दूध और दूध उत्पाद प्रसंस्करण (Milk Products Processing) पर प्रशिक्षण

हिसार : लुवास के डेयरी विज्ञान और प्रौद्योगिकी महाविद्यालय में किसानों के लिए आयोजित तीनदिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम “उन्नत दूध और दूध उत्पाद प्रसंस्करण’’ सफलतापूर्वक संपन्न हुआ. यह कार्यक्रम केंद्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान के साथ संयुक्त रूप से आयोजित किया गया. इस कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को दूध प्रसंस्करण में उन्नत जानकारी और कौशल प्रदान करना था.

इस कार्यक्रम के माध्यम से किसानों को आधुनिक तकनीकों, प्रक्रियाओं और उत्पादों के बारे में जानकारी प्राप्त हुई,  जो उन्हें अपनी डेयरी व्यावसायिकता को बढ़ाने और मानकों को पूरा करने में मदद करेगी.
डा. राजेश खुराना, निदेशक, मानव संसाधन प्रबंधन एवं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि ने प्रशिक्षण कार्यक्रम के समापन समारोह में प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए आधुनिक तकनीकों और विधियों के प्रयोग की महत्वपूर्णता पर जोर दिया.

उन्होंने इस प्रशिक्षण के महत्व को डेयरी क्षेत्र में उत्पादकता और उत्पाद गुणवत्ता में सुधार के लिए अद्वितीय योगदान के रूप में माना. उन्होंने प्रशिक्षण में भाग लेने वाले सभी प्रतिभागियों की प्रतिबद्धता और सीखने के प्रति समर्पण की सराहना की और उद्यम और प्रगति के क्षेत्र में नवाचार को बढ़ाने वाला कहा.

डा. सज्जन सिहाग, अधिष्ठाता, डेयरी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी महाविद्यालय ने अपने संबोधन में सभी प्रतिभागियों, प्रशिक्षकों और अतिथियों को इस कार्यक्रम की सफलता में योगदान के लिए हार्दिक धन्यवाद दिया. उन्होंने डेयरी उद्योग को आगे बढ़ाने में निरंतर अध्ययन और सहयोग की महत्वता पर जोर दिया और ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों की भूमिका को उजागर किया.

उन्होंने बताया कि डेरी उद्योग अत्यंत महत्वपूर्ण है, खासकर उन क्षेत्रों में, जहां इस का उपयोग आधुनिक प्रौद्योगिकी, अनुसंधान और विज्ञान के साथ किया जा रहा है. इस संदर्भ में प्रशिक्षण कार्यक्रमों का महत्वपूर्ण योगदान होता है. इन कार्यक्रमों के माध्यम से, उद्योग के नए और उन्नत प्रौद्योगिकी और विज्ञान को अधिक समझा जा सकता है, जिस से उत्पादन में नवाचार और बेहतर हो सके.

प्रशिक्षण कार्यक्रम के माध्यम से प्रशिक्षकों को नवाचार, अनुसंधान और प्रौद्योगिकी के नवीनतम विकास के साथ अवगत कराया गया, जिस से वे अपने शैक्षिक प्रोग्रामों को उत्कृष्ट बना सकें.

दूध उत्पाद प्रसंस्करण (Milk Products Processing)

प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान कार्यक्रम समन्वयक डा. नवनीत सक्सेना एवं डा. शालिनी अरोड़ा ने प्रशिक्षण कार्यक्रम की उपलब्धियों का विवरण दिया. उन्होंने प्रशिक्षण के दौरान प्राप्त ज्ञान और अनुभवों के महत्व को प्रकट किया और प्रतिभागियों को उन के अनुभव में सहयोग और मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद दिया.

उन्होंने प्रशिक्षण कार्यक्रम के विभिन्न पहलुओं पर विचार किए, उत्पादकता और उत्पाद गुणवत्ता में सुधार के महत्व को समझाया और प्रतिभागियों को उन को कैसे बढ़ावा देना है, इस विषय पर सुझाव दिए.

प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान 30 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया. कार्यक्रम के समापन समारोह में प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र वितरित किए गए. यह प्रमाणपत्र उन के प्रयासों और उपलब्धियों को मान्यता देने का एक प्रतीक था, जो उन के द्वारा प्रशिक्षण कार्यक्रम को सफलतापूर्वक पूरा किया गया.

समापन समारोह ने कार्यक्रम के दौरान प्राप्त समृद्ध अनुभवों और अंतर्दृष्टियों पर विचार करने का मंच प्रदान किया. डा. गुरुराज और डा. रचना, कार्यक्रम समन्वयक ने इस प्रशिक्षण कार्यक्रम को सफलतापूर्वक संपन्न करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

जब पशु खुजली से रहे परेशान

इनसानों में जैसे कई तरह की बीमारियां हो जाती हैं, ठीक उसी तरह जानवरों में भी बीमारियां होती हैं. पशुपालक अगर समय रहते इलाज नहीं कराते तो उन्हें काफी नुकसान उठाना पड़ता है. अब जानवर तो आखिर जानवर ही होते हैं, वे आप की तरह अपनी बीमारी बता नहीं सकते, लेकिन जरा सी सावधानी से आप पशुओं की बीमारी को पकड़ सकते हैं.

अकसर आप ने गायभैंस, बैलबकरी आदि पशुओं को पेड़ या दीवारों से अपना शरीर खुजलाते हुए देखा होगा. दरअसल, यह एक रोग है, खुजली नहीं. लेकिन ज्यादातर पशुपालक इस पर ध्यान नहीं देते. आम बोलचाल की भाषा में इसे चर्म रोग कहते हैं, जो इनसानों के जैसे पशुओं में भी होता है.

चर्म रोग में पशुओं के बाल धीरेधीरे झड़ने लगते हैं और खुजली की जगह चमड़ी पूरी तरह सख्त हो जाती है. खुजली होने पर ज्यादातर पशु तनाव में चले जाते हैं.

यह बात आप को भले ही समझ में न आए, लेकिन खुजली और पशुओं के शरीर पर भिनभिनाने वाली मक्खियां, कीड़ेमकोड़े वगैरह पशुओं को इतनी परेशानी में डाल देते हैं कि वे जिस्मानी रूप से कमजोर हो जाते हैं. इस का सीधा असर उन की उत्पादन कूवत पर पड़ता है.

बीमारी तभी ज्यादा फैलती है जब मौसम बदलता है. पशु डाक्टर बताते हैं कि बदलते मौसम में पशुओं का खास खयाल रखना होता है क्योंकि उसी समय उन में त्वचा रोग होने की संभावना ज्यादा रहती है. जीवाणु समेत कई

तरह के कृमि पशुओं में त्वचा रोगों के लिए जिम्मेदार होते हैं, खासकर जीवाणु से होने वाले त्वचा रोगों में पशुओं के शरीर में मवाद पड़ जाता है.

पशुपालकों के सामने समस्या यह होती है कि आमतौर पर त्वचा रोग के लक्षण दिखने में लंबा समय लग जाता है, जिस का नतीजा होता है कि पशु तब तक गंभीर रूप से बीमार हो जाते हैं, इसलिए पशुओं पर ध्यान देना बहुत जरूरी है.

