किसान के घर पर किसानवैज्ञानिक संगोष्ठी

अविकानगर : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के संस्थान केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान, अविकानगर (मालपुरा जिला – टोंक) निदेशक एवं भ्रमण कार्यक्रम समन्वयक डा. अरुण कुमार तोमर ने गांव देशांतरी नाड़ी (नयानगर) गुड़ामालानी के प्रगतिशील किसान छगन लाल गोयल के घर पर किसानवैज्ञानिक संगोष्ठी का आयोजन किया, जिस में गांव के लोगों ने निदेशक का बाड़मेर परंपरा से स्वागत करते हुए बताया कि आप का किसान के द्वार आने पर हम को अत्यंत ख़ुशी हो रही है.

निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर ने छगन लाल के समकलित खेती, बागबानी, देशी मुरगीपालन, खरगोशपालन, भेड़बकरी एवं अन्य पशुओं के पालन से अपने परिवार को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का उदाहरण देते हुए बाड़मेर की पारिस्थितिकी में छोटे पशु भेड़बकरी एवं खरगोश को आसानी से पाला जा सकता है की उपयोगिता पर विस्तार से चर्चा की गई.

निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर ने प्रगतिशील किसान छगन लाल के फार्म पर आंवला व सहजन के पौधे का पौधरोपण करते हुए उन के फायदे मानव और पशुधन में विस्तार से संगोष्ठी मे पधारे किसानों को विस्तार से अवगत कराया.

Farmerनिदेशक डा. अरुण कुमार तोमर ने संगोष्ठी में मौजूद सभी किसानों के सभी तरह के सवालों का जवाब दिया. साथ ही, उन्होंने संगोष्ठी में उपस्थित किसानों को अधिक से अधिक संख्या में कृषि विज्ञान केंद्र के पास नए क्षेत्रीय बाजरा अनुसंधान संस्थान केंद्र, गुड़ामालानी के फाउंडेशन स्टोन (स्थापना दिवस) में पधार कर आईसीआर, नई दिल्ली के राजस्थान में स्थित संस्थान की प्रदर्शनी अवलोकन करने एवं साथ में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ द्वारा दिया गया संबोधन के बारे में बताया.

उन्होंने यह भी बताया कि एक ही जगह आप को देश के प्रसिद्ध कृषि व पशुपालन की उन्नत तकनीकियों की जानकारी मिलेगी, उस से सभी लाभान्वित हो कर अपनी खेती व पशुपालन व्यवसाय को आजीविका में सफल बनाए.

Farmerनिदेशक डा. अरुण कुमार तोमर ने इस संगोष्ठी के माध्यम से सभी किसानों को अधिक से अधिक संख्या में अपनी जानकारी को अन्य किसान भाइयों को प्रसारित करने का निवेदन किया, जिस से उपराष्ट्रपति के साथ देश के केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, राज्यमंत्री कैलाश चौधरी और परिषद के महानिदेशक डा. हिमांशु पाठक के विचारों से गुड़ामालानी के सभी किसान लाभान्वित हों.
निदेशक के साथ डा. रणधीर सिंह भट्ट, विभागाध्यक्ष पशु पोषण विभाग, इंद्रभूषण कुमार, मुख्य प्रशासनिक अधिकारी, राजकुमार, मुख्य वित्त एवं लेखा अधिकारी, डा. अमर सिंह मीना, डा. सत्यवीर सिंह दांगी व अन्य अविकानगर संस्थान का स्टाफ मौजूद रहा.

किसानों के विकास के लिए कृषक संगोष्ठी

झाबुआ : खेती के क्षेत्र में किसान समुदाय की आत्मनिर्भरता को बढ़ाने और आय वृद्धि के लिए ग्रामीण विकास विभाग, आजीविका मिशन नाबार्ड, कृषि, उद्यानिकी, पशुपालन, मत्स्यपालन, बैंकर्स, मनरेगा, कृषि विज्ञान केंद्र जैसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था से संबद्ध क्षेत्रकों के अधिकारियों की विगत समय से जिला कलक्टर तन्वी हुड्डा द्वारा नियमित रूप से साप्ताहिक समीक्षा बैठक आयोजित की जा रही है.

जिला कलक्टर द्वारा विगत बैठक में ग्रामीण सरोकारों से संबंधित समस्त विभागों को समस्त विकासखंडों में किसानों और गांव वालों की संगोष्ठियां आयोजित करने के निर्देश दिए गए.

कृषिगत क्षेत्रकों के टिकाऊ और समन्वित विकास के लिए किए जा रहे सतत प्रयासों की कड़ी में रानापुर और रामा विकासखंडों में कृषक संगोष्ठियां आयोजित हुईं.

रामा और रानापुर विकासखंड जिले की भौगोलिक और कृषि जलवायवीय परिस्थितियों में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं. यहां पर्यावरण संरक्षणीय खेतीकिसानी के लिए पर्याप्त अवसर सुलभ है. क्षेत्र के किसानों में प्रकृति के प्रति निकटता और इस के संवर्धन का भाव भी जीवंत है.

जनपद अध्यक्ष निर्मला भानू भूरिया ने बड़ी संख्या में कृषक संगोष्ठी में सहभागिता करने वाले महिलापुरुष किसानों को संबोधित करते हुऐ व्यक्त किया.

जिले के उपसंचालक कृषि एनएस रावत ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि अंचल में फसलों की विभिन्नता और विविधता भी सदियों से विद्यमान है. किसान समुदाय में खेतीकिसानी की बारीक समझ का पारंपरिक बौद्धिक ज्ञान भी है.

बदलते हुए आर्थिक व सामाजिक परिवेश में आवश्यकता इस बात की है कि किसान परंपरागत उन्नत ज्ञान के साथसाथ किसानी के एक से अधिक उद्यमों से एकीकृत स्वरूप में जुड़ कर अपनी आय में वृद्धि की ओर लगातार अग्रसर हो किसानों को फसलों की जलवायु सहिष्णु नवीनतम किस्मों का चयन करना चाहिए, मिलेट्स फसलों और प्राकृतिक उपज की बढ़ती हुई मांग को ध्यान में रखते हुए जिले के किसानों को अपनी खेती की योजना में समुचित परिवर्तन करने की आवश्यकता है.

पशुपालन विभाग के उपसंचालक डा. विल्सन डावर ने खेतीकिसानी में पशुपालन, बकरीपालन, मुरगीपालन की महत्ता को समझाते हुए कहा कि क्षेत्र में पशुपालन खेती का अभिन्न अंग रहा है और हमें इस व्यवस्था को सूझबूझ से आगे बढाने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए.

उन्नत पशुपालन की वैज्ञानिक बारीकियों से किसानों को अवगत कराते हुए शासन द्वारा पशुओं की आकस्मिक बीमारी की स्थिति में पशु एंबुलेंस सुविधा के बारे में विस्तार से बताया. पशुओं के अकस्मात बीमार होने की स्थिति में 1962 निःशुल्क फोन नंबर पर सूचना देने की सुविधा का लाभ लेने का आग्रह किया.

बड़ी संख्या में उपस्थित महिलापुरुष किसानों को जिले के प्राकृतिक खेती मास्टर ट्रेनर गोपाल मुलेवा ने प्राकृतिक खेती के विभिन्न पहलुओं के बारे में किसानों को व्यावहारिक समझाइश दी गई.

मुलेवा ने खरीफ की फसलों के प्रबंधन के साथसाथ रबी मौसम की कार्ययोजना बनाए जाने के लिए तकनीकी बारीकियों से किसानों को परिचित कराया.

ब्लौक टैक्नोलौजी मैनेजर संतोष पाटीदार ने प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रारंभ से लगा कर संपूर्ण पद्धति के विभिन्न चरणों के बारे में विस्तार से किसानों को समझाइश देते हुए व्यावहारिक बोध कराया.

गोष्ठी के दौरान महिला किसान कमला इंदर, संगीता खराडी और पुरुष किसान झितरा सोमला, कमेश डामोर, कमलेश अमरसिंह ने अपने खेतों पर अपनाई जा रही मिलेट फसलों के साथसाथ प्राकृतिक खेती के लाभ और उत्साहजनक परिणामों के अनुभव किसानों के साथ साझा किए.

उद्यानिकी विभाग के डीएस बामनीया और चौबे ने अंचल में उगाई जा रही सब्जी, फल, फसलों के साथसाथ हलदी,अदरक, धनिया, मिर्च जैसी मसाला फसलें, ब्राह्मी, एलोवेरा, लेमनग्रास जैसी सुगंधित और औषधीय फसलों की खेती के बारे में किसानों को जानकारी दी गई.

आजीविका मिशन के संजय सोलंकी ने महिला किसानों और समूहों के माध्यम से संचालित गतिविधियों और उन के उत्तरोत्तर उन्नयन के बारे में प्रेरणादायी उद्बोधन देते हुए उत्पादन के साथसाथ मूल्य संवर्धन और बेहतर दाम पर विपणन व्यवस्था बनाए जाने पर जोर दिया.

रामा विकासखंड के वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी ज्वाला सिंगार द्वारा क्षेत्र के किसानों द्वारा अपनाई जा रही प्राकृतिक खेती और मिलेट फसलों की काश्त के बारे में विस्तार से अवगत कराते हुए प्रयासों और भावी योजना की जानकारी दी गई.

कार्यक्रम का संचालन गोपाल मुलेवा तकनीकी सहायक द्वारा किया गया. किसानों की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए सहायक संचालक कृषि एसएस रावत, उपपरियोजना संचालक आत्मा एमएस धार्वे ने मिलेट्स की खेती आधारित कृषक परिचर्चा की संयुक्त रूप से सूत्रधारिता की.

कृषक संगोष्ठी के अंतिम चरण में वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी, रानापुर, अमरसिंह खपेड ने आभार प्रकट किया. किसान संगोष्ठी में रामा रानापुर विकासखंडों का समस्त कृषि विभागीय अमले द्वारा कार्यक्रम आयोजन में सक्रिय सहभागिता की गई.

302.8 लाख रुपए की धनराशि का अनुदान

वाराणसी : केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और डेरी मंत्री परषोत्तम रूपाला वाराणसी में संत रविदास घाट पर राज्यमीन चिताला की एक लाख मत्स्य बीज रिवर रैंचिंग कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए.

