लीची के खास कीट व रोग

लीची के फल अपने मनमोहक रंग, स्वाद और गुणवत्ता के चलते भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया में अपना खास पहचान बनाए हुए हैं. लीची के सफल उत्पादन के लिए मुनासिब किस्मों का चयन बेहतर कृषि तकनीक, कीट बीमारी के रोकथाम व पौध संरक्षक के तरीकों को अपना कर किसान मुनाफा ले सकते हैं.

लीची के प्रमुख कीट

लीची फल बेधक व टहनी बेधक : इस कीट के लार्वा नई कोपलों की मुलायम टहनियों के भीतरी भाग को खाते हैं. नतीजतन, ग्रसित टहनियों में फूल व फलन ठीक से नहीं होता है. इस के प्रकोप से फल झड़ जाते हैं.

नियंत्रण : फल के लौंग आकार होने पर इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल कीटनाशक का छिड़काव 0.5-0.7 मिलीलिटर या नोवाल्यूरान 10 ईसी 1.5 मिलीलिटर नामक कीटनाशक का 2 छिड़काव 10-15 दिनों के फासले पर करें.

लीची की मकड़ी : इस कीट के नवजात और वयस्क दोनों ही नई कोपलों, पत्तियों, पुष्पक्रमों व फलों से लगातार रस चूसते हैं.

इस के लक्षण शुरू में निचली सतह पर धूसर रंग के मखमली सतह के रूप में बनते हैं. परिणामस्वरूप प्रकाश संश्लेषण की क्रिया रुक जाती है.

नियंत्रण : जुलाई माह में क्लोरफेनापार 10 ईसी या प्रोपरगाइट 57 ईसी मकड़ीनाशक कैमिकल का 3 मिलीलिटर की दर से 15 दिनों के अंतराल पर 2 बार छिड़काव करना चाहिए.

लीची का बग : इस जाति के अर्भक व वयस्क दोनों ही नुकसान पहुंचाते हैं. ये मुलायम पत्तियों, टहनियों व फलों का रस चूस कर नुकसान पहुंचाते हैं.

रोकथाम : मिली बग अगर पौधे पर चढ़ गए हों तो क्लोरोपाइरीफास या मिथाइल डेमेटान या इमिडाक्लोप्रिड या रोगोर 0.08 फीसदी का छिड़काव करें.

नीबू का काला एफिड : कीटों द्वारा कोशिका रस चूस लिए जाने के कारण पत्तियां, कलियां और फूल मुरझा जाते हैं. इस के साथसाथ यह कीट एक किस्म के विषाणुओं को भी फैलाता है.

रोकथाम : इस कीट की रोकथाम के लिए औक्सीडिमेटान मिथाइल या फिर डाईमिथोएट के 0.03 या इमिडाक्लोप्रिड 17 एसएल घोल का छिड़काव करें.

लीची के प्रमुख रोग

पत्ती मंजर और फल झुलसा : इस रोग की शुरुआत पत्तियों के आखिरी सिरे पर ऊतकों के सूखने से होती है. इस के रोग कारक मंजरों को झुलसा देते हैं, जिस से प्रभावित मंजरों में कोई फल नहीं लग पाते.

रोकथाम : इस रोग पर नियंत्रण करने के लिए थायोफेनेट मिथाइल 75 डब्लूपी 2 ग्राम प्रति लिटर या डाईफेनोकोनाजोल 25 ईसी 1 मिलीलिटर प्रति लिटर या एजोक्सीस्ट्रोबिन 250 एससी 0.8 मिलीलिटर प्रति लिटर के घोल का छिड़काव करने से कुछ हद तक काबू पाया जा सकता है.

श्याम वर्ण यानी एंथ्रेक्नोज : यह फलों के साथसाथ पत्तियों और टहनियों को भी प्रभावित कर सकते हैं. फलों के छिलकों पर छोटेछोटे 0.2-0.4 सैंटीमीटर गहरे भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं.

रोग की अधिक तीव्रता की स्थिति में काले धब्बों का फैलाव फल के छिलकों पर आधे हिस्से तक हो सकता है.

रोकथाम : इस रोग की तीव्रता ज्यादा होने पर रोकथाम के लिए थायोफेनेट मिथाइल 75 डब्लूपी 2 ग्राम प्रति लिटर या डाईफेनोकोनाजोल 25 ईसी 1 मिलीलिटर प्रति लिटर के घोल का छिड़काव करें.

म्लानि या उकटा रोग : यह रोग पत्तियों के हलके पीले होने के साथसाथ मुरझाने से शुरू होती है जो क्रमिक उत्तरोत्तर बढ़ती हुई 4-5 दिनों में पेड़ को पूरी तरह सुखा देती है. जड़ों और फ्लोएम ऊतकों पर कुछ भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं, जो बाद में जाइलम ऊतकों में भी फैल जाते हैं. इस की वजह से पानी का बहाव रुक जाता है.

रोकथाम : हैक्साकोनाजोल 5 एससी 1 मिलीलिटर प्रति लिटर या कार्बंडाजिम 50 डब्लूपी 2 ग्राम प्रति लिटर से पेड़ के सक्रिय जड़ क्षेत्र को भिगोएं.

फल विगलन : इस रोग के फैलने से छिलका मुलायम और फल सड़ने लगते हैं. प्रभावित फलों के छिलके भूरे से काले रंग के हो जाते हैं. सड़े हुए भाग पर फफूंद दिखने लगती है. फल फटने के बाद विगलन रोग जनकों के माइसिलियम फटे हुए भाग में पहुंच जाते हैं.

रोकथाम : फल तुड़ाई के 15-20 दिन पहले पेडों पर कार्बंडाजिम 50 डब्लूपी 2 ग्राम प्रति लिटर या थायोफेनेट मिथाइल 50 डब्लूपी 2 ग्राम प्रति लिटर या एजोक्सीस्ट्रोबिन 23 एससी 1 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी के घोल का छिड़काव करें.

उपज : लीची से प्रति पेड़ औसतन 1.5 से 2.0 क्विंटल उपज मिल जाती है. एक हेक्टेयर में तकरीबन 150 से 200 क्विंटल उपज मिल जाती है.

कृषि 24/7 – कृषि का अजब उपकरण

कृषि एवं किसान कल्याण विभाग (डीएएंडएफडब्ल्यू) ने वाधवानी इंस्टीट्यूट फौर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (वाधवानी एआई) के सहयोग से कृषि 24/7 प्लेटफार्म को विकसित किया है, जो कृषि सूचना निगरानी एवं विश्लेषण के लिए Google.org की सहायता से चलने वाला स्वचालित पहला कृत्रिम बुद्धिमता-संचालित समाधान है. कृषि 24/7 प्लेटफार्म, कृषि एवं किसान कल्याण विभाग को प्रासंगिक सूचनाओं की पहचान करने, समय पर सावधान करने और किसानों के हितों की रक्षा के उद्देश्य से त्वरित कार्रवाई करने और बेहतर निर्णय लेने के माध्यम से स्थायी कृषि विकास को बढ़ावा देने में सहायता पहुंचाएगा.

कृषि 24/7 का कार्यान्वयन सही समय पर उचित निर्णय लेने में सहायता के उद्देश्य से कृषि संबंधित रुचि के कृषि समाचार, लेखों की पहचान और प्रबंधन करने के लिए एक कुशल तंत्र की आवश्यकता को पूरा करता है.

यह प्लेटफार्म कई भाषाओं में समाचार, लेखों को स्कैन करता है और उन का इंगलिश में अनुवाद करता है. कृषि 24/7 समाचार व लेखों से आवश्यक जानकारी को ढूंढ़ कर निकालता है. इन में शीर्षक, फसल का नाम, कार्यक्रम का प्रकार, तिथि, स्थान, गंभीरता, सारांश और स्रोत का आधार शामिल होता है.

