Integrated Farming System: छोटे किसान हो रहे हैं खुशहाल

क्या आप जानते हैं कि आईएफएस (Integrated Farming System) फॉर्मिंग मॉडल क्या है? इसे अपनाकर कैसे छोटे किसान बन रहे हैं धनवान और अब वे केवल फसल पर ही निर्भर नहीं हैं. पढ़े यह लेख –

Integrated Farming System (आईएफएस) क्या है?

Integrated Farming System : आईएफएस यानी इंटीग्रेटेड फॉर्मिंग सिस्टम (IFS) एक ऐसी एकीकृत कृषि प्रणाली है जिसे अपनाकर छोटे किसान अपनी खेती को अधिक उत्पादक और लाभकारी बना रहे हैं. इस मॉडल ने न केवल किसानों की आजीविका सुरक्षित की है, बल्कि मौसम और जलवायु की अनिश्चितताओं से भी उनकी रक्षा की है.

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, प्रधानमंत्री-राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (पीएम-आरकेवीवाई) के तहत वर्षा-सिंचित क्षेत्र विकास (RAD) इस कार्यक्रम का कार्यान्वयन कर रहा है. यह योजना भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा विकसित आईएफएस (Integrated Farming System) मॉडलों के माध्यम से सतत कृषि उत्पादन को बढ़ावा देती है.

आईएफएस मॉडल की विशेषताएं और लाभ

• कृषि का विविधीकरण किया जाना, जिससे फसल के साथ बागबानी, पशुधन, मत्स्यपालन, मधुमक्खीपालन और कृषि-वानिकी को जोड़कर आय बढ़ाई जा सके.

• मौसम और जलवायु से सुरक्षा प्रदान करना, ताकि सूखा-प्रवण क्षेत्रों में अनुकूलन क्षमता बढ़े.

• मृदा और जल संरक्षण की अहमियत हो, जिससे वर्षा जल संचयन और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में मदद मिले.

• आईएफएस अपनाने वाले किसानों के लिए प्रति क्लस्टर 10,000 रुपए की वित्तीय सहायता प्रदान करना.

छोटे किसानों को मुनाफा

केवीके प्रशिक्षण और प्रदर्शन के तहत वर्ष 2024-25 में 4,416 प्रदर्शन आयोजित किए गए और 96,013 किसानों को विभिन्न आईएफएस (Integrated Farming System) मॉडल पर प्रशिक्षित किया गया.

आईएफएस मॉडल अपनाने वाले किसानों की आमदनी में कई गुना वृद्धि हुई है. उदाहरण के तौर पर 1 हेक्टेयर जमीन वाले किसान ने गेहूं और धान के साथ आम और नीबू की बगिया लगाई, तालाब में मछलीपालन शुरू किया और बकरीपालन से नियमित आय सुनिश्चित की. अब ऐसे किसान केवल फसल पर निर्भर नहीं हैं और मौसम की मार से भी सुरक्षित हैं.

Research : कोटा में फिर शुरू होगा गेहूं और जौ पर अनुसंधान

Research : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली द्वारा कृषि विश्वविद्यालय, कोटा को गेहूं और जौ पर अनुसंधान (Research) के लिए अखिल भारतीय समन्वित परियोजना के स्वैच्छिक केंद्र के रूप में स्वीकृति प्रदान की गई है. यह विश्वविद्यालय के लिए एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है, जिस से कोटा संभाग में गेहूं और जौ की फसल पर अनुसंधान (Research) को नई दिशा मिलेगी, साथ ही इन के उच्च गुणवत्ता के बीज का उत्पादन भी किया जा सकेगा.

कोटा देशप्रदेश के गेहूं उत्पादन में विशेष महत्त्व रखता है. राजस्थान में उत्पादित कुल गेहूं में से लगभग 15-20 फीसदी योगदान अकेले कोटा, बूंदी, बारां और झालावाड़ जिलों का है. यह क्षेत्र उर्वर चंबल घाटी और उच्च उत्पादकता के लिए विख्यात है और यहां के किसानों ने राष्ट्रीय स्तर पर गेहूं उत्पादन में अपनी अलग पहचान स्थापित की है.

विश्वविद्यालय के कुलगुरु डा. अभय कुमार व्यास ने इस अवसर पर हर्ष जताते हुए बताया कि विश्वविद्यालय में गेहूं और जौ की भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की अखिल भारतीय समन्वित परियोजना साल 1983 से चल रही थी,पर साल 2017 में किन्हीं प्रशासनिक कारणों से यह परियोजना बंद हो गई थी. विश्वविद्यालय द्वारा पिछले 3 सालों से इस परियोजना को दोबारा शुरू किए जाने के प्रयास किए जा रहे थे, जिस के फलस्वरूप अब जा कर इस परियोजना के लिए स्वीकृति प्राप्त हुई है.

नए केंद्र के रूप में स्वीकृति मिलने से कोटा खंड में गेहूं और जौ की नई किस्मों के विकास पर अनुसंधान (Research) को गति मिलेगी, क्षेत्र विशेष की जलवायु और मिट्टी के अनुरूप उन्नत किस्मों और तकनीकों का परीक्षण और विस्तार होगा, किसानों को बेहतर उत्पादकता व गुणवत्ता के साथसाथ सीधा लाभ मिलेगा और गेहूं व जौ की उन्नत किस्मों के प्रजनक और फाउंडेशन बीज के उत्पादन में बहुत वृद्धि होगी.

याद रहे कि कि हाल ही में विश्वविद्यालय के उद्यानिकी एवं वानिकी महाविद्यालय, झालावाड़ के लिए आईसीएआर, नई दिल्ली द्वारा फलों (संतरा व नारंगी) की अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान (Research) परियोजना शुरू किए जाने की स्वीकृति प्राप्त हुई है.

कृषि विश्वविद्यालय, कोटा ने अपनी स्थापना से ले कर अब तक क्षेत्रीय कृषि विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है और यह नया दायित्व विश्वविद्यालय की उपलब्धियों में एक और स्वर्णिम अध्याय जोड़ता है.

