जैविक उत्पादन में मध्य प्रदेश की 40 फीसदी और उद्यानिकी में  11 फीसदी भागीदारी

ग्वालियर : उद्यानिकी और खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में निवेशकों के लिए मध्य प्रदेश के द्वार सदैव खुले हैं. प्रदेश में निवेश के बेहतर माहौल और भौगोलिक परिस्थितियों का लाभ उद्यमी उठा सकते हैं. यह बात उद्यानिकी और खाद्य प्रसंस्करण मंत्री नारायण सिंह कुशवाह ने भोपाल में आयोजित खाद्य प्रसंस्करण और कृषि व्यवसाय शिखर सम्मेलन के अवसर पर कही.

मंत्री  नारायण सिंह कुशवाह ने कहा कि मध्य प्रदेश में 27 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में 400 लाख मीट्रिक टन उद्यानिकी फसलों का उत्पादन होता है. देश में मध्य प्रदेश उद्यानिकी उत्पादन में 11 फीसदी, कृषि उत्पादन में 10 फीसदी और दुग्ध उत्पादन में 9 फीसदी उल्लेखनीय भागीदारी दर्ज करता है. मध्य प्रदेश देश में टमाटर उत्पादन में पहला और मिर्च, प्याज के उत्पादन में दूसरा स्थान रखता है.

उन्होंने आगे कहा कि विश्व बाजार में प्राकृतिक एवं जैविक उत्पादों की अत्यधिक मांग है. देश में कुल जैविक उत्पादन में मध्य प्रदेश की 40 फीसदी हिस्सेदारी है. इस से साफ है कि मध्य प्रदेश उद्यानिकी फसलों के उत्पादन में महत्वपूर्ण भागीदारी रखता है.

मंत्री नारायण सिंह कुशवाह ने सम्मेलन में भाग ले रहे व्यवसायियों से अपील की कि वह प्रदेश में उद्यानिकी फसलों पर आधारित व्यावसायिक गतिविधियों में निवेश करें. राज्य सरकार उन की भरपूर मदद करेगी.

उन्होंने आगे कहा कि मध्य प्रदेश में विगत वर्षों में खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में छोटीबड़ी 2400 इकाइयों को राज्य सरकार द्वारा 214 करोड़ की अनुदान सहायता दी गई है.

उद्यानिकी विभाग की योजनाओं के लिए करें पंजीयन

अनुपपुर : अनूपपुर जिले में उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग मध्य प्रदेश भोपाल के द्वारा संचालित योजनाओं में प्रदाय लक्ष्यानुसार लाभ प्राप्त करने के लिए किसानों के पंजीयन के लिए औनलाइन आवेदन आमंत्रित किए गए हैं.

अनूपपुर जिले में वर्ष 2024-25 में फल पौध रोपण योजना, संकर सब्जी क्षेत्र विस्तार, संकर मसाला क्षेत्र विस्तार, संकर पुष्प क्षेत्र विस्तार, संरक्षित खेती एवं ड्रिप, मिनी/माइक्रो स्प्रिंकलर, पोर्टेबल स्प्रिंकलर उद्या निकी विभाग की विभिन्न योजनाओं का लाभ किसान उठा सकते हैं.

जिले के समस्त किसान अपनेअपने विकासखंड अधिकारी से संपर्क कर पंजीयन के लिए के लिए औनलाइन आवेदन कर सकते हैं. वहीं दूसरी ओर विकासखंड, पुष्पराजगढ़ के किसान बिपिन कुमार वर्मा के मोबाइल नंबर 8643048280, विकासखंड, जैतहरी के किसान माखनलाल प्रजापति के मोबाइल नंबर 9424700738, विकासखंड, कोतमा के किसान दीपक कुमार बुनकर के मोबाइल नंबर 7828835021 एवं विकासखंड, अनूपपुर के किसान सरदार सिंह चौहान के मोबाइल नंबर 7000937796 पर पंजीयन के संबंध में बातचीत कर अधिक जानकारी ले सकते हैं.

पंजीयन के लिए mpfsts.mp.gov.in पोर्टल पर किसान खुद या किसी भी औनलाइन सेवा केंद्र में जा कर पंजीयन करा सकते हैं. पंजीयन के लिए बैंक की पासबुक, मोबाइल नंबर, खसरा बी-1, आधारकार्ड, फोटो एवं अनुसूचित जनजाति/अनुसूचित जाति वर्ग के लिए जाति प्रमाणपत्र होना अनिवार्य है.

ग्वारपाठा (Cowpea) पर शोध में नवाचार

जब भी किसानों की खुश्हाली की बात आती है, ज्यादातर किसान अपनेआप को कर्ज में डूबा हुआ पाते हैं. ज्यादा बारिश, ओला गिरना, सूखा पड़ना और सरकारी नीतियों के अलावा अपनी इस हालत के लिए कहीं न कहीं किसान खुद भी जिम्मेदार होता है.

