Fish Farming: मछली उत्पादन के साथ अतिरिक्त आमदानी पाएं

देश के कई राज्यों में तालाबों की कमी नहीं है, जहां मछलीपालन बड़े आराम से किया जा सकता है. सरकार भी मछलीपालन में बढ़ावा देने के लिए अनेक योजनाएं लाती रहती है. इस लेख में पढ़े कि आप मछली उत्पादन से भारी मुनाफा कैसे कम सकते हैं –

छोटी मछलियां होती हैं जायकेदार

खाली पड़े तालाबों छोटी मछलियों का भरपूर उत्पादन किया जा सकता है. ये छोटी मछलियां बड़ी मछलियों की तुलना में काफी स्वादिष्ठ होती हैं, लिहाजा इनकी मांग भी खूब रहती है और दाम भी ज्यादा मिलता है. यह रोजगार और आय का अच्छा जरीया साबित हो सकता है.

मछली पालन में कैसा हो गोष्ठीमारा

मछली उत्पादन में कमी होने का एक बड़ा कारण यह है कि गांवों के मछली पकड़ने वाले लोग मछली पकड़ने के लिए एक ऐसे जाल का इस्तेमाल करते हैं, जिसे गोष्ठीमारा जाल कहा जाता है. इस प्रकार के जाल की यह खासीयत होती है कि 15 दिन की आयु वाली छोटी मछलियां भी इस से आसानी से पकड़ ली जाती हैं. ये छोटी मछलियां अमूमन मछली उत्पादन में एक प्रकार से मछली के बीज का काम करती हैं. यही छोटी मछलियां बड़ी होकर मछली व्यवसाय में काम आती हैं.

जब बीज वाली छोटी मछलियां ही नहीं रहेंगी, तो बड़ी मछलियों का उत्पादन कहां से होगा. लिहाजा मछली उत्पादन का कम होना लाजिम है. ब्रह्मपुत्र नदी के अलावा बड़े-बड़े बिलों में मछली पकड़ने के लिए गोष्ठीमारा जालों का भरपूर इस्तेमाल किया जाता है. लिहाजा, मछली उत्पादन को बढ़ाने के लिए इस प्रकार के जालों के इस्तेमाल पर फौरन रोक लगाना बहुत जरूरी है, ताकि बीज वाली छोटी मछलियां बची रहें.

बेकार पड़ी जमीन कमाई का जरिया

असम राज्य की बात करें तो वहां, कई हजार हेक्टेयर नीची जमीन है. यह धरती की सामान्य सतह से इतनी नीची है कि बड़े – बड़े गड्ढों के रूप में बदल गई है. यह नीची जमीन लगभग सालभर पानी से भरी रहती है. इसे असम में बिल (तालाब) के नाम से जाना जाता है. यह जमीन कृषि के लिए बेकार होती है. पानी से भरे इन बिलों को जरूरी सुधारकर के मछलीपालन के लायक बना सकते हैं. असम के शिक्षित बेरोजगारों को मछलीपालन के द्वारा एक अच्छा रोजगार मिल सकता है.

असम में इस समय लगभग 1 लाख हेक्टेयर ऐसे बिल (तालाब) हैं, लेकिन इन की हालत दिन-प्रतिदिन बदतर होती जा रही है. ये बिल धीरे-धीरे पानी के साथ बहकर आने वाली रेत और मिट्टी से भरते जा रहे हैं. आमतौर पर इन बिलों को मछली के ठेकेदारों को सामयिक तौर पर ठेके पर दिया जाता है. लेकिन मछली के ठेकेदार इन बिलों में सही ढंग से मछली का उत्पादन नहीं करते हैं.

कैसे करें मछली पालन

ये बिल एक तरह से बेकार साबित हो रहे हैं. बड़े-बड़े बिलों के बीच-बीच में ऊंचे-ऊंचे किनारे बनाकर उन्हें छोटे आकार के फिशरी में बदल सकते हैं. इन फिशरी को शिक्षित बेरोजगारों को मछलीपालन के लिए दे सकते हैं. इससे बेरोजगारों को रोजगार भी मिलेगा और राजस्व के रूप में सरकार को भी काफी आय होगी. हालांकि वर्तमान समय में असम में मछली का उत्पादन बहुत ही कम हो गया है, लेकिन मछली पकड़कर और मछली बेचकर जीवन चलाने वाले लोगों की तादाद काफी बढ़ गई है.

Fish Farming

खाली तालाबों के विकास से बढ़ेगा मछलीपालन

असम राज्य में बिलों के अलावा कई हजार एकड़ जमीन में खाली पड़े (बड़े-बड़े कुदरती गड्ढे) और तालाब भी बने हुए हैं. राज्य में मछली उत्पादन को बढ़ाने के लिए इन खालों और तालाबों का विकास करना भी बेहद जरूरी है. इन तालाबों और खालों में वैज्ञानिक और उन्नत ढंग से मछलीपालन किया जा सकता है.
इस तरह से मछलीपालन किया जाए तो हर 5 या 6 महीने पर भारी मात्रा में मछलियां पैदा की जा सकती हैं. इससे एक ओर तो बेरोजगारों को रोजगार मिलेगा और दूसरी ओर राज्य में लोगों को खाने के लिए पर्याप्त मछलियां मिलेंगी.

मछलीपालन लघु उद्योग

मछली उत्पादन के सहायक उद्योग के रूप में राज्य में मछली के बीजों के उत्पादन के केंद्र तो स्थापित किए ही जा सकते हैं. साथ ही साथ मछली के चारे का उद्योग भी चलाया जा सकता है. इससे भी बेरोजगारों लोगों के लिए आय का अच्छा साधन बन सकता है.

असम के कई जिलों में सैकड़ों हेक्टेयर ऐसी जमीन है, जिसे अंचल कहा जाता है. इन अंचलों में खेती बिलकुल ही नहीं हो सकती है, क्योंकि इन अंचलों की जमीन काफी नीची होती है. इन में हमेशा पानी जमा रहता है. यदि इनको विकसित करके मछलीपालन के लायक बनाया जाए, तो इन में मछली का उत्पादन भारी मात्रा में किया जा सकता है.

मछलीपालन के साथ करें बत्तखपालन

मछलीपालन के साथ-साथ तालाब व बिलों वगैरह में बत्तखपालन (Duck Farming) भी आसानी से किया जा सकता है. बत्तख का मल मछलियों के खाने के लिहाज से अच्छा होता है. लिहाजा, बत्तखपालन करने से मछलियों का चारा मुफ्त मिल जाएगा. इसके लिए मछलीपालकों को अलग से कुछ खर्च नहीं करना पड़ेगा.

उन्नत किस्म की बत्तख है लाभकारी

देशी या परंपरागत बत्तखपालन की तुलना में उन्नत किस्म की बतख के पालन के लिए असम की जलवायु काफी मुफीद है. उन्नत किस्म की बत्तखें अंडे भी ज्यादा देती हैं और उनके अंडे आकार में बडे़ होते हैं. यानी मछलीपालन के साथसाथ बत्तखपालन काफी फायदे का व्यवसाय साबित होगा.

मछलीपालन करने वाले तालाबों व बिलों में पानी की कमी नहीं होती. लिहाजा इनके किनारों पर सुअर, गाय, भैंस वगैरह का भी पालन किया जा सकता है. सुअर का मल भी मछलियों का एक अच्छा चारा होता है. इसके अलावा इन किनारों पर फल-फूल की खेती भी की जा सकती है. इस तरह से मछलीपालन के साथ-साथ अतिरिक्त आय भी होती रहेगी.

Insurance : समुद्री मछुआरों के लिए बीमा

Insurance: मत्स्यपालन विभाग, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय भारत में मात्स्यिकी क्षेत्र के स्थाई  और विकास और मछुआरों के कल्याण के माध्यम से नीली क्रांति लाने के लिए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 20,050 करोड़ रुपए के निवेश से प्रमुख योजना ‘प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना’ का कार्यान्वयन कर रहा है.