कृषि 24/7 यह सुनिश्चित करता है कि कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय को वैब पर प्रकाशित होने वाली प्रासंगिक घटनाओं की समय पर जानकारी प्राप्त हो जाए.

कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के सचिव मनोज आहूजा ने इस पहल की शुरुआत करते हुए कहा कि सूचना निगरानी की यह प्रणाली न केवल हमें जानकारी प्रदान करती रहेगी, बल्कि हमें अपना विचार तय करने के लिए सशक्त माध्यम देगी.

उन्होंने निरंतर सुधार की बात भी की और अपना सुझाव देते हुए कहा कि जैसेजैसे हम आगे बढ़ेंगे, वैसेवैसे इस प्रणाली को विस्तार देने के लिए तैयार रहेंगे.

मनोज आहूजा ने कहा कि जिस तरह से दुनिया विकसित होती जा रही है, उसी तरह से हमारे उपकरण एवं माध्यम भी विकसित होने चाहिए.

सचिव मनोज आहूजा ने कहा कि आइए, हम यह सुनिश्चित करने के लिए मिल कर काम करें कि यह निगरानी प्रणाली एक गतिशील उपकरण बन जाए, जो सूचना के बदलते परिदृश्य के अनुकूल हो और हमारे किसानों को बेहतर सेवाएं देने के हमारे मिशन में एक मूल्यवान संपदा के तौर पर उपलब्ध हो.

संयुक्त सचिव (प्रसारण) सैमुअल प्रवीण कुमार ने सूचनाओं के इस घटक के कार्यों के बारे में संक्षेप में बताया, जिस का उद्देश्य कृषि इकोसिस्टम पर औनलाइन प्रकाशित समाचार, लेखों की लगभग वास्तविक समय की निगरानी प्रदान करना है, जो कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के हित की खबरों की पहचान करने और सूचनाओं का चुनाव करने, चेतावनी जारी करने और समय पर कार्रवाई करने के लिए एक विस्तृत तंत्र तैयार करने में सहायता करेगा.

वाधवानी इंस्टीट्यूट फौर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के संयुक्त निदेशक (एजी) जेपी त्रिपाठी ने कहा कि हम मौजूदा चुनौतियों के लिए कृत्रिम बुद्धिमता से संचालित होने वाला तंत्र बनाना चाहते हैं, जहां सूचनाओं की निगरानी और सत्यापन हस्तचालित व समय लेने वाला रहा है.

उन्होंने बताया कि उन के संस्थान द्वारा बीमारी के प्रकोप के लिए एकसमान घटनाओं को परखने वाले और विश्लेषण संबंधी प्लेटफार्म को राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) के साथ सफलतापूर्वक संचालित किया गया है.

जेपी त्रिपाठी ने यह भी कहा कि हम कृषि एवं किसान कल्याण विभाग और केंद्र सरकार के नियंत्रण वाले अन्य निकायों के साथ सहयोग कर के, उन्हें प्रभावी उपकरणों से लैस करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जो उन्नत डेटा संचालित निर्णयों के माध्यम से सूचना प्रवाह को बेहतर बना देते हैं.

विश्व के सब से विश्वविद्यालय में है गोविंद बल्लभ पंत कृषि विश्वविद्यालय

पंतनगर (उत्तराखंड) : राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने उत्तराखंड के पंतनगर में स्थित गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के 35वें दीक्षांत समारोह में भाग लिया और उसे संबोधित किया.

इस अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि देश में कृषि शिक्षा को बढ़ावा देने और कृषि क्षेत्र के विकास के लिए गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की स्थापना की गई थी. स्थापना के बाद से यह कृषि शिक्षा, अनुसंधान और विकास के लिए एक उत्कृष्ट केंद्र बन गया है.

उन्होंने आगे कहा कि 11000 एकड़ क्षेत्र में फैला यह विश्‍व के सब से बड़े विश्वविद्यालयों में से एक है.

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि नोबल पुरस्कार विजेता डा. नौर्मन बोरलौग ने पंतनगर विश्वविद्यालय को ‘हरित क्रांति का अग्रदूत’ नाम दिया था.

Pant Universityइस विश्वविद्यालय में नौर्मन बोरलौग द्वारा विकसित मैक्सिकन गेहूं की किस्मों का परीक्षण किया गया था. इस ने हरित क्रांति की सफलता में प्रभावी भूमिका निभाई है. कृषि क्षेत्र से जुड़ा हर व्यक्ति ‘पंतनगर बीज’ के बारे में जानता है. पंतनगर विश्वविद्यालय में विकसित बीजों का उपयोग देशभर के किसानों द्वारा फसल की गुणवत्ता और उपज बढ़ाने के लिए किया जाता है.

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि पंतनगर विश्वविद्यालय देश के कृषि क्षेत्र के विकास में अग्रणी भूमिका निभाता रहेगा.

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने यह भी कहा कि कृषि के क्षेत्र में हो रहे अनुसंधानों को किसानों तक पहुंचाना कृषि विकास के लिए आवश्‍यक है. उन्हें यह जान कर प्रसन्‍नता हुई कि यह विश्वविद्यालय विभिन्न जलवायु अनुकूल प्रौद्योगिकियों के माध्यम से ग्रामीण समुदाय की सहायता कर रहा है.

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जोर दे कर कहा कि शिक्षा प्रणाली को वैश्विक स्तर पर हो रहे प्रौद्योगिकीय, आर्थिक और सामाजिक विकास के साथ तालमेल बिठाने की आवश्‍यकता है.

उन्होंने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों को ऐसे स्नातक तैयार करने चाहिए, जो उद्योग के लिए तैयार हों और जो रोजगार सृजित कर सकें एवं प्रौद्योगिकी केंद्रित विश्‍व में प्रतिस्पर्धा कर सकें.

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने साफ शब्दों में कहा कि आज दुनिया जलवायु परिवर्तन और मृदा क्षरण जैसी समस्याओं से निबटने के लिए प्राकृतिक और जैविक खेती की ओर बढ़ रही है. पर्यावरणअनुकूल भोजन की आदतों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है.

Pant Universityउन्होंने कहा कि इस विश्वविद्यालय के शोधकर्ता, वैज्ञानिक और संकाय सदस्य हमारे भोजन की आदतों में मोटे अनाज को प्राथमिकता देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे.

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए नवीनतम प्रौद्योगिकी का उपयोग आवश्यक है.

उन्होंने फसल प्रबंधन, नैनो-प्रौद्योगिकी, जैविक खेती आदि के माध्यम से कृषि में डिजिटल समाधान शुरू करने के लिए पंतनगर विश्वविद्यालय की सराहना की. उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय कृत्रिम आसूचना के उपयोग के लिए भी कदम उठा रहा है. उन्हें यह जान कर प्रसन्‍नता हुई कि इस विश्वविद्यालय ने अपना स्वयं का कृषि ड्रोन विकसित किया है, जो कुछ ही मिनटों में कई हेक्टेयर भूमि पर छिड़काव कर सकता है. उन्होंने विश्वास जताया कि ड्रोन प्रौद्योगिकी का लाभ शीघ्र ही किसानों को मिल सकेगा.

विश्वकर्मा योजना के तहत मास्टर प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण

नई दिल्ली : प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना को लागू करने की दिशा में एक रणनीतिक कदम के रूप में कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय (एमएसडीई) ने तय किए गए ट्रेडों में कारीगरों और शिल्पकारों के समुदाय को सशक्त बनाने के लिए पीएम विश्वकर्मा योजना के तहत मास्टर ट्रेनर्स और मूल्यांकनकर्ताओं के प्रशिक्षण कार्यक्रम की शुरुआत की.

