Soil Conservation. रोजाना लाखों टन उपजाऊ मिट्टी का खेतों से कटाव हो रहा है और वह बह कर समुद्र में चली जा रही है. कुछ इलाकों में पिछले 50 सालों में मिट्टी में जैवांश का स्तर 30 से 60 फीसदी कम हो गया है.

हमारे देश में 70 फीसदी खेती बारिश पर निर्भर है और बारिश को ले कर हमेशा डर बना रहता है कि बारिश होगी या नहीं. इसलिए इस तरह की खेती में बरसात आने से पहले ही कुछ इंतजाम करने चाहिए, जिस से बारिश से होने वाले मिट्टी के कटाव को कम कर के बारिश के पानी का इस्तेमाल खेती में किया जा सके.

इस के लिए मिट्टी संरक्षण की तकनीकी विधियां अपनानी होंगी. इसलिए बारिश पर आधारित खेती के लिए तकनीकी रूप से मिट्टी और पानी संरक्षण की तकनीकों का वैज्ञानिक इस्तेमाल करना बहुत जरूरी होगा.

ढालदार खेतों में मिट्टी बचाव

उन इलाकों में जहां कुदरती ढाल होता है, वहां पर ढाल के मुताबिक ही खेतों की लंबाई व चौड़ाई तय करनी चाहिए. निचले इलाकों में खेत अधिक चौड़े व ऊंचे इलाकों में कम चौड़े रखे जाने चाहिए. अधिक चौड़ाई वाले इलाकों में खेती करना आसान होता है, परंतु कम चौड़ाई वाले इलाकों में बागबानी करना ज्यादा फायदेमंद होता है, ताकि मिट्टी और खेत दोनों महफूज रहें.

खेती की जमीन का कटाव होने की बड़ी वजह अधिक ढाल का होना है. ढाल वाले इलाकों में मिट्टी का कटाव बारिश के पानी के बहाव के कारण होता है.

जैसेजैसे ढलान और ढालदार लंबाई बढ़ेगी पानी के बहाव की गति बढ़ेगी जिस के कारण मिट्टी का कटाव बढ़ेगा. इसलिए खेती की जमीन में मिट्टी बचाने के लिए जमीन का ढलान और ढालदार लंबाई को कम रखना चाहिए. अगर बारिश का पानी बिना रुकावट के खेतों के ऊपर एक के बाद एक कई खेतों से हो कर बह जाता है, तो इस से मिट्टी का कटाव बढ़ता रहता है. धीरेधीरे ऐसे खेतों का ढाल बाहर की ओर अधिक हो जाता है.

मिट्टी के बचाव के उपाय नहीं अपनाने से मिट्टी की उर्वरा ताकत में दिनोंदिन कमी बढ़ती रहती है.

ढालदार खेतों की बनावट में सुधार के लिए सब से आसान तरीका है कि इन खेतों की लंबाई के मुताबिक भीतरी भाग से मिट्टी काट कर बाहरी किनारों पर ढाल के अनुसार तकरीबन एक फुट ऊंची मेंड़ बना दी जाए, जिस से बारिश का पानी खेत में रुक सके और खेत की लंबाई की तरफ हो कर बहे. ऐसा होने से खेत अपने आप ही समतल हो जाएगा.

मिट्टी के कटाव को कम करें

मिट्टी की ऊपरी परत में जैवांश और जैविक सक्रियता सब से ज्यादा पाई जाती है, जो पौधों की बढ़वार और मिट्टी के लिए बहुत अहम है. मिट्टी के कटाव का असर न भी दिखाई दे तो भी इसे कम करना चाहिए. ऊपरी मिट्टी की महज 1/32 इंच की क्षति, जो खेत में दिखाई देना कठिन है, 5 टन मिट्टी प्रति एकड़ के बराबर हो सकती है.

इस तरह रोकें इसे

नालियों की दिशा बदलने से मिट्टी का कटाव कम हो जाता है, क्योंकि इस से मिट्टी की ओर जाने वाले पानी की दिशा बदल जाती है. इसी तरह पेड़पौधों द्वारा मिट्टी की ओर जाने वाली हवा की दिशा बदली जा सकती है.

पलवार मिट्टी को ढकते हैं और कटाव से बचाते हैं. कार्बनिक खादें और कंपोस्ट मिट्टी में जैवांश की मात्रा बढ़ा कर उस की गुणवत्ता में सुधार लाते हैं. बहुवर्षीय फसलें मिट्टी को ढक कर और अपनी जड़ों द्वारा उसे एक जगह पर स्थिर रख कर एक साथ कई लाभ पहुंचाती हैं.

निराईगुड़ाई प्रबंधन

मिट्टी के ठोस यानी कठोर होने को कम करने और जैवांश की मात्रा बढ़ाने के लिए निराईगुड़ाई और जुताई वगैरह कामों का सही तालमेल और उन को वैज्ञानिक तरीके से करना सही रहता है, क्योंकि मशीनों के इस्तेमाल से मिट्टी का दबाव बढ़ता है यानी मिट्टी की अंदर की परत ठोस हो जाती है. मिट्टी का दबाव पौधों की जड़ों को फैलने से रोकता है, मिट्टी की नमी और तापमान पर असर डालता है. मिट्टी में पानी को कम करता है, जिस से बहते पानी की मात्रा और मिट्टी का कटाव बढ़ता है.

धान की रोपाई के लिए गीली मिट्टी में जुताई, बोआई कम से कम करनी चाहिए, क्योंकि इस से मिट्टी की बनावट पर असर पड़ता है और मिट्टी कठोर हो जाती है.

फसल की बोआई के बाद 30 फीसदी फसल अवशेष छूट जाते हैं, जो मिट्टी को कटाव से बचाते हैं. इस तरह कुछ उपाय अपना कर हम अपनी मिट्टी को बचा सकते हैं, लेकिन कदम हमें जल्द ही उठाना होगा, क्योंकि मिट्टी बहुत तेजी से मर रही है. Soil Conservation

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