किसान राजाराम को मिला ‘महिंद्रा रिचेस्ट फार्मर औफ इंडिया अवार्ड’

नई दिल्ली: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, पूसा, नई दिल्ली के मेला ग्राउंड में आयोजित एक भव्य समारोह में ‘महिंद्रा मिलेनियर फार्मर औफ इंडिया अवार्ड 2023’ में छत्तीसगढ़ के डा. राजाराम त्रिपाठी को केंद्रीय पशुपालन मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने देश के सब से अमीर किसान की ट्रौफी दे कर सम्मानित किया और उन्हें ‘भारत के सब से अमीर किसान‘ के खिताब से नवाजा.

इस अवसर पर केंद्रीय पशुपालन मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने कहा कि देश के किसान अब समृद्धि की राह पर चल पड़े हैं, इन सफल प्रगतिशील करोड़पति किसानों के बारे में जान कर हम सब को बड़ी प्रसन्नता हुई है. डा. राजाराम त्रिपाठी जैसे उद्यमी किसान देश के किसानों के लिए रोल मौडल हैं.

इस अवसर पर ब्राजील के राजदूत ने डा. राजाराम त्रिपाठी को अपने देश में आमंत्रित करते हुए ब्राजील यात्रा का टिकट भी प्रदान किया. इस अवसर पर ब्राजील के उच्चाधिकारी, नीदरलैंड के कृषि सलाहकार माईकल, संयुक्त अरब अमीरात के राजदूत, आईसीएआर के निदेशक, कृषि जागरण की प्रमुख एमसी डोमिनिक, शाइनी डोमिनिक डा. पीसी पंत, ममता जैन, पीसी सैनी, हर्ष राठौर, आशुतोष पांडेय हिंदुस्तान के साथ ही देशभर के कृषि वैज्ञानिक, कृषि क्षेत्र के उद्योगपति और सैकड़ों की तादाद में अलगअलग राज्यों से पधारे प्रगतिशील किसान व कृषि उद्यमी मौजूद थे.

अवार्ड मिलने के बाद डा. राजाराम त्रिपाठी ने कहा कि वह अपना यह अवार्ड मां दंतेश्वरी हर्बल समूह के सभी साथियों और बस्तर के अपने आदिवासी भाइयों को अर्पित करते हैं. वे अपने समूह की आमदनी का पूरा हिस्सा बस्तर के आदिवासी भाइयों के विकास में ही खर्च कर रहे हैं और आगे इन के विकास के लिए एक ट्रस्ट बना कर अपनी सारी खेती को उस के साथ जोड़ कर उन की बेहतरी के लिए अपनी आखिरी सांस तक काम करते रहेंगे.

यों तो जैविक खेती और औषधीय पौधों की खेती के पुरोधा माने जाने वाले डा. राजाराम त्रिपाठी आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. बीएससी (गणित), एलएलबी के साथ हिंदी साहित्य, अंग्रेजी साहित्य, इतिहास, अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान सहित 5 विषयों में एमए और डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त डा. राजाराम त्रिपाठी को देश का सब से ज्यादा शिक्षित किसान माना जाता है. खेती में नएनए नवाचारों के साथ ही ये आज भी पढ़ाई कर रहे हैं और इन दिनों ये सामाजिक विज्ञान में स्नातकोत्तर की परीक्षा दे रहे हैं. इन्हें हरित योद्धा, कृषि ऋषि, हर्बल किंग, फादर औफ सफेद मूसली आदि की उपाधियों से नवाजा जाता है. मिसाइलमैन एपीजे अब्दुल कलाम ने इन्हें ‘‘हर्बलमैन औफ इंडिया‘‘ की उपाधि दी थी.

देश के सब से पिछड़े भाग बस्तर में पिछले 30 सालों की उन की कठिन तपस्या व संघर्षों के बारे में यह दुनिया बहुत कम जानती है. बस्तर के एक बेहद पिछड़े क्षेत्र, कुख्यात झीरम घाटी वाले दरभा विकास खंड के गांव ‘ककनार‘ में जन्मे और वहीं पलेबढ़े डा. राजाराम त्रिपाठी का बचपन बस्तर के जंगलों में आदिवासी सखाओं के साथ गाय चराते और खेती करते बीता है. ये अपने गांव से प्रतिदिन 50 किलोमीटर साइकिल चला कर पढ़ने के लिए जगदलपुर आते थे. इन्होंने अपने बूते देश की विलुप्त हो रही दुर्लभ वनौषधियों के संरक्षण और संवर्धन के लिए बस्तर, कोंडागांव में लगभग 30 साल मेहनत कर के तकरीबन 10 एकड़ का जैव विविधता से भरपूर एक जंगल उगा कर वनौषधियों के लिए प्राकृतिक रहवास में ही ‘‘इथिनो मैडिको गार्डन‘‘ यानी  ‘‘दुर्लभ वनौषधि उद्यान‘‘  विकसित कर दिखाया है, जहां आज 340 से ज्यादा प्रजातियों की 5,100 दुर्लभ वनौषधियां फलफूल रही हैं.

Dr. Rajaramप्रगतिशील किसान डा. राजाराम त्रिपाठी की कुछ विशेष उपलब्धियां:-

– डा. राजाराम त्रिपाठी के नेतृत्व में ‘‘मां दंतेश्वरी हर्बल‘‘ को आज से 22 साल पहले देश के पहले ‘‘सर्टिफाइड और्गैनिक स्पाइस एंेड हब्र्स फार्मिंग का अंतर्राष्ट्रीय प्रमाणपत्र हासिल करने का गौरव प्राप्त है.

– 2 दशकों से अपने मसालों और हर्बल उत्पादों का यूरोप, अमेरिका आदि देशों में निर्यात में विशिष्ट गुणवत्ता नियंत्रण हेतु ‘राष्ट्रीय बागबानी बोर्ड‘ भारत सरकार द्वारा ‘बैस्ट ऐक्सपोर्टर’ का अवार्ड भी मिल चुका है.

– डा. राजाराम त्रिपाठी 2 दर्जन से ज्यादा देशों की यात्रा कर के वहां की कृषि एवं विपणन पद्धति का अध्ययन कर चुके हैं.

– डा. राजाराम त्रिपाठी ने भारत सरकार के सर्वोच्च शोध संस्थान सीएसआईआर और आईएचबीटी के साथ करार कर जीरो कैलोरी वाली ‘स्टीविया‘ की बिना कड़वाहट और ज्यादा मिठास वाली प्रजाति के विकास करने और इस की पत्तियों से शक्कर से 250 गुना मीठी स्टीविया की ‘जीरो कैलोरी शक्कर‘ बनाने का  करार किया है.

– डा. राजाराम त्रिपाठी ने जैविक पद्धति से देश के सभी भागों में विशेष रूप से गरम क्षेत्रों में न्यूनतम देखभाल में परंपरागत प्रजातियों से ज्यादा उत्पादन और बेहतर गुणवत्ता देने वाली काली मिर्च की नई प्रजाति ‘‘मां दंतेश्वरी काली मिर्च-16, पीपली की नई प्रजाति ‘‘मां दंतेश्वरी पीपली-16‘‘ एवं स्टीविया की नई प्रजाति ‘‘मां दंतेश्वरी स्टीविया-16’’ आदि नई प्रजातियों को विकसित किया है और बड़ी संख्या में किसान इन का फायदा उठा रहे हैं. इस की सराहना स्पाइस बोर्ड के वैज्ञानिकों और देश के कृषि विशेषज्ञों ने भी की है.

– डा. राजाराम त्रिपाठी देश के पहले ऐसे किसान हैं, जिन्हें देश के सर्वश्रेष्ठ किसान होने का अवार्ड अब तक 4 बार, भारत सरकार के अलगअलग कृषि मंत्रियों के हाथों मिल चुका है.

– अब तक 7 लाख से अधिक लहलहाते पेड़ उगाने वाले डा. राजाराम त्रिपाठी को आरबीएस ‘अर्थ हीरो‘ (एक लाख की पुरस्कार राशि), ग्रीन वारियर यानी हरित योद्धा अवार्ड सहित कई अंतर्राष्ट्रीय अवार्ड और प्रतिष्ठित राष्ट्रीय अवार्ड मिल चुके हैं.

