Vegetables : बरसात में उगाई जाने वाली खास सब्जियां

Vegetables : बरसात के मौसम में बाजार में सब्जियां अक्सर महंगी हो जाती हैं. क्योंकि बरसात में अनेक बेल वाली सब्जियां बरसात के कारण सड़ने लगती हैं, जिस कारण पैदावार कम हो जाती है. इस के अलावा सब्जियों में अनेक तरह की कीट बीमारियां भी बढ़ जाती हैं. पत्तेवाली सब्जियों की इन दिनों बहुआहत होती है, लेकिन कीड़ों के चलते इन्हें लोग कम खरीदते हैं. ख़पतवार भी अधिक पनपते हैं, जो पैदावार में कमी लाते हैं.

ऐसे में जरूरी है कि बरसात में कुछ खास सब्जियों पर फोकस कर उन्हें आप घर में भी उगा सकते हैं.

सेम की फली सब्जी की खेती

सेम बहुत पसंद की जाने वाली पौष्टिक सब्जी है. इसे बीज के जरीए सीधा उगाया जाता है. उत्तर भारत के क्षेत्र में इसे उगाने का सब से अच्छा समय जून से ले कर अगस्त का महीना है. सेम की फली में बहुत अधिक मात्रा में प्रोटीन होता है. सब से ध्यान रखने योग्य बात ये है कि इसे लगाते समय बीज का ध्यान रखना बहुत जरूरी है. अपने क्षेत्र के अनुसार इस की बीज की प्रजाति को लगाएं.

बैगन की खेती

बैगन एक सदाबहार सब्जी है और इस से सालोंसाल फल उत्पादन लिया जा सकता है. गर्मियों में इसे मार्चअप्रैल के महीनो में उगाया जाता है. तो सर्दियों के लिए बरसात का मौसम शुरू होते ही लगा दिया जाता है. इस की अच्छी उपज के लिए अच्छी प्रजाति का चयन करें.

करेला की खेती

करेले की खेती अब एक औषधीय फसल भी हो चुकी है, क्योंकि शुगर के पीड़ित लोगों के लिए यह बहुत स्वास्थ्यवर्धक सब्जी मानी जाती है और लोग इस के जूस का सेवन भी सालोंसाल करते हैं. इसलिए निश्चित तौर पर यह मुनाफा देने वाली फसल है. इन दिनों बरसात का मौसम आने वाला है और देश के कई इलाकों में मानसून आ भी चुका है.

ऐसे में बरसात के मौसम में करेले की खेती भी एक अच्छी सब्जी है. लेकिन बरसात के लिए करेले के अलग तरीके के बीज आते हैं. अक्सर लोग गर्मी के मौसम के ही बीजों को उपयोग कर लेते हैं, जिस कारण करेला का उत्पादन अच्छा नहीं मिल पाता. इसलिए आप इस बात का जरूर ध्यान रखें, कि अगर आप बरसाती मौसम का करेला लगाने जा रहे हैं, तो उसी के अनुसार करेले का बीज खरीदें. अगर किसी अन्य मौसम में करेला लगाना है, तो उस के अनुसार ही करेले की प्रजाति का चयन करें.

टमाटर की खेती

टमाटर अब सालों साल मिलता है और इस के बिना अब हर सब्जी का स्वाद भी अधूरा है. साल भर में टमाटर बाजार में अपने कई रंग भी दिखाता है. कभी किसान के वारेन्यारे करता है तो कभी उस के लिए घाटे का सौदा भी बनता है. इसलिए जरूरी है कि समय के अनुसार अच्छी उपज देनेवाली प्रजाति का चयन करें.

टमाटर की खेती आमतौर पर तीन मौसमों में की जाती है:

– खरीफ मौसम में इस की खेती जूनजुलाई में की जाती है. इस समय बारिश का मौसम होता है.

– रबी की खेती में अक्टूबरनवंबर के मौसम में तापमान कम होता है, जो टमाटर की खेती के लिए अनुकूल होता है. इस समय में फसल की वृद्धि अच्छी होती है.

– जायद के समय टमाटर की खेती फरवरीमार्च के समय की जाती है. इस समय तापमान सामान्य होता है.

टमाटर की खेती के लिए उपयुक्त किस्में

भारत में टमाटर की अनेक किस्में होती हैं, जो अलगअलग मौसम और क्षेत्रों में उगाई जाती हैं. कुछ प्रमुख किस्में हैं:

पूसा रूबी, पूसा अर्ली ड्वार्फ, पूसा 120, आर्का विकास, आर्का अभिजीत

इनमें से किसी भी किस्म का चयन करने से पहले कृषि जानकर से यह जानकारी भी लें, कि आप के क्षेत्र के अनुसार कौन से किस्म अच्छी रहेगी.

बीज की तैयारी और बोआई

बोआई से पहले बीजों को फफूंदनाशक से उपचारित कर लेना चाहिए. ताकि रोगों से बचाव हो सके. फिर बीज उपचार के बाद टमाटर की नर्सरी तैयार करें.

पौधों को खेत में रोपने से पहले मिट्टी को अच्छी तरह जोत कर तैयार कर लेना चाहिए. पौधों के बीच 60-75 सैंटीमीटर की दूरी रखनी चाहिए.

टमाटर की खेती के लिए उचित मात्रा में खाद और सिंचाई की आवश्यकता होती है.

सिंचाई

टमाटर के पौधों को नियमित रूप से सिंचाई की आवश्यकता होती है. गरमी के मौसम में हर 4 से 5 दिन और सर्दी में 10 से 15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें.

टमाटर के पौधे की देखभाल का सही तरीका

कीटों और बीमारियों से बचाव

कीट नियंत्रण: सफेद मक्खी, चेपा, और फल छेदक कीट टमाटर के प्रमुख दुश्मन हैं. इन से बचाव के लिए जैविक कीटनाशकों का प्रयोग करें.

रोग नियंत्रण: टमाटर में पत्तियों का पीला पड़ना, तना गलन, और फल सड़न जैसी बीमारियां हो सकती हैं. इन से बचने के लिए रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन करें और समयसमय पर फफूंदनाशकों का छिड़काव करें.

Pro Tray Technology : प्रो ट्रे तकनीक से उगाएं फलसब्जियां

Pro Tray Technology : आमतौर पर खेती जमीन, घर आंगन के बगीचे या गमलों में लोग करते आए हैं. बड़े पैमाने पर खेती करने के लिए बड़े रकबे यानी खेती की जमीन की जरूरत होती ही है. लेकिन घर की सामान्य जरूरत लायक सब्जी की खेती हम घर के आसपास खाली पड़ी जमीन या गमलों में या घर के छज्जे या छत पर भी कर सकते हैं. क्योंकि कुछ फलसब्जियां बिना कृषि रसायनों के घर में भी उगाई जा सकती हैं, जो गुणकारी होने के साथ पौष्टिक भी होती हैं.

इस तकनीक से अलग हट कर कुछ और तरीकों से भी फलसब्जी की खेती की जा सकती है.

प्रो ट्रे तकनीक से फलसब्जियां

हाइड्रोपोनिक और वर्टिकल फार्मिंग की तरह ही प्रो ट्रे तकनीक भी चलन में है और किसानों द्वारा अपनाई जा रही है. इस खास तकनीक के जरीए किसान कम खर्च और कम जगह में सब्जियों की अच्छी पैदावार ले सकते हैं.

प्रो ट्रे में करें नर्सरी तैयार

नर्सरी तैयार करने के लिए प्रो ट्रे तकनीक एक आधुनिक तकनीक है. प्रो ट्रे में फल या सब्जी की नर्सरी तैयार करने के लिए सब से पहले प्रो ट्रे लें , जो आप को खादबीज, नर्सरी या खेती के सामान बेचने वालों के यहां आसानी से मिल जाएगी. वहां से आप ये ट्रे खरीद लें. फिर कंपोस्ट सीओ और कोकोपीट नारियल तेल का बेस तैयार कर लें. इस के लिए सब से पहले कोकोपीट ब्लौक की जरूरत होगी. यह नारियल के बुरादे से बनती है. इस ब्लौक को 5 घंटे तक पानी में भिगो कर रखना है और फिर कोकोपीट ब्लौक की अच्छी तरह से सफाई करनी है, ताकि इस में मौजूद सब गंदगी बाहर निकल जाएं और पौधों को किसी तरह का नुकसान न पहुंचे और पौध अच्छी गुणवत्ता वाली तैयार हो सके. उस के बाद कोकोपीट ब्लौक को अच्छी तरह सुखा लें.

जब ब्लौक सूख जाए तो 50 फीसदी वर्मी कंपोस्ट और 50 फीसदी कोकोपीट को अच्छी तरह मिक्स कर मिश्रण तैयार करें. अब इस तैयार मिश्रण को प्रो ट्रे में भर लें.

प्रो ट्रे में बीजों की बोआई

प्रो ट्रे के हर खाने में उंगली या किसी लकड़ी की मदद से छेद कर गड्ढा बना लें और अब इस में धीरेधीरे बीज डाल दें. फिर उन्हें हल्के हाथ से ढक दें. हमें यह ध्यान रखना है कि बीजों की बोआई के तुरंत बाद सिंचाई नहीं करनी है. क्योंकि तैयार मिश्रण में नमी होती है, जो बीज अंकुरण के लिए काफी होती है. इस के बाद इन ट्रे को अंधेरे में रख दें.

