शीत ऋतु में गन्ने की वैज्ञानिक खेती

गन्ना एक नकदी फसल है, जिस से गुड़, चीनी, शराब आदि बनाए जाते हैं. वहीं दूसरी ओर ब्राजील देश में गन्ने का उत्पादन सब से ज्यादा होता है. भारत का गन्ने की उत्पादकता में संपूर्ण विश्व में दूसरा स्थान है.

गन्ने को मुख्यत: व्यावसायिक चीनी उत्पादन करने वाली फसल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, जो कि विश्व में उत्पादित होने वाली चीनी के उत्पादन में तकरीबन 75 फीसदी योगदान करता है, शेष में चुकंदर, मीठी ज्वार इत्यादि फसलों का योगदान है.

गन्ने का प्रयोग बहुद्देशीय फसल के रूप में चीनी उत्पादन के साथसाथ अन्य उत्पाद जैसे कि पेपर, इथेनाल एल्कोहल, सैनेटाइजर, बिजली उत्पादन व जैव उर्वरक के लिए कच्चे पदार्थों के रूप में इस्तेमाल किया जाता है.

उपयुक्त भूमि, मौसम व खेत की तैयारी

उपयुक्त भूमि : गन्ने की खेती मध्यम से भारी काली मिट्टी में की जा सकती है. दोमट भूमि, जिस में सिंचाई की उचित व्यवस्था व जल का निकास अच्छा हो और जिस का पीएच मान 6.5 से 7.5 के बीच हो, गन्ने के लिए सर्वोत्तम  है. उपयुक्त मौसम में गन्ने की बोआई वर्षा में दो बार की जा सकती है.

शरदकालीन बोआई अक्तूबरनवंबर में इस फसल की बोआई करते हैं और फसल 10 से 14 माह में तैयार होती है. वसंतकालीन बोआई फरवरी से मार्च माह तक फसल बोते हैं. यह फसल 10 से 12 माह में तैयार होती है.

नोट : शरदकालीन गन्ने वसंत में बोए गए गन्ने से 25-30 प्रतिशत व ग्रीष्मकालीन गन्ने से 30-40 प्रतिशत अधिक पैदावार देता है.

खेत की तैयारी

खेत की ग्रीष्मकाल में 15 अप्रैल से 15 मई के पूर्व एक गहरी जुताई करें. इस के पश्चात 2 से 3 बार देशी हल या कल्टीवेटर से जुताई कर के और रोटावेटर व पाटा चला कर खेत को भुरभुरा, समतल और खरपतवाररहित कर लें. रिजर की सहायता से 3 से 4.5 फुट की दूरी पर 20-25 सैंटीमीटर गहरी कूंड़ें बनाएं.

उपयुक्त किस्म, बीज का चयन व तैयारी गन्ने के सारे रोगों की जड़ अस्वस्थ बीज का उपयोग ही है. गन्ने की फसल उगाने के लिए पूरा तना न बो कर इस के 2 या 3 आंख के टुकड़े काट कर उपयोग में लाएं. गन्ने की ऊपरी भाग की अंकुरण क्षमता 100 प्रतिशत, बीच में 40 प्रतिशत और निचले भाग में केवल 19 प्रतिशत ही होती है. 2 आंख वाला टुकड़ा सर्वोत्तम रहता है.

Sugarcaneगन्ना के बीज का चुनाव करते समय बरतें सावधानियां

* उन्नत जाति के स्वस्थ निरोग शुद्ध बीज को ही लें.

* गन्ना बीज की उम्र लगभग 8 माह या कम हो, तो अंकुरण अच्छा होता है. बीज ऐसे खेत से लें, जिस में रोग व कीट का प्रकोप न हो. जिस में खादपानी समुचित मात्रा में दिया जाता रहा हो.

* जहां तक हो, नरमगरम हवा उपचारित (54 सैंटीग्रेड और 85 प्रतिशत आर्द्रता पर 4 घंटे) या टिश्यू कल्चर से उत्पादित बीज का ही चयन करें.

* हर 4-5 साल बाद बीज बदल दें, क्योंकि समय के साथ रोग व कीट लगने में वृद्धि होती जाती है.

* बीज काटने के बाद कम से कम समय में बोनी कर दें.

गन्ने की उन्नत जातियां

को. 05011 (कर्ण-9), को.से. 11453, को.षा. 12232, को.षा. 08276, यू.पी. 05125, को. 0238 (कर्ण-4), को. 0118 (कर्ण-2), को.से. 98231, को.शा. 08279, को.शा. 07250, को.शा. 8432, को.शा. 96269 (शाहजहां), को.शा. 96275 (स्वीटी) आदि. ये जातियां उत्तर प्रदेश के लिए संस्तुत की गई हैं.

