Poultry Farming : वैज्ञानिक तरीके से करें मुरगीपालन

Poultry Farming : पशुपालन के क्षेत्र में अनेक ऐसे काम हैं, जिन्हें कर के अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है. इन में मुरगीपालन (Poultry Farming) भी एक ऐसा व्यवसाय है, जिस की शुरुआत कम पूंजी, कम समय, कम मेहनत और कम जगह में की जा सकती है.

मुरगीपालन (Poultry Farming) का काम खासकर अंडे व मांस के लिए किया जाता है. मुरगीपालन (Poultry Farming)  व्यवसाय को फायदेमंद बनाने के लिए निम्नलिखित मुलभूत बातों की जानकारी होनी अति आवश्यक है. इस काम को शुरू करने से पहले मुरगीपालन में प्रशिक्षण लेना निश्चित ही फायदेमंद रहता है.

इस के लिए अपनी नजदीकी कृषि संसथा, कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क करना चाहिए.

हरियाणा के लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय में भी पशु फार्म कौम्प्लैक्स विभाग है. वहां से भी आप पशुपालन, मुरगीपालन (Poultry Farming) आदि की जानकारी और ट्रेनिंग ले सकते हैं.

उत्तम नस्ल का चयन

मुरगीपालन (Poultry Farming) के लिए अगर अच्छा मुनाफा लेना है तो उत्तम नस्ल का चयन करें. अंडा उत्पादन के लिए मुख्यतः वाइट लेगहोर्न नस्ल की मुरगियां उत्तम रहती है. अपने भोगौलिक क्षेत्र व जलवायु के हिसाब से हरले (अंडा उत्पादन), असील, कड़कनाथ, धनराजा (मांस उत्पादन) इत्यादि नस्लें उपयुक्त हैं. आजकल बाजार में संकर नस्ल की मुरगियां भी उपलब्ध हैं जो अंडा व मांस के लिए काफी लाभदायक हैं.

जगह का चयन

मुरगी फार्म की जगह समतल हो और कुछ ऊंचाई पर हो, जिस से कि बारिश का पानी फार्म में जमा न हो सके. इस के साथसाथ बिजली और पानी की सुविधा सही रूप से उपलब्ध होनी चाहिए. शैड (छप्पर) हमेशा पूर्वपश्चिम दिशा में होना चाहिए और शैड की जाली वाला साइड़ उत्तर-दक्षिण में होना चाहिए, जिस से कि हवा सही रूप से शैड के अंदर से बह सके और धूप अंदर ज्यादा न लगे.

Poultry Farming

आहार प्रबंधन

अच्छा उत्पादन व लाभ प्राप्त करने के लिए मुरगियों के आहार पर ध्यान देना आवश्यक है. मुरगीपालन (Poultry Farming) में आहार सब से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि सब से ज्यादा खर्च इसी में होता है और आहार अंडा उत्पादन को भी प्रभावित करता है.

मुरगियों के भोजन में मक्का, गेहूं चोकर, चावल की पौलिश, सोयाबीन खल, फिश मील, मूंगफली की खल तथा लवण मिश्रण और नमक होना चाहिए.

प्रजनन प्रबंधन

आमतौर पर ऐसा देखा जाता है कि एक बार मुरगी खरीदने के बाद एक झुंड में उन्हीं से बारबार प्रजनन करवाया जाता है, जिन से इन ब्रीडिंग (अतः प्रजनन) के दुष्प्रभाव सामने आते हैं. इस से अंडों की संख्या और मांस वृद्धि में कमी आती है और चूजों की मृत्युदर बढ़ती है. लिहाजा, इन्हें प्रतिवर्ष बदल देना चाहिए. मुरगी फार्म पर प्रजनन के लिए नर और मादा का अनुपात 1:10-12 से अधिक नहीं होना चाहिए.

बरतनों की जानकारी

प्रत्येक 100 चूजों के लिए कम से कम 2×5 लिटर क्षमता वाले पानी के बरतन और 2×5 किलोग्राम क्षमता वाले दाने के बरतन होने आवश्यक हैं.

बिछावना व ब्रूडिंग से जुड़ी जानकारी

बिछावनों के लिए आप लकड़ी का बुरादा, मूंगफली का छिल्का, गेहूं/जई की तूड़ी या धान का छिलका उपयोग कर सकते हैं. बिछावन नया होना चाहिए और उस में किसी भी प्रकार का संक्रमण न हो. बिछावन की मोटाई 2-3 इंच होनी चाहिए.

ब्रूडिंग कई प्रकार से की जाती है जैसे बिजली के बल्ब या अंगीठी/सिगड़ी से, इसलिए आप को अपनी सुविधा के अनुसार इस का चुनाव करना होगा.

बीमारियों से रोकथाम

मुरगियों को विभिन्न प्रकार के संक्रामक रोग जैसे कि मेरेक्स, रानीखेत, गुंबोरो व फाउल पावक्स आदि हो सकते हैं. इन से बचाव के लिए समय पर टीकाकरण अवश्य करा लें. मुरगी फार्म में समयसमय पर कीटनाशक धुआं और चूने का प्रयोग करना चाहिए. बीमार मुरगियों को अलग कर देना चाहिए. यदि कोई मुरगी बीमार हो कर मर गई हो तो उसे स्वस्थ मुरगियों से तुरंत अलग कर देना चाहिए और पशु डाक्टर से संपर्क करें. मरी मुरगी का पोस्टमार्टम करवा कर मृत्यु के संभावित कारणों का पता लगाना चाहिए.

मुरगीपालन में सामान्य प्रबंधन

मुरगी आवास का आकार बड़ा होना चाहिए, ताकि पर्याप्त शुद्ध हवा पहुंच सके और नमी न रहे. मुर्गी संख्या 5-7 प्रति वर्गमीटर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए.

एक मुरगी फार्म से दूसरे मुरगी फार्म में उचित दूरी रहनी चाहिए.

मुरगियों का कुत्ते, गीदड़, बिलाव, चील आदि से बचाव करना चाहिए.

मुरगियां खरीदते समय उन का उचित डाक्टरी परिक्षण करा लेना चाहिए और नई मुरगियों को कुछ दिनों तक अलग रख कर यह निश्चय कर लेना चाहिए कि वे किसी रोग से ग्रस्त तो नहीं हैं न. पूरी सावधानी बरतने पर भी कुछ रोग हो जाए, तो रोगानुसार इलाज कराएं.

Dairy Farming : वैज्ञानिक तरीके से करें डेयरी फार्मिंग

Dairy Farming : भारत में बड़े पैमाने पर दूध का कारोबार होता है. किसान खेती के साथसाथ पशुपालन भी करता आया है, ताकि उसे दोहरा लाभ हो. पशुपालन करने से उसे दूध उत्पादन के अलावा खेती में काम आने वाली गोबर की खाद भी मिलती है. अगर चाहे तो वह उस के गोबर से गोबर गैस प्लांट भी लगा सकता है.