जब पौधे उग जाएं, तो प्रो ट्रे को निकाल कर बाहर रख देना है और इस के बाद पौधों की पहली सिंचाई करनी है. इन पौधों को सूखने ना दें. इस तरीके से 10 से 15 दिन में एक बेहतरीन नर्सरी तैयार हो जाएगी और सभी पौधे रोपने के लिए तैयार हो चुके होंगे. अब आप इन को अपनी सुविधानुसार बड़े पौट या किसी बोरी या जमीन ,बगीचे में रोप सकते हैं.

इन की करें खेती

प्रो ट्रे तकनीक अपना कर कई तरह के देशी और विदेशी फलों और सब्जियों की खेती की जा सकती है. सब से खास बात यह है कि इस की मदद से किसी भी मौसम में सब्जियों और फल की खेती कर सकते हैं.  आजकल खेती में यह तकनीक बहुत चलन में है और किसान इस में बिना मौसम के भी बहुत सी सब्जियां उगा सकते हैं.

Inspiring Personalities : वर्मी कंपोस्ट की राह दिखा रहे विज्ञान शुक्ला

Inspiring Personalities : खेती में रासायनिक खादों के अधाधुंध इस्तेमाल से मिट्ट‌ी की घटती उर्वरशक्ति और आमजन की बिगड़ती सेहत को समझते हुए बांदा जिले के अतर्रा गांव के किसान विज्ञान शुक्ला (Vigyan Shukla) ने एक ऐसी राह चुनी जो खुद के लिए तो मील का पत्थर साबित हुई. साथ ही, अन्य किसानों के लिए भी खेती में नई राह दिखाने का काम कर रही है. विज्ञान शुक्ला (Vigyan Shukla) ने अब से 14 साल पहले अकेले जैविक खेती की शुरुआत की और कंपोस्ट खाद बनाने का काम अपने घर से शुरू किया और आज के समय उन से प्रेरणा ले कर जिले के लगभग 300 किसान जैविक खेती को अपना रहे हैं.

विज्ञान शुक्ला (Vigyan Shukla) बांदा जिले के ऐसे प्रगतिशील किसान हैं जिन के साथ आज बुंदेलखंड क्षेत्र के लगभग 15 हजार किसान जुड़े हुए हैं, जो लगातार उन के संपर्क में रह कर जैविक खेती से अच्छा फसल उत्पादन ले रहे हैं और पशुपालन भी कर रहे हैं. विज्ञान शुक्ला (Vigyan Shukla) ने बताया कि उन के खेत पर स्थापित वर्मी कंपोस्ट यूनिट, पशुपालन यूनिट, जैविक आउटलेट पर अभी तक लगभग 4 हजार किसान भ्रमण कर चुके हैं.

उन्होंने बताया कि जैविक खेती की शुरुआत के 2 सालों में फसल उत्पादन में 10 से 12 फीसदी तक की कमी आई थी जो बाद में पूरी हो गई. अब तो रासायनिक खेती की तुलना में 20 से 25 फीसदी अधिक पैदावार मिलती है और कम लागत में गुणवत्ता युक्त फसल उत्पादन भी  मिलता है. जिस के बाजार दाम भी अच्छे मिलते हैं.

Vigyan Shukla

कैसे करते हैं खेती ?

विज्ञान शुक्ला (Vigyan Shukla) धान,गेहूं, ज्वार, हाइब्रिड ज्वार, मूंग आदि की खेती करते हैं और खेत की एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करते हैं और 3 जुताई कल्टीवेटर से कर मिट्टी की संतुति के अनुसार बीज तय करते हैं.

जुताई के समय गोबर की खाद 6 टन प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में डालते हैं. खरपतवार की रोकथाम के लिए समय पर निराईगुड़ाई का काम करते हैं और पहली निराई के समय पौधों में विरलीकरण का काम करते हैं. पहली सिंचाई खेती में पुष्पास्था के समय ओर दूसरी सिंचाई पुष्प आने के बाद करते हैं.

फसल सुरक्षा के लिए रस चूसने वाले कीटों और छोटी सुंडी , इल्लियों की रोकथाम के लिए  नीमास्त्र का इस्तेमाल और कीटों और बड़ी सुंडियों के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करते हैं. छिड़काव के लिए 100 लीटर पानी में 2.5 मिलीलिटर नीमास्त्र या ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करते हैं.

फसल तैयार होने के बाद फसल काटने पर उसे धूप में सुखाकर 10 से12 फीसदी नमी पर उस का भंडारण करते हैं. सुरक्षित भंडारण के लिए सूखी नीम की पतियों का इस्तेमाल करते हैं.

बीज बोने से पहले उस का बीजशोधन ट्राइकोग्रामा ट्राईकोडर्मा 4 ग्राम प्रति किलोग्राम की दर के बाद राइजोबियम कल्चर 200 ग्राम प्रति 10 किलोग्राम बीज की दर से करते हैं.

लोगों को मिल रहा रोजगार

विज्ञान शुक्ला (Vigyan Shukla) का कहना है कि उन के प्रक्षेत्र पर 30 वर्मी कंपोस्ट यूनिट लगी हैं. 13 पशुपालन यूनिट हैं, जैविक आउटलेट हैं जिन के जरिए लगभग 25 से 30 लोगों को रोजगार मिल रहा है.

Vigyan Shuklaविज्ञान शुक्ला (Vigyan Shukla) को उन के द्वारा खेती में किए जा रहे उत्कृष्ट कार्य के लिए राष्ट्रीय स्तर का जगजीवनराम अभिनव पुरस्कार के अलावा ढेरों सम्मान से नवाजा जा चूका है.

विज्ञान शुक्ल (Vigyan Shukla) ने बताया कि स्नातक की पढ़ाई के दौरान परिजनों को रासायनिक खादों से जूझते देखा तो मन दुखी हो गया तभी से मैं कंपोस्ट खाद के निर्माण में जुट गया. इस की शुरूआत के लिए 15×3×2 फीट की चार चरही में गोबर भर कन्नौज से लाए और उस में केंचुआ ला छोड़ा तो अच्छी वर्मी कंपोस्ट खाद बनने की शुरुआत हुई.

फिर कुछ समय बाद खेतों में पैदावार बढ़ने लगी और अच्छे नतीजों से उत्साहित हो कर कृषि एवं उद्यान विभाग से अनुदान ले कर काम को आगे बढ़ाया. जिस से खाद में अच्छा उत्पादन होने लगा तो आमदनी बढ़ने लगी. फिर तीन सालों के बाद इस काम से फसल पैदावार के अलावा खाद बिक्री से सालाना 1 लाख रुपए की आय होने लगी. जिस से मेरी आगे की राह और आसान बन गई. आज विज्ञान शुक्ला के प्रयास से बांदा और चित्रकूट जनपद के 100 से अधिक किसानों को इस तकनीक से जोड़ा गया है.

वर्मी कंपोस्ट तकनीक के बारे में उन्होंने बताया कि 15 फीट लंबी, 3 फीट चौड़ी और 2 फीट ऊंची, चरही में 15 क्विंटल गोबर और 4 क्विंटल केंचुआ की जरूरत पड़ती है. जिस में 11 क्विंटल वर्मी कंपोस्ट खाद तैयार हो जाता है. यह 2 एकड़ खेत के लिए पर्याप्त है. इन में सभी 16 पोषक तत्वों का जमावड़ा होता है. इस के प्रयोग से यूरिया, डीएपी जैसी रासायनिक खादों की आवश्यकता नहीं पड़ती है. छोटे से छोटा किसान भी वर्मी कंपोस्ट खाद का उत्पादन कर सकता है.

Apple Farming : मैदानी इलाकों में सेब की बागबानी

Apple Farming : सेब की बागबानी आमतौर पर पहाड़ी इलाकों में ही की जाती है. इस वजह से सेब को पहाड़ी फल माना जाता है. भारत में सेब की बागबानी आमतौर पर हिमाचल प्रदेश, जम्मूकश्मीर और उत्तराखंड में की जाती है. पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों जैसे अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में भी अब सेब की बागबानी की जा रही है.

पहाड़ी इलाकों में ऊंचाई के मुताबिक सेब की अलगअलग प्रजातियां उगाई जाती हैं. इन प्रजातियों में फूल केवल उन्हीं दशाओं में होता है, जब उन को मौसम के मुताबिक 800 से 1500 घंटे की ठंडी इकाइयां यानी चिलिंग यूनिट्स मिल जाती हैं. ठंडी इकाइयों की गिनती तापमान के 7 डिगरी सैल्सियस से नीचे आने पर शुरू होती है. ठंड की उक्त परिस्थितियां केवल शीतोष्ण जलवायु में ही मुनासिब होती हैं इसलिए सेब की बागबानी को शीतोष्ण जलवायु के इलाके में किया जाता रहा है.

मैदानी इलाकों में सेब की बागबानी के लिए विदेशी शोध संस्थानों ने कुछ प्रजातियां ईजाद की थीं, पर उन का भारत की उपोष्ण जलवायु में जांच न होने के चलते इस के बारे में अभी तक जागरूकता नहीं थी.

सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, मेरठ (उत्तर प्रदेश) के पुराने परिसर पर डाक्टर अरविंद कुमार के मुताबिक, शोध अनुसंधान पर फलों पर आधारित कृषि प्रणाली विकसित करने के लिए अध्ययन किया गया. इस के तहत सेब की कम ठंडी वाली प्रजातियों जिन की फूल के लिए ठंडी इकाइयों की जरूरत केवल 250 से 300 घंटों की होती है, का परीक्षण उपोष्ण जलवायु में किया गया.