6 से 10 नवंबर, 2023 तक राष्ट्रीय उद्यमशीलता और लघु व्यवसाय विकास संस्थान (निस्बड)) में आयोजित होने वाले इस पांच दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, मध्य प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ सहित 10 विभिन्न राज्यों के 41 मास्टर प्रशिक्षकों को प्रशिक्षित किया जा रहा है.

मास्टर प्रशिक्षकों का पहला बैच निम्नलिखित व्यवसायों को पूरा करेगा :

नाई, दर्जी, राजमिस्त्री, बढ़ई (सुथार/बधाई), गुड़िया और खिलौना निर्माता (पारंपरिक) और लुहार. मास्टर ट्रेनर्स ट्रेनिंग प्रोग्राम का लक्ष्य इन मास्टर ट्रेनर्स को आधुनिक प्रौद्योगिकी कौशल और उद्यमशीलता ज्ञान में निपुण बनाना है. प्रतिभागियों को उद्यमशीलता दक्षताओं, व्यवसाय योजना की तैयारी, सरकारी सहायता पारिस्थितिकी तंत्र, वित्तीय साक्षरता, डिजिटल और सोशल मीडिया मार्केटिंग, ब्रांडिंग और मार्केटिंग पर प्रशिक्षण दिया जाएगा.

इस के अतिरिक्त, मास्टर प्रशिक्षकों को अपने कौशल को बढ़ाने और वर्तमान में चल रहे ट्रेंड्स को अपनाने के लिए एक आधुनिक टूल किट प्रदान की जाएगी.

कार्यक्रम का उद्घाटन कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय के सचिव अतुल कुमार तिवारी ने किया. उद्घाटन के दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के महत्वपूर्ण घटकों पर जोर दिया और कहा, “एक कुशल और सशक्त कार्यबल के निर्माण की खोज में, प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के तहत मास्टर ट्रेनर्स और असैसर्स प्रोग्राम, हमारे देश को ज्ञान से लैस करने की और इस के लिए आवश्यक विशेषज्ञता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.”

ये मास्टर प्रशिक्षक (ट्रेनर), ज्ञान और नवाचार के पथप्रदर्शक के रूप में, हमारे देश के भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगे.

उन्होंने आगे कहा, “उन का समर्पण और विशेषज्ञता न केवल हमारे कार्यबल के कौशल को समृद्ध करेगी बल्कि आत्मनिर्भर, तकनीकी रूप से उन्नत और समृद्ध भारत के लिए प्रधान मंत्री विश्वकर्मा योजना के दृष्टिकोण को साकार करने में भी योगदान देगी. साथ मिल कर, हम अपने नागरिकों को सशक्त बनाएंगे और सामूहिक रूप से 21वीं सदी के लिए एक कुशल भारत का निर्माण करेंगे.”

पीएम विश्वकर्मा योजना के अंतर्गत पीएम विश्वकर्मा प्रमाणपत्र और आईडी कार्ड के माध्यम से मान्यता, कौशल सत्यापन के माध्यम से कौशल उन्नयन, बुनियादी कौशल, उन्नत कौशल प्रशिक्षण, उद्यमशीलता ज्ञान,15,000 रुपए तक टूलकिट प्रोत्साहन, 3,00,000 तक क्रेडिट सहायता और डिजिटल लेनदेन के लिए प्रोत्साहन सुनिश्चित करती है. यह कार्यक्रम राष्ट्रीय विपणन समिति (एनसीएम) द्वारा विपणन और ब्रांडिंग सहायता भी प्रदान करेगा.

कारीगरों और कुशल शिल्पकारों द्वारा तैयार किए गए उत्पादों और सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ाने और पहुंच का विस्तार करने पर ध्यान देने के साथ प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना को वितरित करने के लिए मास्टर प्रशिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाएगा. उन का प्राथमिक उद्देश्य घरेलू और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में विश्वकर्माओं का निर्बाध एकीकरण सुनिश्चित करना होगा. इस पहल का महत्वपूर्ण लक्ष्य कारीगरों और शिल्पकारों को व्यापक सहायता प्रदान करना है जिस से उन के संबंधित व्यापार की मूल्य श्रृंखला में प्रगति को सुविधाजनक बनाया जा सके.

इन प्रशिक्षकों को विभिन्न पहलुओं पर प्रशिक्षण प्राप्त होगा, जिस में कार्यक्रम के लाभार्थियों के लिए विशेष ओरिएंटेशन सत्र आयोजित करना, उन के काम के दायरे को समझना और व्यवहार अभ्यास और वास्तविक जीवन के मामले के अध्ययन के माध्यम से उद्यमशीलता गुणों को पहचानने में प्रतिभागियों की सहायता करना शामिल है.

Vishwakarma Yojnaइस के अलावा, मास्टर प्रशिक्षकों को कई सरकारी सहायता योजनाओं से परिचित कराया जाएगा जिन का लाभ विश्वकर्मा वित्तीय सहायता के लिए उठा सकते हैं. उन्हें आगे प्रशिक्षित करने के लिए भी प्रशिक्षित किया जाएगा ताकि विश्वकर्मा बैंक वित्तपोषण से जुड़ी प्रक्रियाओं और औपचारिकताओं में अच्छी तरह से पारंगत हो सकें. यह प्रशिक्षण उन्हें वित्तीय संस्थानों और ऋण देने की प्रक्रियाओं द्वारा अपनाई जाने वाली नीतियों और दिशानिर्देशों को संरचित और व्यवस्थित तरीके से समझने में सशक्त बनाएगा.

इस के अलावा ये प्रशिक्षक प्रतिभागियों को व्यवसाय योजना के विभिन्न घटकों को समझने में सहायता करने के लिए सुसज्जित होंगे. वे व्यवसाय की प्रकृति को स्पष्ट करने, एक अच्छी बिक्री और विपणन रणनीति विकसित करने, वित्तीय पृष्ठभूमि की रूपरेखा तैयार करने और अनुमानित लाभ और हानि विवरण तैयार करने में कुशल होंगे.

गुरुशिष्य परंपरा पर प्रकाश डालने वाले पीएम विश्वकर्मा दिशानिर्देशों के अनुसार, मास्टर प्रशिक्षकों को व्यावहारिक प्रशिक्षण के लिए व्यापार विशिष्ट उपकरणों और उन का उपयोग करने के तरीके पर उन्मुख किया जाएगा. आधुनिक प्रशिक्षण श्रव्यदृश्य उपकरण प्रशिक्षण के पूरक होंगे. प्रत्येक उपकरण के उपयोग का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा. आधुनिक डिजाइन और समय अनुकूलन को विकसित कर के कैसे सुधार किया जाए इस पर दिशा दिखाई जाएगी.

मास्टर ट्रेनर को प्रत्येक ट्रेड के लिए बनाई गई प्रशिक्षु और ट्रेनर हैंडबुक का उपयोग करने के तरीके के बारे में बताया जाएगा. प्रत्येक ट्रेड प्रशिक्षण कक्षा मोड में दिया जाएगा. व्यापार प्रशिक्षण के दौरान उद्योग विशेषज्ञों को एक सत्र के लिए बुलाया जा सकता है.

सभी पंजीकृत लाभार्थियों के लिए कौशल मूल्यांकन करने के लिए मास्टर टेनर्स को प्रशिक्षित किया जाएगा, ताकि उन के मौजूदा कौशल स्तरों का आकलन किया जा सके.

यह आकलन सभी 12 क्षेत्रीय भाषाओं में तैयार किया गया है. यह कौशल को बढ़ाने की प्रक्रिया में पहली महत्वपूर्ण गतिविधि होगी और कौशल के वर्तमान स्तरों का आकलन कर के, पीएम विश्वकर्मा योजना में कौशल उन्नयन के भविष्य के मार्ग को एक सूचीबद्ध तरीके से तैयार किया जाएगा. यह विश्वकर्मा के मौजूदा कौशल, आधुनिक उपकरणों और तकनीकों से परिचित होने और किसी भी अंतराल का व्यापक मूल्यांकन करने के लिए एक सरल, संक्षिप्त परीक्षण होगा.