भारत में छोटाबड़ा हर तबके का किसान है और डेयरी फार्मिंग (Dairy Farming) भारत में छोटे व बड़े दोनों स्तर पर सब से ज्यादा विस्तार से फैला हुआ व्यवसाय है, इसलिए डेयरी व्यवसायी वैज्ञानिक विधि से पशुपालन कर अधिक मुनाफा ले सकते हैं.

डेयरी व्यवसाय को फायदेमंद बनाने के लिए लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय हिसार द्वारा दी गई बहुत ही महत्त्वपूर्ण जानकारी बड़े ही आसान तरीके से यहां बताई गई है, जिस का लाभ निश्चित ही पशुपालकों को मिलेगा.

करें उत्तम नस्ल का चयन

डेयरी फार्मिंग (Dairy Farming ) में अधिक दूध उत्पादन के लिए अच्छी नस्ल के पशुओं का चयन करना चाहिए. देशी नस्लों में साहीवाल, रैड सिंधी, गिर, थारपारकर जबकि विदेशी नस्लों में होलस्टीन फ्रीजीयन व जर्सी अच्छी दुधारु नस्लें हैं. संकर नस्लों में हरधेनु व फ्रीजवाल अच्छी नस्लें हैं और हरियाणा नस्ल की गाय भी अपने क्षेत्र की उत्तम नस्ल है. भैसों में मुर्राह नस्ल सब से अच्छी दुधारु नस्ल है. यह सभी नस्ल अच्छा दूध उत्पादन देती हैं और पशुपालक अपनी पहुंच के हिसाब से किस्म का चयन डेयरी फार्मिंग का काम कर सकता है

पशुओं का आवास प्रबंधन

यदि पशु का आवास स्वच्छ व आरामदायक होगा तो निश्चिततौर पर पशु का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा और वह अपनी क्षमता अनुसार अधिक दूध का उत्पादन करेगा, इसलिए पशु के लिए स्वच्छ और आरामदायक आवास की व्यवस्था करें.

प्रजनन प्रबंधन

गाय/भैंसों का कृत्रिम गर्भाधान अथवा अच्छी नस्ल के प्रमाणित सांड से उचित समय पर गर्भाधान कराएं. गरमी में आने के 10-12 घंटे बाद ही पशुओं में गर्भाधान करवाएं. 2 ब्यांतों में उचित अंतराल के लिए ब्याने के 40 से 90 दिन के अंदर कृत्रिम गर्भाधान कराएं.

पशुओं का आहार प्रबंधन

पशु के कुल आहार में सूखे पदार्थ के आधार पर दोतिहाई भाग चारा और एकतिहाई भाग दाने का मिश्रण मिला कर देना चाहिए. मोटेतौर पर एक वयस्क गाय को प्रतिदिन 30-35 किलो हरा चारा, 5-6 किलो सूखा चारा (तूड़ा) व 1-1.5 किलो दाना पर्याप्त रहता है. इस के अलावा दुधारु पशुओं में गाय को प्रति 2.5 किलो दूध के लिए 1 किलो व भैंस को प्रति 2 किलो दूध के लिए 1 किलो अतिरिक्त दाना देना चाहिए. गर्भावस्था के दौरान गाय को 1.25 किलो तथा भैस को 1.75 किलो अतिरिक्त दाना देना चाहिए.

स्वच्छ दुग्ध उत्पादन

सामान्यतः हानिकारक जीवाणुओं और गंदगी रहित दूध को स्वच्छ दूध कहते हैं. इस के लिए पशुघर में साफसफाई रखनी चाहिए और अच्छी तरह से धोए हुए बरतनों का ही उपयोग करना चाहिए. दूध साफ व शांत वातावरण में निकालना चाहिए. ज्यादा पशुओं के लिए दूध निकालने की मशीन (मिल्किंग मशीन) का उपयोग भी किया जा सकता है. मिल्किंग मशीन से काम समय में अच्छी क्वालिटी का शुद्ध दूध प्राप्त होता है.

नवजात की देखभाल

नवजात बछड़ा/बछड़ी को जन्म के 20 से 30 मिनट के अंदर खीस पिलानी चाहिए. खीस नवजात पशु को रोग निरोधक शक्ति प्रदान करता है. खीस सामान्यतः नवजात के भार के 1/10 भाग के बराबर पिलाएं. साधारणतः नाल अपनेआप टूट जाती है, अगर जुड़ी रहे तो नए ब्लेड से 2.5 इंच छोड़ कर काट दें व 3 से 4 दिन तक टिंक्चर आयोडीन लगाएं.

बीमारियों से रोकथाम

संक्रामक रोगों (गलघोंटू व मुंह खुर इत्यादि) की रोकथाम के लिए नियमित टीकाकरण करवाएं. दुधारु पशुओं में होने वाले थनैला रोग से बचाव के उपाय करने चाहिए. इस के लिए पशुघर की नियमित सफाई करें व थनों और लेवटी को लाल दवा के घोल से धोएं. हर 3 से 4 महीने में पशुओं को पेट के कीड़ों से मुक्त करने की दवा दें.

इस के अलावा पशु अगर सुस्त दिखाई दे या किसी बीमारी की आशंका हो तो पशु डाक्टर को जरूर दिखाएं और पशुओं का समय पर टीकाकरण करवाएं.

Milking Machine : मिल्किंग मशीन से गुणवत्तायुक्त दूध उत्पादन

Milking Machine : आमतौर पर पशुओं से दूध दुहने का काम हाथों से ही किया जाता रहा है लेकिन अब डेयरी फार्मिंग में नईनई तकनीकें सामने आ गई हैं. पुराने तौरतरीके बदल रहे हैं. खेती और पशुपालन में अनेक तरह के आधुनिक कृषि यंत्र आ गए हैं, जो काम को आसान बना रहे हैं. ऐसी ही एक मशीन है जो पशुओं का दूध निकालने का काम करती है, जिसे मिल्किंग मशीन (Milking Machine) यानी दूध दुहने की मशीन कहा जाता है. इस मशीन से दुध निकालना काफी आसान है और इस से दूध का उत्पादन भी बढ़ जाता है.

बड़े स्तर पर पशुपालन करने वाले या डेयरी फार्मिंग में इस मिल्किंग मशीने (Milking Machine) का उपयोग हो रहा है. इस मशीन से दुधारू पशुओं का दूध बड़ी ही आसानी से निकाला जा सकता है. इस से पशुओं के थनों को कोई नुकसान नहीं होता है और दूध की गुणवत्ता बनी रहती है. यह मशीन थनों की मालिश भी करती है. इस मशीन से गाय को वैसा ही महसूस होता है, जैसे वह अपने बच्चे को दूध पिला रही हो.

हो सकता है कि शुरुआत में पशु को कुछ दिक्कत महसूस हो, लेकिन बाद में पशु को इस की आदत हो जाती है.

मिल्किंग मशीने (Milking Machine) से दूध निकालने से समय की भी बचत होती है और दूध में किसी प्रकार की गंदगी नहीं आती है. पशुपालक के दूध निकालते समय खांसने व छींकने से होने वाले प्रदूषण से भी दूध बचा रहता है.