त्वचा रोग दिखने में बहुत साधारण होते हैं, लेकिन कई बार यह गंभीर बीमारी बन जाती है. दुधारू पशुओं में कई तरह के त्वचा रोग होते हैं. इन रोगों से पशुओं की त्वचा पूरी तरह से खराब भी हो जाती है.

पशुओं को सेहतमंद रखना है तो गरमियों व बरसात में उन के शरीर पर सब से ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होती है. गायभैंसों में त्वचा रोग सब से ज्यादा होता है. पशुओं को कई तरह के चर्म रोग (पैरासाइट्स, बैक्टीरिया, वायरस, एलर्जी, फंगस) होते हैं.

चर्म रोग में पशुओं का दूध तो नहीं घटता, लेकिन वे तनाव में जरूर आ जाते हैं. इस से उन के दूध देने की कूवत पर असर पड़ता है.

ध्यान दें कि आप के पशुबाड़े में ऐसी कोई चीज न रखें, जिस से उस के शरीर में कोई चोट लग जाए. इसलिए जहां पशु बांधे जाते हों, वहां साफसफाई बहुत जरूरी है. पशुओं के खानपान पर भी ध्यान देना बहुत जरूरी है क्योंकि विटामिन की कमी से चर्म रोग होता है.

अगर पशु को किसी भी तरह का चर्म रोग हो गया है तो पास के पशु अस्पताल में दिखा लें. इस रोग में चर्मिल प्लस ट्यूब का भी इस्तेमाल किया जा सकता है.

चर्म रोग के लक्षण

जीवाणुजनित रोग : इस रोग से पशुओं की प्रभावित जगह गरम हो जाती है और त्वचा लाल हो जाती है. वहां पर जख्म भी हो जाता है और मवाद निकलने लगता है.

कृमिजनित रोग : इस रोग की पहचान आसानी से की जा सकती है, क्योंकि खुजली की जगह पर बाल का झड़ जाना, कान की खुजली में पशु सिर हिलाता है, कान फैल जाता है और उस में भूरे काले रंग का वैक्स जमा हो जाता है. इस के उपचार के लिए पशु के कान को हलके गरम पानी में धोने वाला सोड़ा मिला कर उस की सफाई करनी चाहिए.

बाह्य त्वचा रोग : इस रोग के लिए कृमि जिम्मेदार होता है. यह रोग पशुओं के अलावा इनसानों में भी फैलता है. इस में त्वचा मोटी होने के अलावा बहुत खुजली होती है.

फफूंदजनित त्वचा रोग : इस में पशु की त्वचा, बाल और नाखून प्रभावित होते हैं.

विषाणुजनित त्वचा रोग : पशुओं की नाक और खुर की त्वचा मोटी हो जाती है और पेट में फुंसी हो जाती है.

ऐसे करें देखभाल

पशु खुजली

*    आप हमेशा पशुओं को स्वच्छ व साफ जगह रखें.

*    गरमियों के मौसम में प्रतिदिन नहलाना चाहिए.

*    आसपास की गंदगी (गोबर वगैरह) को नियमित रूप से साफ करें.

*    बारिश में सब से ज्यादा बीमारियां फैलती हैं, इसलिए पशुओं के इर्दगिर्द पानी जमा न होने दें.

*    मच्छर, मक्खी व कीड़ेमकोड़े दूर करने के लिए अच्छा इंतजाम करें.

*    3 महीने के अंतराल पर पशुओं को आंतरिक परजीवीनाशक दवा का सेवन कराना चाहिए.

*    सभी तरह के त्वचा रोगों में पशु को अच्छा खानपान, विटामिन व खनिज लवण देने चाहिए. साथ ही, लिवर टौनिक व बालों के लिए कंडीशनर का प्रयोग करना चाहिए.

आइसक्रीम की इकाई (Ice-Cream Unit) लगाएं मुनाफा कमाएं

यह बड़ी पुरानी कहावत है कि हमारे देश में दूध की नदियां बहती थीं यानी पहले भी दूध का उत्पादन बहुतायत में होता था. दूध व उस का इस्तेमाल हमारे जीवन में इस तरह रचाबसा था कि ‘दूधो नहाओ पूतो फलो’ व ‘दूध का कर्ज उतारने’ जैसे बहुत से मुहावरे रोजमर्रा की आम बोलचाल में बखूबी इस्तेमाल किए जाते हैं.

खानपान में बदलाव के बावजूद दूध आज भी ज्यादातर लोगों की सब से बड़ी जरूरत है इसलिए डेरी उद्योग में पैर जमाने, आगे बढ़ने व कमाने की बहुत गुंजाइश है. दूध जल्दी खराब होने वाली बड़ी नाजुक चीज है इसलिए इस के उत्पादन, भंडारण, रखरखाव व बिक्री में जल्दी, पुख्ता इंतजाम, बहुत साफसफाई और सूझबूझ की जरूरत होती है.

चाहे खेती हो या डेरी, ज्यादा कमाई के लिए किसानों को उद्यमी बनना होगा. दरअसल, ज्यादातर किसानों को उन के दूध की वाजिब कीमत नहीं मिलती. इसलिए दूध का बेहतर इस्तेमाल उस की चीजें बना कर बेचने से हो सकता है. मसलन, कुछ पशुपालक दूध से दही, मावा, पनीर, मक्खन व घी वगैरह चीजें बनाते रहे हैं, लेकिन ये तो सिर्फ 5 चीजें हैं, जबकि अमूल कोआपरेटिव दूध से छाछ, लस्सी, दही, चीज व आइसक्रीम वगैरह 50 चीजें बना कर बेच रही है.

जरूरत है नए नजरिए की. ग्राम नबीपुर, जिला शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश के प्रगतिशील किसान ज्ञानेश तिवारी सुधरे तरीकों से अपनी डेरी में 400 लिटर दूध का उत्पादन कर के लाखों रुपए हर महीने कमा रहे हैं.

मसलन, अब आइसक्रीम की मांग तेजी से बढ़ रही है. इसलिए डेरी का काम करने वालों को ध्यान दे कर इस नए काम में अपना हाथ आजमाना चाहिए.

हर इलाके में किसी न किसी उपज की बहुतायत होती है. बाजार में उस उपज की भरमार रहने से उत्पादकों को वाजिब कीमत तो दूर कई बार लागत भी नहीं मिलती. केरल के नारियल उत्पादक भी इस समस्या से आजिज आ चुके थे. उन्होंने फूड प्रोसैसिंग को कमाई बढ़ाने का जरीया बनाया और ताजा नारियल की आइसक्रीम बना कर खुद इस मसले का हल खोजा.

आज केरल में टैंडर कोकोनट आइसक्रीम का कारोबार 100 करोड़ रुपए से भी ऊपर पहुंच चुका है इसलिए डेरी उद्यमी भी ऐसा कर सकते हैं.

पशुपालक अपनी डेरी के दूध से आइसक्रीम बना कर बेच सकते हैं. इस से उन की उत्पादन लागत दूसरों के मुकाबले कम हो सकती है. हालांकि पशुपालन व दूध उत्पादन सदियों से खेती के सहायक कामधंधों में शामिल व अहम रहा है, लेकिन पशु व उन के आहार की कीमत बढ़ने से डेरी उद्योग में भी लगातार बढ़ी है, इसलिए सिर्फ दूध निकाल कर बेचने से कहीं ज्यादा कमाई दूध से आइसक्रीम बना कर बेचने से की जा सकती है.