इस कार्यक्रम की अध्यक्षता उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री, मत्स्य विभाग, डा. संजय कुमार निषाद ने की. कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश सरकार के राज्य मंत्री स्टांप न्यायालय शुल्क एवं पंजीयन, महापौर, नगरनिगम, वाराणसी, अशोक कुमार तिवारी, वीरू साहनी, सभापति, उत्तर प्रदेश मत्स्य जीवी सहकारी समिति, विधायक कैंट, सौरभ श्रीवास्तव, मुख्य विकास अधिकारी, वाराणसी, हिमांशु नागपाल भी उपस्थित रहे.

सीआरपीएफ एवं एनडीआरएफ के अधिकारी एवं जवानों द्वारा भी कार्यक्रम में हिस्सा लिया गया.

कार्यक्रम में केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और डेरी मंत्री परषोत्तम रूपाला द्वारा प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत 10 लाभार्थियों को 302.8 लाख रुपए की धनराशि का अनुदान मिला, वहीं मुख्यमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत 10 लाभार्थियों को 12.32 लाख रुपए की धनराशि का अनुदान दिया गया. इतना ही नहीं, कृषि क्रेडिट कार्ड के 10 लाभर्थियों को 18.1 लाख रुपए की धनराशि के ऋण का वितरण किया एवं 10 मछुआ दुर्घटना बीमा योजना के लाभार्थियों को भी पत्रक वितरित किया गया.

कार्यक्रम के प्रारंभ में निदेशक मत्स्य, प्रशांत शर्मा ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा के बारे में विस्तार से अवगत करवाया. कार्यक्रम में विभागीय गतिविधियों का वीडियो द्वारा भी प्रदर्शन किया गया एवं कार्यक्रम में प्रदर्शनी का भी आयोजन हुआ, जिस में मत्स्य विभाग के साथसाथ अन्य संस्थाओं के द्वारा अपनीअपनी सेवाओं एवं उत्पादों का भी प्रदर्शन किया.

कार्यक्रम में वाराणसी मंडल के अतिरिक्त मंडल प्रयागराज, मिर्जापुर एवं आजमगढ़ के लगभग 1,000 मत्स्यपालकों द्वारा प्रतिभाग किया गया. कार्यक्रम का संचालन संयुक्त निदेशक, लखनऊ, उत्तर प्रदेश, एनएस रहमानी द्वारा किया गया.

डेरी और मत्स्य उत्पादकों को क्रेडिट कार्ड जरूरी

महाराष्ट्र : केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री परषोत्तम रूपाला ने पिछले दिनों महाराष्ट्र में ‘मत्स्यपालन, पशुपालन एवं डेरी के लिए राष्ट्रीय किसान क्रेडिट कार्ड सम्मेलन’ की अध्यक्षता की. मत्स्यपालन, पशुपालन और डेरी मंत्रालय ने मत्स्यपालन विभाग के सहयोग से राष्ट्रीय किसान क्रेडिट कार्ड सम्मेलन का आयोजन किया था.

इस कार्यक्रम में केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और डेरी राज्य मंत्री डा. एल. मुरुगन, भारत सरकार में वित्त राज्य मंत्री डा. भागवत किशनराव कराड, महाराष्ट्र सरकार में मत्स्यपालन मंत्री सुधीर मुनगंटीवार, महाराष्ट्र सरकार के राजस्व, पशुपालन एवं डेरी विकास मंत्री राधाकृष्ण एकनाथराव विखे पाटिल, मत्स्यपालन विभाग में सचिव डा. अभिलक्ष लिखी, पशुपालन व डेरी विभाग की सचिव अलका उपाध्याय, पशुपालन एवं डेरी विभाग में अपर सचिव वर्षा जोशी, मत्स्यपालन विभाग (अंतर्देशीय मत्स्यपालन) के संयुक्त सचिव सागर मेहरा और राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड- एनएफडीबी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डा. एल. नरसिम्हा मूर्ति, एआरएस भी उपस्थित थे.

विशेष अतिथि के रूप में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के कार्यकारी निदेशक नीरज निगम और नाबार्ड में पुनर्वित्त विभाग के सीजीएम विवेक सिन्हा ने इस कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई.

केंद्रीय मंत्री परषोत्तम रूपाला ने महाराष्ट्र सरकार के मत्स्यपालन विभाग (डीओएफ) और पशुपालन एवं डेरी विभाग (डीएएचडी) के सभी अधिकारियों को बधाई दी. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसान क्रेडिट कार्ड पशुपालन एवं डेरी और मछली पालने वाले मत्स्य उत्पादकों, दोनों को ही उपलब्ध कराया जाना चाहिए और पहले कदम के रूप में उन के प्रस्ताव को स्वीकार किया जाना चाहिए.

केंद्रीय मंत्री परषोत्तम रूपाला ने आगे यह भी कहा कि इस से ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकसित होने की आशा बनी रहेगी. साथ ही, सागर परिक्रमा के दौरान किसान क्रेडिट कार्ड को बढ़ावा देने के उद्देश्य से जिला अधिकारियों के साथसाथ विभाग के अधिकारियों द्वारा किए गए कार्यों की सराहना की.

उन्होंने आगे कहा कि आधारभूत तरीके से इस मुद्दे के समाधान के लिए जिला स्तर पर समीक्षा की जानी चाहिए.

मत्स्यपालन विभाग, पशुपालन एवं डेरी विभाग और किसान क्रेडिट कार्ड द्वारा प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना और किसान क्रेडिट कार्ड पर लघु वीडियो व किसान क्रेडिट कार्ड के लाभ और पात्रता के साथसाथ लाभार्थियों के प्रशंसापत्र भी साझा किए गए.

परषोत्तम रूपाला ने पात्र मत्स्यपालकों व मछुआरों को किसान क्रेडिट कार्ड कार्ड वितरित किए. लाभार्थियों ने वर्चुअल बातचीत के बाद किसान क्रेडिट कार्ड का लाभ उठाने के अपने अनुभव भी साझा किए.

मत्स्यपालन, पशुपालन और डेरी राज्य मंत्री डा. एल. मुरुगन ने पहले राष्ट्रीय किसान क्रेडिट कार्ड सम्मेलन में आने के लिए सभी का स्वागत किया. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि गरीब कल्याण के एक घटक के तौर पर वित्तीय समावेशन शामिल है. और ऐसी स्थिति में यह अवश्य सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि पूरे देश में किसान क्रेडिट कार्ड को बढ़ावा दे कर स्थानीय ऋणदाताओं द्वारा लगाए गए उच्च ब्याज ऋण को समाप्त कर दिया जाए.

डा. एल. मुरुगन ने सभी बैंकों से आगे आने, प्रशिक्षण देने और क्षमता निर्माण करने का आग्रह किया. महाराष्ट्र सरकार के राजस्व, पशुपालन और डेरी विकास मंत्री राधाकृष्ण एकनाथराव विखे पाटिल ने उपस्थित सभी बैंकरों को मानदंडों में ढील देने की सलाह दी, क्योंकि मत्स्यपालन विभाग और पशुपालन एवं डेरी विभाग दोनों क्षेत्र परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं और उन्हें जमीनी स्तर पर सस्ते ऋण की आवश्यकता है.

भारत सरकार में वित्त राज्य मंत्री डा. भागवत किशनराव कराड ने इस बात पर प्रकाश डाला कि जैसेजैसे भारत तीसरी सब से बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की ओर बढ़ रहा है, वैसेवैसे ही जमीनी स्तर पर परिवर्तन की आवश्यकता है.

उन्होंने आग्रह करते हुए कहा कि मत्स्यपालन के सभी आवेदकों को किसान क्रेडिट कार्ड दिया जाए, लंबित आवेदनों का यथाशीघ्र निबटारा किया जाए और बैंक या आवेदक से लौटाए गए आवेदनों पर पुनः विचार किया जाए.

उन्होंने आगे बताया कि गुजरात सरकार शून्‍य फीसदी पर लोन देती है और राज्य सरकार की योजना की तरह ही ऐसे प्रावधान को भी कैबिनेट में प्रस्तावित किया जाना चाहिए.

डा. भागवत किशनराव कराड ने यह सुझाव दिया कि कार्यान्वयन को आसान बनाने के लिए छोटे स्तर के विक्रेताओं व महिला दुकानदारों को विक्रेता के रूप में माना जाना चाहिए.

उन्होंने यह भी कहा कि बैंकों को योजना के प्रचारप्रसार में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए और किसान क्रेडिट कार्ड के लिए घरघर जा कर प्रचार करना चाहिए.

महाराष्ट्र सरकार में मत्स्यपालन, वन और सांस्कृतिक कार्य मंत्री सुधीर मुनगंटीवार ने सागर परिक्रमा कार्यक्रम की सराहना की और इस पहल का नेतृत्व करने के लिए केंद्रीय मंत्री को बधाई दी. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसान क्रेडिट कार्ड के आवेदकों का प्रबंधन सावधानी से किया जाना चाहिए और विक्रेताओं को भी ऋण दिया जाना चाहिए, ताकि बाजार संयोजन अथवा प्रौद्योगिकी अपनाने आदि की समस्याओं का समाधान किया जा सके.

मुनगंटीवार ने यह भी सुझाव दिया कि आजीविका सृजन के लिए कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के प्रावधानों का पता लगाया जाना चाहिए.

मत्स्यपालन विभाग की सचिव डा. अभिलक्ष लिखी ने बताया कि मत्स्यपालन के लिए 25,000 करोड़ रुपए का ऋण लक्ष्य निर्धारित है, इसलिए व्यवसाय करने में सहजता होना महत्वपूर्ण है. कार्यक्रम के दौरान आवेदनों की अस्वीकृति के कारणों की जांच के लिए प्राथमिकता, झींगापालन व अन्य गहन गतिविधियों के लिए वित्त के स्तर की समीक्षा, महिला विक्रेताओं के लिए ऋण, घरघर किसान क्रेडिट कार्ड अभियान में मत्स्यपालन, पशुपालन और डेरी को शामिल करना, क्षमता निर्माण, आउटरीच, राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा संचार आदि के लिए पैसे की आवश्यकताएं जैसे विषयों पर प्रकाश डाला गया.

पशुपालन एवं डेरी विभाग की सचिव अलका उपाध्याय ने इस तथ्य को उल्लिखित किया कि भारत को ‘दुनिया की डेरी’ के रूप में जाना जाता है और अब भारत को आत्मनिर्भरता से उद्यमिता व मूल्य संवर्धन की तरफ आगे बढ़ने की जरूरत है. उन्होंने बड़े लाभार्थी आधार के कवरेज के लिए जिला और ब्लौक स्तर पर किसान क्रेडिट कार्ड आउटरीच की आवश्यकता और डीएफएस के सहयोग से निगरानी की जरूरत पर जोर दिया.