अध्ययन से हासिल नतीजों से यह भरम टूट गया कि सेब की बागबानी पहाड़ी इलाकों में ही की जा सकती है.

संस्थान में हुए अध्ययन के मुताबिक, अगर सही प्रजाति को चुन कर सेब की बागबानी उपोष्ण जलवायु इलाकों में की जाए तो कामयाबी मिल सकती है. यह अध्ययन उपोष्ण इलाकों में कृषि एवं बागबानी में विविधीकरण के एक नए विकल्प के तौर पर उभरा है.

मिट्टी व खेत की तैयारियां

बागबानी करने वाले किसानों को यह सलाह दी जाती है कि सेब लगाने से पहले मिट्टी जांच जरूर करानी चाहिए. इस से पोषक तत्त्वों की कमी को दूर करने के लिए जरूरी संशोधन का निर्धारण करने में मदद मिलेगी और मिट्टी का पीएच मान 6.0-7.0 हो, बेहतर है.

सेब के पौधों को अच्छी नमी और पोषक तत्त्वों की धारण क्षमता के साथ गहरी और अच्छी तरह से गीली बलुई मिट्टी की जरूरत होती है. पानी जमा नहीं होना चाहिए और उचित जल निकास वाली मिट्टी सेब की खेती के लिए मुनासिब होती है.

जाड़े के मौसम में इस प्रजाति को फूल के लिए जरूर 250-300 शीतलन इकाइयों यानी चिलिंग यूनिट्स चाहिए. इन्हें सूरज की रोशनी की कम से कम 6 घंटे की जरूरत होती है. इसलिए उत्तर या पूर्व दिशा से रोशनी की उपलब्धता में कोई व्यवधान नहीं होना चाहिए. उस जगह को चुनें.

मैदानी इलाकों में सेब की मुनासिब प्रजातियां

मैदानी इलाकों में बागबानी के लिए सेब की कई प्रजातियों के नाम हैं. इन प्रजातियों का प्रचारप्रसार और क्षेत्र विस्तार नहीं हो सका. इस की 2 मुख्य वजह थीं. पहली वजह यह कि इन प्रजातियों के मैदानी इलाकों में प्रक्षेत्र मूल्यांकन के आंकड़ों की अनुपलब्धता थी. इस अनुपलब्धता की वजह यह थी कि सेब व दूसरी शीतोष्ण फलों पर शोध करने वाले ज्यादातर संस्थान पर्वतीय इलाकों में सीमित हैं. दूसरी वजह यह कि इन की रोपण सामग्री की कमी.

कम ठंड की जरूरत वाली प्रजातियां : अन्ना, डौर्सेट गोल्डन, एचआरएमएन 99, इन भोमर, माइकल, बेवर्ली हिल्स, पार्लिंस ब्यूटी, ट्रौपिकल ब्यूटी, पेटिंगिल, तम्मा वगैरह. संस्थान में अन्ना, डौर्सेट गोल्डन व एचआरएमएन 99 प्रजाति के पौधों को लगाया गया है. उन पर हुए 3 सालों के अध्ययन से मिली जानकारी को बताया जा रहा है:

अन्ना : यह प्रजाति गरम जलवायु में अच्छी तरह से विकसित होती है और बहुत जल्दी पक कर तैयार होती है. पहाड़ी इलाकों में होने वाली सेब की प्रजातियों को फूल और फल के लिए कम से कम 500 घंटे की ठंडी इकाइयों की जरूरत होती है, जबकि इस प्रजाति को महज 250-300 घंटों की ठंडी इकाइयों की जरूरत होती है.

इस प्रजाति के पौधे प्रक्षेत्र रोपण के एक साल बाद फूल आना शुरू हो जाता है. फूल फरवरी माह के पहले हफ्ते से शुरू होता है जो तकरीबन एक माह तक चलता है. जून में ये फूल पक जाते हैं. फल देखने में गोल्डन डिलीशियस जैसे लगते हैं. यह जल्दी और अधिक फल वाली किस्म है. ताजा फलों के रूप में इन का इस्तेमाल सही रहता है. जून माह में सामान्य तापमान पर तकरीबन 7 दिनों तक इन का भंडारण किया जा सकता है.

डौर्सेट गोल्डन : यह सेब की गोल्डन डिलीशियस जैसी प्रजाति है जो गरम इलाकों के लिए विकसित की गई है. यहां ठंडे मौसम में 250 से 300 घंटों की ठंडी इकाइयां मिल सकें.

यह भी इजराइल द्वारा विकसित की गई प्रजाति है. दिखने में यह फूल बनने के समय में गुणों में और मैदानी मौसम के प्रति व्यवहार में अन्ना किस्म के समान है. इस का गोल्डन पीले सुनहरे रंग का है. हालांकि कभीकभी फलों की सतह पर गुलाबी रंग भी आता है जो उस के सौंदर्य को बढ़ाता है. यह खासतौर से ताजा खाने के लिए बहुत अच्छी और मीठी प्रजाति है. यह शुरुआती मौसम की फसल है. पेड़ का विस्तार मध्यम रहता है.

डौर्सेट गोल्डन किस्म को खासतौर से अन्ना सेब की बागबानी में परागणदाता किस्म के रूप में मान्यताप्राप्त है. इस में फूल आने का समय फरवरी माह के पहले हफ्ते से शुरू हो कर मार्च माह के पहले हफ्ते तक रहता है. इस वजह से यह अन्ना सेब के लिए अच्छी परागणदाता किस्म जानी जाती है.

अन्ना किस्म की सफल बागबानी में अगर उचित दूरी पर 20 फीसदी पौधे डौर्सेट गोल्डन प्रजाति के लगाए जाएं, जिस से पूरे बाग में उन के द्वारा पैदा परागकण मुहैया हो सकें तो नतीजे अच्छे आते हैं.

एचआरएमएन 99 : इस प्रजाति को हिमाचल प्रदेश के उन्नतशील किसान हरीमान शर्मा ने विकसित किया है. इसे शीतोष्ण, उपोष्ण व गरमी के 40 से 45 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान में भलीभांति किया जा सकता है. इस प्रजाति को ठंड की जरूरत नहीं होती है.

इस प्रजाति के फलों की क्वालिटी बढि़या है. इस को अनेक जलवायु और समुद्र तल से 1,800 फुट पर में भी उगाया जा सकता है. इस प्रजाति को अन्ना व डौर्सेट गोल्डन के मुकाबले कम ठंड की जरूरत होती है.

यह प्रजाति बहुत जल्दी पक कर तैयार होती है. पहाड़ी इलाकों में होने वाली सेब की प्रजातियों को फूल व फल के लिए कम से कम 500 घंटों की इकाइयों की जरूरत होती है, जबकि इस प्रजाति को कम घंटों की ठंडी इकाइयों की जरूरत होती है.

इस प्रजाति के पौधे प्रक्षेत्र रोपण के 3 साल बाद फल देना शुरू कर देते हैं. फूल फरवरी माह के पहले हफ्ते में शुरू होता है, जो तकरीबन एक माह तक चलता है. फल जून में पक जाते हैं. फलों के पकने पर रंग का विकास हलकी पीली सतह के साथ होता है. इस प्रजाति की उपज 3 साल के बाद पौधे 1 क्विंटल फल प्रति पौधा देता है.

फलों की क्वालिटी

* जून माह में गरम मौसम में तैयार होने के चलते फलों में टीएसएस अच्छा पाया गया है. तकरीबन 15 डिगरी ब्रिक्स, जो कि फलों की क्वालिटी का एक द्योतक है. फलों का औसत वजन 200 ग्राम है. पीली सतह पर लाल आभा लिए इस फल की मांग को बढ़ाने वाली वजह है.

* जून माह में इन के ताजा फलों की उपलब्धता इस प्रजाति का सकारात्मक पहलू है क्योंकि उस वक्त बाजार में केवल शीतगृह का एक साल पुराना और कैमिकलों से उपचारित व महंगा सेब ही मिलता है.

* मैदानी इलाकों में सेब के पौधों पर फूल से परिपक्वता के दौरान किसी भी हानिकारक कीट या रोग का प्रकोप नहीं होता है. इस वजह से इन पर किसी कीटनाशक या फफूंदीनाशक का छिड़काव नहीं करना पड़ता. नतीजतन, कीटनाशकों से मुक्त फल मिलता है.

पौध रोपण का समय और तरीका : सर्दियों में पौधशाला से रोपण सामग्री लेने के बाद जल्दी रोपण कर देना चाहिए. रोपण के समय 20 से 25 सैंटीमीटर की गहराई व व्यास का एक छोटा गड्ढा भरे हुए गड्ढे के मध्य में बनाते हैं और पौधे को उस जगह पर सीधा खड़ा रख कर जड़ों को मिट्टी से ढक कर दबा दें और 2 फुट व्यास का थाला बना कर उन में हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए.

पौधा रोपते समय यह ध्यान रखें कि जड़ व सांकुर के जोड़ का स्थान जो कि एक गांठ के रूप में आसानी से दिखाई देता है, कभी भी जमीन में दबने न पाए. यह जोड़ का स्थान भूमि की सतह से कम से कम 10-15 सैंटीमीटर ऊपर रहना चाहिए. रोपने के तुरंत बाद मल्चिंग करने से पौधों की अच्छी बढ़वार होती है और खरपतवार की समस्या नहीं आती है.

