मोटे अनाज (Coarse Grains) की खेती को बढ़ावा

जयपुर : मोटे अनाज को बढ़ावा देने के लिए भारत एवं राज्य सरकार निरंतर प्रयासरत है. मोटे अनाज को बढ़ावा देने के लिए बजट घोषणानुसार कृषि विभाग द्वारा वित्तीय वर्ष 2024-25 में किसानों को बाजरा के 7 लाख, 90 हजार और ज्वार के 89 हजार बीज मिनी किट का निःशुल्क वितरण किया गया है, जिस से राज्य में मोटे अनाज के उत्पादन में वृद्धि होगी और किसानों की आय में भी बढ़ोतरी होगी.

मोटे अनाज की खेती कम सिंचाई एवं कम उपजाऊ भूमि में आसानी से पैदा की जा सकती है. गौरतलब है कि मोटे अनाज को ऐसी फसल माना जाता है, जो कुपोषण, स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन जैसी महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करती है.

बता दें कि देश के प्रस्ताव के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा बाजरा, ज्वार, कोदो समेत 8 मोटे अनाज को प्रोत्साहित करने के लिए वर्ष 2023 को अंतर्राष्ट्रीय पोषक अनाज वर्ष घोषित किया गया था.

स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है मोटा अनाज

मोटे अनाज में बाजरा, ज्वार, रागी एवं कोदो जैसे धान्य को शामिल किया गया है. इन में पोषक तत्व प्रोटीन व खनिज भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. मोटे अनाज में औषधीय गुणों के कारण इन के सेवन से कुपोषण, मोटापा, हार्ट से संबंधित बीमारियों और मधुमेह जैसी गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है.

वैज्ञानिकों का मानना है कि भोजन थाली में मिलेट्स का सेवन उत्तम स्वस्थ शरीर के रखरखाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

राज्य में बाजरा और ज्वार की 49.60 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में की गई बोआई

राज्य में खरीफ 2024 में बाजरा और ज्वार की 49.60 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बोआई की गई है, जिस में से बाजरे की 43.04 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में और ज्वार की 6.60 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बोआई की गई है.

4,290 रुपए प्रति क्विंटल पर कोदो खरीद और बिजली उत्पादन करेंगे किसान

बालाघाट : मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव ने कहा कि कोदो या कुटकी हमारी सांस्कृतिक विरासत है. इस विरासत का बालाघाट जिले में इतिहास 3,000 साल पुराना इतिहास है. बालाघाट सिर्फ वन्यजीव, वन, खनिज संसाधनों के लिए ही नहीं जाना जाता है, बल्कि इस की पहचान यहां उत्पादित होने वाले मोटे अनाज से भी है. शासन मोटे का उत्पादन और संवर्धन करने के लिए लगातार काम कर रही है. अब रानी दुर्गावती  अन्न प्रोत्साहन योजना संवर्धन और उत्पादन की दिशा में काम करने के साथ ही किसानों को अधिक मुनाफा देने के लिए शासन द्वारा 1,000 रुपए का अनुदान किसानों को दिया जा रहा है. साथ ही, केंद्र सरकार द्वारा इस साल कोदो 4290 रुपए समर्थन मूल्य पर खरीदने की घोषणा भी की गई है.

मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव ने आगे यह भी कहा कि शासन के प्रयासों से मिलेट मिशन में  अन्न फसलों का उत्पादन लगातार बढ़ रहा है. बालाघाट में ही यह रकबा 10,000 हेक्टेयर होता था. अब इस का रकबा 15,200 हेक्टेयर करने का लक्ष्य रखा गया है. मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव पिछले दिनों बालाघाट में  अन्न उत्सव व किसान सम्मान समारोह को संबोधित कर रहे थे.

अब किसान अन्न उत्पादन के साथ ही ऊर्जा उत्पादक भी बनेंगे

मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव ने किसानों को अन्न उत्सव व किसान सम्मान समारोह में संबोधित करते हुए कहा  कि राज्य शासन अब सोलर ऊर्जा को बढ़ावा देने की ओर बढ़ रही है. इस में किसानों की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होगी. प्रदेश के किसान को अन्न उत्पादन के साथ ही बिजली उत्पादक भी बनाया जाएगा.

उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य शासन मिल कर किसानों को माली रूप से सशक्त करने के लिए किसान सम्मान निधि की राशि प्रदान कर रही है. केंद्र द्वारा हर साल 80 लाख किसानों को किसान सम्मान निधि के रूप में 25,000 करोड़ रुपए प्रदान कर रही है, वहीं राज्य शासन सीएम किसान कल्याण योजना में हर साल  12,500 करोड़ रुपए सीधे पात्र किसानों के खातों में दे रही है.

उन्होंने आगे कहा कि बालाघाट में जल संरचनाओं के संरक्षण की दिशा में उल्लेखनीय काम हुए हैं. इस के लिए बालाघाट के कामों का दस्तावेजीकरण भी किया जाएगा.

आयुष्‍मान योजना में बीमार व्‍यक्ति के उपचार के लिए होगी एयर एम्बुलेंस की सुविधा

मुख्‍यमंत्री डा. मोहन यादव ने कहा कि अब आयुष्‍मान कार्डधारी बीमार व्‍यक्ति को अगर इलाज के लिए दूसरे शहर जाने की जरूरत है, तो इस के लिए चिकित्‍सक, नर्स और उन्‍नत मैडिकल उपकरणों के साथ ही एयर एम्‍बुलेंस की व्‍यवस्‍था भी नि:शुल्‍क कराई जाएगी. साथ ही, बिना आयुष्‍मान कार्डधारी जरूरतमंद व्‍यक्तियों को रियायती दर पर सुविधा का भी लाभ दिया जाएगा.

उन्होंने जानकारी दी कि अब तक जबलपुर, ग्‍वालियर और रीवा जैसे शहरों में एयर टैक्‍सी की व्‍यवस्‍था शुरू कर दी गई है. इस तरह की व्‍यवस्‍था प्रदेश में ऐसे शहर जहां हवाईपट्टी की सुविधा है, वहां से एयर टैक्‍सी का संचालन शीघ्र किया जाएगा.

मुख्‍यमंत्री डा. मोहन यादव ने कहा कि 20 जुलाई को जबलपुर में रीजनल इं‍डस्‍ट्री कौन्‍क्‍लेव होगा, जिस से क्षेत्र के विकास को गति मिलेगी. जो रोजगार की दिशा में यह उल्‍लेखनीय कदम होगा.

उन्‍होंने कहा कि धर्मस्व विभाग द्वारा उन स्‍थलों को चिन्‍हांकित किया जाएगा, जहांजहां से भगवान  राम और  कृष्‍ण का प्रदेश में गमन हुआ है. उन स्‍थलों पर पर्यटन की दृष्टि से काम कर तीर्थ के रूप में विकसित करने का काम किया जाएगा.

मिलेट्स पर आधारित प्रदर्शनियों की मुख्‍यमंत्री ने की तारीफ

मुख्‍यमंत्री डा. मोहन यादव ने इतवारी बाजार स्थित कृषि मंडी में आयोजित  अन्‍न उत्‍सव व किसान सम्‍मान समारोह के प्रारंभ में मिलेट्स पर आधारित प्रदर्शनी का अवलोकन किया. अवलोकन के दौरान उन्‍होंने किसानों से चर्चा भी की. साथ ही, उन्‍होंने प्रदर्शनी की तारीफ करते हुए किसानों का उत्‍साहवर्धन भी किया. इस दौरान उन्‍होंने आजीविका मिशन के 855 स्‍वसहायता समूह को 2728.61 लाख रुपए का केश क्रेडिट लिमिट का प्रतीकात्‍मक चेक भी प्रदान किया. यह चेक स्‍वसहायता समूह की दीदी सुनीता राउत और केशवंती राणा को प्रदान किया.

