Livestock. हमारे घरआंगन, खेत में उगने वाले कुछ खरपतवार भी ऐसे हैं, जो पशुओं की बीमारी में काम आते हैं. भले ही बढ़ती आधुनिक तकनीकों के सामने वे फीके पड़ गए, लेकिन हमारे बुजुर्गों ने इन्हीं मुफ्त की दवाओं से पशुओं की अनेक नस्लों को आने वाली पीढ़ी के लिए बचा कर रखा. ये वे हैं जो पशुओं के साथ इनसान के लिए कारगर साबित होते हैं. आइए जानें इनके बारे में:
फरास की लकड़ी : आज भले ही इस का वजूद खत्म होने की कगार पर हो, लेकिन इस की खासीयत को नकारा नहीं जा सकता. लकड़ी के फ्रेम बनाने में इस्तेमाल होने वाली इस की लकड़ी जिस खेत की मेंड़ पर होती है, वहां पाला नहीं आता. यह खारे पानी में मौजूद कार्बन और मोनो आक्साइड को खत्म करती है. इस का इस्तेमाल पशुओं के दूध को बढ़ाने में किया जाता है.
सहजन:
यह औषधि जितनी जानवर के लिए फायदेमंद है, उतनी ही इनसान के लिए भी फायदेमंद है. इस का इस्तेमाल गठिया बीमारी को दूर करने में किया जाता है. गैस बनने पर इस के मुरब्बे का इस्तेमाल किया जाता है. इस के पत्ते पशुओं को दवा के रूप में इन्हीं बीमारियों के लिए दिए जाते हैं.
झरबेरिया :
बेकार दिखने वाली इस झाड़ी पर पोषक और जायकेदार छोटे बेर लगते हैं. जंगलों के साथ इस की भी संख्या लगातार घट रही है. कुछ इलाकों में इसे आज भी
पशुओं के चारे में इस्तेमाल किया जाता है, खासतौर से राजस्थान में. इस के इस्तेमाल से पशुओं की दूध देने की कूवत में इजाफा होता है और घी में खुशबू भी अच्छी आती है. इस के अलावा यह पशुओं को कई बीमारियों से भी बचाता है.
वन मेथी :
यह जानवरों का दूध बढ़ाने में इस्तेमाल होती है. कीटनाशक गुण होने के कारण बच्चों के पेट में कीड़े होने पर गुदा मुख पर इसे लगाया जाता है. इस का रायता पीने से गैस खत्म होती है. इस के नीचे सांप नहीं आता है. अगर आ भी जाए तो वह इस पौधे के दायरे में आने पर बेकार हो जाता है. इस का इस्तेमाल मिरगी बीमारी में भी किया जाता है.
चंद्रसूर :
इस का इस्तेमाल बहुत पुराना गठिया रोकने और महिला व मादा पशुओं में दूध कम उतरने की समस्या को कम करने के काम में आता है. यह क्षारीय जमीन में होता है.
दूब घास :
यह एंटी वायरल, एंटी बैक्टीरियल व एंटी सेप्टिक होती है. इस के रस से बच्चों की नकसीर व महिलओं की प्रदर की बीमारी दूर होती है. पशुओं का यह प्रिय भोजन इसलिए है, क्योंकि इस से उन्हें पर्याप्त ताकत और बीमारी से लड़ने की ताकत मिलती है.
ओंगा :
इस को लटजीरा के नाम से भी जाना जाता है. यह एंटी एलर्जिक, एंटी सेप्टिक व एंटी वायरल गुणों वाला होता है. इस को चारे के रूप में खिलाने से पशुओं की आधी बीमारी खत्म हो जाती हैं. हड्डी टूटने पर इस के पत्तों को घी के साथ छौंक कर के पशुओं को खिलाया जाता था. इस की जड़ बहुत काम की होती है. लोग इस की दातुन भी करते हैं.
तमाल :
इसे पसैंदू के नाम से भी जाना जाता है. खुरपका, मुंहपका में इस के पके फलों को घाव पर बांधा जाता है. फलों को पानी में उबाल कर घाव को धोते हैं. इस के नीचे बच्चों को नहलाने से त्वचा रोग दूर होते हैं. ज्यादा पानी वाले इलाकों में पैरों की उंगलियां गलने की बीमारी दूर करने में इस का इस्तेमाल होता है. बरसात के दिनों में इस के पत्तों को उबाल कर खुरपका बीमारी को दूर करते हैं.
इन सभी देशी दवाओं के अलावा पशुओं के शारीरिक विकास के लिए उन्हें समयसमय पर कुछ जरूरी पोषक तत्त्व भी देते रहना चाहिए. आमतौर पर हरे चारे में 1-2 फीसदी तक खनिज तत्त्व पाए जाते हैं, जबकि सूखे चारे में आधा से एक फीसदी और मीट के चूर्ण में 6-7 फीसदी खनिज तत्त्व पाए जाते हैं. खनिज तत्त्वों की कमी वाले इलाकों में सही मात्रा में खनिज तत्त्वों को दे कर इन की उपलब्धता को बढ़ाया जा सकता है.
यह अच्छा रहेगा कि खनिज मिश्रण बाजार से खरीद कर पशुओं को खिलाएं और आईएसआई संस्था द्वारा प्रमाणित खनिज मिश्रण ही खरीदें. बहुत सी प्राइवेट कंपनियां भी खनिज मिश्रण बना कर बेचती हैं जैसे कैडिला, रैनबैक्सी, फाइजर टेंटाफार्म, कांसेप्ट वगैरह.
पशुओं को रातिब मिश्रण भी देना चाहिए. अगर रातिब मिश्रण दिया जा रहा हो तब सौ किलो रातिब मिश्रण में 1-2 किलो खनिज मिश्रण व एक किलो साधारण नमक मिला कर पशुओं को खिलाएं.
आज हम हर काम के लिए दूसरों पर निर्भर हो गए हैं. किसान भी अब अपने पशुओं से दूर होते जा रहे हैं, नहीं तो घर या आसपास ही ऐसी तमाम चीजें होती हैं, जिन से पशुओं की कई छोटीमोटी बीमारियों को ठीक किया जा सकता है.