प्रशिक्षण के बाद उम्मीदवारों का मूल्यांकन दिए जा रहे 40 घंटे के बुनियादी प्रशिक्षण के आधार पर किया जाएगा. यह आधुनिक उपकरणों, प्रशिक्षण अवधि के दौरान उन के उपयोग और डिजिटल और वित्तीय साक्षरता, ब्रांडिंग और मार्केटिंग, स्व-रोजगार मौड्यूल के उन के ज्ञान पर किया जाएगा. यह एक समयबद्ध मूल्यांकन होगा जिसे सभी विश्वकर्माओं को करना होगा.

इस कार्यक्रम में, एमएसडीई की संयुक्त सचिव सुहेना उस्मान, एनआईएसबीयूडी कीनिदेशक (ईई) डा. पूनम सिन्हा और एनएसडीसी केसीपीओ महेंद्र पायल भी उपस्थित थे.

पीएम विश्वकर्मायोजना एक केंद्रीय क्षेत्र योजना है जो 17 सितंबर, 2023 को प्रधानमंत्री द्वारा हाथों और उपकरणों से काम करने वाले कारीगरों और शिल्पकारों को शुरू से अंत तक सहायता प्रदान करने के लिए शुरू की गई थी. अधिक जानकारी के लिए कृपया www.pmvishwakarma.gov.inपर जाएं. किसी भी प्रश्न के लिए कारीगर और शिल्पकार 18002677777 पर फोन कर सकते हैं या pm-vishwakarma@dcmsme.gov.in पर ईमेल कर सकते हैं.

हरित क्रांति (श्वेत क्रांति) बनाम गुलाबी क्रांति

यदि हम आजादी के बाद कृषि इतिहास की ओर नजर घुमाएं तो इस हकीकत को मानना पड़ेगा कि नेहरू युग के अंतिम साल में खाद्यान्न को ले कर देश में संकट इसलिए बढ़ा, क्योंकि केंद्र की पंचवर्षीय योजनाओं में कृषि पर कोई खास ध्यान नहीं दिया गया था. इस वजह से राज्यों में दंगे शुरू हो गए थे. अमेरिकी नीति ‘फूड ऐंड पीस’ के हिस्से के तौर पर उस समय भारत में पीएल 480 अनाज का सहारा लिया गया था.

देश को खाद्यान्न संकट से उबारने के लिए जवाहरलाल नेहरू के बाद प्रधानमंत्री के तौर पर लाल बहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दे कर किसानों के साथ जवानों को भी हरित क्रांति के लिए तैयार किया.

60 के दशक का यह दौर उत्पादकता को बढ़ाने के मद्देनजर गेहूं  (बाद में धान पर भी) उत्पादन पर खास जोर दिया गया और 80 के दशक तक भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर ही नहीं हो गया, बल्कि निर्यात भी करने लगा.

इन में वैज्ञानिक डा. एमएस स्वामीनाथन के प्रयासों का भी हाथ था. इसे देश की पहली हरित क्रांति के रूप में जाना जाता है. यह (हरित क्रांति) 60 के दशक से ले कर 80 के दशक के मध्य तक पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश से ले कर भारत के दक्षिणी राज्यों तक फैल गई. लेकिन वक्त के साथ हरित क्रांति के व्यावसायीकरण करने की बात भी सामने आई. कृषि से जुड़े परंपरागत मूल्य एवं संस्कृति विलुप्त हुए. धरती से जल दोहन और रासायनिक जहरीले उर्वरकों के बेतहाशा इस्तेमाल की वजह से धरती और खाद्यान्न दोनों जहरीले हुए.

यदि उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण पर आधारित आर्थिक नीतियों के कारण भारत की पिछले 30 सालों में आर्थिक विकास की गति तेजी से बढ़ी है, तो साथ में इस हकीकत को भी स्वीकार किया जाना चाहिए कि तथाकथित आर्थिक विकास का फायदा भारत के उस अभिजात्य वर्ग को मिला, जो पहले से ही बेहतर जिंदगी जी रहा था.

गौरतलब है जो आर्थिक विकास उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों को लागू करने के बाद हुआ, उस में ऐसी भी नीतियां हैं, जो कई तरह के सवाल खड़ा करती हैं. उन में कुछ ऐसे सवाल भी हैं, जो सीधे आम आदमी, पर्यावरण, पशुधन के खात्मे से ताल्लुक रखते हैं.

कृषि से ताल्लुक रखने वाली श्वेत क्रांति और हरित क्रांति को ले कर भी सवाल खड़े किए जाते रहे हैं. इस के पीछे केंद्र और राज्य सरकारों की गलत नीतियां रही हैं.

भापजा की सरकार ने साल 2014 में सत्ता संभालते ही नई हरित क्रांति की बात कही, वहीं पर मांस निर्यात को बढ़ावा देने के लिए एक बड़ी रकम बूचड़खानों को भी दी. यह भाजपा की उस नीति से मेल नहीं खाती, जो भारतीय परंपरा और संस्कृति को बढ़ावा देने वाली है.

Meat Exportयदि आंकड़ों पर जाएं तो साल 2014 में जब राजग सरकार सत्ता में आई उस ने मांस निर्यात और बूचड़खानों के लिए अपने पहले ही बजट में 15 करोड़ की सब्सिडी दी और टैक्स में छूट का विधिवत प्रावधान किया. इस से समझा जा सकता है कि भाजपा की नीतियां मांस निर्यात के मामले में जैसी कांग्रेस की थीं, वैसी ही हैं.

आंकड़ों की तह में जाएं, तो पता चलता है कि साल 2003-04 में भारत से 3.4 लाख टन गायभैंस के मांस का निर्यात हुआ, जो साल 2012-13 में बढ़ कर 18.9 लाख टन हो गया. यह बढ़ोतरी साल 2014-15 में 24 लाख टन पहुंच गई यानी 14 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. वहीं साल 2019-20 में 1,030.41 मीट्रिक टन मांस का निर्यात किया गया, जिस की कीमत तकरीबन 16.32 करोड़ रुपए थी.

आंकड़े बताते हैं कि दुनिया में जितना मांस का निर्यात होता है, उस में भारत अकेले ही तकरीबन 58.7 फीसदी निर्यात करता है. गौरतलब है की भारत 65 देशों को मांस का निर्यात करता है. इन में सऊदी अरब, कुवैत, मिस्र, मलयेशिया, फिलीपींस, म्यांमार, नेपाल, लाइबेरिया और वियतनाम प्रमुख हैं. विदेशों में बढ़ते मांस निर्यात की वजह से भारत में जो मांस कभी 30 रुपए प्रति किलोग्राम बिकता था, वह आज 300 रुपए प्रति किलोग्राम बिक रहा है.

मांस निर्यात से सब से ज्यादा असर दूध उत्पादन से ताल्लुक रखने वाली श्वेत क्रांति पर पड़ा है. जब 13 जनवरी, 1970 को श्वेत क्रांति की शुरुआत हुई, तब इसे आम आदमी के रोजगार, आर्थिक स्थिति में सुधार और बेहतर स्वास्थ्य से जोड़ कर देखा गया.

पिछले 40 सालों में जिस तरह से मांस निर्यात के जरीए विदेशी पैसा कमाने की होड़ लगी हुई है, उस ने श्वेत और हरित क्रांति को रोकने या खत्म करने का काम किया है.

गौरतलब है विदेशों में बढ़ते मांस के निर्यात का सीधा असर दूध उत्पादन और घटते पशुधन पर पड़ रहा है.

गौरतलब है कि पशुधन भारतीय कृषि का आधार रहा है. गैरकानूनी बूचड़खानों की वजह से पशुधन पर सीधे असर पड़ा है जिस से पशुपालन बहुत ही खर्चीला काम हो गया है.