मुख्‍यमंत्री डा. मोहन यादव ने मिलेट्स के बारे में समूह की दीदियों से चर्चा कर बैहर विकासखंड के शहद पर विशेष प्रतिक्रिया दी. कार्यक्रम के दौरान सांसद भारती पारधी, कटंगी विधायक  गौरव पारधी, लांजी विधायक  राजकुमार कर्राहे, पूर्व मंत्री  गौरीशंकर बिसेन व रामकिशोर कावरे और नपा अध्‍यक्ष भारती सुरजीत ठाकुर उपस्थित रहे. अधिकारियों में कलक्‍टर डा. गिरीश कुमार मिश्रा, एसपी  समीर सौरभ, जिपं सीईओ  डीएस रणदा, एसडीएम  गोपाल सोनी एवं अन्‍य विभागीय अधिकारी उपस्थित रहे.

किसान पाठशाला में मिल रही कृषि तकनीकी (Agricultural Technology) जानकारी

बस्ती : खरीफ 2024 में बस्ती मंडल के समस्त जनपद में ग्राम पंचायत स्तर पर गोष्ठी/किसान पाठशाला का आयोजन प्रत्येक ग्राम पंचायत पर 1 जून से 14 जून 2024 तक जारी है. यह जानकारी देते हुए संयुक्त कृषि निदेशक अविनाश चंद्र तिवारी ने बताया कि दलहन विकास, तिलहन विकास, मिलेट्स पुनरुद्धार त्वरित मक्का विकास योजना एवं आरकेबीवाई योजना के अंतर्गत बस्ती जिले में 677, संत कबीर नगर में 433 एवं सिद्धार्थनगर में 654 किसान पाठशालाओं का आयोजन कराया जाना है.

प्रत्येक किसान पाठशाला में 80 से 100 किसानों की सहभागिता के साथ जनप्रतिनिधियों, एफपीओ के सदस्यों की प्रतिभागिता कराई जानी है.

उन्होंने बताया कि प्रत्येक ग्राम पंचायत के लिए 2 मुख्य खरीफ फसलों जो फसल बीमा के लिए अधिसूचित हो, को चिन्हांकित कर किसानों को फसल उत्पादन नवीनतम तकनीकी की जानकारी दी जाएगी.

किसान पाठशाला में उस विकास खंड में पुरस्कृत/प्रगतिशील किसान के द्वारा अधिक उत्पादन करने के संबंध में बात करा कर किसानों को एफपीओ के गठन/पराली प्रबंधन/डिजिटल क्राप सर्वे/आपदा प्रबंधन/प्राकृतिक खेती धान की डीएसआर विधि दलहन, तिलहन, मक्का उत्पादन तकनीकी, कृषि विभाग की विभिन्न योजनाएं जैसे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, सबमिशन औन एग्रीकल्चर ऐक्सटेंशन, सबमिशन औन एग्रीकल्चर मेकैनाइजेशन, पीएम कुसुम (सोलर पंप), पीएम किसान आदि एवं सहयोगी विभाग उद्यान, मत्स्य, पशुपालन, गन्ना, रेशम आदि विभागों द्वारा संचालित योजनाओं और चिन्हित फसल उत्पादन की तकनीकी जानकारी दी जाएगी. सुविधानुसार गोष्ठी/पाठशाला में ड्रोन का प्रदर्शन और उस के तकनीकी का प्रचारप्रसार भी कराया जाएगा.

उन्होंने किसानों से कहा है कि अपने जनपद के कृषि विभाग के अधिकारीयों/कर्मचारियों से संपर्क कर निर्धारित तिथि को ग्राम पंचायत स्तर पर गोष्ठी/किसान पाठशाला में प्रतिभाग करें, जिस से विभागीय योजनाओं के साथसाथ कृषि में उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाने के लिए नईनई तकनीकी जानकारी प्राप्त कर सके.

“बेहतर फसल प्रबंधन” पर कौशल विकास कार्यक्रम

श्रीकाकुलम: 3 नवंबर, 2023. भाकृअनुप-नार्म ने श्रीकाकुलम जिले के 4 गांवों (संथाकोथावलसा, कोंडावलसा, कोंडरागुडा और इसाकापलेम) के अनुसूचित जाति के किसानों के लिए ‘‘बेहतर फसल प्रबंधन प्रौद्योगिकियों एवं श्रीअन्न के मूल्य संवर्धन‘‘ पर कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके), अमादलावलसा, श्रीकाकुलम जिला, आंध्र प्रदेश के सहयोग से कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया. इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में 28 महिलाओं समेत कुल 75 किसानों ने हिस्सा लिया.

डा. पीवी सत्यनारायण, प्रमुख, एआरएस, रागोलु ने किसानों को श्रीअन्न (मिलेट्स) के महत्व के बारे में बताया, क्योंकि इस में अच्छा फाइबर, प्रोटीन और खनिज होते हैं, इसलिए दिल और एनीमिया के रोगियों के लिए इस का सेवन आवश्यक है. उन्होंने बाजरा में 4 प्रबंधन विधियों, जैसे- बीज का चयन, बोआई का समय, उर्वरक आवेदन का समय और सिंचाई का उचित समय भी समझाया.

एटीएमए के परियोजना निदेशक एस. रामचंद्र राव ने किसानों को श्रीअन्न उत्पादन के संबंध में केवीके प्रौद्योगिकियों के सर्वोत्तम उपयोग का सुझाव दिया. उन्होंने इस बात पर भी चर्चा की कि रोजमर्रा की जिंदगी में श्रीअन्न कितना महत्वपूर्ण है और वर्ष 2023 को अंतर्राष्ट्रीय श्रीअन्न वर्ष क्यों घोषित किया गया है. बाद में केवीके, आमदालावलसा की कार्यक्रम समन्वयक डा. के. भाग्यलक्ष्मी ने किसानों को दैनिक जीवन में श्रीअन्न के मूल्यवर्धन के बेहतर उपयोग का सुझाव दिया. साथ ही, श्रीअन्न के मूल्य संस्करण में उद्यमिता को बढ़ावा दिया.

किसानों को श्रीअन्न की विधियों के बेहतर पैकेज, श्रीअन्न के पोषण महत्व और स्वास्थ्य लाभ, वर्तमान कृषि में जैव उर्वरकों के महत्व, मछली एवं पशु पोषण में श्रीअन्न की भूमिका, श्रीअन्न के साथ विविध मूल्यवर्धित उत्पादों की तैयारी, पैकिंग, ब्रांडिंग, एफएसएसएआई पंजीकरण प्रक्रियाओं से संबंधित पहलुओं पर प्रशिक्षित किया गया. इस के साथसाथ एआरएस, विजयनगरम में श्रीअन्न प्रसंस्करण इकाई का ऐक्सपोजर दौरा भी किया गया.

