Rajasthan Soil. राजस्थान ही इकलौता ऐसा राज्य है जहां टिब्बेदार बलुई मिट्टी, भूरी दोमट, लाल दोमट, काली मिट्टी और पहाड़ी मिट्टी मिलती है. अलगअलग तरह की मिट्टियों के बनने में मौसम का अहम रोल रहा है. यहां हम राजस्थान के अलगअलग हिस्सों में फैली मिट्टी के बारे में बता रहे हैं:

अरावली की शुष्क मिट्टी

अरावली के पश्चिमउत्तर इलाके में धरती रेतीले मैदानों और रेतीले टिब्बों से ढकी है. यहां का मौसम गरम है. उत्तरी व पश्चिमी राजस्थान में 2 सौ से 4 सौ मिलीमीटर व सुदूर पश्चिमी सीमा पर सौ मिलीमीटर से भी कम बारिश होती है. बारिश के पानी में स्थानीय व सालाना का अधिक अंतर व ज्यादा भाप बनने के कारण यह इलाका शुष्क रहता है.

इस इलाके में मिट्टी कई रूप रंगों में बिखरी हुई है. जैसे:

टिब्बेदार बलुई मिट्टी: इस वर्ग में टिब्बे व अंतर्टिब्बा की रेतीली मिट्टी आती है. टिब्बे छितरे हुए होते हैं, परंतु एक कड़ी में जुड़े हुए टिब्बे जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर और बीकानेर जिलों के पश्चिमी भाग, नागौर, सीकर व चुरू जिलों के पूर्वी भाग में मिलते हैं.

टिब्बे स्थिर होते हैं और उन पर झाडि़यां, घास, पेड़ वगैरह कुदरती वनस्पतियां पाई जाती हैं. टिब्बों वाली बलुई मिट्टी बहुत गहरी, रेतीली, पीलीभूरी व हलके पीलेभूरे रंग की होती है. यह बिना चूने वाली मिट्टी होती है. बलुई मिट्टी में एक मीटर गहराई में 50 से 80 मिलीमीटर पानी ठहर सकता है और इस पानी का 80 फीसदी भाग पौधे इस्तेमाल करते हैं. जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर के अंतर्टिब्बा इलाकों में जिप्सम वाली मिट्टी मिलती है.

भूरी रेतीली मिट्टी: महीन रेतीली से दोमट रेतीले गठन वाली यह मिट्टी भूरे से पीलेभूरे रंग की होती है. यह कुछ अधिक मटियार व सिल्ट वाली चूनेदार होती है. 70 से 90 सेंटीमीटर गहराई पर चूने के कंकड़ों वाली परत मिलती है. इन की सतह पर रेत की परत छितरी होती है. भूरी रेतीली मिट्टी में पानी ठहराव की कूवत 60 से 90 एमएम प्रति मीटर है. इस तरह की मिट्टी शुष्क जिलों बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर, नागौर, बीकानेर, जालोर में मिलती है.

भूरी दोमट मिट्टी: लालभूरे से गहरे लालभूरे रंग, दोमट गठन व बिना कैल्शियम कार्बोनेट वाली मिट्टी इस वर्ग में आती है. यह जोधपुर व नागौर जिलों में मिलती है. इस की पानी ठहरने की कूवत भी अधिक है. कटाव और खारेपन की समस्या भी इस में नहीं होती है.

कठोर पटल की मिट्टी: रेतीली व दोमट रेतीली, उथली मिट्टी में 30 से 40 सेंटीमीटर नीचे चूने के कंकड़ों की सख्त परत मिलती है. इस कठोर परत में पानी का थोड़ा बहुत रिसाव हो जाता है, पर पेड़पौधों की जड़ें घुस नहीं पातीं. रेतीली व कम गहरी होने के कारण मिट्टी में नमी की मात्रा भी कम है. इस कारण झाडि़यां व घास कम समय में ही सूख जाती हैं और पेड़ पनप ही नहीं पाते. बाड़मेर, जैसलमेर व बीकानेर जिलों में बड़े पैमाने पर और जोधपुर, नागौर में कहींकहीं इस तरह की मिट्टी मिलती है.