Agricultural University : बिहार कृषि विश्वविद्यालय को मिला एक और अवार्ड

Agricultural University : बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर ने एक बार फिर भारतीय कृषि विज्ञान को राष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित किया है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर)–भारतीय तिलहन अनुसंधान संस्थान (आईआईओआर), हैदराबाद द्वारा बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रांची में आयोजित अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (एआईसीआरपी)–कुसुम एवं तीसी की वार्षिक समीक्षा बैठक में बीएयू, सबौर को ‘Best एआईसीआरपी–लिनसीड सैंटर अवार्ड 2024–25’ से सम्मानित किया गया.

यह सम्मान तीसी ( लिनम यूसिटाटिसिम usitatissimum एल.) में जर्मप्लाज्म सुधार, जलवायु सहनशील एवं रोग प्रतिरोधी किस्मों के विकास तथा नैनोप्रौद्योगिकी आधारित उत्पादन तकनीक में उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रदान किया गया.

विशेष उल्लेखनीय बात यह है कि यह उच्च स्तरीय शोध कार्य बीएयू सबौर के निदेशक अनुसंधान डा. अनिल कुमार सिंह के रणनीतिक नेतृत्व एवं वैज्ञानिक मार्गदर्शन में संचालित किया गया, जिन के विजन और सतत सहयोग से यह उपलब्धि संभव हो पाई.

इस उपलब्धि के लिए भारतीय तिलहन अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद द्वारा विशेष प्रशस्ति प्रमाणपत्र प्रदान किया गया. यह तकनीक सटीक पोषण प्रबंधन और जलवायु के प्रति लचीली कृषि का उत्कृष्ट उदाहरण है.

तीसी बीज ओमेगा-3 फैटी एसिड, α-लिनोलेनिक एसिड (एएलए ), लिग्नान और उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन का समृद्ध स्रोत है.

बीएयू द्वारा विकसित प्रजातियां

फंक्शनल फूड्स, औषधि, बायोपेंट, वार्निश एवं पशु आहार हेतु अत्यंत उपयुक्त हैं. जीनोमिक चयन और फैनोटाइपिक सुधार के माध्यम से तेल की गुणवत्ता, स्थिरता और औद्योगिक उपयोगिता को सुदृढ़ किया गया है.

कुलपति डा. डीआर सिंह ने कहा, “बीएयू ने तीसी की नई किस्मों एवं जलवायु के प्रति सहनशील तकनीकों के क्षेत्र में देश में नया मानक स्थापित किया है. यह पुरस्कार हमारे बहुविषयी वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सतत नवाचार का जीवंत प्रमाण है.”

यह उपलब्धि स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि जीनोमिक प्रजनन, नैनो उर्वरक और सटीक पोषण प्रबंधन का समन्वित उपयोग तिलहन उत्पादन को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकता है. यह भारत की खाद्य तेल एवं पोषण सुरक्षा को सुदृढ़ करेगा. किसानों की आय वृद्धि और कृषि आधारित उद्योगों के विस्तार में महत्त्वपूर्ण योगदान देगा.

बीएयू, सबौर अब भारत का ‘राष्ट्रीय तिलहन नवाचार केंद्र’ बन कर उभरा है, जो देश को तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के लिए मजबूत वैज्ञानिक आधार प्रदान करेगा.

नई किस्में और राष्ट्रीय योगदान

निदेशक अनुसंधान डा. अनिल कुमार सिंह के मार्गदर्शन में परियोजना के मुख्य अन्वेषक डा. आरबीपी निराला और सहयोगी वैज्ञानिक डा. रामानुज विश्वकर्मा, डा. शिवशंकर आचार्य, डा. एसके चौधरी और डा. ए. लोकेश्वर रेड्डी ने 2021–22 से 2023–24 के बीच गहन प्रजनन एवं आणविक अनुसंधान द्वारा उल्लेखनीय उपलब्धियां प्राप्त कीं.

संस्थान द्वारा विकसित नई किस्में

सबौर तीसी-2 – ≥42 फीसदी उच्च तेल प्रतिशत, मध्यम अवधि एवं स्थिर उपज क्षमता. सबौर तीसी-3–अल्टरनेरिया ब्लाइट और पाउडरी मिल्ड्यू रोगों के प्रति उच्च सहनशीलता. सबौर तीसी-4–सूखा एवं ऊष्मा सहनशील, जलवायु परिवर्तन के अनुकूल.

राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव

इन किस्मों का 21.4 फीसदी प्रजनक बीज उत्पादन में प्रत्यक्ष योगदान देशभर में किया जा रहा है, जो किसी एक केंद्र से असाधारण उपलब्धि है.

नैनो प्रौद्योगिकी आधारित उत्पादन नवाचार

सबौर टीम ने नैनो यूरिया (3 मिलीलिटर/लिटर पानी) का फूल आने की अवस्था में पर्णीय छिड़काव करने की अभिनव तकनीक विकसित की. नाइट्रोजन उपयोग दक्षता में 18–20 फीसदी तक वृद्धि. रासायनिक उर्वरक की खपत में 25–30 फीसदी तक कमी. औसतन 12–15 फीसदी तक उपज में वृद्धि.

Kisan Samman Nidhi : प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की 20वीं किस्त जारी

Kisan Samman Nidhi : प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना की 20वीं किस्त 2 अगस्त, 2025 को वाराणसी में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम के माध्यम से देश भर के करोड़ों किसानों को जारी की गई. केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक के दिशानिर्देशन में पूरे देश के सभी कृषि संस्थानों में किसानों को जोड़ा गया.

इस कार्यक्रम के द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश भर के किसानों को किसान सम्मान निधि सहित अन्य कृषि आधारित योजनाओं के बारे में जानकारी दी. उन्होंने किसानों से सीधी बात करते हुए  कहा कि केंद्र सरकार की प्राथमिकता है कि सभी सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ किसानों और आम नागरिकों तक पहुंचे.  देश के विकास में किसानों के विकास के हित में काम करना सरकार का सर्वोपरि उद्देश्य है.

इस अवसर पर मऊ के राष्ट्रीय बीज विज्ञान संस्थान में जागरूकता सह जीवंत प्रसारण कार्यक्रम का आयोजन किया गया. निदेशक, डा. संजय कुमार के मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यक्रम में लगभग 124 किसान शामिल हुए और संस्थान के वैज्ञानिक व कार्मिक भी उपस्थित रहे.