पौध रोपण : रोपण के लिए चयनित जगह का बराबर करना जरूरी रहता है क्योंकि ये पौधे जलभराव की स्थिति को सह नहीं सकते हैं. मैदानी इलाकों में सेब की चयनित प्रजातियों को वर्गाकार विधि से 5×5 या 6×6 मीटर की दूरी पर लगाना चाहिए.

पौध रोपण के कम से कम एक माह पहले वांछित जगह पर गड्ढों की खुदाई 2×2×2 फुट कर के 20-25 दिनों के लिए छोड़ देना चाहिए. पौध रोपण के 10 दिन पहले इन गड्ढों में गोबर की सड़ी खाद 15-20 किलो मिला कर इन्हें भर देना चाहिए.

ध्यान रहे कि मिट्टी व खाद मिला कर भरने की सतह से कम से कम 10 सैंटीमीटर ऊपर रहे.

पौधे की बढ़वार : नए रोपित पौधों में नई पत्तियां तापमान में बढ़ोतरी के साथ फरवरी माह के पहले हफ्ते में आना शुरू हो जाता है और उन की बढ़वार तेजी से होती है. कभीकभी रोपण के तुरंत बाद नई पत्तियों के साथ पुष्प कलिकाएं भी आ जाती हैं, लेकिन इन से फल की बढ़वार नहीं हो पाती है.

फरवरी माह से यह वानस्पतिक बढ़वार सितंबर तक चलती है. अक्तूबर माह से पौधों में सुषुप्तावस्था के लक्षण आने लगते हैं और बढ़वार रुक जाती है. नवंबर से जनवरी माह तक पौधों की तकरीबन 60 फीसदी पत्तियां गिर जाती हैं.

पत्तियों के गिरने पर बागबान भाइयों को चिंता नहीं करनी चाहिए. यह इन पौधों की शीत ऋतु के समय न्यूनतम तापमान को सहने व अगले मौसम में फूल लाने के लिए एक स्वाभाविक प्रक्रिया है.

प्रक्षेत्र में पौधों की रोपित आयु एक साल होने के बाद उन की ऊंचाई तकरीबन 4 फुट और छत्रक फैलाव तकरीबन 2.5 फुट हो जाता है. इन पौधों में फरवरी में पुष्पकलिकाएं बनती हैं जिन पर फलों की बढ़वार होती है.

फरवरी में यदि पुष्पन के समय तेज आंधीतूफान या बारिश होती है, तो फलन पर बुरा असर पड़ता है. ये फल जून माह में उपयोग के लिए तैयार हो जाते हैं. पहले साल में प्रति पौधा 4-5 फल ही हासिल होते हैं. दूसरे साल में पौधे के छत्रक कैनोपी विकास के साथ इन की तादाद 50 और तीसरे साल में 300 हो जाती है.

फलों को पक्षियों से होता नुकसान

उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में सेब की फसल जून माह में तैयार हो जाती है. इस दौरान दूसरी कोई फसल तैयार न होने के चलते पक्षियों के आकर्षण का केंद्र यह फल रहता है. किसी भी फल पर पक्षियों का हमला उस फल की क्वालिटी का द्योतक होता है.

इस समस्या से बचाव के लिए मई माह से बांस की संरचना प्लास्टिक की जाली द्वारा फलों से लदे पेड़ों को ढका जा सकता है.

पक्षियों को उड़ाने के लिए मजदूर रखना महंगा होता है इसलिए प्लास्टिक की जाली से पेड़ों को ढकना एक अच्छा विकल्प है. कई दूसरे फलों में भी यह प्रयोग किया जाता है. एक बार खरीदी गई यह जाली कई सालों तक इस्तेमाल में आ सकती है.

सेब में ऐसे करें रोगों पर नियंत्रण

पामा या स्कैब : शुरू में पत्तियों पर अनिश्चित परिधि वाले सूक्ष्म 3 से 6 मिलीमीटर व्यास के हलके से जैतूनी हरे धब्बे बनते हैं. बढ़ती अवस्था के साथ इन का रंग गहरा होता जाता है और अंत में ऊपरी सतह पर ये काले रंग के हो जाते हैं. उग्र संक्रमण होने पर पत्तियां कुंचित बैनी यानी सिकुड़ी हुई और बेआकार की हो जाती हैं. फलों पर भी हलके जैतूनी धब्बे बनते हैं जो बाद में गहरे भूरे, फिर काले हो जाते हैं. पुराने धब्बे में उन के किनारों पर त्वचा एक वलय के आकार में ऊपर उठ जाती है. शुरुआती अवस्था में ही भारी संक्रमण होने पर फल की पूरी सतह कार्क के समान हो जाती है और उस में गहरी दरारें पड़ जाती हैं.

रोकथाम : कवकनाशी रसायन जैसे कैप्टान 0.2 से 0.3 फीसदी, डोडीन 0.15 फीसदी या डोडीन+ ग्लोयोडीन 0.15 फीसदी +0.75 फीसदी या पोलीरान 0.15 फीसदी का कली खिलने पर या 7 से 10 दिन के अंतर पर 6 से 7 बार छिड़काव करें.

चूर्णिल आसिता :  पत्तियों पर वसंत मौसम में कवकजाल के छोटे धूसर या सफेद धब्बे दिखलाई पड़ते हैं. पत्तियों की निचली सतह पर धब्बे बनते हैं जिस से वे सिकुड़ कर मुड़ जाती हैं. पत्तियों से संक्रमण नई टहनियों पर फैलता है जिन पर पत्तियों के ही समान कवक बनते हैं. नए फलों पर संक्रमण होने से वे छोटे रह जाते हैं जबकि बाद की अवस्थाओं में संक्रमित फलों पर रुक्ष शल्क के लक्षण दिखलाई पड़ते हैं.

रोकथाम : बेनोमिल अथवा थायाबेंडेजोल के 0.1 फीसदी घोल से मृदा मज्जन अथवा कली निकलने के समय से जुलाई के पूर्वार्द्ध तक 10 से 14 दिनों के अंतर पर छिड़काव करें. बेनोमिल के छिड़काव से रोग नियंत्रण के साथसाथ पेड़ की वानस्पतिक बढ़वार पर भी अच्छा असर पड़ता है. कली निकलने के पहले 1:50 सांद्रता वाले गंधक चूना मिश्रण का छिड़काव भी रोग नियंत्रण में फायदेमंद है.

फाइटोफ्थेरा स्तंभ कैंकर : यह तने का रोग है जो 4-5 साल पुराने पेड़ों पर नीचे की शाखाओं पर पाया जाता है. छाल के मर जाने के चलते रोगग्रस्त इलाकों में नया रिसाव होता है जिस से छाल भलेठमी हो जाते हैं. कैंकर अंडाकार, पर कभीकभी अनियमित आकार के भी हो सकते हैं. संक्रमण के 1 से 2 साल के भीतर ही तना गल जाने के चलते पूरा पेड़ मर जाता है. कभीकभी फल विगलन रोग भी देखा जाता है.

रोकथाम : रोग प्रतिरोधी किस्मों के मूलवृंत्तों का इस्तेमाल करें. बाग से ढालों पर मेंड़ बनाएं ताकि बारिश का पानी रोगी से स्वस्थ पेड़ों में बह कर न जा सके.

Snacks : आगरा के भल्ले (Bhalle) कुरकुरे व टैस्टी

Snacks : आलू की टिक्की को उत्तर भारत में सब से ज्यादा पसंद किया जाता है. इसे कई अलगअलग नाम और तरह से चाट के तौर पर तैयार भी किया जाता है. दिल्ली और आगरा में इसे ‘आलू भल्ला’ (Bhalle) के नाम से जाना जाता है. आगरा, दिल्ली के हर बाजार, चाट की दुकानों में देशी घी से तैयार भल्ले खाने को मिलते हैं. आगरा के आलू भल्ले को दूसरे शहरों में आलू की टिक्की कहते हैं.

उत्तर प्रदेश में आगरा पर्यटकों के लिए सब से ज्यादा घूमने वाला शहर समझा जाता है. यहां आने वाला हर पर्यटक शाम को भल्ले जरूर खाना पसंद करता है. भल्ले भले ही आलू की टिक्की के रूप में दूसरे शहरों में मिलते हों, पर ‘आगरा के भल्ले’ अलग ही स्वाद देते हैं. कुछ चाट दुकानदार भल्ले के साथ काबुली चने और चटनी का इस्तेमाल भी करते हैं.

आगरा में शाम के समय हर सड़क पर ऐसी चाट की दुकानें मिल जाती हैं. सदर बाजार, आगरा में चाट की दुकानों पर भल्ले खाने वालों की लाइन लगी होती है. इस के अलावा फतेहाबाद रोड और ताजमहल के आसपास सड़कों पर स्ट्रीट फूड के रूप में भल्ले सभी जगह मिलते हैं. बड़े होटल और रैस्टोरैंट में भी भल्ले खाने को मिलते हैं. चटपटी चाट के रूप में भल्ले की दुकान लगाना रोजगार का बड़ा साधन हो गया है. यहां दुकान चलाने वाले लोग बताते हैं कि वैसे तो भल्ले आलू टिक्की की ही तरह होते हैं, पर आगरा में इन का स्वाद और भी ज्यादा टेस्टी हो जाता है. इस की वजह पश्चिम उत्तर प्रदेश में पैदा होने वाले आलू को माना जाता है. इस का स्वाद बाकी देश से अलग होता है.