मिल्किंग मशीन (Milking Machine) को आज बहुत सी कंपनियां बनाती हैं और पशुपालकों को ये आसानी से उपलब्ध हैं, जिन की कीमत लगभग 35 हजार से शुरू होती है.

वैनसन मिल्किंग मशीन

वैनसन पशुओं का दूध दुहने की मशीन बनाने वाली कंपनी है, जो देश के अलगअलग राज्यों में और पशुपालन के अनेक क्षेत्रों में काम कर रही है. हजारों पशुपालकों तक पहुंच बनाने वाली इस मिल्किंग मशीन में मौडर्न तकनीक इस्तेमाल की गई है. इस मिल्किंग मशीन की खूबी यह है कि दूध दुहते समय दुधारू पशु को ऐसा ही महसूस होता है जैसे कि उस का बछड़ा दूध पी रहा हो. इस से पशु को कोई परेशानी नहीं होती है. दूध उत्पादन भी बढ़ता है और पशु के थन भी पूरी तरह से स्वस्थ रहते हैं. दूध पशु के थनों से पाइपों के जरीए सीधा स्टील के बंद डब्बों में पहुंचता है.

ज्यादातर पशुपालक मिल्किंग मशीन (Milking Machine) का इस्तेमाल गाय का दूध निकालने में करते हैं, क्योंकि इस मशीन की प्राथमिकता गाय का दूध निकालने की होती है.

अगर भैंस का दूध निकालने के लिए इस मशीन का इस्तेमाल करना है, तो इस में मामूली बदलाव की जरूरत होती है. भैंस का दूध निकालने के लिए मिल्किंग मशीन (Milking Machine) में खास तरह के ‘बबुलस लाइनर’ का उपयोग किया जाता है, इसलिए इस की जानकारी बेहद जरूरी है.

बकेट मिल्किंग मशीन (Milking Machine) 5 से 50 पशुओं के फार्म के लिए उपयोगी है.

उपलब्ध मौडल : इस में अनेक प्रकार के मौडल आते हैं. पशुपालक अपनी मांग के अनुसार मौडल का चुनाव कर सकते हैं. इस तरह के मौडल के लिए यह मशीन कैरोसिन, पैट्रोल इंजन के साथ भी उपलब्ध है.

एक बकेट : यह 10-15 पशुओं से दूध निकालने के लिए पर्याप्त है.

2 बकेट : 2 बकेट वाला मौडल 15-30 पशुओं के लिए पर्याप्त है.

4 बकेट : यह मौडल 30-50 पशुओं के लिए पर्याप्त है.

6 बकेट : यह 50 से अधिक पशुओं के लिए ठीक है.

डेयरी फार्मिंग करने वालों के लिए अधिक बकेट वाले मौडल ही उपयोग करते हैं, क्योंकि उन के पास दुधारू पशु भी अधिक होते हैं.

मोबाइल मिल्किंग मशीन

जैसा कि नाम से ही पता चल रहा है. इस यंत्र को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना आसान है. इस के अलावा इस मिल्किंग मशीन (Milking Machine) से एकसाथ 8-10 पशुओं का दूध भी निकाला जा सकता है. एक मशीन 20 से 30 पशुओं के लिए पर्याप्त है.

उपलब्ध मौडल : एक बकेट वाला मौडल 10-15 पशुओं के लिए पर्याप्त है और 2 बकेट वाला मौडल 15-30 पशुओं के लिए पर्याप्त है.

वैनसन का ‘लाइन मिल्कर’ :

‘लाइन मिल्कर’ बकेट सिस्टम और पार्लर सिस्टम के बीच का दूध दुहने का सैटअप है. इस की कई खासीयतें हैं, जैसे :

-पुरजों की कम घिसावट और रखरखाव में आसान है.

-पिट या पार्लर बनाने की जरूरत नहीं है.

-यह किसी भी प्रकार के शैड में लगाया जा सकता है.

-सफाई करने में कम समय लगता है.

-दूध एक ही जगह पर इकट्ठा किया जा सकता है.

-40 से 60 पशुओं के फार्म के लिए उपयोगी है.

वैनसन मिल्किंग पार्लर की बड़ी रेंज 

बड़े पैमाने पर डेयरी फार्मिंग करने वालों के लिए यह कंपनी अलगअलग प्रकार के मिल्किंग पार्लर बनाती है, जैसे : हैरिंग बोन पार्लर, स्विंग ओवर पार्लर, रैपिड ऐक्जिट पार्लर और रोटरी पार्लर.
वैनसन आटोमैटिक पार्लर में आफिमिल्क, इजराइल की टैक्नोलौजी इस्तेमाल की गई है. आफिमिल्क दुनिया की सब से बड़ी आटोमेशन कंपनी है. मिल्किंग पार्लर में हर गाय की सूचना नोट की जाती है. यह सूचना अपनेआप सौफ्टवेयर में चली जाती है.

आखिर में हम बताना चाहेंगे कि पशुपालक अपनी जरूरत के मुताबिक ही मिल्किंग मशीन (Milking Machine) के चुनिंदा मौडल का चुनाव कर सकता है. अधिक जानकारी के लिए इस मिल्किंग मशीन बनाने वाली कंपनी में फोन नंबर 9811104804, 8510088892 पर बात कर के ले सकते हैं या इन की वैबसाइट www.vansunmilking.com पर भी देख कर अधिक कुछ जान सकते हैं.

मिल्किंग मशीनों पर मिलती है सब्सिडी

अलग अलग राज्य सरकार मिल्किंग मशीनों (Milking Machine) की खरीदने पर सब्सिडी भी दे रही है, इसलिए पशुपालकों को इस के लिए अपने जिले के पशुपालन अधिकारी और बैंकों के कृषि और पशुपालन विभाग के अधिकारियों से संपर्क करना चाहिए.

Green Fodder : हरे चारे की अधिकता के लिए उन्नत किस्में

Green Fodder: चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में आयोजित कृषि मेला ‘रबी’ के समापन समारोह के अवसर पर लुवास विश्वविद्यालय के कुलपति डा. विनोद कुमार वर्मा विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित हुए.

इस अवसर पर उन्होंने कहा कि इस वर्ष कृषि मेले का जो विषय (प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन) रखा गया गया है, वह वर्तमान समय की मांग है और उन्होंने बताया कि पशुपालन क्षेत्र में भी प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन महत्त्वपूर्ण है. हरे चारे (Green Fodder) की अधिक पैदावार के लिए हमें उन्नत किस्में और साईलेज तकनीक अपनानी होगी. गोबर और बायोगैस का उपयोग कर हम ऊर्जा व खाद दोनों प्राप्त कर सकते हैं. पशुओं को संतुलित आहार, खनिज मिश्रण और उचित देखभाल दे कर हम दूध उत्पादन और उन की सेहत को बेहतर बना सकते हैं.

उन्होंने पशुपालकों से कहा कि वे अपने खेत और पशुधन को संसाधन नहीं, बल्कि पूंजी समझें. यदि हम जल, मिट्टी, वनस्पति और पशुओं की सही देखभाल करेंगे तो यही संसाधन हमें दोगुनीतिगुनी आय देंगे.