गन्ना बोआई का सब से उपयुक्त समय 

अक्तूबरनवंबर महीना ही क्यों चुनें

* फसल में अग्रवेधक कीट का प्रकोप नहीं होता.

* फसल वृद्धि के लिए अधिक समय मिलने के साथ ही अंतरवर्तीय फसलों की भरपूर संभावना.

* अंकुरण अच्छा होने से बीज कम लगता है और कल्ले अधिक फूटते हैं.

* अच्छी बढ़वार की वजह से खरपतवार कम होते हैं.

* सिंचाई जल की कमी की दशा में, देर से बोई गई फसल की तुलना में नुकसान कम होता है.

* फसल के जल्दी पकाव पर आने से कारखाने जल्दी पिराई शुरू कर सकते हैं.

* जड़ फसल भी काफी अच्छी होती है.

बीज की मात्रा

75-80 क्विंटल प्रति हेक्टेयर 2 आंख वाले टुकड़े लगेंगे.

बीजोपचार

बीजजनित रोग व कीट नियंत्रण के लिए कार्बंडाजिम 2 ग्राम प्रति लिटर पानी व क्लोरोपायरीफास 5 मिलीलिटर प्रति लिटर की दर से घोल बना कर आवश्यक बीज का 15 से 20 मिनट तक उपचार करें.

खाद और उर्वरक

फसल के पकने की अवधि लंबी होने के कारण खाद और उर्वरक की आवश्यकता भी अधिक होती है. इसलिए खेत की अंतिम जुताई से पहले 20 टन सड़ी गोबर या कंपोस्ट खाद खेत में समान रूप से मिला देना चाहिए.

इस के अतिरिक्त 180 किलोग्राम नत्रजन (323 किलोग्राम यूरिया), 80 किलोग्राम फास्फोरस (123 किलोग्राम डीएपी) और 60 किलोग्राम पोटाश (100 किलोग्राम म्यूरेट औफ पोटाश) प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए. फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा बोआई के समय प्रयोग करें और नत्रजन की मात्रा को इस प्रकार प्रयोग करें. गन्ने में नत्रजन की कुल मात्रा को चार समान भागों में बांट कर बोवनी के क्रमश: 30, 90, 120 और 150 दिन में प्रयोग करें.

वसंतकालीन गन्ना

गन्ने में नत्रजन की कुल मात्रा को 3 समान भागों में बांट कर बोवनी क्रमश: 30, 90 और 120 दिन में प्रयोग करें.

नत्रजन को उर्वरक के साथ नीमखली के चूर्ण में मिला कर प्रयोग करने में नत्रजन उर्वरक की उपयोगिता बढ़ती है. साथ ही, दीमक से भी सुरक्षा मिलती है. 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट व 50 किलोग्राम फेरस सल्फेट 3 वर्ष के अंतराल में जिंक व आयरन सूक्ष्म तत्त्व की पूर्ति के लिए आधार खाद के रूप में बोआई के समय उपयोग करें.

जल प्रबंधन :

सिंचाई व जल निकास

गरमी के दिनों में भारी मिट्टी वाले खेतों में 8-10 दिन के अंतर पर और सरदी के दिनों में 15 दिन के अंतर से सिंचाई करें. हलकी मिट्टी वाले खेतों में 5-7 दिनों के अंतर से, जबकि गरमी के दिनों में 10 दिन के अंतर से सिंचाई करें.

सिंचाई की मात्रा कम करने के लिए गरेड़ों में गन्ने की सूखी पत्तियों की पलवार की 10-15 सैंटीमीटर की तह बिछाएं. गरमी में पानी की मात्रा कम होने पर एक गरेड़ छोड़ कर सिंचाई दे कर फसल बचावें. कम पानी उपलब्ध होने पर ड्रिप सिंचाई (टपक विधि) से करने से भी 60 प्रतिशत पानी की बचत होती है.

गरमी के मौसम में फसल 5-6 महीने तक की होती है, स्प्रिंकलर (फव्वारा) विधि से सिंचाई कर के 40 प्रतिशत पानी की बचत की जा सकती है. वर्षा के मौसम में खेत में उचित जल निकास का प्रबंध रखें. खेत में पानी के जमा होने से गन्ने की बढ़वार और रस की क्वालिटी प्रभावित होती है.

खाली स्थानों की पूर्ति

कभीकभी पंक्तियों में कई जगहों पर बीज अंकुरित नहीं हो पाता है. इस बात को ध्यान में रखते हुए खेत में गन्ने की बोआई के साथसाथ अलग से सिंचाई स्रोत के नजदीक एक नर्सरी तैयार कर लें. इस में बहुत ही कम अंतराल पर एक आंख के टुकड़ों की बोआई करें. खेत में बोआई के एक माह बाद खाली स्थानों पर नर्सरी में तैयार पौधों को सावधानीपूर्वक निकाल कर रोपाई कर दें.

