Cereals. ऊगल या कूटू या फाफर को अंगरेजी में बकह्वीट के नाम से जाना जाता है. भारत में आमतौर पर इस की खेती हिमालय के ऊंचे इलाकों में की जाती है. पौष्टिकता के हिसाब से यह एक खास फसल है.
ऊगल के आटे से रोटी, हलवा, पकौड़े व अन्य पकवान तैयार किए जाते हैं. इस की पत्तियां हरी सब्जी के काम में आती हैं. ऊगल के पौधे से पशुओं के लिए चारा भी मिलता है.
मिट्टी का चुनाव
इस के लिए पानी निकास वाली बलुई दोमट मिट्टी अच्छी रहती है, जिस का पीएच मान 5.5 से 6.5 के बीच होता है. रेतीली मिट्टी में भी इस की खेती आराम से की जा सकती है.
उन्नतशील किस्में
वीएल ऊगल-7 : यह 70 से 80 दिन में पकने वाली किस्म है और मध्य ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाकों के लिए अच्छी है. इस का दाना मोटा व मीठा होता है. इस की उत्पादन क्षमता 750 से 1000 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है.
पीआरवी 9001: ऊगल की यह किस्म पकने में 90 से 100 दिन का समय लेती है. इस की उत्पादन क्षमता 1000 से 1250 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है.
खेत की तैयारी
खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और 2-3 जुताई देशी हल से करनी चाहिए. इस के बाद पाटा लगा कर खेत समतल कर के तैयार कर लिया जाता है.
बीज और बोआई : एक हेक्टेयर खेत के लिए 35-40 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है. आमतौर पर ऊगल की बोआई छिटकवां विधि से की जाती है, पर यह वैज्ञानिक विधि नहीं है. इसलिए इसे कतारों में बोने की सलाह दी जाती है.
बोआई का समय
इलाके के हिसाब से इस की बोआई का समय अलगअलग है.
– उत्तरीपश्चिमी इलाकों में मध्य जून से जुलाई
– उत्तरीपूर्वी पहाडि़यों पर अगस्त से सितंबर
– नीलगिरी की पहाडि़यों पर अप्रैल से मई महीने में बोने का उचित समय है.
कतार से कतार की दूरी 30 सेंटीमीटर और पौध से पौध की दूरी 8-10 सेंटीमीटर रखनी चाहिए. बीज उथले कोनों में 2-3 सेंटीमीटर की गहराई पर बोने चाहिए.
खाद व उर्वरक : ऊगल की अच्छी पैदावार पाने के लिए सड़ी हुई गोबर की खाद या कंपोस्ट की खाद 15-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर खेत तैयारी के समय बोआई के 20 दिन पहले खेत में मिला देनी चाहिए. साथ ही 50 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश देना चाहिए. नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बोआई के समय कूंड़ों में और नाइट्रोजन की आधी मात्रा बोआई के 30 दिन बाद खड़ी फसल में देनी चाहिए.
सिंचाई : ऊगल खरीफ की फसल है. इस की पानी की जरूरत आमतौर पर बरसात के पानी से पूरी हो जाती है. जब सूखे की स्थिति हो, तो दाने की दूधिया अवस्था में सिंचाई करें.
खरपतवार रोकथाम: बोआई के 20-25 दिन बाद पहली निराई कर के खरपतवारों को निकाल देना चाहिए. जरूरत पड़ने पर दूसरी निराई 40-45 दिन पर करें. पहली निराई के समय ही घने पौधों की छंटाई कर के बेकार पौधों को भी निकाल देना चाहिए.
ऊगल की फसल में चूर्णिल आसिता व उकठा रोग का हमला होता है.
चूर्णिल आसिता: बीमार पौधों की पत्तियों पर चूर्ण दिखाई देता है. बीमारी का असर बढ़ने पर पत्तियों, तने और फूलों पर भी सफेद चूर्ण नजर आता है. पत्तियां सूख जाती हैं और पौधे की बढ़वार रुक जाती है.
कैराथेन 80 डब्ल्यूपी नामक रसायन का 0.1 फीसदी यानी (1 ग्राम प्रति लीटर पानी) घोल का छिड़काव करना चाहिए.
उकठा बीमारी : इस के असर से पौधों की पत्तियां पीली पड़ जाती हैं तथा पूरा पौधा मुरझा कर सूख जाता है.
फफूंदीनाशक कार्बंडाजिम या थीरम की 3 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज का उपचार करना चाहिए.
कीट
अमूमन ऊगल की फसल पर कीटों का हमला नहीं होता है, पर कभीकभी माहू इस को नुकसान पहुंचाता है. ये छोटे कोमल शरीर वाले हरे रंग के कीट पत्तियों, फूल व पौधे पर समूह में चिपक कर उन का रस चूस कर फसल को नुकसान पहुंचाते हैं.
इस की रोकथाम के लिए थिमेट 20 ईसी के 0.05 फीसदी घोल का छिड़काव (1 एमएल प्रति 2 लीटर पानी) करना चाहिए.
कटाई व मड़ाई
बोआई के 100-120 दिन में ही फसल पक कर तैयार हो जाती है. दाने में नमी की मात्रा जब 20-25 फीसदी हो तब हंसिए से कटाई कर लेनी चाहिए. जब दाने सूख जाएं तो मड़ाईर् कर देनी चाहिए.