डा. विनोद कुमार वर्मा ने इस दौरान कहा कि पशुपालन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी से ही किसानों की आमदनी बढ़ाई जा सकती है. इसी उद्देश्य से लुवास ने महिलाओं के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए हैं. लुवास विश्वविद्यालय द्वारा दुग्ध प्रसंस्करण, खनिज मिश्रण निर्माण और आधुनिक पशुपालन तकनीकों पर प्रशिक्षण आयोजित किए जाते हैं, जो स्वरोजगार और आय वृद्धि के लिए उपयोगी हैं.

डा. विनोद कुमार वर्मा ने बताया कि विश्वविद्यालय पशुपालन से संबंधित पशुपालकों की सभी समस्याओं के हल के लिए तत्पर है. पशुपालक विश्वविद्यालय या इस के क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्रों की मदद ले कर अपने पशुओं के उत्पादन में वृद्धि, नस्ल सुधार आदि अपना कर अपनी आय को बढ़ा सकते हैं.

किसान मेले में लुवास के कुलपति डा. विनोद कुमार वर्मा ने लुवास के विभिन्न विभागों द्वारा लगाए गए स्टालों का निरीक्षण किया. इन स्टालों के माध्यम से विश्वविद्यालय की नवीनतम शोध और तकनीक किसानों तक पहुंचाई गई. पशुपालकों ने लुवास स्टालों में गहरी रुचि दिखाई और मौके पर विशेषज्ञों से पशु रोग संबंधी समस्याओं का समाधान प्राप्त किया.

इस दौरान विस्तार शिक्षा निदेशक डा. राजेश खुराना विस्तार शिक्षा निदेशालय से डा. सरिता, जनसंपर्क अधिकारी डा. निलेश सिंधु व लुवास के अन्य अधिकारी, विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्ष व अन्य कर्मचारी उपस्थित रहे.

Krishi Vigyan Kendra : वैज्ञानिक सलाहकार समिति की बैठक

Krishi Vigyan Kendra : आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या द्वारा संचालित कृषि विज्ञान केंद्र (Krishi Vigyan Kendra) बलिया पर वैज्ञानिक सलाहकार समिति की 25वीं बैठक हुई. बैठक की अध्यक्षता विश्वविद्यालय प्रतिनिधि डा. जेपी सिंह प्रभारी कृषि विज्ञान केंद्र गाजीपुर ने की. कार्यक्रम में मुख्य अतिथि प्रगतिशील किसान उपेंद्र सिंह राय थे. अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय प्रतिनिधि डा. जेपी सिंह प्रभारी कृषि विज्ञान केंद्र गाजीपुर, डा. संजीत कुमार वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष कृषि विज्ञान केंद्र बलिया, अलका श्रीवास्तव जिला उद्यान अधिकारी बलिया, मोहित यादव डीडीएम नाबार्ड, प्रगतिशील किसान उपेंद्र सिंह, संतोष कुमार सिंह, हरेराम चौरसिया, अनंत कुमार सिंह, विमलेश राय, मणि शंकर तिवारी, आनंद सिंह, सुशील श्रीवास्तव आदि प्रगतिशील किसानों के साथ मौजूद रहे.

केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डा. संजीत कुमार ने बैठक में उपस्थित सभी अधिकारियों, कर्मचारीगण वैज्ञानिकों एवं प्रगतिशील किसानों का स्वागत किया, उन्होंने कहा कि कृषि विज्ञान केंद्र (Krishi Vigyan Kendra) बलिया जनपद के किसानों एवं खेतीबारी से जुड़े लोगों, व्यावसायियों को एकीकृत कृषि प्रणाली, उन्नत बीज उत्पादन तकनीक, सब्जियों की वैज्ञानिक खेती, मशरूम उत्पादन तकनीक, केंचुआ खाद उत्पादन तकनीक, नाडेप उत्पादन तकनीक, सब्जियों के नर्सरी उत्पादन तकनीक, प्राकृतिक खेती, फलों एवं सब्जियों का संरक्षण, पशुपालन, बकरीपालन, मुरगीपालन, मधुमक्खीपालन, विभिन्न फसलों में एकीकृत पोषक तत्त्व प्रबंधन, एकीकृत कीट एवं रोग प्रबंधन, भंडारगृह में बीज एवं कृषि उत्पादों का संरक्षण, बीज संसाधन एवं विपणन, कृषि उत्पादों का विपणन आदि विषयों पर प्रशिक्षण प्रदान कर के जनपद के किसानों, महिलाओं, एफपीओ के पदाधिकारियों/सदस्यों एवं ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षित कर रहा है, जिस से किसानों द्वारा उत्पादित फसल लागत कम कर के किसानों की आय वास्तविक आय मे वृद्धि के साथसाथ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर भी बढ़ रहे हैं.

इस कार्यक्रम में केंद्र के वैज्ञानिकों डा. सोमेंद्र नाथ ने शस्य विज्ञान, डा. मनोज कुमार ने पादप प्रजनन एवं अनुवंशिकी, डा. अभिषेक यादव ने पादप सुरक्षा, डा. अनिल पाल ने मृदा विज्ञान, डा. अवधेश कुमार ने उद्यान विज्ञान के साथसाथ अपनेअपने अनुभाग की प्रगति आख्या एवं वर्ष 2025-26 की कार्ययोजना प्रस्तुत की. प्रक्षेत्र प्रबंधक डा. सतीश कुमार यादव ने केंद्र के प्रक्षेत्र की वार्षिक प्रगति आख्या एवं वर्ष 2025-26 की कार्ययोजना प्रस्तुत की.

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय प्रतिनिधि डा. जेपी सिंह ने कहा कि कृषि विज्ञान केंद्र (Krishi Vigyan Kendra) बलिया वास्तव में कड़ी मेहनत, लगन एवं उत्साहपूर्वक कार्य कर रहा है जो केंद्र की व्यवस्था, वैज्ञानिकों द्वारा प्रस्तुतिकरण, किसानों से साथ संवाद एवं केंद्र के प्रक्षेत्र भ्रमण के अवलोकन से स्पष्ट दिखाई दिया. इस के लिए मैं केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डा. संजीत कुमार तथा केंद्र के वैज्ञानिकों/कर्मचारियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं देता हूं. साथ ही साथ डा. जेपी सिंह ने किसानों एवं एफपीओ संचालकों से संवाद कर उन की प्रगति के बारे में विस्तृत जानकारी लेते हुए खेतीबारी के विकास के बारे में विस्तृत चर्चा की. उन्होंने बैठक में उपस्थित सभी वैज्ञानिकों, अधिकारियों, किसानों के साथ केंद्र पर चल रही प्राकृतिक खेती प्रदर्शन इकाई, केंचुआ खाद उत्पादन इकाई, नाडेप खाद उत्पादन इकाई, बीज उत्पादन इकाई, मशरूम उत्पादन इकाई, अरहर की मेंड़ पर बोई गई फसल, मक्का की फसल में एकीकृत पोषक तत्त्व प्रबंधन प्रदर्शन इकाई, एकीकृत बागबानी प्रदर्शन इकाई आदि का अवलोकन किया.