खरपतवार प्रबंधन :

अंधी गुड़ाई

गन्ने का अंकुरण देर से होने के कारण कभीकभी खरपतवारों का अंकुरण गन्ने से पहले हो जाता है. इस के नियंत्रण के लिए एक गुड़ाई करना आवश्यक होता है, जिसे अंधी गुड़ाई कहते हैं.

निराईगुड़ाई

आमतौर पर प्रत्येक सिंचाई के बाद एक गुड़ाई आवश्यक होगी. इस बात का विशेष ध्यान रखें कि ब्यांत अवस्था (90-100 दिन) तक निराईगुड़ाई का काम निबटा लें.

मिट्टी चढ़ाना

वर्षा प्रारंभ होने तक फसल पर मिट्टी चढ़ाने का काम पूरा कर लें (120 से 150 दिन).

रासायनिक नियंत्रण

बोआई के पश्चात अंकुरण से पहले खरपतवारों के नियंत्रण के लिए एट्राजीन 2.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 600 से 800 लिटर पानी में घोल बना लें और बोआई के एक सप्ताह के अंदर खेतों में समान रूप से इस घोल का छिड़काव कर दें.

खड़ी फसल में चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के लिए 2-4-डी सोडियम साल्ट 2.8 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 600 से 800 लिटर पानी का घोल बना कर बोआई के 45 दिन बाद छिड़काव करें.

सकरी मिश्रित खरपतवार के लिए 2-4-डी सोडियम साल्ट 2.8 किलोग्राम मैट्रीब्यूजन 1 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 600 से 800 लिटर पानी का घोल बना कर बोआई के 45 दिन बाद छिड़काव करें.

उपरोक्त नीदानाशकों के उपयोग के समय खेत में नमी आवश्यक है.

अंतरवर्ती खेती

गन्ने की फसल की बढ़वार शुरू के 2-3 माह तक धीमी गति से होती है. गन्ने की 2 कतारों के बीच का स्थान काफी समय तक खाली रह जाता है. इस बात को ध्यान में रखते हुए यदि कम अवधि की फसलों को अंतरवर्ती खेती के रूप में उगाया जाए, तो निश्चित रूप से गन्ने की फसल के साथसाथ प्रति इकाई अतिरिक्त आमदनी प्राप्त हो सकती है. इस के लिए निम्न फसलें अंतरवर्ती खेती के रूप में उगाई जा सकती हैं.

शरदकालीन खेती

गन्ना+आलू (1:2), गन्ना+प्याज (1:2), गन्ना+मटर (1+1), गन्ना+धनिया (1:2) गन्ना+चना (1:2), गन्ना+गेंहू (1:2).

वसंतकालीन खेती

गन्ना+मूंग (1+1), गन्ना+उड़द (1+1), गन्ना+धनिया (1:3), गन्ना+मेथी (1:3).

गन्ने की कटाई

फसल की कटाई उस समय करें, जब गन्ने में सुक्रोज की मात्रा सब से अधिक हो, क्योंकि यह अवस्था थोड़े समय के लिए होती है. जैसे ही तापमान बढ़ता है, सुक्रोज का ग्लूकोज में परिवर्तन प्रारंभ हो जाता है और ऐसे गन्ने से शक्कर व गुड़ की मात्रा कम मिलती है.

कटाई से पहले पकाव का सर्वेक्षण करें इस के लिए रिफ्लैक्टोमीटर का उपयोग करें. यदि माप 18 या इस के ऊपर है, तो गन्ना परिपक्व होने का संकेत है. गन्ने की कटाई गन्ने की सतह से करें.

अधिक उपज लेने के लिए प्रमुख बिंदु

गन्ना फसल के लिए 8 माह की आयु का ही गन्ना बीज उपयोग करें. शरदकालीन गन्ना (अक्तूबरनवंबर माह) की ही बोआई करें.

गन्ना की बोआई कतार से कतार की दूरी 120-150 सैंटीमीटर दूरी पर गीली कूंड पद्धति से करें. बीजोपचार (फफूंदनाशक कार्बंडाजिम 2 ग्राम प्रति लिटर और कीटनाशक क्लोरोपायरीफास 5 मिलीलिटर प्रति लिटर 15-20 मिनट तक डुबा कर) ही बोआई करें.