डा. डी. श्रीनिवास, एसोसिएट डीन, कृषि महाविद्यालय, नायरा ने किसानों को सब्सिडी पर बीज प्रसंस्करण इकाइयां प्राप्त करने के लिए क्लस्टर बनाने का सुझाव दिया. साथ ही, किसानों को श्रीअन्न के महत्व के बारे में बताया और बेहतर पैदावार के लिए इस क्षेत्र के लिए अनुशंसित किस्मों का चयन करने और खेती करने का सुझाव दिया. किसानों को केवीके द्वारा दी गई तकनीकी सहायता का अधिकतम सीमा तक उपयोग करने की उन्होंने सलाह दी.

प्रगतिशील किसान बीवी रमण मूर्ति ने किसानों को श्रीअन्न की खेती के बारे में प्रोत्साहित किया और इस बात पर जोर दिया कि किसानों को खानेपीने की आदतों में बदलाव की जरूरत है.

डा. एम. रमेश नाइक, वैज्ञानिक, भाकृअनुप- नार्म , डा. एस. किरण कुमार और डा. बी. सुनीता, केवीके, आमदालावलसा ने प्रशिक्षण कार्यक्रम कोआर्डिनेट किया.

मोटे अनाजों की खेती

लघु या छोटी धान्य फसलों जैसे मंडुआ, सावां, कोदों, चीना, काकुन आदि को मोटा अनाज कहा जाता है. इन सभी फसलों के दानों का आकार बहुत छोटा होता है. लघु अनाज पोषक तत्त्वों और रेशे से भरपूर होने के चलते इस का औषधीय उपयोग भी है.

यह आयरन, कैल्शियम और प्रोटीन के साथसाथ फास्फोरस का भी अच्छा स्रोत है. मंडुआ से रोटी, ब्रेड, सत्तू, लड्डू, बिसकुट आदि तैयार किए जाते हैं, वहीं सावां, कोदों, चीना व काकुन को चावल, खीर, दलिया व मर्रा के रूप में उपयोग करते हैं और पशुओं को चारा भी मिल जाता है.

जहां मुख्य अन्य फसलें नहीं उगाई जा सकती हैं, वहां पर ये फसलें आसानी से उगा ली जाती हैं. ये फसलें सूखे व अकाल को सहन कर लेती हैं और 70-115 दिन में तैयार हो जाती हैं. फसलों पर कीट व रोगों का प्रकोप कम होता है.

ग्रामीण क्षेत्रों में इन मोटे अनाजों के बारे में अनेक कहावतें प्रचलित हैं, जैसे :

मंडुआ मीन, चीन संग दही,

कोदों भात दूध संग लही.

मर्रा, माठा, मीठा.

सब अन्न में मंडुआ राजा.

जबजब सेंको, तबतब ताजा.

सब अन्न में सावां जेठ.

से बसे धाने के हेठ.

 

खेत की तैयारी

 

मिट्टी पलटने वाले हल से एक गहरी जुताई करें. इस के बाद 2-3 बार हैरो से गहरी जुताई करें.

मंडुआ की उन्नत किस्में

जल्दी पकने वाली प्रजाति (90-95 दिन) वीआर 708, वीएल 352, जीपीयू 45 है, जिस की उपज क्षमता प्रति बीघा (2500 वर्गमीटर/20 कट्ठा) 4-5 क्विंटल है.

मध्यम व देर से पकने वाली प्रजाति (100-115 दिन) जीपीयू 28, 67, 85, आरएयू 8 है. इस की उपज क्षमता 5-6 क्विंटल प्रति बीघा है.

सावां की प्रजाति

वीएल 172  (80-85 दिन), वीएल 207, आरएयू 3, 9 (85-90 दिन).

कोदों प्रजाति

जेके 65, 76, 13, 41, 155, 439 (अवधि 85-90 दिन), जीपीयूके पाली, डिडरी (अवधि 100-115 दिन) है.

चीना की प्रजाति

कम अवधि (60-70 दिन) एमएस 4872, 4884 व बीआर 7, मध्यम व देर से पकने वाली प्रजाति (70-75 दिन अवधि) जीपीयूपी 21, टीएनएयू 151, 145 है.

काकुन की उन्नत किस्में

आरएयू 2, को. 4, अर्जुन (75-80 दिन अवधि) व एसआईए 326, 3085, बीजी 1, मध्यम व देर से (80-85 दिन) पकने वाली है.

बीज की दर

प्रति बीघा मंडुआ 2.5-3.0 किलोग्राम सावां, कोदों, चीना, काकुन का 2.0 से 2.5 किलोग्राम की आवश्यकता होती है. सभी फसलों की बोआई जून से जुलाई महीने तक की जाती है.

बोआई की दूरी

मंडुआ में लाइन से लाइन की दूरी 20-25 सैंटीमीटर और पौध से पौध की दूरी 10 सैंटीमीटर रखनी चाहिए. सावां, कोदों, चीना व काकुन के लिए 25-30 सैंटीमीटर लाइन से लाइन और पौध से पौध की दूरी 10 सैंटीमीटर रखें. सभी फसलों की बोआई की गहराई 2 सैंटीमीटर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए.

खाद एवं उर्वरक

सभी फसलों में मिट्टी की जांच के आधार पर ही खाद व उर्वरक का प्रयोग करें. बोआई से पहले 17 किलोग्राम यूरिया, 62 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट व 10 किलोग्राम म्यूरेट औफ पोटाश का प्रयोग प्रति बीघा में करें. 25-30 दिन की पौध होने पर निराई के बाद 17 किलोग्राम यूरिया डालें.

उपज क्षमता

सावां, कोदों, चीना व काकुन की जल्दी पकने वाली प्रजातियों की 3-4 क्विंटल और मध्यम व देर से पकने वाली प्रजातियों की उपज 3.50 से 4.50 क्विंटल प्रति बीघा है.

अंत:वर्ती खेती

अरहर, ज्वार व मक्का के साथ आसानी से मोटे अनाजों की अंत:खेती की जा सकती है.

मिलेट से बनाएं सेहतमंद पकवान

कोदो, कुटकी, नाचनी या रागी और बाजरा आदि मिलेट के अंतर्गत आने वाले अनाज हैं. ये अनाज ग्लूटेन फ्री और फायबर से भरपूर होते हैं, जिस से इन्हें पचाने के लिए हमारे पाचनतंत्र को अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती, इसीलिए इन्हें सुपर फ़ूड भी कहा जाता है. इन्हें अपनी रोज की डाइट में शामिल करना हमारे उत्तम स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक होता है.

आज हम आप को ऐसे ही मिलेट की 2 रैसिपी बनाना बता रहे हैं, जिन्हें आप आसानी से घर पर बना सकती हैं. तो आइए देखते हैं कि इन्हें कैसे बनाया जाता है :

रागी मिक्स वेज परांठा

कितने लोगों के लिए : 4

बनने में लगने वाला समय:  30 मिनट
मील टाइप: वेज

सामग्री (कवर के लिए)
रागी का आटा –  2 कप
नमक – स्वादानुसार
घी –  1/2 टीस्पून
पानी – 1 कप

अजवाइन – 1 चुटकी
तेल – परांठा सेंकने के लिए

सामग्री (भरावन के लिए)

उबले मैश किए आलू  – 2
बारीक कटा प्याज  – 1
बारीक कटी हरी मिर्च  – 3
बारीक कटा हरा धनिया  – 1 लच्छी
बारीक कटी शिमला मिर्च  – 1/2 कप
बारीक कटी बींस  – 1/4 कप
नमक  – स्वादानुसार
लाल मिर्च पाउडर  – स्वादानुसार
अमचूर पाउडर  – 1/4 टीस्पून
जीरा  – 1/8 टीस्पून
गरम मसाला  – 1/4 टीस्पून
टोमेटो सौस  – 2 टेबलस्पून
तेल  – 1 टीस्पून

विधि :

एक नौनस्टिक पैन में तेल गरम कर के जीरा तड़का कर प्याज को सुनहरा होने तक भून लें. अब इस में हरी मिर्च, शिमला मिर्च, बींस और नमक डाल कर ढक कर 5 मिनट तक पकाएं. उस के बाद उबले हुए आलू और सभी मसाले डाल कर अच्छी तरह चलाएं. 2-3 मिनट भून कर हरा धनिया डाल कर गैस बंद कर दें.

