मछलियां सांस लेने व छोड़ने के काम के लिए पानी में घुली औक्सीजन का इस्तेमाल करती हैं. अगर किसी वजह से तालाब, नदी या दूसरे किसी पालनयोग्य बांधों में औक्सीजन की कमी हो जाती है तो मछलियां मरने लग जाती हैं. इस के अलावा उन की बढ़वार भी रुक जाती है.

इस समस्या के हल के लिए अगर मछली को पालने के लिए बनाए गए तालाबों में फिश एरिएटर लगा दिए जाएं तो मछलियों का मरना कम हो जाएगा और उत्पादन भी 25-30 फीसदी तक बढ़ जाएगा.

उत्तर भारत में मुख्य रूप से कतला, रोहू और मृगल प्रजातियों की मछलयां पाली जाती हैं. जब तापमान में बहुत कमी या बढ़ोतरी होती है और प्रदूषित पानी तालाब में मिल जाता है तो घुलनशील औक्सीजन की कमी हो जाती है. इस वजह से मछलियां अकसर सतह पर आ कर हवा से औक्सीजन लेने की कोशिश करती हैं और पानी की सतह पर चक्कर लगाने लगती हैं. इस के बावजूद भी उन्हें सही औक्सीजन नहीं मिलती तो वे मरने लगती हैं.

कभीकभी तो तालाब या झीलों में औक्सीजन की कमी में इतनी ज्यादा मछलियां मरने लगती हैं कि इन के किनारे मरी हुई मछलियों के ढेर लग जाते हैं. घुलनशील औक्सीजन की ज्यादा कमी होने पर तालाबों की सभी मछलियां एकसाथ मरने लगती हैं.

हवा की औक्सीजन को पानी में घुलनशील करने के लिए फिश एरिएटर का इस्तेमाल किया जाता है. फिश एरिएटर एक साधारण सी मशीन है जो बिजली से चलाई जाती है. यह मशीन पानी को हवा में फव्वारे के रूप में फेंक कर औक्सीजन को पानी में घोलने का काम करती है. जब पानी में सही मात्रा में औक्सीजन घुल जाती है तो मछलियां इसे आसानी से हासिल कर लेती हैं.

फिश एरिएटर का यह भी फायदा है कि फव्वारा चलने के कारण तालाब या झील के तल में जमा घुलनशील लवण पानी में मिल जाता है जो मछलियों की बढ़ोतरी दर में मददगार होते हैं.

इस के अलावा फव्वारा चलने के कारण मछलियां बारिश जैसे मौसम का अनुभव करती हैं. उन में प्रजनन कूवत पैदा हो जाती है और फिश एरिएटर तालाब के पानी का तापक्रम सामान्य बनाने में भी मददगार होता है, जिस से पानी में मछली को सही वातावरण और तापमान मिलता रहता है. वे अपना भोजन तालाब से सुचारु रूप से हासिल करती रहती हैं.

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