जड़ प्रबंधन के तहत ठूंठ जमीन की सतह से काटना, गरेड़ तोड़ना, फफूंदनाशक व कीटनाशक से ठूंठ का उपचार, गेप फिलिंग, संतुलित उर्वरक (एनपीके-300:85:60) का उपयोग करें. गन्ने की फसल की कतारों के मध्य कम समय में तैयार होने वाली फसलों चना, मटर, धनिया, आलू, प्याज आदि फसलें लें खरपतवार नियंत्रण के लिए एट्राजिन 1.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर सक्रिय तत्त्व की दर से बोआई के 3 से 5 दिन के अंदर करें और 2-4-डी 750 ग्राम प्रति हेक्टेयर सक्रिय तत्त्व 35 दिन के अंदर छिड़काव करें.

गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में टपक सिंचाई पद्धति को प्रोत्साहन दिया जाए. गन्ना क्षेत्र विस्तार के लिए गन्ना उत्पादक किसानों के समूहों को शुगर केन हारवेस्टर, पावर बडचिपर व अन्य उन्नत कृषि यंत्रों को राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत 40 प्रतिशत अनुदान उपलब्ध कराया जाना चाहिए.

गन्ना बोआई यंत्र : सुगरकेन ट्रांस प्लांटर

नकदी फसल मानी जाने वाली गन्ने की खेती इस समय तमाम समस्याओं से दोचार हो रही है. एक तरफ गन्ने की तैयार फसल को चीनी मिलों द्वारा खरीदने के बाद भुगतान में हीलाहवाली, तो वहीं दूसरी तरफ खेती में घटती श्रम शक्ति और बढ़ती लागत ने किसानों को गन्ने की खेती से मुंह मोड़ने को मजबूर कर दिया है.

गन्ने की खेत की तैयारी से ले कर बोआई, उर्वरक, सिंचाई, रोग व कीट नियंत्रण, फिर फसल की गुड़ाई, कटाई, लदान व ढुलाई इन बीजों में किसान इतनी लागत लगा देता है कि मिलों द्वारा उस का वाजिब मूल्य न मिलने से गन्ना किसान का दूसरी फसलों को लेने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. ऐसे में गन्ने की खेती में काम आने वाले कृषि यंत्रों का प्रयोग कर किसान अपनी लागत में तो कमी ला ही सकता है, बल्कि कम श्रम के बाद अधिक मुनाफा भी कमा सकता है.

यहां हम गन्ना बोआई यंत्र सुगरकेन प्लांटर के बारे में जानकारी दे रहे हैं.

सुगरकेन ट्रांस प्लांटर

यह यंत्र न केवल गन्ने की बोआई को आसान बनाता है, बल्कि न्यूनतम लागत व श्रम शक्ति से किसान के गन्ने की खेती को लाभदायक बनाता है. सुगरकेन ट्रांस प्लांटर न्यूनतम 50 हार्सपावर के ट्रैक्टर में लगा कर उसे साफ्ट से जोड़ दिया जाता है. इस में लगे डब्बों में उर्वरक डाल कर खेत में गन्ने की बोआई के दौरान ही उर्वरक दे दिया जाता है. इन डब्बों के ऊपर 2 सीट लगी होती है, जिस पर 2 लोग बैठ कर गन्ने को पकड़ कर मशीन में डालते जाते हैं. यह मशीन पहले से तैयार किए गए खेत में गन्ने को रोपती है. यह मशीन गन्ने की आंखों व कलियों को नुकसान से भी बचाती है. मशीन द्वारा निर्धारित मात्रा में उर्वरक बोआई के दौरान ही मिल जाता है. साथ ही, यह निर्धारित दूरी पर गन्ने की बोआई करती है.

Farming Machinesइस मशीन द्वारा बनाई गई पंक्तियों की निश्चित गहराई व एकसाथ दोहरी पंक्ति से गन्ने का जमाव सामान्य तरीके से की जाने वाली बोआई की अपेक्षा 25 फीसदी अधिक होता है. इस मशीन द्वारा पारंपरिक तरीके से की जाने वाली बोआई की अपेक्षा श्रम की लागत में 55 फीसदी तक की कमी लाई जा सकती है.

यह मशीन न्यूनतम लागत व न्यूनतम श्रम में भी एक दिन में 4 एकड खेत की बोआई कर सकती है. मशीन से बोआई करने पर खाद का शतप्रतिशत उपयोग हो जाता है.

इस मशीन का रखरखाव व अनुरक्षण बेहद ही आसान है. गन्ना किसानों के लिए यह मशीन बोआई को आसान बनाने के साथ ही लागत में कमी लाने का एक बेहतर माध्यम साबित हो रही है. इस मशीन की अनुमानित कीमत 2 लाख रुपए है.

इस तरह न केवल किसान मशीनों का प्रयोग कर गन्ने के खेती को आसान बना सकते हैं, बल्कि लाभदायक भी बना सकते हैं.

