Traditional Indian Fruit. देश के अलगअलग इलाकों में जंगली वनस्पतियों के फल बड़े चाव से खाए जाते हैं. बहुत पहले से ही लोग कुछ स्थानीय फलों को सुखा कर मेवे के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं. पिछले कुछ समय से इन कुदरती वन, फलों की खेती भी शुरू हुई है. ऐसा ही एक पेड़ है ‘पीलू’.
रेगिस्तानी इलाकों में खासकर पश्चिमी राजस्थान में बड़े पैमाने पर पाया जाने वाला ‘पीलू’, झाल, झालकी, के नाम से भी जाना जाता है.
फल चुनना और सुखाना
मारवाड़ में खारी जमीन के किसान माखनदास बताते हैं कि खारी झाल के फल बिलकुल महीन और चटपरेचरखे हैं, जबकि मीठी झाल के पीलू सूखने पर कालीमिर्च के दाने जैसे दिखते हैं. ताजा पीलू और सूखे पीलू बड़े चाव से खाए जाते हैं. खास कर पाली, जालोर इलाके में किसान कई क्विंटल पीलू सुखा कर कमाई करते हैं. सूखे फलों को ‘कोकड़ी’ भी कहा जाता है.
जानें ये बातें
पीलू के पेड़ की जड़ों से निकलने वाले नए पौधे और बीजों से उगे नए पौधे भी मातृ पेड़ के चारों ओर फैलते हुए झुरमुट सा बना देते हैं. हलका सा हरापन लिए हुए सफेद फूलों का गुच्छा मार्चअप्रैल में फूलता है. इन दिनों मधुमक्खियों की तादाद बढ़ाने के लिए गुड़पानी भरे बरतन बांध कर रखने चाहिए ताकि ज्योंज्यों पुष्प खिलते रहें, त्योंत्यों मधुमक्खियां सब का परागण करती रहें. इस से ज्यादातर फूल फल बन सकेंगे. इन के फल मईजून महीने में तैयार होते हैं, जो उन दिनों की गरमी और जलवायु पर निर्भर करता है. अधिकतर पेड़ों पर 10-12 दिन ही ज्यादा फूल खिल कर फल बनते हैं.
और भी हैं खासीयतें
काजरी के वनस्पति विज्ञानी डा. जेसी तिवारी के मुताबिक यह एक बड़े काम की वनस्पति है, जो सदाबहार, ऐंठनदार मुड़ी हुई, झाड़ीनुमा, सूखारोधी और लवणीयता सहन करने वाली फलदार वनसंपदा है. खाने वाले फलों के साथ ही अखाद्य तेल, पशु आहार की खल और ऊंट के लिए पत्तीदार चारा मिलता है, तो रेगिस्तान के प्रसार को रोकने में ‘विंड ब्रेक’ व ब्रांड के रूप में भी यह काम आ सकता है.
अब इस के तेल के मेडिसिनल उपयोग होने लगे हैं. औद्योगिक तौर पर इस के बीजों में 40-45 फीसदी अखाद्य तेल मिलता है. साल 1996 तक पंजाब, हरियाणा, गुजरात, उत्तर प्रदेश समेत राजस्थान से सालाना 47 हजार टन फल इकट्ठा किए जाते थे, जिस से लगभग 15 हजार टन तेल निकाला जाता था. इसी के चलते गुजरात में इसे सामाजिक वानिकी कार्यक्रम में शामिल किया जा चुका है.
देशी किस्में:
फिलहाल स्थानीय किस्में ही बोई जाती हैं, जो कि सूखारोधी और पालारोधी हैं. क्षार व लवणीय मिट्टी यहां तक कि बलुई रेगिस्तान से समुद्रतट तक कहीं पर भी यह पनप जाता है.
पौध तैयारी :
बीज या रूट सकर्स द्वारा पौलिथीन बैग में बरसाती दिनों में पौध तैयार की जाती है. शुरू में बढ़वार बहुत धीमी होने के कारण नर्सरी में सिंचाई करते रहना चाहिए.
पौध रोपण :
खेतों की मेंड़ों पर या कतार में एक साल के पौधे 60×60×60 घन सेंटीमीटर के गड्ढों में रोपे जाते हैं. पौध से पौध की दूरी 5 मीटर रखनी पड़ती है. सूखे इलाकों में मूंग, मोठ, ग्वार, बाजारा व अन्य घास बीजों की खेती इंटरक्रौप के रूप में बोई जाए तो अच्छा लाभ लिया जा सकता है.
खाद व उर्वरक :
इस की जड़ें खुद इतनी मजबूत व गहरी फैली होती हैं कि अलग से खाद की जरूरत नहीं पड़ती, फिर भी जैविक खाद दे सकते हैं.
फसल सुरक्षा :
दीमक से बचाव के लिए बीएचसी डस्ट 50 ग्राम प्रति गड्ढा या डोर्मेट काम लिया जाता है, लेकिन बायोपेसटीसाइड व नीम खली, देशी कीटनाशक ही काम में लें. पत्तियों पर फफूंद लगने पर फंगीसाइड हर्बल स्प्रे किया जाना चाहिए, वैसे पेड़ में कीट व बीमारियों से लड़ने की अच्छी ताकत होती है.
पैदावार :
6-7 साल पुराने एक पेड़ से मईजून में औसतन 5-10 किलो फल मिलते हैं, लेकिन उपज वास्तव में जमीन और देखरेख पर निर्भर करती है. Traditional Indian Fruit





