एक ओर जहां उत्पादन लागत बढ़ रही है, वहीं पैदावार लगातर कम होती जा रही है. इस से अब किसानों के लिए सब्जी की खेती (Vegetable Farming) घाटे का सौदा हो गई है.

किसानों की इन समस्याओं को ध्यान में रखते हुए एक बिना लागत वाली बहुत असरदार, आबोहवा के माफिक और सब जगह लागू होने वाली प्रणाली न्यूनतम साझा कार्यक्रम का विकास किया गया है. यह तकनीक समेकित नाशीजीव प्रबंधन का ही अंग है.

जानें इन सभी के बारे में

मिट्टी सौरीकरण : ज्यादातर सब्जियों की पौध नर्सरी में बीज बो कर तैयार की जाती है. नर्सरी में कवकीय व बीमारी पैदा करने वाले जीवाणु कीटों व खरपतवार की वजह से, बीज सड़न, जड़ व तना सड़न के कारण पौधों की संख्या कम हो जाती है. जो पौध बचते हैं वे कमजोर व बीमार होते हैं और उन से बीमारी खेतों तक पहुंच जाती है.

सौरीकरण नर्सरी में बीमारी जनकों, कीटों व खरपतवारों को कम करने की एक अच्छी तकनीक है. इस में नर्सरी बीज बोआई से 5 से 8 हफ्ते पहले तैयार की जाती है और इसे पानी से पूरी तरह तर कर दिया जाता है. फिर नर्सरी को पारदर्शी पौलिथीन की चादर (50-100 माइक्रोन मोटाई वाली) से ढक देते हैं. चारों ओर से पौलिथीन की चादर को इस तरह दबा देते हैं कि उस में हवा न आजा सके. इस पौलिथीन को बीज बोआई से 3-4 दिन पहले ही हटाते हैं.

पौलिथीन की चादर ग्रीन हाउस का असर पैदा करती है, जिस से सूरज की गरमी पौलिथीन की चादर के अंदर तो  जाती है, लेकिन बाहर नहीं आ सकती. इस से नर्सरी में मिट्टी का तापमान बढ़ जाता है, जो बीमारी पैदा करने वाली वजहों और कीटों के लिए नुकसानदायक होता है.

सही नतीजे लेने के लिए जरूरी है कि सौरीकरण 5 से 8 हफ्ते तक किया जाए, पारदर्शी पौलिथीन का ही इस्तेमाल किया जाए, पौलिथीन बिछाने से पहले नर्सरी की सिंचाई की जाए व मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ मिला हो.

वर्मी कंपोस्ट तैयार करना : उत्तराखंड में परंपरागत तरीके से तैयार की जाने वाली खाद या कच्चे गोबर का किसान बहुत इस्तेमाल करते हैं.

किसान खेतों में गोबर के ढेर लगा देते हैं, जिस में बारिश का पानी गिरने से पोषक तत्त्व पानी के साथ घुल कर बह जाते हैं और गोबर अच्छी तरह सड़ नहीं पाता. इस तरह बनाई गई खाद में पोषक तत्त्वों की कमी होती है और अधसड़ी खाद से खेतों में कीट और बीमारियां ज्यादा फैलती हैं.

वर्मी कंपोस्ट ज्यादा पोषक तत्त्व वाली और कम समय में तैयार होने वाली खाद है. इसे तैयार करने के लिए गोबर, सूखे व हरे पत्ते, घासफूस, धान का पुआल, खेतों का कचरा वगैरह का इस्तेमाल करते हैं, जिसे खा कर केंचुएं मल के रूप में खाद तैयार कर देते हैं. यह खाद फसलों को कुदरती संपूर्ण व संतुलित भोजन मुहैया कराती है.

वर्मी कंपोस्ट से पौधों में बीमारियों से लड़ने की कूवत का विकास होता है और मिट्टी का उपजाऊपन बढ़ने के साथ मिट्टी की पानी इकट्ठा करने की कूवत बढ़ जाती है.

वर्मी कंपोस्ट तैयार करने के लिए खेतों के कचरे, खरपतवार व गोबर को इकट्ठा कर 6 फुट लंबे, ढाई फुट चौड़े व डेढ़ फुट ऊंचे गड्ढे में डाल देते हैं.

गड्ढे में केंचुए भी डाल देते हैं. ये केंचुए गड्ढे में डाले गए सामान को खा कर मिट्टी के रूप में मल छोड़ते हैं. एसीनिया फटीडा किस्म के केंचुए अच्छी और जल्दी खाद बनाते हैं.