घटते दुधारू जानवरों की वजह से पिछले 20 सालों में दूध का दाम तेजी से बढ़ा है. आम आदमी जो कोई दुधारू जानवर नहीं पाल सकता, वह महंगे दूध खरीदने की हालत में नहीं होता है.

Milkगौर करने वाली बात यह है कि बिना किसी सरकारी मदद के देश में दूध का 70 फीसदी कारोबार असंगठित ढांचा संभाल रहा है. देश में दूध उत्पादन में 96 हजार सहकारी संस्थाएं जुड़ी हुई हैं. 14 राज्यों में अपनी दुग्ध सहकारी संस्थाएं हैं. लेकिन मांस निर्यात की वजह से पशुधन के खात्मे का असर घटते दूध उत्पादन पर साफ दिखाई पड़ रहा है. इस असंगठित क्षेत्र (दूध उत्पादन) में 7 करोड़ से ज्यादा लोग जुड़े हुए हैं, जिस में अशिक्षित कारोबारी ज्यादा हैं.

यदि मांस निर्यात पर सरकारी रोक न लगी या गैरकानूनी बूचड़खानों के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो संभव है कि कुछ सालों में ही इस असंगठित क्षेत्र से जुड़े लोगों को किसी और क्षेत्र में कारोबार के लिए मजबूर हो कर आना पड़े.

मांस निर्यात के आईसीएआर के आंकड़े बताते हैं कि हर साल तकरीबन 9.12 लाख जो भैंसें बूचड़खानों में कत्ल कर दी जाती हैं, यदि वे भैंसें कत्लखाने में जाने से बच जाएं, तो 2,95,50,000 टन गोबर की खाद बनाई जा सकती है. इस से 39.40 हेक्टेयर कृषि भूमि को खाद मुहैया कराई जा सकती है. इस से जहां जैविक खेती को बढ़ावा मिलेगा, वहीं महंगी रासायनिक खादों से भी छुटकारा मिल जाएगा.

दूसरी तरफ  यदि देखा जाए तो इनसान और जानवर एकदूसरे के पूरक हैं. इनसान यदि एक जानवर को पालता है, तो वह जानवर उस के पूरे परिवार को पालता है. इतना ही नहीं, बंदर, रीछ, घोड़े, बैल, सांड़, भैंसा और गाय इनसान की जिंदगी के अहम हिस्से हैं.

आज भी लाखों लोगों की आजीविका इन जानवरों पर आधारित है. राजस्थान में एक कहावत है, कहने को तो भेड़ें पालते हैं, दरअसल भेड़ें ही इन को पालती हैं. इन के दूध, घी और ऊन आदि से हजारों परिवारों की जीविका चलती है. भेड़ों के दूध को वैज्ञानिकों ने फेफड़े के रोगियों के लिए बहुत ही फायदेमंद बताया है.

‘बांबे ह्यूमैनेटेरियन लीग’ के अनुसार, जानवरों से हर साल दूध, खाद, ऊर्जा और भार ढोने वाली सेवा द्वारा देश को अधिक आय होती है. इस के अलावा मरने के बाद इन की हड्डियों और चमड़े से जो आय होती है, वह भी करोड़ों रुपए में. यांत्रिक कत्लखानों को बंद कर दिया जाए, तो लाखों जानवरों का वध ही नहीं रुकेगा, बल्कि उस में इस्तेमाल होने वाला 70 करोड़ लिटर से अधिक पानी की बचत होगी, जो कत्लखानों की धुलाई में इस्तेमाल होता है.

ऐसे एकदो नहीं, बल्कि तमाम उदाहरण हैं, जिन से मांस निर्यात से होने वाले नुकसान का पता चलता है. आज जरूरत इस बात की है कि दुधारू जानवरों और भार ढोने वाले जानवरों को उन की उपयोगिता के मुताबिक उन का उपयोग किया जाए और उन्हें कत्लखाने भेजने की अपेक्षा उन को परंपरागत कामों में इस्तेमाल किया जाए. इस से जहां दुधारू जानवरों की संख्या बढ़ेगी, वहीं दूध और कंपोस्ट खाद की समस्या से भारत को नजात मिलेगी.

Meatयदि महज भेड़ों को ही बूचड़खानों में भेजने की जगह उन का परंपरागत इस्तेमाल (जब तक वे जीवित रहें) किया जाए, तो 600 करोड़़ रुपए का दूध मिलेगा, 450 करोड़ रुपए की खाद, 50 करोड़ रुपए की ऊन प्राप्त होगी. इसी तरह गाय के वध को रोक देने से सालभर में जो लाभ होगा, वह हैरानी में डालने वाला है.

आंकड़ों के अनुसार, एक गाय के गोबर से सालभर में तकरीबन 17,000 रुपयों की खाद प्राप्त होगी. रोजाना यांत्रिक कत्लखानों में 60,000 गाय कटती हैं जिन के गोबर मात्र से प्रतिवर्ष लगभग एक अरब रुपए की आमदनी हो सकती है. दूध, घी, मक्खन और मूत्र से होने वाले फायदे को जोड़ दिया जाए, तो अरबों रुपए की आय केवल गाय के वध को रोक देने से देश को हो सकती है.

ये आंकड़े और तथ्य यह बताते हैं कि देश की खुशहाली आम आदमी की बेहतरी के साथसाथ पर्यावरण की रक्षा के लिए गुलाबी क्रांति की नहीं, बल्कि निरापद श्वेत और हरित क्रांति की जरूरत है. इस से परंपरागत व्यवसायों को बढ़ावा मिलेगा और मांस निर्यात जैसे अहिंसा प्रधान देश में हिंसा वाले व्यवसाय से छुटकारा भी मिल सकेगा.

प्राकृतिक खेती पर प्रशिक्षण

उदयपुर : 4 नवंबर, 2023. महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के अनुसंधान निदेशालय में संस्थागत विकास कार्यक्रम के अंतर्गत ‘‘प्राकृतिक खेती से स्थायित्व कृषि एवं पारिस्थितिकी संतुलन” पर 2 दिवसीय प्रशिक्षण का समापन हुआ. इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में डा. एसके शर्मा, सहायक महानिदेशक, मानव संसाधन, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली ने अपने उद्बोधन में कहा कि प्राकृतिक कृषि की महत्ता को देखते हुए प्राकृतिक खेती पर स्नातक छात्रों के लिए विशेष पाठ्यक्रम पूरे राष्ट्र में आरंभ किया जा रहा है.

उन्होंने आगे कहा कि प्राकृतिक खेती से मृदा स्वास्थ्य एवं पारिस्थितिकी संतुलन अच्छा रहेगा, जिस से कृषि में स्थायित्व आएगा. इस के लिए सभी विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों, शिक्षकों, विषय विशेषज्ञों एवं विद्यार्थियों के लिए प्रशिक्षण आयोजित किए जा रहे हैं.

उन्होंने यह भी बताया कि महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय का प्राकृतिक खेती में वृहद अनुसंधान कार्य एवं अनुभव होने के कारण यह विशेष दायित्व विश्वविद्यालय को दिया गया है.

विदित है कि राजस्थान कृषि महाविद्यालय के विद्यार्थियों के लिए गोविंद वल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के सस्य विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष एवं आचार्य डा. महेंद्र सिंह पाल ने विद्यार्थियों को प्राकृतिक कृषि में सस्य क्रियाएं एवं प्राकृतिक खेती के उद्देश्य दृष्टि एवं सिद्धांत पर अपना उद्बोधन दिया.