अब आटा तैयार करने के लिए पानी को नमक, घी और अजवाइन के साथ एक भगौने में उबाल लें. जैसे ही पानी उबलने लगे तो गैस बंद कर दें और रागी का आटा डाल कर अच्छी तरह चलाएं. जब पानी में आटा अच्छी तरह मिक्स हो जाए, तो इसे एक प्लेट में निकाल कर हाथ से अच्छी तरह मिला कर एकदम गेहूं के आटे जैसा नरम कर लें.

अब चकले पर थोड़ा सा तेल या घी लगा कर 2 रोटी बेल लें. एक रोटी के किनारों पर उंगली से पानी लगाएं और ब्रश से पूरी रोटी पर टोमेटो सौस लगा कर 1 टेबलस्पून भरावन अच्छी तरह फैला दें. ऊपर से दूसरी रोटी रख कर उंगलियों की सहायता से चारों तरफ से दबा दें. तैयार परांठे को चिकनाई लगे तवे पर डाल कर घी लगा कर दोनों तरफ से सुनहरा होने तक सेंक लें.

गरमागरम परांठे को चटनी या अचार के साथ सर्व करें.

कोदो मिलेट पिज्जा

कितने लोगों के लिए:  6
बनने में लगने वाला समय:  30 मिनट
मील टाइप : वेज

सामग्री
कोदो मिलेट –  1 कप
चना दाल  – 1/4 कप
चावल  – 1/2 कप
दही  – 1/2 कप
ईनो फ्रूट साल्ट  – 1 सैशे
बारीक कटी हरी मिर्च  – 4
अदरक  – 1 छोटी गांठ
हींग  – 1 चुटकी
जीरा  – 1/8 टीस्पून
नमक  – स्वादानुसार
हल्दी पाउडर  – 1/4 टीस्पून
बारीक कटी लाल शिमला मिर्च – 1 टीस्पून
बारीक कटी हरी शिमला मिर्च – 1 टीस्पून
बारीक कटी पीली शिमला मिर्च – 1 टीस्पून
चीज क्यूब्स  – 6
चिली फ्लेक्स  – 1/2 टीस्पून
ओरेगेनो  – 1/2 टीस्पून
चाट मसाला  – 1 टीस्पून
घी  – 1 टीस्पून

विधि :

कोदो मिलेट, चावल और दाल को बनाने से पहले ओवरनाइट भिगो दें. सुबह पानी निकाल कर हरी मिर्च, नमक और दही के साथ बारीक पीस लें. अब इस में ईनो फ्रूट साल्ट, जीरा, हींग और हल्दी पाउडर डाल कर अच्छी तरह चलाएं. तैयार मिश्रण से चिकनाई लगे तवे पर एक बड़ा चम्मच मिश्रण ले कर मोटामोटा फैलाएं. जब इस का रंग बदल जाए तो पलट दें और एक पूरा चीज क्यूब ग्रेट कर दें. ऊपर से तीनों शिमला मिर्च डाल कर ढक कर एकदम धीमी आंच पर चीज के मेल्ट होने तक पकाएं. ऊपर से ओरेगेनो, चिली फ्लेक्स और चाट मसाला बुरक कर सर्व करें.

मिलेट्स प्रोसैसिंग में है रोजगार

उदयपुर : 31 जुलाई 2023. महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय द्वारा नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 की तृतीय वर्षगाठ पर मिलेट्स के प्रसंस्करण यानी प्रोसैसिंग एवं रोजगार के अवसर पर एक सेमिनार का आयोजन किया गया. कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजीत कुमार कर्नाटक, आईसीएआर के सहायक महानिदेशक डा. एसके शर्मा , अधिष्ठाता डा. मीनू श्रीवास्तव एवं विषय विशेषज्ञ प्रो. मुक्ता अग्रवाल उपस्थित थे.

इस अवसर पर कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने अपने उद्बोधन में नई शिक्षा नीति को लागू करने की तृतीय वर्षगांठ एवं इस वर्ष को अंतराष्ट्रीय मिलेट वर्ष के रूप में मनाने के अवसर पर कहा कि मिलेट्स के प्रसंस्करण यानी प्रोसैसिंग और मूल्य संवर्धित पदार्थों के विपणन में उद्यमितता और स्वरोजगार की अपार संभावनाएं निहित हैं.

उन्होंने आगे यह भी कहा कि नई शिक्षा नीति (एनईपी) में व्यावसायिक शिक्षा स्कूली शिक्षा से ले कर उच्च शिक्षा तक शिक्षार्थियों को नौकरियों के लिए तैयार करेगी. व्यावसायिक प्रशिक्षण और कृषि शिक्षा में व्यावहारिक सत्र, उद्योग प्रदर्शन और इंटर्नशिप शामिल होंगे, यह शिक्षार्थियों को एक विशिष्ट व्यापार के लिए तैयार करेगा और उन के तकनीकी कौशल को उन्नत करेगा, जो रोजगार के लिए अनिवार्य है.

उन्होंने मिलेट्स को आहार में शामिल करने पर बल देते हुए कहा कि शरीर का इम्यून सिस्टम मजबूत बनाने के लिए नियमित मिलेट खाना बहुत ही लाभदायक माना जाता है, क्योंकि इन में शरीर को स्वस्थ रखने के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्व यानी मिलेट में न्यूट्रिशन पाए जाते हैं. ये मिलेट टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज से बचाने में सहायक होते हैं. आजकल जो अनाज खाया जाता है, वह नकारात्मक अनाज (गेहूं, चावल) है. शरीर में फैट कम करने और वजन घटाने में मिलेट काफी सहायक होता है. बाजरे में अधिक मात्रा में फाइबर और ट्रिप्टोफैन (एमिनो एसिड) पाया जाता है. जब मुख्य भोजन में मिलेट का सेवन करते हैं, तो फाइबर और ट्रिप्टोफैन के कारण वह धीमी गति से पचता है. इस वजह से पेट लंबे समय तक भरा हुआ महसूस होता है, जिस से ज्यादा खाने से बच जाते हैं और मोटापा या वजन घटाने में मदद मिलती है. मिलेट में फाइबर की मात्रा अधिक पाई जाती है.