बढती मांग

आइसक्रीम की इकाई (Ice-Cream Unit)

चुसकी, मलाई बर्फ, कुलफी, सौफ्टी व आइसक्रीम वगैरह का चलन बहुत पुराना व ज्यादा है. देशभर में आइसक्रीम बनाने के बहुत से छोटेबड़े कारखाने चल रहे हैं. हालांकि आइसक्रीम की मांग अमूमन पूरे साल बनी रहती है, लेकिन गरमियों में आइसक्रीम की खपत व बिक्री बहुत ज्यादा बढ़ जाती है. तरहतरह के स्वाद वाली रंगबिरंगी आइसक्रीम बच्चों से ले कर बड़ेबुजुर्गों व घरों से होटलों तक में खूब पसंद की जाती है. शादीब्याह व दावतों में शहरी व गंवई इलाकों तक में बड़े पैमाने पर आइसक्रीम की खपत होती है.

भारत में आइसक्रीम का बाजार तकरीबन 1800 करोड़ रुपए सालाना का है, जो हर साल 20 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रहा है.

किसान चाहें तो कच्चा माल खरीद कर इस मैदान में उतर कर ज्यादा फायदा कमा सकते हैं, जरूरत है हिचक छोड़ कर पहल करने की.

बीते 80 सालों से आइसक्रीम बना रही अहमदाबाद की सब से पुरानी कंपनी वाडीलाल है. इस अकेली कंपनी की गुजरात में 35 फीसदी की हिस्सेदारी व पूरे देश के आइसक्रीम बाजार में 14 फीसदी की हिस्सेदारी है. यह कंपनी 150 किस्मों के फ्लेवर में 300 तरह के आइसक्रीम पैक तैयार करती है.

जानकारों के मुताबिक, अब आइसक्रीम के बाजार में इलाकाई कंपनियों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है. किसान आपस में मिल कर भी यह काम शुरू कर सकते हैं.

अमीर मुल्कों में प्रति आदमी आइसक्रीम की खपत 2 लिटर व भारत में उस से 10 गुना कम सिर्फ 200 ग्राम है. दूध से खुद आइसक्रीम बना कर बेचने का काम पशुपालकों के लिए खासा मुनाफे का सौदा हो सकता है. किसान चाहें तो जानकारी, ट्रेनिंग या तजरबा हासिल कर आइसक्रीम बनाने की इकाई लगा कर चला सकते हैं.

कमाई का अच्छा मौका

दूध से आइसक्रीम बनाने का काम शुरू कर के डेरी उद्यमी अपने बच्चों को घर बैठे फायदेमंद रोजगार मुहैया करा सकते हैं. यह काम करना कोई मुश्किल नहीं है. इस काम की सब से बड़ी खूबी यह है कि आइसक्रीम का बाजार बहुत बड़ा है. इसलिए दूध उत्पादक अपनी कूवत के मुताबिक इकाई लगा सकते हैं.

किसान आइसक्रीम बनाने की इकाई लगाने में सब से पहले यह फैसला करें कि यह काम उन्हें अकेले करना है या दूसरों के साथ मिल कर या साझेदारी फर्म, प्राइवेट लिमिटेड कंपनी या फिर अमूल की तरह कोआपरेटिव सोसायटी बना कर करना है. पशुपालक किसानों की अपनी संस्था अमूल बीते 25 सालों से कई तरह की आइसक्रीम बना कर देशभर में बेच रही है.

कारोबार के तयशुदा ढांचे के मुताबिक ही संबंधित रजिस्ट्रार के यहां फर्म, कंपनी या सोसायटी का रजिस्ट्रेशन कराया जाता है, उस के बाद बिक्री, व्यापार कर और एफएसएसएआई का लाइसैंस हासिल किया जाता है. ये सारे काम जिला उद्योग केंद्र की मदद से पूरे किए जा सकते हैं. इस के अलावा पूंजी, बिजली, पानी, कोल्ड स्टोर व वाहनों की जरूरत होती है.

अब बहुत तरह की आइसक्रीम बाजार में मिलती हैं, इसलिए दूध उत्पादक किसानों के साथसाथ फल उत्पादक किसान भी चाहें तो आइसक्रीम इकाई लगा कर अपनी उपज की ज्यादा कीमत पा सकते हैं.

मुंबई, दिल्ली, नोएडा, कानपुर, आगरा, लखनऊ, एर्णाकुलम आदि कई शहरों में आइसक्रीम पार्लर चला रही नेचुरल कंपनी की पहचान सब से अलग है, क्योंकि इस कंपनी की 18 किस्म की खास आइसक्रीम में ताजा फलों की भरमार रहती है.

कुदरती स्वाद के लिए मशहूर हो चुकी नेचुरल आइसक्रीम में शरीफा, चीकू, तरबूज, पपीता, अमरूद, ताजा नारियल, सीताफल, जामुन, स्ट्राबेरी, आम वगैरह कई चीजों का खूब इस्तेमाल किया जाता है इसलिए आइसक्रीम में अलग ही स्वाद होता है. खास बात यह भी है कि नेचुरल की पैक्ड आइसक्रीम को आसानी से कहीं भी लाया व ले जाया जा सकता है.

नई तकनीक से पैक की गई यह आइसक्रीम 6 घंटे तक नहीं पिघलती, क्योंकि नई पैकेजिंग तकनीक से अब नामुमकिन काम भी आसान हो गए हैं.

कच्चा माल व जरूरी चीजें

असल में आइसक्रीम दूध, क्रीम, वनीला, स्ट्राबेरी व दूसरी कई जायकेदार चीजों को मिला कर ठंडा कर के जमी हुई मिठाई की तरह होती है. इसे बनाने के लिए दूध, क्रीम, दूध पाउडर, चीनी, पानी, अंडे, क्रीम, रंग, मेवे, फलों के एसेंस, फ्लेवर टिकाऊ बनाने के लिए स्टैबलाइजर के तौर पर ग्वारगम या एथिल सैल्यूलोज आदि का इस्तेमाल किया जाता है ताकि उस के अंदर बर्फ के कण न जमें, वह चिकनी और आधी ठोस बनी रहे.

दूध में पानी व चीनी मिलाने के बाद उसे पाश्चुरीकृत करने के लिए 72 सैंटीग्रेड तापमान पर 30 मिनट तक गरम किया जाता है. इस के बाद उसे एकसमान करने के लिए लगातार घुमाया व चलाया जाता है ताकि सारा मिश्रण मिल जाए, उस में चिकनाई आ जाए व हवा भर जाए. इस के बाद उसे ठंडा किया जाता है. इस के बाद उस में जरूरत के मुताबिक वनीला या स्ट्राबेरी के एसेंस मिलाए जाते हैं.

यहां से शुरू होती है अलगअलग तरह के छोटेबड़े खांचों में भर कर 0 सैंटीग्रेड से नीचे तापमान में रख कर आइसक्रीम को जमाने की प्रक्रिया. बाद में आइसक्रीम को काजू, किशमिश, पिस्ता व बादाम आदि सूखे मेवों, चौकलेट की परत या चेरी डाल कर सजाने का काम किया जाता है.