प्राकृतिक खेती के विषय में पूरे विश्व की दृष्टि भारत की ओर है. ऐसे में पूरे विश्व से वैज्ञानिक एवं शिक्षक प्रशिक्षण के लिए भारत आ रहे हैं. ऐसे में हमारा नैतिक दायित्व बनता है कि हम उत्कृष्ट श्रेणी के प्रशिक्षण आयोजित करें.

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि डा. पीके सिंह, परियोजना प्रभारी आईडीपी, नाहेप ने रसायनों के अविवेकपूर्ण उपयोग से होने वाली आर्थिक, पर्यावरण व मानव स्वास्थ्य को होने वाली हानियों के बारें में बताया.

उन्होंने आगे यह भी कहा कि सभी को खाद्य सुरक्षा प्रदान करना एवं प्रकृति व पारिस्थितिक कारकों को कृषि में समावेश कर के ही पूरे कृषि तंत्र को ‘‘शुद्ध कृषि’’ में रूपांतरित किया जा सकता है.

डा. पीके सिंह ने कहा कि प्राकृतिक खेती को अपनाने के साथसाथ हमें बढ़ती आबादी के लिए पर्याप्त खाद्य उत्पादन को दृष्टि में रखना चाहिए.

Organic Farmingडा. एसएस शर्मा, अधिष्ठाता, राजस्थान कृषि महाविद्यालय, उदयपुर ने कहा कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने प्राकृतिक खेती के महत्व को देखते हुए एवं इसे कृषि में स्थापित करने के लिए पाठ्यक्रम का निर्माण किया गया है, जिसे पूरे राष्ट्र में प्राकृतिक कृषि का 180 क्रेडिट का पाठ्यक्रम स्नातक विद्यार्थियों को पढ़ाया जाएगा.

उन्होंने आगे यह भी कहा कि प्राकृतिक खेती को सफल रूप में प्रचारित व प्रसारित करने के लिए सब से पहले जरूरत है कि इस की गूढ़ जानकारी को स्पष्ट रूप से अर्जित किया जा सके, अन्यथा जानकारी के अभाव में प्राकृतिक खेती को सफल रूप से लागू करना असंभव होगा.

डा. एसएस शर्मा ने बताया कि इस प्राकृतिक खेती के पाठ्यक्रम के द्वारा स्नातक छात्र तैयार होंगे, जो किसानों तक इसे सही रूप में प्रचारित करेंगे.

उन्होंने प्राकृतिक खेती पर विभिन्न अनुसंधान परियोजनाएं चालू करने की आवश्यकता पर जोर दिया, वहीं डा. अरविंद वर्मा, निदेशक अनुसंधान एवं कोर्स डायरेक्टर ने अतिथियों का स्वागत किया. साथ ही, प्राकृतिक खेती एवं जैविक खेती के बारे में विद्यार्थियों को विस्तृत रूप से बताया.

डा. अरविंद वर्मा ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि प्राकृतिक खेती में प्रक्षेत्र पर उपलब्ध संसाधनों का पूर्ण उपयोग किया जाता है, जबकि जैविक खेती में रसायनमुक्त जैविक पदार्थों का बाहर से समावेश किया जा सकता है. उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती में जीवामृत एवं बीजामृत के साथ नीमास्त्र एवं ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया जाता है.

रास नहीं आई शहर की जिंदगी, खेती को बनाया रोजगार

हाल के दशक में युवाओं का खेती में रुझान तेजी से बढ़ा है, इसलिए तमाम बड़ी डिगरियों वाले भारीभरकम तनख्वाह को छोड़ खेती की तरफ रुख मोड़ रहे हैं, जिस से ऐसे लोग नौकरियों से कई गुना ज्यादा खेती से आमदनी ले रहे हैं.

ऐसे ही एक शख्स हैं अमित विक्रम त्रिपाठी, जो सेना में 18 साल की नौकरी करने के बाद जब 36 साल की उम्र में रिटायर हुए, तो उन्होंने लखनऊ जैसे महानगर में बसने का फैसला किया और वहां पर घर बनवाने के लिए 2 प्लौट भी खरीदे, लेकिन वहां की भीड़भाड़ और भागमभाग जिंदगी को देख कर उन का मन उचट गया, इसलिए उन्होंने लखनऊ में बसने के बजाय अपने गांव में रह कर ही खेती करने का फैसला किया और आज वे खेती से न केवल लाखों रुपए की आमदनी हासिल कर रहे हैं, बल्कि दर्जनों लोगों को रोजगार भी दे रहे हैं.

जनपद बस्ती के सल्टौआ गोपालपुर ब्लौक के मनवा गांव के रहने वाले अमित विक्रम त्रिपाठी ने 17 साल की उम्र में सेना की नौकरी जौइन कर 18 वर्षों तक देश के सरहद की रक्षा की और जब उन्हें सेना से रिटायरमैंट मिला, तो उन्होंने शहर में रह कर अपने बच्चों को महानगरीय जीवनशैली में शिक्षा दिलाएंगे. लेकिन उन का मन महानगरों की जीवनशैली में नहीं लगा और अपने गांव लौट कर खेती करने का निर्णय लिया.

केले व सुगंधित धान की आमदनी से बढ़ा हौसला

गांव लौट कर उन्होंने 4 साल पहले खेती की शुरुआत केला और काला नमक धान की फसल से की, जिस में उन के 2 हेक्टेयर केले की फसल में 2 लाख रुपए की लागत आई, जबकि 2 हेक्टेयर काला नमक धान में 60,000 रुपए आई, जिस में उन्होंने लागत छोड़ कर केले की खेती से पहले साल ही लगभग 3 लाख

रुपए का मुनाफा कमाया. इस के अलावा काला नमक धान से भी 2 लाख रुपए की आमदनी हुई.

Village Farmingबढ़ी आमदनी से दूसरों को दे रहे हैं रोजगार

पहली बार में ही खेती से हुई आमदनी से अमित विक्रम त्रिपाठी का हौसला और भी बढ़ गया. इस के बाद उन्होंने काला नमक धान और केले की खेती के रकबे को तो बढ़ाया ही, साथ में शिमला मिर्च, राई सहित सब्जियों की खेती की तरफ भी कदम बढ़ाया.

इस से उन की आय में लगातार इजाफा होने लगा और वर्तमान में वे सालभर में खेती से लगभग 10 लाख रुपए की आमदनी प्राप्त कर रहे हैं. इस के अलावा वे खेतों में काम करने वाले तकरीबन डेढ़ दर्जन लोगों को रोजगार दे रहे हैं.

अमित विक्रम त्रिपाठी का कहना है कि लोग गांव छोड़ कर रोजगार के लिए शहरों की तरफ भाग रहे हैं. ऐसे में शहरों पर बोझ बढ़ रहा है और गांवों में खेती बंजर होती जा रही है. अगर यही हाल रहा, तो दुनिया के सामने खाद्यान्न संकट पैदा होने में देर नहीं लगेगी.

उन का कहना है कि खेती आज के दौर में घाटे का सौदा नहीं रही है. बस जरूरत है खेती को सही ढंग से करने की. उस में उन्नत तकनीकी का उपयोग हो. साथ ही, मार्केट की भरपूर समझ हो.

उन का यह भी कहना है कि अगर खेती को सही तरीके से किया जाता है, तो नौकरियों से यह कई गुना बेहतर नतीजे दे सकती है.

मोटे अनाजों की खेती

लघु या छोटी धान्य फसलों जैसे मंडुआ, सावां, कोदों, चीना, काकुन आदि को मोटा अनाज कहा जाता है. इन सभी फसलों के दानों का आकार बहुत छोटा होता है. लघु अनाज पोषक तत्त्वों और रेशे से भरपूर होने के चलते इस का औषधीय उपयोग भी है.

यह आयरन, कैल्शियम और प्रोटीन के साथसाथ फास्फोरस का भी अच्छा स्रोत है. मंडुआ से रोटी, ब्रेड, सत्तू, लड्डू, बिसकुट आदि तैयार किए जाते हैं, वहीं सावां, कोदों, चीना व काकुन को चावल, खीर, दलिया व मर्रा के रूप में उपयोग करते हैं और पशुओं को चारा भी मिल जाता है.