आईसीएआर के एडीजी डा. एसके शर्मा ने बताया कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को 29 जुलाई, 2020 को केंद्रीय कैबिनेट द्वारा अनुमोदित किया गया था. यह 34 वर्षों के बाद भारत का सब से बड़ा शैक्षिक सुधार है. नई शुरू की गई शिक्षा नीति योजनाबद्ध और चरणबद्ध तरीके से भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 की जगह लेगी. भारत को ज्ञान की वैश्विक महाशक्ति बनाने के लिए यह नई शिक्षा नीति भारत सरकार की सब से बड़ी और चर्चित पहल है. इस नई शिक्षा नीति का दृष्टिकोण एक ऐसी शिक्षा प्रणाली प्रदान करना है, जो देश को स्थाई रूप से एक जीवंत ज्ञान समाज में बदल दे और सभी को उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान कर सके. राष्ट्रीय शिक्षा नीति पहुंच, इक्विटी, गुणवत्ता, वहनीयता और जवाबदेही के मूलभूत स्तंभों पर बनी है. नई शिक्षा नीति का उद्देश्य समाज के सभी वर्गों के छात्रों को उच्च गुणवत्ता वाली सार्वभौमिक शिक्षा प्रदान करना है. प्रत्येक विषय में पाठ्यचर्या सामग्री को उस की मूल अनिवार्यता तक कम कर दिया जाएगा, और महत्वपूर्ण सोच और अधिक समग्र शिक्षा पर और ज्यादा जोर दिया जाएगा, जो पूछताछ आधारित, खोज आधारित, चर्चा आधारित और विश्लेषण आधारित शिक्षा होगी. छात्रों को अध्ययन के लिए अधिक लचीलापन और विषयों का विकल्प दिया जाएगा. छात्र अध्ययन के विभिन्न क्षेत्रों से विषयों के एक समूह का चयन करने में सक्षम होंगे, एक समूह में विज्ञान और मानविकी या वाणिज्य और मानविकी आदि के विषय हो सकते हैं. व्यावसायिक और पाठ्येतर गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाएगा और छात्रों को इन सहपाठ्यचर्या में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा.

नई शिक्षा नीति के मुताबिक यूजी शिक्षा 3 या 4 साल की हो सकती है, जिस में कई निकास विकल्प और इस अवधि के भीतर उपयुक्त प्रमाणन होंगे. उदाहरण के लिए, 1 साल के बाद सर्टिफिकेट, 2 साल के बाद एडवांस डिप्लोमा, 3 साल के बाद बैचलर डिगरी और 4 साल के बाद रिसर्च के साथ बैचलर डिगरी. युवाओं को विश्वस्तरीय शिक्षा दिलाने के लिए शिक्षा में प्रौद्योगिकी को प्राथमिकता से अपनाया जाएगा, इस के लिए राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी मंच यानी एनईटीएफ एक स्वायत्त निकाय बनाया जाएगा, जो प्रौद्योगिकी के उपयोग पर विचारों के मुक्त आदानप्रदान के लिए एक समृद्ध मंच प्रदान करेगा, जो कि सीखने, मूल्यांकन, योजना, प्रशासन को बढ़ाने के लिए मददगार साबित होगा. छात्रों में लचीलापन और विषयों की पसंद में वृद्धि होगी. छात्र विभिन्न समूहों से विषयों का चयन कर सकते हैं. इस का अर्थ है कि कला के छात्र विज्ञान स्ट्रीम से भी विषय चुन सकते हैं. कला और विज्ञान के बीच, पाठ्यचर्या और पाठ्येतर गतिविधियों के बीच, और व्यावसायिक और शैक्षणिक धाराओं के बीच सामंजस्य रखा गया है.

विषय विशेषज्ञ प्रो. मुक्ता अग्रवाल ने बताया कि मिलेट्स के कई प्रकार के मूल्य संवर्धित भोज्य पदार्थ बनाए जा सकते हैं, जो कि सेहत के लिए लाभदायक होने के साथसाथ स्वरोजगार के लिए भी आय बढ़ाने का अच्छा स्रोत हो सकते हैं.

उन्होंने आगे बताया कि मिलेट्स को प्रतिदिन आहार में सम्मिलित किया जा सकता है और विभिन्न त्योहारों व समारोहों में ही इन का उपयोग किया जा सके. मिलेट से शरीर में उत्पन्न होने वाली ग्लूकोज की मात्रा को नियंत्रित किया जा सके. मिलेट्स में मैग्नीशियम और पोटैशियम जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो कोलेस्ट्राल लेवल को बढ़ने से रोकते हैं व ब्लड प्रेशर को भी नियंत्रित करने में मददगार होते हैं. इस के चलते हृदय से जुड़े रोगों से बचने में लाभ मिलता है और दिल स्वस्थ व मजबूत रहता है.

उन्होंने कहा कि मिलेट कैंसर से छुटकारा दिलाने में मदद करते हैं. इस मिलेट में एंटीऔक्सीडेंट्स तत्व पाए जाते हैं, जो शरीर में फ्री रेडिकल्स के प्रभाव को कम करते हैं.

मोटे अनाज कोदो की खेती : कमाई का खास जरीया

देश में वर्षा दर में आ रही कमी किसानों के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है. वहीं वर्षा में कमी से खेती की लागत बढ़ाने और फसल उत्पादन में भी कमी आ रही है. ऐसे में किसान कम पानी में पैदा होने वाले अनाजों की खेती पर ज्यादा जोर दे रहे हैं. साथ ही, किसान ऐसे उपाय भी खोज रहे हैं, जिस से कृषि उपज की मार्केटिंग की समस्या से भी निबटा जा सके.

एक तरफ खेती की बढ़ती समस्याएं हैं, तो वहीं दूसरी तरफ बीमारियों का बढ़ता स्तर. इसीलिए ऐसे अनाजों की खेती पर ज्यादा जोर दिया रहा है, जो खाने में पौष्टिक हो. साथ ही, बीमारियों की रोकथाम में भी सहायक हो. इन्हीं सभी समस्याओं के निदान में मोटे अनाज कोदो की खेती किसानों के लिए लाभप्रद साबित हो सकती है.

कोदो अनाज की एक ऐसी फसल है, जिस से किसान मुहं मोड़ चुके थे. लेकिन हाल के वर्षों में कोदो के चावल की मांग में काफी उछाल आया है, वहीं औषधि निर्माण कंपनियों में कोदो की बढ़ रही मांग ने इस की खेती में किसानों में एक बार फिर से रुचि पैदा कर दी है.

कोदो में पोषक तत्वों की प्रचुर मात्रा पाई जाती है. यह दिल और शुगर के मरीजों के लिए भी फायदेमंद है. इसी वजह से कई बड़ी कंपनियां बिसकुट, नमकीन या बेकरी से जुड़ी चीजें बनाती हैं. इन कंपनियों में कोदो की खासा मांग है. कोदो फसल का अच्छा मूल्य किसानों को मिल रहा है.

इस की खेती कम वर्षा वाले क्षेत्रों और कम सिंचाई की दशा में आसानी से की जा सकती है. इस की फसल सूखे की दशा में भी आसानी से उगाई जा सकती है.

कोदो के दाने मोटी खोल से ढंके होते हैं, इसलिए फसल कटाई के पश्चात इस खोल को हटाना जरूरी हो जाता है. कोदो की अधपके फसल की कटाई नहीं करनी चाहिए, क्योंकि अधपके अनाज को खाना हानिकारक होता है.

अगर किसान कोदो की व्यावसायिक लेवल पर खेती करें, तो कम सिचाई, कम लागत और कम मेहनत में अच्छा मुनाफा लिया जा सकता है. कोदो की मार्केटिंग में भी वर्तमान में कोई समस्या नहीं है. किसान औनलाइन मार्केटिंग के जरीए भी कोदो की बिक्री कर सकते हैं.