यह योजना अन्य बातों के साथसाथ, अंतर्देशीय मछुआरों और मत्स्य श्रमिकों सहित मछुआरों को समूह दुर्घटना बीमा कवरेज के माध्यम से सामाजिक सुरक्षा उपाय प्रदान करती है, जिस में समुद्री और अंतर्देशीय मछुआरों और संबंधित मत्स्य श्रमिकों दोनों को शामिल किया जाता है, जिस में संपूर्ण बीमा प्रीमियम राशि केंद्र और राज्य के बीच सामान्य राज्यों के लिए 60:40 के अनुपात में, हिमालयी और पूर्वोत्तर राज्यों के लिए 90:10 के अनुपात में साझा की जाती है.

जबकि केंद्रशासित प्रदेशों के मामले में, सारी प्रीमियम राशि केंद्र द्वारा भुगतान की जाती है. प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत प्रदान की जाने वाली बीमा कवरेज में मृत्यु या स्थायी पूर्ण शारीरिक अक्षमता के लिए 5 लाख रुपए, स्थायी आंशिक शारीरिक अक्षमता के लिए ढाई लाख रुपए और दुर्घटना की स्थिति में अस्पताल में भर्ती होने पर 25 हजार रुपए की राशि प्रदान की जाती है. प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के कार्यान्वयन के बीते 3 सालों में (2022-23 से 2024-25) के दौरान, केंद्र सरकार ने 103.73 लाख मछुआरों के बीमा कवरेज के लिए 54.03 करोड़ रुपए की राशि जारी की है, जिस में सालाना औसतन 34.57 लाख मछुआरे शामिल हैं.

मछुआरों के लिए कल्याणकारी योजनओं (Welfare Schemes) का शुभारंभ

मत्स्यपालन विभाग, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय द्वारा भारत में मात्स्यिकी क्षेत्र के स्थायी और जिम्मेदार विकास और मछुआरों के कल्याण के माध्यम से नीली क्रांति (ब्लू रेवोल्यूशन) लाने के लिए सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 20,050 करोड़ रुपए के निवेश से एक प्रमुख योजना ‘प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना’ (पीएमएमएसवाई) का कार्यान्वयन  किया जा रहा है.

इस योजना में मछुआरों और मत्स्य किसानों के लिए कई कल्याणकारी गतिविधियों की परिकल्पना की गई है, जिस में विभाग ने पीएमएमएसवाई योजना के तहत वेस्सल कम्युनिकेशन एंड सपोर्ट सिस्टम के नैशनल रोलआउट प्लान को मंजूरी दी है, जिस में 364 करोड़ रुपए के कुल खर्च के साथ सभी तटीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों  में 1,00,000 फिशिंग वेसल्स पर ट्रांसपोंडर की स्थापना शामिल है.

नाव मालिकों को ट्रांसपोंडर के लिए मुफ्त में सहायता प्रदान की जाती है, जिस में टू वे कम्यूनिकेशन की सुविधा उपलब्ध है और संपूर्ण एक्सक्लूसिव इकोनोमिक जोन को कवर करते हुए किसी भी आपात स्थिति के दौरान छोटे टेक्स्ट मैसेज भेजे जा सकते हैं. यह मछुआरों को समुद्री सीमा के पास आने या उसे पार करने पर अलर्ट भी करता है.

इस के अलावा अन्य गतिविधियों जैसे समुद्री राज्यों/संघ  राज्य क्षेत्रों में इंटीग्रेटेड कोस्टल फिशिंग, गांवों का विकास, जिस का उद्देश्य स्थायी मत्स्य प्रथाओं के माध्यम से पर्यावरणीय नुकसान को कम करते हुए तटीय मछुआरों को आर्थिक और सामाजिक लाभ प्रदान  करना है.

18 से 70 साल की आयु समूह में आकस्मिक मृत्यु या स्थायी पूर्ण शारीरिक अक्षमता  पर 5 लाख रुपए, आकस्मिक स्थायी आंशिक शारीरिक अक्षमता पर 2.50 लाख रुपए और दुर्घटनावश अस्पताल में भरती होने पर 25,000 रुपए का बीमा लाभ प्रदान करना, 18 से 60 साल की आयु समूह के लिए मछली पकड़ने पर प्रतिबंध/मंद अवधि के दौरान मत्स्य संसाधनों के संरक्षण के लिए सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछड़े सक्रिय पारंपरिक मछुआरों के परिवारों के लिए आजीविका और पोषण संबंधी सहायता देना, जिस में  मछली पकड़ने पर प्रतिबंध/मंद अवधि के  दौरान  3 महीनों के लिए प्रति मछुआरे  को 3,000 रुपए की सहायता प्रदान की जाती है, जिस में लाभार्थी का योगदान 1,500 रुपए  होता है और इस के लिए सामान्य राज्य के लिए अनुपात 50:50, उत्तरपूर्वी राज्यों और हिमालयी राज्यों  के  लिए  80:20, जबकि केंद्र शासित प्रदेशों के लिए सौ फीसदी है.

वर्तमान में चल रही पीएमएमएसवाई के तहत मछुआरों और मत्स्य किसानों को माली रूप से सशक्त बनाने और उन की बारगैनिंग पावर बढ़ाने के लिए मत्स्य किसान उत्पादक संगठनों/फिश फार्मर प्रोड्यूसर और्गेनाइजेशन (एफएफपीओ) की स्थापना के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करने का प्रावधान है, जो मछुआरों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने में मदद करता है.

मत्स्यपालन विभाग ने अब तक 544.85 करोड़ रुपए की कुल परियोजना लागतपर कुल 2,195 एफएफपीओ की स्थापना के लिए मंजूरी दी है, जिस में 2,000 मत्स्य सहकारिताओं को एफएफपीओ का रूप देने और 195 नए एफएफपीओ गठित करना शामिल है.

इस के अलावा, मछुआरों और मत्स्यपालकों द्वारा संस्थागत ऋण तक पहुंच को सुविधाजनक बनाने के लिए साल 2018-19 से किसान क्रेडिट कार्ड की  सुविधा को मात्स्यिकी क्षेत्र तक विस्तारित किया गया है और आज तक मछुआरों और मत्स्यपालकों को 4,50,799 केसीसी कार्ड दिए गए हैं.

मछलीपालन (Fish Farming) पानी में पनपता रोजगार

आज देशभर में मछली की काफी मांग है और दिनोंदिन इस में इजाफा हो रहा है. आंकड़ों के मुताबिक मछलीपालन कारोबार तकरीबन 15 फीसदी की तेजी से बढ़ रहा है, जो लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा कर रहा है. दुनियाभर में भारत मछली उत्पादन में दूसरे स्थान पर है.

मछलीपालन में तालाबों का प्रबंधन सब से ज्यादा खास होता है. मछलीपालन के लिए तालाबों की तैयारी बरसात से पहले कर लेनी चाहिए. मछलीपालन के लिए तालाबों के प्रबंधन को 3 भागों में बांटा जाता है:

पानी इकट्ठा करने से पहले का प्रबंधन, इकट्ठा करते समय का प्रबंधन और इकट्ठा करने के बाद का प्रबंधन.

पानी इकट्ठा करने से पहले तालाब का प्रबंधन : मछली के बीज संचयन से पहले तालाब का प्रबंधन यानी तालाब तैयार करना होता है. तालाब की तैयारी करते समय पहले तालाब में जो खरपतवार उगे हैं उन्हें हटा दें. इस के लिए आप मजदूरों की भी मदद ले सकते हैं या खरपतवारों को तालाब में जाल बिछा कर निकाल सकते हैं.

तालाब में मांसाहारी मछलियां अधिकतर पालतू मछलियों को खा जाती हैं, इसलिए उन की रोकथाम करनी चाहिए. इस के लिए आप जाल का इस्तेमाल कर सकते हैं या 2500 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से महुआ की खली का इस्तेमाल कर उन पर काबू पा सकते हैं. इस के अलावा ब्लीचिंग पाउडर का 300 से 350 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन ध्यान रहे कि यदि आप ब्लीचिंग पाउडर का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो उस में क्लोरीन की मात्रा 30 फीसदी होनी चाहिए और सूर्यास्त के बाद ही उस का इस्तेमाल करना चाहिए.