जहां मुख्य अन्य फसलें नहीं उगाई जा सकती हैं, वहां पर ये फसलें आसानी से उगा ली जाती हैं. ये फसलें सूखे व अकाल को सहन कर लेती हैं और 70-115 दिन में तैयार हो जाती हैं. फसलों पर कीट व रोगों का प्रकोप कम होता है.

ग्रामीण क्षेत्रों में इन मोटे अनाजों के बारे में अनेक कहावतें प्रचलित हैं, जैसे :

मंडुआ मीन, चीन संग दही,

कोदों भात दूध संग लही.

मर्रा, माठा, मीठा.

सब अन्न में मंडुआ राजा.

जबजब सेंको, तबतब ताजा.

सब अन्न में सावां जेठ.

से बसे धाने के हेठ.

 

खेत की तैयारी

 

मिट्टी पलटने वाले हल से एक गहरी जुताई करें. इस के बाद 2-3 बार हैरो से गहरी जुताई करें.

मंडुआ की उन्नत किस्में

जल्दी पकने वाली प्रजाति (90-95 दिन) वीआर 708, वीएल 352, जीपीयू 45 है, जिस की उपज क्षमता प्रति बीघा (2500 वर्गमीटर/20 कट्ठा) 4-5 क्विंटल है.

मध्यम व देर से पकने वाली प्रजाति (100-115 दिन) जीपीयू 28, 67, 85, आरएयू 8 है. इस की उपज क्षमता 5-6 क्विंटल प्रति बीघा है.

सावां की प्रजाति

वीएल 172  (80-85 दिन), वीएल 207, आरएयू 3, 9 (85-90 दिन).

कोदों प्रजाति

जेके 65, 76, 13, 41, 155, 439 (अवधि 85-90 दिन), जीपीयूके पाली, डिडरी (अवधि 100-115 दिन) है.

चीना की प्रजाति

कम अवधि (60-70 दिन) एमएस 4872, 4884 व बीआर 7, मध्यम व देर से पकने वाली प्रजाति (70-75 दिन अवधि) जीपीयूपी 21, टीएनएयू 151, 145 है.

काकुन की उन्नत किस्में

आरएयू 2, को. 4, अर्जुन (75-80 दिन अवधि) व एसआईए 326, 3085, बीजी 1, मध्यम व देर से (80-85 दिन) पकने वाली है.

बीज की दर

प्रति बीघा मंडुआ 2.5-3.0 किलोग्राम सावां, कोदों, चीना, काकुन का 2.0 से 2.5 किलोग्राम की आवश्यकता होती है. सभी फसलों की बोआई जून से जुलाई महीने तक की जाती है.

बोआई की दूरी

मंडुआ में लाइन से लाइन की दूरी 20-25 सैंटीमीटर और पौध से पौध की दूरी 10 सैंटीमीटर रखनी चाहिए. सावां, कोदों, चीना व काकुन के लिए 25-30 सैंटीमीटर लाइन से लाइन और पौध से पौध की दूरी 10 सैंटीमीटर रखें. सभी फसलों की बोआई की गहराई 2 सैंटीमीटर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए.

खाद एवं उर्वरक

सभी फसलों में मिट्टी की जांच के आधार पर ही खाद व उर्वरक का प्रयोग करें. बोआई से पहले 17 किलोग्राम यूरिया, 62 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट व 10 किलोग्राम म्यूरेट औफ पोटाश का प्रयोग प्रति बीघा में करें. 25-30 दिन की पौध होने पर निराई के बाद 17 किलोग्राम यूरिया डालें.

उपज क्षमता

सावां, कोदों, चीना व काकुन की जल्दी पकने वाली प्रजातियों की 3-4 क्विंटल और मध्यम व देर से पकने वाली प्रजातियों की उपज 3.50 से 4.50 क्विंटल प्रति बीघा है.

अंत:वर्ती खेती

अरहर, ज्वार व मक्का के साथ आसानी से मोटे अनाजों की अंत:खेती की जा सकती है.

5 राज्यों के चुनावों के केंद्र में “किसान और घोषणापत्र”

नवंबर की सर्दी में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलगाना और मिजोरम सहित पांच राज्यों के चुनाव होने हैं. इधर जैसेजैसे ठंड बढ़ रही है, वैसेवैसे इन राज्यों की हवाओं में राजनीति की गरमी बढ़ते जा रही है.

यों तो लोकतांत्रिक देश भारत में आएदिन सहकारी समितियों से ले कर सिंचाई समितियों तक नाना प्रकार की समितियों के चुनाव, ग्राम पंचायत, जनपद, जिला जनपद, नगरपालिका, निगम  चुनाव, विधानसभा, राज्यसभा, लोकसभा के चुनाव, उपचुनाव होते ही रहते हैं, पर कई मायनों में इस बार हो रहे इन 5 राज्यों के चुनाव कुछ अलग हट कर हैं.

सब से महत्वपूर्ण बात यह कि इन 5 राज्यों के चुनावों में पहली बार “किसान” केंद्रीय भूमिका में है. इन सभी चुनावों में प्रदेश के किसानों के जरूरी मुद्दों के अलावा प्रमुख राष्ट्रीय व क्षेत्रीय पार्टियों के घोषणापत्रों का महत्व भी बढ़ा है, जबकि इस से पहले जिस जनता के लिए यह घोषणापत्र तैयार किए जाते थे, वह जनता स्वयं ही इन घोषणापत्रों को गंभीरता से नहीं लेती थी और स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवार की छवि, जाति, धर्म अथवा अन्यान्य मापदंडों के आधार पर वोट देने के लिए अपने प्रत्याशी का चयन करती थी.

चूंकि यदि जनता ही पार्टियों के घोषणापत्रों और जीतने के बाद घोषणापत्र में किए गए वादों के बिंदुवार क्रियान्वयन के आधार पर अगले चुनावों में वोट नहीं डालती, तो फिर भला राजनीतिक पार्टियां अपने घोषणापत्रों को गंभीरता से ले कर उन पर बिंदुवार अमल क्यों करेंगी. इसीलिए चुनाव जीतने के बाद प्रायः घोषणापत्र को डस्टबिन के हवाले कर देती थीं और उन से कोई सवाल भी नहीं पूछता था.

कुलमिला कर ‘घोषणापत्र’ का मतलब ही हो गया वो थोथी घोषणाएं, जो केवल लोगों की रुचि के लिए घोषित की जाएं, पर जिन का अमल करना जरूरी नहीं है.

जनता में शिक्षा और जागरूकता की कमी, धर्म, जातियोंउपजातियों में सामाजिक बंटवारा और तदनुसार वोटों के ध्रुवीकरण व बंटवारा आदि इस की प्रमुख वजह रही हैं. वजह चाहे जो भी रही हों, पर इस से भारत का लोकतंत्र धीरेधीरे कमजोर ही हुआ है.

किंतु वर्तमान चुनाव में ‘घोषणापत्र’ महत्वपूर्ण व निर्णायक मुद्दा बन कर उभरा है. इस का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि केंद्र की सत्ता में काबिज और दुनिया की सब से बड़ी पार्टी कहलाने वाली भाजपा ने आज पर्यंत, जबकि चुनाव होने में केवल एक हफ्ता ही शेष है, किंतु अभी तक अपने घोषणापत्र जारी नहीं किए हैं. और यह जानबूझ कर रणनीतिक कारणों से है.

कांग्रेस की ब्रह्मास्त्ररूपी ‘चुनावी-गारंटियों’ को पर्याप्त टक्कर देने के लिए भाजपा में भारी माथापच्ची और विचारविमर्श जारी है. यही वजह है कि इन का घोषणापत्र अथवा संकल्पपत्र अभी तक जारी नहीं हुआ है.