आगरा की रहने वाली अर्चना श्रीवास्तव कहती हैं, ‘‘आगरा घूमने वाले पर्यटक ताजमहल देखने के साथ यहां के भल्ले जरूर खाना पसंद करते हैं. इस का स्वाद खाने वालों को बहुत भाता है. यही वजह है कि भल्ले की दुकानें आप को हर जगह मिल जाती हैं. आलू किसानों को भी आज एक नई पहचान मिल रही है. पश्चिम उत्तर प्रदेश का यह इलाका आलू की खेती के साथ देशी घी के लिए काफी जाना जाता है. देशी घी में तले हुए भल्ले का स्वाद बहुत अच्छा लगता है.’’

आवश्यक सामग्री: आलू 300 ग्राम उबले छिले हुए, हरी मटर के दाने 1 कप दरदरे पिसे हुए, तेल टिक्की सेंकने के लिए, गरम मसाला छोटी चम्मच, नमक स्वादानुसार, अमचूर पाउडर छोटी चम्मच, लाल मिर्च पाउडर छोटी चम्मच, धनिया पाउडर आधा छोटी चम्मच, अरारोट 2 चम्मच, दही, हरी चटनी, मीठी चटनी, चाट मसाला.

बनाने की विधि: आलू को कद्दूकस कर लें. इस में 2 छोटी चम्मच अरारोट डाल कर अच्छी तरह से मिलाते हुए एकदम गुंथे आटे जैसा तैयार कर लें. आलू के साथ मिक्स करने के लिए मटर में गरम मसाला, स्वादानुसार नमक, अमचूर, लाल मिर्च पाउडर और धनिया पाउडर डाल कर सारी चीजों को अच्छी तरह से मिला लीजिए. जितना बड़े भल्ले बनाना है, उतना बड़े गुंथे आलू से निकाल कर गोले बना लीजिए. इसी पिसी मटर को भी तैयार कर लीजिए. एक गोला उठाइए और इस के बीच में जगह बना कर एक भाग मटर इस में भर दीजिए. चारों तरफ से आलू ले कर मटर को बंद कर दीजिए.

तवा गरम कर के उस पर एक टेबल स्पून तेल डाल कर चारों ओर फैला दीजिए. एकएक कर के तवे पर जितनी टिक्की आ जाए, सिंकने के लिए लगा कर रख दीजिए. धीमी आग पर आलू टिक्की सेंकिए. टिक्कियों को उलटपलट कर दोनों ओर से ब्राउन होने तक सेंकें. टिक्कियां सिंकने के बाद और कुरकुरा करने के लिए इन्हें तवे के किनारे लगा कर रख दीजिए. बाकी टिक्कियां भी इसी तरह सेंक लें. लीजिए, आलू भल्ले तैयार हैं.

आलू भल्ले को खाने के लिए देने से पहले टिक्की को तवे पर बीच में ला कर दबा कर और कुरकुरा कर लीजिए. एक या 2 टिक्की प्लेट में निकाल कर रखिए. टिक्की के ऊपर दही, हरी चटनी, मीठी चटनी डालिए और ऊपर से चाट मसाला भी डालिए. गरमागरम आलू भल्ला परोसिए. कई जगहों पर इसे हरेभरे पत्तों से बने दोने में दिया जाता है, तो कई जगह पर मिट्टी के कुल्हड़ में भल्ले खाने को दिए जाते हैं. प्रयोग के तौर पर इस में ऊपर से महीन सेव भी डाल दी जाती है.

Paddy : सही समय पर करें काम अच्छा पैदा हो धान

Paddy : सही तकनीक का इस्तेमाल कर के किसान न केवल इस तरह की समस्याओं से बच सकते हैं, बल्कि ज्यादा उपज भी ले सकते हैं.

यहां हम बासमती धान की खेती कलैंडर पर रोशनी डाल रहे हैं, ताकि किसान अपने कामों को समय पर अंजाम दें और अच्छी उपज पाएं.

1 से 15 जून

बीज भरोसेमंद जगह से ही खरीदें. बीजोपचार जरूर करें. 5 किलो बीज के लिए 5 ग्राम एमीसान व एक ग्राम स्ट्रैप्टोसायक्लीन का 10 लिटर पानी में घोल बनाएं. 24 घंटे तक बीज को उस में डुबोएं. टब एल्यूमिनियम का न हो. थोड़ा बीज का नमूना और थैला सुरक्षित रखें.

16 से 30 जून

अगर पौध पीली पड़ती दिखाई दे तो 3 फीसदी फेरस सल्फेट का छिड़काव करें. पौध उखाड़ने के एक हफ्ते पहले एक बार किसी फफूंदीनाशक का छिड़काव करें. पौधशाला में सिंचाई शाम के समय में करें.

1 से 15 जुलाई

जिन किसानों की धान की पौध 20-25 दिन की हो गई हो, वे सिंचाई करें और सावधानी से पौध उखाड़ कर उस की रोपाई करें. रोपाई के समय 4-5 सैंटीमीटर से ज्यादा पानी न रखें. एक वर्गमीटर में 25-30 पौधे लगाएं. रोपाई 15 जुलाई से पहले खत्म कर लें. पूसा बासमती-1509 की रोपाई 15 जुलाई के बाद ही करें.

16 से 31 जुलाई

सिंचाई व खरपतवार का ध्यान रखें. नाइट्रोजन की पहली खुराक का बुरकाव करें. जहां पौध मर गए हैं, वहां नई पौध लगा दें. खेत की मेंड़ को साफ रखें. अच्छा रहेगा कि फफूंदीनाशक का छिड़काव मेंड़ पर भी कर दें.

1 से 15 अगस्त

इस समय धान की फसल पर तना छेदक, पत्ती मोड़क, हरा तेला, सफेद पीठ वाला तेला कीट का हमला हो सकता है इसलिए किसान खेत की लगातार जांच करें. फैरोमौन प्रपंच यानी ट्रैप फसल के बीचोंबीच लगा सकते हैं ताकि पीला तना छेदक नर पतंगे खत्म हो जाएं. कीटों के पाए जाने पर ट्राइकोग्रामा कार्ड 1-3 प्रति एकड़ की दर से लगा सकते हैं. दवा का छिड़काव तभी करें, जब उन की तादाद ज्यादा हो.

16 से 31 अगस्त

खरपतवार की समय से पहले रोकथाम करें और नाइट्रोजन की बाकी बची मात्रा डालें. मेंड़ को साफ रखें व एक बार फिर किसी फफूंदीनाशक का छिड़काव करें.

इस दौरान धान में पत्ती लपेटक कीट का हमला देखा जाता है. अगर हमला ज्यादा हो तो कार्बोफ्यूरान 3जी/6 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से बुरकाव करें.

1 से 30 सितंबर

धान में पत्ती लपेटक कीट की जांच करें. इस समय धान की फसल को चौपट करने वाले ब्राउन प्लांट होपर यानी भूरा फुदका का हमला शुरू हो सकता है.

किसान खेत के अंदर जा कर पौधों के तनों के निचले भाग पर मच्छर जैसे कीट की जांच करें.

धान में ब्लास्टर यानी बदरा बीमारी का हमला होने की निगरानी भी हर 2-3 दिन के अंतर पर करें. शुरू में पत्तियों पर सूई की नोक के बराबर गोल तांबे के रंग के धब्बे बनना इस बीमारी की निशानी है. 2-3 दिन के अंदर ये धब्बे लंबाई में बढ़ कर आंख के आकार के हो जाते हैं.

अगर इस कीट की समय पर रोकथाम न की जाए तो बाली के नीचे के हिस्से पर इस का असर पड़ता है. इसे आम भाषा में गरदन तोड़ कहते हैं.

इस की रोकथाम के लिए बाविस्टीन 2 ग्राम प्रति लिटर की दर से 3 बार छिड़काव करें. पहली बार रोपाई के 30-40 दिन बाद, दूसरा छिड़काव पहले छिड़काव से 20-25 दिन बाद और तीसरा, दूसरे छिड़काव से 20-25 दिन बाद करने से बीमारियों की रोकथाम की जा सकेगी. जैसे ही बीमारी का लक्षण दिखाई दे, तुरंत छिड़काव करें.

इस समय धान में आभासी कंड यानी हलदी बीमारी आने की काफी संभावना है. इस बीमारी के आने से धान के दाने फूल जाते हैं और पीले रंग के हो जाते हैं. इस की रोकथाम के लिए ब्लाइटौक्स-50 की 500 ग्राम प्रति हेक्टेयर मात्रा को पानी में मिला कर 10 दिन के अंतर पर 2 बार बालियां आने से पहले छिड़काव करें. खेत में पानी जमा न होने दें.

इसी समय ब्राउन प्लांट होपर यानी भूरा फुदका का हमला शुरू हो सकता है. किसान खेत की नियमित निगरानी करते रहें और कीटों की ज्यादा तादाद होने पर मोनोक्रोटोफास 2 एमएल प्रति लिटर पानी की दर से जहां कीट हो, वहां छिड़काव करें.

1 से 30 अक्तूबर

दाना पकने पर खेत में दूसरी किस्मों के पौधे दिखाई दें तो उन्हें निकाल दें. अगर फसल में दूसरी जाति के दाने होते हैं तो भाव कम कर दिया जाता है.