इस से तालाब के कीड़ेमकोड़ों पर काबू पाया जा सकता है. इस के लिए आप 300 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से तालाब में चूना डालें. ऐसा करने से सभी कीड़ेमकोड़े मर जाते हैं.

यह सब करने के बाद फर्टिलाइजर का प्रबंधन करना चाहिए. इस के लिए सब से पहले सवा सौ किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से चूने का इस्तेमाल करें. इस के बाद 250 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से सरसों की खली, 5000 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर, 250 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से सिंगल सुपर फास्फेट और सवा सौ किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से यूरिया और 50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से पोटाश का इस्तेमाल कर के तालाब के पानी को 1 हफ्ते के लिए ऐसे ही छोड़ देना चाहिए.

1 हफ्ते बाद तालाब में खाली जाल चलाएं. खाली जाल चलाने के बाद 1 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से पोटेशियम परमैगनेट का छिड़काव करें. इस के बाद दूसरे चरण की तैयारी करें.

इकट्ठा करने के समय का प्रबंधन : इस के तहत मछली की प्रजाति, मछली की संख्या, मछली का वजन, मछली की लंबाई और किस समय मछली के बीज डालें, ये बातें बहुत खास हैं, जिन का बहुत ध्यान रखना होगा.

मछली की प्रजाति : मछलियों की 6 प्रजातियां हैं- कतला, रेहू, मिगल, ग्रास कौर्प, सिल्वर कौर्प और कामन कौर्प.

मछली की ये सभी प्रजातियां पानी की अलगअलग सतहों में रहती हैं. नीचे रहने वाली मछलियां मिगल और कामन कौर्प हैं, जबकि ऊपर रहने वाली मछलयां कतला और सिल्वर कौर्प हैं. बीच में रहने वाली रेहू मछली को इकट्ठा करना चाहिए. 10 फीसदी ग्रास कौर्प का संचय पूरे तालाब में करना चाहिए.

इस तरह से तालाब की तीनों सतहें पूरी तरह बराबर हो जाती हैं और किसान को ज्यादा उत्पादन मिलता है.

मछली का आकार और वजन : इकट्ठा करने के दौरान मछली के बीज का आकार कम से कम 6 से 8 सेंटीमीटर होना चाहिए और उस का वजन 50 ग्राम होना चाहिए. इस साल का जो बीज है, उस को अगले साल तक ईयर लिंक बना कर बीज बैंक में रखें और फिर उस का इस्तेमाल करें.

बीज डालने का समय : अगर आप 2 क्रौप की प्लानिंग करते हैं तो उस के लिए बीज डालने का सही समय फरवरी से जून और जुलाई से नवंबर तक का होता है. अगर आप की प्लानिंग 1 क्रौप की है, तो उस के लिए जून से अप्रैल तक का समय सही रहता है.

बीज डालने से पहले इस बात का खयाल रखें कि यदि आप बीज बाहर से ला रहे हैं, तो उस का अंकुरण सही होना चाहिए. अगर आप बाहर से बीज लाते हैं, तो जितना पानी बीज वाले पौलीथिन बैग में है उस में उतना ही तालाब का पानी भी मिलाएं. अब 10 मिनट तक उस का अंकुरण करें उस के बाद तालाब में बीज उलट दें.

मछलीपालन (Fish Farming)

बीज डालने के बाद का प्रबंधन : बीज के बाद आप उस की देखभाल किस तरह करते हैं उसी पर आप का उत्पादन निर्भर करता है, इस के लिए आप को तमाम बातों पर खास ध्यान देना होगा.

ऊपरी आहार प्रबंधन और उर्वरक प्रबंधन : वैज्ञानिक तरीके से मछलीपालन करने में ऊपरी आहार का खास रोल है. आहार के रूप में आप चावल की भूसी और सरसों की खली को बराबर मात्रा में मिला कर उस का इस्तेमाल कर सकते हैं या फिर मार्केट में मिलने वाले फीड का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. महीने में हम अगर मछलियों को 5 फीसदी की दर से खाना खिलाते हैं तो 25 किलोग्राम दाना रोजाना खर्च होगा.

इसी तरह 2 महीने में अगर 4 फीसदी की दर से खिलाएंगे, तो 30 से 35 किलोग्राम दाने की जरूरत पड़ेगी. इसी तरह 3 महीने में 4 फीसदी की दर से तकरीबन 55 किलोग्राम, 4 महीने में 90 किलोग्राम और 5 महीने में 108 किलोग्राम दाना रोजाना चाहिए. इस तरह 1 क्रौप में हमें कम से कम 9 से 10 टन आहार की जरूरत होती है.

मछली जल्दी बढ़े इस के लिए हमें प्रोबायोटिक्स का इस्तेमाल करना होगा. 5 से 10 ग्राम फीड में प्रोबायोटिक्स डालें.

उर्वरक प्रबंधन : बीज डालने के बाद महीने में 2 बार उर्वरक का इस्तेमाल करना चाहिए. अगर किसी महीने पहली तारीख को आप ने गोबर का इस्तेमाल 1000 से 1500 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर किया है, तो फिर 15 तारीख को 25 से 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से सिंगल सुपर फास्फेट और डीएपी का इस्तेमाल करें.

उर्वरक के इस्तेमाल से 2 दिन पहले कम से कम 10 से 15 किलोग्राम कैल्शियम कार्बोनेट जो एग्रीकल्चर लाइमस्टोन है, का इस्तेमाल करें.

उर्वरक डालने से 2 दिन पहले खेत में चूने का इस्तेमाल करना चाहिए. उस के बाद हर 15 दिन में एक बार जैविक खाद और उस के 15 दिन बाद रासायनिक खाद देनी चाहिए. जिस महीने में तालाब का पानी ज्यादा हरा हो जाए, उस महीने रासायनिक खाद का इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए.

मछलीपालन से जुड़ी ज्यादा जानकारी के लिए लेखक के मोबाइल नंबर 9792218242 पर बात कर सकते हैं.

मछलीपालन के फायदे

मछलीपालन के कई फायदे हैं, जो आर्थिक मदद से ले कर हर तरह की मदद करते हैं. मछली को छोटे तालाब या पोखर में पाला जा सकता है. यदि आप के पास बड़ा तालाब नहीं है, तो वैज्ञानिक तरीके से भी छोटे आकार की सीमेंट की गोलाकार हौद बना कर उन में मछलीपालन किया जा सकता है.

यदि आप ने सही जानकारी हासिल कर ली है तो मछलीपालन के काम में आप को आसानी होगी. नस्ल के हिसाब से मछलियों का 4 से 7 महीने के अंदर 1 किलोग्राम से ले कर 5 किलोग्राम तक वजन बढ़ जाता है. मछली के मांस में अच्छी मात्रा में प्रोटीन होता है. इस व्यवसाय के लिए बैंक लोन भी आसानी से मिल जाता है. आज मछलीपालन के मामले में आंध्र प्रदेश पहले स्थान पर है, उस के बाद पश्चिम बंगाल और फिर गुजरात व केरल का नंबर आता है.

मत्स्यपालन क्षेत्र में हैं रोजगार की अपार संभावनाएं: राजीव रंजन सिंह

गुवाहाटी : मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के तहत मत्स्यपालन विभाग ने असम के गुवाहाटी में ‘पूर्वोत्तर क्षेत्र के राज्यों की बैठक 2025’ का आयोजन किया. इस की अध्यक्षता मत्स्यपालन, पशुपालन, डेयरी मंत्रालय और पंचायती राज मंत्रालय केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने की.

पशुपालन मंत्री राजीव रंजन सिंह ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) के तहत लगभग 50 करोड़ रुपए की लागत वाली प्रमुख परियोजनाओं की शुरुआत की, जिस के तहत पूर्वोत्तर क्षेत्र में आत्मनिर्भर मत्स्यपालन क्षेत्र बनाने की मंशा जाहिर की.  इन परियोजनाओं से मत्स्यपालन क्षेत्र में लगभग 4,530 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होने का अनुमान है.

केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने मत्स्यपालन लाभार्थियों को राष्ट्रीय मातिस्यकी विकास बोर्ड (एनएफडीबी) पंजीकरण प्रमाणपत्र, केसीसी कार्ड, सर्वश्रेष्ठ एफएफपीओ और मत्स्यपालन स्टार्टअप के लिए पुरस्कार सहित प्रमाणपत्र भी  दिए. साथ ही, क्षेत्रीय विकास की गति को जारी रखने और टिकाऊ बनाने के उद्देश्य से मत्स्य विभाग ने सिक्किम राज्य में जैविक मत्स्यपालन और जलीय कृषि के विकास के लिए सिक्किम के सोरेंग जिले में जैविक मत्स्यपालन क्लस्टर को अधिसूचित किया.

केंद्रीय मत्स्य एवं पशुपालन मंत्री राजीव रंजन सिंह ने मत्स्यपालन क्षेत्र की अपार संभावनाओं के बारे में बताते हुए कहा कि प्रजातियों के विविधीकरण, मछली उत्पादन में 20-25 फीसदी की वृद्धि के लक्ष्य को प्राप्त करने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने व रोजगार सृजन के लिए उत्पादन खपत के अंतर को कम करने की जरूरत है.

उन्होंने राज्यों को क्षेत्र विशेष की कमियों को दूर करने के लिए राज्य केंद्रित योजनाएं बनाने के लिए भी प्रोत्साहित किया. केंद्र सरकार की  प्रमुख पहलों में मत्स्यपालन और अवसंरचना विकास कोष का लाभ उठाना, एनएफडीबी क्षेत्रीय केंद्रों के जरीए नवाचार को बढ़ावा देना, असंगठित क्षेत्र को औपचारिक बनाना, ब्रूड बैंक विकसित करना और केंद्रीय मीठाजल जीवपालन अनुसंधान संस्थान और केंद्रीय अंतर्स्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान में प्रगतिशील किसानों को प्रशिक्षण देना शामिल है.

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण और पंचायती राज, उपराज्य मंत्री प्रो. एसपी सिंह बघेल ने जोर दे कर कहा कि किसानों की आय को दोगुना करना केवल कृषि को संबंधित क्षेत्रों, विशेष रूप से मत्स्यपालन के साथ एकीकृत कर के ही संभव है.

उन्होंने आगे कहा कि पूर्वोत्तर क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना हमारी प्रमुख प्राथमिकताओं में से एक  है, जिस में भूमि और संसाधन सीमाओं को दूर करने के लिए बायोफ्लोक और रीसर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम जैसी नई जलीय कृषि पद्धतियों को अपनाने पर हमें जोर देना है.

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण और अल्पसंख्यक कार्य, उपराज्य मंत्री जौर्ज कुरियन ने पूर्वोत्तर क्षेत्र और केरल में एकीकृत मछलीपालन की पारंपरिक प्रथाओं का जिक्र किया, जिस में टैपिओकासहमछलीपालन और सूअरसहमछलीपालन शामिल है, जिन्हें बेहतर दक्षता के लिए आधुनिक तकनीकों के साथ पुनर्जीवित किया गया है.

राज्य मंत्री जौर्ज कुरियन ने मछली उत्पादन को बढ़ाने और क्षेत्र के मत्स्यपालन के क्षेत्र को और अधिक बढ़ावा देने के लिए नई तकनीकों को अपनाने पर भी जोर दिया.

इस सत्र में एनएफडीबी के मुख्य कार्यकारी डा. बिजय कुमार बेहरा द्वारा ‘पूर्वोत्तर राज्यों में मत्स्यपालन विकास के लिए पर्यावरणीय और पारिस्थितिक चुनौतियों’ और केंद्रीय अंतर्स्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, गुवाहाटी के प्रधान वैज्ञानिक डा. बीके भट्टाचार्य द्वारा ‘पूर्वोत्तर राज्यों में खुले जल मत्स्यपालन संसाधनों का विकास’ पर व्यावहारिक चर्चाएं भी शामिल थीं, जिस ने क्षेत्र में इस सैक्टर के भविष्य पर महत्वपूर्ण दृष्टिकोण साझा किए.

इस सम्मलेन के अवसर पर असम सरकार के मत्स्यपालन मंत्री कृष्णेंदु पौल ने भारतीय मत्स्यपालन क्षेत्र में असम के महत्वपूर्ण योगदान पर चर्चा करते हुए बताया कि असम ने 4.75 लाख मीट्रिक टन का उल्लेखनीय मछली उत्पादन और लगभग 20,000 मीट्रिक टन का निर्यात किया, जिस से मछली किसानों और मछुआरों को काफी फायदा हुआ है.

उन्होंने आगे कहा कि राज्य की 90 फीसदी से अधिक आबादी मछली का सेवन करती है, इसलिए मत्स्यपालन असम की अर्थव्यवस्था में प्रमुख स्थान रखता है. पहाड़ियों में उत्पादन, उत्पादकता और जल भंडारण क्षमता बढ़ाने के लिए पीएमएमएसवाई के तहत परियोजनाओं की पहचान की गई है, जिस का उद्देश्य संसाधनों का कायाकल्प और क्षेत्रीय विकास है.

इस के अलावा जापान के जेआईसीए द्वारा समर्थित असम मत्स्य विकास और ग्रामीण आजीविका परियोजना, समग्र जलीय कृषि विकास पर ध्यान केंद्रित करती है और यह क्षेत्र के लिए स्थायी आजीविका पैदा कर रही है और जमीनी स्तर पर अच्छी तरह से प्रगति कर रही है.

अरुणाचल प्रदेश सरकार के मत्स्यपालन, कृषि, बागबानी, एएचवीडीडी मंत्री गेब्रियल डेनवांग वांगसू ने मत्स्यपालन विकास में राज्य की अपार संभावनाओं को रेखांकित किया और पीएमएमएसवाई के तहत छोटे और शिल्पकार किसानों को समर्थन देने पर जोर दिया.

मंत्री गेब्रियल डेनवांग वांगसू ने अरुणाचल प्रदेश में एक समर्पित शीत जल मत्स्यपालन संस्थान की स्थापना का प्रस्ताव रखा और बीज उत्पादन के बुनियादी ढांचे को बढ़ाने के लिए एकमुश्त अनुदान की वकालत की. खुले पानी में मत्स्यपालन और टिकाऊ तौरतरीकों को अपनाने के अवसरों का जिक्र करते हुए उन्होंने हिमालयी राज्यों की अनूठी ताकतों को संबोधित करने के लिए विशेष रूप से तैयार की गई योजना का भी आह्वान किया.

मिजोरम सरकार के मत्स्यपालन मंत्री पु. ललथनसांगा ने राज्य में मत्स्यपालन विकास में तेजी लाने के लिए प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत मंजूरी और राशि जारी करने में तेजी लाने की आवश्यकता पर जोर दिया. पीएमएमएसवाई के तहत तालाबों के जीर्णोद्धार और कायाकल्प को शामिल करने के महत्व पर प्रकाश डाला गया, क्योंकि ये गतिविधियां मिजोरम के मत्स्यपालन क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं.

इस के अलावा कम उत्पादकता का समाधान निकालने, गुणवत्ता वाले बीज एवं चारे की उपलब्धता में सुधार करना और मछली किसानों के लिए क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण को प्राथमिकता देने आदि की पहचान उन प्रमुख क्षेत्रों के रूप में की गई, जिन पर ध्यान देने की जरूरत है.

