Turmeric Cultivation: हलदी  का इस्तेमाल आमतौर पर मसाले के रूप में होता है, वहीं आदमी को खूबसूरत बनाने और दवाओं में भी इस्तेमाल किया जाता है. हलदी से बनी दवाएं घाव, चोट, मोच व दर्द वगैरह में काम आती हैं. हलदी में पाए जाने वाले ओलियोरेजिन का इस्तेमाल लकड़ी, चमड़ा, वार्निश व पेंट वगैरह बनाने में किया जाता है.

हलदी का इस्तेमाल भारत में बहुतायत होता है. दुनिया के कुल हलदी उत्पादन का लगभग 76.3 फीसदी भारत में ही होता है. इसी वजह से कुल उत्पादन का तकरीबन 92 फीसदी भाग का इस्तेमाल अपने ही देश में होता है.

हलदी खासतौर से आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, केरल वगैरह राज्यों में उगाई जा रही है. उत्तर प्रदेश में कुल उत्पादन का खास हिस्सा देवरिया में उगाया जाता है. उत्तर प्रदेश में गोरखपुर मंडल में हलदी खासतौर से उगाई जाती है.

ज्यादातर किसानों को हलदी की खेती (Turmeric Cultivation) की वैज्ञानिक जानकारी नहीं है इसलिए भरपूर पैदावार लेने के लिए इस की जानकारी होना बेहद जरूरी है, जिस से किसान ज्यादा पैदावार ले सकें.

जलवायु : हलदी के लिए गरम नम जलवायु की जरूरत होती है. मुनासिब बढ़वार और विकास के लिए 20 से 30 सैंटीग्रेड तापमान अच्छा माना जाता है. हलदी की खेती (Turmeric Cultivation) पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बागों में भी कम छायादार वाली जगहों पर की जा सकती है.

मिट्टी और खेत की तैयारी

हलदी की खेती (Turmeric Cultivation) के लिए अच्छे जल निकास वाली दोमट मिट्टी या बलुई दोमट मिट्टी बढि़या होती है लेकिन पीएच मान 5.5 से 6.5 के बीच वाली मिट्टी बढि़या मानी गई है.

खेत की तैयारी के लिए एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और 3-4 जुताइयां देशी हल से कर के पाटा लगा कर खेत को क्यारियों में बांट कर बोआई करनी चाहिए.

उन्नत प्रजातियां :

देशी, पटानी, चायना नदान, बलागा, मुनदागा, यला चागा, (सीएलएल 324), (सीएलएल 326), (सीएलएल 327), दुग्गीरैला, माइड्यूकर, अमालापुरम, अपेले, मुवाटुपझा, ईडेपालयम, सीओ 1, सीओ 2, भवानी, शिलांग, पीसीटी 2 व पीसीटी 5 वगैरह.

बोआई का समय :

हलदी की बोआई का सही समय अप्रैल माह है. देर से बोआई करने पर कंदों की मोटाई कम होती है और उपज में कमी आ जाती है.

बीज दर :

एक हेक्टेयर रकबे के लिए 20 क्विंटल बीज कंद मुनासिब हैं. कंदों के राइजोम का वजन 25 ग्राम प्रति कंद होना चाहिए.

बीज शोधन :

बीज शोधन के लिए 2 ग्राम डाइथेन एम 45 और 1 मिलीलिटर इमिडाक्लोप्रिड प्रति लिटर पानी के घोल में 30 मिनट तक डुबो कर राइजोम का उपचार करना चाहिए. उस के बाद छाया में सुखा कर बीज की बोआई करनी चाहिए.

बोआई विधि और रोपण दूरी :

बोआई के लिए 60 सैंटीमीटर की दूरी पर मेंड़ें बना ली जाती हैं. इन मेंड़ों में तकरीबन 15 से 20 सैंटीमीटर के फासले पर खुरपी की मदद से गांठें गाड़ दी जाती हैं. बोआई के लिए मातृ कंदों का इस्तेमाल किया जाता है.

बोआई के समय खेत में मुनासिब नमी होनी चाहिए. कंदों के गुच्छे से उंगलीनुमा को अलगअलग कर लेना चाहिए.

बोआई के समय कंद अंकुरित होना शुरू कर दें तो अंकुरण पर बुरा असर पड़ता है. लेकिन बड़े अंकुरों के टूट जाने पर अंकुरण पर उलटा असर पड़ता है इसलिए यह जरूरी है कि कंदों के अंकुरण की शुरुआत में ही बोआई करनी चाहिए. बोआई के फौरन बाद मेंड़ों पर कार्बनिक पलवार जरूर बिछा देनी चाहिए ताकि खेत में नमी बनी रहे और अंकुरण जल्दी हो जाए.

खाद और उर्वरक की मात्रा :

खेत की तैयारी के समय 250 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद को खेत में मिला देना चाहिए. बोआई से 15 दिन पहले खेत में 250 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से नीम की खली डालनी चाहिए. हलदी की अच्छी पैदावार लेने के लिए 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 80 किलोग्राम फास्फोरस और 120 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से देनी चाहिए. नाइट्रोजन की आधी मात्रा बोआई के समय दें और बाकी बची नाइट्रोजन की मात्रा को 2 बराबर हिस्सों में बांट कर 2 बार यानी बोआई के 30-40 दिन बाद और 60 से 80 दिन बाद टौप डै्रसिंग के दौरान देनी चाहिए.

सिंचाई :

गरमियों में बारिश के बाद कंदों के बढ़वार के समय 10-15 दिन के फासले पर जरूरत के मुताबिक सिंचाई करनी चाहिए. खेत में 50-75 फीसदी नमी होने पर सिंचाई करना फायदेमंद होता है.

निराईगुड़ाई और मिट्टी चढ़ाना :

पौधों से अच्छी बढ़वार हासिल करने के लिए 2-3 निराईगुड़ाई कर के खरपतवारों को निकाल देना चाहिए. इस की फसल में पौधों में मिट्टी चढ़ाना भी एक जरूरी काम है. इस के लिए बोआई के 4 महीने बाद पौधों में मिट्टी चढ़ाने का काम करना चाहिए. दूसरी बार मिट्टी चढ़ाने का काम कंदों को ढकने के लिए करना चाहिए.

पलवार प्रबंधन :

फसल रोपने के फौरन बाद पलवार बिछानी चाहिए. इस के लिए 150 से 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से हरी पत्तियों का इस्तेमाल किया जाता है. पलवार बिछाने से मिट्टी की नमी ज्यादा समय तक बनी रहती है और प्रकंदों का फुटाव अच्छा होता है. पत्तियों की 4 से 6 सैंटीमीटर मोटी तह बिछानी चाहिए.

खुदाई :

हलदी की खुदाई आमतौर पर बोआई के 8-9 महीने बाद करनी चाहिए. खुदाई का काम जनवरी माह से शुरू कर के फरवरी माह तक कर लेना चाहिए. अक्तूबर माह से फसल की पत्तियां पीली पड़ना या सूखना शुरू कर देती हैं. पत्तियां जब सूख कर गिरने लगें तब खुदाई की जा सकती है.

खुदाई से पहले पौधों को जमीन की सतह से काट लेना चाहिए. खेत में हलकी सिंचाई करनी चाहिए. ओट आने पर फसल की खुदाई करनी चाहिए. खुदाई के बाद कंदों को भलीभांति छांट कर और पानी में धो कर साफ कर लेना चाहिए.

उपज :

प्रति हेक्टेयर 200 से 250 क्विंटल कच्ची हलदी और 40 से 50 क्विंटल सूखी हलदी मिलती है.

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