– हालफिलहाल डा. राजाराम त्रिपाठी के मार्गदर्शन में ‘‘मां दंतेश्वरी फार्म एंेड रिसर्च सैंटर‘‘ द्वारा 40 लाख रुपए में तैयार होने वाले एक एकड़ के ‘पौलीहाउस‘ का ज्यादा टिकाऊ, प्राकृतिक, सस्ता और हर साल पौलीहाउस से ज्यादा फायदा देने वाला सफल और बेहतर विकल्प ‘‘नैचुरल ग्रीनहाउस‘‘ कोंडागांव मौडल महज ‘‘डेढ़ लाख रुपए‘‘ में. जी हां, 40 लाख रुपए के पौलीहाउस का विकल्प महज डेढ़ लाख रुपए में तैयार किया है. किसानों की आमदनी को कई गुना बढ़ाने वाले इस मौडल ने तो पूरे देश में तहलका मचा दिया है. इसे देश की खेती का ‘‘गेमचेंजर‘‘ माना जा रहा है. साथ ही, इस नैचुरल ग्रीनहाउस को ‘‘क्लाइमेटचेंज‘‘ के खिलाफ सब से कारगर हथियार माना जा रहा है.

– डा. राजाराम त्रिपाटी के द्वारा स्थापित ‘मां दंतेश्वरी हर्बल समूह‘ के साथ अब इन परिवारों की दूसरी पीढ़ी भी कंधे से कंधा मिला कर पसीना बहा रही है. इस नव युवा पीढ़ी की अगुआई कर रही इन की बिटिया अपूर्वा त्रिपाठी, जो कि 25 लाख रुपए का पैकेज ठुकरा कर बस्तर की आदिवासी महिला समूहों के साथ मिल कर उगाए गए विशुद्ध प्रमाणित जैविक जड़ीबूटियों, मसालों और उत्कृष्ट खाद्य उत्पादों की श्रंखला ‘‘एमडी-बोटैनिकल्स‘‘  ब्रांड के जरीए एक विश्वसनीय वैश्विक ब्रांड का तमगा हासिल कर चुकी हैं. इन के बस्तरिया उत्पाद अब ‘फ्लिपकार्ट‘ और ‘अमेजन‘ पर ट्रेंड कर रहे हैं.

– यह भी उल्लेखनीय है कि बस्तर स्थित इनके हर्बल-फार्म जिसे ये किसान की प्रयोगशाला कहते हैं, पर अब तक माननीय महामहिम  राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम आजाद राज्यपाल श्री दिनेश नंदन सहाय मुख्यमंत्री श्री अजीत जोगी, अमेरिका, नीदरलैंड, इंग्लैंड, दक्षिण अफ्रीका, इथोपिया सहित विश्व के विभिन्न देशों के कई माननीय मंत्रीगण, प्रतिनिधि गण, उच्चाधिकारी तथा वैज्ञानिक पधार चुके हैं।

– देश के हजारों प्रगतिशील किसानों, स्कूलों के बच्चों और मैडिसिनल प्लांट के शोधार्थियों, वैज्ञानिकों, नवउद्यमी युवाओं के लिए इस किसान की प्रयोगशाला यानी ‘‘मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म और रिसर्च सैंटर फार्म‘‘ पर निरंतर आनाजाना लगा रहता है.

– वर्तमान में डा. राजाराम त्रिपाठी ‘‘नैशनल मैडिसिनल प्लांट बोर्ड‘‘ आयुष मंत्रालय, भारत सरकार के सदस्य हैं. साथ ही, भारत सरकार के ‘‘भारतीय गुणवत्ता संस्थान यानी बीआईएक की ‘‘कृषि मशीनरी तकनीकी अप्रूवल कमेटी‘‘ के भी सदस्य हैं.

– डा. राजाराम त्रिपाठी ‘‘सैंट्रल हर्बल एग्रो मार्केटिंग फेडरेशन औफ इंडिया (चाम्फ) ूूू.बींउ.िवतह ‘‘ जो कि जैविक किसानों का देश का सब से बड़ा संगठन है, उस के चेयरमैन हैं.

– डा. राजाराम त्रिपाठी को हाल ही में देश के अग्रणी 223 किसान संगठनों के द्वारा बनाए गए ‘‘एमएसपी गारंटी-किसान मोरचा‘‘ का ‘मुख्य राष्ट्रीय प्रवक्ता‘ भी बनाया गया है.

– डा. राजाराम त्रिपाठी वर्तमान में देश के सब से 45 किसान संगठनों के पूरी तरह से गैरराजनीतिक मंच, ‘अखिल भारतीय किसान महासंघ ( आईफा)‘ के ‘राष्ट्रीय संयोजक‘ के रूप में देशभर के किसानों की सशक्त आवाज के रूप में जाने जाते हैं.

– खेतीकिसानी में झंडे गाड़ने से इतर आदिवासी बोली, भाषा और उन की संस्कृति के संरक्षण के लिए डा. राजाराम त्रिपाठी का काम देशभर में उन की अलग पहचान बनाता है. इन के द्वारा लिखी किताबों में ‘‘बस्तर बोलता भी है‘‘ और ‘‘दुनिया इन दिनों‘‘  की गणना देश की चर्चित कृतियों में होती है. विगत एक दशक से दिल्ली से प्रकाशित हो रही जनजातीय सरोकारों की मासिक पत्रिका ‘‘ककसाड़‘‘ के जरीए छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की विलुप्त हो रही बोली, भाषा, संस्कृति और सदियों के संचित अनमोल परंपरागत ज्ञान को संजोने, व बढ़ाने के काम में अथक जुटे ‘‘कृषि ऋषि‘‘ डा. राजाराम त्रिपाठी को लोक संस्कृति का चलताफिरता ध्वजावाहक कहा जाना भी अतिशयोक्ति न होगा. इन का काम बहुआयामी है. इन के बारे में अगर और अधिक जानना हो, तो कृपया गूगल पर जाएं, गूगल बाबा की लाइब्रेरी में इन के ऊपर हजारों पेज आप को मिल जाएंगे.

कृषि स्टार्टअप से लग रहे कृषि क्षेत्र को पंख

नई दिल्ली: कृषि एवं किसान कल्याण विभाग द्वारा राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई) के अंतर्गत वर्ष 2018-19 से ‘नवाचार एवं कृषि उद्यमिता विकास” कार्यक्रम लागू किया जा रहा है, जिस का उद्देश्य देश में स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र का पोषण करने के लिए वित्तीय एवं तकनीकी सहायता प्रदान करते हुए नवाचार और कृषि उद्यमिता को बढ़ावा देना है.

स्टार्टअप के इनक्यूबेशन और इस कार्यक्रम के कार्यान्वयन के लिए 5 नालेज पार्टनर्स (केपी) और 24 आरकेवीवाई एग्री बिजनैस इनक्यूबेटर (आर-एबीआई) नियुक्त किए गए हैं.

स्टार्टअप को नालेज पार्टनर्स (केपी) और आरकेवीवाई एग्री बिजनैस इनक्यूबेटर्स (आर-एबीआई) द्वारा प्रशिक्षित और इनक्यूबेट किया जाता है. भारत सरकार कृषि स्टार्टअप कौनक्लेव, कृषि मेला, प्रदर्शनियों, वैबिनार, कार्यशालाओं सहित विभिन्न राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों का आयोजन करती है, जिस से उन्हें विभिन्न हितधारकों के साथ जोड़ कर कृषि स्टार्टअप को बढ़ावा देने के लिए एक मंच प्रदान किया जा सके.

कार्यक्रम के अंतर्गत सहायता प्राप्त कृषि स्टार्टअप ‘योजना‘ से ले कर ‘मापन‘ और ‘विकास चरण‘ कार्यान्वयन के विभिन्न चरणों में हैं. ये कृषि स्टार्टअप कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे हैं, जैसे कि सटीक कृषि, कृषि मशीनीकरण, कृषि परिचालन एवं आपूर्ति श्रृंखला, कृषि प्रसंस्करण एवं खाद्य प्रौद्योगिकी, अपशिष्ट से धन, जैविक कृषि, पशुपालन, डेरी और मत्स्यपालन आदि. कृषि स्टार्टअप्स द्वारा विकसित एवं उभरती प्रौद्योगिकियां कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों में विभिन्न सस्ती और अभिनव समाधान प्रदान कर रही हैं.

कार्यक्रम के अंतर्गत, वर्ष 2019-20 से 2023-24 तक कुल 1524 कृषि स्टार्टअप को 106.25 करोड़ रुपए की वित्तीय सहायता प्रदान की गई.

कृषि विभाग की अनेक योजनाएं लागू

संत कबीर नगर: जिलाधिकारी महेंद्र सिंह तंवर की अध्यक्षता में कृषि, पशुपालन, उद्यान, सहाकारित, दुग्ध विकास विभाग द्वारा संचालित विकासपरक व लाभार्थीपरक योजनाओं में लक्ष्य के सापेक्ष प्रगति, गुणवत्ता एवं कार्ययोजना से संबंधित समीक्षा बैठक कलेक्ट्रेट सभागार में आयोजित हुई. कृषि विभाग के कार्ययोजनाओं की समीक्षा के दौरान जिलाधिकारी द्वारा मुख्यमंत्री डैसबोर्ड पर प्रदर्शित आंकड़ों के सापेक्ष योजनावार समीक्षा की गई.