घोषणापत्रों पर अमल करने के मामले में सब से पहले ठोस उदाहरण, 15 सालों के राजनीतिक वनवास के बाद किसानों के वोटों के दम पर सत्ता में दमदार तरीके से वापस लौटी छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने प्रस्तुत किया. छत्तीसगढ़ में लगभग 80 फीसदी वोटर किसान परिवारों से हैं और इन में भी ज्यादातर किसान धान की खेती करते हैं.

15 साल तक सत्ता में रही भाजपा ने बढ़ती लागत से परेशान इन धान किसानों को प्रति क्विंटल धान पर 270 रुपए का बोनस देने की घोषणा की, लेकिन सत्ता में आने के बाद एकदम से मुकर गई.

किसानों ने सरकार को उन के वादे की लगातार याद दिलाई और घोषित बोनस देने की मांग की, पर सरकार ने इन बेचारे रिरियाते किसानों की ओर दोबारा मुड़ कर भी नहीं देखा.

इसी क्रम में छत्तीसगढ़ राज्य सरकार ने औषधीय पौधों के किसानों को केंद्र के अनुदान के अलावा 25 फीसदी अनुदान की घोषणा की, पर 15 सालों के शासन में एक भी किसान को यह अनुदान नहीं दिया गया.

अलगअलग राजनीतिक तिकड़मों के जरीए भाजपा की सरकार बनती रही, किसान मन मसोस कर बैठे रहे और खून के आंसू रोते रहे. पिछले चुनाव में जब कर्जमाफी और 2500 रुपए पर धान खरीदने के वादे को घोषणापत्र में शामिल कर छत्तीसगढ़ कांग्रेस पार्टी किसानों के पास गई, तो पहलेपहल किसानों ने इन की घोषणाओं पर भरोसा नहीं किया. आखिरकार कांग्रेस को गांवगांव जा कर कर्जमाफी एवं 2500 रुपए प्रति क्विंटल धान खरीदी करने की गंगाजल ले कर शपथ लेनी पड़ी. अंततः किसानों ने कांग्रेस की शपथ पर भरोसा किया और 90 सीट में 68 सीट दे कर बंपर जीत दिलाई.

अब बारी कांग्रेस की थी. कांग्रेस ने भी सत्ता में वापसी व ताजपोशी के 2 घंटे के भीतर ही किसानों के कर्जमाफी के वादे को पूरा करने का प्रयास किया. घोषणाओं के क्रियान्वयन की छुटपुट खामियों और शराबबंदी को तकनीकी रूप से न कर पाने के अलावा कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र की सभी घोषणाओं को पूरा करने में पूरा जोर लगाया.

कुछ महीने पहले हुए हिमाचल प्रदेश के चुनाव में भाजपा की नई पेंशन योजना से असंतुष्ट 2 लाख से ज्यादा कर्मचारी परिवारों के लिए ओल्ड पेंशन एक बड़ा व संवेदनशील मुद्दा था. कांग्रेस ने इस मुद्दे के महत्व को समझते हुए इसे अपने घोषणापत्र में शामिल किया और जीतने पर पुरानी पेंशन योजना लागू करने का वादा किया.

चुनाव जीतने के बाद इस पर कांग्रेस ने तत्काल अमल भी किया. इस से सरकारी कर्मचारियों में और जनता में भी कांग्रेस की विश्वसनीय कुछ और बढ़ी.

छत्तीसगढ़ और हिमाचल प्रदेश के चुनावी घोषणापत्रों पर अमल के बाद कांग्रेस ने कर्नाटक चुनावों में अपने घोषणापत्र में जरूरी जमीनी मुद्दों को शामिल कर घोषणापत्र के दम पर न केवल बाजी मारी, बल्कि कर्नाटक की सत्ता पर बैठते ही उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अपने घोषणापत्र का बिंदुवार क्रियान्वयन करने का प्रयास किया. सोशल मीडिया के बूते इसे पड़ोसी प्रदेशों और देश के वोटरों ने देखा भी और समझा भी.

राजनीतिक पार्टियों के ढपोरशंखी घोषणाओं व थोथे घोषणापत्रों के प्रति जनता के बढ़ते अविश्वास, उदासीनता व बेजारी को देखते हुए ही अब इसे घोषणापत्र के बजाय ‘संकल्पपत्र’ और ‘गारंटीपत्र’ आदि ज्यादा विश्वसनीय नाम दिए जा रहे हैं.

कांग्रेस को भी यह सद्बुद्धि रातोंरात नहीं आई. केंद्र व राज्यों में जब कांग्रेस की लुटिया पूरी तरह डूबने लगी, तब उन्हें किसानों के वोटों और घोषणापत्रों का महत्व समझ में आया‌. उन्होंने किसानों की समस्याओं और दूसरे तबकों की जरूरत का ध्यान रखते हुए व्यावहारिक घोषणापत्र बनाए और उस पर ईमानदारी से अमल करने की कवायद शुरू की. फलत: कांग्रेस का बढ़ता हुआ ग्राफ सामने है.

कांग्रेस के कायाकल्प में राहुल गांधी की भूमिका का अगर जिक्र न हो, तो नाइंसाफी होगी. ‘भारत जोड़ो’ की 3500 किलोमीटर की यात्रा में पगपग पर जनता के हर तबके के साथ जुड़ने की प्रक्रिया में उन के व्यक्तित्व के कई सकारात्मक पहलू देश की जनता ने देखे, राहुल गांधी को ले कर गाड़े गए कई नकारात्मक मिथक टूटे और कई नए बने.

राहुल गांधी के लिए यह कायाकल्प की अंतर्यात्रा साबित हुई, वहीं कांग्रेस के लिए भी यह यात्रा एक नई संजीवनी बूटी साबित हुई.

अब अगर भाजपा की बात करें, तो कांग्रेस पर लगातार लग रहे घोटालों, भ्रष्टाचार के आरोपों और बदइंतजामी के चलते जनता ने साल 2014 के चुनाव में नरेंद्र मोदी और भाजपा पर यकीन कर उन्हें एक मौका दिया और केंद्र की सत्ता पर बिठाया.

वहीं साल 2019 के चुनाव में नरेंद्र मोदी व भाजपा ने किसानों की आय को दोगुना करने, 100 स्मार्ट सिटी बनाने, प्रतिवर्ष 2 करोड़ युवाओं को रोजगार देने जैसे बड़ेबड़े वादे किए, बुलेट ट्रेन चलाने, गंगा की समग्र सफाई और उस पर नौपरिवहन स्थापित करने जैसे कितने ही सुनहरे सपने दिखाए. वह वादे और इरादे एवं घनगर्जन के साथ की गई ढपोरशंखी घोषणाएं आज केवल जनता को ही नहीं, बल्कि स्वयं भाजपा को भी मुंह चिढ़ा रही हैं.

वैसे, देश के किसानों द्वारा लंबे समय से मांगी जा रही उन की सभी फसलों के लिए एक सक्षम “न्यूनतम समर्थन मूल्य- गारंटी कानून” ( एमएसपी गारंटी-कानून) जल्द से जल्द ला कर देश के किसानों की नाराजगी कुछ हद तक कम की जा सकती है. देश के किसानों, किसान संगठनों, युवाओं से सीधी जमीनी चर्चा कर के इन की समस्याओं के दीर्घकालिक हल भी ढूंढे जा सकते हैं, किंतु आगामी साल 2024 के चुनाव में कौन सा मुंह ले कर देश के किसानों, बेरोजगारों और आम जनता के पास जाएंगे, मोदी और भाजपा के सामने सीना ताने खड़ा यह वो सवाल है, जिस का कोई संतोषजनक जवाब फिलहाल इन के पास नहीं है.