गन्ने की खेती में काम आने वाले ट्रांस प्लांटर के बारे में अधिक जानकारी के लिए इस पते पर संपर्क कर सकते हैं :

सूरत सिंह,
श्रीजी हैवी प्रोजैक्ट वर्क्स लि.,
सुगर केंद्र क्राप सोलूसन,
ए- 504 अंधेरी कुर्ला रोड, अंधेरी ईस्ट, मुंबई- 400049
मोबाइल नंबर 9416853266

गन्ने की फसल में कीटों से रहें सावधान

वसंतकालीन व शरदकालीन पेड़ी गन्ने की फसल खेतों में लगी हुई है. गन्ने की फसल में कई तरह के कीटों के लगने का खतरा रहता है, जो पूरी फसल को बरबाद कर सकते हैं. इन से बचने के लिए किसानों को सब से पहले तो बोआई के समय ही कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए, जिस से कीट न लगें. लेकिन फिर भी अगर कीट लग जाते हैं, तो उस के लिए किसानों को उचित कीटनाशक का इस्तेमाल करना चाहिए.

गन्ने की खेती करने वाले किसानों को इस समय खास ध्यान देने की जरूरत है. गन्ने में मुख्य रूप से इस समय कीटों का प्रकोप हो सकता है, जिन की पहचान और नुकसान के लक्षण जानेंगे, तभी सही प्रबंधन कर पाएंगे.

दीमक : यह कीट बोआई से ले कर कटाई तक फसल की किसी भी अवस्था में लग सकता है. दीमक पेड़ी गन्ने के कटे सिरों, पेड़ी की आंखों, किल्लों, जड़ से तना तक गन्ने को काट देता है और कटे स्थान पर मिट्टी भर देता है.

प्रबंधन : दीमक की रोकथाम के लिए बावेरिया बेसियाना 2 किलोग्राम 500 लिटर पानी में घोल कर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करना चाहिए. इस के अलावा जिस खेत में दीमक का प्रकोप हो, उस में समुचित सिंचाई कर के भी दीमक को कम किया जा सकता है.

अंकुर बेधक : यह कीट गन्ने के किल्लों को प्रभावित करता है. इस कीट का प्रकोप गरमी के महीनों (मार्च से जून महीने तक) में अधिक होता है. प्रभावित पौधे की पहचान मृतसार का पाया जाना ऊपर से दूसरी या तीसरी पत्ती के मध्य सिरा पर लालधारी का पाया जाना है.

प्रबंधन : अंडों को इकट्ठा कर के नष्ट कर देना चाहिए. प्रभावित पौधों को पतली खुरपी से लार्वा/प्यूपा सहित काट कर निकाल कर चारे में प्रयोग करना या उसे नष्ट कर देना चाहिए.

पायरिला : यह कीट हलके से भूरे रंग का 10-12 मिलीलिटर लंबा होता है. इस का सिर लंबा व चोंचनुमा होता है. इस के शिशु और वयस्क गन्ने की पत्ती से रस चूस कर नुकसान  पहुंचाते हैं. इस का प्रकोप अप्रैल से अक्तूबर महीने तक पाया जाता है.

शल्क : गन्ने की पोरियों से रस चूसने वाला यह एक हानिकारक कीट है. इस के शिशु हलके पीले रंग के होते हैं, जो थोड़े समय में गन्ने की पोरियों पर चिपक जाते हैं. गतिहीन सदस्यों का रंग पहले राख की तरह भूरा होता है, जो धीरेधीरे काला हो जाता है. मछली के शल्क की तरह ये कीट गन्ने की पोरियों पर चिपके रहते हैं.

प्रबंधन : प्रभावित क्षेत्रों से अप्रभावित क्षेत्रों में बीज किसी भी दशा में वितरित नहीं करना चाहिए. जहां तक मुमकिन हो, ग्रसित खेतों की पेड़ी न ली जाए.

ग्रासहौपर : इस के निम्फ और वयस्क गन्ने की पत्तियों को जून से सितंबर महीने तक काट कर नुकसान पहुंचाते हैं.

प्रबंधन : रोकथाम के लिए मेड़ों की छंटाई और घासफूस की सफाई करें.

विशेष प्रबंधन

* सभी बेधक कीटों के लिए 4 लाइट फैरोमौन ट्रेप प्रति एकड़ की दर से खेत में लगाएं.

* नीम औयल/अजादिरैक्टीन 2.5 लिटर को 500 लिटर पानी में घोल कर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें.

* पीली/नीली स्टिकी ट्रेप 20 प्रति एकड़ में लगाएं.

* कैमिकल कीटनाशकों का इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर ही करें.