बिना लाइसेंस की दुकानों के बिक्री ना हो

जिलाधिकारी महेंद्र सिंह तंवर ने निर्देशित किया कि कोई भी खाद बिना लाइसेंस की दुकानों के बिक्री ना हो. कृषि विभाग के अधिकारी इस का औचक निरीक्षण करें. सभी उर्वरक विक्रेताओं की सूची जनपद के पोर्टल पर डाल दी जाए, जिस से किसान जागरूक बनें.

किसान क्रेडिट कार्ड की समीक्षा

किसान क्रेडिट कार्ड की समीक्षा में पाया गया कि अभी महज 30 फीसदी लक्ष्य के सापेक्ष किसान क्रेडिट कार्ड वितरित हुए हैं, जबकि 30 दिसंबर तक शतप्रतिशत 87,586 किसान क्रेडिट कार्ड जारी हो जाने चाहिए. इस संबंध में अग्रणी जिला बैंक प्रबंधक के लिए निर्देश दिए गए कि सभी जिला समन्वयक से बातचीत कर के प्रगति लाएं.

यंत्रों की औनलाइन बुकिंग शुरू

कृषि यंत्रीकरण योजना के अंतर्गत 30 नवंबर से यंत्रों की औनलाइन बुकिंग शुरू हो चुकी है, जो 14 दिसंबर तक जारी रहेगी. इस के पश्चात ईलौटरी के द्वारा किसानों का चयन किया जाएगा. चयनित किसान यंत्र खरीद कर विक्रेता के माध्यम से ही बिल और उस यंत्र के साथ फोटो नचलंदजतंजतंबापदह पोर्टल पर अपलोड करेंगे, जिस का समय से सत्यापन कर अनुदान राशि किसानों को वितरित कराई जाएगी. किसान सम्मान निधि योजना के अंतर्गत अवशेष ईकेवाईसी 69,587 किसानों को विकसित ‘भारत संकल्प यात्रा’ अभियान के दौरान कैंप लगाते हुए कर ली जाए. साथ ही, जिन किसानों के आधार सीडिंग बैंक में नहीं हुई है एवं भूलेख अंकन नहीं हुआ है, उन की भी योजना बना कर पूर्ति सुनिश्चित की जाए.

जिले में इस वर्ष पराली जलाए जाने की 32 घटनाएं हुई हैं, जिन में कुल 80,000 पर्यावरण क्षतिपूर्ति किसानों के विरुद्ध कार्यवाही की गई, जिस में से अभी तक महज 15,000 रुपए की वसूली हुई है. सभी उपजिलाधिकारी को अलग से पर्यावरण क्षतिपूर्ति वसूली किए जाने के निर्देश दिए गए.

जिलाधिकारी द्वारा उपनिदेशक, कृषि एवं जिला कृषि अधिकारी को निर्देशित किया गया कि समय से बीजों को वितरण करते हुए उन की डीबीटी कर अनुदान की धनराशि किसानों को उपलब्ध करा दें. साथ ही, प्रदर्शन इस प्रकार से किए जाएं, जिस से कि किसान प्रोत्साहित हो कर नई तकनीकियों को अपनाएं.

जिलाधिकारी द्वारा यह भी निर्देशित किया गया कि कृषि विभाग के अधिकारी एक मौडल फार्म एवं बखिरा झील के संबंध में अलग से प्रोजैक्ट तैयार कर इस क्षेत्र में विशेष काम करें. साथ ही, जिलाधिकारी द्वारा पशुपालन विभाग की समीक्षा के दौरान गोवंश संरक्षण अभियान की जानकारी ली गई. उन्होंने मुख्यमंत्री डैशबोर्ड की प्रगति की समीक्षा बैठक में गोवंश संरक्षण की प्रगति पर नाराजगी जाहिर की.

गोआश्रयस्थलवार यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट की जानकारी भी जिलाधिकारी द्वारा किस ब्लौक में कितने गोआश्रयस्थल हैं, कितने गोवंश आज की तिथि में संरक्षित हैं और कितने का फंड जेनरेट कर पैसा दिया जा रहा है. सहभागिता योजना के अंतर्गत ब्लौकवार सत्यापन की रिपोर्ट भी जिलाधिकारी द्वारा चाही गई. साथ ही, जिले में कितने कैटल कैचर संचालित हैं, उन की सूची भी मांगी गई. डा. सुरेंद्र कुमार द्वारा बताया गया कि जनपद में 3 कैटल कैचर वर्तमान में हंै.

सहकारिता विभाग की समीक्षा

जिलाधिकारी महेंद्र सिंह तंवर द्वारा सहकारिता विभाग की समीक्षा करते हुए निर्देश दिया गया कि सभी किसानों को उर्वरक गुणवत्तायुक्त मिले, निर्धारित मूल्य पर उर्वरक की बिक्री की जाए एवं किसानों को पीओएस मशीन से कटी रसीद दी जाए. जिन बिक्री कंेद्रों के द्वारा उर्वरक के निर्धारित मूल्य से अधिक धनराशि ली जाए, तो उन के विरुद्ध उर्वरक (नियंत्रण) आदेश 1985 एवं आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 की धारा 3ध्7 के अंतर्गत प्राथमिकी दर्ज कराई जाए. साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया जाए कि किसान को उन की भूमि की जोत एवं बोई गई फसल के अनुपात में उर्वरक की बिक्री की जाए, किसी भी किसान को जरूरत से ज्यादा मात्रा में उर्वरक की बिक्री न की जाए. जिन के द्वारा उर्वरक बिक्री बिना उर्वरक प्राधिकारपत्र के किया जाए, तो ऐसे विक्रेताओं के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराई जाए.

जनपद में सहकारिता विभाग द्वारा निर्धारित इफको उर्वरक लक्ष्य यूरिया 17757 एमटी के सापेक्ष 5567 एमटी, फास्फेटिक लक्ष्य 8041 एमटी के सापेक्ष 7512 एमटी उपलब्धता रही. दिसंबर, 2023 में यूरिया आपूर्ति के लिए रैक प्लान 2600 एमटी का है, जिस के सापेक्ष 6 दिसंबर, 23 को लगभग 1500 एमटी यूरिया प्राप्त होने की सूचना है. इसी प्रकार जिले की समितियों के माध्यम से प्रमाणित गेहंू बीज 770 क्ंिवटल का वितरण किया गया है. विभाग द्वारा सहकार से समृद्धि योजना के अंतर्गत कुल 83 बी-पैक्स के सापेक्ष माइक्रो एटीएम 39 पैक्स, कंप्यूटराइजेशन 11 पैक्स, प्रधानमंत्री जनऔषधि केंद्र 2 पैक्स एवं सीएससी की सेवा 43 समितियों पर उपलब्ध है.

जनपद में 9 बी-पैक्स समितियों द्वारा सदस्य किसानों को 3 फीसदी के ब्याज दर पर फसली ऋण वितरण के अंतर्गत अब तक 7 किसानों को 4.15 लाख रुपए का ऋण उपलब्ध कराया गया है.

जिलाधिकारी महेंद्र सिंह तंवर द्वारा उद्यान विभाग के क्रियाकलापों एवं योजनाओं की समीक्षा की गई. जिला उद्यान अधिकारी ने बताया कि उद्यान विभाग के अंतर्गत आईजीआरएस के माध्यम से 5 शिकायतें मिली थीं, जिन्हें समय से निस्तारित कर लिया गया. पिछली बैठक के दौरान दिए गए सभी निर्देशों का अनुपालन कर लिया गया था. बखिरा झील के आसपास के क्षेत्र में औद्यानिक फसलों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से खलीलाबाद फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी द्वारा केले की खेती कौंट्रैक्ट के आधार पर करने की इच्छा व्यक्त की गई. यह कंपनी 50 हेक्टेयर क्षेत्रफल में केले की खेती करने और केला आधारित उद्योग लगाने की इच्छुक है. इस कंपनी द्वारा महाराष्ट्र की सनरिया एग्रो कंपनी से मिल कर केले का निर्यात किया जाएगा.

जिलाधिकारी महेंद्र सिंह तंवर द्वारा एकीकृत बागबानी विकास मिशन योजना के अंतर्गत रबी मौसम के कार्यक्रमों के दिशानिर्देश विलंब से प्राप्त होने के कारण उन कार्यक्रमों को ज्यादा मौसम में करने के लिए अनुमोदन दिया गया. साथ ही, बखिरा झील के आसपास केले की खेती के लिए कार्यक्रम को अंतिम रूप देने के लिए निर्देशित किया गया.

इसी क्रम में जिलाधिकारी द्वारा दुग्ध विभाग की समीक्षा करते हुए जिला योजना एवं नंद बाबा मिशन दुग्ध समितियां के गठन व पुनर्गठन की पूर्ति कर ली गई. मुख्यमंत्री प्रगतिशील पशुपालन योजना के लिए प्राप्त आवेदनपत्रों की सत्यापन की कार्रवाई किए जाने का निर्देश दिया गया.