इस कार्यक्रम की शुरुआत वरिष्ठ वैज्ञानिक, डा. कल्याणी कुमारी ने किया. विकसित कृषि संकल्प अभियान के नोडल अधिकारी और कार्यक्रम के समन्वयक, प्रधान वैज्ञानिक डा. अंजनी कुमार सिंह ने किसानों को संस्थान स्तर पर चल रहे भारत सरकार की कृषि योजनाओं के बारे में जानकारी दी. उस के बाद वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. अजय कुमार ने किसानों को धान की खेती में खरपतवार नियंत्रण विधियों और खेती में जैविक खाद के प्रयोग के बारे में बताया.

वैज्ञानिक डा. विनेश बनोथ द्वारा धन्यवाद ज्ञापन दे कर कार्यक्रम की समाप्ति हुई. किसानों ने वरिष्ठ वैज्ञानिकों के साथ अपने अनुभव भी साझा किए और सरकार की इस पहल के प्रति आभार जताया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वीडियो कौंफ्रेंसिंग के माध्यम से इस बार तकरीबन 9.7 करोड़ किसानों के बैंक खातों में 20,500 करोड़ रुपए की राशि ट्रांसफर की गई. इस योजना का उद्देश्य किसानों की आय को सहारा देना और उन्हें खेती की लागत में राहत पहुंचाना है. यह आयोजन केंद्र सरकार द्वारा किसानों की आर्थिक सहायता और सशक्तीकरण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है.

Training : किसान महिलाओं को स्वावलंबी बनाने के लिए सिलाई प्रशिक्षण

Training : महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने कहा कि देश बदल रहा है, ऐसे में नीतियों और हमारी सोच को भी बदलने का वक्त है. नवाचार की जरूरत महसूस की जा रही है, पुराने ढर्रे पर चलने का वक्त जा चुका है. यदि हम ने इस सच्चाई को नहीं जाना, तो हमारी हालत भी पुराने लैंडलाइन फोन और कैमरा कंपनियों जैसी हो जाएगी जो नवाचार से दूरी बनाने के कारण चलन से ही बाहर हो गए हैं.

डा. अजीत कुमार कर्नाटक प्रसार शिक्षा निदेशालय सभागार में आयोजित 15 दिवसीय सिलाई व कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम के समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे. निदेशालय एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो की ओर से अनुसूचित जाति उपयोजना के अंतर्गत जीविकोपार्जन के लक्ष्य से आयोजित इस प्रशिक्षण में उदयपुर और सलूंबर जिलों के दूरदराज गांवों की 30 महिलाओं ने भाग लिया.

इन प्रतिभागी महिलाओं को प्रमाणपत्र व अत्याधुनिक बिजली से चलने वाली सिलाई मशीन सहित अन्य साजसामान किट मुफ्त में प्रदान की गई, ताकि वे अपने गांव जा कर स्वरोजगार की दिशा में कदम रख सकें.

डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने कहा कि अब तक हम लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति का अनुसरण करते आ रहे थे जो हमारे देश की पद्धति नहीं थी. साल 1835 में बनी मैकाले शिक्षा पद्धति बिलकुल समय के उस दौर में सार्थक रही है, लेकिन भारतीय परंपरा के परिप्रेक्ष्य में नई शिक्षा नीति की जरूरत महसूस की गई. इस क्रम में अगस्त 2020 में नई शिक्षा नीति आई.

इस नई शिक्षा नीति में शिक्षा, शोध, प्रसार के साथसाथ कौशल विकास को भी शामिल किया गया. इस नई शिक्षा नीति से 2035 तक यानी 15 साल में देशभर में परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देगा. उन्होंने प्रतिभागी महिलाओं से आह्वान किया कि प्रशिक्षण में प्राप्त ज्ञान को व्यर्थ न गवाएं, अन्य महिलाओं को प्रशिक्षण दें.

इस  कार्यक्रम के अध्यक्ष डा. एनजी पाटील निदेशक आईसीएआर-एनबीएसएस, नागपुर महाराष्ट्र ने एमपीयूएटी में महज 11 फीसदी स्टाफ के बावजूद 57 पेटेंट हासिल करने को अपूर्व उपलब्धि बताया. उन्होने महिलाओं से कहा कि सिलाई कौशल का पहला प्रयोग अपने बच्चों व परिवार के लिए करें. महिला सशक्त होगी तो परिवार और देश भी सशक्त होगा. इस प्रशिक्षण का मकसद भी यही है कि महिलाएं आर्थिक उन्नति कर आत्मनिर्भर बन सकें.

इस कार्यक्रम में आईसीएआर एनबीएसएस, उदयपुर इकाई प्रभारी डा. बीएल मीणा, सीनियर वैज्ञानिक एवं प्रशिक्षण समन्वयक डा. आरएस मीणा ने कहा कि छोटीछोटी जोत वाले किसान  परिवारों से जुड़ी महिलाओं को सिलाई प्रशिक्षण ही नहीं बल्कि, मशीन में आने वाली छोटीछोटी खराबियों व उन्हें दुरूस्त करने का प्रशिक्षण भी दिया गया.

इस कायर्क्रम के शुरुआत में प्रसार शिक्षा निदेशक डा. आरएल सोनी ने कहा कि सिलाई आज की नहीं, पुरातन विधा है. जब से मनुष्य ने वस्त्र पहनना शुरू किया है, समय के साथसाथ पहनावे में बदलाव आते रहे हैं. उन्होंने कहा कि महिलाओं को स्वावलंबी बनाने के लिए निदेशालय 35 तरह के प्रशिक्षण आयोजित करता है. महिलाएं अपनी कल्पना को उड़ान देने में पीछे नहीं रहें.

बनाए झबला, बैग, कशीदाकारी भी सीखी

इस 15 दिवसीय प्रशिक्षण में महिलाओं ने रूमाल, कुर्ती, पेटीकोट, घाघरा, छोटे बच्चों का झबला आदि की कटिंग व सिलाई सीखी. मास्टर ट्रेनर डा. छवि, डा. लतिका व्यास ने बैग सिलाई व सुंदर कशीदाकारी भी सिखाई. इस मौके पर प्रशिक्षणार्थी राधा मेघवाल, शारदा खटीक, कोमल मेघवाल आदि ने अनुभव भी साझा किए.