धूसर भूरी मिट्टी: यह धूसर भूरे, गहरे धूसर रंग की दोमट व दोमट मटियार गठन वाली होती है. इस की गहराई 50 से 70 सेंटीमीटर है. इस मिट्टी में पानी लेने की ताकत  150-200 एमएम प्रति मीटर होती है. इस में पानी द्वारा मिट्टी कटाव देखा जाता है. यह मिट्टी जोधपुर व नागौर जिलों के दक्षिणपूर्वी इलाके पाली, जालौर व बाड़मेर जिलों में मिलती है.

बाढ़ वाले मैदान की मिट्टी: प्रदेश के उत्तरी भाग में घग्गर और इस की सहायक नदियों के द्वारा जमा किए रेत से बने मैदान में महीन रेतीले और रेतीले दोमट गठन, भूरे, धूसर भूरे रंग की गहरी मिट्टी मिलती है. शुष्क इलाकों की मोटे गठन की मिट्टी के मुकाबले घग्गर बाढ़ वाले मैदान की मिट्टी में रेत के कण बहुत बारीक होते हैं. यह मिट्टी बहुत उपजाऊ होती है. इंदिरा गांधी नहर के पानी से सिंचाई और उर्वरकों के सही इस्तेमाल से यह इलाका अन्न भंडार बनता जा रहा है. इस का फैलाव गंगानगर, हनुमानगढ़ और बीकानेर जिले के उत्तरी पश्चिमी भाग में है.

हलकी भूरी रेतीली मिट्टी: यह हलकी पीलीभूरी रेतीली, बिना कैल्शियम कार्बोनेट वाली गहरी मिट्टी होती है. यह मिट्टी शुष्क से अर्धशुष्क मौसम वाले सीकर, झुंझुनू, चुरू और नागौर जिलों में मिलती है. सतह पर रेत की परत व छोटे टिब्बे मिलते हैं. रेतीले या दोमट रेतीले गठन वाली हलकी पीलीभूरी से लालभूरी गहरी मिट्टी मिलती है. यह मिट्टी बहुत तेजी से पानी निकास वाली और मुलायम ढेले वाली होती है.

जलोढ़ मैदान व दक्षिणी पठार

अरावली के पूर्व में जलोढ़ मैदान फैला हुआ है. दक्षिणपूर्वी धरातल चंबल व सहायक नदियों की मिट्टी से बना दक्षिणी भूभाग पठारी है. इस पूर्वी व दक्षिणी भूभाग में 700 से 900 मिलीमीटर बारिश होती है.

नए जलोढ़ मैदान की मिट्टी: यहां दोमट रेतीली व रेतीले दोमट गठन की गहरी मिट्टी होती है. शुष्क इलाकों के मुकाबले यह सघन और कम रंधाकार की है जिस से पानी का रिसाव कम होता है. इस का फैलाव जयपुर, अलवर, करौली, दौसा व भरतपुर में है.

भूरी मिट्टी: यह भूरे, धूसर भूरे, पीलेभूरे रंग व मटियार, दोमट गठन वाली व हलकी कैल्शियम कार्बोनेट मिट्टी है. इस में पानी के रिसाव की दर कम है. जमीनी पानी से सिंचित इस मिट्टी में लवणीयता की समस्या है. यह भीलवाड़ा, टोंक व अजमेर जिलों में मिलती है. उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़ व जयपुर जिलों में भी कहींकहीं यह पाई जाती है.