मिट्टी का चुनाव : कोदो मोटे अनाजों में एक ऐसी फसल है, जिसे किसी भी तरह की मिट्टी में आसानी से उगाया जा सकता है. अच्छे उत्पादन के लिए दोमट व रेतीली मिट्टी ज्यादा अच्छी होती है.

कोदो की खेती में यह ध्यान देना जरूरी हो जाता है कि खेत से पानी की निकासी अच्छी हो.

खाद एवं उर्वरक का प्रयोग : लोगों में बढ़ती बीमारियों के प्रकोप को देखते हुए कोदो की फसल में जैविक खादों का उपयोग स्वास्थ्य के नजरिए से अच्छा माना जा सकता है. क्योंकि कोदो का उपयोग डायबिटीज सहित अन्य बीमारियों में ज्यादा किया जा रहा है. ऐसे में इस की फसल में गोबर की सड़ी खाद, नाडेप कंपोस्ट का प्रयोग किया जाना चाहिए. यह मिट्टी में पोषक तत्वों की मात्रा को बढ़ाता है, जिस से खेती में नमी को बनाए रखने में मदद मिलती है.

अगर किसान के पास कंपोस्ट खाद की उपलब्धता है, तो 5 से 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में पहली जुताई के समय मिलाना लाभकारी होता है. किसान गोबर की खाद अपने पास की डेयरी से भी खरीद सकते हैं. इस के साथ ही प्रति हेक्टेयर की दर से 40 किलोग्राम नाइट्रोजन, 20 किलोग्राम फास्फोरस व 20 किलोग्राम पोटाश का प्रयोग करना चाहिए. इस में ऊपर दी गई नाट्रोजन की आधी मात्रा और फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा खेत में बोते समय कूड़ों में बीज के नीचे डाल देना चाहिए. नाइट्रोजन की बाकी बची हुई मात्रा को 30-35 दिन बाद खड़ी फसल में प्रयोग करना चाहिए.

खेती की तैयारी

कोदो की फसल बोने के पूर्व खेत में पर्याप्त नमी का होना जरूरी है. इस के लिए सर्वप्रथम खेत में नमी बनाए रखने के लिए वर्षा शुरू होने के पूर्व ही खेत की जुताई कर के मिट्टी को भुरभुरी बना लेना चाहिए. एक जुताई रोटावेटर से कर के दो जुताई कल्टीवेटर से कर के पाटा लगा देना उचित होता है.

बोआई का उचित समय व उन्नत प्रजातियां

कोदो की बोआई का उचित समय जून के पहले हफ्ते से ले कर जुलाई माह तक का होता है. कोदो के बीजों की खेत में बोआई उसी दशा में करें, जब खेत में पर्याप्त नमी हो. इस के बीजों को छिटकाव और लाइनिंग दोनों विधियों से बोया जा सकता है. लेकिन लाइन से बोई गई फसल ज्यादा उपज देने वाली होती है.

अगर आप इसे लाइन से बो रहे हैं, तो इस में लाइन से लाइन की दूरी 40 से 50 सैंटीमीटर एवं पौधे से पौधे की बीच की दूरी 8 से 10 सैंटीमीटर होनी चाहिए. बीज बोने की गहराई लगभग 3 सैंटीमीटर होनी चाहिए.

कोदो के बीज चूंकि महीन होते हैं. ऐसे में इस के लिए ज्यादा बीज की जरूरत नहीं पड़ती है. एक हेक्टेयर फसल के लिए तकरीबन 15 किलोग्राम बीज की आवश्यकता पड़ती है. कोदो के अधिक उत्पादन के लिए उन्नत प्रजातियों का चयन किया जाना चाहिए. इस के लिए 105 से 110 की अवधि वाली प्रजातियों में :

पीएससी-1, 2 आरपीएस -41, 76 पीएलआर-1 जेएनके-364

85 दिन की अवधि वाले में :

जेके-41, जेके-62, जेके-76,

115 दिन वाले में :

निवास-1,

112 दिन वाली फसल में :
डिंडोरी 76 शामिल हैं. डिंडोरी 73, पाली कोयम्बटूर 2 भी अच्छा उत्पादन देने वाली प्रजातियां हैं. इन फसलों का उत्पादन प्रति हेक्टेयर तकरीबन 18 से 20 क्विंटल तक होता है.

सिंचाई : कोदो की फसल खरीफ सीजन की फसल है. ऐसे में कम वर्षा भी इस के लिए मुफीद है. फिर भी अगर कम वर्षा होती है, तो फसल की सिंचाई किया जाना उचित होता है. लेकिन ध्यान रहे कि फसल में ज्यादा देर तक पानी न रुकने पाए. अत्यधिक वर्षा की स्थिति में पानी की निकासी का पुख्ता इंतजाम किया जाना जरूरी है.

खरपतवार पर नियंत्रण रखें : कोदो की फसल से अच्छी पैदावार लेने के लिए इस में खरपतवारों का नियंत्रण किया जाना जरूरी हो जाता है. फसल में खरपतवारों के नियंत्रण के लिए फसल की बोआई के पश्चात इस की निराई करा दें, जिस से पौधों का विकास अच्छी दशा में होता है.

बीमारियों की रोकथाम : कृषि विज्ञान केंद्र, बस्ती में फसल सुरक्षा विशेषज्ञ डा. प्रेमशंकर के अनुसार, कोदो की फसल में अर्गट नामक रोग का प्रकोप देखा जाता है, जो फफूंद लगने के कारण होता है. इस रोग का प्रकोप फसल में तब होता है, जब फूल आ रहा होता है. इस रोग में फूलों से चिपचिपा, हलके गुलाबी रंग का स्राव निकलता है, जो बाद में सूख कर एक पपड़ी के रूप में जम जाता है. रोगग्रस्त अनाज का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए.

कोदो की फसल को बीमारियों से बचाने के लिए स्वस्थ व प्रमाणित बीजों का चुनाव करना चाहिए. साथ ही, बोआई से पूर्व बीज का बीजोपचार विटावेक्स पावर, जिस में कार्बोक्सिन 37.5 फीसदी और थाइरम 37.5 फीसदी होता है की 2.5 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए.

खड़ी फसल में रोग दिखाई पड़ने पर पहला छिड़काव मैंकोजेब 63 फीसदी डब्ल्यूपी, कार्बेन्डाजिम 12 फीसदी डब्ल्यूपी की 3 ग्राम प्रति लिटर मात्रा या 1.5 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए. दूसरा छिड़काव कार्बेन्डाजिम 1.5 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव किया जाता है.

डा. प्रेमशंकर के अनुसार, बाली में लगने वाले कडुआ रोग का प्रकोप भी फसल में पाया जाता है. इस की रोकथाम के लिए भी ऊपर बताई गई रसायनों की मात्रा का प्रयोग करना चाहिए. इस के अलावा रतुआ रोग का प्रकोप भी पाया जाता है. यह भी फफूंदीजनित रोग है. इस में पौधों की पत्तियों पर भूरे रंग के फफोले दिखाई पड़ते हैं. इस रोग के प्रभाव में आने से फसल उत्पादन पर बुरा असर पड़ता है. इस की रोकथाम के लिए भी ऊपर बताई गई रसायनों की मात्रा का प्रयोग करना चाहिए.