मत्स्यपालन विभाग के संयुक्त सचिव (अंतर्देशीय मत्स्यपालन) सागर मेहरा के स्वागत भाषण के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई. उन्होंने कार्यक्रम के दौरान वहां उपस्थित सभी हितधारकों से किसान क्रेडिट कार्ड योजना के कार्यान्वयन में विशिष्ट कारणों एवं अंतरालों की पहचान करने के लिए अपने विचार, मुद्दे, चुनौतियां, सुझाव व फीडबैक साझा करने का अनुरोध किया.

सागर मेहरा ने इस बात पर भी बल दिया कि कुछ मानदंडों में ढील देने की जरूरत है और कुछ में सुधारात्मक कार्रवाई करने की आवश्यकता है, ताकि किसान क्रेडिट कार्ड देशभर के सभी पात्र किसानों तक पहुंच सके.

पशुपालन एवं डेरी विभाग की अपर सचिव वर्षा जोशी ने मत्स्यपालन, पशुपालन और डेरी में किसान क्रेडिट कार्ड की उपलब्धियों और इस क्षेत्र के सामने आने वाली चुनौतियों का उल्लेख किया. उन्होंने आग्रहपूर्वक कहा कि हितधारकों को कुछ मानदंडों में ढील देनी चाहिए और जरूरत के मुताबिक उत्पादकों को जानकारी उपलब्ध करानी चाहिए.

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के कार्यकारी निदेशक नीरज निगम ने इस बात पर प्रकाश डाला कि वित्तीय समावेशन प्राप्त करने के लिए छोटे ऋणों को बढ़ाना आवश्यक है. उन्होंने विचारविमर्श के निष्कर्ष के रूप में कहा कि बैंकों को आरबीआई केसीसी दिशानिर्देशों का पालन करने की जरूरत है. इस के अलावा बैंक कर्मचारियों को वित्तीय साक्षरता में अधिक प्रशिक्षित किया जाना चाहिए और पूरे वर्ष अभियान चलाया जाना चाहिए.

नीरज निगम ने यह भी कहा कि संपूर्ण प्रकिया के लिए समयसीमा का पालन किया जाना चाहिए और बैंकों द्वारा सही स्थिति को प्रासंगिक रूप से सूचित किया जाना चाहिए.

उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि निगरानी को गंभीरता से लिया जाना चाहिए और राज्य स्तर पर मुद्दों को उजागर करने के लिए निचले स्तर यानी ब्लौक व जिला स्तर पर लिया जाना चाहिए.

नाबार्ड में पुनर्वित्त विभाग के सीजीएम वीके सिन्हा ने इस बात का उल्लेख किया कि कृषि के संबद्ध क्षेत्र भी मूल क्षेत्र के समान ही महत्वपूर्ण हो गए हैं और वास्तविक क्षमता को सही आकार प्रदान करने के लिए प्रत्येक मूल्य श्रृंखला नोड पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है.

उन्होंने इस बात पर ध्यान आकृष्ट कराया कि नाबार्ड नियमित रूप से आरआरबी की समीक्षा कर रहा है और जमीनी स्तर पर जानकारी प्राप्त करने के लिए ऐसा करना जारी रखेगा.

वीके सिन्हा ने सुझाव देते हुए कहा कि दस्तावेजीकरण से संबंधित मुद्दों पर सही नियमों का पालन करने के उद्देश्य से बैंकरों के लिए समान दिशानिर्देश उपलब्ध कराए जाने चाहिए.

भारतीय स्टेट बैंक के मुख्य महाप्रबंधक एबीयू और जीएसएस शांतनु पेंडसे ने अपने बैंक द्वारा किसानों को पेश किए जाने वाले उत्पादों के बारे में संक्षेप में जानकारी दी, जिस में मूल्य श्रृंखला के लिए मूल्यवर्धन/प्रसंस्करण का सहयोग करने के लक्ष्य के साथ नए विकसित उत्पाद शामिल किए गए हैं.

उन्होंने आगे बताया कि चर्चा के दौरान उजागर की गई चुनौतियों को विधिवत नोट किया गया है और इस सिलसिले में एक तत्काल उपाय के रूप में एक परामर्श जारी किया जाएगा.

शांतनु पेंडसे ने केसीसी दिशानिर्देशों के अनुपालन और स्वामित्व कागजात व सिविल स्कोर की कड़ाई में ढील देने के लिए आवश्यकता जताई.

उन्होंने कहा कि 1.6 लाख रुपए तक कोई संपार्श्विक नहीं और गारंटर जैसे मानदंडों का पालन किया जाना चाहिए. उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल राम नाइक ने केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और डेरी मंत्री के नेतृत्व में सागर परिक्रमा कार्यक्रम की सराहना की. उन्होंने आग्रह किया कि छोटे लैंडिंग सेंटर आदि जैसी गतिविधियों के लिए सीएसआर को शामिल करने को बढ़ावा दिया जाना चाहिए.

इस आयोजन में कुल 80,000 लोग वहां उपस्थित हो कर और वर्चुअल माध्यम से शामिल हुए. 35 राज्य/केंद्र शासित प्रदेश 370 अलगअलग स्थानों से 21,000 मछुआरों एवं मत्स्यपालकों के साथ जुड़े. 9,000 प्रतिभागी उपस्थित हो कर और वर्चुअल माध्यम से जुड़े, जबकि 50,000 एएचडी किसान 1,000 सामान्य सेवा केंद्रों (सीएससी) के माध्यम से जुड़े. आउटडोर अभियान के हिस्से के रूप में डिजिटल, इलैक्ट्रानिक, प्रिंट मीडिया के माध्यम से लगभग 22 लाख लोगों तक पहुंचा गया और दिशानिर्देशों/एसओपी पर 7 स्थानीय भाषाओं में प्रचार सामग्री वितरित की गई. मत्स्यपालन के लिए केसीसी सुविधा पर वीडियो जारी किया गया. राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड- एनएफडीबी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डा. एल. नरसिम्हा मूर्ति के धन्यवाद प्रस्ताव के साथ इस कार्यक्रम का समापन हुआ.

 सितंबर माह में खेती से जुड़े काम

समय पर खेतीबारी से जुड़े सभी जरूरी काम निबटा लेने चाहिए. अगर ऐसा नहीं किया जाता है, तो उत्पादन घटने के साथ ही नुकसान होने की संभावना ज्यादा बढ़ जाती है. ऐसे में सितंबर माह में खेती, बागबानी, पशुपालन, मत्स्यपालन, भंडारण और प्रोसैसिंग से जुड़े इन कामों को निबटाएं.

जिन किसानों ने धान की खेती की है, वे फसल में नाइट्रोजन की दूसरी व अंतिम टौप ड्रैसिंग बाली बनने की प्रारंभिक अवस्था यानी रोपाई के 50-55 दिन बाद कर दें. वहीं अधिक उपज वाली धान की प्रजातियों में प्रति हेक्टेयर 30 किलोग्राम नाइट्रोजन यानी 65 किलोग्राम यूरिया और सुगंधित प्रजातियों में प्रति हेक्टेयर 15 किलोग्राम नाइट्रोजन यानी 33 किलोग्राम यूरिया का प्रयोग करें.

धान में बालियां फूटने और फूल निकलने के दौरान यह सुनिश्चित करें कि खेत में पर्याप्त नमी हो.

धान की फसल को भूरा फुदका से बचाने के लिए खेत से पानी निकाल दें. इस कीट का प्रकोप पाए जाने पर नीम औयल 1.5 लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें.

किसान धान की अगेती किस्मों की कटाई के पहले ही उस के उचित भंडारण की व्यवस्था कर लें. इस के लिए यह सुनिश्चित करें कि मड़ाई के बाद धान के दानों को अच्छी तरह सुखा कर ही भंडारण किया जाए, इसलिए दानों को 10 प्रतिशत नमी तक सुखा लेते हैं.

धान का भंडारण जहां किया जाना है, उस कमरे और जूट के बोरों को विसंक्रमित कर देना चाहिए.

धान के भंडारण में कीड़ों से बचाव के लिए स्टौक को तरपोलीन या प्लास्टिक की चादरें ढकने से भी राहत मिलती है.

सरसों की अगेती किस्मों जो खरीफ और रबी के मध्य में बोई जाती हैं, इस की बोआई 15 से 30 सितंबर के बीच अवश्य कर दें. साथ ही, बीजजनित रोगों से बचाव व सुरक्षा के लिए प्रमाणित बीज ही बोएं.

बीजशोधन के लिए थीरम व कार वैक्सिन का मिश्रण 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के अनुसार उपचारित करें. मैंकोजेब की बावस्टीन का 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से भी उपचारित किया जा सकता है.

सरसों की फसल में खरपतवार नियंत्रण के लिए बोआई से पहले 2.2 लिटर प्रति हेक्टेयर फ्लूक्लोरोलिन का 600-800 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें.

यदि बोआई से पहले खरपतवार नियंत्रण नहीं किया गया है, तो 3.3 लिटर पेंडीमिथेलीन (30 ईसी ) को 600-800 लिटर पानी में घोल कर बोआई के 1-2 दिन बाद छिड़काव करें.

सरसों की अगेती किस्मों पूसा सरसों-25, पूसा सरसों-26, पूसा सरसों-27, पूसा सरसों- 28, पूसा अगर्णी, पूसा तारक व पूसा महक की बोआई की जा सकती है.

रबी के सीजन में गेहूं की खेती करने वाले किसान आलू की अगेती किस्मों की बोआई सितंबर महीने में कर के ज्यादा फायदा ले सकते हैं. इन किस्मों में कुफरी बादशाह, कुफरी सूर्या, कुफरी चंद्रमुखी, कुफरी अलंकार, कुफरी पुखराज, कुफरी ख्याती, कुफरी अशोका, कुफरी जवाहर शामिल हैं. इन के पकने की अवधि 80 से 100 दिन है.

आलू के इस किस्म की खेती करने वाले किसान इस माह पछेती गेहूं की खेती कर सकते हैं. आलू की बोआई 25 सितंबर से शुरू की जा सकती है.