इस अवसर पर जिला विकास अधिकारी सुरेश चंद्र केसरवानी, उपकृषि निदेशक डा. राकेश कुमार सिंह, भूमि संरक्षण अधिकारी सीपी सिंह, जिला कृषि अधिकारी पीसी विश्वकर्मा, उप मुख्य चिकित्साधिकारी डा. राकेश तिवारी, एआर कौपरेटिव हरी प्रसाद, जिला उद्यान अधिकारी समुद्र गुप्त मल्ल, जिला कृषि रक्षा अधिकारी शशांक, दुग्ध विकास अधिकारी वीके गुप्ता, सूचना अधिकारी सुरेश कुमार सरोज आदि उपस्थित रहे.

हरे चारे की खेती

भारत के जो किसान खेती के साथ पशुपालन भी करते हैं, उन के लिए दुधारू पशुओं और पालतू पशुओं  के लिए हरे चारे की समस्या से दोचार होना पड़ता है. बारिश में तो हरा चारा खेतों की मेंड़ या खाली पड़े खेतों में आसानी से मिल जाता है, परंतु सर्दी या गरमी में पशुओं के लिए हरे चारे का इंतजाम करने में परेशानी होती है. ऐसे में किसानों को चाहिए कि  खेत के कुछ हिस्से में हरे चारे की बोवनी करें, जिस से अपने पालतू पशुओं को हरा चारा सालभर मिलता रहे.

पालतू पशुओं के लिए हरे चारे की बहुत कमी रहती है, जिस का दुधारू पशुओं की सेहत व दूध उत्पादन पर बुरा असर पड़ता है. इस समस्या के समाधान के लिए जायद में बहु कटाई वाली ज्वार, लोबिया, मक्का और बाजरा वगैरह फसलों को चारे के लिए बोया जाता है.

हालांकि मक्का, ज्वार जैसी फसलों से केवल 4-5 माह ही हरा चारा मिल पाता है, इसलिए किसान कम पानी में 10 से 12 महीने हरा चारा देने वाली फसलों को चुन सकते हैं.

जानकार किसान बरसीम, नेपियर घास, रिजका वगैरह लगा कर हरे चारे की व्यवस्था सालभर बनाए रख सकते हैं.

बरसीम

पशुओं के लिए बरसीम बहुत ही लोकप्रिय चारा है, क्योंकि यह बहुत ही पौष्टिक व स्वादिष्ठ होता है. यह साल के पूरे शीतकालीन समय में और गरमी के शुरू तक हरा चारा मुहैया करवाती है.

पशुपालन व्यवसाय में पशुओं से बहुत ज्यादा दूध उत्पादन लेने के लिए हरे चारे का खास महत्त्व है. पशुओं के आहार पर तकरीबन 70 फीसदी खर्च होता है और हरा चारा उगा कर इस खर्च को कम कर के ज्यादा फायदा कमाया जा सकता है.

गाडरवारा तहसील के अनुविभागीय अधिकारी केएस रघुवंशी बताते हैं कि बरसीम सर्दी के मौसम में पौष्टिक चारे का एक उत्तम जरीया है. इस में रेशे की मात्रा कम और प्रोटीन की औसत मात्रा 20 से 22 फीसदी होती है. इस के चारे की पाचनशीलता 70 से 75 फीसदी होती है. इस के अलावा इस में कैल्शियम और फास्फोरस भी काफी मात्रा में पाए जाते हैं. इस के चलते दुधारू पशुओं को अलग से खली, दाना वगैरह देने की जरूरत कम पड़ती है.

Green fodderनेपियर घास

किसानों के बीच नेपियर घास तेजी से लोकप्रिय हो रही है. गन्ने की तरह दिखने वाली नेपियर घास लगाने के महज 50 दिनों में विकसित हो कर अगले 4 से 5 साल तक लगातार दुधारू पशुओं के लिए पौष्टिक आहार की जरूरत को पूरी कर सकती है.

पशुपालकों को एक बार नेपियर घास लगाने पर 4-5 साल तक हरा चारा मिल सकता है. इसे मेंड़ पर लगा कर खेत में दूसरी फसलें उगा सकते हैं. 50 दिनों में फसल पूरी तरह से तैयार हो जाती है और इस में सिंचाई की जरूरत भी नहीं पड़ती है.

पशुपालन विभाग के एक अधिकारी बताते हैं कि प्रोटीन और विटामिन से भरपूर नेपियर घास पशुओं के लिए एक उत्तम आहार की जरूरत को पूरा करता है. दुधारू पशुओं को लगातार यह घास खिलाने से दूध उत्पादन में भी वृद्धि के साथ ही रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है. खेत की जुताई और समतलीकरण यानी एकसार करने के बाद नेपियर घास की जड़ों को 3-3 फुट की दूरी पर रोपा जाता है.

नेपियर घास का उत्पादन प्रति एकड़ तकरीबन 300 से 400 क्विंटल होता है. इस घास की खूबी यह है कि इसे कहीं भी लगाया जा सकता है. एक बार घास की कटाई करने के बाद उस की शाखाएं फिर से फैलने लगती हैं और 40 दिन में वह दोबारा पशुओं के खिलाने लायक हो जाता है. प्रत्येक कटाई के बाद घास की जड़ों के आसपास गोबर की सड़ी खाद या हलका यूरिया का छिड़काव करने से इस में तेजी से बढ़ोतरी होती है.

रिजका

यह किस्म चारे की एक अहम दलहनी फसल है, जो जून माह तक हरा चारा देती है. इसे बरसीम की अपेक्षा सिंचाई की जरूरत कम होती है. रिजका को 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 20 से 30 सैंटीमीटर के अंतर से लाइनों में बोआई करनी चाहिए.

अक्तूबर से नवंबर माह के मध्य का समय बोआई के लिए सब से अच्छा माना जाता है.

रिजका अगर पहली बार बोया गया है, तो रिजका कल्चर का प्रयोग करना चाहिए. यदि कल्चर उपलब्ध न हो तो जिस खेत में पहले रिजका बोया गया है, उस में से

ऊपरी परत से 30 से 40 किलोग्राम मिट्टी निकाल कर जिस में रिजका बोना है, उस में मिला देना चाहिए.

कम पानी में भी होगी जवाहर विसिया 1 

जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर के कृषि वैज्ञानिकों ने हरे चारे की एक नई किस्म खोजी है. कम पानी में उगने वाली हरे चारे की इस नई प्रजाति को जवाहर विसिया 1 नाम दिया गया है.

यह एक कटाई वाली दलहनी फसल है, जो 90 से 95 दिनों में चारे के लिए तैयार हो जाती है. एक हेक्टेयर जमीन में 240 से 260 क्विंटल हरे चारे के साथ 50 से 55 क्विंटल सूखे चारे का उत्पादन इस से होगा. इस चारे में 15 फीसदी तक प्रोटीन रहने के चलते यह पशुओं के लिए पौष्टिक है. दुधारू पशुओं में दूध की मात्रा बढ़ाने में यह चारा उपयोगी होगा.

जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर के वाइस चांसलर डाक्टर पीके विसेन ने बताया कि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों डाक्टर एके मेहता, डाक्टर एसबी दास, डाक्टर एसके बिलैया, डाक्टर पुष्पेंद्र यादव और डाक्टर अमित ?ा के सम्मिलित प्रयासों से एक लंबे अनुसंधान के बाद यह किस्म विकसित की गई है. कम पानी वाले या सूखाग्रस्त इलाकों के लिए चारे की यह किस्म वरदान साबित होगी.

अखिल भारतीय चारा अनुसंधान परियोजना की ओर से इंफाल, मणिपुर में आयोजित नैशनल सैमिनार में हरे चारे की इस किस्म को मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र व उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके के लिए अनुमोदित किया गया है.

पशुपालन आंकड़े हुए जारी

गुवाहाटी: केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री परषोत्तम रूपाला ने पिछले दिनों गुवाहाटी में राष्ट्रीय दुग्ध दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में पशु एकीकृत नमूना सर्वे (मार्च, 2022-फरवरी, 2023) पर आधारित बुनियादी पशुपालन आंकड़े 2023 (दूध, अंडा, मांस और ऊन उत्पादन 2022-23) जारी किए. बुनियादी पशुपालन आंकड़ों की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

दूध, अंडा, मांस एवं ऊन उत्पादन

केंद्रीय मंत्री परषोत्तम रूपाला ने बताया कि देश में दूध, अंडा, मांस और ऊन के उत्पादन का अनुमान वार्षिक एकीकृत नमूना सर्वे (आईएसएस) के परिणामों के आधार पर लगाया जाता है, जो देशभर में 3 मौसमों यानी गरमी (मार्चजून), बरसात (जुलाईअक्तूबर) और सर्दी (नवंबरफरवरी) में आयोजित किया जाता है. वर्ष 2022-23 के लिए दूध, अंडा, मांस और ऊन के उत्पादन का अनुमान सामने लाया गया है और इस सर्वे के परिणामों को संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है.