जनपद के जिला गन्ना अधिकारी/कृषि रक्षा अधिकारी/क्षेत्रीय गन्ना सहायक से भी तकनीकी जानकारी ले सकते हैं.

गन्ने की फसल में ऐसे करें देखभाल

गन्ना फसल में इस समय मौसम को देखते हुए और उन के पूर्वानुमान का आकलन करते हुए सिंचाई का इंतजाम कीजिए.

अगर वर्षा का जल खेतों में भर गया हो, तो उसे निकालने का इंतजाम भी करें.मेंड़ों की मरम्मत जरूर कर दें, जिस से आगामी मानसून में पानी मेंड़ों को तोड़ न दे.

खेत में ओट आने के बाद अच्छी तरह से निराईगुड़ाई कर दें और मिट्टी पौधों पर चढ़ा दें. अगर गन्ना की पंक्ति में दूरी ज्यादा हो, तो यांत्रिक विधि से भी गुड़ाई की जा सकती है.

गन्ने की फसल में निराईगुड़ाई करने से खरपतवार नष्ट हो जाते हैं और मिट्टी की हलकी परत बन जाती है, जिस से पानी सूखता नहीं है.

जड़ों में वायु का संचार अच्छी तरीके से होता है. इस वजह से जड़ों का विकास अच्छी तरह से हो जाता है.

फसल सुरक्षा

दीमक : इस कीट पर नियंत्रण पाने के लिए न्यूवेरिया बैसियाना नामक फफूंद 1.15 फीसदी 1-2 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से 30 किलोग्राम गोबर की खाद में मिला कर पानी का छींटा दे कर और 8-10 दिन तक छाया में रखने के बाद शाम के समय खेतों में बुरकाव करना चाहिए.

रासायनिक विधि में 800 मिलीलिटर प्रति एकड़ क्लोरपायरीफास 20 ईसी को सिंचाई के समय पानी के साथ इस्तेमाल करना चाहिए.

अंकुर व चोटी बेधक : ग्रीष्म में प्रभावित किल्लों और बेधक के अंडसमूह को नष्ट कर देना चाहिए और ट्राइकोकार्ड 4 कार्ड प्रति एकड़ की दर से गन्ने की पत्तियों पर लगाना चाहिए.

गन्ने के साथ राजमा की खेती

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना मुख्य फसल के रूप में उगाया जाता है. नकदी फसल होने और तमाम चीनी मिलें होने की वजह से किसानों के बीच गन्ना बहुत ही लोकप्रिय फसल है. इस की खेती ज्यादातर एकल फसल के रूप में की जाती है. किसान गन्ने की फसल को नौलख या पेड़ी के रूप में 2-3 साल तक लेते रहते हैं. अनेक किसान गन्ने के साथ अन्य फसल भी लेते हैं जिसे हम सहफसली खेती के रूप में जानते हैं. ऐसा करने से गन्ने की खेती में मुनाफा भी बढ़ जाता है.

गन्ना और राजमा की सहफसली खेती

खेत का चुनाव व तैयारी : गन्ना और राजमा की खेती के लिए समतल जीवांशयुक्त बलुई दोमट मिट्टी का चुनाव करना चाहिए. गोबर की खाद को खेत में डाल कर 4-5 बार जुताई कर के मिट्टी को भुरभुरी बना लेना चाहिए.

बीज का चुनाव व बोआई : पंत अनुपमा, अर्का कोमल, करिश्मा, सेमिक्स, कंटेंडर वगैरह राजमा की उन्नत प्रजातियां हैं. राजमा के बीजों को कार्बंडाजिम की 2 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें. गन्ने के बीजोपचार के लिए कार्बंडाजिम की 200 ग्राम मात्रा को 100 लिटर पानी में घोल कर टुकड़ों को उस में 25-30 मिनट तक डुबोएं.

गन्ना और राजमा की सहफसली खेती में राजमा के 80 किलोग्राम और गन्ने के 60 क्विंटल बीज प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करने चाहिए. बोआई 25 अक्तूबर से 15 नवंबर के मध्य कर लेनी चाहिए. गन्ने की 2 लाइनों के बीच राजमा की 2 लाइनों की मेंड़ों पर बोआई करें.

 

निराईगुड़ाई व सिंचाई : दोनों फसलों की बोआई सर्दी के मौसम में होने की वजह से खरपतवारों की समस्या कम रहती है, फिर भी खरपतवार निकालने के लिए फसल में 2-3 बार निराईगुड़ाई करें. पूरे फसलोत्पादन के दौरान जमीन को नम बनाए रखें, ताकि फसल को पाले से सुरक्षित रखा जा सके.