आज के दौर में किसान की फसल आने के बाद उस का बाजार भाव काफी कम हो जाता है जिस का नुकसान उन्हें उठाना पड़ता है क्योंकि किसान सिर्फ उस फसल की परंपरागत बिक्री पर ही निर्भर रहता है.

अगर किसान थोड़ा सा जागरूक हो जाएं और नवाचार में भरोसा करें तो आज कई फसल पैदावार ऐसी होती हैं जिन्हें आधुनिक तकनीक से प्रोसैस कर उन के अनेक वैल्यू एडेड प्रोडक्ट बनाए जा सकते हैं जैसे आलू और केले से चिप्स, बाजरा से बिसकुट, केक, आम, नीबू, मिर्च आदि से अचार, आंवला से जैम, मुरब्बा, अनाज से लड्डू, नमकीन वगैरह.

इस तरह के नवाचार से न केवल किसान की आमदनी बढ़ेगी बल्कि उस की साख में भी इजाफा होगा.

तो क्यों न किसान पारंपरिक फसलों से हट कर कुछ ऐसी फसलें उगाएं जिन से उन्हें और भी बेहतर फायदा मिले. एलोवेरा यानी ग्वारपाठा भी ऐसी ही एक फसल है जिसे प्रोसैस कर अनेक तरह के वैल्यू एडेड प्रोडक्ट बनाए जा सकते हैं. सब्जी, अचार, ब्यूटी प्रोडक्ट्स और आयुर्वेदिक दवाओं में एलोवेरा का इस्तेमाल होता है.

औषधि के रूप में ग्वारपाठा के अनेक रसायनों का इस्तेमाल जोड़ों का दर्द दूर करने, पेट की बीमारी का उपचार, यहां तक कि कैंसर के निदान तक में किया जाता है लेकिन ग्वारपाठा का दैनिक जीवन में उपयोग अब तक केवल सब्जी, जूस वगैरह तक ही सीमित था. अब इस के अन्य उत्पाद बनाने की दिशा में शोध का काम जारी है.

ग्रीन कैमिस्ट्री रिसर्च सैंटर डूंगर कालेज, बीकानेर, राजस्थान की शोधार्थी पूनम कवर, मानसी जोशी, काजल चारण और अनु जैन ने इस दिशा में कई नवाचार किए हैं. इन लड़कियों ने ग्वारपाठा की बरफी तैयार कर आहार विशेषज्ञों को हैरत में डाल दिया है क्योंकि यह बरफी न केवल खाने में पौष्टिक और स्वादिष्ठ है बल्कि इसे कई दिनों तक स्टोर कर के भी रखा जा सकता है.

पूनम ने बताया कि बचपन से ही उन्होंने अपनी मां को घर में ग्वारपाठा के लड्डू बनातेखिलाते देखा है. शोध के दौरान जब इन्होंने यह जानकारी अपनी मार्गदर्शक डाक्टर उमा राठौर से साझा की तो सब को सहज ही इस दिशा में आगे बढ़ने की राह मिल गई और फिर ग्वारपाठा की बरफी बनाने पर काम शुरू हुआ.

जब बरफी बन कर तैयार हुई तो इस का स्वाद लोगों की जबान पर चढ़ गया. इसे पूरी तरह से ग्रीन कैमिस्ट्री की उन्नत तकनीक से बनाए जाने के चलते इस की विधि पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित थी.

खाने में रुचिकर होने के चलते ग्वारपाठा से बने ये वैल्यू एडेड प्रोडक्ट दैनिक जीवन में इस का उपयोग बढ़ाने में सहायक साबित होंगे.

ग्वारपाठा के लड्डू व बरफी बनाने की विधि

लड्डू : ग्वारपाठा के लड्डू बनाने के लिए सब से पहले इसे किनारों से काट कर इस के कांटे हटा दें. अब एक तेज धार वाले चाकू से छील कर इस का जैल निकाल लें. इस जैल को आटे और घी के साथ मिला कर अच्छी तरह से गूंध लें. गूंधे हुए आटे से छोटीछोटी मठरी बना कर उन्हें धीमी आंच पर शुद्ध घी में तल लें. ठंडा होने पर मिक्सचर में पीस कर चूरमा बना लें. इस में बराबर की मात्रा में चीनी और इच्छानुसार मेवे डालें और गरम घी डाल कर लड्डू की तरह बांध लें. इन्हें ज्यादा पौष्टिक बनाने के लिए गोंद भी डाला जा सकता है.