दूध उत्पादन

केंद्रीय मंत्री परषोत्तम रूपाला ने बताया कि वर्ष 2022-23 के दौरान देश में कुल दूध उत्पादन 230.58 मिलियन टन अनुमानित है, जिस में पिछले 5 वर्षों में 22.81 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई, जो वर्ष 2018-19 में 187.75 मिलियन टन थी. इस के अलावा वर्ष 2021-22 के अनुमान से वर्ष 2022-23 के दौरान उत्पादन 3.83 फीसदी बढ़ गया है. पूर्व में, वर्ष 2018-19 में वार्षिक वृद्धि दर 6.47 फीसदी, वर्ष 2019-20 में 5.69 फीसदी, वर्ष 2020-21 में 5.81 फीसदी और वर्ष 2021-22 में 5.77 फीसदी थी.

केंद्रीय मंत्री परषोत्तम रूपाला ने कहा कि वर्ष 2022-23 के दौरान सब से अधिक दुग्ध उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश था, जिस की कुल दुग्ध उत्पादन में हिस्सेदारी 15.72 फीसदी थी. इस के बाद राजस्थान (14.44 फीसदी), मध्य प्रदेश (8.73 फीसदी), गुजरात (7.49 फीसदी) और आंध्र प्रदेश (6.70 फीसदी) का स्थान था. वार्षिक वृद्धि दर (एजीआर) के संदर्भ में, पिछले वर्ष की तुलना में सब से अधिक वार्षिक वृद्धि दर कर्नाटक (8.76 फीसदी) में दर्ज किया गया, इस के बाद पश्चिम बंगाल (8.65 फीसदी) और उत्तर प्रदेश (6.99 फीसदी) का स्थान रहा.

अंडा उत्पादन

केंद्रीय मंत्री परषोत्तम रूपाला ने कहा कि देश में कुल अंडा उत्पादन 138.38 बिलियन होने का अनुमान है. वर्ष 2018-19 के दौरान 103.80 बिलियन अंडों के उत्पादन के अनुमान की तुलना में वर्ष 2022-23 के दौरान पिछले 5 वर्षों में 33.31 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई. इस के अलावा, वर्ष 2021-22 की तुलना में वर्ष 2022-23 के दौरान उत्पादन में 6.77 फीसदी की वार्षिक वृद्धि हुई है. पूर्व में वर्ष 2018-19 में वार्षिक वृद्धि दर 9.02 फीसदी, वर्ष 2019-20 में 10.19 फीसदी, वर्ष 2020-21 में 6.70 फीसदी और वर्ष 2021-22 में 6.19 फीसदी थी.

उन्होंने बताया कि देश के कुल अंडा उत्पादन में प्रमुख योगदान आंध्र प्रदेश का रहा है, जिस की हिस्सेदारी कुल अंडा उत्पादन में 20.13 फीसदी है. इस के बाद तमिलनाडु (15.58 फीसदी), तेलंगाना (12.77 फीसदी), पश्चिम बंगाल (9.94 फीसदी) और कर्नाटक (6.51 फीसदी) का स्थान है. वार्षिक वृद्धि दर (एजीआर) के संदर्भ में, सब से अधिक वृद्धि दर पश्चिम बंगाल में (20.10 फीसदी) दर्ज की गई और उस के बाद सिक्किम (18.93 फीसदी) और उत्तर प्रदेश (12.80 फीसदी) का स्थान रहा.

मांस उत्पादन

केंद्रीय मंत्री परषोत्तम रूपाला ने कहा कि वर्ष 2022-23 के दौरान देश में कुल मांस उत्पादन 9.77 मिलियन टन होने का अनुमान है, जिस में वर्ष 2018-19 में 8.11 मिलियन टन के अनुमान की तुलना में पिछले 5 वर्षों में 20.39 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है. वर्ष 2021-22 की तुलना में वर्ष 2022-23 में 5.13 फीसदी की वृद्धि हुई. इस से पहले वर्ष 2018-19 में वार्षिक वृद्धि दर 5.99 फीसदी, वर्ष 2019-20 में 5.98 फीसदी, वर्ष 2020-21 में 2.30 फीसदी और वर्ष 2021-22 में 5.62 फीसदी थी.

उन्होंने आगे कहा कि कुल मांस उत्पादन में प्रमुख योगदान 12.20 फीसदी हिस्सेदारी के साथ उत्तर प्रदेश का है और इस के बाद पश्चिम बंगाल (11.93 फीसदी), महाराष्ट्र (11.50 फीसदी), आंध्र प्रदेश (11.20 फीसदी) और तेलंगाना (11.06 फीसदी) का स्थान है. वार्षिक वृद्धि दर के संदर्भ में, उच्चतम वार्षिक वृद्धि दर (एजीआर) सिक्किम में (63.08 फीसदी) दर्ज की गई है, इस के बाद मेघालय (38.34 फीसदी) और गोवा (22.98 फीसदी) का स्थान है.

ऊन उत्पादन

मंत्री परषोत्तम रूपाला ने बताया कि वर्ष 2022-23 के दौरान देश में कुल ऊन उत्पादन 33.61 मिलियन किलोग्राम अनुमानित है, जिस में वर्ष 2018-19 के दौरान 40.42 मिलियन किलोग्राम के अनुमान की तुलना में पिछले 5 वर्षों में 16.84 फीसदी की नकारात्मक वृद्धि दर्ज की गई है. हालांकि वर्ष 2021-22 की तुलना में 2022-23 में उत्पादन 2.12 फीसदी बढ़ गया है. इस से पूर्व में वर्ष 2018-19 में वार्षिक वृद्धि दर -2.51 फीसदी, वर्ष 2019-20 में -9.05 फीसदी, वर्ष 2020-21 में -0.46 फीसदी और वर्ष 2021-22 में -10.87 फीसदी थी.

उन्होंने बताया कि कुल ऊन उत्पादन में 47.98 फीसदी हिस्सेदारी के साथ राजस्थान का प्रमुख योगदान है, इस के बाद जम्मूकश्मीर (22.55 फीसदी), गुजरात (6.01 फीसदी), महाराष्ट्र (4.73 फीसदी) और हिमाचल प्रदेश (4.27 फीसदी) का स्थान है. वार्षिक वृद्धि दर के संदर्भ में सब से अधिक वार्षिक वृद्धि दर अरुणाचल प्रदेश (35.75 फीसदी) में दर्ज किया गया है, इस के बाद राजस्थान (6.06 फीसदी) और झारखंड (2.36 फीसदी) का स्थान है.

समुद्री नौकाओं को आधुनिक बनाने के लिए अनुदान

अहमदाबाद: भारत के मत्स्यपालन उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए उठाए गए एक महत्वपूर्ण कदम में, मत्स्यपालन, पशुपालन एवं डेरी राज्य मंत्री डा. एल. मुरुगन ने पिछले दिनों नीली क्रांति और प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) के माध्यम से पारंपरिक मछुआरों को गहरे समुद्र में मछली पकड़ने की तरफ परिवर्तन में समर्थन देने के लिए केंद्र सरकार की अटूट प्रतिबद्धता पर जोर दिया.

उन्होंने गुजरात साइंस सिटी, अहमदाबाद में आयोजित ग्लोबल फिशरीज कौंफ्रैंस इंडिया 2023 में ‘गहरे समुद्र में मछली पकड़ना: प्रौद्योगिकी, संसाधन और अर्थशास्त्र‘ विषय पर एक तकनीकी सत्र में यह बात कही.

डा. एल. मुरुगन ने कहा कि सरकार पारंपरिक मछुआरों को अपने जहाजों को गहरे समुद्र में मछली पकड़ने वाली नौकाओं में बदलने के लिए 60 फीसदी तक वित्तीय सहायता प्रदान कर रही है. इस के अतिरिक्त इस परिवर्तन को सुविधाजनक बनाने के लिए ऋण सुविधाएं भी उपलब्ध हैं.

उन्होंने टूना जैसे गहरे समुद्र के संसाधनों के लिए अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों को बनाए रखने के लिए अंतर्निर्मित प्रसंस्करण सुविधाओं से लैस आधुनिक मछली पकड़ने वाले जहाजों की आवश्यकता पर जोर दिया. यह स्वीकारते हुए कि पारंपरिक मछुआरों में वर्तमान में इन क्षमताओं की कमी है. सरकार इस अंतर को दूर करने के लिए प्रतिबद्ध है.