मणिपुर सरकार के मत्स्यपालन, समाज कल्याण, कौशल, श्रम, रोजगार और उद्यमिता मंत्री एच. डिंगो सिंह ने राज्य में मत्स्यपालन और जलीय कृषि क्षेत्र पर पीएमएमएसवाई की सफलता को स्वीकार किया. हैचरी, बायोफ्लोक सिस्टम, तालाब, केग कल्चर की स्थापना, सजावटी मछलीपालन, मछली कियोस्क, मूल्यवर्धित उद्यम, रोग निदान सुविधाएं और कोल्ड स्टोरेज इकाइयों की स्थापना से मणिपुर में सामूहिक रूप से बुनियादी ढांचे और अवसरों में बढ़ोतरी हुई है.

त्रिपुरा सरकार के मत्स्यपालन मंत्री सुधांशु दास ने बताया कि राज्य में मछली उत्पादन की क्षमता 2 लाख है, जिस में 38,594 हेक्टेयर क्षेत्र मछलीपालन के लिए है. वर्तमान में 85,000 मीट्रिक टन उत्पादन की तुलना में मांग 117,000 मीट्रिक टन है, जिस की कमी पश्चिम बंगाल, असम और आंध्र प्रदेश से आयात कर के पूरी की जाती है.

मंत्री सुधांशु दास ने बताया कि त्रिपुरा में 98 फीसदी आबादी मछली का सेवन करती है. उन्होंने बायोफ्लोक और मोतीपालन से जुड़ी चुनौतियों पर भी चर्चा की, जिस में इस क्षेत्र की मौसमी निर्भरता को एक प्रमुख कारण बताया.

सिक्किम सरकार के कृषि, बागबानी, पशुपालन व पशु चिकित्सा सेवाएं, मंत्री पूरन कुमार गुरुंग ने पीएमएमएसवाई से राज्य को होने वाले महत्वपूर्ण लाभों पर प्रकाश डाला, जिस में ट्राउट रेसवे हैचरी, जलीय कृषि प्रणाली और सजावटी मछलीपालन जैसी गतिविधियां शामिल हैं.

उन्होंने रेसवे और सजावटी मछली इकाइयों के निर्माण जैसे लंबित प्रस्तावों के लिए समर्थन का अनुरोध किया और मत्स्यपालन प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की मांग की. सिक्किम की जैविक स्थिति पर जोर देते हुए उन्होंने अतिरिक्त समर्थन का आह्वान किया और राज्य के मत्स्य विकास के लिए आईसीएआर संस्थानों के महत्व पर जोर दिया.

नागालैंड सरकार के मत्स्यपालन और जलीय संसाधन मंत्री ए. पंगजंग जमीर ने राज्य के मत्स्य संसाधनों, खासकर नए तालाबों और टैंकों के विकास की महत्वपूर्ण संभावनाओं पर जोर दिया. उन्होंने उत्पादकता बढ़ाने और मछली किसानों की आय को बढ़ाने के लिए एक प्रमुख रणनीति के रूप में एकीकृत मछलीपालन की शुरुआत पर जोर दिया. इस क्षेत्र की इकोटूरिज्म की आशाजनक संभावनाओं की भी पहचान की गई और पहाड़ी क्षेत्रों में मछली परिवहन में सुधार के अवसरों को भविष्य के विकास के क्षेत्र के रूप में देखा गया है.

मत्स्यपालन विभाग, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय में सचिव डा. अभिलक्ष लिखी ने अपने मुख्य भाषण में पीएमएमएसवाई के तहत 1,700 करोड़ सहित पूर्वोत्तर क्षेत्र को आवंटित की गई. साथ ही, 2,000 करोड़ रुपए किनकिन क्षेत्रों को दिए जाएंगे, इस पर भी प्रकाश डाला.

उन्होंने 3 प्रमुख क्षेत्रों पर ज्यादा जोर दिया, जिन में डिजिटलीकरण के माध्यम से मत्स्यपालन को औपचारिक बनाना, राज्य के अधिकारियों से इसे प्राथमिकता देना, ब्याज अनुदान और ऋण गारंटी जैसे वित्तीय साधनों के साथ मत्स्यपालन और जलीय कृषि अवसंरचना विकास निधि को बढ़ावा देना और एफएफपीओ और स्वयं सहायता समूह के माध्यम से एकीकृत खेती को आगे बढ़ाना शामिल है. उन्होंने युवा स्टार्टअप का समर्थन करने और मछली उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए अंतराल को दूर करने का भी आह्वान किया, जिस का लक्ष्य 12 लाख टन है.

मत्स्यपालन विभाग, भारत सरकार में संयुक्त सचिव सागर मेहरा ने भारतीय मत्स्यपालन क्षेत्र की उपलब्धियों पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिस में उत्पादन, उत्पादकता, आय और निर्यात जैसे प्रमुख पहलुओं पर जोर दिया गया.

इस रिपोर्ट में पूर्वोत्तर क्षेत्र में प्रचुर संसाधनों पर भी ध्यान दिया गया. साथ ही, रिपोर्ट में पूर्वोत्तर क्षेत्र में मौजूदा चुनौतियों और कमियों का भी जिक्र किया गया. भविष्य में इस के विकास के लिए रणनीतिक दृष्टिकोण और फोकस क्षेत्रों पर भी चर्चा की गई.

 

किसानों के मददगार हो सकते हैं  फिश फार्म (Fish Farms )

भारत का मौसम मछलीपालन के लिए बहुत अच्छा है. भारत में सब से अधिक मछली उत्पादन वाले राज्यों में आंध्र प्रदेश, गुजरात, केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और पंजाब शामिल हैं. पूरे देश में करीब डेढ़ करोड़ लोग मछलीपालन से रोजगार हासिल कर रहे हैं.

केंद्र सरकार का कृषि मंत्रालय राज्यों में मछलीपालन विभाग खोल कर इस का प्रचारप्रसार करता है. इस के साथ ही साथ नेशनल फिशरीज डेवलपमेंट बोर्ड भी मछलीपालन को बढ़ावा देता है. ये दोनों ही विभाग किसानों को मछलीपालन से जुड़ी जानकारी देते हैं. सब से पहले किसानों को इन विभागों से संपर्क कर के मछलीपालन उद्योग के बारे में पता करना चाहिए. इन विभागों से किसानों को मछलीपालन की केवल जानकारी ही नहीं मिलती, बल्कि बैंक से लोन पाने के साथ ही साथ तकनीकी मदद भी मिल जाती है. किसान अपने तालाब बना कर उन को ‘फिश फार्म’ की तरह से बना सकते हैं. वे तालाब की मेंड़ पर कई तरह के पेड़ लगा सकते हैं. सरकारी मदद से मछली के अच्छी प्रजाति के बीज भी मिल जाते हैं.

मछलीपालन के लिए  तालाब के लिए जमीन का चुनाव करते समय यह देखें कि जमीन बहुत उबड़खाबड़ न हो.  जलभराव वाला क्षेत्र नहीं होना चाहिए. जलभराव की दशा में बरसात के दिनों में ऐसा पानी वहां जम जाता है, जो मछलियों को नुकसान पहुंचा सकता है. तालाब के आसपास खेत नहींहोने चाहिए. खेत में पैदावार के लिए कई तरह के कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाता है, जो मछलियों को नुकसान पहुंचा सकते हैं. तालाब का चुनाव मछली की प्रजाति के मुताबिक होना चाहिए. कुछ मछलियां कम पानी में रहती हैं और कुछ गहरे पानी में रहती हैं. बंजर जमीन और खाली पड़ी जमीन में तालाब बनाने का काम किया जा सकता है.

तालाब में मछलियों की सुरक्षा का खास खयाल रखना चाहिए. पहली बार जब मछलीपालन शुरू करें, तो तालाब में बीज डालने के लिए उन का साइज 50 से 100 ग्राम होना चाहिए. तालाब को रोगमुक्त रखने के लिए जैविक कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. पहली बार तालाब में पानी भर कर 15 दिनों के लिए छोड़ देना चाहिए. तालाब के पानी और मिट्टी के पीएच को समयसमय पर देखना चाहिए. मछली की प्रजाति अपने लोकल बाजार के हिसाब से लेनी चाहिए. मछलियों को बीमारियों से दूर रखने के लिए तालाब को साफसुथरा और रोगमुक्त रखना चाहिए. मछलियों को खली और दूसरी खाने की चीजें देनी चाहिए. खाद्य पदार्थ को तालाब के कोने में डाल देना चाहिए. इस के अलावा तालाब का पानी समयसमय पर बदलते रहना चाहिए.