खाद व उर्वरक : खेत में 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से सड़ी गोबर की खाद मिलानी चाहिए. इस के अलावा 150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस, 80 किलोग्राम पोटाश और 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट उर्वरकों का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए.

फसल सुरक्षा : बोआई से पहले बीजोपचार जरूर करें. आमतौर पर फलियां बनते समय फली भेदक, पर्ण सुरंगक व कुछ चूषक कीटों का हमला हो जाता है. कभीकभी मोजैक रोग का संक्रमण भी हो जाता है.

उन्नत तकनीक से खेती करने पर राजमा की फलियों की औसत उपज 50-60 क्विंटल प्रति एकड़ तक हासिल हो जाती है और तकरीबन 40,000 रुपए प्रति एकड़ अतिरिक्त आमदनी हो जाती है. इस के साथ ही गन्ने की उत्पादकता में भी इजाफा होता है.

खास वजह यह भी है कि खेत में डाली गई खाद व उर्वरकों का अधिकतम इस्तेमाल भी है. खरपतवार प्रबंधन का लाभ दोनों फसलों द्वारा हासिल किया जाता है और सहफसल में अपनाए गए कीट व रोग प्रबंधन का लाभ मुख्य फसल को भी मिल जाता है.

कीटों व रोगों की रोकथाम

* नीम का तेल 1.5 लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. इस के इस्तेमाल से फसल की सुरक्षा भी हो जाती है और इनसानों की सेहत पर बुरा असर नहीं पड़ता है.

* नीम का तेल न होने पर 2 लिटर क्विनालफास 25 ईसी या 1.25 लिटर मोनोक्रोटोफास 36 एसएल या 2 किलोग्राम कार्बारिल 50 डब्लूपी को 600-700 लिटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से 12-14 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें.

गन्ने का कचरा भी है कीमती

हमारे देश के 19 राज्यों में बड़े रकबे में गन्ने की खेती होती है. गन्ने की खेती से हरी, सूखी पत्तियां, अगोला, पेराई के बाद खोई व गन्ने की प्रोसैसिंग से शीरा, स्पेंट वाश व मैली का कचरा बचता है. जानकारी न होने की वजह से ज्यादातर किसान इस कचरे का बेहतर इस्तेमाल नहीं कर पाते. वे उन्हें बेकार समझ कर फेंक देते हैं. इस से गंदगी बढ़ती है. कुछ किसान व ईंट भट्टे वाले गन्ने का कचरा बतौर ईंधन में इस्तेमाल कर लेते हैं.

आसान बचत

भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि गन्ने का कचरा कीमती और फायदेमंद है, क्योंकि इस का इस्तेमाल बढि़या कार्बनिक खाद के तौर पर मिट्टी की सेहत सुधारने में किया जा सकता है. गन्ने का कचरा मल्चिंग, ऊसर खेतों को ठीक करने के काम आ सकता है. इस से किसानों का पैसा बचेगा और मिट्टी को पोषक खुराक मिलेगी. किसान थोड़ा ध्यान दे कर अगर इस तकनीक को समझ लें तो वे आसानी से अपना काफी पैसा बचा सकते हैं.

जाहिर है कि नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश वाले अकार्बनिक और महंगी खादों के अंधाधुंध इस्तेमाल से मिट्टी की संरचना व संतुलन दोनों बिगड़ रहे हैं. एक तरफ फसलों पर इन का खराब असर पड़ रहा है, तो वहीं दूसरी तरफ किसानों की जेब हलकी होती है. खेती की लागत बढ़ती है. खेतों से ले कर कोल्हू, खांडसारी क्रेशरों व चीनी मिलों तक में हर साल गन्ने का लाखों टन कचरा बचता है. इस के सही इस्तेमाल से मिट्टी में जरूरी तत्त्वों की कमी पूरी की जा सकती है.

गन्ने की पत्ती

गन्ने की हरी पत्तियों को पशु बड़े ही चाव से खाते हैं इसलिए गन्ने की हरी पत्तियां यानी अगोले का इस्तेमाल चारे के रूप में किया जाता है. माहिरों का कहना है कि ज्यादातर किसान गन्ना नहीं बांधते. तेज हवाओं से गन्ने की लंबी फसल गिर जाती है. जुलाईअगस्त के महीने में पत्तियों की मदद से गन्ने की बंधाई जरूर कर देनी चाहिए. इस के लिए गन्ने की पत्तियों को रस्सी की तरह बंट लें और लाइनों में खड़े गन्ने के थानों को आपस में बांध दें.