इस कार्यकम में केंद्र के सभी वैज्ञानिकों सहित कार्यालय अधीक्षक अमित तिवारी, कार्यक्रम सहायक धर्मेंद्र कुमार, स्टेनोग्राफर राकेश कुमार सिंह, परिचर राम तोल आदि के साथसाथ जनपद के लगभग 35 प्रगतिशील किसान उपस्थित रहे.

Fish Farming : मत्स्यपालन उत्पादन हुआ दोगुना से ज्यादा

Fish Farming : उत्तर प्रदेश में मत्स्यपालन (Fish Farming) के विकास हेतु पर्याप्त जल संसाधन उपलब्ध हैं, जिन का सदुपयोग करते हुए प्रदेश को मत्स्य उत्पादन के क्षेत्र में रोजगार के अवसर सृजित करते हुए आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है. भारत को विकसित राष्ट्र बनाए जाने में मत्स्यपालन (Fish Farming) की महत्त्वपूर्ण भूमिका हो सकती है. प्रदेश में पर्याप्त जल संसाधन उपलब्ध होने के फलस्वरूप मत्स्य विकास के अनुकूल अवसर एवं प्रचुर संभावनाएं हैं. प्रदेश में गंगा, यमुना, चंबल, बेतवा, गोमती, घाघरा, राप्ती नदी सहित कई सदा बहने वाली नदियां हैं, जिन के दोनों किनारे और आसपास मछुआ समुदाय की घनी आबादी निवास करती है, जो आजीविका हेतु मत्स्यपालन, मत्स्याखेट और मत्स्य विपणन कार्यों पर निर्भर है.

मत्स्यपालन (Fish Farming) के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में बेकार पड़ी कृषि हेतु अनुपयुक्त भूमि तालाब, पोखरों, जलाशयों का उपयोग कर के अतिरिक्त आय अर्जित की जा सकती है. प्रदेश सरकार ग्रामीण अंचल के विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और समाज के निर्बल, भूमिहीन, मजदूर एवं बेरोजगार व्यक्तियों को रोजगार के साधन जुटाने और सामाजिक व आर्थिक दशा सुधारने का एक अच्छा अवसर सुलभ करा रही है.

प्रदेश को वन ट्रिलियन डौलर इकोनौमी बनाने में प्रदेश में सब से तेज वृृद्धि मत्स्य उत्पादन की है. वर्ष 2018 में प्रदेश में मछली उत्पादन 6.3 लाख मीट्रिक टन था, जो वर्ष 2025 में बढ़ कर 13.3 लाख मीट्रिक टन हो गया है. यह दोगुने से भी अधिक की वृद्धि है. वर्ष 2022-23 की तुलना में पिछले 3 वर्षों में 50 प्रतिशत से अधिक मत्स्य उत्पादन की वृृद्धि हुई है. वित्तीय वर्ष 2023-24 में 26 फीसदी की रिकौर्ड वार्षिक वृृद्धि हुई है. वर्ष 2020 से अब तक राज्य एवं केंद्र पुरोनिधानित योजनाओं के अंतर्गत कुलमिला कर 15,542 लाभार्थी लाभान्वित हुए हैं, जिन्हें अब तक कुल 437.26 करोड़ रुपए का अनुदान दिया गया है.

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना

मत्स्य विभाग उत्तर प्रदेश में नीली क्रांति योजना वर्ष 2019-20 तक संचालित थी जिस के स्थान पर भारत सरकार द्वारा नई उपयोजनाओं को सम्मिलित कर योजनाओं की प्रोजैक्ट कास्ट में वृद्धि करते हुए प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना संचालित की है.

इस योजना का उद्देश्य मात्स्यिकी उत्पादन में विस्तारीकरण में सघनता लाना, विविधीकरण के माध्यम से वृद्धि करना और भूमि व जल का उपजाऊ उपयोग करना है. वर्ष 2020 से वर्ष 2025 तक संचालित इस योजना के अंतर्गत केंद्र पोषित एवं केंद्र पुरोनिधानित परियोजनाएं संचालित हैं. केंद्र पुरोनिधानित परियोजनाएं लाभार्थीपरक और अलाभार्थीपरक प्रकृति की हैं.

केंद्र पोषित परियोजनाओं में अनुदान की धनराशि का सौ फीसदी वहन केंद्र सरकार द्वारा किया जा रहा है. केंद्र पुरोनिधानित परियोजनाओं में अनुदान की धनराशि में से 60 फीसदी अंश केंद्र सरकार द्वारा और 40 फीसदी अंश राज्य सरकार द्वारा वहन किया जा रहा हैं. इस के अंतर्गत सामान्य वर्ग को 40 प्रतिशत अनुदान और महिला व अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग को 60 फीसदी अनुदान दिया जाता है.

संदर्भित योजना के अंतर्गत 31 परियोजनाओं का संचालन किया जाता है. विभागीय पोर्टल पर औनलाइन आवेदन जनपद स्तर पर जिलास्तरीय समिति द्वारा आवेदनपत्रों का निस्तारण, तत्पश्चात पात्र आवेदकों का भारत सरकार से प्राप्त प्रशासनिक अनुमोदन के सापेक्ष लक्ष्य एवं धनराशि का आवंटन किया जाता है.

प्रदेश में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत 2,210 हेक्टेयर तालाब का निर्माण, 282 हेक्टेयर रियरिंग इकाई, 1,045 बायोफ्लौक, 67 मत्स्य बीज हैचरी, 1,099 आरएएस, 1,286 बैकयार्ड आरएएस, 47 इंसुलेटेड व्हीकल, 338 मोटरसाइ‌किल, 110 थ्रीव्हीलर, 2210 साइकिल, 71 कियोस्क, 100 जिंदा मछली विक्रय केंद्र, 935 केज, 155 फीड मिल, 4 मोवाइल लैब और 4 और्नामैंटल रियरिंग यूनिट के काम पूरे कराए गए.

प्रदेश में केंद्र पुरोनिधानित परियोजनांतर्गत वर्ष 2020-21 से 2023-24 तक 11,654 लाभार्थी अनुदानित, जिन का कुल परियोजना लागत 1,158.55 करोड़ रुपए रहा है. वर्ष 2020-21 से 2023-24 तक अनुसूचित जाति के 1,384, महिला के 4,344, सामान्य वर्ग के 5,926 लाभार्थियों हेतु क्रमशः 47.86 रुपए, 222.40 रुपए, और 139.76 रुपए; कुल 410.02 करोड़ रुपए धनराशि का अनुदान वितरित किया गया है.