करीब 1 साल के बाद मछलियों की बिक्री शुरू होनी चाहिए. तब तक मछलियां 800 ग्राम से डेढ़ किलोग्राम के करीब हो जाती हैं. अगर किसानों में लगन और सही जानकारी है, तो वे अपने तालाब में ही मछली के छोटे बच्चे भी पाल कर उन को बीज की तरह से प्रयोग कर सकते हैं. शुरुआत में किसानों को छोटे स्तर पर इसे शुरू करना चाहिए. फिर धीरेधीरे इसे आगे बढ़ाना चाहिए. तालाब को ‘फिश फार्म’ की तरह से विकसित करना चाहिए. तालाब के पास सब्जियों और पपीते की खेती की जा सकती है. कुछ लकड़ी वाले पेड़ भी लगाए जा सकते हैं. ‘फिश फार्म’ बनाने से किसानों का रिस्क कम हो जाता है और उन की कमाई बढ़ जाती है. मछली खाने वालों की तादाद में लगातार इजाफा होने से यह बिजनेस बढ़ रहा है. खाने के रूप में मछली बहुत फायदेमंद होती है. यह प्रोटीन का सब से अच्छा जरीया होती है. मछली में कोलेस्ट्राल सब से कम होता है. इस के अलावा मछली में मिनरल व विटामिन भी ज्यादा होते हैं. इसे एक हेल्दी फूड माना जाता है.

जिंदा मछली परिवहन के लिए ड्रोन प्रौद्योगिकी

कोलकाता : केंद्र सरकार के मत्स्यपालन विभाग के सचिव डा. अभिलक्ष लिखी ने पिछले दिनों कोलकाता स्थित आईसीएआर-केंद्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सीआईएफआरआई) का मत्स्यपालन प्रबंधन संबंधी ड्रोन अनुप्रयोग के क्षेत्र में इस संस्थान के अनुसंधान एवं विकास की समीक्षा करने के लिए दौरा किया.

इस कार्यक्रम में वैज्ञानिक, राज्य मत्स्यपालन अधिकारी, मछुआरे और मछुआरियां शामिल हुईं. प्रस्तुति के दौरान, राज्यों के मत्स्यपालन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों, नागर विमानन मंत्रालय, नेफेड, एनसीडीसी, एनईआरएमएआरसी, एसएफएसी, खुदरा विक्रेताओं, स्टार्टअप, मत्स्यपालन अधीनस्थ कार्यालयों, राज्य सरकार के अधिकारियों, एफएफपीओ, सहकारी समितियों आदि को वर्चुअल कौंफ्रेंस के माध्यम से शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया है.

ड्रोन प्रदर्शन के दौरान, डा. अभिलक्ष लिखी ने मछलीपालकों और मछुआरों के साथ सक्रिय रूप से बातचीत की, उन के अनुभवों, उन की सफलता की कहानियों और उन के दैनिक कार्यों में आने वाली चुनौतियों को सुना. इस बातचीत ने इस बारे में बहुमूल्य जानकारी प्रदान की कि कैसे ड्रोन जैसी आधुनिक प्रौद्योगिकी उन की जरूरतों को पूरा कर सकती है, दक्षता में सुधार कर सकती है और मत्स्यपालन के क्षेत्र में उत्पादकता बढ़ा सकती है. साथ ही, उन्हें अपनी आकांक्षाओं और चिंताओं को व्यक्त करने के लिए एक मंच भी प्रदान कर सकती है.

इस मौके पर बोलते हुए सचिव डा. अभिलक्ष लिखी ने कहा कि आईसीएआर-सीआईएफआरआई द्वारा शुरू की गई पायलट परियोजना मछलीपालन के क्षेत्र में नए अवसरों को खोलेगी, जो कम समय और न्यूनतम मानवीय भागीदारी के साथ ताजी मछली के परिवहन के लिए एक प्रभावी और आशाजनक विकल्प प्रदान करेगी और साथ ही मछलियों पर तनाव को कम करेगी.

उन्होंने आगे कहा कि निजी भागीदारी के साथ ड्रोन प्रौद्योगिकी का उपयोग कर के मछली परिवहन पर अनुसंधान और विकास भी उपभोक्ताओं और किसानों को आपूर्ति श्रंखला प्रणाली में बेहतर स्वच्छ ताजी मछली उपलब्ध कराने में सक्षम बनाएगा.

उन्होंने यह भी कहा कि फरवरी, 2024 में 6,000 करोड़ रुपए के परिव्यय के साथ प्रधानमंत्री मत्स्य समृद्धि योजना (पीएम-एमकेएसएसवाई) को स्वीकृति दी गई थी, जिस का उद्देश्य साल 2025 तक मत्स्यपालन क्षेत्र के सूक्ष्म उद्यमों और छोटे उद्यमों सहित मछली किसानों, मछली विक्रेताओं को कार्य आधारित पहचान देने के लिए एक राष्ट्रीय मत्स्यपालन डिजिटल प्लेटफार्म (एनएफडीपी) बना कर असंगठित मत्स्यपालन क्षेत्र को औपचारिक रूप देना है.

सचिव अभिलक्ष लिखी ने कहा कि एनएफडीपी के जरीए पीएम-एमकेएसएसवाई संस्थागत ऋण की पहुंच और प्रोत्साहन, जलीय कृषि बीमा की खरीद, सहकारी समितियों को एफएफपीओ बनने के लिए मजबूत करना, ट्रेसबिलिटी को अपनाना, मूल्य श्रंखला दक्षता और सुरक्षा व गुणवत्ता आश्वासन और रोजगार सृजन करने वाली प्रथाओं को अपनाने के लिए प्रदर्शन अनुदान को सुगम बनाएगा.

उन्होंने आईसीएआर-सीआईएफआरआई और अन्य हितधारकों से ड्रोन आधारित इन अनुप्रयोगों को मछली किसानों तक पहुंचाने के लिए कदम उठाने और यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया कि सभी की इन अनुप्रयोगों तक पहुंच हो सके. उन्होंने मत्स्यपालन विभाग से इन सभी मूल्यवान प्रदर्शनों का दस्तावेजीकरण करने और उन को मंत्रालय को भेजने के लिए भी कहा, ताकि उन का इस्तेमाल देशभर के मछली किसानों के बीच जागरूकता पैदा करने के लिए किया जा सके.

इस समीक्षा बैठक में आईसीएआर-सीआईएफआरआई के निदेशक डा. बीके दास ने ड्रोन आधारित प्रौद्योगिकियों में संस्थान की उपलब्धियों और प्रगति को विस्तारपूर्वक प्रस्तुत किया. मत्स्यपालन में ड्रोन प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग पर एक स्टार्टअप द्वारा प्रस्तुति भी दी गई.

विभिन्न ड्रोन आधारित प्रौद्योगिकियों, जैसे स्प्रेयर ड्रोन, फीड ब्राडकास्ट ड्रोन और कार्गो डिलीवरी ड्रोन का प्रदर्शन आईसीएआर-सीआईएफआरआई और स्टार्टअप कंपनियों द्वारा 100 से अधिक मछुआरों और मछुआरिनों के बीच किया गया.