आइसक्रीम जमाने के लिए कप, जार व फ्रीजर की जरूरत पड़ती है. अब ऐसी सभी सामग्री अपने देश में आसानी से मिल जाती है.

बाजार व बिक्री

आइसक्रीम की इकाई (Ice-Cream Unit)

याद रखें कि रोज नए फ्लेवर से आइसक्रीम का कलेवर बदल रहा है. नईनई आइसक्रीम खानपान व खुशियों का हिस्सा बन रही हैं.

आप का आजमाया हुआ नया व उम्दा नुसखा आइसक्रीम के बाजार में आप की अलग पहचान बना सकता है. साथ ही, आप की बिक्री तेजी से बढ़ सकती है, क्योंकि अब आइसक्रीम की औनलाइन डिलीवरी सीधे घरों तक हो रही है. जरूरत है बाजार में हो रहे बदलाव से फायदा उठाने की.

उत्पादक व उपभोक्ता अब औनलाइन मिल जाते हैं. इस सिस्टम से बीच के बिचौलिए कम हैं. इस से निर्माता का फायदा बढ़ता है. बाजार में ग्राहक बेशक राजा होता है, लेकिन उम्दा क्वालिटी व प्रचार भी काफी माने रखते हैं.

ध्यान रहे कि आइसक्रीम के बाजार में वही ज्यादा बिकेगा जो वाकई अच्छा होगा. अमीर मुल्कों से तरहतरह के गुर सीख कर आइसक्रीम की बिक्री बढ़ाने की राह में अभी बहुतकुछ करना बाकी है. मसलन, ब्रैड स्लाइस के बीच में आइसक्रीम की स्लाइस लगा कर बेचने की शुरुआत अभी तक अपने देश में नहीं हुई है, जबकि सिंगापुर वगैरह देशों में ऐसे कई तरीके सालों से बहुत कामयाब साबित हो रहे हैं, जिन्हें अपनाया जा सकता है.

आइसक्रीम बेचने के तरीकों में क्वालिटी जैसी बड़ी कंपनियां भी बरसों से एक ही कदमताल कर रही हैं. मसलन, आइसक्रीम के ज्यादातर पार्लर्स में 2 से 5 आइसक्रीम के बड़े पैक गत्ते के कटेफटे चोकोर डब्बों में रखे रहते हैं. स्कूप से कोन या कप में आइसक्रीम डाल कर देने का तरीका अब पुराना हो गया है.

सिंगापुर में आइसक्रीम को ट्रे में केक व मिठाई की तरह बेहद सुंदर ढंग से सजा कर रखा जाता है. उस के ऊपर इतनी उम्दा टौपिंग होती है कि देखते ही ग्राहक का मन उसे खानेखरीदने के लिए करने लगता है.

इस तरह पशुपालक किसान भी अगर बेहतर मार्केटिंग के नए व कारगर गुर सीख लें तो वे आइसक्रीम से जल्दी पैसे कमा कर खुशहाल हो सकते हैं. अमूल, इफको व पतंजली जैसी कई नामी कंपनियां इस बात का सुबूत हैं, जो बेहतर मार्केटिंग से बाजार में छा गईं व आज लाखोंकरोड़ों रुपए का कारोबार कर रहे हैं.

मशीनें यहां से लें

इच्छुक उद्यमी किसान पहले छोटे पैमाने पर आइसक्रीम बना सकते हैं. वाजिब दाम पर उम्दा क्वालिटी का माल दे कर बाजार में अपनी पैठ व अच्छी साख बना सकते हैं ताकि मशहूर हो सकें. फिर धीरेधीरे काम को आगे बढ़ाएं तो कामयाबी मिलनी तय है.

आइसक्रीम बनाने वाली आटोमैटिक मशीनों की जानकारी अलीबाबा डौट काम या इंडियामार्ट डाट कौम पर ली जा सकती है. इस के अलावा इन निर्माताओं से भी संपर्क किया जा सकता है:

मैं. केवीआर इंडस्ट्रीज , 6-33/1 निकट कूकरपल्ली बस स्टैंड, मूसापैट, हैदराबाद, पिन-500018. फोन : 0848606212

मै. शांति इंजीनियर्स, 11 अमेनियम स्ट्रीट, चौथा तल, बरावोराने रोड, बुर्रा बाजार, कोलकाता-700001, पश्चिम बंगाल.

आइसक्रीम जैसा फ्रोजन डेजर्ट

अमूल व मदर डेरी में दूध की चिकनाई से बनी आइसक्रीम असली होती है, लेकिन दूध की वसा के अलावा अब म्यूनीज, सोया क्रीम व पीनट बटर जैसी कई दूसरी किफायती चिकनाई भी खूब इस्तेमाल हो रही है. आइसक्रीम जैसी एक चीज फ्रोजन डेजर्ट भी बनने लगी है, जो सब्जियों की वसा से बनाई जाती है. इस की लागत भी बहुत कम है.

हमारे देश में अब फ्रोजन डेजर्ट का चलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है. जानकारों के मुताबिक, देश के आइसक्रीम बाजार में तकरीबन 40 फीसदी हिस्सेदारी फ्रोजन डेजर्ट की हो गई है.

ज्यादातर उपभोक्ता आइसक्रीम व फ्रोजन डेजर्ट के महीन अंतर को नहीं परख पाते और फ्रोजन डेजर्ट को भी आइसक्रीम समझ कर ही खा जाते हैं. इसी तरह अब दही से बनी आइसक्रीम फ्रोजन योगर्ट के नाम से बन कर बिक रही है.

ईस्मा : आइसक्रीम निर्माताओं की मददगार संस्था

हमारे देश में चल रहे आइसक्रीम उद्योग की सारी जानकारी मुहैया कराने के मकसद से अप्रैल, 2011 से इंडियन आइसक्रीम मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन ‘ईस्मा’ काम कर रही है. यह संस्था अपने सदस्यों को सरकारी नीतियों, फूड सेफ्टी की हिदायतों, उन के पालन, इंटरनैशनल बिजनैस, इंटरनैशनल स्टैंडर्ड समेत ट्रेनिंग वगैरह की सहूलियतें मुहैया कराती है.

‘ईस्मा’ आपसी सलाहमशवरे से चुनौतियों का मुकाबला करने, कारोबार बढ़ाने के उपाय खोजने, रणनीति व माहिरों के तजरबों का फायदा दिलाने का काम भी करती है, इसलिए आइसक्रीम बनाने वालों को इस संगठन का सदस्य बनना बहुत फायदेमंद रहता है.

इच्छुक उद्यमी निदेशक, इंडियन आइसक्रीम मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन यानी ‘ईस्मा’ ए-801, 8वां तल, टाइम स्क्वायर बिल्डिंग, सीजी रोड, नवरंगपुरा, अहमदाबाद 380009, फोन 7383354764 से संपर्क कर सकते हैं.