इस कार्यक्रम में छात्र कल्याण अधिकारी डा. मनोज कुमार महला, रश्मि दूबे, डा. आदर्श शर्मा व राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो के अधिकारियों ने भी अपने विचार रखे. कार्यक्रम का संचालन डा. लतिका व्यास ने किया.

अनुसंधान अब पूसा में नहीं खेत और किसान के हिसाब से तय होंगे

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान 16 जुलाई, 2025 को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के 97वें स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम शामिल हुए. इस कार्यक्रम का आयोजन भारत रत्न सी. सुब्रमण्यम औडिटोरियम, एनएएससी कौम्प्लेक्स, पूसा, नई दिल्ली में किया गया. इस अवसर पर केंद्रीय कृषि मंत्री ने उत्कृष्ट योगदान के लिए वैज्ञानिकों को राष्ट्रीय कृषि विज्ञान पुरस्कार भी वितरित किए. कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने परिसर में आयोजित विकसित कृषि प्रदर्शनी का अवलोकन भी किया. साथ ही विभिन्न कृषि उत्पादों व प्रौद्योगिकी की जानकारी भी ली. इस कार्यक्रम में 10 कृषि प्रकाशनों का विमोचन किया गया. साथ ही कृषि क्षेत्र के विभिन्न समझौता ज्ञापनों का विमोचन भी किया गया.

इस कार्यक्रम में कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी, कृषि सचिव देवेश चतुर्वेदी, आईसीएआर के महानिदेशक डा. एमएल जाट सहित देशभर से आए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के निदेशक, अन्य वरिष्ठ अधिकारी, वैज्ञानिक और बड़ी संख्या में किसान शामिल रहे.

इस अवसर पर संबोधित करते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने संपूर्ण भारतवासियों की तरफ से पूरी आईसीएआर की टीम को बधाई दी. उन्होंने कहा कि आईसीएआर के साथ जिन देशों ने समझौता किया है और जिन देशों में भारतीय कृषि उत्पादों का निर्यात हो रहा है, उन की तरफ से भी आईसीएआर को बधाई. देश के जिन 80 करोड़ लोगों को राशन उपलब्ध हो रहा है, उन की तरफ से भी आईसीएआर बधाई का पात्र है. स्थापना दिवस गर्व का विषय है. स्थापना दिवस उत्सव के रूप में मनाया जाना चाहिए.

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि हमारे वैज्ञानिकों की बौद्धिक क्षमता तुलना से परे है. अपने काम के दम पर  हमारे वैज्ञानिक आज किसान कल्याण व विकास का मार्ग तय कर रहे हैं. उन्होंने कहा आज हम गेहूं का निर्यात कर रहे हैं. चावल उत्पादन में भी काफी बढ़ोतरी हुई है. इस बार चावल का इतना उत्पादन हुआ है कि रखने के लिए अतिरिक्त जगह का प्रबंध किया जा रहा है. रिकौर्ड स्तर पर उत्पादन में बढ़ोतरी हुई है.

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि हरित क्रांति के दौरान वर्ष 1966 से 1979 तक हमारा खाद्यान्न उत्पादन प्रति वर्ष 2.7 मिलियन टन बढ़ा. वर्ष 1980 से 1990 तक उत्पादन में 6.1 मिलियन टन प्रति वर्ष उत्पादन में बढ़ोतरी हुई.  वर्ष 2000 से 2013-14 तक खाद्यान्न उत्पादन में 3.9 मिलियन टन प्रति वर्ष बढ़ोतरी देखी गई. लेकिन 2013-14 से 2025 तक खाद्यान्न उत्पादन में 8.1 मिलियन टन की बढ़ोतरी हुई है. पिछले 11 सालों में खाद्यान्न उत्पादन में ढाई से तीन गुना वृद्धि देखी गई.

उन्होंने आगे बागबानी के क्षेत्र में हुई वृद्धि के बारे में बताया कि वर्ष 1966-1980 तक 1.3 मिलियन टन प्रति वर्ष बढ़ोतरी हुई थी. साल 1980-1990 में 2 मिलियन टन वृद्धि हुई. फिर साल 1990 से 2000 के दौरान 6 मिलियन टन वृद्धि हुई है। पिछले 11 सालों में बागबानी क्षेत्र में 7.5 मिलियन टन की बढ़ोतरी के साथ फल और सब्जियों का उत्पादन लगातार बढ़ रहा है. उन्होंने कहा कि दूध उत्पादन में भी नवीन प्रौद्योगिकियों के साथ उत्पादन में वृद्धि हो रही है. दूध उत्पादन में साल 2000 से 2014 तक 4.2 मिलियन टन की वृद्धि देखी गई जबकि साल 2014 से 2025 के समय में यह वृद्धि 10.2 मिलियन टन प्रति वर्ष रही. यह आंकडे स्वयं में पिछले 11 सालों में उत्पादन क्षेत्र में हुई उल्लेखनीय उपलब्धि को दर्शाते हैं.

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि जलवायु परिवर्तन, छोटी जोत, वायरस अटैक और पशुपालन से जुड़ी विभिन्न चुनौतियों के बावजूद भी वैज्ञानिकों के असाधारण योगदान के कारण उत्पादन में लगातार वृद्धि हुई है. उन्होंने आगे कहा कि प्राकृतिक खेतों को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं. आने वाली पीढ़ियों के लिए धरती को सुरक्षित रखना है. इस के लिए उन्होंने वैज्ञानिकों से प्राकृतिक खेती के जरीए गुणवत्तापूर्ण उत्पाद की दिशा में काम करने का आह्वान किया. उन्होंने कहा कि दलहन और तिलहन में प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ाने के लिए कदम उठाने और बड़े स्तर पर शोध करने की आवश्यकता है. मुझे विश्वास है कि वैज्ञानिक इस दिशा में आगे बढेंगे.