मटर की अगेती किस्मों की खेती कर किसान अतिरिक्त लाभ ले सकते हैं, क्योंकि ये किस्में 50 से ले कर 60 दिनों में तैयार हो जाती हैं. इसलिए इस के बाद दूसरी फसल आसानी से ली जा सकती है.

अगर किसान मटर की अगेती खेती करना चाहते हैं, तो इस की बोआई 15 सितंबर से 15 अक्तूबर के बीच कर सकते हैं. किसान भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित की गई मटर की आजाद मटर-3, काशी नंदिनी, काशी मुक्ति, काशी उदय और काशी अगेती की बोआई कर सकते हैं.

टमाटर, विशेषकर संकर प्रजातियों व गांठगोभी के बीज की बोआई नर्सरी में करें. इस के अलावा सब्जियों की खेती करने वाले किसान फूलगोभी की पूसा सुक्ति, पूसा पौषिजा प्रजातियों की नर्सरी डालने के साथ ही मध्यवर्गीय फूलगोभी जैसे इंप्रूव्ड जापानी, पूसा दीपाली, पूसा कार्तिक की रोपाई के लिए पूरा महीना ही मुफीद है. वहीं पत्तागोभी की किस्मों में  गोल्डन एकर, पूसा कैबेज हाइब्रिड-1 की नर्सरी डाली जा सकती है.

पत्तागोभी की अगेती किस्में जैसे-पूसा हाइब्रिड-2, गोल्डन एकर की बोआई 15 सितंबर तक माध्यम व पछेती किस्में जैसे पूसा ड्रमहेड, संकर क्विस्टो की बोआई 15 सितंबर के बाद शुरू की जा सकती है.

शिमला मिर्च की रोपाई पौध के 30 दिन के होने पर 50-60-40 सैंटीमीटर की दूरी पर करें. मूली की एशियाई किस्मों जैसे जापानी ह्वाइट, पूसा चेतकी, हिसार मूली नं. 1, कल्याणपुर-1 की बोआई इसी माह में शुरू की जा सकती है.

मेथी की अगेती फसल लेने के लिए मध्य सितंबर से बोआई शुरू की जा सकती है. इस के लिए प्रति हेक्टेयर 25-30 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होगी.

अगर बरसात कम या समाप्त हो गई हो तो हरी पत्ती के लिए धनिया की प्रजाति पंत हरीतिमा, आजाद धनिया-1 की इस माह बोआई कर सकते हैं.

पालक की उन्नत किस्म पूसा भारती की बोआई इस माह की जा सकती है.

गाजर की पूसा वृष्टि किस्म की बोआई इसी माह में शुरू करें. इस के अलावा जिन सब्जियों की खेती की जा सकती है, उस में शलगम, सौंफ के बीज, सलाद, ब्रोकली को भी शामिल किया जा सकता है.

सितंबर माह में तैयार बैगन, मिर्च, खीरा व भिंडी की फसल लेने वाले किसान फसल की जरूरत के मुताबिक निराईगुड़ाई व सिंचाई करें और तैयार फलों को तोड़ कर बाजार भेजें.

जिन किसानों ने मक्के की फसल ले रखी है, वह अधिक बरसात होने पर अतिरिक्त जलनिकासी की पुख्ता व्यवस्था करें. फसल में नरमंजरी निकलने की अवस्था में और दाने की दूधियावस्था सिंचाई की दृष्टि से बहुत ही महत्त्वपूर्ण है. यदि पिछले दिनों में बरसात न हुई हो या नमी की कमी हो तो सिंचाई अवश्य करें.

ज्वार की खेती करने वाले किसान अच्छी उपज हासिल करने के लिए बरसात नहीं होने या नमी की कमी होने पर बाली निकलने के समय व दाना भरते समय सिंचाई जरूर करें. वहीं बाजरा की उन्नत और संकर प्रजातियों में 87-108 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से यूरिया की टौप ड्रैसिंग बोआई के 25-30 दिन बाद करें.

जिन किसानों ने मूंग और उड़द की खेती की है, वे बरसात न होने पर कलियां बनते समय पर्याप्त नमी बनाए रखने के लिए सिंचाई करें.

अगर मूंग और उड़द की फसल में फली छेदक कीट की सूंडि़यों का प्रकोप है, तो उस की रोकथाम के लिए निबौली का 5 प्रतिशत 1.25 लिटर मात्रा का प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

सोयाबीन की फसल लेने वाले किसान सितंबर माह में बरसात न होने पर फूल व फली बनते समय सिंचाई जरूर करें.

सूरजमुखी की खेती करने वाले किसान यह ध्यान दें कि सूरजमुखी के फूल में नर भाग पहले पकने के कारण परपरागण का काम मधुमक्खियों द्वारा होता है, इसलिए खेत या मेंड़ों पर बक्सों में मधुमक्खीपालन किया जाए. अधिक बीज बनने से उपज में बढ़वार होगी और अतिरिक्त आय भी होगी.

फलों की बागबानी से जुड़े किसान सितंबर में वयस्क आम के पौधों में उर्वरक की 500 ग्राम नाइट्रोजन, 250 ग्राम फास्फोरस, 500 ग्राम पोटाश को प्रति पौधे की दर से डालें.

आम में एंथ्रेक्नोज रोग से बचाव के लिए कौपर औक्सीक्लोराइड 50 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण की 3 ग्राम मात्रा एक लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें.

आंवले में फल सड़न रोग की रोकथाम के लिए कौपर औक्सीक्लोराइड 3 ग्राम प्रति लिटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें. वहीं नीबूवर्गीय फलों में यदि डाईबे, स्केब व सूटी मोल्ड बीमारी का प्रकोप पाए जाने पर कौपर औक्सीक्लोराइड (3 ग्राम प्रति लिटर पानी) की दर से छिड़काव करें.

केले और पपीते की खेती करने वाले किसान पौधों की रोपाई का काम इस महीने जरूर पूरा कर लें. जिन लोगों ने केले के पौधों को पहले ही रोप दिया है, वे केले में प्रति पौधा 55 ग्राम यूरिया पौधे से 50 सैंटीमीटर दूर घेरे में प्रयोग कर हलकी गुड़ाई कर के जमीन में मिला दें. वहीं इस माह के शुरू में अमरूद की बरसाती फसल को तोड़ कर बाजार भेजें.

स्ट्राबेरी के पौधों की रोपाई 10 सितंबर से शुरू की जा सकती है. अगर उस समय तापमान अधिक हो, तो 20 सितंबर के बाद रोपाई शुरू करें.

रोपण करते समय यह ध्यान रहे कि पौधे स्वस्थ यानी कीट व रोगों से रहित होने चाहिए. इस की उन्नतशील किस्में चांडलर, फैस्टिवल, विंटर डौन, फ्लोरिना, कैमा रोजा, ओसो ग्रांड, ओफरा, स्वीट चार्ली, गुरिल्ला, टियोगा, सीस्कैप, डाना, टोरे, सेल्वा, बेलवी, फर्न, पजारो हैं.

फूलों की खेती में रुचि रखने वाले किसान रजनीगंधा के स्पाइक की कटाईछंटाई का काम इस माह पूरा करें.

जो लोग ग्लैडियोलस की खेती करना चाहते हैं, वे रोपाई की तैयारी पूरी कर लें. इस के लिए प्रति वर्गमीटर 10 किग्रा गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद को 200 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट व 200 ग्राम म्यूरेट औफ पोटाश के साथ मिला कर रोपाई के 15 दिन पहले अच्छी तरह मिला दें.

गेंदे की शरद ऋतु वाली किस्मों की रोपाई इसी माह में शुरू कर दें. इस की नर्सरी डालने का उचित समय 10-15 सितंबर है.

इस के अलावा किसान इसी माह मशरूम उत्पादन से जुड़ी तैयारियां शुरू कर दें. उस में काम आने वाले उपकरण, कंपोस्ट आदि के लिए आवश्यक सामग्री जुटाना समय से काम शुरू किए जाने में मददगार होगा.

Animalअगर आप पशुपालक हैं, तो पशुओं को जानलेवा खुरपका व मुंहपका रोग से बचाव के लिए उन का टीकाकरण कराएं. अगर आप का पशु इस रोग से ग्रसित हो गया है, तो पशुओं के घाव को पोटैशियम परमैग्नेट से धोएं और बीमार पशु को तत्काल स्वस्थ पशुओं से दूर रखें. उन का दानापानी भी अलग दें. साथ ही, बीमार पशु को बांध कर रखें और उन्हें घूमनेफिरने न दें.

यह सुनिश्चित करें कि पशु को सूखे स्थान पर ही बांधा जाए. उसे  कीचड़, गीली मिट्टी व गंदगी से दूर रखें. जहां पशु की लार गिरती है, वहां पर कपड़े धोने का सोडा व चूने का छिड़काव करें. पशुओं के नवजात बच्चों को खीस यानी पैदा होने के बाद उस की मां का गाढ़ा दूध जरूर पिलाएं.

जो लोग मुरगीपालन के व्यवसाय से जुड़े हैं, वे सुनिश्चित करें कि दाने में सीप का चूरा अवश्य मिलाया जा रहा हो. इस से मुरगियों में कैल्शियम की मात्रा बढ़ती है. इस के अलावा मुरगियों के पेट के कीड़ों को मारने के लिए दवा दें. पोल्ट्री फार्म में कम से कम 14-16 घंटे रोशनी बनी रहे. पोल्ट्री फार्म के बिछावन, जिसे डीप लिटर कहते हैं, को नियमित रूप से उलटतेपलटते रहें.

जो लोग मछलीपालन के व्यवसाय से जुड़े हैं, वे तालाब में पानी की पर्याप्त मात्रा बनाए रखने के लिए उस की गहराई कम से कम 1 मीटर तक जरूर रखें. गोबर की खाद व अकार्बनिक खादों का तालाबों में प्राकृतिक भोजन की उर्वरता बढ़ाने के लिए प्रयोग करें. साथ ही, तालाब में प्राकृतिक भोजन की जांच करें और जरूरत के मुताबिक पूरक आहार संचित मछलियों को प्रतिदिन देते रहें. इस के अलावा मछलीपालक समयसमय पर जाल डाल कर तालाब में पल रही मछलियों की बढ़वार की जांच करते रहें.

(कीटनाशकों के नाम कृषि विज्ञान केंद्र, बस्ती के वैज्ञानिक फसल सुरक्षा डा. प्रेम शंकर द्वारा सुझाए गए हैं. साथ ही, पशुपालन से जुड़ी जानकारी पशुपालन विशेषज्ञ डा. डीके श्रीवास्तव द्वारा सुझाई गई है.)