पछेते धान में इस मौसम में एक सिंचाई जरूर करें. मौसम को ध्यान में रखते हुए किसानों को यह सलाह है कि धान की पकने वाली फसल को कटाई से 2 हफ्ते पहले सिंचाई लगाना बंद कर दें. फसल कटाई के बाद फसल को 2-3 दिन खेत में सुखा कर गहाई कर लें. उस के बाद दानों को अच्छी तरह से सुखा कर ही मंडी ले जाएं या स्टोर करें.

Trolley : छोटी ट्रौली से करें काम, बोझ ढोना हुआ आसान

Trolley : कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भी भागीदारी अहम है. पशुपालन में भी महिलाओं की तकरीबन 70 फीसदी भागीदारी है. महिलाओं द्वारा पशुओं के लिए चारा काटना और उसे लाना, दूध दुहना, गोबर डालना व उस के उपले बनाना और पशुओं की देखरेख करना ये सभी काम शामिल हैं.

ये सभी काम मेहनत वाले हैं जिन से थकावट होती है इसलिए अब कृषि में अनेक प्रयोग होने लगे हैं जो खेती से जुड़े कामों को आसान बना रहे हैं.

इसी दिशा में चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार के ‘पारिवारिक संसाधन प्रबंधन विभाग’ द्वारा एक बहुद्देशीय ट्रौली को बनाया गया है जिस पर सामान लादना व ढोना आसान है. इस ट्रौली से किसी भी सामान को एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है जैसे गोबर, ईंधन, पानी वगैरह. इस ट्रौली को हाथों से धक्का दे कर चलाया जाता है. बोझ को सिर पर उठा कर नहीं चलना पड़ता इसलिए इस ट्रौली के इस्तेमाल में आराम रहता है.

यह ट्रौली खेतिहर महिलाओं के लिए काफी आरामदायक है. इस ट्रौली को लोहे की चादर और पाइपों से बनाया गया है जिस में तकरीबन 17-18 किलो वजन होता है. इस की अनुमानित कीमत 2,000 रुपए है.

आप इसे स्थानीय बाजार से भी ले सकते हैं या हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार के ‘पारिवारिक संस्थान प्रबंधन विभाग’ से संपर्क कर सकते हैं.

Aquaponics : खेती का भविष्य है ‘एक्वापौनिक्स’ तकनीक

Aquaponics : हमारे देश की 60 फीसदी आबादी का हिस्सा किसी न किसी रूप से खेती से जुड़ा है. यही वजह है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है. अगर हम इस क्षेत्र में दूर तक नजर दौड़ाएं तो खेती में नवाचार की खासी कमी है. आज भी अनेक किसान पारंपरिक तरीके से खेती कर रहे हैं. खेती में हमें आज बहुतकुछ नए प्रयोग करने की जरूरत है. इन्हें इस्तेमाल कर के अच्छी पैदावार ली जा सकती है.

ऐसी ही एक आधुनिक तकनीक है एक्वापौनिक्स (Aquaponics). इस तकनीक में मछलियां और पौधे आपस में एकदूसरे की मदद करते हैं यानी इस सिस्टम का इस्तेमाल कर मछलियों को सब्जियों के उत्पादन के एक्वाकल्चर और हाइड्रोपौनिक्स (पानी में पौधे उगाना) सिस्टम का एकसाथ इस्तेमाल किया जाता है. इस तकनीक को हम कम जगह में भी अपना सकते हैं. इस में मिट्टी या जमीन की जरूरत नहीं होती है.

Aquaponics

एक्वापौनिक्स (Aquaponics) की शुरुआत शायद एशिया से हुई. यहां के किसानों ने देखा कि ज्यादा बरसात या बाढ़ आने के बाद खेतों में पानी भर जाता है जिस में मछलियां भी होती हैं. उन खेतों में उगाई गई धान की फसलों से अच्छी पैदावार मिलती है. मछलियों से निकलने वाली गंदगी धान या दूसरी फसल के लिए पोषक तत्त्वों का काम करती है.

अगर आसान तरीके से बताया जाए तो जिस पानी का इस्तेमाल इस तकनीक में किया जाता है उस पानी में मछली छोड़ दी जाती हैं, जो उस पानी में रह कर अपना मल वगैरह छोड़ती हैं, वही पानी पौधों के लिए जैविक उर्वरक का काम करता है. इस के उलट हाइड्रोपौनिक्स सिस्टम में हमें पानी में जैविक उर्वरक के रूप में कुछ रसायन डालने होते हैं.

Aquaponics

इसी तकनीक को आज विकसित कर एक्वापौनिक्स (Aquaponics) सिस्टम का नाम दिया है. पारंपरिक खेती, एक्वाकल्चर या हाइड्रोपौनिक्स की तुलना में एक्वापौनिक्स (Aquaponics) तकनीक के कई फायदे हैं.

इस तकनीक में पौधे पानी से अमोनिया और नाइट्रोजन लेते हैं जिस से मछलियां शुद्ध और आक्सिजनयुक्त बेहतर माहौल में पलतीबढ़ती हैं.

माहिरों का मानना है कि जमीन में खेती करने की तुलना में एक्वापौनिक्स (Aquaponics) सिस्टम के तहत सलाद और सब्जियां, जिस में टमाटर, बैगन, शलगम वगैरह पैदा की जा सकती हैं. इस तरह के पौधों में पानी की बहुत ही कम जरूरत होती है. साथ ही, इस सिस्टम के लिए ऊर्जा भी कम लगती है.

Aquaponicsआने वाले समय में इस तकनीक को इस्तेमाल किया जाएगा तो इस से मछलियों के साथसाथ रसायनमुक्त सब्जियां भी मिलेंगी.

दुनियाभर में प्राकृतिक रूप से मछलियों का उत्पादन घटा है और अब माहिर भी मछली उत्पादन के लिए नए समाधान तलाश रहे हैं. फार्म में मछलीपालन करने वालों के लिए भी एक्वापौनिक्स (Aquaponics) सिस्टम बेहतर विकल्प साबित हो सकता है.

इस बारे में हमारी बात अनुभव दास से हुई. वे एक्वापौनिक्स (Aquaponics) के क्षेत्र में काम कर रही कंपनी ‘रैड ओटर फार्म्स’ के संस्थापक हैं. उन का कहना है कि पैदावार के मामले में हम दुनियाभर में कुछ उत्पादों में ऊंचाई पर हो सकते हैं, लेकिन हमारी फसल पैदावार प्रति हेक्टेयर के हिसाब से कम है. पिछले 5 सालों में हमारे कृषि उत्पादन की वृद्धि दर 0.2 फीसदी से 4.2 फीसदी के आसपास रही है.

टमाटर का उदाहरण लें. साल 2017 में भारत चीन के बाद दुनिया में सब से ज्यादा टमाटर पैदा करने वाला देश था. चीन ने तकरीबन 110,000 हेक्टेयर जमीन पर 56.8 मिलियन टन टमाटर का उत्पादन किया, वहीं भारत ने तकरीबन 10 फीसदी कम जमीन पर 18.7 मिलियन टन का उत्पादन किया. टमाटर की यह प्रति हेक्टेयर उत्पादकता अतुलनीय है.

उन्होंने आगे बताया कि आज बड़े पैमाने पर सरकार द्वारा खेती से जुड़े कामों के लिए मदद भी की जाती है. इस के बाद भी भारत का कृषि उत्पादन कमजोर है. तो क्या आने वाले कृषि उत्पादन बढ़ती आबादी की मांगों को पूरा करेगा  क्या हमारे खेत की पैदावार और उस की क्वालिटी बेहतर होगी जो स्वस्थ जीवन के लिए जरूरी है? क्या खेती कभी मौडर्न होगी? वगैरह.

इस पर अनुभव दास ने कहा कि आने वाले कल को बेहतर बना सकें, इस के लिए हमें कृषि क्षेत्र की मौडर्न तकनीकों की तरफ जाना होगा. बदलाव बहुत जरूरी है. एक बेहतर राष्ट्र के लिए खेती के विकास पर ध्यान देना ही होगा. दिनोंदिन हमारी खेत की जोत घट रही है जबकि आबादी बढ़ रही है. हमारे 65 फीसदी खेत फसल विकास के लिए मानूसन पर निर्भर हैं. इसलिए अगर हम प्रकृति के भरोसे रहे तो हम प्रगति की राह नहीं चल सकते. सामाजिक नवाचारकों के रूप में हम एक बदलाव लाना चाहते थे. हमें कृषि के क्षेत्र में एक अलग और नई सोच पैदा करने की जरूरत है. मानसून के भरोसे रह कर खेती नहीं की जा सकती. इस के अलावा हमें रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल को भी कम करने की जरूरत है.

Aquaponics

हमारा मानना है कि एक्वापौनिक्स (Aquaponics) हमें यह यह मौका देता है. इसे हमें अपनाना चाहिए. एक्वापौनिक्स चक्र पारंपरिक मिट्टी आधारित कृषि की तुलना में 90 फीसदी से ज्यादा बढ़ने वाली फसलों के लिए पानी की जरूरत को कम करता है.

एक्वापौनिक्स (Aquaponics) तकनीक खेती की जमीन पर निर्भर नहीं है. यह बिना मिट्टी के होने वाली इस तकनीक को दुर्गम इलाकों, यहां तक कि शहरी जगहों में ले जाया जा सकता है. इस से बड़ी मात्रा में पानी की बचत होती है और खेती की पैदावार रासायनिक मुक्त होती है. पारंपरिक खेती के मुकाबले पैदावार भी 10-12 गुना ज्यादा है और क्वालिटी बेहतर है. एक लाइन में अगर कहा जाए तो एक्वापौनिक्स जिम्मेदार और टिकाऊ कृषि प्रणाली है और आने वाले समय में यह खेती का भविष्य है.