लाल दोमट मिट्टी: इस वर्ग की मिट्टी लालभूरी दोमट व रेतीले दोमट गठन की कैल्शियम कोर्बोनेट रहित 50-70 सेंटीमीटर गहराई की है. आसपास की पहाडि़यों के टूटने और पानी बहाव से यह मिट्टी बनी है. लाल दोमट मिट्टी में पानी का रिसाव मध्यम होता है. धरती के ऊपरी भागों में मिट्टी उथली है. इस में पानी लेने की क्षमता कम है. लवणीयता व क्षारीयता की समस्या इस मिट्टी में नहीं मिलती है, परंतु पानी से कटाव बहुत ज्यादा होता है. नीचे के मैदानों व घाटियों में यह बहुत गहरी, लाल व दोमट गठन की बहुत उपजाऊ मिट्टी है. प्रदेश के दक्षिणी भाग में अरावली पहाडि़यों के बीच डूंगरपुर, उदयपुर और चित्तौड़गढ़ जिलों में यह मिट्टी मिलती है.

मध्यम काली मिट्टी: यह धूसर भूरी, मटियार दोमट गठन कोणीय ढेले वाली 70-120 सेंटीमीटर गहराई की मिट्टी है. मटियार की मात्रा अधिक होने के कारण यह मिट्टी बारिश के मौसम में गीली होने पर फूल जाती है और गरमी में सूखने पर सिकुड़ती है. सिकुड़ने पर इस में 50-100 सेंटीमीटर गहराई तक दरार पड़ जाती है. काली मिट्टी के साथ लाल रंग की मिट्टी भी मिलती है. अधिक क्ले व सिल्ट होने के कारण मिट्टियों की पानी लेने की कूवत बहुत अधिक है.

पानी का रिसाव बहुत कम होने के कारण सिंचित इलाकों में पानी भराव की समस्या रहती है. चंबल व इस की सहायक नदियों के किनारे पानी कटाव से गहरे खड्डे बन गए हैं. इस तरह के खड्डे बहुत बड़े इलाके में फैले हुए हैं. इस वर्ग की मिट्टी झालावाड़, बांरा, प्रतापगढ़, कोटा, बूंदी, सवाईमाधोपुर, धौलपुर, करौली, बांसवाड़ा व उदयपुर जिलों में मिलती है.

पहाड़ी मिट्टी: पहाड़ी इलाकों में धरती ज्यादा ऊंचीनीची व पथरीली होने के कारण मिट्टी में बहुत अंतर मिलता है. यह मिट्टी उथली, कंकड़ों वाली, मोटी रेतीली, लालभूरी व धूसरभूरी है. इस मिट्टी का बारिश के मौसम में कटाव होता रहता है. यह खेती के लिए बेकार है और चारागाह और जंगल लगाने के काम ही आ सकती है.

पहाडि़यों के बीचबीच में जो मिट्टी इकट्ठी होती रहती है, वह बहुत उपज देने वाली है. इस में महीन गठन जैसे कि मटियार दोमट, दोमट व रेतीले दोमट गठन की मिट्टी मिलती है. उथली मिट्टी की पानी लेने की कूवत बहुत कम है. इस में एकवर्षीय घास व छोटी झाडि़यां ही पनप सकती हैं. यह राजस्थान के दक्षिण में उदयपुर, राजसमंद, डूंगरपुर बांसवाड़ा और सिरोही जिलों में मिलती है.

लवणीयक्षारीय मिट्टी

राजस्थान के शुष्क व अर्धशुष्क दोनों ही भागों में लवण यानी नमक वाली मिट्टी मिलती है. इस मिट्टी में लवण इकट्ठा होने पर मिट्टी लवणीय और क्षारीय हो जाती है. कुदरती लवणीय मिट्टी पाली, जोधपुर, नागौर, भीलवाड़ा व कोटा जिलों में मिलती है.

इनसानों द्वारा तैयार लवणीय मिट्टी नहरों और सिंचाई के लिए बनाए बांधों के आसपास मिलती है. प्रदेश में ज्यादातर जगहों का पानी लवणीय है और यही सिंचाई का जरीया होने से मिट्टी लवणीय हो जाती है. पानी में कहींकहीं पर लवणीयता तो कम है, परंतु कार्बोनेट की मात्रा अधिक है. इस तरह के पानी से सिंचाई करने पर मिट्टी क्षारीय हो जाती है.

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