डा. एल. मुरुगन ने आगे कहा कि टूना मछलियों की दुनियाभर में काफी मांग है और भारत में अपनी टूना मछली पकड़ने की क्षमता बढ़ाने की शक्ति है. उन्होंने अधिक स्टार्टअप को गहरे समुद्र में मछली पकड़ने के क्षेत्र में प्रवेश करने व ईंधन की लागत को कम करने और मछली पकड़ने वाली नौकाओं में हरित ईंधन के उपयोग की खोज पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अनुसंधान का आह्वान किया. गहरे समुद्र में मछली पकड़ने की क्षमता का स्थायी तरीके से प्रभावी ढंग से उपयोग कर मछली पकड़ने वाले जहाजों को उन्नत करने के लिए अनुसंधान और डिजाइन की आवश्यकता है.

गहरे समुद्र के संसाधनों के उच्च मूल्य पर प्रकाश डालते हुए भारत सरकार के मत्स्यपालन के उपायुक्त डा. संजय पांडे ने कहा कि हिंद महासागर येलोफिन टूना का अंतिम मूल्य 4 बिलियन अमेरिकी डौलर से अधिक है.

विश्व बैंक के सलाहकार डा. आर्थर नीलैंड ने कहा कि भारत के ईईजेड में 1,79,000 टन की अनुमानित फसल के साथ येलोफिन और स्किपजैक टूना की आशाजनक क्षमता के बावजूद वास्तविक फसल केवल 25,259 टन है, जो केवल 12 फीसदी की उपयोग दर का संकेत देती है.

उन्होंने गहरे समुद्र में मछली पकड़ने में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र से निवेश की आवश्यकता पर जोर दिया, जिस से आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय लाभ हो सके.

डा. आर्थर नीलैंड ने आगे कहा, ‘‘विशेषज्ञ मत्स्यपालन विज्ञान और प्रबंधन, मछली प्रोसैसिंग और बुनियादी ढांचे के साथ भारत के मजबूत संस्थागत आधार का उपयोग गहरे समुद्र में मछली पकड़ने की विकास योजनाओं के लिए भी फायदेमंद होगा.‘‘

Fishermanउन्होंने जानकारी देते हुए आगे कहा कि हितधारकों की भागीदारी और निवेश, प्रौद्योगिकी और विशेषज्ञता एवं क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और साझेदारी को प्रोत्साहित करने के लिए एक माहौल बनाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

इस विषय पर आयोजित एक पैनल चर्चा में प्रस्ताव दिया गया कि गहरे समुद्र में मछली पकड़ने के विकास के लिए एक व्यवस्थित ढांचा विकसित करने के लिए सभी हितधारकों की चिंताओं को संबोधित करने वाले सामूहिक और समावेशी प्रयास आवश्यक हैं. गहरे समुद्र के सलाहकार, एनआईओटी, चेन्नई, डा. मानेल जखारियाय, वैज्ञानिक-जीएमओईएस, डा. प्रशांत कुमार श्रीवास्तव, आईसीएआर-केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सीएमएफआरआई) के वरिष्ठ वैज्ञानिक, डा. पी. शिनोजय और सीएमएलआरई के वैज्ञानिक डी, डा. हाशिम पैनलिस्ट थे.

गहरे समुद्र में मछली पकड़ने का काम प्रादेशिक जल की सीमा से परे किया जाता है, जो तट से 12 समुद्री मील की दूरी पर है, और तट से 200 समुद्री मील के विशेष आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) के भीतर है.

जलीय कृषि में नवाचारों के लिए ब्लू फाइनेंस को बढ़ाने का आह्वान

जलवायु परिवर्तन और खाद्य एवं पोषण सुरक्षा की बढ़ती मांग से उत्पन्न गंभीर खतरों को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के वरिष्ठ मत्स्य अधिकारी साइमन फ्यूंजस्मिथ ने जलकृषि क्षेत्र में नवाचारों और विकास के लिए ब्लू फाइनेंस बढ़ाने का आह्वान किया.

उन के अनुसार, वैश्विक जलीय कृषि साल 2030 तक मानव उपभोग के लिए 59 फीसदी मछली प्रदान करेगी. साइमन फ्यूंजस्मिथ ने कहा कि एशिया 82 मिलियन टन के साथ वैश्विक जलीय कृषि उत्पादन का 89 फीसदी प्रदान करता है. एशिया में अधिकतर छोटे पैमाने के उद्यम कुल उत्पादन में 80 फीसदी से ज्यादा का योगदान दे रहे हैं. यह क्षेत्र प्राथमिक क्षेत्र में 20.5 मिलियन लोगों के लिए नौकरियां पैदा करता है. स्थायी मत्स्यपालन और जलीय कृषि को बढ़ावा देने का उल्लेख करते हुए उन्होंने छोटे पैमाने पर मत्स्यपालन और जल किसानों द्वारा स्थायी प्रथाओं का समर्थन करने का सुझाव दिया.

भेड़बकरी एवं खरगोशपालन पर प्रशिक्षण

अविकानगर: केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान, अविकानगर में एग्री बिजनैस इनक्यूबेटर सैंटर एवं केड फाउंडेशन, उदयपुर के तत्वावधान में 10 राज्यों, राजस्थान, हरियाणा, गुजरात, मध्य प्रदेश, पंजाब, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश एवं दिल्ली के 45 किसानो (3 महिला एवं 42 पुरुष) का 5वें बैच को व्यावसायिक भेड़बकरी एवं खरगोशपालन पर प्रशिक्षण कार्यक्रम 16 से 22 नवंबर, 2023 तक केड फाउंडेशन द्वारा पांचदिवसीय प्रशिक्षण उदयपुर में और दोदिवसीय प्रशिक्षण अविकानगर में आयोजित किया गया.

संस्थान के निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर ने सभी प्रशिक्षणार्थियों को संबोधित करते हुए बताया कि इस प्रशिक्षण का उद्देश्य आप के भेड़बकरीपालन की जानकारी से पहले से उपलब्ध जानकारी में कुछ नई जानकारी देनी है.

Sheep-Goat Husbandryवर्तमान समय में वैज्ञानिक तरीके से भेड़बकरीपालन व्यवसाय करते हुए आजीविका में बढ़ोतरी की जा सकती है. बढ़ते शहरीकरण के कारण खेती और पशुपालन उद्यमिता का रूप लेता जा रहा है, क्योकि शहरी लोगों की भोजन की हर आवश्यकता आप के द्वारा ही की जा सकती है.

इसलिए आप अपने भेड़बकरीपालन व्यवसाय को पशुपालन उद्यमिता के रूप में विकसित कर के भारत सरकार की मंशा आत्मनिर्भर भारत में अपने परिवार को माली रूप से सशक्त बना कर और लोगों को भी रोजगार दे कर कर सकते हैं.

निदेशक द्वारा किसान के हर तरह के भेड़बकरीपालन के सवाल का जवाब देते हुए भविष्य में भी संस्थान का पूरा सहयोग का आश्वासन दिया गया. अंत में सभी प्रशिक्षण लेने वाले प्रगतिशील किसानों को प्रमाणपत्र दिया गया.

Sheep-Goat Husbandryअविकानगर में प्रशिक्षण कार्यक्रम के समन्वयक डा. विनोद कदम, सहसमन्वयक डा. अजित सिंह महला व डा. अरविंद सोनी द्वारा किया गया. पशु पोषण विभाग के विभागाध्यक्ष डा. रणधीर सिंह भट्ट, केड फाउंडेशन, उदयपुर के निदेशक मुकेश सुथार, डा. अमर सिंह मीना, फिजियोलौजी एवं जैव रसायन विभाग के प्रभारी डा. सत्यवीर सिंह डांगी, डा. दुश्यंत कुमार शर्मा, नरेश बिश्नोई, अविकानगर संस्थान के मीडिया प्रभारी व वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. अमर सिंह मीना आदि द्वारा भी प्रशिक्षण कार्यक्रम को सफल बनाने में पूरा सहयोग दिया गया.

खाद्यान्न जरूरतों के मामले में भारत सरप्लस

रांची : कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता विभाग के सचिव और बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति अबूबकर सिद्दीकी ने कृषि वैज्ञानिकों का आह्वान किया है कि वे जलवायु के अनुकूल खेती पर अपना अनुसंधान प्रयास केंद्रित करें.

उन्होंने यह भी कहा कि अपनी खाद्यान्न जरूरतों के मामले में भारत सरप्लस है, लेकिन बायोसेफ्टी, पोषण सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निबटने के लिए अब भी बहुत काम करने की जरूरत है.