इंटरनैशनल लैवल पर एक्वापौनिक्स (Aquaponics) ने खेती के विकल्प के रूप में अच्छा कदम बढ़ाया है. खासतौर पर संयुक्त राज्य अमेरिका और आस्ट्रेलिया में. भारत में एक्वापौनिक्स (Aquaponics) अभी शुरुआती दौर में है. लेकिन अगर हम मिल कर कदम बढ़ाएंगे तो आने वाले समय में एक्वापौनिक्स (Aquaponics) एक प्रभावी तकनीक साबित होगी और अपनेआप में कृषि क्षेत्र में एक लीडर का काम करेगी.

Brinjal : बैगन की नई किस्में उगाइए

Brinjal : भारतीय बागबानी अनुसंधान संस्थान, बेंगलुरु के वैज्ञानिकों ने बैगन की 3 नई किस्में ईजाद की हैं, अर्का अवनाश, अर्का हर्षित और अर्का उन्नति.

अर्का अविनाश : इस किस्म के पौधे लंबे और फैलाव लिए होते हैं. इस की पत्तियां गहरे हरे रंग की होती हैं. इस के फल हरे, कोमल और अधिक भंडारण क्षमता वाले होते हैं. पकने की क्वालिटी भी उत्तम पाई गई है. यह जीवाणु उकटा की प्रतिरोधी किस्म है. यह किस्म प्रति हेक्टेयर 30 टन तक उपज दे देती है.

अर्का हर्षित : इस किस्म के पौधे लंबे और फैले हुए होते हैं. इस किस्म की पत्तियां गहरे हरे रंग की होती हैं. यह किस्म प्रति हेक्टेयर 40 टन तक उपज दे देती है.

अर्का उन्नति : इस किस्म के पौधे लंबे व उठे हुए होते हैं. पत्तियां गहरी हरी और हरे कैलिक्स वाले फल होते हैं जो गुच्छों में लगते हैं. फल कोमल और उन की भंडारण क्षमता ज्यादा होती है.

यह किस्म जीवाणु उकटा की प्रतिरोधी है. इस किस्म की एक खूबी यह भी है कि इसे खरीफ और रबी दोनों मौसमों में उगाया जा सकता है. यह किस्म प्रति हेक्टेयर 40 टन तक उपज दे देती है.

जलवायु : बैगन उष्णकटिबंधीय जलवायु वाला पौधा है. इसे गरम मौसम की जरूरत होती है. पौधों की अच्छी बढ़वार और विकास के लिए 20-30 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान की जरूरत होती है.

अगर मौसम लंबी अवधि तक ठंडा रहे तो पौधों की बढ़वार पर बुरा असर पड़ता है. थोड़े पाले से भी इसे ज्यादा नुकसान हो जाता है.

भूमि : बैगन को वैसे तो तमाम तरह की जमीनों में उगाया जा सकता है, पर सही जल निकास वाली दोमट मिट्टी, जिस का पीएच मान 5.5-6.0 हो, अच्छी मानी गई है.

जमीन की तैयारी : पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें. उस के बाद 2-3 जुताइयां कल्टीवेटर या हैरो से आरपार कर के कुछ सप्ताह तक खूली धूप में छोड़ दें. रोपाई करने से पहले खेत में सिंचाई के लिए सुविधानुसार क्यारियां बना लें.

खाद और उर्वरक: बैगन की फसल लंबी अवधि वाली होती है. उच्च उर्वरता वाली जमीनों में यह ज्यादा उपज देने वाली फसल है. इस की उच्च गुणवत्ता वाली ज्यादा उपज लेने के लिए इस की मिट्टी जांच कराना बहुत जरूरी है. अगर किसी कारणवश मिट्टी जांच न हो सके तो उस स्थिति में प्रति हेक्टेयर निम्न मात्रा में खाद व उर्वरक जरूर डालें:

गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद 250-300 क्विंटल, नाइट्रोजन 100 किलोग्राम, फास्फोरस 60 किलोग्राम, पोटाश 40 किलोग्राम.

गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद को पहली जुताई से पहले खेत में समान रूप से बिखेर देना चाहिए. नाइट्रोजन की आधी मात्रा, फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा का मिश्रण बना कर आखिरी जुताई के समय डालना चाहिए. नाइट्रोजन की बाकी बची आधी मात्रा को 2 बराबर हिस्सों में बांट कर एक भाग रोपाई के 30 दिन बाद और दूसरा भाग रोपाई के 45 दिन बाद टौप ड्रैसिंग के दौरान देना चाहिए.

पौध रोपाई

बीज द्वारा पहले बैगन की पौध तैयार की जाती है, फिर पौध तैयार होने पर उसे खेत में रोपा जाता है. बैगन की बोआई के 3 प्रमुख मौसम हैं:

शरद शिशिर : इस मौसम में पौधशाला में बीज जून माह के अंत से जुलाई माह के मध्य तक बोए जाते हैं और रोपाई जुलाई माह में की जाती है.

वसंतग्रीष्म : इस के लिए पौधशाला में बीज अक्तूबरनवंबर माह में बोए जाते हैं और रोपाई जनवरीफरवरी माह में की जाती है.

बीज की मात्रा : एक हेक्टेयर के लिए 400-500 ग्राम बीज पर्याप्त हैं.

बीजों को पौधशाला में बोने से पहले 2.5 ग्राम थाइरम या सेरेसान जीएन प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिए. ग्रीष्म व वर्षा ऋतु में पौधा महज 4 हफ्ते में रोपने लायक हो जाता है.

पौधों की रोपाई : पौधशाला से पौधा निकालने के 2-3 दिन पहले हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए ताकि पौधों को सुगमता से बिना जड़ों के नुकसान पहुंचाए उखाड़ा जा सके. लंबे बैगन की किस्मों को पंक्तियों व पौधों की दूरी क्रमश: 60 सैंटीमीटर × 60 सैंटीमीटर और गोल बैगन की किस्मों में क्रमश: 75 सैंटीमीटर × 60 सैंटीमीटर रखें. पौधों की रोपाई के तुरंत बाद हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए ताकि पौधे सुगमता से जम सकें.

सिंचाई और जल निकास

बैगन में सिंचाई कई बातों पर निर्भर करती है. इन में जमीन, फसल उगाने का समय और वातावरण प्रमुख हैं. जांच से पता चला है कि बैगन की ज्यादा उपज लेने के लिए 100-110 सैंटीमीटर पानी की जरूरत होती है. बहुत ज्यादा या कम सिंचाई करने से बैगन की फसल खराब हो सकती है.

आमतौर पर गरमियों में प्रति सप्ताह और सर्दियों में 15 दिन के अंतर पर सिंचाई करना सही रहता है, जबकि खरीफ फसल में सिंचाई की जरूरत नहीं होती है, पर काफी लंबी अवधि तक बारिश न हो तो जरूरत के मुताबिक सिंचाई करें.

कभीकभी बारिश के मौसम में ज्यादा बारिश होने से पानी खेत में जमा हो जाता है. अगर ऐसी स्थिति पैदा हो जाए तो  फालतू पानी को तुरंत ही निकालने का बंदोबस्त करना चाहिए वरना पौधे पीले पड़ कर मर जाते हैं.

फसल सुरक्षा

खरपतवार नियंत्रण : बैगन के पौधों की बढ़वार धीमी गति से होती है इसलिए वे खरपतवारों के साथ होड़ नहीं कर पाते हैं इसलिए पौधों की शुरुआती बढ़वार के समय हलकी निराईगड़ाई करनी चाहिए. पूरी फसल में 3-4 निराईगुड़ाई करना काफी होता है.

खरपतवार की सही रोकथाम करने के लिए खरपतवारनाशकों का इस्तेमाल भी किया जा सकता है. फ्लोक्लोरलिन की 1.0-1.5 किलो सक्रिय अवयव प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें. इस के बाद एक बार हाथ से निराईगुड़ाई करें, जब फसल 30 दिन की हो जाए.

कीट नियंत्रण

एपीलेकना बीटिल : यह कीट पौधशाला से नुकसान पहुंचाना शुरू कर देता है. इस कीट का शिशु छोटा व लाल रंग का होता है. इस से पहले पीले रंग का होता है. यह कीट पत्तियों को खा कर छलनी जैसा बना देता है.

रोकथाम : हाथ से अंडों, सूंडि़यों व प्रौढों को इकट्ठा कर नष्ट कर देना चाहिए. कार्बोरिल या मैलाथियान के 0.1 फीसदी घोल का पर्णीय छिड़काव करना चाहिए. कीटरोधक किस्में जैसे अर्का शिरीष, हिसार चयन 14, संकर विजय नामक किस्में उगानी चाहिए.

शाखा व फल छेदक : इस कीट की सूंड़ी चिकनी व गुलाबी रंग की होती है जो बालरहित होती है. इस की पीठ पर बैगनी रंग की धारियां होती हैं. इस की सूंडि़यां नई शाखाओं में घुस जाती हैं जिस की वजह से शाखाएं मुरझा जाती हैं. बाद में ये सूंडि़यां फल में छेद कर के घुस जाती हैं.