उन्नत दूध और दूध उत्पाद प्रसंस्करण (Milk Product Processing) पर प्रशिक्षण

हिसार: लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय के डेयरी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी महाविद्यालय के अनुसूचित जाति उपयोजना के अंतर्गत किसानों के लिए उन्नत दूध और दूध उत्पाद प्रसंस्करण पर एक व्यापक प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ कुलपति लुवास डा. विनोद कुमार वर्मा द्वारा किया गया.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कुलपति डा. विनोद कुमार वर्मा ने उपस्थित पशुपालक प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए बताया कि डेयरी उद्योग ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालकों की जीविका को बढ़ावा देने में अत्यधिक महत्त्व रखता है. यह लाखों किसानों के लिए आय का महत्त्वपूर्ण स्रोत है, विशेष रूप से महिला किसानों के लिए, जो डेयरी उत्पादन और दूध प्रसंस्करण में मुख्य भूमिका निभाती हैं. डेयरी क्षेत्र का महत्त्व अत्यधिक है, क्योंकि यह न केवल रोजगार के अवसर प्रदान करता है, बल्कि खाद्य सुरक्षा और पोषण में भी महत्त्वपूर्ण योगदान देता है.

लुवास के कुलपति डा. विनोद कुमार वर्मा ने प्रशिक्षण कार्यक्रम के परिवर्तनात्मक संभावनाओं पर जोर दिया और इसे डेयरी क्षेत्र में उत्पादकता और गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए एक महत्त्वपूर्ण कदम के रूप में माना. उन्होंने किसानों को दूध प्रसंस्करण में उन्नत जानकारी और कौशल के साथ संपन्न करने की महत्त्वता को भी जाहिर किया, जिस से ऐसे सशक्तीकरण से उन के उद्यमी प्रयासों को मजबूती मिल सकती है और उन की सामाजिक व आर्थिक स्थिति को उन्नत किया जा सकता है.

इस अवसर पर मुख्य अतिथि व अन्य विशिष्ट अतिथियों द्वारा “किसानों के लिए उन्नत दूध और दूध उत्पाद प्रसंस्करण‘‘ नामक एक पुस्तिका का लोकार्पण भी किया गया .

कार्यक्रम की शुरुआत में डेयरी साइंस कालेज के अधिष्ठाता एवं पाठ्यक्रम निदेशक डा. सज्जन सिहाग ने अतिथियों का स्वागत करते हुए किसानों को व्यावसायिक कौशल और व्यावसायिक जानकारी के साथ उन्नत दूध प्रसंस्करण तकनीकों में सशक्त करने के लिए तैयार किए गए व्यापक पाठ्यक्रम के बारे में अवगत कराया.

निदेशक डा. सज्जन सिहाग ने नवीनतम तकनीक और दूरस्थ प्रथाओं को एकत्रित करने की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता पर जोर दिया और डेयरी उत्पादन को अनुकूलित करने और उच्च गुणवत्ता परिणाम सुनिश्चित करने के लिए दूध प्रसंस्करण प्रौद्योगिकियों की आवश्यकता को उजागर किया.

उन्होंने आगे बताया कि यह तीनदिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम 4 से 6 मार्च, 2024 तक चलने वाले इस कार्यक्रम का आयोजन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, केंद्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान, हिसार के साथ संयुक्त रूप से किया गया. इस पहल का उद्देश्य किसानों को दूध प्रसंस्करण में उन्नत जानकारी और कौशल प्रदान करना है. इस कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों से 30 प्रतिभागी हिस्सा ले रहे हैं.

कार्यक्रम समन्वयक के रूप में उपस्थित प्रधान वैज्ञानिक एवं टीओटी प्रभारी डा. नवनीत सक्सेना ने प्रोग्राम के उद्देश्यों को समझाया. उन्होंने बताया कि ये कार्यक्रम किसानों को सशक्त बनाने के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं और उन की उत्पादकता और आय स्तरों को बढ़ाने में मदद करते हैं.

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशक डा. नरेश जिंदल, एचआरएम के निदेशक डा. राजेश खुराना, विस्तार शिक्षा निदेशक डा. वीएस पंवार, छात्र कल्याण निदेशक डा. पवन कुमार, स्नातकोत्तर अधिष्ठाता डा. मनोज रोज व अन्य अधिकारी व विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्ष, वैज्ञानिक एवं संकाय सदस्य उपस्थित रहे. इस प्रशिक्षण के समन्वयक डा. शालिनी अरोडा, डा. गुरुराज एवं डा. रचना ने किया.

पशुधन ( Livestock) को मिलेंगी शीघ्र उत्कृष्ट चिकित्सकीय सेवाएं

जयपुर: मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कहा कि स्वस्थ पशुधन के लिए राज्य सरकार संकल्पबद्ध है. इसी क्रम में सरकार ने हेल्पलाइन नंबर 1962 की शुरुआत की है. इस के माध्यम से पशुओं को शीघ्र चिकित्सकीय सेवाएं उपलब्ध हांेगी और प्रदेश के पशुपालक समृद्ध होंगे.

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ओटीएस स्थित मुख्यमंत्री निवास पर मोबाइल वेटरनरी इकाइयों के लोकार्पण पर आयोजित समारोह में भाग ले रहे थे. उन्होंने 21 मोबाइल वेटरनरी इकाइयों को हरी झंडी दिखा कर रवाना किया. इस के अतिरिक्त प्रदेश में जिला स्तर पर आयोजित समारोहों में 159 इकाइयों का लोकार्पण भी किया गया.

इस मौके पर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कहा कि प्रत्येक एक लाख पशुओं पर एक मोबाइल वेटरनरी यूनिट काम करेगी. उन्होंने यह भी कहा कि इस योजना के अंतर्गत राज्य स्तरीय काल सैंटर की स्थापना भी की जाएगी, जो पशुओं के सामान्य रोगों के उपचार के लिए टैलीमैडिसन व्यवस्था एवं पशु प्रबंधन, पोषण आदि के लिए सलाह भी देगा. काल सैंटर के माध्यम से पशुओं का आपात स्थिति में प्राथमिकता से उपचार सुनिश्चित हो सकेगा.

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कहा कि हमारी सरकार किसान कल्याण एवं पशुपालकों के हित में दूरगामी निर्णय कर रही है. सरकार ने अपने पहले बजट में ही गौवंश संरक्षण के लिए शैड, खेली का निर्माण और दुग्ध, चारा, बांटा संबंधी उपकरण खरीदने के लिए गोपाल क्रेडिट कार्ड योजना के अंतर्गत एक लाख रुपए तक ब्याजमुक्त ऋण उपलब्ध कराने की महत्वपूर्ण घोषणा की है.

1,600 तकनीकी व्यक्तियों को मिलेगा रोजगार

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कहा कि प्रत्येक ब्लौक में मोबाइल वेटरनरी इकाइयों द्वारा पशु चिकित्सा शिविरों का आयोजन कर पशुपालकों को लाभान्वित किया जाएगा. प्रत्येक ब्लौक में एक मोबाइल वेटरनरी यूनिट के लिए एक पशु डाक्टर, एक तकनीकी पशु चिकित्सा कर्मचारी एवं एक ड्राइवर कम पशु परिचारक होंगे. इस से तकरीबन 1600 तकनीकी व्यक्तियों को रोजगार मिलेगा.

मिल्किंग मशीन (Milking Machine) : दुधारू पशुओं से दूध दुहने का खास यंत्र

मिल्किंग मशीन (Milking Machine) किसानों के लिए एक ऐसी खास मशीन है, जो घरेलू पशुपालन और डेयरी फार्मिंग के लिए बहुत ही उपयुक्त है. इस के इस्तेमाल से पशुओं से साफसुथरा दूध निकाला जाता है. इस में समय भी कम लगता है और पशु को भी सुविधा रहती है.