लंगड़ी बुखार से हो सकती है  दुधारू पशुओं की मौत

लंगड़ी बुखार एक जानलेवा बीमारी है. यदि पशु इस की चपेट में आ जाए और समय पर उस की देखभाल न हो, तो उस की मौत तक हो जाती है.

भारत ने दुग्ध उत्पादन में बड़ी तेजी के साथ विश्व बाजार में अपनी एक पहचान बनाई है. विश्व में आज भारत दुग्ध उत्पादन के मामले में शीर्ष पर है. जिस स्तर पर हम आज दूध उत्पादन कर रहे हैं, यह हमारे लिए गर्व की बात है. इस लय को बरकरार रखने के लिए हमें अपने दुधारू पशुओं का ध्यान रखना बहुत ही आवश्यक है.

दुधारू पशुओं को पालने में जो सब से बड़ी समस्या आती है, वह है पशुओं में होने वाली बीमारियां. उन की देखभाल करना जरूरी है. यदि एक पशु में कोई बीमारी हो जाता हैं कि तो दूसरे पशु भी इस का शिकार होने लगते हैं.

यदि इन की उचित देखभाल न की जाए, तो बीमारी घातक हो जाती है. कुछ बीमारियां इतनी भयानक होती हैं कि दुधारू पशुओं की मौत तक हो जाती है. इन बीमारियों में गलघोंटू, मुंहपकाखुरपका और लंगड़ी बुखार मुख्य हैं.

लंगड़ी बुखार एक जानलेवा बीमारी है. यदि पशु इस की चपेट में आ जाए और समय पर उस की देखभाल न हो, तो उस की मौत तक हो जाती है.

आज हम आप को लंगड़ी बुखार बीमारी के लक्षणों और इस के इलाज के बारे में कुछ जरूरी जानकारी उपलब्ध करा रहे हैं.

लंगड़ी बुखार

वैसे तो यह बीमारी गाय और भैंसों दोनों में होती है. परंतु यह बीमारी गाय में अधिक पाई जाती है. यह एक खतरनाक बीमारी है. सब से पहले पशु की पिछली व अगली टांगों के ऊपरी भाग में भारी सूजन आ जाती है, जिस से पशु लंगड़ा कर चलने लगता है या फिर बैठने लगता है. जिस भाग पर सूजन आई होती है, उसे दबाने पर कड़कड़ की आवाज आती है.

इस से बचने के लिए पशु का उपचार शीघ्र करवाना चाहिए, क्योंकि इस बीमारी के जीवाणुओं द्वारा हुआ जहर शरीर में पूरी तरह फैल जाने से पशु की मौत हो जाती है.

इस बीमारी से बचने के लिए पशुओं में ‘प्रोकेन पेनिसिलिन’ के टीके लगाए जाते हैं. यह टीके बिलकुल मुफ्त लगते हैं. लंगड़ी बुखार को साधारण भाषा में जहरबाद, फडसूजन, काला बाय आदि नामों से भी जाना जाता है. यह बीमारी पशुओं में कभी भी हो सकती है.

मुख्य रूप से यह बीमारी 6 महीने से 2 साल तक की उम्र वाले पशुओं में अधिक पाई जाती है.

मुख्य लक्षण

इस बीमारी में पशु को तेज बुखार आता है और उस का तापमान 106 डिगरी फारेनाइट से 107 फारेनाइट तक पहुंच जाता है. पशु सुस्त हो कर खानापीना छोड़ देता है.

पीडि़त पशु लंगड़ा कर चलने लगता है. यह बीमारी आमतौर पिछले पैरों को अधिक प्रभावित करती है और सूजन घुटने से ऊपर वाले हिस्से में होती है.

यह सूजन शुरू में गरम व कष्टदायक होती है, जो बाद में ठंडी व दर्दरहित हो जाती है. पैरों के अलावा सूजन पीठ, कंधे व दूसरी मांसपेशियों वाले हिस्से पर भी हो सकती है. सूजन के ऊपर वाली चमड़ी सूख कर कड़ी होती जाती है.

इस बीमारी में पशु का उपचार जल्दी करवाना चाहिए, क्योंकि इस बीमारी के जीवाणुओं द्वारा हुआ जहर शरीर में पूरी तरह फैल जाने से पशु की मौत हो जाती है.

ऐसी बीमारियों में पशुपालक को चाहिए कि अपने पशु का जल्द से जल्द इलाज कराएं या पहले से ही पशुओं का टीकाकरण करा लें, ताकि भविष्य में पशु को कोई परेशानी न हो.

जानकारी के लिए कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक व अध्यक्ष से संपर्क करें.

रोकथाम व बचाव

* वर्षा ऋतु शुरू होते ही पशु को इस बीमारी का टीका लगवा लेना चाहिए. यह टीका पशु को 6 माह की उम्र पर भी लगाया जाता है.

* रोगग्रस्त पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग कर देना चाहिए.

* भेड़ों में ऊन कतरने से 3 महीने पहले टीकाकरण करवा लेना चाहिए, क्योंकि ऊन कतरने के समय घाव होने पर जीवाणु घाव से शरीर में प्रवेश कर जाता है, जिस से रोग की संभावना बढ़ जाती है.

* सूजन को चीरा मार कर खोल देना चाहिए, जिस से जीवाणु हवा के संपर्क में आने पर अप्रभावित हो जाता है.

साफ तरीकों से करें दूध का उत्पादन

दूध को ज्यादा समय तक सुरक्षित रखने, गंदे व असुरक्षित दूध को पीने से होने वाली बीमारियों से लोगों को बचाने व ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए दूध का उत्पादन साफ तरीकों से करना बहुत जरूरी है.

दूध में भोजन के सभी जरूरी तत्त्व जैसे प्रोटीन, शक्कर, वसा, खनिजलवण, विटामिन वगैरह उचित मात्रा में पाए जाते हैं, जो लोगों की सेहत और बढ़ोतरी के लिए बहुत जरूरी होते हैं, इसीलिए दूध को एक संपूर्ण आहार कहा गया है.

लेकिन दूध में जीवाणुओं की बढ़ोतरी होते ही दूध जल्दी खराब होने लगता है. इसे ज्यादा समय तक साधारण दशा में सुरक्षित नहीं रखा जा सकता है. कुछ दूसरे हानिकारक जीवाणु दूध के जरीए दूध पीने वालों में कई तरह की बीमारियां पैदा कर देते हैं, इसलिए दूध को ज्यादा समय तक सुरक्षित रखने, गंदे व असुरक्षित दूध को पीने से होने वाली बीमारियों से लोगों को बचाने व ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए दूध का उत्पादन साफ तरीकों से करना बहुत जरूरी है.

अगर भारत जैसे देश की बात करें तो यहां की दूध की क्वालिटी बहुत अच्छी नहीं है. दूध की क्वालिटी पर असर डालने वाले जीवाणुओं की तादाद की बात करें तो प्रति मिलीलिटर कच्चे दूध में इन की तकरीबन 2 लाख से 10 लाख के बीच तादाद होती है, जबकि विदेशों में अच्छे से प्रबंधन करने के चलते इन की तादाद प्रति मिलीलिटर 30,000 से ज्यादा नहीं होती.

अगर हम पैकेटबंद दूध की बात करें तो इस में भी तादाद प्रति मिलीलिटर 30,000 से ज्यादा नहीं होती. इन हालात को देखते हुए हम कह सकते हैं कि हमारे देश में पशुपालक दूध की क्वालिटी पर इतना ध्यान नहीं देते.

दूध में 2 तरह की गंदगियां पाई जाती हैं

* आंख से दिखाई देने वाली गंदगियां, जैसे गोबर के कण, घासफूस के तिनके, बाल, धूल के कण, मच्छरमक्खियां वगैरह. इन्हें साफ कपड़े या छलनी से छान कर अलग किया जा सकता है.

* आंख से न दिखाई देने वाली गंदगियां. इस के तहत सूक्ष्म आकार वाले जीवाणु आते हैं, जो केवल सूक्ष्मदर्शी यंत्र द्वारा ही देखे जा सकते है. इन्हें नष्ट करने के लिए दूध को गरम करना पड़ता है. दूध को लंबे समय तक रखना हो तो इसे ठंडा कर के रखना चाहिए.

इन गंदगियों के 2 स्रोत हैं

* जानवरों के अयन से : थनों के अंदर से पाए जाने वाले जीवाणु.

* बाहरी वातावरण से.

* जानवर के बाहरी शरीर से.

* जानवर के बंधने वाली जगह से.

* दूध के बरतनों से.

* दूध दुहने वाले ग्वाले से.

* दूसरे साधनों जैसे मच्छरमक्खियों, गोबर व धूल के कणों, बालों वगैरह से.

हमारे देश में जो दूध उत्पादन हो रहा है, वह ज्यादातर गांवों में या शहर की निजी डेरियों में ही उत्पादित किया जा रहा है, जहां सफाई पर ध्यान न देने के चलते दूध में जीवाणुओं की तादाद बहुत ज्यादा होती है और दिखाई देने वाली गंदगियां जो नहीं होनी चाहिए, भी मौजूद रहती हैं. इस के मुख्य कारण ये हैं :

* पशुओं को दुहने से पहले ठीक से सफाई न करना.

* पशुओं को दुहने वाले के हाथ व कपड़े साफ न होना.

* गांवों व शहरों में गंदी जगहों पर दूध निकालना.

* गंदे बरतनों में दूध निकालना व रखना.

* गाय के बच्चे को थन से दूध का पिलाना.

* दूध दुहने वाले का बीमार होना.

* दूध बेचने ले जाते समय पत्तियों, भूसे व कागज वगैरह से ढकना.

* देश की जलवायु का गरम होना.

* गंदे पदार्थों से दूध का अपमिश्रण करना.

साफ दूध का उत्पादन सेहत व ज्यादा मुनाफे के लिए जरूरी है, इसलिए ऐसे दूध का उत्पादन करते समय इन बातों पर ध्यान देना बहुत जरूरी है :

दूध देने वाले पशु से संबंधित सावधानियां

* दूध देने वाला पशु पूरी तरह सेहतमंद होना चाहिए. उसे टीबी, थनैला वगैरह बीमारियां नहीं होनी चाहिए. पशुओं की जांच समयसमय पर पशु चिकित्सक से कराते रहना चाहिए.