रोकथाम : कीट लगी शाखाओं और फलों को तोड़ कर नष्ट कर दें. मैटासिस्टौक्स 2 मिलीलिटर दवा प्रति लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें. 4-5 साल का फसल चक्र अपनाएं.

तना छेदक : इस कीट की सूंड़ी तने में घुस कर फसल को नुकसान पहुंचाती है और तना नीचे की ओर झुक जाता है.

रोकथाम : कीट लगी शाखाओं और फलों को तोड़ कर नष्ट कर दें. मैटासिस्टौक्स 2 मिलीलिटर दवा प्रति लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें. 4-5 साल का फसल चक्र अपनाएं.

इस के अलावा हरा तेला एक छोटा कीट होता है जो पत्तियों के निचले भाग में पाया जाता है. यह पत्तियों का रस चूसता है. इस के चलते पत्तियां मुड़ जाती हैं और आखिर में मुरझा जाती हैं और भूरे रंग की हो जाती हैं. इस की रोकथाम में कीट लगे पौधों को नष्ट करे दें.

आर्द्र विगलन : यह एक फफूंदीजनित रोग है. यह रोग पौधशाला में लगता है. जिन पौधों में यह रोग लगता है, वे भूस्तर से सड़ने लगते हैं. पौधशाला में पौधों का मुरझाना और सूख जाना इस रोग का प्रमुख लक्षण है.

रोकथाम : पौधशाला में बीज बोने से 10-15 दिन पहले कैप्टान या थाइरम की 2 ग्राम दवा प्रति लिटर पानी में घोल कर पर्णीय छिड़काव करना चाहिए.

बीज बोने से पहले कैप्टान या थाइरम की 2 ग्राम दवा प्रति लिटर पानी में घोल कर उपचारित करना चाहिए. बीज बोने से पहले 50 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान के गरम पानी से 30 मिनट तक उपचारित करना चाहिए.

रोगी पौधों पर रोग के लक्षण दिखाई देते ही उन्हें उखाड़ देना चाहिए. 3-4 साल का फसल चक्र अपनाना चाहिए.

फोमोप्सिस झुलसा : यह एक फफूंदीजनित रोग है. रोगी पत्तियों पर छोटेछोटे गोल भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं. अनियमित आकार के धब्बे पत्तियों के किनारे दिखाई देते हैं. फलों के धब्बों में धूल के कणों के समान भूरी रचना साफ दिखाई देती है. इस रोग का प्रकोप पौधशाला के पौधों पर भी होता है, जिस के चलते पौधे झुलस जाते हैं.

रोकथाम : सेहतमंद बीज ही बोएं. बीज बोने से पहले कैप्टान या थाइरम से उपचारित कर लें. पौधशाला में कैप्टान के 0.2 फीसदी घोल का प्रति सप्ताह पर्णीय छिड़काव करें. रोपाई के बाद 0.2 फीसदी जिनेब या मैनेब का छिड़काव करें.

पत्तियों के धब्बे : यह रोग 4 प्रकार की फफूंदियों द्वारा फैलता है जैसे आल्टरनेरिया मेलांजनि, आल्टरनेरिया सोलेनाई, स्कोस्पोरा-सोलेनाई मेलांजनि और सरकोस्पोरा मेलांजनि.

आल्टरनेरिया की दोनों प्रजातियों के कारण पत्तियों पर अनियमित आकार के भूरे धब्बे बन जाते हैं. इस वजह से पत्तियां पीली पड़ कर मर जाती हैं और आखिर में गिर जाती हैं. इस के अलावा रोगी पत्तियां भी गिर जाती हैं और पौधों पर फल कम लगते हैं.

रोकथाम : रोगी पत्तियों को तोड़ कर जला देना चाहिए. खेत को खरपतवार से मुक्त रखना चाहिए. ब्लाइटौक्स के 0.2 फीसदी घोल का 7-8 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें.

फलों की तोड़ाई: जब फल पूरी तरह से पक जाएं, कोमल हों और उन में रंग आ जाए तब उन्हें तोड़ लेना चाहिए क्योंकि फलों को देरी से तोड़ने पर वे कठोर हो जाते हैं और उन में बीज पक जाते हैं व फलों का रंग फीका पड़ जाता है. इस वजह से फल सब्जी बनाने के लिए अनुपयुक्त हो जाते हैं. आमतौर पर फल लगने के तकरीबन 8-10 दिन बाद फल तोड़ने लायक हो जाते हैं.

उपज : बैगन की उपज कई बातों पर निर्भर करती है, जिन में जमीन की किस्म, उगाई जाने वाली किस्म, फसल की देखभाल प्रमुख हैं. अगर बैगन की किस्मों को सही तरीके से बोया जाए तो प्रति हेक्टेयर 40 टन तक उपज मिल जाती है.

Kitchen Garden : बेहतर सेहत के लिए लगाएं किचन गार्डन

Kitchen Garden : सब्जियों के उत्पादन में बेहिसाब रासायनिक खादों व कीटनाशक दवाओं के इस्तेमाल के कारण सब्जियां सेहत के लिए नुकसानदायक साबित हो रही हैं. लेकिन समस्या यह भी है कि बिना रासायनिक खादों व कीटनाशकों के इस्तेमाल वाली सब्जियां बाजार में या तो मिलती नहीं हैं या कई गुनी महंगी मिलती हैं. इस समस्या का एकमात्र हल यह है कि घर व आसपास की खाली जगह में किचन गार्डन (Kitchen Garden) लगा कर जैविक सब्जियां खुद उगाई जाएं.

अपने मकान के आसपास खाली पड़ी जमीन या खाली स्थानों पर गमले लगा कर उन में किचन गार्डन (Kitchen Garden) तैयार किया जा सकता है. किचन गार्डन (Kitchen Garden) तैयार करने के लिए बेल वाली सब्जियों की बोआई गमलों में की जा सकती है, जबकि पत्ती वाली व जड़युक्त सब्जियों की बोआई खाली जमीन पर कर सकते हैं.

किचन गार्डन (Kitchen Garden) बनाने के लिए खाली जमीन के एक किनारे पर खाद का गड्ढा बनाना होगा, जिस में घर का प्लास्टिकमुक्त कचरा व पौधों के अवशेष डालने होंगे. इस से बढि़या जैविक खाद बन जाएगी.

Kitchen Garden

किचन गार्डन (Kitchen Garden) के लिए तैयार की गई क्यारियों में खुदाई कर के मिट्टी को कई बार पलट देना चाहिए और उस के बाद उस में कंपोस्ट खाद डाल कर मिला देनी चाहिए. क्यारियों के बीच मिट्टी की चौड़ी मेंड़ बना दें ताकि पानी एक क्यारी से दूसरी क्यारी में न जा सके. इन क्यारियों में लगाने के लिए पहले सब्जियों के पौध तैयार करें और उन्हें 15 दिनों बाद इन क्यारियों में लगा दें. सिंचाई जहां तक हो सके स्प्रिंकलर से करें. इसी प्रकार गमलों में बेलदार सब्जियों के पौधों की बोआई करने से पहले उन में कंपोस्ट खाद मिट्टी में मिला कर भर दें.

यदि सब्जियों में कोई रोग या कीटजनक समस्या पैदा होती है, तो उस का जैविक इलाज करें. जो पौधे रोगग्रस्त हो गए हों, उन्हें किचन गार्डन (Kitchen Garden) से हटा दें. जहां तक हो सके समयसमय पर सिंचाई करें और पौधों के आसपास उगने वाले खरपतवार हटा दें. तय अंतराल के बाद निराईगुड़ाई करते रहें.

किचन गार्डन (Kitchen Garden) से खरीफ के मौसम में लोबिया, तुरई, भिंडी, अरवी, करेला, लौकी, ग्वार, मिर्च, टमाटर, कद्दू, बैगन व पालक वगैरह सब्जियां हासिल की जा सकती हैं. रबी के मौसम सितंबर से नवंबर तक किचन गार्डन में आलू, मेथी, मिर्च, टमाटर, बैगन, प्याज, लहसुन, धनिया, पालक, गोभी, गाजर व मटर जैसी सब्जियों का उत्पादन किया जा सकता है. इसी तरह जायद में फरवरी व मार्च में भिंडी व कद्दूवर्गीय सब्जियां हासिल की जा सकती हैं. यदि घर के आसपास खाली जगह ज्यादा हो तो उस में केला, पपीता, नीबू, अमरूद व करौंदा आदि के पौधे लगाए जा सकते हैं.

Kitchen Garden

किचन गार्डन (Kitchen Garden) से कीटनाशक व रासायनिक खादों से मुक्त सब्जियां परिवार को भरपूर मात्रा में हासिल होंगी, वहीं इन सब्जियों से भरपूर विटामिन, खनिज लवण व कार्बोहाइड्रेट भी मिलते रहेंगे. पोषण वैज्ञानिकों के अनुसार, एक व्यक्ति को संतुलित भोजन के रूप में रोजाना 85 ग्राम फल और 300 ग्राम सब्जियों की जरूरत होती है, जिस में 125 ग्राम हरी पत्तेदार सब्जियां और 100 ग्राम जड़ वाली सब्जियां व 75 ग्राम अन्य सब्जियां होना जरूरी है. लेकिन मौजूदा वक्त में इस मात्रा में लोगों को सब्जियां मिल नहीं पा रहीं, जिस से उन के शरीर में कुपोषण के कारण रोगों के आक्रमण की संभावना बनी रहती है. इस का हल किचन गार्डन से काफी हद तक किया जा सकता है.