आज भी दूरदराज के इलाकों में बहुत से पशुपालक ऐसे हैं, जो मिल्किंग मशीन के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते हैं. ये मशीनें बिजली, बैटरी आदि की मदद से चलती हैं. इन में इलैक्ट्रिक मीटर लगा होता है.

दूध दुहने वाली मशीनों में चिकनाई वाले वैक्यूम पंप होते हैं, जो वैक्यूम पैदा करते हैं और दूध निकलने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हैं. और फिर दूध निकलता हुआ स्टील की बालटियों में इकट्ठा होता जाता है.

यहां ऐसी ही एक कंपनी की मशीन के बारे में जानकारी दी गई है, जो पशुपालकों के लिए काफी लाभदायक साबित हो सकती है.

वैनसन मिल्किंग मशीन

Milking Machine

वैनसन पशुओं का दूध दुहने की मशीन बनाने वाली कंपनी है, जो कि देश के अलगअलग राज्यों में और अनेक पशुपालन के क्षेत्र में काम कर रही है. हजारों पशुपालकों तक पहुंच बनाने वाली इस मिल्किंग मशीन में मौडर्न तकनीक इस्तेमाल की गई है.

मशीन से दूध दुहना प्राकृतिक दूध दुहने जैसा

मिल्किंग मशीन की खूबी है कि दूध दुहते समय दुधारू पशु को ऐसा ही महसूस होता है जैसे कि उस का बछड़ा दूध पी रहा हो. इस से पशु को कोई परेशानी नहीं होती और वह आराम से दूध दुहने देती है.

मशीन से दूध दुहने के फायदे

सब से पहला फायदा तो यही है कि दूध पूरी तरह से साफ व सुरक्षित निकलता है. दूध दुहने में समय भी कम लगता है. अगर हम यही काम पुराने तरीके से करें, तो दूध में पशु के बाल, कचरा, गोबर आदि के कण गिर जाते हैं.

कई दफा पशुपालक दूध निकालते समय खांसताछींकता भी है या हाथ साफ नहीं है आदि अनेक बातें हैं. इस से दूध खराब हो सकता है, जबकि मिल्किंग मशीन से दूध दुहने पर ऐसा नहीं होता.

दूध उत्पादन भी बढ़ता है और पशु के थन भी पूरी तरह से स्वस्थ रहते हैं. दूध पशु के थनों से पाइपों के जरीए सीधा स्टील के बंद डब्बों में पहुंचता है.

भैसों का दूध दुहने के लिए खास

Milking Machine

 

ज्यादातर पशुपालक मिल्किंग मशीन का इस्तेमाल गाय का दूध निकालने में करते हैं, क्योंकि इस मशीन की प्राथमिकता गाय के दूध को निकालने की होती है.

अगर भैंस का दूध निकालने के लिए इस मशीन का इस्तेमाल करना है, तो इस में मामूली बदलाव की जरूरत होती है. भैंस का दूध निकालने के लिए मिल्किंग मशीन में खास तरह के ‘बबुलस लाइनर’ का उपयोग किया जाता है, इसलिए इस की जानकारी बेहद जरूरी है.

बकेट मिल्किंग मशीन

* दूध निकालने में कम समय और उत्तम क्वालिटी का दूध.

* उपयोग करने में आसान और कम रखरखाव.

* 5 से 50 पशुओं के फार्म के लिए उपयोगी.

उपलब्ध मौडल : इस में अनेक प्रकार के मौडल आते हैं. पशुपालक अपनी मांग के अनुसार मौडल का चुनाव कर सकते हैं. इस तरह के मौडल के लिए यह मशीन कैरोसिन, पैट्रोल इंजन के साथ भी उपलब्ध है.

एक बकेट : यह 10-15 पशुओं से दूध निकालने के लिए पर्याप्त है.

दो बकेट : दो बकेट वाला मौडल 15-30 पशुओं के लिए पर्याप्त है.

चार बकेट : यह मौडल 30-50 पशुओं के लिए पर्याप्त है.

छ: बकेट : यह 50 से अधिक पशुओं के लिए ठीक है.

डेयरी फार्मिंग करने वालों के लिए अधिक बकेट वाले मौडल ही उपयोग करते हैं, क्योंकि उन के पास दुधारू पशु भी अधिक होते हैं.

मोबाइल मिल्किंग मशीन

जैसा कि नाम से ही पता चल रहा है. इस यंत्र को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना आसान है. इस के अलावा इस मिल्किंग मशीन से एकसाथ 8-10 पशुओं का दूध भी निकाला जा सकता है. एक मशीन 20 से 30 पशुओं के लिए पर्याप्त है.

उपलब्ध मौडल : एक बकेट वाला मौडल 10-15 पशुओं के लिए पर्याप्त है और दो बकेट वाला मौडल 15-30 पशुओं के लिए पर्याप्त है.

वैनसन का ‘लाइन मिल्कर’

* ‘लाइन मिल्कर’ बकेट सिस्टम और पार्लर सिस्टम के बीच का दूध दुहने का सैटअप है. इस की कई खासियतें हैं जैसे :

* पुरजों की कम घिसावट और रखरखाव में आसान है.

* पिट या पार्लर बनाने की आवश्यकता नहीं है.

* यह किसी भी प्रकार के शेड में लगाया जा सकता है.

* सफाई करने में कम समय लगता है.

* दूध एक ही जगह पर इकट्ठा किया जा सकता है.

* 40 से 60 पशुओं के फार्म के लिए उपयोगी है.

वैनसन मिल्किंग पार्लर की बड़ी रैंज

बड़े पैमाने पर डेयरी फार्मिंग करने वालों के लिए यह कंपनी अलगअलग प्रकार के मिल्किंग पार्लर बनाती है. जैसे : हैरिंग बोन पार्लर, स्विंग ओवर पार्लर, रैपिड ऐक्जिट पार्लर और रोटरी पार्लर.

वैनसन आटोमैटिक पार्लर में आफिमिल्क, इजराइल की टैक्नोलौजी इस्तेमाल की गई है. आफिमिल्क विश्व की सब से बड़ी आटोमेशन कंपनी है. मिल्किंग पार्लर में हर गाय की सूचना नोट की जाती है. यह सूचना अपनेआप सौफ्टवेयर में चली जाती है.

आखिर में हम बताना चाहेंगे कि पशुपालक अपनी जरूरत के मुताबिक ही मिल्किंग मशीन के चुनिंदा मौडल का चुनाव कर सकता है. अधिक जानकारी के लिए इस मिल्किंग मशीन बनाने वाली कंपनी में फोन नंबर 9811104804, 8510088892 पर बात कर के ले सकते हैं या इन की वैबसाइट www.vansunmilking.com पर भी देख कर अधिक कुछ जान सकते हैं.

सेहतमंद गायभैंस पालन (Dairy Farming) के लिए सलाह

गरमी का मौसम शुरू होने के चलते लगातार तापमान बढ़ रहा है. इस हालत में पशुओं को गरमी से बचाने के लिए पर्याप्त मात्रा में संतुलित भोजन की जरूरत होती है. गरमी से बचाव के लिए गायभैंस का खास ध्यान रखने की जरूरत है.