बरफी : ग्वारपाठा की बरफी बनाने के लिए इस की पत्तियों के किनारे काट कर कांटे हटा लें. अब इसे कद्दूकस कर लें. कद्दूकस किए गए ग्वारपाठा को एक मोटे तले की कड़ाही में बराबर मात्रा में चीनी डाल कर चलाते रहें. धीरेधीरे यह गाढ़ा होने लगेगा. जब चार तार की चाशनी बन जाए तब गैस बंद कर दें और फिर थाली या प्लेट के तले में घी लगा कर इस की मोटी परत बिछा दें. थोड़ा जमने पर बरफी की शक्ल में काट कर स्टोर कर लें.

पूनम ने बताया कि मीठी बरफी के बाद अब ग्वारपाठा के नमकीन व्यंजन बनाने की विधियों पर भी शोध किया जाएगा. साथ ही, अब ऐसे स्टेबलाइजर या पौलीसेक्राइड खोजने की कोशिश भी की जा रही है जिन की मदद से इन उत्पादों को और भी अधिक समय तक स्टोर किया जा सके और लंबे समय तक इन का फायदा उठाया जा सके.

मनभावन और कुरकुरे केले के चिप्स (Banana Chips)

भारत में केले की खेती अब किसानों के लिए बहुत ही फायदे की हो गई है. इसे अब नकदी फसल के रूप में जाना जाता है. केले की खेती में सब से बड़ी परेशानी केले के छोटे और बड़े साइज से होती है. इस परेशानी को दूर करने के लिए किसान केले की टिशू कल्चर खेती को अपना रहे हैं. इस से केले के पेड़ में एकसमान आकार के केले पैदा होते हैं.

टिशू कल्चर केले की खेती करने के लिए खेत का चुनाव बहुत ही सावधानी से करना चाहिए. खेत में जल निकासी का अच्छा इंतजाम होना चाहिए. खेत की मिट्टी चिकनी, दोमट और बलुई दोमट होनी चाहिए. केले की फसल तैयार करने के लिए खेत बनाने का काम जून महीने से करना चाहिए.

केले की फसल में सिंचाई का खयाल रखना चाहिए. खेत में नमी हमेशा बनी रहे. पानी ज्यादा न होने पाए और न ही खेती की नमी सूखने पाए. फूल निकलने के 50 दिन बाद केले के पेड़ को बांस के टुकड़ों का सहारा देते हैं, जिस से फल लगने पर पेड़ को कोई नुकसान न हो.

केले में फूल आने का समय खास होता है. बोने के 80-90 दिन बाद जब केले की फलियां गोल हो जाएं तो सावधानी से उस को काट लेना चाहिए. केले की फलियों को रखते समय यह याद रखें कि उन में चोट न लगे. चोट लगने से केले के सड़ने का खतरा ज्यादा रहता है. अगर पके केले का मंडी में भाव गिर रहा हो तो कच्चे केले से कुरकुरे चिप्स तैयार कर के भी बेचे जा सकते हैं.

अलग स्वाद के चिप्स

जिस तरह आलू के चिप्स होते हैं उसी तरह केले के चिप्स भी तैयार किए जाते हैं. इन का 250 ग्राम का एक पैकेट 50 रुपए का बाजार में फुटकर बिकता है. 200 ग्राम का पैकेट 30 रुपए का मिलता है. 1 किलोग्राम केला चिप्स के पैकेट 180 रुपए के मिलते हैं.

केला चिप्स की शुरुआत गोवा से हुई थी. गोवा के समुद्री किनारों पर केले की अच्छी पैदावार होती है. इस का इस्तेमाल करने के लिए केला चिप्स का बनना शुरू हुआ.

केला चिप्स का कुरकुरा स्वाद आज सभी को पसंद आने लगा है. इस के चलते अब हर जगह केला चिप्स बनने लगे हैं. पहले बहुत सारा केला खराब हो जाता था, पर अब केला चिप्स बनने से अच्छी कीमत मिलने लगी है. देश के तकरीबन सभी बड़े स्टोरों और बाजारों में केले के चिप्स बिक रहे हैं.

लोकल लैवल के किसान अभी केला चिप्स कम बनाते हैं. इस की सब से बड़ी वजह उन के बीच जानकारी की कमी है. आलू चिप्स बनाने का काम करने वाले देवेंद्र कुमार कहते हैं, ‘‘मैं आलू के साथ केले के चिप्स भी बनाने लगा हूं. हमारे ग्राहक अब केला चिप्स की ज्यादा डिमांड करने लगे हैं. अब हम लोकल किसानों से कच्चा केला खरीद कर चिप्स बनाने का काम करने लगे हैं.

‘‘एक केले में 6 से 8 चिप्स बन जाते हैं. केले के  छोटेबड़े होने से चिप्स की तादाद कम या ज्यादा हो सकती है. इस के बाद चिप्स को वनस्पति तेल में तला जाता है. इस के बाद पौलीथिन पैक में इसे पैक कर दिया जाता है.’’