वह भारतीय आनुवंशिकी एवं पौधा प्रजनन सोसाइटी, नई दिल्ली के रांची चैप्टर द्वारा बिरसा कृषि विश्वविद्यालय में ‘फसल सुधार के लिए पौधा विज्ञान की चुनौतियां, अवसर एवं रणनीतियां’ विषय पर आयोजित दोदिवसीय राष्ट्रीय सैमिनार को संबोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि जो लोग अपने ज्ञान को साझा नहीं करते, उन के ज्ञान की कोई उपयोगिता नहीं रह जाती है, इसलिए वैज्ञानिकों को पढ़ना, सुनना, देखना, विश्लेषण करना और नवोन्मेष (इनोवेशन) करना सतत जारी रखना चाहिए. ज्ञानकौशल की गति और गुणवत्ता दुनिया के साथ मिला कर रखना होगा, तभी हम प्रतिस्पर्धा और रोजगार बाजार में टिक पाएंगे.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सहायक महानिदेशक (खाद्य एवं चारा फसलें) डा. एसके प्रधान ने कहा कि देश में इस वर्ष 330 मिलियन टन खाद्यान्न का उत्पादन हुआ, जो वर्ष 2030 का लक्ष्य था यानी इस मोरचे पर हम 7 वर्ष आगे हैं, किंतु इस से हमें आत्मसंतुष्ट नहीं होना है. मक्का और मिलेट्स उत्पादन का वर्तमान स्तर 37 और 15 मिलियन टन है, जिसे वर्ष 2047 तक बढ़ा कर क्रमशः 100 मिलियन टन एवं 45 मिलियन टन करना है. बायोफ्यूल के लिए भी मक्का फसल की जरुरत है. उत्पादन वृद्धि का भावी लक्ष्य भी हमें कम पानी, कम उर्वरक, कम रसायन और कम भूमि का प्रयोग करते हुए हासिल करना होगा.

Surplus Foodसोसाइटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं भारतीय बीज विज्ञान संस्थान, मऊ (उत्तर प्रदेश) के निदेशक डा. संजय कुमार ने अपने औनलाइन संबोधन में कहा कि भारत में दुनिया की लगभग 18 फीसदी आबादी रहती है, किंतु इस के पास विश्व का केवल 2.4 फीसदी भूमि संसाधन और 4 फीसदी जल संसाधन उपलब्ध है, इसलिए भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए हमें अपनी फसल प्रजनन और बीज प्रजनन नीतियों, योजनाओं और रणनीतियों में बदलाव लाना होगा.

शुरू में स्वागत भाषण करते हुए आयोजन सचिव और बीएयू के आनुवंशिकी एवं पौधा प्रजनन विभाग की अध्यक्ष डा. मणिगोपा चक्रवर्ती ने सोसाइटी के रांची चैप्टर की गतिविधियों और उपलब्धियों पर प्रकाश डाला.

आयोजन हाईब्रिड मोड में किया जा रहा है, जिस में देश के विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और कृषि उद्योगों से आनुवंशिकी, पौधा प्रजनन, पादप जैव प्रौद्योगिकी, फसल दैहिकी, बीज प्रौद्योगिकी, बागबानी एवं सब्जी विज्ञान से जुड़े डेढ़ सौ से अधिक कृषि वैज्ञानिक औफलाइन एवं औनलाइन मोड में भाग लिया. औनलाइन भाग लेने वालों में बीएयू के पूर्व कुलपति डा. एमपी पांडेय, डा. ओंकार नाथ सिंह और बीएचयू के स्कूल औफ बायोटैक्नोलौजी के पूर्व प्रोफैसर डा. बीडी सिंह शामिल हैं.

कृषि सचिव ने इस अवसर पर बीएयू के आनुवंशिकी एवं पौधा प्रजनन विभाग के पूर्व अध्यक्ष डा. जेडए हैदर एवं डा. वायलेट केरकेट्टा और पूर्व अनुसंधान निदेशक डा. ए. वदूद को उन के विशिष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया. सोसाइटी की कोषाध्यक्ष डा. नूतन वर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन किया.

प्रसवकाल में डेरी पशुओं की देखभाल

* पशुशाला में पशुओं के प्रसव के लिए अलग से प्रसवघर का इंतजाम करना चाहिए, जो कि साफसुथरा और हवादार होना चाहिए. फर्श को फिनाइल से धो कर सुखा लें. इस के बाद तुड़ी या पराली बिछा दें. फर्श ऊंचानीचा और फिसलने वाला यानी चिकना नहीं होना चाहिए. इस जगह में रोशनी का सही इंतजाम होना चाहिए.

* ब्याने से लगभग 10 दिन पहले पशु को प्रसवघर में बांधना शुरू कर दें. प्रसव के समय पशु के पास अधिक व्यक्तियों को खड़ा न होने दें और पशु के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ न करें.

* ब्याने के समय यदि पशु खड़ा है तो ध्यान रखें कि बच्चा जमीन पर जोर से न गिरे. जब बच्चा योनि द्वार से बाहर आने लगे तो हाथों द्वारा बाहर निकालने में मादा की मदद करें.

* प्रसव के दौरान मादा को तकलीफ होने लगे या बच्चे का कुछ भाग बाहर आ जाए और पूरा बच्चा बाहर न आए तो उसी समय पशु चिकित्सक की मदद लें. कोशिश करें कि प्रसव के समय पशु विशेषज्ञ आप की पहुंच में हो जिस से पशु को कोई समस्या होने पर उस की तुरंत मदद ली जा सके.

* प्रसव क्रिया शुरू होते ही पशु बेचैन हो जाता है और योनि द्वार से तरल पदार्थ निकलना इस का मुख्य लक्षण है.

* इस समय पानी की थैली बाहर निकलती है जिसे अपनेआप ही फटने दें और छेड़छाड़ न करें. प्रसव के समय बच्चा पहले सामने के पैरों पर सिर टिकी अवस्था में बाहर आता है.

* प्रसव के बाद योनि द्वार पूंछ और पीछे के हिस्से को कुनकुने पानी में तैयार पोटैशियम परमैगनेट के घोल से साफ कर दें. पशु के पास गंदगी को तुरंत हटा दें.

* यदि प्रसव 4 घंटे में न हो तो पशु चिकित्सक की मदद लेनी चाहिए.

* अकसर जेर 5-6 घंटे में बाहर निकल जाता है. यदि जेर 13-14 घंटे तक न निकले तो पशु चिकित्सक को दिखाएं.

पशुपालन : सरकारी योजनाओं का लें फायदा

हमारे यहां कई गंवई इलाकों में पशुपालन खेती के साथसाथ किया जाने वाला काम है. कुछ लोग अपनी घरेलू जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ही पशुपालन करते हैं, वहीं कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने पशुपालन को बतौर डेरी कारोबार के रूप में अपनाया हुआ है.

यही डेरी कारोबार उन की आमदनी का एकमात्र जरीया है. लेकिन किसी भी काम को करने के लिए उस के बारे में सटीक जानकारी हो तो कारोबार मुनाफे का सौदा बनता है. कई दफा जानकारी की कमी में कारोबार करने वालों को नुकसान उठाना पड़ता है, इसलिए पशुपालन में पशुओं का रखरखाव, उन के खानपान में चारा, पानी वगैरह देने के अलावा घरेलू उपचार की सही जानकारी होनी चाहिए.

नया डेरी फार्म लगाने के लिए पहले या दूसरे ब्यांत के पशु जो कि ज्यादा से ज्यादा 20 या 25 दिन की ब्याई हुई ही खरीदनी चाहिए, क्योंकि ऐसे पशु अधिक समय तक दूध देते हैं.

इस के अलावा पशुओं की हर अवस्था जैसे गर्भकाल, प्रसवकाल और दूध काल वगैरह में समुचित देखभाल और प्रबंधन से ही किसी भी डेरी फार्म या डेरी उद्योग को कामयाब बनाया जा सकता है.

गांवों में पशुओं की देखभाल व खानपान, प्रबंधन का काम ज्यादातर महिलाएं ही करती हैं. इसलिए यह जरूरी भी है कि समयसमय पर महिलाओं को पशुओं की देखभाल और प्रबंधन के बारे में तकनीकी जानकारी प्रशिक्षण के माध्यम से देनी चाहिए ताकि पशु से ज्यादा से ज्यादा दूध ले सकें.

केंद्र सरकार द्वारा भी किसानों और पशुपालकों के लिए अनेक हितकारी योजनाएं समयसमय पर आती रहती हैं, उन की जानकारी ले कर भी फायदा उठाना चाहिए. इस तरह की जानकारी अखबारों, पत्रपत्रिकाओं, रेडियो, टीवी और कृषि विभागों द्वारा दी जाती है.

इस के अलावा कृषि मेलों में भी भरपूर जानकारी मिलती है. अपने नजदीक लगने वाले ऐसे आयोजनों में भी युवा महिला व किसानों को जाना चाहिए, जहां पर खेतीकिसानी व पशुपालन के अनेक विशेषज्ञ होते हैं जो आप को नईनई जानकारी देते हैं. खेती से जुड़ी सरकारी कंपनियां, प्राइवेट कंपनियां, बैंक वगैरह के अधिकारी मौजूद होते हैं. उन से भी आम लोगों को तमाम तरह की नई जानकारी मिलती है.