वर्ष 2024-25 के सापेक्ष वर्ष 2025-26 में 1650 लाभार्थी अनुदान हेतु चयनित हैं, जिन की कुल परियोजना लागत 73.90 करोड़ रुपए है. वर्ष 2025-26 में योजनांतर्गत लाभार्थीपरक परियोजनाओं हेतु धनराशि 50.00 करोड़ रुपए निर्गत किए गए हैं. अनुसूचित जाति/महिला लाभार्थी को परियोजना लागत का 60 फीसदी अनुदान और अन्य लाभार्थियों को परियोजना लागत का 40 फीसदी अनुदान दिया जा रहा है.

सभी लाभार्थी प्रदेश में मछली उत्पादन और उत्पादकता की वृद्धि में अत्यधिक सहायक सिद्ध हो रहे है. इस के अतिरिक अलाभार्थी परक परियोजना के रूप में जनपद चंदौली में धनराशि 61.8770 करोड़ रुपए लागत की अल्ट्रा मौडल होलसेल फिश मार्केट की स्थापना की गई है, जिस में 30 करोड़ रुपए केंद्रांश, 20 करोड़ राज्यांश और 11.8770 करोड़ रुपए मंडी परिषद के अंश के रूप में सम्मिलित हैं.

Livestock Farming : वैज्ञानिक पद्धति से भेड़बकरी और खरगोश पालन

Livestock Farming : भाकृअनुप-केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान अविकानगर के मानव संसाधन विकास अनुभाग द्वारा 8 दिवसीय (8 से 15 सितंबर, 2025) 17वां कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत वैज्ञानिक पद्धति से भेड़बकरी एवं खरगोश पालन (Livestock Farming) पर 6 राज्यों (राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश) के 35 लोग (3 महिलाएं और 32 पुरुष) सम्मलित हो रहे हैं.

प्रशिक्षण के कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्थान निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर द्वारा की गई और उन्होंने अपने संबोधन में वहां उपस्थित ट्रेनी को अधिक से अधिक ज्ञान इस अवसर पर लेने का सुझाव दिया.

साथ में प्रशिक्षण के दौरान छोटे पशुओं के लिए जरूरी प्रबंधन, नस्ल चयन, स्वास्थ्य, पोषण, प्रजनन एवं आवास आदि के बारे मे उपस्थित किसानों को अविकानगर में रहने के दौरान सीखने का आह्वान किया.

साथ में पशुपालन के लिए जरूरी आयाम में भी युवाओं को अधिक से अधिक आने का निवेदन किया, जिस से इस सैक्टर में भी हर स्तर पर इंटरप्रेन्योर का विकास किया जा सके. साथ में निदेशक द्वारा सभी को इस 8 दिवसीय कार्यक्रम में अधिक से अधिक ज्ञान छोटे पशुओ एवं उन से विकसित उत्पादों पर लेने का भी सुझाव दिया.

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का समन्वय डा. सुरेश चंद शर्मा एवं डा. लीलाराम गुर्जर द्वारा किया जाएगा. कार्यक्रम का संचालन नोडल अधिकारी एचआरडी डा. सत्यवीर सिंह डागी द्वारा किया गया.

इस अवसर पर डा. रणधीर सिंह भट्ट एवं डा. जी. गणेश सोनावणे विभाग अध्यक्ष द्वारा भी प्रशिक्षण के भागीदारियों को अपने सुझाव दिए. प्रशिक्षण कार्यक्रम में रजिस्ट्रेशन का काम गौतम चोपड़ा एवं कमलेश द्वारा किया गया. अविकानगर के मीडिया प्रभारी डा. अमर सिंह मीना द्वारा कार्यक्रम की जानकारी दी गई.

Lump Disease : पशुपालकों पर भारी, पशुओं में लंपी बीमारी

Lump Disease  : पाकिस्तान से राजस्थान के रास्ते आई लंपी स्किन बीमारी की वजह से पशुपालकों को काफी परेशान होना पड़ता है. क्योंकि वायरस से फैलने वाली इस बिमारी का कोई सटीक इलाज अभी भी नहीं खोजा जा सका है. इस वजह से कभीकभी पशुओं की मौत हो जाती है. देश में लंपी बिमारी के चलते अब तक हजारों की तादाद में पशुओं की मौत हो चुकी है. राजस्थान और गुजरात सहित देश के 10 राज्यों में पशुओं में ये बीमारी पाई गई है. इस बीमारी का असर विशेषकर भैंसों की तुलना में गायों में ज्यादा पाया गया है.

लंपी (Lump Disease) एक ऐसी बिमारी है जिस का वायरस तेजी से संक्रमण फैलाता है. यदि समय पर इस की रोकथाम के उपाय नहीं किए जाएं तो इस से पशु की मौत भी हो सकती है. हालांकि, सरकार ने इस बीमारी के लिए एक देसी वैक्सीन भी लौंच कर दी है. इस के बाद भी पशुपालकों को कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए ताकि, इस बीमारी के संक्रमण को बढने से रोका जा सके.

लंपी बिमारी (Lump Disease) की पहचान

पशुओं में होने वाला लंपी त्वचा रोग कैप्रीपौक्स वायरस के कारण होता है, जो गायों और भैंसों को संक्रमित करता है. यह बीमारी मुख्य रूप से मक्खी, टिक्स और मच्छर के कारण फैलती है. यह बीमारी नमी वाले तापमान में ज्यादा तेजी से फैलती है. इस बीमारी से प्रभावित पशु के शरीर पर गांठे उभर आती है और इस में से पानी रिसने लगता है. इस से बैक्टीरिया को प्रवेश करने का मौका मिल जाता है. ये फफोले घाव का रूप ले लेते हैं, जिन पर मक्खियां बैठती हैं  और संक्रमण का प्रसार करती हैं. भारत में इस बीमारी के लक्षण प्रमुख रूप से गाय जैसे दुधारू पशुओं पर देखे जा रहे हैं. इस बीमारी से कई हजार गायों की मौत हो चुकी है. अभी फिलहाल इस बीमारी का प्रकोप सिर्फ गायों में देखा जा रहा है. भैंसों में अभी तक इस बीमारी के लक्षण नहीं पाए गए हैं.

गायों में होने वाली लंपी बीमारी (Lump Disease) को उस के लक्षणों को देख कर आसानी से पहचाना जा सकता है. इस बीमारी की चपेट में आने वाले पशुओं को शुरू में बुखार आता है. इस से पशु सुस्त रहने लगते हैं. इस रोग से पीड़ित पशु की आंखों और नाक से स्त्राव होता है. पशु के मुंह से लार टपकती रहती है. लंपी बीमारी से ग्रसित पशु के शरीर पर गांठ जैसे छाले हो जाते हैं जो फफोले का रूप ले लेते हैं. इस बीमारी से ग्रस्त पशुओं की अगर सही से देखभाल और बचाव न किया जाए तो पशुओं की मौत भी हो जाती है. क्योंकि रोग से ग्रसित की भूख कम हो जाती है और पशु चारा कम खाना शुरू कर देता है. इस की वजह से पशु की दूध देने की क्षमता कम हो जाती है.