गरमियों में पशुओं का आवास प्रबंधन

भीतरी व बाहरी परजीवियों से बचाव के लिए कृमिनाशक दवा का प्रयोग करें. पशुओं को खुरपका, मुंहपका, गलघोंटू और लंगड़ी ज्वर से बचाव के लिए टीका लगवाएं. पशुओं में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए विटामिन बी और सैलेनियम सप्लीमैंट दें.

पशु बीमार हो तो सेहतमंद पशु से तुरंत अलग कर देखरेख करें. जरूरत पड़ने पर नजदीकी पशु डाक्टर से संपर्क करें. पशुओं का बीमा जरूर करवा लें. गाय व भैंस को प्रतिदिन नहलाएं, पशुओं को बाहर न निकालें और न पशुओं के साथ यातायात करें. साफ और ताजा पानी भरपूर मात्रा में दें, जिस से पशुओं की सारी शारीरिक प्रक्रिया अच्छी तरह से चले और दुग्ध उत्पादन में किसी प्रकार की कमी न हो.

संतुलित आहार

Dairy Farming

पशुओं को हरा चारा के साथ सूखा चारा मिला कर खिलाएं. पौष्टिकता बढ़ाने के लिए गेहूं के भूसे को यूरिया से उपचारित करें (100 किलोग्राम भूसे को उपचारित करने के लिए 4 किलोग्राम यूरिया को 40 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें.) पशुओं के संतुलित आहार में 50 ग्राम मिनरल पाउडर व 20 ग्राम नमक रोजाना दें.

पशु ब्याने के 2 घंटे के अंदर नवजात बछड़े व बछिया को खीस जरूर पिलाएं. इस से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है. दुधारू पशुओं को ढाई लिटर दूध उत्पादन पर एक किलोग्राम मिश्रित दाना देना चाहिए.

गायभैंसों के 7 माह के गर्भकाल के बाद उस की खुराक के अलावा 1 से सवा किलोग्राम दाना उस की रोज की जरूरत के अलावा देना चाहिए, क्योंकि इन आखिरी महीनों में भ्रूण का तेजी से विकास होता है.

किसान घर पर इस प्रकार पशुओं के लिए संतुलित आहार बना सकते हैं.

पशुपालन (Animal Husbandry) को प्रोत्साहन

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नई दिल्लीः केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अवसंरचना विकास कोष (आईडीएफ) के तहत लागू किए जाने वाले पशुपालन अवसंरचना विकास कोष (एएचआईडीएफ) को 29,610.25 करोड़ रुपए के परिव्यय के साथ वर्ष 2025-26 तक अगले 3 सालों के लिए जारी रखने की मंजूरी दे दी.

यह योजना डेयरी प्रसंस्करण और उत्पाद विविधीकरण, मांस प्रसंस्करण यानी मीट प्रोसैसिंग और उत्पाद विविधीकरण, पशु चारा संयंत्र, नस्ल गुणन फार्म, पशु अपशिष्ट से धन प्रबंधन (कृषि-अपशिष्ट प्रबंधन) और पशु चिकित्सा वैक्सीन और दवा उत्पादन सुविधाओं के लिए निवेश को प्रोत्साहित करेगी.

भारत सरकार अनुसूचित बैंक और राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी), नाबार्ड और एनडीडीबी से 90 फीसदी तक ऋण के लिए 2 साल की मुहलत सहित 8 सालों के लिए 3 फीसदी ब्याज अनुदान प्रदान करेगी. पात्र संस्थान अलगअलग होंगे, निजी कंपनियां, एफपीओ, एमएसएमई, धारा 8 कंपनियां हैं. अब डेयरी सहकारी समितियां डेयरी संयंत्रों के आधुनिकीकरण, सुदृढ़ीकरण का भी लाभ उठाएंगी.

भारत सरकार एमएसएमई और डेयरी सहकारी समितियों को 750 करोड़ रुपए के ऋण गारंटी कोष से उधार लिए गए ऋण की 25 फीसदी तक ऋण गारंटी भी प्रदान करेगी.

एएचआईडीएफ ने योजना के अस्तित्व में आने के बाद से अब तक 141.04 एलएलपीडी (लाख लिटर प्रतिदिन) दूध प्रसंस्करण क्षमता, 79.24 लाख मीट्रिक टन फीड प्रसंस्करण क्षमता और 9.06 लाख मीट्रिक टन मांस प्रसंस्करण क्षमता को आपूर्ति श्रंखला में जोड़ कर गहरा असर डाला है. यह योजना डेयरी, मांस और पशु चारा क्षेत्र में प्रसंस्करण क्षमता को 2-4 फीसदी तक बढ़ाने में सक्षम है.

पशुपालन क्षेत्र के निवेशकों के लिए पशुधन क्षेत्र में निवेश करने का अवसर प्रस्तुत करता है, जिस से यह क्षेत्र मूल्यवर्धन, कोल्ड चेन और डेयरी, मांस, पशु चारा इकाइयों की एकीकृत इकाइयों से ले कर तकनीकी रूप से सहायता प्राप्त पशुधन और पोल्ट्री फार्म, पशु अपशिष्ट से ले कर धन प्रबंधन और पशु चिकित्सा औषधि व वैक्सीन इकाइयों की स्थापना तक एक आकर्षक क्षेत्र बन जाता है.

तकनीकी रूप से सहायता प्राप्त नस्ल गुणन फार्म, पशु चिकित्सा दवाओं और वैक्सीन इकाइयों को मजबूत करना, पशु अपशिष्ट से धन प्रबंधन जैसे नए कामों को शामिल करने के बाद, यह योजना पशुधन क्षेत्र में बुनियादी ढांचे के उन्नयन के लिए एक बड़ी क्षमता प्रदर्शित करेगी.

यह योजना उद्यमिता विकास के माध्यम से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 35 लाख लोगों के लिए रोजगार सृजन का एक माध्यम होगी. इस का उद्देश्य पशुधन क्षेत्र में धन सृजन करना है. अब तक एएचआईडीएफ ने तकरीबन 15 लाख किसानों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित किया है.

एएचआईडीएफ किसानों की आय को दोगुना करने, निजी क्षेत्र के निवेश के माध्यम से पशुधन क्षेत्र का दोहन करने, प्रोसैसिंग और मूल्य संवर्धन के लिए नवीनतम तकनीकों को लाने और पशुधन उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा दे कर देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देने के प्रधानमंत्री के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में एक मार्ग के रूप में उभर रहा है. पात्र लाभार्थियों द्वारा प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन बुनियादी ढांचे में इस तरह के निवेश से इन संसाधित और मूल्यवर्धित वस्तुओं के निर्यात को भी बढ़ावा मिलेगा.

इस प्रकार एएचआईडीएफ में प्रोत्साहन द्वारा निवेश न केवल निजी निवेश को 7 गुना बढ़ा देगा, बल्कि किसानों को जानकारी पर अधिक निवेश करने के लिए भी प्रेरित करेगा, जिस से उत्पादकता और किसानों की आय में वृद्धि होगी.