भारतीय मत्स्यपालन क्षेत्र में जलीय संसाधनों की निगरानी और प्रबंधन में कई चुनौतियां हैं, जो जलीय संसाधनों के संरक्षण के लिए प्रभावी और टिकाऊ योजना बनाने में बाधा डालती हैं. हालांकि आधुनिक प्रौद्योगिकियों के लगातार बढ़ते विकास के साथ तालमेल रखने के लिए कृषि प्रणाली में हर दिन सुधार हो रहा है, लेकिन उतरी हुई मछलियों के किफायती उपयोग के लिए व्यवस्थित मछली परिवहन में उचित वैज्ञानिक पद्धति, समय दक्षता और लागत प्रभावी साधनों का अभाव है, क्योंकि यह हमारे मत्स्यपालन और मछली प्रसंस्करण उद्योगों के समुचित विकास के लिए एक जरूरी शर्त है. दूरदराज के मछली पकड़ने वाले क्षेत्रों से लंबी दूरी तक परिवहन के लिए आवश्यक लंबा समय और हैंडलिंग और संरक्षण की कमी से मछलियों को अपूरणीय क्षति हो सकती है. यहां तक कि वे मर भी सकती हैं, जिस से बाजार में उन की कीमत कम हो जाती है और किसानों को भारी नुकसान होता है.

हाल ही में ड्रोन जैसी आधुनिक प्रौद्योगिकी में दूरदराज के स्थानों पर महत्वपूर्ण सामान पहुंचाने, पहुंच बाधाओं को दूर करने और तेजी से डिलीवरी को सक्षम बनाने की जबरदस्त क्षमता है. मत्स्यपालन उद्योग में ड्रोन प्रौद्योगिकी की क्षमता का पता लगाने के लिए, केंद्र सरकार के मत्स्यपालन विभाग ने आईसीएआर-सीआईएफआरआई को “जिंदा मछली परिवहन के लिए ड्रोन प्रौद्योगिकी विकसित करने” संबंधी एक पायलट परियोजना सौंपी है.

यह परियोजना आईसीएआर-केंद्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सीआईएफआरआई), कोलकाता द्वारा कार्यान्वित की जाएगी, जिस का उद्देश्य 100 किलोग्राम पेलोड वाला ड्रोन डिजाइन करना और विकसित करना है, जो 10 किलोमीटर तक जिंदा मछली ले जा सकेगा.

समुद्री मछली पकड़ने वाले जहाजों पर 1,00,000 ट्रांसपोंडर (Transponders) लगाए जाएंगे

नई दिल्ली : भारत सरकार ने 23 अगस्त “राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस” घोषित किया है, क्योंकि इस दिन भारत को एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल हुई थी. इसी दिन चंद्रयान-3 मिशन ने विक्रम लैंडर की सुरक्षित और सौफ्ट लैंडिंग पूरी की और चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास प्रज्ञान रोवर को तैनात किया. इस उपलब्धि ने भारत को चंद्रमा पर उतरने वाला चौथा देश और चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास उतरने वाला पहला देश बना दिया है.

इस ऐतिहासिक उपलब्धि की याद में मत्स्यपालन विभाग, भारत सरकार ने मात्स्यिकी क्षेत्र में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों के अनुप्रयोग के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए कई सैमिनार और प्रदर्शनियां आयोजित कर रहा है.

ये कार्यक्रम विभिन्न तटीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों, इसरो और मत्स्यपालन विभाग के क्षेत्रीय कार्यालयों के सहयोग से आयोजित किए जा रहे हैं. अब तक विभिन्न तटीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हाइब्रिड मोड में 4000 से अधिक प्रतिभागियों के साथ 11 सैमिनार और कार्यशालाएं आयोजित की गई हैं.

इन आयोजनों के एक भाग के रूप में मत्स्यपालन विभाग, भारत सरकार ने 13 अगस्त, 2024 को कृषि भवन, नई दिल्ली में “मात्स्यिकी क्षेत्र में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग” विषय पर एक सैमिनार का आयोजन किया. राजीव रंजन सिंह, केंद्रीय मंत्री, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय और पंचायती राज मंत्रालय ने इस कार्यक्रम की अध्यक्षता की. इस आयोजन में जार्ज कुरियन, राज्यमंत्री, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय एवं अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के साथसाथ अन्य गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति थी.

राजीव रंजन सिंह ने चंद्रयान-3 मिशन की शानदार सफलता के लिए इसरो के वैज्ञानिकों को बधाई दी. केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने मत्स्यपालन क्षेत्र, विशेष रूप से समुद्री क्षेत्र के साथ अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी को एकीकृत करने के लिए मत्स्यपालन विभाग, भारत सरकार द्वारा की गई विभिन्न पहलों और महत्वपूर्ण उपायों पर प्रकाश डाला.

इस प्रणाली का उपयोग फिशिंग वेसल्स की मौनिटरिंग, कंट्रोल और सरवेलेंस के लिए किया जाता है, जो समुद्र में उन की सुरक्षा के लिए आवश्यक है. 13 तटीय राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में मेकैनाइज्ड और मोटोराइज्ड दोनों तरह के फिशिंग वेसल्स पर 1,00,000 ट्रांसपोंडर लगाने का लक्ष्य रखा गया है, जिस के लिए 364 करोड़ रुपए का बजट आवंटित किया गया है.

जार्ज कुरियन ने मात्स्यिकी क्षेत्र में तकनीकी नवाचारों, उपग्रह प्रौद्योगिकियों और वेसल्स  कम्यूनिकेशन एंड सपोर्ट सिस्टम में युवा पीढ़ी को शामिल करने के महत्व पर प्रकाश डाला. राज्य मंत्री ने राष्ट्रीय रोलआउट प्लान के तहत निःशुल्क ट्रांसपोंडर प्रदान कर के मछुआरों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्धता पर जोर दिया.
इसरो के स्पेस एप्लिकेशन सैंटर के वैज्ञानिक डा. चंद्र प्रकाश ने मात्स्यिकी क्षेत्र में कम्यूनिकेशन एंड नेविगेशन सिस्टम्स का अवलोकन प्रस्तुत किया, जिस में विभिन्न अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों की विशेषताएं और अनुप्रयोग शामिल थे.

डा. अभिलक्ष लिखी, सचिव, मत्स्यपालन विभाग ने वेसल्स कम्यूनिकेशन एंड सपोर्ट सिस्टम और ओशनसैट -3 जैसी कुछ प्रमुख परियोजनाओं पर इसरो और मत्स्यपालन विभाग के बीच सहयोगात्मक प्रयासों पर प्रकाश डाला. केंद्रीय सचिव ने मात्स्यिकी क्षेत्र में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग को बढ़ाने पर भी जोर दिया.

सागर मेहरा, संयुक्त सचिव, मत्स्यपालन विभाग, भारत सरकार ने सभी गणमान्य व्यक्तियों और अन्य प्रतिभागियों को धन्यवाद दिया और मत्स्यपालन विभाग विभाग, भारत सरकार और इसरो के बीच सफल सहयोग की सराहना की.

मत्स्यपालन विभाग, भारत सरकार की संयुक्त सचिव नीतू प्रसाद ने मात्स्यिकी क्षेत्र में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों के अनुप्रयोग पर मत्स्यपालन विभाग, भारत सरकार द्वारा शुरू की गई विभिन्न पहलों जैसे वेसल्स कम्यूनिकेशन एंड सपोर्ट सिस्टम के लिए नैशनल रोलआउट प्लान, ओशनसैट का अनुप्रयोग, पोटेंशियल फिशिंग जोन्स (पीएफजेड) आदि के बारे में जानकारी दी.

उन्होंने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि वेसल्स कम्यूनिकेशन एंड सपोर्ट सिस्टम, जिसे भारत सरकार ने साल 2023 में अनुमोदित किया था, एक महत्वपूर्ण पहल है.

मत्स्यपालन विभाग, राज्य/संघ राज्य क्षेत्र के मात्स्यिकी विभाग, इसरो, आईएनसीओआईएस, आईएमएसी, आईसीएआर, न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड के अधिकारी और अन्य हितधारकों ने कृषि भवन में प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया.

इस कार्यक्रम में लगभग 1,000 मछुआरे, छात्र, राज्य मात्स्यिकी विभाग और मत्स्यपालन विभाग के क्षेत्रीय कार्यालयों, आईसीएआर आदि के अधिकारियों ने वर्चुअल मोड द्वारा शामिल हुए.