कीट पर नियंत्रण : कोदो की फसल में बीमारियों की अपेक्षा कीटों का प्रकोप कम देखा गया है. फसल में दीमक व तना बेधक का प्रकोप देखा जाता है. दीमक के नियंत्रण के लिए खेत में कभी भी कच्ची गोबर की खाद का प्रयोग नहीं करना चाहिए.

जिस खेत में दीमक का प्रकोप अधिक होता है, उस खेत का भूमि शोधन व्यूबेरिया बेसियाना की 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की मात्रा की दर से करना चाहिए. व्यूबेरिया बेसियाना एक सफेद रंग की फफूंदी है, जो विभिन्न फसलों एवं सब्जियों की सुंडियों जैसे चने की सुंडी, बालदार सुंडी, रस चूसने वाले कीट, वूली एफिड, फुदको, सफेद मक्खी एवं स्पाइडर माइट व दीमक आदि कीटों के प्रबंधन के लिए प्रयुक्त की जाती है. यह प्यूपा अवस्था को संक्रमित करती है. व्यूबेरिया बेसियाना कीट के संपर्क में आते ही शरीर में प्रवेश कर जाता है, जिस के प्रभाव से कीट कुछ दिनों बाद ही लकवा ग्रस्त हो जाता है और अंत में मर जाता है. मृत कीट सफेद रंग की ममी में तबदील हो जाता है. इस मित्र फफूंद की उचित वृद्धि के लिए अधिक आर्द्रता की आवश्यकता होती है.

अगर कोदो की खड़ी फसल में दीमक का प्रकोप दिखाई दे, तो क्लोरोपायरीफास 20 फीसदी ईसी की 2.5 लिटर मात्रा का प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

फसल में तना बेधक कीट का प्रकोप भी कभीकभी दिखाई पड़ता है. इस कीट का प्रकोप होने पर पहला छिड़काव फिप्रोनिल की 2 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी की मात्रा या 1.5 लिटर प्रति हेक्टेयर की मात्रा की दर से छिड़काव करना चाहिए, जबकि दूसरा छिड़काव इंडोक्साकार्ब 15.8 फीसदी ईसी की 500 मिलीलिटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 600 से 800 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना उचित होता है.

कटाई, मड़ाई व भंडारण

कोदो की फसल उस की वैराइटियों के अनुसार सितंबर से अक्तूबर माह के बीच पक कर तैयार हो जाती है. फसल की कटाई के पश्चात एक सप्ताह तक खेत में फसल को सूखने देते हैं. इस के बाद थ्रेशिंग कर अनाज अलग कर लेते हैं. मड़ाई के बाद कोदो के दानों को धूप में अच्छी जगह से सुखा लेना चाहिए और बोरों में भर देना चाहिए.

पोषक तत्वों की उपलब्धता : कोदो में चावल की तुलना में पोषक तत्वों की प्रचुर मात्रा उपलब्ध होती है. जहां चावल में प्रोटीन 6.8 ग्राम है, वहीं कोदो में 8.3 ग्राम. चावल में कार्बोहाइड्रेट 78.2 ग्राम, कोदो में 65.9 ग्राम. चावल में वसा 0.5 ग्राम, कोदो में 1.4 ग्राम. चावल में फाइबर 0.2 ग्राम, कोदो में 9.0 ग्राम. लौह तत्व चावल में 0.6 ग्राम, कोदो में 2.6 ग्राम. चावल में कैल्शियम 10.0 मिलीग्राम, कोदो में 27.0 मिलीग्राम. चावल में फास्फोरस की मात्रा 160.0 मिलीग्राम, कोदो में 188.0 मिलीग्राम.

इसलिए पोषण के नजरिए से भी कोदो का उपयोग लाभदायक ही होता है.

खरीफ में मोटे अनाजों की खेती

सवाल : मोटे अनाज किसे कहते हैं?

लघु या छोटे धान्य फसलों जैसे – मंडुआ, सांवा, कोदो, चीना, काकुन, ज्वार, बाजरा आदि को मोटा अनाज कहा जाता है. इन सभी फसलों के दानों का आकार बहुत छोटा होता है.

सवाल : मोटे आनाज की उपयोगिता क्या है?

मोटे अनाज पोषक तत्वों और रेशे से परिपूर्ण होने के कारण इस का औषधीय उपयोग भी है और यह आयरन, कैल्शियम, प्रोटीन और फास्फोरस का अच्छा स्रोत है. मधुमेह के मरीजों, ब्लड प्रेशर, हड्डी के रोग और पाचन क्रिया से संबंधित रोगों में काफी लाभकारी होता है. यही वजह है कि मंडुआ से रोटी, ब्रेड, सत्तू, लड्डू, बिसकुट आदि एवं सांवा, कोदो, चीना व काकुन को चावल, खीर, दलिया व मर्रा के रूप में उपयोग करते हैं और पशुओं को चारा भी मिल जाता है.

सवाल : मोटे अनाज की खेती कब की जाती है?

ये खरीफ की फसलें हैं. जूनजुलाई माह तक फसल लगाई जा सकती है. जिन जगहों पर मुख्य अन्य फसलें नहीं उगाई जा सकती हैं, वहां पर ये फसलें सुगमतापूर्वक उगा ली जाती हैं. ये फसलें कम पानी में पैदा होने वाली फसलें हैं. सूखे को आसानी से सहन कर लेती हैं.

सवाल : इस तरह की फसलें कितने दिन में तैयार हो जाती हैं?

मोटे आनाज की फसलें 70-115 दिन में पक कर तैयार हो जाती हैं और फसलों पर कीट एवं रोगों का प्रकोप कम होता है. ग्रामीण क्षेत्रों में इन मोटे अनाजों के बारे में अनेक कहावतें प्रचलित हैं जैसे –

*मंडुआ, मीन, चीन संग दही,
कोदो भात दूध संग लही…

मार्रा, माठा, मीठा,

सब अनन्न में मंडुआ राजा,
जबजब सेंको, तबतब ताजा.

सब अनन्न में सांवा जेठ,
से बसे धाने के हेठ…

सवाल : इन अनाजों की खेती करने के लिए खेत की तैयारी कैसे करनी चाहिए?

खेत की तैयारी के लिए मिट्टी पलटने वाले हल से एक गहरी जुताई करें और 2-3 बार हैरो से जुताई कर के गोबर की खाद डालें.

सवाल : मोटे अनाज की फसलों की प्रमुख किस्में क्या हैं?

मंडुआ की उन्नति किस्में :

जल्दी पकने वाली प्रजाति (90-95दिन)

वीआर 708, वीएल 352, जीपीयू 45 है, जिस की उपज क्षमता प्रति बीघा ( 2500 वर्गमीटर प्रति 20 कट्ठा) 4-5 क्विंटल है.

मध्यम व देर से पकने वाली प्रजाति (100-115 दिन)

जीपीयू 28, 67, 85, आरएयू 8 है, जिस की उपज क्षमता 5-6 क्विंटल प्रति बीघा है.

सांवा की प्रजाति : वीएल 172 (80-85 दिन), वीएल 207, आरएयू 3, 9 (85 -90 दिन)

कोदो की प्रजाति : जेके 65, 76, 13, 41, 155, 439, (अवधि 85-90 दिन) जीपीयूके पाली, डिडरी (अवधि100-115 दिन) है.