जैव अभिकर्ता का इस्तेमाल

बीमारी पैदा करने वाली वजहों का नाश करने वाले जीवों को जैव अभिकर्ता कहते हैं, क्योंकि यह पूरी तरह से जैविक तकनीक है इसलिए जैव नियंत्रण से फसलों की सुरक्षा के साथ मिट्टी की क्वालिटी और आबोहवा को खराब होने से बचाया जा सकता है.

पिछले 2 दशकों से जैव अभिकर्ता बाजार में उपलब्ध हैं. बीमारी के लिए ट्राइकोडर्मा व स्यूडोमोनास जैव अभिकर्ता ज्यादा मशहूर हैं. जैव अभिकर्ता का इस्तेमाल कई तरीके से किया जाता है.

बीज उपचार : बड़े बीजों जैसे मटर, सोयाबीन, गेहूं व बीन के लिए 6-8 ग्राम बायो एजेंट प्रति किलोग्राम और छोटे बीजों जैसे गोभी, मिर्च, टमाटर, बैगन वगैरह के लिए 4-6 ग्राम बायोएजेंट प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजों को उपचारित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. अगर बीज पहले से केमिकल दवाओं द्वारा उपचारित हैं, तो उन्हें पानी से धो कर जैव अभिकर्ता द्वारा उपचारित करना चाहिए. उपचार के लिए बीजों के ऊपर थोड़ा सा पानी छिड़क कर जैव अभिकर्ता पाउडर ठीक से मिला देते हैं. इस के बाद बीज को थोड़ी देर छाया में रख कर बोआई कर देते हैं.

कंद उपचार : अदरक, अरबी, आलू वगैरह के उपचार के लिए 8-10 ग्राम जैव अभिकर्ता प्रति लीटर पानी में घोल कर उस में कंदों को डुबो कर निकाल देते हैं. कंदों को छाया में सुखाने के बाद बोआई कर देते हैं.

पौध उपचार : रोपाई से पहले पौध की जड़ को जैव नियंत्रक के घोल से उपचारित करते हैं. इस के लिए पौध को नर्सरी से उखाड़ कर जड़ को पानी से अच्छी तरह साफ करें.

8-10 ग्राम प्रति लीटर जैव अभिकर्ता का पानी में घोल बना कर उस में आधा घंटे तक जड़ डुबाने के बाद पौधों की रोपाई करते हैं. पौध उपचार गोभी, मिर्च, बैगन, टमाटर वगैरह सब्जियों के पौधों का करते हैं.

खाद उपचार : सड़ी हुई खाद को खेत में डालने से पहले जैव अभिकर्ता से उपचारित किया जाता है. इस के लिए ढाई सौ ग्राम जैव अभिकर्ता को एक क्विंटल सड़ी हुई खाद में मिला कर इस्तेमाल करना चाहिए. खाद बनाते समय गड्ढों में भी जैव अभिकर्ता को मिलाया जा सकता है.

छिड़काव : बीज व मिट्टी से होने वाली बीमारियों की रोकथाम के अलावा जैव अभिकर्ता से हवा द्वारा फैलाई जाने वाली बीमारियों को भी रोका जा सकता है. इस के लिए 8-10 ग्राम प्रति लीटर जैव अभिकर्ता पानी में मिला कर घोल का छिड़काव समयसमय पर फसल में किया जाना चाहिए.

सिंचाई : जैव अभिकर्ता का 8-10 ग्राम प्रति लीटर घोल बना कर सब्जियों की नर्सरी की समयसमय पर सिंचाई करनी चाहिए, जिस से पौधे सेहतमंद रहेंगे और उन की बढ़वार अच्छी रहेगी.

वर्मी कंपोस्ट की क्वालिटी में इजाफा : वर्मी कंपोस्ट को गड्ढे से निकालने के बाद उस में ढाई सौ ग्राम प्रति क्विंटल की दर से जैव अभिकर्ता को मिला दिया जाता है, जिस से वर्मी कंपोस्ट की उर्वरा ताकत में इजाफा होता है और जैव अभिकर्ता को कार्बनिक पदार्थ मिल जाने के कारण खाद में तेजी से फैल जाता है.

खेती में जैविक प्रणाली ऐसी हो जो मिट्टी में रहने वाले जीवाणुओं की वैरायटी और बढ़वार को और बढ़ा सके ताकि जीवाणु पौधों के लिए फायदेमंद और बीमारी फैलाने वालों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकें.

जैव नियंत्रण में एक जीव या जीवाणु दूसरे हानिकारक जीव या जीवाणु को खत्म या कंट्रोल करता है. इस के लिए जैव अभिकर्ताओं की तादाद को पौधों की जड़ों के आसपास ज्यादा मात्रा में बनाए रखना होता है.  Vegetable Farming

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