गन्ने की सूखी पत्तियां गांवों में जलाने या फूंस के साथ छप्पर बांधने में काम आती हैं. अब उन्हें कागज की लुगदी बनाने वाले कारखाने भी खरीद रहे हैं. पिछले साल उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर व सहारनपुर के इलाकों में गन्ने की सूखी पत्तियां 2-3 सौ रुपए क्विंटल तक बिकी थीं. माहिरों के मुताबिक, गन्ना जमने के बाद व गरमी में सिंचाई के बाद गन्ने की सूखी पत्तियां बिछाने से खेत में नमी बनी रहती है. साथ ही, गन्ना काटने के बाद खेत में सूखी पत्तियां बिछा कर आग लगाने से कीड़ेमकोडे़ वगैरह मर जाते हैं. खरपतवार काबू में रहते हैं व पेड़ी की फसल अच्छी होती है.

गन्ने की मैली खाद की थैली

गन्ने का रस छानने के बाद बची मैली को प्रेसमड कहते हैं. इस में कई पोषक तत्त्व होते हैं, लेकिन इसे सीधे खेत में डालने से खेत में दीमक व अन्य कीट का खतरा बढ़ जाता है. किसान नजदीकी चीनी मिलों से प्रेसमड ले कर सड़ाने के बाद इस का इस्तेमाल कर सकते हैं. गन्ने की मैली से बढि़या खाद बनती है. उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर जैविक चीजों को जल्द सड़ाने को आर्गेनोडीकंपोजर, नाइट्रोजन स्थिर करने को एजेटोबैक्टर, फास्फोरस बढ़ाने को साल्विलाइजिंग बैक्टीरिया और बेधकों के सफाए को ट्राइको कार्ड किसानों को कम दाम पर मुहैया कराती है.

खेती के माहिरों ने जीवाणु कल्चर यानी टीके या वर्मी कल्चर यानी केंचुओं की मदद से गन्ने की मैली को बेहतर खाद में बदलने का तरीका निकाला है. इस के लिए डेढ़ मीटर लंबे, 2 मीटर चौड़े व एक मीटर गहरे गड्ढ़े में गन्ने की सूखी पत्तियां, गन्ने की खोई व घरेलू कचरे की 2 इंच मोटी तह लगाएं. उस पर 8 किलोग्राम यूरिया व 10 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट प्रति टन की दर से डालें. फिर 5 सौ लिटर पानी में 1 क्विंटल गोबर के घोल में एक किलोग्राम जीवाणु कल्चर का घोल बना कर छिड़क देना चाहिए. जीवाणु कल्चर गन्ना शोध केंद्रों पर मिल जाता है.

इस तरह 3-4 परत लगाने से गड्ढ़ा भर जाता है. गड्ढ़े की लंबाई में एक फुट जगह हवा के लिए छोड़ने के बाद गोबर, मिट्टी व प्रेसमड के लेप से गड्ढ़ा ढक दें. पहले हर 15 दिन पर 2 बार, फिर एक महीने बाद तीसरी पलटाई करें. हर पलटाई पर पानी जरूर छिड़कें. इस तरह 75 से 90 दिनों में गन्ने की मैली से बढि़या खाद तैयार हो जाती है. इसे गड्ढ़े की जगह ढेर लगा कर भी बनाया जा सकता है. इस के अलावा दूसरा तरीका है वर्मी कल्चर यानी केंचुओं से प्रेसमड को बनाने का.

प्रेसमड को वर्मी कल्चर से बनाने के लिए पहले 45 दिन तो जीवाणु कल्चर की तरह गड्ढ़े में सड़ाया जाता है. आधा सड़ने के बाद उसे किसी शेड के नीचे पक्के फर्श पर डाल कर उस में प्रति टन 1 किलोग्राम की दर से केंचुए छोड़ दिए जाते हैं. इस के बाद पानी छिड़क कर 60 फीसदी नमी बनाने से तकरीबन 45 दिनों में गन्ने की मैली काले रंग की वर्मी कंपोस्ट में बदल जाती है. इस खाद को गन्ना बोते समय 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में डालना चाहिए.

गन्ने की खोई

गन्ना पेरने के बाद बची खोई को जलाने के लिए भट्टी में झोंका जाता है, जबकि कागज, गत्ता, परफ्यूराल, अल्फासेलूलोज व जिलीटाल बनाने वाले इसे अच्छी कीमत पर खरीदते हैं. इस के अलावा गन्ने की खोई को मुरगीघर में बिछावन, क्षारीय मिट्टी में सुधार व शीरे के साथ जानवरों के चारे में भी इस्तेमाल किया जाता है. बदलती खेती के इस दौर में पुरानी लीक पर चलने की जगह नईनई जानकारी से फायदा उठाना जरूरी है, ताकि बेकार बचे कचरे को भी कंचन बनाया जा सके. यानी खेतीबारी में ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाया जा सके.