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि ‘विकसित कृषि संकल्प अभियान’ दुनिया का सब से बड़ा अभियान था. इस अभियान के माध्यम से कई बातें निकल कर सामने आईं. इस के जरीए फसलवार और राज्यवार फसलों पर बैठकें करने और समाधान के प्रयास का रास्ता तय हुआ. सोयाबीन और कपास के बाद अब गन्ने व मक्के पर भी बैठक आयोजित की जाएगी. कपास को ले कर सवाल उठा कि इतनी किस्में विकसित होने के बावजूद उत्पादन क्यों घट गया. मैं बताना चाहता हूं कि वायरस अटैक के कारण फसलें प्रभावित हो रही है, बीटी कौटन भी वायरस अटैक की समस्या से जूझ रहा है. इस अभियान के जरीए शोध के लिए 500 विषय उभर कर हमारे सामने आए हैं, जिन पर काम किया जाएगा. अनुसंधान अब पूसा में तय नहीं होगा, खेत और किसान के हिसाब से आगे के शोध के रास्ते तय होंगे. उन्होंने आईसीएआर के महानिदेशक को ‘एक टीम-एक लक्ष्य’ की संकल्पना पर भी काम करने के निर्देश दिए. उन्होंने कहा कि एक लक्ष्य के साथ वैज्ञानिकों की टीम बना कर, किसान कल्याण के लिए कार्य करें.

केंद्रीय कृषि मंत्री ने किसानों की तरफ से उर्वरक की जांच के उपकरण सहित विभिन्न आधुनिकतम प्रौद्योगिकी के विकास की मांग को ले कर भी चर्चा की. उन्होंने कहा कि हमारे देश में जोत के आकार छोटे हैं, बड़ी मशीनों की जरूरत नहीं. छोटी मशीनें बनाने पर जोर देना होगा. जल्दी खराब होने वाले कृषि उत्पादों की शेल्फ लाइफ बढ़ाने की दिशा में शोध होना चाहिए. जो विषय किसान ने दिए उस पर शोध होना चाहिए. कोई भी समझौता ज्ञापन करते समय ध्यान दिया जाए कि जिन कंपनियों के साथ समझौता हो रहा है वह किस कीमत पर बीज व उत्पाद बेच रही हैं. केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस दिशा में आईसीएआर और कृषि विभाग को मिलकर एक साथ काम करने के निर्देश दिए.

उन्होंने किसानों से कहा कि अगर आप के साथ किसी भी तरह का धोखा हो रहा है, तो टोल- फ्री नंबर पर जरूर अपनी शिकायत दर्ज करवाइएगा. आधिकारिक तौर पर टोल फ्री नंबर जारी किया जाएगा. किसान भाइयोंबहनों के साथ धोखाधड़ी बिल्कुल बर्दाश्त नहीं की जाएगी. किसी ने भी अमानक उर्वरक या बीज बनाया तो सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी. उन्होंने कहा कि 30 हजार बायोस्टिमुलेंट बेचे जा रहे थे. जिस के संबंध में सख्ती से कदम उठाया गया है. मैंने सारे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों को चिट्ठी लिख कर इस संबंध में उचित कार्रवाई के लिए भी कहा है. किसी भी किसान को गैर उपयोगी उत्पाद खरीदने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. जिस प्रकार से जन औषधि केंद्रों के रूप में सस्ती दवाइयों की दुकान हैं, वैसे ही सस्ते उर्वरकों के लिए भी केंद्र या दुकान खोलने पर विचार किया जा सकता है.

अंत में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वैज्ञानिकों से आह्वान करते हुए कहा कि आईसीएआर के स्थापना दिवस के इस अवसर पर किसान कल्याण के लिए समर्पित हो कर काम करने का संकल्प लें. मैं जानता हूं कि वैज्ञानिक आजीविका निर्वाह के लिए नौकरी नहीं करते, वैज्ञानिक का जीवन यज्ञ के समान है, जिस में सबकी सेवा का भाव निहित रहता है. मुझे विश्वास है कि आप अपनी क्षमता का पूरा उपयोग करते हुए विकसित भारत के निर्माण में अहम योगदान करेंगे. एक बार और पूरी आईसीएआर की टीम को बहुतबहुत बधाई.

हमारा लक्ष्य सिर्फ देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के लिए अन्न उपलब्ध करवाना है

Shivraj Singh Chauhan : केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पिछले दिनों नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय कृषि विज्ञान परिसर के भारत रत्न सी. सुब्रमण्यम सभागार में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की 96वीं वार्षिक आम बैठक की अध्यक्षता की.

इस बैठक में 18 से ज्यादा केंद्रीय एवं राज्य मंत्री शामिल रहे. इस बैठक में आईसीएआर के महानिदेशक डा. एमएल जाट ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के वार्षिक प्रतिवेदन 2024-2025 का संकल्प पढ़ा. इस बैठक में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की सालाना रिपोर्ट 2024-25 जारी की गई. साथ ही, कृषि एवं प्रौद्योगिकी संबंधित चार पुस्तकों का विमोचन भी किया गया.

इस के बाद सभी मंत्रियों ने बैठक को संबोधित किया, जिस में उन्होंने भारत के खाद्यान्न उत्पादन में बढ़ोतरी और कृषि क्षेत्र में तेजी से हो रही प्रगति को ले कर खुशी जाहिर की. इस बैठक में सभी मंत्रियों ने भविष्य में खेती और किसान समृद्धि की दिशा में एक जुट हो कर सार्थक प्रयास करने की प्रतिबद्धता भी जताई. इस बैठक में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने फसल औषधि केंद्र के विचार को आगे बढ़ाने की भी बात की. साथ ही, विभिन्न राज्यों के मंत्रियों से महत्त्वपूर्ण योजनाओं को जारी रखने और महत्त्वहीन योजनाओं को खत्म करने और नई योजनाओं के शुरू होने को ले कर सुझाव भी आमंत्रित किए. केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि योजनाओं का वास्तविक लाभ किसानों को मिल रहा है या नहीं, इस की पहचान करना बेहद जरूरी है.