* दूध दुहने से पहले पशु के शरीर की अच्छी तरह सफाई कर लेना चाहिए. दुहने से पहले पशु के शरीर पर चिपके हुए गोबर, धूल, कीचड़, घास वगैरह साफ कर लेना चाहिए. खासतौर से पशु के शरीर के पीछे वाले हिस्से, पेट, अयन, पूंछ व पेट के निचले हिस्से की सफाई करनी चाहिए.

* दुहने से पहले अयन की सफाई पर खास ध्यान देना चाहिए व थनों को किसी जीवाणु नाशक के घोल के भीगे हुए कपड़े से पोंछ लेना चाहिए.

* अगर किसी थन में कोई बीमारी हो तो उस से दूध नहीं निकालना चाहिए.

* दुहने से पहले दूर थन की 2-4 दूध की धारें जमीन पर गिरा देनी चाहिए या अलग बरतन में इकट्ठा करनी चाहिए.

दूध देने वाले पशु के बांधने की जगह

* पशु बांधने का व खड़े होने की जगह पूरी होनी चाहिए.

* फर्श पक्का हो. अगर पक्का फर्श नहीं हो तो कच्चा फर्श समतल हो. उस में गड्ढे वगैरह न हों, जिस से पेशाब व पानी बह जाए.

* दूध दुहने से पहले पशु के चारों ओर सफाई कर देनी चाहिए, गोबर, पेशाब हटा देना चाहिए. यदि बिछावन बिछाया गया हो तो दुहने से पहले उसे हटा देना चाहिए.

* दूध निकालने वाली जगह की दीवारें, छत वगैरह साफ होनी चाहिए. उन की समयसमय पर चूने से पुताई करवाते रहना चाहिए और फर्श की फिनाइल से धुलाई 2 घंटे पहले कर लेनी चाहिए.

दूध के बरतन से संबंधित सावधानियां

* दूध दुहने का बरतन साफ होना चाहिए. उस की सफाई पर खास ध्यान दिया जाना चाहिए. दूध के बरतन को पहले ठंडे पानी से, फिर सोडा या दूसरे जीवाणु नाशक रसायन से मिले गरम पानी से, फिर सादे खौलते हुए पानी से धो कर धूप में सुखा लेना चाहिए.

* साफ किए हुए बरतन पर मच्छरमक्खियों को नहीं बैठने देना चाहिए और  कुत्ता बिल्ली उसे जूठा न कर सकें.

* दूध दुहने के बरतन का मुंह चौड़ा व सीधा और ऊपर की तरफ खुलने वाला नहीं होना चाहिए, क्योंकि इस से मिट्टी, धूल, गोबर वगैरह के कण व घासफूस के तिनके, बाल वगैरह सीधे दुहाई के समय बरतन में गिर जाएंगे इसलिए बरतन संकरे मुंह वाला हो और मुंह थोड़ा टेढ़ा होना चाहिए.

दूध दुहने वाले शख्स से संबंधित सावधानियां

* दूध दुहने वाला आदमी या औरत सेहतमंद होना चाहिए. उसे किसी तरह की कोई बीमारी न हो.

* उस के हाथों के नाखून कटे होने चाहिए और दुहाई से पहले हाथों को अच्छी तरह से साबुन से धो लेना चाहिए.

* ग्वाले या दूध दुहने वाले आदमी के कपड़े साफ होने चाहिए और सिर कपड़े से ढका हो.

* दूध निकालते समय सिर खुजलाना व बात करना, तंबाकू खा कर थूकना, छींकना, खांसना वगैरह गंदी आदतें नहीं होनी चाहिए.

दूसरी सावधानियां

* पशुओं को चारा, दाना, दुहाई के समय नहीं देना चाहिए, बल्कि पहले या बाद में दें.

* दूध में मच्छर मक्खियों का प्रवेश रोकना चाहिए.

* ठंडा करने से यानी 4-7 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान पर रखने से दूध में पाए जाने वाले जीवाणुओं की बढ़ोतरी रुक जाती है.

* दूध को कभी भी बिना गरम हुए इस्तेमाल में नहीं लाना चाहिए.

इन बातों पर अगर किसान भाई ध्यान दे तो स्वच्छ दूध का उत्पादन कर ज्यादा मुनाफा कमा सकतें हैं.

अधिक जानकारी के लिए कृषि विज्ञान केंद्र के पशु वैज्ञानिक से संपर्क करें.

इस मशीन से गाय और भैंस दोनों का दूध निकाला जा सकता है

गाय और भैंस के थनों की बनावट में थोड़ा फर्क होता है, इसलिए गाय का दूध दुहने वाली मशीन में थोड़ा सा बदलाव कर के इस मशीन से ही भैंस का दूध भी निकाला जा सकता है. भैंस का दूध निकालने के लिए मशीन का प्रैशर बढ़ाना होता है. डेरी डद्योग के लिए पशुपालक किसानों को सरकार अनुदान भी दे रही है. यह अनुदान पिछले दिनों तक केवल अनुसूचित जाति के लोगों को ही मिलता था, जो 33.33 फीसदी था. लेकिन अब सभी वर्ग के लोग इस अनुदान का लाभ ले सकते हैं.

मशीन से दूध निकालने की शुरुआत डेनमार्क और नीदरलैंड से हुई और आज यह तकनीक दुनियाभर के लोगों द्वारा इस्तेमाल की जा रही है. आजकल डेरी उद्योग से जुड़े अनेक लोग पशुओं से दूध उत्पादन मशीन के द्वारा ले रहे हैं.

पशुओं का दूध दुहने वाली मशीन को हम मिल्किंग मशीन के नाम से भी जानते हैं. इस मशीन से दुधारू पशुओं का दूध बड़ी ही आसानी से निकाला जा सकता है. इस से पशुओं के थनों को कोई नुकसान नहीं होता है. इस से दूध की गुणवत्ता बनी रहती है और उस के उत्पादन में बढ़ोतरी होती है. यह मशीन थनों की मालिश भी करती और दूध निकालती है. इस मशीन से पशु को वैसा ही महसूस होता है, जैसे वह अपने बच्चे को दूध पिला रही हो.

मिल्किंग मशीन से दूध निकालने से लागत के साथसाथ समय की भी बचत होती है और दूध में किसी तरह की गंदगी नहीं आती. इस से तिनके, बाल, गोबर और पेशाब के छींटों से बचाव होता है. पशुपालक के दूध निकालते समय उन के खांसने व छींकने से भी दूध का बचाव होता है. दूध मशीन के जरीए दूध सीधा थनों से बंद डब्बों में ही इकट्ठा होता है.

घरेलू व दुधारू पशुओं की बीमारियों से जागरूकता जरूरी

चौधरी सरवन कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर के डाक्टर जीसी नेगी पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय के पशु जनस्वास्थ्य एवं जानपदिक विज्ञान विभाग के विशेषज्ञों ने शोध में सर्वे करते हुए ऐसी बीमारियों को जाना है, जो पशुओं से इनसानों में न केवल प्रवेश कर उन्हें संक्रमित कर सकती हैं, बल्कि जानलेवा भी बन जाती है.

तपेदिक, रैबीज, ब्रुसेलोसिस, स्क्रब टाईफस,लिपटो सेरा, टोक्सो प्लाजमा, डिपथेरिया, टोक्सो कैराकैनी जैसी कुछ ऐसी बीमारियां हैं, जो पशुओं से मनुष्यों में भी पाई जाती हैं. इन बीमारियों से संक्रमित होने पर मनुष्य अपने साथ दूसरों को भी इस की चपेट में ले लेता है. इन से बचने के लिए मनुष्यों को जहां पर्याप्त सावधानी बरतते हुए खानपान में भी विशेष ध्यान रखना पड़ेगा.

दुधारू पशुओं से होने वाली बीमारियों में तपेदिक प्रमुख है. यह बीमारी पीड़ित पशुओं के दूध, त्वचा और संपर्क में आने से होती है. ग्रामीण क्षेत्रों में यह बीमारी अधिक होती है, क्योंकि पशुओं के साथ मनुष्य अधिक संपर्क में रहते हुए उन के साथ ही रहता है. ऐसी ही बीमारी रैबीज है, जो कुत्तों व बिल्लियों से संक्रमित होती हैं. यह इतनी घातक है कि मनुष्य के लिए जानलेवा भी हो जाती है.

टोक्सो कैराकैनी, टोक्सो प्लाज्मा, डिप्थेरिया भी कुत्तेबिल्लियों से होने वाली अन्य बीमारियां हैं. इस में संक्रमित पशुओं से विषाणुओं के छोटेछोटे अंडे पैरों और बालों के माध्यम से पहुंच कर मनुष्य को बीमार करते हैं.

दुधारू पशुओं में ब्रुसेलोसिस रोग भी मनुष्यों को संक्रमित करता है. पीड़ित पशुओं को छूने से और संपर्क में आने से यह मनुष्यों में होता है. इस के अतिरिक्त दुधारू पशुओं और अन्य जानवरों को जब दवाओं को दिया जाता है तो उस के बाद भी उन के उत्पादों को त्वरित प्रयोग में नहीं लाया जाना चाहिए. इन दवाओं के कारण मनुष्यों पर भी उस का विपरीत प्रभाव पड़ता है. लिहाजा, इन दवाओं के प्रयोग के बाद दूध, मांस और अंडे आदि को 48 घंटे से ले कर 28 दिन तक प्रयोग नहीं करने की सलाह पशु चिकित्सा से जुड़े विशेषज्ञ देते हैं.

पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय के पशु जनस्वास्थ्य एवं जानपदिक विज्ञान विभाग द्वारा करवाई गई एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में भी ऐसे अनेक खुलासे विशेषज्ञों ने किए हैं, जिन में पालतू व घरेलू पशुओं के संपर्क में आने से ही नहीं, बल्कि आप के आसपास घूमने वाले जानवरों से भी मनुष्य संक्रमित हो सकते है. ऐसी स्थिति में इन पशुओं से दूरी रखते हुए मनुष्यों को अपना बचाव करना चाहिए.

विशेषज्ञों से समयसमय पर अपने घरेलू जानवरों और दुधारू पशुओं का निरीक्षण करवाते हुए उन का टीकाकरण करवाया जाना नितांत आवश्यक है.