लंपी स्किन रोग का इलाज

अभी तक लंपी बीमारी (Lump Disease) का कोई कारगर इलाज  नहीं खोजा जा सका है. इस के लिए हाल ही में एक वैक्सीन विकसित की गई है लेकिन उसे अभी पशुपालकों तक पहुंचाने में समय लगेगा. ऐसी दशा में अगर किसी पशु में लंपी स्किन रोग हो जाता है तो इस का इलाज  पारंपरिक आयुर्वेदिक और होमियोपैथी के जरीए किया जा सकता है. इस तरह के उपचार से संक्रमित पशुओं के ठीक होने में काफी अच्छे परिणाम देखे गए हैं.

नीम की पत्तियों को पानी में उबाल कर नीम में उबले पानी को गाय की त्वचा में लगाना. साथ ही उबाली गई पत्तियों को पीस कर त्वचा में लेप लगाना. कई मामलों में यह देखा गया है कि एलोवेरा भी लंपी वायरस के खात्मे में बढ़िया काम करता है. इसलिए पशुपालक ऐलोवेरा का लेप भी पशुओं की त्वचा में लगा सकतें हैं, जो काफी हद तक लंपी वायरस के बचाव में कारगर सिद्ध हुआ है.

लंपी से संक्रमित पशुओं के इलाज  के लिए लिए पशु आहार में आयुर्वेदिक खुराक भी जोड़ सकते हैं, जिसे बनाने के लिए 10 पान के पत्‍ते, 10 ग्राम काली मिर्च, 10 ग्राम नमक और गुड़ आदि सामानों की जरूरत होती है. इन सब को इकट्ठा करने के बाद सब से पहले 10 पान के पत्‍ते, 10 ग्राम काली मिर्च, 10 ग्राम नमक को पीस कर गाढ़ा पेस्ट बना लें और उस में गुड़ डाल कर मिश्रण बनाएं. पहले दिन में इस आयुर्वेदिक मिश्रण को हर 3 घंटे के बीच पशुओं को सीमित मात्रा में खिलाएं. दूसरे दिन से अगले 15 दिन तक 3 खुराक प्रति दिन के हिसाब से पशुओं को खिलाते रहें.

पशुओं के शरीर पर घाव और गांठों में कीड़े दिखने पर नारियल के तेल में कपूर मिला कर लगाना फायदेमंद रहता है. आप चाहें तो सीताफल की पत्तियों को पीस कर भी घाव पर लगा सकते हैं.

इस के अलावा होमियोपैथी की कुछ दवाएं काफी कारगर पाई गई हैं. पशुपालक किसी अच्छे होमियोपैथी चिकित्सक से मिल, दवाएं ले कर संक्रमित पशुओं को दें.

दूसरे पशुओं को कैसे बचाएं

लंपी स्किन रोग संक्रमण से फैलने वाला रोग है. इसलिए जो गायें इस रोग से संक्रमित हो जाए तो तुरंत ही दूसरे पशुओं में इस बिमारी के फैलाव का उपाय शुरू कर देना चाहिए. इस के लिए लंपी स्किन रोग से प्रभावित पशुओं को इस रोग से बचाने के लिए संक्रमित पशु को स्वस्थ पशु से तुरंत अलग कर देना चाहिए. जिस जगह पर संक्रमित पशुओं को रखा गया वहां और स्वस्थ्य पशुओं के बाड़े में बीमारी फैलाने वाले मक्खीमच्छर की रोकथाम के लिए आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए.

पशुओं के खाने और पीने का बरतन या पात्र साफ होना चाहिए. पशुपालक यह कोशिश करें कि  जो चारा पशुओं को खिलाया जा रहा है वह ताजा हो और संक्रमित पशु के खानेपीने की नाद स्वस्थ पशु के नाद से दूर या अलग रखें. लंपी बीमारी से संक्रमित पशुओं को एक जगह से दूसरी जगह न ले जाएं. इस से इस बीमारी के फैलने की संभावनाएं बढ़ जाती है.

लंपी वायरस से ग्रस्त पशुओं को जिस जगह पर रखा गया हो वहां पर साफसफाई, जीवाणु और विषाणुनाशक रसायन का प्रयोग करें. चूंकि लंपी बीमारी का प्रभाव अभी तक सिर्फ गायों में देखा गया है ऐसे में लंपी वायरस से बचाव हेतु वायरस का संक्रमण देखते ही नजदीकी पशु चिकित्सालय में या पशु चिकित्सक से संपर्क करें.

लंपी स्किन रोग से बचाव के लिए वैक्सीन तैयार

पशुओं को लंपी स्किन रोग से बचाव के लिए स्वदेशी वैक्सीन (लंपीप्रो वैकइंड) लौंच की गई है. यह वैक्सीन राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र, हिसार (हरियाणा) ने भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, इज्जतनगर (बरेली) के सहयोग से बनाई है. इस वैक्सीन को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के निर्देश के क्रम में बनाया गया है. जानकारों का कहना है कि यह वैक्सीन लंपी स्किन रोग पर 100 फीसदी कारगर है.

लंपी बिमारी से बचाव के लिए राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए तीन सालों के शोध से एक कारगर टीका विकसित किए जाने में सफलता मिली है. बायोटैक समूह की कंपनी द्वारा आईसीएआर के साथ मिल कर विकसित गांठदार त्वचा रोग के टीके को सीडीएससीओ का लाइसैंस भी मिल गया है.

बायोवेट का कहना है कि बायोलंपी वैक्सीन  लंपी स्किन रोग के लिए विश्व स्तर पर पहला मार्कर टीका है और इसे जल्द ही लौंच किया जाएगा. जो जल्द ही व्यावसायिक रूप से उपलब्ध हो जाएगी. बायोवेट के मल्लूर संयंत्र में सालाना 50 करोड़ खुराक का उत्पादन किया जा सकता है.

सीडीएससीओ लाइसैंस पशु चिकित्सा स्वास्थ्य सेवा में भारत की आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है, जिस से आयातित टीकों पर निर्भरता खत्म हो जाती है. यह डीआईवीए मार्कर वैक्सीन रोग निगरानी और उन्मूलन कार्यक्रमों के लिए पशु चिकित्सा के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी बदलाव है और डेयरी उद्योग की स्थिरता में प्रमुख भूमिका निभाने के लिए तैयार है.

बायोवेट के एक अधिकारी का कहना है कि पिछले दो सालों में, भारत में लंपी स्किन रोग के चलते तकरीबन 2 लाख मवेशियों की मौत हो गई और कई अन्य ने अपनी दूध उत्पादन क्षमता खो दी. बायोलंपी वैक्सीन , जो फ्रीजड्राई रूप में उपलब्ध है, एक एकल टीकाकरण है जो 3 महीने से अधिक उम्र के मवेशियों और भैंसों को साल में 1 बार दिया जाता है.