कृषि भवन में आयोजित कार्यक्रम के बाद महाराष्ट्र के मात्स्यिकी विभाग के सहयोग से एफएसआई मुख्यालय, मुंबई में एक सैमिनार और कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिस में मछुआरों, छात्रों, अधिकारियों और नाव मालिकों आदि सहित तकरीबन 300 लोग शामिल हुए.

खारे पानी में सफेद झींगापालन (Shrimp Farming) से कमाई

हरियाणा राज्य की तकरीबन 6.2 लाख हेक्टेयर जमीन के पानी में खारापन है. इस जमीन का बेहतर इस्तेमाल सफेद झींगापालन के लिए किया जा सकता है. झींगापालन खारेपन से ग्रस्त जमीन के इस्तेमाल के साथसाथ अच्छी आमदनी का जरीया भी है. यदि वैज्ञानिक तरीके से इस का पालन किया जाए, तो आज का नौजवान इस से खासी आमदनी हासिल कर सकता है.

सफेद झींगा क्या है?

झींगापालन (Shrimp Farming)

मूलरूप से यह मेक्सिकन प्रजाति है, जो प्रशांत महासागर में मेक्सिको से पेरू तक पाई जाती है. भारत सरकार व कृषि मंत्रालय के तहत मत्स्य विभाग की कोशिशों से साल 2009 से भारत में इस का पालन किया जा रहा है.

झींगा का रंग धुंधला सफेद होता है, पर मौसम के हिसाब से यह अपना रंग बदल सकता है. इस के वयस्क की लंबाई तकरीबन 23 सेंटीमीटर होती है. मादा झींगा नर से ज्यादा तेजी से बढ़ोतरी करती है.

क्यों करें सफेद झींगापालन?

यह झींगा तेजी से बढ़ता है और 100 से 120 दिनों में ही 1 झींगे का वजन 20-25 ग्राम तक हो जाता है. इस का पालन 0.5 पीपीटी से 45 पीपीटी तक के खारेपन में किया जा सकता है. 23-30 डिगरी सेल्सियस तापमान पर यह अच्छी बढ़ोतरी करता है और 15-33 डिगरी सेल्सियस तक के तापमान को सहन कर सकता है. इसलिए हरियाणा में यह तकरीबन 9 महीने तक बढ़ोतरी कर सकता है. इस की खुराक में प्रोटीन की जरूरत कम होती है और इस में 35 फीसदी प्रोटीन, 19 फीसदी वसा और 3 फीसदी कार्बोहाइडे्रट्स के साथसाथ तमाम मिनरल्स भी होते हैं. यह प्रोटीन सभी जरूरी अमीनो एसिडो से भरपूर होता है. इस की पैदावार 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर सालाना या 40 क्विंटल प्रति एकड़ सालाना तक होती है.

इस का पालन कैसे करें?

झींगापालन के लिए सब से पहले सही जगह को चुनना बहुत ही जरूरी है. खासतौर से जो जमीन लवणीय है और उस का पानी भी लवणीय है, उस में सफेद झींगे को पाला जा सकता है. इस के लिए मिट्टी व पानी की जांच मत्स्य विभाग से कराना जरूरी है.

इसे पालने में बहुत ही सावधानी रखनी पड़ती है. सफेद झींगापालन की ट्रेनिंग मत्स्य पालन विभाग, हरियाणा व सीआईएफई, लाहली/बनियानी (रोहतक) के संस्थानों में दी जाती है. ट्रेनिंग ले कर आप अपना काम शुरू कर सकते हैं.

झींगापालन (Shrimp Farming)

ध्यान रखने वाली बातें : तकनीक जानकारी हासिल करने व झींगापालन की जगह का चुनाव करने के बाद निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए:

* इस का बीज व खुराक भारत के तटीय प्रदेशों जैसे आंध्र प्रदेश वगैरह से हासिल किया जा सकता है.

* तालाब के पानी में आक्सीजन की कमी न हो, इस के लिए जलवाहक यानी ऐरिटर लगाने चाहिए.

* तालाब में बीज का संचय 60 प्रति वर्गमीटर के घनत्व के हिसाब से किया जाना चाहिए.

* झींगे का परिपूरक आहार इस के वजन के अनुपात में डाला जाना चाहिए. ज्यादा या कम आहार इस की बढ़ोतरी पर बुरा असर डालता है.

* तालाब के पानी में विभिन्न प्रकार के मापदंड जैसे पीएच, खारापन,सीओ2, ओ2, नाइट्राइट, नाइट्रेट, फास्फेट, सल्फर, कैल्शियम, मैग्नीशियम, क्षारीयता वगैरह की जांच की जरूरत लगातार पड़ती है.

उपज व मार्केटिंग

* 100 से 120 दिनों में झींगा तैयार हो जाता है. इस का वजन 20 से 25 ग्राम का होता है.

* झींगे को जाल द्वारा पानी से निकाला जाता है.

* इस की पैकिंग पिसी हुई बर्फ के साथ हवाबंद डब्बों में की जाती है. बाद में डब्बों को मंडी तक बेचने के लिए पहुंचाया जाता है.

अधिक जानकारी के लिए आप अपने जिले के जिला मत्स्य अधिकारी से संपर्क करें.

फिश एरिएटर (Fish Aerator) लगा कर बढ़ाएं मछली उत्पादन

मछलियां सांस लेने व छोड़ने के काम के लिए पानी में घुली औक्सीजन का इस्तेमाल करती हैं. अगर किसी वजह से तालाब, नदी या दूसरे किसी पालनयोग्य बांधों में औक्सीजन की कमी हो जाती है तो मछलियां मरने लग जाती हैं. इस के अलावा उन की बढ़वार भी रुक जाती है.

इस समस्या के हल के लिए अगर मछली को पालने के लिए बनाए गए तालाबों में फिश एरिएटर लगा दिए जाएं तो मछलियों का मरना कम हो जाएगा और उत्पादन भी 25-30 फीसदी तक बढ़ जाएगा.

उत्तर भारत में मुख्य रूप से कतला, रोहू और मृगल प्रजातियों की मछलयां पाली जाती हैं. जब तापमान में बहुत कमी या बढ़ोतरी होती है और प्रदूषित पानी तालाब में मिल जाता है तो घुलनशील औक्सीजन की कमी हो जाती है. इस वजह से मछलियां अकसर सतह पर आ कर हवा से औक्सीजन लेने की कोशिश करती हैं और पानी की सतह पर चक्कर लगाने लगती हैं. इस के बावजूद भी उन्हें सही औक्सीजन नहीं मिलती तो वे मरने लगती हैं.

कभीकभी तो तालाब या झीलों में औक्सीजन की कमी में इतनी ज्यादा मछलियां मरने लगती हैं कि इन के किनारे मरी हुई मछलियों के ढेर लग जाते हैं. घुलनशील औक्सीजन की ज्यादा कमी होने पर तालाबों की सभी मछलियां एकसाथ मरने लगती हैं.

हवा की औक्सीजन को पानी में घुलनशील करने के लिए फिश एरिएटर का इस्तेमाल किया जाता है. फिश एरिएटर एक साधारण सी मशीन है जो बिजली से चलाई जाती है. यह मशीन पानी को हवा में फव्वारे के रूप में फेंक कर औक्सीजन को पानी में घोलने का काम करती है. जब पानी में सही मात्रा में औक्सीजन घुल जाती है तो मछलियां इसे आसानी से हासिल कर लेती हैं.

फिश एरिएटर का यह भी फायदा है कि फव्वारा चलने के कारण तालाब या झील के तल में जमा घुलनशील लवण पानी में मिल जाता है जो मछलियों की बढ़ोतरी दर में मददगार होते हैं.

इस के अलावा फव्वारा चलने के कारण मछलियां बारिश जैसे मौसम का अनुभव करती हैं. उन में प्रजनन कूवत पैदा हो जाती है और फिश एरिएटर तालाब के पानी का तापक्रम सामान्य बनाने में भी मददगार होता है, जिस से पानी में मछली को सही वातावरण और तापमान मिलता रहता है. वे अपना भोजन तालाब से सुचारु रूप से हासिल करती रहती हैं.