प्रमुख रोगों की जानकारी, लक्षण व बचाव

रैबीज

यह रैबीज रोग संक्रमित पशु के काटने से होता है. इतना ही नहीं, संक्रमित पशु की लार, उस की त्वचा के घाव और चोट के प्रभाव में आने से भी यह होता है.

यह संक्रामक बीमारी है, जो रैबीज पशु द्वारा स्वस्थ पशु या मानव को काटने या चाटने से फैलती है. यह मानव के मस्तिष्क और मेरूदंड को प्रभावित करता है.

मानव में रैबीज के लक्षणों में प्रमुख तौर पर जिन्हें माना जाता है, उस में मुख्य तौर पर संक्रमित व्यक्ति को पानी से डर लगता है. उसे गुस्सा, उत्तेजना, चिड़चिड़ापन व उदासी घेर लेती है. 2-4 दिन तक बुखार, थकावट और सिरदर्द रहता है. इस की अंतिम अवस्था में पीड़ित व्यक्ति पानी को देखने मात्र से ही गले, मांसपेशियों में अकड़न आ जाती है.

रैबीज से पीड़ित व्यक्ति का इलाज संभव नहीं है. एक बार यह हो जाए, तो उस की मौत निश्चित है. इस से बचने का केवल यही एकमात्र उपाय है कि पशु का पहले से ही टीकाकरण करवा लिया जाए.

तपेदिक या क्षयरोग

तपेदिक लंबे समय तक चलने वाला जीवाणुजनित रोग है. यह एक विशेष प्रकार के जीवाणु एसिड फास्ट मायकोबैक्टीरिया से होता है. यह रोग सभी प्रकार के पशुओं और मानवों में हो सकता है. इस का जीवाणु सामान्य वातावरण में एक वर्ष तक जीवित रह सकता है.

मानव में इस के लक्षण इस प्रकार देखे जाते हैं. शाम के समय बुखार आना, रात के समय पसीना आना, कमजोरी और वजन कम होना, भूख कम लगना, खांसी में खून आना, 3 हफ्ते से अधिक समय तक खांसी का रहना, गले के पास सूजन व गिल्टी का होना, आंत की दीवार में सूजन होने पर दस्त लगना प्रमुख है.

रोग से बचाव के लिए

दुधारू व पालतू पशुओं के रहने के लिए अलग स्थान होना चाहिए. दूध का प्रयोग हमेशा उबाल कर ही करें. पशुओं का दूध निकालते समय हाथ में कोई जख्म नहीं होना चाहिए. रोग से बचाव के लिए बीसीजी के टीके लगवाने चाहिए, जो अस्पतालों मं नि:शुल्क उपलब्ध होते हैं. सब से महत्वपूर्ण पीड़ित व्यक्ति को अधिक प्रोटीनयुक्त आहार प्रदान करना चाहिए.

कृषि से जुड़ी काम की बातें

धान की नर्सरी

* धान की नर्सरी डालने के लिए खेत की तैयारी करें. साथ ही, उन्नतशील किस्मों में नरेंद्र धान-359, नरेंद्र धान-2026, नरेंद्र धान-2064, नरेंद्र धान-2065, नरेंद्र धान-3112, सरजू-52, सीता आदि हैं और संकर किस्मों में एराइज-6444, प्रो. एग्रो-6201, पीएचबी-71, पायनियर-27 पी 31, 27 पी 37, 28 पी 67, आरआरएक्स-113, कावेरी-468, केआरएच-2, यूएस-312, आरएच-312, आरएच-1531 आदि हैं और सुगंधित धान की किस्म-टाइप-3, पूसा बासमती-1, मालवीय सुगंध-105, मालवीय सुगंध-3-4, नरेंद्र सुगंध एवं सीएलआर-10 आदि में से किसी एक किस्म के बीजों एवं खाद की व्यवस्था कर नर्सरी डालें.

* धान के बीजों की नर्सरी डालने के 15 दिन पूर्व खेत में हलकी सिंचाई करें, ताकि खेत में निकलने वाले खरपतवार खेत तैयार करते समय नष्ट हो जाएं.

अरहर

* अरहर की बोआई के लिए खेत को तैयार करें. बीज किसी प्रमाणित संस्था या कृषि विज्ञान केंद्र से ही खरीदें. किसानों को सलाह है कि वे बीजों को बोने से पहले अरहर के लिए उपयुक्त राईजोबियम और फास्फोरस में घुलनशील बैक्टीरिया से अवश्य उपचार कर लें.

अरहर की उन्नत किस्में

* पूसा-2001, पूसा-991, पूसा-992, पारस, मानक, यूपीएएस यानी उपास 120.

* खरीफ मक्का की बोआई के लिए खेतों की तैयारी करें, साथ ही उन्नतशील संस्तुति संकुल एवं संकर प्रजातियां-प्रकाश, वाई-1402, बायो-9681, प्रो.-316, डी-9144, दिकाल्ब-7074, पीएचबी-8144, दक्कन 115, एमएमएच-133 आदि में से किसी एक प्रजाति की बोआई के लिए खाद एवं बीज की व्यवस्था करें.

* मक्के की संकुल प्रजाति की बोआई के लिए 20-25 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर और संकर प्रजाति के लिए 18-20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई करें.

फसल सुरक्षा

* मूंग की फसल में फली बेधक कीट का प्रकोप दिखाई देने की संभावना है. अत: इस की रोकथाम के लिए इमामेक्टिन बेंजोएट 5 फीसदी एसजी 220 ग्राम प्रति हेक्टेयर या डाईमेथोएट 30 फीसदी ईसी 1 लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से 600-700 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव आसमान साफ होने पर करें.

* सब्जियों की फसलों में फल छेदक/पत्ती छेदक कीट की रोकथाम के लिए नीम औयल 1.5-2.0 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी में घोल बना कर 3-4 छिड़काव 8-10 दिन के अंतराल पर करें. सब्जियों की खड़ी फसलों में निराईगुड़ाई करें और सिंचाई का काम 8-10 दिन के अंतराल पर शाम के समय करें.

* फल मक्खी कीट की संख्या जानने और उस के नियंत्रण के लिए कार्बारिल 0.2 फीसदी+प्रोटीन हाईड्रोलाइसेट या सीरा 0.1 फीसदी अथवा मिथाइल यूजीनाल 0.1 फीसदी+मैलाथियान 0.1 फीसदी के घोल को डब्बे में डाल कर ट्रैप लगाएं.

Animalपशुपालन में बरतें सावधानी

* पशुओं को दिन के समय छायादार जगह पर बांध कर रखें. पशुशाला में बोरे का परदा डाल कर रखें और उस पर पानी का छिड़काव कर ठंडा रखें.

* पशुओं को पीने के लिए पर्याप्त मात्रा में ताजा और शुद्ध पानी उपलब्ध कराएं. तेज धूप से काम कर के आए पशुओं को तुरंत पानी न पिलाएं. आधा घंटा सुस्ताने के बाद पानी दें. पशुओं को सुबह और शाम नहलाएं.

* पेट में कीड़ों से बचाव के लिए पशुओं को कृमिनाशक दवा दें. खुरपकामुंहपका रोग की रोकथाम के लिए एफएमडी वैक्सीन से और लंगडि़या बुखार की रोकथाम के लिए बीक्यू वैक्सीन से पशुओं का टीकाकरण अवश्य कराएं. पशुओं में गलघोंटू और फड़ सूजन की रोकथाम के लिए टीकाकरण कराएं. शाम के समय पशुओं के पास नीम की पत्तियों का धुआं करें, ताकि मच्छर व मक्खी भाग जाएं.

Farmingमुरगीपालन

* मुरगियों को भोजन में पूरक आहार दें. विटामिन व ऊर्जा खाद्य सामग्री इस में मिलाएं और साथ ही साथ कैल्शियम सामग्री भी मुरगियों को आहार में दें.

* पेट में कीड़ों की रोकथाम के लिए दवा दें. मुरगियों को गरमी से बचाव के लिए मुरगीघर में परदे, पंखे और वैंटिलेशन की व्यवस्था करें.

* मुरगियों को गरमी से बचाने के लिए मुरगीघर में लगे हुए जूट के परदों पर पानी के छींटे मारें, जिस से ठंडक बनी रहे.

पशुओं का पौष्टिक चारा ज्वार

हमारे गांवों की 73 फीसदी आबादी पशुपालन से जुड़ी है. जिन किसानों के पास जोत कम है, वे भी चारे की फसलों के बजाय नकदी फसलों की ओर ज्यादा ध्यान देते हैं.

हरा चारा खिलाने से पशुओं में भी काम करने की कूवत बढ़ती है, वहीं दूध देने वाले पशुओं के दूध देने की कूवत बढ़ती है, इसलिए उत्तम चारे का उत्पादन जरूरी है, क्योंकि चारा पशुओं को मुनासिब प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन और खनिज पदार्थों की भरपाई करते हैं.

हरे चारे का उत्पादन कुल जोत का तकरीबन 4.4 फीसदी जमीन पर ही किया जा रहा है. 60 के दशक में पशुओं की तादाद बढ़ने के बावजूद भी चारा उत्पादन रकबे में कोई खास फर्क नहीं हुआ है.

अच्छी क्वालिटी का हरा चारा हासिल करने के लिए ये तरीके अपनाए जाने चाहिए :

जमीन : ज्वार की खेती के लिए दोमट, बलुई दोमट और हलकी व औसत दर्जे वाली काली मिट्टी, जिस का पीएच मान 5.5 से 8.5 हो, बढि़या मानी गई है.

यदि मिट्टी ज्यादा अम्लीय या क्षारीय है, तो ऐसी जगहों पर ज्वार की खेती नहीं करनी चाहिए.

खेत और बीज

पलेवा कर के पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें या हैरो से. उस के बाद 1-2 जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से कर के पाटा जरूर लगा देना चाहिए.

एकल कटाई यानी एक कटाई वाली किस्मों के लिए 30-40 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर और बहुकटान यानी बहुत सी कटाई वाली प्रजातियों के लिए 25-30 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत में डालना चाहिए.

उन्नतशील किस्में 

हरे चारे के उत्पादन के लिए ज्वार की ज्यादा पैदावार और अच्छी क्वालिटी लेने के लिए उन्नतशील किस्मों को ही चुनें.

बीजोपचार

बोने से पहले बीजों को 2.5 ग्राम एग्रोसन जीएन थीरम या 2.0 ग्राम कार्बंडाजिम प्रति किलोग्राम के हिसाब से बीज उपचारित करना काफी फायदेमंद रहता है. ऐसा कर के से फसल में बीज और मिट्टी के रोगों को आसानी से कम कर सकते हैं.