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि कृषि राज्य का विषय है, राज्य सरकारों के सहयोग के बिना कृषि की उन्नति के प्रयास अधूरे हैं. केंद्र और राज्यों को मिल कर कृषि क्षेत्र के लिए कार्य करना होगा. उन्होंने कहा एक समय था जब हमें निम्न गुणवत्ता वाला गेहूं अमेरिका से आयात कर के खाना पड़ता था. भारत के बारे में यह छवि थी कि हम कभी खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर नहीं बन सकते. लेकिन आज यह छवि और मिथक पूरी तरह से मिट गई है. खाद्यान्न के मामले में भारत रिकौर्ड कायम कर रहा है. अन्न के भंडार भर रहे हैं. खाद्यान्न उत्पादन में रिकौर्ड स्तर पर वृद्धि दर्ज की गई है. आज हम कृषि उत्पाद निर्यात कर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि हमारी उपलब्धियां अभिनंदनीय हैं, जिस के लिए सभी वैज्ञानिकों और आईसीएआर की टीम को बधाई देता हूं. लेकिन उपलब्धियों के साथसाथ कुछ चुनौतियां भी हैं, जिस दिशा में हमें काम करना होगा. उन्होंने कहा कि विकसित कृषि संकल्प अभियान में जो सुझाव व बातें उभर कर आई हैं, उसी के आधार पर आगे का रास्ता तय होगा. राज्य के हिसाब से भावी अनुसंधान के रास्ते तय करने होंगे. मांग आधारित अनुसंधान की जरूरत है. सिर्फ कागजी औपचारिकता के लिए अनुसंधान नहीं, बल्कि किसानों की उपयोगिता को देखते हुए अनुसंधान किए जाने चाहिए.

उन्होंने आगे कहा कि सोयाबीन, दलहन, तिलहन में अभी और अधिक शोध व काम की जरूरत है. गेहूं, चावल, मक्के के साथसाथ दलहन, तिलहन व अन्य फसलों के उत्पादन में वृद्धि को ले कर तेजी से प्रयास करने होंगे. जिस के लिए राज्यवार व फसलवार कार्य योजना बनाई जाएगी. उन्होंने कहा कि कल मैं ने मध्य प्रदेश में सोयाबीन की खेती का निरीक्षण किया. जहां खराब बीज की गंभीर समस्या देखने को मिली. खराब बीज के कारण अकुंरण ही नहीं हो पाया था. जिस के बारे में मैं ने तुरंत जांच के आदेश दे दिए हैं. अमानक बीज, खाद और उर्वरक बेहद गंभीर विषय है, जिसे ले कर भी सरकार जल्द ही कड़ा कानूनी प्रावधान लाएगी. उर्वरकों के एमआरपी पर भी काम करने की जरूरत है. उर्वरक की सही कीमत तय होनी बहुत जरूरी है.

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि फसलवार बैठकों का क्रम शुरू किया जा चुका है. सोयाबीन पर मध्य प्रदेश के इंदौर में बड़ी बैठक की गई है. आगे अब कपास, गन्ने व अन्य फसलों को लेकर भी विशेष बैठकें की जाएगी. आने वाली 11 जुलाई को कोयंबटूर में कपास को ले कर सम्मेलन करेंगे. कपास मिशन को उपयोगी बनाने पर विचार करेंगे. एकएक फसल पर राज्य की जरूरतों, जलवायु अनुकूलता और किसानों की आवश्यकताओं के अनुसार विस्तारपूर्वक चर्चा की जाएगी और उचित समाधान के साथ उत्पादन बढ़ोतरी पर काम होगा.

उन्होंने आगे वैज्ञानिकों से आह्वान करते हुए कहा कि प्रौद्योगिकी के और बेहतर इस्तेमाल के साथ किसानों की मांग के अनुरूप और आधुनिक खेती के उपकरण बनाने की दिशा में प्रयास करें. हाल ही के एक अनुभव का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि एक किसान द्वारा ऐसे उपकरण बनाने की मांग की गई थी, जो उर्वरकता की जांच कर सके. ऐसा उपकरण जो बता सके कि तय मापदंड के अनुसार उर्वरक की गुणवत्ता सही है या नहीं, उर्वरक उपयोगी है या नहीं. ऐसे ही कई विचार किसानों से चर्चा के दौरान सामने आते हैं, जिसे आधार बनाकर शोध की दिशा तय की जा सकती है. उन्होंने कहा कि लैब और संस्थानों का सैद्धांतिक ज्ञान जब व्यावहारिक स्वरूप में किसानों तक पहुंचेगा, तभी सही मायने में शोध की सार्थकता सिद्ध होगी.

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि रबी की फसल से पहले राज्यों के साथ मिल कर फिर से ‘विकसित कृषि संकल्प अभियान’ के जरीए किसानों तक विज्ञान को ले जाने की कोशिश होगी. रबी सम्मेलन दो दिन का होगा. पहले दिन रूपरेखा तय होगी, दूसरे दिन राज्यों के कृषि मंत्री तय रूपरेखा को अनुमोदित करते हुए अंतिम कार्य योजना को रूप देंगे. भारत की माटी की उर्वरक क्षमता अतुलनीय है. मुझे यकीन है कि भारत देश के लिए भी और दुनिया के लिए भी अन्न की उपज करेगा और दुनिया का फूड बास्केट बनेगा.

उन्होंने आगे कहा कि विकसित भारत के लिए विकसित खेती और समृद्ध किसान जरूरी है. जिस के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी. उन्होंने कहा कि मैं स्वयं खेतों में जा कर किसानों से मिल कर खेती को जमीनी स्तर पर समझने की कोशिश कर रहा हूं. कश्मीर के सेब हो, केसर हो, उत्तर प्रदेश का गन्ना या कर्नाटक की सुपारी हो, मैं सब जगह जा कर खेती को नजदीक से समझने और भावी रणनीतियों को ले कर प्रयासरत हूं.