चीना की प्रजाति : कम अवधि (60-70 दिन). एमएस 4872, 4884 और बीआर 7, मध्यम व देर से पकने वाली प्रजाति (70-75 दिन) जीपीयूपी 21, टीएनएयू151, 145 है.

काकुन की उन्नत किस्में:

आरएयू 2, को. 4, अर्जुन (75-80.दिन अवधि) एवं एसआईए -326, 3085, बीजी -1 मध्यम एवं देर से (80-85 दिन ) पकने वाली है.

सवाल : कुछ खास फसलों को लगाने के लिए बीज दर क्या है?

बीज दर प्रति बीघा मंडुआ 2.5 -3.0 किलोग्राम. वहीं सांवा, कोदो, चीना, काकुन का 2.0 से 2.5 किलोग्राम की आवश्यकता होती है. सभी फसलों की बोआई जून से जुलाई तक की जाती है.

सवाल : बोआई की दूरी क्या होनी चाहिए?

मंडुआ लाइन से लाइन 20-25 सैंटीमीटर और पौध से पौध 10 सैंटीमीटर रखनी चाहिए. सांवा, कोदो, चीना एवं काकुन के लिए 25-30 सैंटीमीटर लाइन से लाइन और पौध से पौध 10 सैंटीमीटर रखें. सभी फसलों की बोआई की गहराई 2 सैंटीमीटर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए.

सवाल : खाद एवं उर्वरक की मात्रा और प्रयोग विधि क्या है?

सभी फसलों में मिट्टी की जांच के आधार पर उर्वरक का प्रयोग करें. बोने से पहले 17 किलोग्राम यूरिया, 62 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट, 10 किलोग्राम म्यूरेट औफ पोटाश का प्रयोग प्रति बीघा में करें. 25-30 दिन की पौध होने पर निराई के बाद 17 किलोग्राम यूरिया डालें.

सवाल : मोटे अनाजों से प्रति बीघा कितनी उपज ली जा सकती है?

सांवा, कोदो, चीना एवं काकुन की जल्दी पकने वाली प्रजातियों की 3-4 क्विंटल और मध्यम एवं देर से पकने वाली प्रजातियों की उपज 3.50 से 4.50 क्विंटल प्रति बीघा तक उपज ली जा सकती है.

सवाल : मोटे अनाज के साथ अंत:खेती किस के साथ की जा सकती है?

अरहर, ज्वार, मक्का के साथ आसानी से मोटे अनाजों की अंत:खेती की जा सकती है.
………..

– प्रो. रवि प्रकाश मौर्य, सेवानिवृत्त वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष, निदेशक प्रसार्ड ट्रस्ट, मल्हनी, भाटपार रानी, देवरिया (उत्तर प्रदेश) – 274702

मोटे अनाज और जैविक खेती अपनाएं किसान- साभा कुंवर कुशवाहा

कृषि एवं ग्रामीण विकास ट्रस्ट, मल्हनी, भाटपार रानी के तत्त्वावधान में 10 मार्च, 2023 को कृषि एवं ग्रामीण विकास पर एक गोष्ठी का आयोजन ट्रस्ट प्रक्षेत्र कार्यालय, लक्षमणपुर रोड, महुआवारी मेला (मल्हना) में किया गया.

इस गोष्ठी का उद्घाटन भाटपार रानी विधानसभा क्षेत्र के विधायक साभा कुंवर कुशवाहा द्वारा किया गया. अपने उद्धघाटन भाषण में उन्होंने मोटे अनाजों की खेती पर अपना अनुभव साझा किया और बताया कि ‘श्रीअन्न योजना’ सरकार द्वारा लागू की गई है, जिस में मोटे अनाज जैसे ज्वार, बाजरा, मड़ुवा, सावा, टागुन और चीना की खेती किसान करें, क्योंकि ये सभी अनाज सेहत के लिए फायदेमंद हैं.

इस मौके पर मुख्य अतिथि ने ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित वित्तीय कलैंडर 2023-24 और राइटिंग पैड का विमोचन भी किया.

इस ट्रस्ट के निदेशक प्रोफैसर रवि प्रकाश मौर्य ने अतिथियों का स्वागत करते हुए बताया कि ट्रस्ट के एक साल पूरा होने के मौके पर पहली वर्षगांठ मनाई जा रही है. यह ट्रस्ट फरवरी, 2022 में बनी थी, जिस का मुख्य उद्देश्य कृषि एवं ग्रामीण विकास के लिए सकारात्मक पहल करना, शिक्षा, कृषि शिक्षा, शोध, प्रसार एवं सामुदायिक विकास के उत्थान के लिए कार्य करना, प्राकृतिक, जैविक एवं टिकाऊ खेती को बढ़ावा देना, कृषि एवं ग्रामीण विकास के क्षेत्र में विशेष परामर्श सेवा प्रदान करना, आवश्यकता आधारित प्रशिक्षण, कार्यशाला, संगोष्ठी, प्रक्षेत्र दिवस, किसान मेला एवं प्रदर्शनी का आयोजन करना तथा कृषक उत्पादक संगठन को बढावा देना है.

इस ट्रस्ट में अपने उद्देश्यों को ध्यान में रख कर कृषि एवं ग्रामीण विकास गोष्ठी का आयोजन किया गया है.

आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या की अधिष्ठाता परास्नातक अध्ययन प्रोफैसर सुमन प्रसाद मौर्य ने महिलाओं के सशक्तीकरण पर प्रकाश डाला और बताया कि उत्तर प्रदेश कृषि सयुंक्त प्रवेश परीक्षा, का फार्म निकला है. उसे www.nduat.org या https://upcatetexam.net पर देखा जा सकता है. आवेदन करने की अंतिम तिथि 20 अप्रैल, 2023 है. इस की प्रवेश परीक्षा 30-31मई, 2023 को होगी. जो छात्र/छात्राएं कृषि, विज्ञान से इंटर की परीक्षा दे चुके हैं या इंटर पास हैं, वे कृषि, उद्यान, कृषि अभियंत्रण, पशुचिकित्सा, मत्स्यपालन आदि में प्रवेश हेतु आवेदन कर सकते हैं. साथ ही सामुदायिक विज्ञान में किसान अपनी बच्चियों को पठनपाठन हेतु प्रेरित करें.

फार्मर्स फेस के प्रबंध निदेशक मोहन मुरारी सिंह ने जैविक, प्राकृतिक एवं टिकाऊ खेती पर प्रकाश डाला. कृषि विज्ञान केंद्र, मल्हना के प्रभारी अधिकारी डा. रजनीश श्रीवास्तव ने कृषक उत्पादक संगठन के गठन से लाभ की जानकारी दी. डा. विकास मौर्य ने फिजियोथैरेपी की जानकारी दी.

नूतन बीज भंडार, तरकुलहा के प्रबंधक राजबल्लभ कुशवाहा ने बीज उत्पादन पर जानकारी दी. इस कार्यक्रम में देवरिया जनपद के साथसाथ सीवान, गोपालगंज (बिहार) के 250 से अधिक किसानों, प्रसार कार्यकर्ताओं, अधिकारियों ने भाग लिया.

वरिष्ठ समाज सेवी, अध्यापक कृषकों को माला पहना कर और अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानित किया गया. सभी आए कृषकों, अधिकारियों को वर्ष 2023-24 कलैंडर बांटे गए. सभी ने फलफूल, सब्जियों की खेती और मशरूम उत्पादन प्रक्षेत्र का अवलोकन किया.