ज्वार को फ्रूट मक्खी से बचाने के लिए इमिडाक्लोप्रिड 1 मिलीलिटर प्रति किलोग्राम के हिसाब से बीज उपचारित करना फायदेमंद रहेगा.

बोने का तरीका

हरे चारे के लिए जायद मौसम में बोआई का सही समय फरवरी से मार्च महीने तक है. ज्यादातर किसान ज्वार को बिखेर कर बोते हैं, पर इस की बोआई हल के पीछे कूंड़ों में और लाइन से लाइन की दूरी 30 सैंटीमीटर पर करना ज्यादा फायदेमंद है.

खाद और उर्वरक 

खाद और उर्वरक की मात्रा का इस्तेमाल जमीन के मुताबिक करना चाहिए. अगर किसान के पास गोबर की सड़ी खाद, खली या कंपोस्ट खाद है, तो बोआई से 15-20 दिन पहले इन का इस्तेमाल खेत में करना चाहिए.

एकल कटान यानी एक कटाई वाली प्रजातियों में 40-50 किलोग्राम नाइट्रोजन और 40 किलोग्राम फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें और बची हुई 40-50 किलोग्राम नाइट्रोजन फसल बोने के एक महीने बाद मुनासिब नमी होने पर खड़ी फसल पर इस्तेमाल करना चाहिए.

बहुकटान वाली किस्मों में 60-75 किलोग्राम नाइट्रोजन और 40 किलोग्राम फास्फोरस बोआई के समय और 15-20 किलोग्राम नाइट्रोजन हर कटाई के बाद प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण 

आमतौर पर बारिश के मौसम में पानी देने की जरूरत नहीं होती. अगर बारिश न हो, तो पहले फसल को हर 8-12 दिन के फासले पर सिंचाई की जरूरत होती है.

फसल की बोआई के तुरंत बाद खरपतवार को जमने से रोकने के लिए 1.5 किलोग्राम एट्राजिन 50 डब्ल्यूपी या सिमेजिन को 1,000 लिटर पानी में घोल बना कर जमाव से पहले खेत में छिड़कना चाहिए.

ज्वार के कीट व रोग प्रबंधन

मधुमिता रोग : फूल आने से पहले 0.5 फीसदी जीरम का 5 दिन के फासले पर 2 छिड़काव करने से इस रोग से बचाव हो सकता है. बाली पर अगर रोग दिखाई दे रहा हो, तो उसे बाहर निकाल कर जला दें.

दाने पर फफूंद : फूल आते समय या दाना बनते समय अगर बारिश होती है, तो इस रोग का प्रकोप ज्यादा होता है. दाने काले व सफेद गुलाबी रंग के हो जाते हैं. क्वालिटी गिर जाती है, इसलिए अगर फसल में सिट्टे आने के बाद आसमान में बादल छाएं और आबोहवा में नमी ज्यादा हो तो मैंकोजेब 75 फीसदी 2 ग्राम या कार्बंडाजिम दवा 0.5 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल बना कर 10 दिन के फासले पर 2 छिड़काव करें.

चारकोल राट : इस रोग का प्रकोप रबी ज्वार के सूखे रकबे में छिली मिट्टी में होता है. इस का फैलाव जमीन पर होता है. इस रोग की रोकथाम के लिए नाइट्रोजन खाद का इस्तेमाल कम से कम करना चाहिए और प्रति हेक्टेयर पौधों की तादाद कम रखनी चाहिए. बीज को बोआई के समय थाइरम 4.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से उपचारित करना चाहिए.

पत्ती पर धब्बे (लीफ स्पौट) : इस की रोकथाम करने के लिए डाईथेन जेड 78 की 0.2 फीसदी का 2 बार 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करने से बचाव हो जाता है.

मुख्य कीट

प्ररोह मक्खी : यह कीट ज्वार का घातक दुश्मन है. फसल की शुरुआती अवस्था में यह कीट बहुत नुकसान पहुंचाता है. जब फसल 30 दिन की होती है, तब तक कीट से फसल को 80 फीसदी तक नुकसान हो जाता है.

इस कीट की रोकथाम के लिए बीज को इमिडाक्लोप्रिड गोचो 14 मिलीलिटर प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर के बोना चाहिए.

बोआई के समय बीज की मात्रा 10 से 12 फीसदी ज्यादा रखनी चाहिए. जरूरी हो तो अंकुरण के 10-12 दिन बाद इमिडाक्लोप्रिड 200 एसएल 5 मिलीलिटर प्रति 10 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए. फसल काटने के बाद खेत में गहरी जुताई करें और फसल के अवशेषों को एकत्रित कर जला दें.

तनाभेदक कीट : इस कीट का हमला फसल लगने के 10-15 दिन से शुरू हो कर उस के पकने तक रहता है. इस के नियंत्रण के लिए फसल काटने के तुरंत बाद खेत में गहरी जुताई करें और बचे हुए फसल अवशेषों को जला दें.

खेत में बोआई के समय खाद के साथ 10 किलोग्राम की दर से फोरेट 10 जी या कार्बोफ्यूरान दवा अच्छी तरह मिला दें.

बोआई के तकरीबन 15-20 दिन बाद इमिडाक्लोप्रिड 200 एसएल 5 मिलीलिटर प्रति 10 लिटर या कार्बोरिल 50 फीसदी घुलनशील पाउडर 2 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल बना कर 10 दिन के अंतराल पर 2 छिड़काव करना चाहिए.

सिट्टे की मक्खी : यह मक्खी सिट्टे निकलते समय फसल को नुकसान पहुंचाती है. इस की रोकथाम के लिए जब 50 फीसदी सिट्टे निकल आएं, तब प्रोपेनफास 40 ईसी दवा 25 मिलीलिटर प्रति 10 लिटर पानी में घोल बना कर 10 से 15 दिन के अंतराल पर 2 छिड़काव करना चाहिए.

टिड्डा : यह कीट ज्वार की फसल को छोटी अवस्था से ले कर उस के पकने तक नुकसान पहुंचाता है और पत्तियों के किनारों को खा कर धीरेधीरे पूरी पत्तियां खा जाता है. बाद में फसल में मात्र मध्य शिराएं और पतला तना ही रह जाता है.

इस कीट के नियंत्रण के लिए फसल में कार्बोरिल 50 फीसदी घुलनशील पाउडर 2 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल बना कर 10 से 15 दिन के अंतराल पर 2 छिड़काव करना चाहिए.

पक्षियों से बचाव : ज्वार पक्षियों का मुख्य भोजन है. फसल में जब दाने बनने लगते हैं, तो सुबहशाम पक्षियों से बचाना बहुत जरूरी है वरना फसल को काफी नुकसान होता है.

कटाई : पशुओं को पौष्टिक चारा खिलाने के लिए फसल की कटाई 5 फीसदी फूल आने पर अथवा 60-70 दिन बाद करनी चाहिए. बहुकटान वाली प्रजातियों की पहली कटाई बोआई के 50-60 दिनों के बाद और बाद की कटाई 30-35 दिन के अंतर पर जमीन की सतह से 6-8 सैंटीमीटर की ऊंचाई पर या 4 अंगुल ऊपर से काटने पर कल्ले अच्छे निकलते हैं.

उपज : प्रजातियों के हरे चारे की उपज 250-450 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हो जाती है, जबकि बहुकटान वाली किस्मों की उपज 750-800 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हो जाती है.

एकल कटान वाली प्रजातियां

यूपी चरी-1, (पूरे भारत के लिए) : अगेती फसल की जल्दी बढ़वार. अधिक प्रोटीन हाइड्रोकैमिकल अम्ल की मात्रा कम. पौध की ऊंचाई 275-325 सैंटीमीटर. पत्ती रोगों के लिए सहनशीलता. तना रसीला और मिठास से भरा.

यूपी चरी-2, (उत्तर प्रदेश के लिए) : हरा चारा व दानों के लिए पत्तियां लंबीचौड़ी और हलके रंग की. तना मध्यम, मोटा व रसीला. पौधे की ऊंचाई 240-275 सैंटीमीटर.

यूपी चरी-3, (उत्तर प्रदेश के लिए) : हरा चारा और दाने के लिए सही. 70 दिनों में हरे चारे के लिए यह किस्म तैयार हो जाती है.

एचसी-171, (पूरे भारत के लिए) : 70 दिनों में हरे चारे के लिए तैयार. तना मध्यम, मोटा, मीठा और रसीला. चारा ज्यादा स्वादिष्ठ और पौष्टिक. पौधे पर 1-21 पत्तियां. पौधे की ऊंचाई 215-225 सैंटीमीटर. पत्ती रोगों और कीटों के लिए प्रतिरोधी.

पूसा चरी-1, (पूरे भारत के लिए) : 70-75 दिनों में हरे चारे के लिए तैयार. तना रसीला व मध्यम मोटाई का. मध्यम लंबी व चौड़ी पत्तियां. पौधों की ऊंचाई मध्यम. बीज बहुत कठोर, सफेद. चारा पौष्टिक.

एसएल-44, (उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के लिए) : तना पतला, मिठासरहित व रसीला. पत्तियां लंबी व मध्यम चौड़ाई. ऊंचाई 252.9 सैंटीमीटर.

बहुकटान वाली प्रजातियां

एसएसजी-988, (पूरे भारत के लिए) : 3-5 कटाई और कीट प्रतिरोधी.

मीठी सुडान एसएसजी-59-3, (पूरे भारत के लिए) : तना पतला और मीठा. ऊंचाई 250-320 सैंटीमीटर. हाइड्रोकैमिकल अम्ल की मात्रा कम. पत्तियां अधिक स्वादिष्ठ. अधिक प्रोटीन. सूखे के प्रति सहनशील.

एचपी चरी, (पूरे भारत के लिए) : चारा 65 से 70 दिनों में तैयार. तना पतला, मीठा व रसरहित. पौधे लंबे, पत्तियां मध्यम, लंबी और संकरी. हाइड्रोकैमिकल अम्ल की मात्रा कम. बेहतर नव विकास कूवत 2 कटाई के लिए.

पूसा चरी-23, (पूरे भारत के लिए) : पौधे की ऊंचाई 172 सैंटीमीटर. तना पतला, मीठा और रसरहित. पत्तियां संकरी. दाना नीले लाल रंग का. सूखे के प्रति सहनशील.