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि खेती मात्र एक व्यवसाय नहीं देश की सेवा है. हमें भारत की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करनी है. 144 करोड़ आबादी के लिए खाद्यान्न सुरक्षा के साथसाथ पोषणयुक्त आहार उपलब्ध करवाना है, आने वाली पीढ़ी के लिए धरती को सुरक्षित रखना है, हमारा लक्ष्य सिर्फ देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के लिए भी अन्न की उपलब्धता करवाना है. उन्होंने कहा कि वर्तमान में भौतिक प्रगति की चाह में दुनिया के कई देश ऐसे कदम उठा रहे है, जिस से प्रकृति को नुकसान हो रहा है. लेकिन हमें ऐसा मार्ग चुनना है जो प्रकृति को नुकसान पहुंचाए बिना, विकास की दिशा तय करे.

अंत में शिवराज सिंह ने वैज्ञानिकों से कहा कि आप बेहतर काम कर रहे हैं, जिस के लिए बधाई के पात्र हैं. लेकिन उपलब्धियों के साथसाथ चुनौतियों पर भी काम करना होगा. मेरा आह्वान है कि आगे की शोध की रूपरेखा चुनौतियों और उन के समाधान को ध्यान में रखते हुए तय कर, बढ़ते रहें और कृषि क्षेत्र में नई सफलताएं हासिल करते रहें.

Animal Health : पशु स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन

Animal Health : भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा संचालित विकसित कृषि संकल्प अभियान के अंतर्गत भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (भा.कृ.अनु.प.)-केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान, अविकानगर द्वारा 05 जून, 2025 को टोंक जिले की मालपुरा तहसील के गरजेड़ा, पिपल्या एवं चांदसेन गांवों में किसान संगोष्ठी एवं पशु स्वास्थ्य शिविरों का सफल आयोजन किया गया.

जिन में कुल 364 किसानों में से 241 पुरूष एवं 123 महिला किसानों ने सक्रिय रूप से भाग लिया और वैज्ञानिकों से सीधी बातचीत की. इस अवसर पर संस्थान के निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर, अभियान के नोडल अधिकारी डा. एलआर गुर्जर सहित संस्थान के वैज्ञानिकों ने विभिन्न विषयों पर किसानों का मार्गदर्शन किया.

इन शिविरों में प्राकृतिक खेती के साथ जीवामृत बना कर भूमि को कैसे सुधार सकते हैं, जैविक कीटनाशक, मृदा स्वास्थ्य, बीजोपचार, जल प्रबंधन व सुक्ष्म सिंचाई, डिजिटल कृषि, पशुओं में होने वाली प्रजनन समस्याएं, पशु आहार और सरकारी योजनाओं की जानकारी जैसे विषयों पर चर्चा की गई. साथ ही, बीमार पशुओं की जांच व उपचार भी किया गया.

इस कार्यक्रम के दौरान किसानों ने अपने अनुभव साझा करते हुए कई अहम समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित किया. जिन में प्रमुख रूप से शामिल हैं टोंक जिले में घटती दलहनी फसलें, ऊसर भूमि एवं खारे पानी की समस्या, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर फसल की खरीद में देरी, नकली एवं महंगे उर्वरक, प्रमाणित बीजों की कमी, पशु चिकित्सा सेवाओं का अभाव, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में मुआवजे की अनुचित कटौती, मुआवजा प्राप्ति की समय सीमा तय किए जाने की आवश्यकता समेत किसानों ने सरकार से इन समस्याओं के शीघ्र समाधान के लिए जरूरी कदम उठाने की मांग की. इसी कड़ी में ग्राम गरजेड़ा में रात्रि चौपाल का आयोजन किया गया, जिस में संस्थान के वैज्ञानिकों ने ग्रामीणों से सीधे बातचीत कर उन की समस्याएं सुनीं और समाधान के लिए आगे की रणनीति पर विचारविमर्श किया.

इस अभियान के अंतर्गत नागौर जिले की मेड़ता सिटी तहसील के ग्राम मोकलपुर में 5 जून, 2025 को किसान संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि कैबिनेट मंत्री, जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी एवं भूजल विभाग राजस्थान सरकार, कन्हैया लाल चौधरी, किसान आयोग अध्यक्ष, सीआर चौधरी, समन्वयक विकसित कृषि संकल्प अभियान, राजस्थान, डा. अरुण कुमार तोमर, स्थानीय विधायक, जिला प्रमुख एवं उपजिला प्रमुख सहित अन्य जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे.

इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में किसानों ने भाग लिया. साथ ही, अभियान के अंतर्गत डूंगरपुर  एवं दौसा जिलों में भी कृषि विज्ञान केंद्र की टीमों के साथ मिल कर केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान अविकानगर द्वारा डूंगरपुर जिले के 6 गांव (आंतरी, पाड़ला मोरु, डोजा, गोड़ा फला, आरा व सूखा पादर) से कुल 949 प्रतिभागी शामिल हुए. दौसा जिले के 3 गांव (ठिकरिया, हापावास व थूमड़ी) से 694 प्रतिभागी उपस्थित रहे. दोनों जिलों से कुल 1,550 किसान (615 महिलाएं, 935 पुरुष) व 93 अन्य मिला कर कुल 1,643 प्रतिभागियों ने भाग लिया.

Horticultural : लाखों किसानों तक पहुंचा भारतीय बागबानी अनुसंधान संस्थान 

Horticultural : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने कृषि और किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार के सहयोग से आईसीएआर संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों, केवीके और राज्य सरकार के विभागों को शामिल करते हुए 29 मई से 12 जून, 2025 तक ‘विकसित कृषि संकल्प अभियान’ के नाम से देश भर में बड़े पैमाने पर खरीफ पूर्व अभियान शुरू किया है. पिछले दस दिनों में 1,896 टीमों ने 8,188 गांवों में 8,95,944 किसानों के साथ बातचीत की है.

कर्नाटक में भी वैज्ञानिकों, कृषि और संबद्ध विभाग के अधिकारियों की 70 से अधिक टीम   किसानों के खेतों का दौरा कर रही हैं. दैनिक आधार पर किसानों के साथ बातचीत कर रही हैं और कृषि क्षेत्र के विकास के लिए मांग आधारित और समस्या उन्मुख अनुसंधान कार्यक्रम विकसित करने के लिए किसानों से फीडबैक ले रही हैं. अब तक 639 टीमों ने 2,495 गांवों का दौरा किया है और 2,77,264 किसानों के साथ बातचीत की है.