Livestock : पशुधन उत्पादकता बढ़ाने हेतु जागरूकता कार्यक्रम

Livestock : मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के अंतर्गत पशुपालन और डेयरी विभाग ने पिछले दिनों पशुधन (Livestock) उत्पादकता बढ़ाने हेतु वर्चुअल जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया. इस कार्यक्रम में देशभर के 2000 कौमन सर्विस सैंटर से 1 लाख से अधिक पशुपालक किसान जुड़े. इन में छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, केरल, अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह, लक्षद्वीप, दिल्ली और चंडीगढ़ जैसे राज्य और केंद्रशासित प्रदेश शामिल रहे.

इस बैठक की अध्यक्षता नई दिल्ली से केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी एवं पंचायती राज राज्य मंत्री प्रो. एसपी सिंह बघेल ने की. इस अवसर पर विभाग की अतिरिक्त सचिव वर्षा जोशी, राम शंकर सिन्हा और अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित रहे.

मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी राज्य मंत्री प्रो. बघेल ने राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में पशुपालक किसानों के अमूल्य योगदान की सराहना की. उन्होंने बताया कि पिछले 10 सालों में देश में दूध उत्पादन की सालाना वृद्धि दर 5.7 फीसदी रही है, जबकि दुनियाभर में यह केवल 2 फीसदी सालाना है.

इस उपलब्धि का श्रेय उन्होंने देश के पशुपालक किसानों को दिया. उन्होंने विभागीय पहलों जैसे टीकाकरण कार्यक्रम और सैक्स सौर्टेड सीमेन के उपयोग की भी प्रशंसा की, जिन से देश में पशुधन उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिली है. उन्होंने आगे किसानों से बातचीत की और पशु चिकित्सा सेवाओं की उपलब्धता के बारे में जानकारी ली, जिस में इलाज संबंधी मदद के लिए टोलफ्री नंबर 1962 का उपयोग शामिल है. उन्होंने पशुपालक किसानों से पशु बीमा को अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया और पशुओं का समयसमय पर टीकाकरण कराने का महत्त्व भी बताया.

इस कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों में पशुपालन के महत्त्वपूर्ण पहलुओं  जैसे नस्ल सुधार, जूनोटिक रोग नियंत्रण, जैव सुरक्षा और विभागीय योजनाओं के द्वारा उद्यमिता विकास पर जागरूकता फैलाना था. इस में कई विषयों पर जागरूकता वीडियो और विशेषज्ञ सत्र प्रस्तुत किए गए, जिस से पशुधन उत्पादकता बढ़ाने के उपायों पर विस्तार से चर्चा हुई. यह सत्र ज्ञान आदानप्रदान, नीति जागरूकता और उद्यमिता को प्रोत्साहन देने का मंच भी बना, जिस ने ग्रामीण विकास और आर्थिक वृद्धि में पशुपालकों की प्रमुख भूमिका को और मजबूती दी.

Training : वैज्ञानिक पशुपालन पर हुआ प्रशिक्षण

Training : केंद्रीय भेड़ व ऊन अनुसंधान संस्थान अविकानगर में पिछले दिनों केंद्रीय गौवंश अनुसंधान संस्थान मेरठ उत्तर प्रदेश की अनुसूचित जाति उपयोजना में टोंक जिले के अनुसूचित जाति के किसानों को दो दिवसीय प्रशिक्षण “वैज्ञानिक पद्धति से पशुपालन” विषय पर अविकानगर के किसान हास्टल में आयोजित किया गया था.

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में मुख्यअतिथि के रूप में नेशनल ब्यूरो औफ एनिमल जैनेटिक्स रिसोर्सेज करनाल हरियाणा संस्थान के निदेशक डा. एनएच मोहन, कार्यक्रम के अध्यक्ष डा. अरुण कुमार तोमर और विशिष्ट अथिति, डा. संजीव कुमार वर्मा नोडल अधिकारी एसीएसपी उपयोजना मेरठ भी उपस्थित रहे और सभी प्रशिक्षण में भाग ले रहे किसानों को प्रमाणपत्र दिया.

इस कार्यक्रम के अध्यक्ष निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर ने “हे शहर तेरा पेट भरते हैं मेरे गांव के खेत” कहते हुए भारत देश में बढ़ती शहरी आबादी के लिए खेती ओर पशुपालन के विभिन्न उत्पादों को कमर्शियल करते हुए सीधे उपभोक्ता तक ले जाना का सुझाव वहां मौजूद किसानों को दिया.

डा. अरुण कुमार तोमर ने आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत के लिए विभिन्न पशुपालन व खेती आधारित स्टार्टअप के विकास पर बल देते हुए वहां मौजूद किसानों को आजीविका बढ़ाने के उपाय पर चर्चा की.  इस कार्यक्रम के मुख्यअथिति निदेशक करनाल संस्थान डा. एनएच मोहन द्वारा भी देश की देशी पशु की विभिन्न नस्लों के संरक्षण पर जोर देते हुए बेहतर पशुपोषण और आवास प्रबंधन पर किसानों को फोकस करने का सुझाव दिया.

उन्होंने कहा कि  हमारे देश के पशुधन संपदा के अधिक उत्पादन के लिए वर्तमान में बेहतर प्रबंधन की जरूरत है और इसी को प्रेरित करने के लिए ही इसी तरह के कार्यक्रम हमारी भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् नई दिल्ली के विभिन्न संस्थान देशभर के किसान के लिए आयोजित कर रहे हैं. इस दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का समन्वयक, मंच संचालन और धन्यवाद प्रस्ताव डा. मेघा पांडे, डा. राजेश बिशनोई और डा. संजीव वर्मा द्वारा किया गया.

इस कार्यक्रम में पंजीकृत 90 अनुसूचित जाति किसानों को पशुपालन उपयोगी सामानों का भी वितरण कार्यक्रम के समापन अवसर पर अथितियों द्वारा किया गया.  इस कार्यक्रम मे वित्तीय सहायता मेरठ संस्थान की एसीएसपी उपयोजना और आयोजक अविकानगर संस्थान द्वारा किया गया.

डा. संजीव कुमार वर्मा नोडल अधिकारी एसीएसपी उपयोजना मेरठ ने उपस्थित किसानों को बताया कि आगे भी भविष्य में टोंक जिले के गाय पालक किसानों के लिए केंद्रीय गौवंश अनुसंधान संस्थान मेरठ इसी तरह के कार्यक्रम अविकानगर निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर के मार्गदर्शन मे आयोजित करता रहेगा.

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के समापन के अवसर पर अविकानगर संस्थान के डा. गणेश सोनवणे, डा. अजय कुमार, डा. लीलाराम गुर्जर, डा. सत्यवीर सिंह डागी, डा. अरविंद, डा. रंगलाल मीना, गौतम चोपड़ा और तकनीकी कर्मचारियों के साथ वेटरनरी इंटर्नशिप भी उपस्थित रहते हुए किसानों किसानो से संवाद किया.

अविकानगर संस्थान की अविशान भेड़ के रजिस्ट्रेशन के लिए करनाल के निदेशक डा. मोहन ने अविशान के सेक्टर्स के साथ किसानों के द्वार भ्रमण करते हुए उस की एक से ज्यादा मेमने पैदा करने की क्षमता को निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर द्वारा दिखाया गया.