलेक्शन एजेंट

अतिरिक्त मुख्य सचिव पशुपालन उमाकांत उमराव ने सभी जिला कलेक्टरों से कहा कि दुग्ध संग्रहण बढ़ाने के लिए पशुपालकों को कलेक्शन एजेंट बनाएं. इस के लिए उन्हें कमीशन भी दिया जाए. 5 साल तक हर साल 1,000 कलेक्शन एजेंट बनाएं. उन्होंने आगे कहा कि दूध की इकौनोमिक वैल्यू गेहूं व धान से ज्यादा है. दूध उत्पादन को बढ़ावा दे कर हम किसानों की आय में बड़ा इजाफा कर सकते हैं.

सचिव पशुपालन एवं डेयरी सत्येंद्र सिंह ने कहा कि डा. भीमराव अंबेडकर कामधेनु योजना और  आचार्य विद्यासागर गौ संवर्धन योजना सहित अन्य योजनाओं की लक्ष्य पूर्ति कर गौ वंश का प्रबंधन और किसानों की आय बढ़ाने के लिए किया जा रहा है.

मध्य प्रदेश के 50 फीसदी गांवों को दुग्ध नेटवर्क से जोड़ने की तैयारी

Milk Network : बड़वानी 08 जुलाई 2025 मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव ने कहा है कि राज्य सरकार प्रदेश में दूध उत्पादन बढ़ा कर किसानों और पशुपालकों की आर्थिक उन्नति के लिए प्रतिबद्ध है. इस के लिए प्रदेश के 50 फीसदी गांवों को दूध नेटवर्क में लाने की रणनीति पर कार्य किया जा रहा है. नई 381 दुग्ध सहकारी समितियों का गठन कर 9,500 दूध उत्पादकों को सहकारी डेयरी प्रणाली से जोड़ा गया है.

मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव रविवार को मुख्यमंत्री निवास में पशुपालन एवं डेयरी विकास विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से चर्चा कर रहे थे. इस से पहले केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने मध्यप्रदेश के लिए डेयरी विकास योजना को क्रियान्वित करने के लिए आवश्यक संशोधन कर अधिक लाभकारी बनाने के निर्देश दिए थे. अब राज्य में दूध उत्पादन की 72 फीसदी संभावित क्षमता को कवर करने और बाजार पहुंच को 15 फीसदी बढ़ाने की दिशा में कार्य किया जा रहा है.

मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव ने दूध संग्रहण बढ़ाने, दुधारू पशुओं की नस्ल सुधार, राष्ट्रीय डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड के सहयोग से देशी नस्ल के पशुओं के लिए मौडल फार्म विकसित करने, सांची ब्रांड की लोकप्रियता बढ़ाने, भोपाल दुग्ध संघ के अंतर्गत हीफर रियरिंग सैंटर की स्थापना, दूध उत्पादक किसानों को खरीदे गए दूध की कीमत का समय पर भुगतान, डिजीटाइजेशन वर्क की प्रगति की जानकारी प्राप्त कर अधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए.

दुग्ध संघों ने जब ढाई से छह रुपए प्रति लिटर राशि बढ़ाई तब इस मौके पर बताया गया कि प्रदेश के दुग्ध संघों में न सिर्फ दूध का संग्रहण बढ़ रहा है, बल्कि किसानों और दूध उत्पादकों का हित भी सुनिश्चित हो रहा है. दुग्ध संघों में दूध के मूल्यों में ढाई रुपए से ले कर छह रुपए तक प्रति लिटर वृद्धि का कार्य किया है. प्रदेश में दो दुग्ध संघों जबलपुर और ग्वालियर में दूध के संग्रहण में महत्त्वपूर्ण बढ़ोतरी हुई है. जबलपुर और ग्वालियर दुग्ध संघ को दूध उत्पादकों के लंबित भुगतान के लिए 2-2 करोड़ रुपए की कार्यशील पूंजी भी दी गई है.