दिनांक 5 सितंबर, 1967 को स्थापित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (भा.कृ.अ.प.)- भारतीय बागबानी अनुसंधान संस्थान (भा.कृ.अ.प – भा.बा.अ.सं.), भा.कृ.अ.प. का शीर्ष रैंकिंग वाला संस्थान है. स्थायी बागबानी विकास को प्राप्त करने के मिशन के साथ, संस्थान ने सालों से कई चुनौतियों का सामना करने के बावजूद, आजीविका सुरक्षा, आर्थिक विकास और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. बीते छह दशकों से, भा.कृ.अ.प – भा.बा.अ.सं. ने फलों, सब्जियों, सजावटी पौधों, औषधीय और सुगंधित पौधों और मशरूम पर व्यापक शोध किया है.

जिस का परिणाम 327 किस्में/संकर और 154 प्रौद्योगिकियां के रूप में हमारे सामने है. संस्थान में विकसित उन्नत और तनाव सहनशील किस्मों/संकरों में फल फसलें (38), सब्जी फसलें (149) और फूल और औषधीय फसलें (140) शामिल हैं, जो आज पूरे देश में फैल गई हैं. अब तक संस्थान ने 130 तकनीकें विकसित की हैं, 675 ग्राहकों को 1,550 लाइसेंस दिए गए हैं.

8 जून, 2025 को भा.कृ.अ.प – भा.बा.अ.सं., बेंगलुरु में आयोजित विकसित कृषि संकल्प अभियान कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कर्नाटक के लगभग 500 किसानों को संबोधित किया और उन से कर्नाटक से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर बातचीत भी की.

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने संबोधन में किसानों के लिए समर्पित योजनाओं और कार्यक्रमों का जिक्र किया. इस के अलावा उन्होंने किसानों की प्रतिक्रिया जानने के लिए किसानों के खेतों का दौरा किया और कर्नाटक में स्थित आईसीएआर संस्थानों द्वारा प्रौद्योगिकी प्रदर्शन भी देखा.

राजस्थान में विकसित कृषि (Agriculture) संकल्प अभियान का आगाज

Agriculture: देश भर में पखवार तक चलने वाले कृषि अभियान के तहत राजस्थान प्रदेश में 29 मई से 12 जून तक विकसित कृषि संकल्प अभियान के अंतर्गत हर गांव, हर खेत के किसान से कृषि वैज्ञानिक रूबरू होंगे और खरीफ में अधिकाधिक लाभ मुहैया कराया जाएगा. केंद्र सरकार की पहल पर कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (डीआरई), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) एवं कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के संयुक्त प्रयासों से देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 29 मई से लगातार 15 दिन तक इस अभियान की धमक गुंजारित होगी.

राजस्थान में अभियान की कमान डा. जेपी मिश्रा निदेशक आईसीएआर अटारी जोधपुर को सौंपी गई है. इस अभियान में दूरदराज के प्रवासी गांवों का लक्षित किया गया है. जिन में आदिवासी और खास कर भौगोलिक रूप से चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में जा कर कृषि वैज्ञानिक क्षेत्रीय खरीफ फसलों से जुड़ी आधुनिक तकनीकों, मृदा स्वास्थ्य कार्ड के उपयोग, विभिन्न सरकारी योजनाओं, नीतियों एवं कृषि में नवाचारों की जानकारी किसानों को बताएंगे.

महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, उदयपुर के कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने यह जानकारी देते हुए बताया कि मेवाड़ बागड़ संभाग में अभियान का आगाज प्रसार शिक्षा निदेशालय के अधीन कृषि विज्ञान केंद्र बांसवाड़ा, भीलवाड़ा प्रथम – द्वितीय, चित्तौड़गढ़, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, राजसमंद एवं वलभ्भनगर के अलावा केवीके बड़गांव की टीमें प्रभावी भूमिका निभाएंगी.

सभी केवीके को 126 ब्लौक के 550 गांवों को कवर करने का लक्ष्य दिया गया है. अभियान के तहत कृषि वैज्ञानिकों की टीमें किसानों से सीधा संवाद करेंगी ताकि, खाद्यान उत्पादन में वृद्धि के साथसाथ गुणवत्ता पर भी ध्यान दिया जा सके. इस अभियान के आगाज के मौके पर गुरूवार को प्रसार शिक्षा निदेशालय के अधीन 9 केवीके के माध्यम से विविध कार्यक्रम भी आयोजित होंगे.

अभियान में इन बिंदुओं पर रहेगा फोकस:

– प्रमुख खरीफ फसलों की आधुनिक कृषि पद्धतियों के बारे में किसानों के बीच जागरूकता पैदा करना.

– किसानों के लिए लाभकारी विभिन्न सरकारी योजनाओं और नीतियों के बारे में जानकारी का प्रचार करना.

– सूक्ष्म पोषक तत्वों सहित उर्वरकों के संतुलित उपयेाग के लिए किसानों द्वारा उचित निर्णय लेने के लिए मृदा स्वास्थ्य कार्ड के उपयोग का प्रचार करना.

– रासायनिक उर्वरकों के विवेकपूर्ण और उचित उपयोग के बारे में जागरूकता फैलाना.

– जमीनी स्तर पर नावाचारों के बारे में किसानों से प्रतिक्रिया एकत्र करना और उस के अनुसार अनुसंधान प्राथमिकताओं को संरेखित करना.

प्रसार शिक्षा निदेशक डा. आरएल सोनी ने बताया कि अभियान के दौरान विश्वविद्यालय के वरिष्ठ वैज्ञानिक टिकाऊ खेती में मृदा प्रबंधन, खरीफ फसलों की उन्नत किस्मों की जानकारी, उत्पादन तकनीक, आजीविका सुरक्षा के लिए फसल विविधीकरण आदि विषयों पर व्याख्यान देंगे. इस मौके पर प्रसार शिक्षा निदेशालय की ओर से ‘विकसित कृषि संकल्प अभियान’ प्री खरीफ अभियान को रेखांकित एक मार्गदर्शिका का प्रकाशन किया गया है. इस अभियान के दौरान किसानों को उक्त मार्गदर्शिका का वितरण भी किया जाएगा.