डेरी पशुओं (Dairy Animals) में मौसम का असर

जब भी बहुत ज्यादा गरम नम या गरम शुष्क वातावरण होता है, तब पशु सामान्यतौर पर जीभ बाहर निकाल कर और अधिक से अधिक पसीना निकाल कर अपनी ऊर्जा को खर्च करते हैं, जिस से उन के शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है.

यह पशुओं के लिए जो एक स्वाभाविक और प्राकृतिक क्रिया है, लेकिन कभीकभी पशुओं के शरीर ऊष्मा बाहर निकालने की क्षमता, पसीना निकालना, जीभ बाहर निकलना जैसी प्राकृतिक क्रियाओं से भी शारीरिक तापमान नियंत्रित नहीं हो पाता, जिसे ऊष्मीय तनाव कहा जाता है.

तापमान, जिस के ऊपर ऊष्मीय तनाव हो सकता है :

  • संकर और विदेशी नस्ल की गायों में  26० सैंटीग्रेड से ऊपर.
  • देशी नस्ल की गायों में 33० सैंटीग्रेड से ऊपर.
  • भैंसों में 36० सैंटीग्रेड से ऊपर.

ऊष्मीय तनाव से पशुपालकों को कई प्रकार से माली नुकसान हो सकता है, जैसे :

  • दूध उत्पादन में कमी.
  • कम प्रजनन दक्षता.
  • मंदहीनता.
  • गर्भधारण दर में कमी.

संवेदनशील पशु

देशी नस्ल की गायों की अपेक्षा संकर और विदेशी नस्ल की गाय ऊष्मीय तनाव के प्रति ज्यादा संवेदनशील होती हैं. भैंसों की मोटी व काली चमड़ी होने और गायों की तुलना में कम पसीना ग्रंथि होने के कारण भैंस ऊष्मा का खर्च ठीक प्रकार से नहीं कर पाती, जिस से उन में ऊष्मीय तनाव का ज्यादा बुरा असर होता है.

ऊष्मीय तनाव को कम करने के लिए उचित प्रबंधन इस प्रकार है :

* पशुशाला की ऊंचाई बीच से 15 फुट और आसपास से 10 फुट होनी चाहिए. उस की लंबी तरफ पूर्वपश्चिम दिशा की ओर होनी चाहिए.

* पशुशाला की बाहरी छत की पुताई सफेद सीमेंट से करने से सूरज की किरणें परावर्तित होंगी व पशुशाला में ठंडक बनी रहेगी.

* पशुशाला के आसपास पेड़पौधे लगाना.

* पशुशाला की दीवारों पर घूमने वाले पंखे लगाना.

* फव्वारे लगाना.

* पंखों के आसपास एक गोले के रूप में फव्वारे लगाना.

* पशुओं को दोपहर में नहलाना.

* कट्टे के परदे लगाना व उन पर पानी का छिड़काव करना.

* ठंडे व स्वच्छ पीने योग्य पानी की पर्याप्त व्यवस्था करना.

* पशुओं के नहाने के लिए टैंक की व्यवस्था करना.

सांड़ के वीर्य की नली को देख कर नस्ल की पहचान

अकसर आप ने यह देखा होगा कि हीट या गरमी में आई हुई गायभैंसों में कृत्रिम गर्भाधान या एआई करने वाला पशुमित्र अपने साथ एक कंटेनर या पात्र ले कर चलता है, जिस में सीमन की स्ट्रा या वीर्य की नलियां एक गैस (तरल नाइट्रोजन) में संरक्षित होती है. वह उस में से एक नली निकालता है और उसे कुनकुने पानी में पिघला कर एक पाइप में डालता है और एआई गन के जरीए गाय या भैंस की बच्चेदानी में छोड़ देता है. उस के बाद उस पाइप में खाली स्ट्रा रह जाती है, जिसे वह फेंक देता है.

अगर उस पाइप में से खाली स्ट्रा को निकाल कर देखें, तो आप बाहर से यह पता लगा सकते हैं कि उस पशुमित्र या एआई करने वाले आदमी ने किस नस्ल के सांड़ के वीर्य या बीज का इस्तेमाल किया है.

सांड़ की नस्ल की पहचान 2 तरह से की जा सकती है :

* स्ट्रा या नली के रंग द्वारा.

* स्ट्रा या नली पर अंकित इंगलिश के कोड द्वारा.

स्ट्रा या नली के रंग द्वारा सांड़ की नस्ल की पहचान : केंद्र सरकार ने सांड़ के वीर्य उत्पादन के बाद स्ट्रा की पहचान के लिए अलगअलग नस्लों के लिए स्ट्रा के अलगअलग रंग तय किए हैं, जिन्हें देख कर सांड़ की नस्ल का पता लगाया जा सकता है :

* होलस्टीन फे्रजियन (एचएफ)- गुलाबी रंग.

* एचएफ संकर (एचएफ क्रौस ब्रीड)-पिस्ता जैसा हरा रंग.

* जर्सी नस्ल-पीला रंग.

* जर्सी क्रौस ब्रीड-पीच या आड़ू जैसा रंग.

* देशी नस्ल-नारंगी रंग.

* सुनंदिनी नस्ल-नीला रंग.

* भैंस-सलेटी रंग.

कभीकभी ऊपर बताए गए रंगों में से कोई भी रंग उपलब्ध न होने पर वीर्य को पारदर्शी स्ट्रा में रखा जा सकता है.

स्ट्रा या नली पर अंकित इंगलिश के कोड द्वारा : वीर्य की स्ट्रा या नली पर इंगलिश के अक्षरों में कुछ कोड छपे हुए होते हैं, जिस में सांड़ का नंबर, उस की नस्ल आदि की जानकारी होती है, जिन्हें देख कर सांड़ की नस्ल का पता लगाया जा सकता है :

जेवाई – जर्सी.

एचएफ – एचएफ.

सीबी एचएफ – एचएफ क्रौस.

सीबी जेवाई – जर्सी क्रौस.

एसयूएन – सुनंदिनी.

एसएएच – साहीवाल.

आरएस – लाल सिंधी.

केएएनके – कांकरेज.

जीआईआर- गिर.

टीएचएआर – थारपारकर.

आरएटीएचआई – राठी.

एचएआर – हरियाणा.

ओएनजीएल – अंगोल.

डीईओएनआई – देवनी.

डीएएनजीआई – डांगी.

एएमएचएल – अमृतमहल.

एमबीएफ – मुर्रा भैंस.

एसबीएफ – सूरती भैंस.

जेबीएफ – जाफराबादी भैंस.

एमएसएनबी – मेहसाणा भैंस.

एनएलआरवीबी – नीली रावी भैंस.

बीबीएफ – बन्नी भैंस.

बीडीबीएफ – भदावरी भैंस.

पीएनपीबी- पंधारपुरी भैंस.

ऊपर बताए गए रंग और कोड के आधार पर पशुपालक सांड़ की नस्ल पहचान सकते हैं. उदाहरण के तौर पर, अगर किसी स्ट्रा का रंग नारंगी है और

उस पर कोड एसएएच दर्ज है, तो नारंगी रंग से हमें यह पता चल गया कि यह तय रूप से देशी नस्ल के सांड़ का वीर्य है और कोड एसएएच से हमें पता चल गया कि यह साहीवाल नस्ल के सांड़ का बीज है.