डेरी सब्सिडी स्कीम (नाबार्ड) की उद्यमिता विकास योजना (डीईडीएस) : केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई इस योजना का खास मकसद देश में दूध के कारोबार को बढ़ावा देना है. पशुपालन योजना के तहत आधुनिक डेरी या डेरी फार्म खोल कर आम किसान अपनी आमदनी में इजाफा कर सकते हैं.

इस योजना का फायदा किसान और पशुपालक दोनों ही ले सकते हैं. जो लोग डेरी कारोबार से जुड़े हैं, वह इस काम को और आगे बढ़ा सकते हैं और अनेक लोगों को रोजगार भी दे सकते हैं.

गंवई इलाकों के बेरोजगार नौजवान भी इस काराबार को शुरू कर सकते हैं. अगर आप को पशुपालन का तजरबा है तो अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं.

केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई इस योजना के तहत डेरी कारोबार से फायदा उठाने के लिए गायपालन और भैंसपालन के लिए लोन दिया जाता है. इस में सरकार द्वारा 25 से 33 फीसदी तक सब्सिडी दी जाती है.

अगर आप 10 दुधारू पशुओं से डेरी की शुरुआत करना चाहते हैं और इस पर होने वाला खर्चा तकरीबन 7 लाख रुपए आता है तो केंद्र के कृषि मंत्रालय द्वारा चलाई जा रही डीईडीएस योजना में आप को तकरीबन 1.75 लाख रुपए की सब्सिडी मिलेगी.

केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय द्वारा यह सब्सिडी राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास  बैंक यानी नाबार्ड के माध्यम से मुहैया कराई जाती है.

किस को कितनी सब्सिडी मिलेगी : डीईडीएस योजना के तहत आप को डेरी लगाने के लिए आमतौर पर 25 फीसदी की सब्सिडी मिलेगी. अगर आप अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से हैं, तो इस योजना के तहत आप को 33 फीसदी सब्सिडी दी जाएगी.

आप अगर राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक यानी नाबार्ड से डेरी खोलने के लिए लोन लेते हैं तो आप को कुछ नियमों का पालन करना होगा और अहम कागजात की जरूरत पड़ेगी. इस की जानकारी इस तरह से है:

* अगर आप के पास 2 से ज्यादा पशु हैं तो आप इस लोन के लिए आवेदन कर सकते हैं. अगर आप पहले से ही पशुपालन करते रहे हैं तो आप को लोन मिलने में भी आसानी होगी और लोन के लिए आवेदन करने के लिए आवेदनकर्ता की उम्र 18 साल से ज्यादा और 65 साल से कम होनी चाहिए.

* अगर आप 2 से ले कर 10 पशु के साथ डेरी शुरू करना चाहते हैं तो प्रति 5 पशु के लिए 0.25 एकड़ जमीन चारे के लिए मुहैया होनी चाहिए. अगर आप के पास जमीन है तो अच्छी बात है. अगर जमीन नहीं है तो आप किसी अन्य व्यक्ति की जमीन किराए पर ले कर यह काम शुरू कर सकते हैं. इस की जानकारी आप को बैंक को देनी होगी.

* आप जहां डेरी खोलना चाहते हैं, वहां का मूल निवास प्रमाणपत्र होना चाहिए.

क्याक्या कागजात जरूरी

* आवेदन फार्म (यह फार्म आप को औनलाइन इंटरनैट या फिर बैंक में मिल जाएगा).

* पहचान के लिए आधारकार्ड या वोटर आईडी कार्ड होना चाहिए.

* जिस बैंक में आप का अकाउंट है, उस बैंक की पासबुक होनी चाहिए.

* आप जहां डेरी खोलना चाहते हैं, वहां का मूल निवास प्रमाणपत्र होना चाहिए.

* आवेदन करने वाले व्यक्ति का पासपोर्ट साइज का फोटो भी चाहिए.

जरूरी कागजातों के अलावा आप को एक आवेदनपत्र देना होगा, जिस में यह लिखा होना चाहिए कि आप लोन क्यों ले रहे हैं? आप यह लोन कितने सालों में चुका देंगे? आप के पास कितने पशु हैं और फिलहाल इन से आप की कितनी आमदनी हो रही है? वगैरह.

इस तरह की जानकारी बैंक आप से मांगेगा, इसलिए ऐसे में आप को इन सवालों के जवाब की पहले से तैयारी कर लेनी चाहिए ताकि बाद में आप को किसी तरह की परेशानी न आए.

डेरी खोलने के लिए लोन का एप्लीकेशन फार्म लेते समय आप किसी भी बैंक कर्मचारी से सही जानकारी ले सकते हैं. बैंक कर्मचारी आप को बता देंगे, जैसे इस में कौनकौन से कागजात लगेंगे. आप को कितने दिन में यह लोन मिल सकता है वगैरह.

कैसे करें आवेदन : डेरी खोलने के लिए लोन कैसे मिलेगा तो इस के लिए आप को अपने बैंक जाना है. वहां आप को एप्लीकेशन फार्म के साथ जरूरी कागजात नत्थी करने हैं.

इन सभी कागजातों के साथ आप को बैंक में इन्हें जमा करना है. यहां बैंक कर्मचारी आप के लोन का आवेदन फार्म नाबार्ड यानी राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक में भेज देंगे.

आप चाहें तो अपने नजदीकी राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) जा कर लोन के लिए खुद भी फार्म जमा कर सकते हैं. इस के बाद आप के दस्तावेज सत्यापन यानी वैरीफिकेशन के लिए राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक जाएंगे.

डौक्यूमैंट वेरीफाई होने के बाद आप को पूछताछ के लिए बैंक बुलाया जाएगा. आप द्वारा दिए गए जवाब से संतुष्ट होने पर ही आप को लोन मिल सकेगा, अन्यथा बैंक कर्मचारी आप के लोन को रिजैक्ट कर सकता है. ऐसे में यह जरूरी है, आप को उस के सवालों का सही जवाब देना होगा. उसे भरोसा दिलाना होगा कि आप को वाकई लोन की जरूरत है.

डेरी फार्म कारोबार में होने वाला अनुमानित खर्च : अगर आप दूध देने वाले 10 पशुओं की डेरी खोलते हैं तो इस प्रोजैक्ट में तकरीबन 7 लाख रुपए की लागत आएगी.

डेरी उद्यमिता विकास योजना यानी डीईडीएस के तहत आप को इस में 1.75 लाख रुपए की सब्सिडी मिल जाएगी. तकरीबन सभी बैंक लोन देते समय अपने लोन की सुरक्षा के लिए आवेदनकर्ता से कुछ न कुछ गिरवी जरूर रखवाते हैं. इसे सिक्योरिटी डिपोजिट कहा जाता है. इस के लिए आप से जमीन के कागजात या घर के ऐसे कागजात मांगे जाते हैं, जिन की कीमत आप के लोन से ज्यादा हो और जब आप का लोन चुकता हो जाता है तो वह कागजात आप को वापस मिल जाते हैं.

अन्य योजनाओं में भी सब्सिडी

Pashupalanदूध उत्पादन के लिए उपकरण पर सब्सिडी : डेरी उद्यमिता विकास योजना (डीईडीएस) के तहत दूध से बनने वाली अनेक चीजें (मिल्क प्रोडक्ट) बनाने की यूनिट शुरू करने के लिए भी सब्सिडी दी जाती है. इस योजना के तहत आप दूध उत्पाद की प्रोसैसिंग के लिए उपकरण खरीद सकते हैं. खरीदे गए उपकरण पर आप को 25 फीसदी तक की कैपिटल सब्सिडी मिल सकती है.

अगर आप अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति में आते हैं तो आप को इस के लिए 33 फीसदी सब्सिडी मिल सकती है.

मिल्क कोल्ड स्टोरेज पर भी है सब्सिडी: इस योजना के तहत दूध और दूध से बने उत्पाद के संरक्षण के लिए कोल्ड स्टोरेज यूनिट शुरू कर सकते हैं. इस पर भी 33 फीसदी  सब्सिडी मिलेगी.

राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की तरफ से डेरी उद्यमिता विकास योजना के तहत पशु खरीदने, बछड़ापालन, वर्मी कंपोस्ट, डेरी लगाने, दूध शीतलन व अन्य कामों के लिए लघु एवं सीमांत किसानों समेत समूहों को प्राथमिकता दी जाती है.

डीईडीएस के बारे में अधिक जानकारी के लिए नाबार्ड की वैबसाइट पर जाए या अपने नजदीकी पशुपालन विभाग से संपर्क करें.