देंवेंद्र कुमार कहते हैं, ‘‘केला चिप्स तैयार करने में कोई बड़ी पूंजी नहीं लगानी पड़ती. इस में सब से ज्यादा मेहनत का काम मार्केटिंग करना होता है इसलिए इस को गांव से भी शुरू किया जा सकता है. अच्छे चिप्स के लिए बढि़या किस्म का लंबे आकार वाला केला लेना सही रहता है. अच्छी पैकिंग होने से भी बाजार में केला चिप्स की अच्छी कीमत मिल जाती है.’’

केला मसाला चिप्स बनाने की विधि

1 पीस कच्चा केला से चिप्स बनाने के लिए 1 चम्मच टाटरी पाउडर, 2 चम्मच लाल मिर्च पाउडर, 1 चम्मच पिसा हुआ मकईदाना, 1 चुटकी हींग लें. केला छील लें. पहले इस के 2 टुकड़े कर दें. इस के बाद हर टुकड़े के लंबेलंबे स्लाइस बना लें. स्लाइस पर बाकी चीजें डाल दें. इस के बाद वनस्पति तेल में इस को फ्राई कर लें. फ्राई करने के बाद स्लाइस बाहर निकाल कर स्वाद के अनुसार नमक को धनिया पाउडर में मिला कर उस के ऊपर डाल दें. मकईदाना पाउडर के मिलने से केला चिप्स बहुत ही कुरकुरा हो जाएगा. इस के बाद इस का प्रयोग खाने में किया जा सकता है.

केला चिप्स बहुत कुरकुरा होता है. ऐसे में जरूरत इस बात की होती है कि इस को सावधानी से पैक किया जाए. टूटने पर यह देखने में अच्छा नहीं लगता, जिस से सही कीमत नहीं मिल पाती है.

घी उत्पादन (Ghee Production) के लिए पालें भदावरी भैंस

किसान खेत के साथसाथ पशुपालन, डेरी, फूड प्रोसैसिंग जैसे कामों को कर के ज्यादा से ज्यादा फायदा ले सकते हैं. ऐसे तमाम किसान हैं जिन्होंने पशुपालन व डेरी का कारोबार अपना कर न केवल अपनी माली हालत में सुधार किया है बल्कि दूसरों के लिए रोजगार मुहैया कराने का जरीया भी बने हैं.

अगर आप दुधारू पशुओं को पालने की इच्छा रखते हैं तो इस के साथसाथ डेरी और दूध से बनी तमाम चीजों को तैयार कर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा ले सकते हैं.

देश में शुद्ध देशी घी की काफी मांग रहती है लेकिन बाजार में देशी घी के नाम से बिकने वाले ब्रांडों की क्वालिटी पर अकसर सवाल खड़ा होता रहता है. ऐसे में किसान डेरी व्यवसाय के साथसाथ देशी घी का उत्पादन कर मुनाफा कमा सकते हैं.

वैसे तो देशी घी का कारोबार गाय या भैंस पाल कर किया जा सकता है लेकिन भैंसों के दूध में वसा की मात्रा ज्यादा होने की वजह से यह घी के लिए ज्यादा मुफीद मानी जाती है.

देश में भैंसों की प्रमुख रूप से 12 नस्लें हैं लेकिन भदावरी नस्ल की भैंस के दूध में वसा की मात्रा ज्यादा होने से दूसरी नस्लों की अपेक्षा इस के दूध से अच्छा घी निकलता है.

भदावरी नस्ल की भैंस का पालन उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश के कुछ इलाकों में किया जाता है. भैंसों की यह प्रजाति विलुप्त होने के कगार पर है.

सरकार द्वारा इसे बचाने के लिए कई योजनाओं पर काम चल रहा है. इस नस्ल की भैंसों की तादाद देश में बहुत कम हो गई है. इसे अब सुरक्षित करने की भी जरूरत है.

भदावरी नस्ल की भैंस के दूध में वसा की मात्रा 12-13 फीसदी पाई जाती है जो उस के खानपान पर निर्भर है. वैसे, उस के खानपान के मुताबिक 6-14 फीसदी तक वसा पाई जाती है.

भदावरी भैंस का पालन करने वाले पशुपालकों के मुताबिक, अगर भदावरी नस्ल की भैंस हर रोज 5 लिटर दूध दे तो एक हफ्ते में 5 किलोग्राम शुद्ध देशी घी हासिल किया जा सकता है जो साढ़े 12 फीसदी वसा के बराबर है.

यह किसी भी नस्ल की भैंस में पाए जाने वाली वसा की मात्रा से कहीं ज्यादा है. भदावरी नस्ल की भैंसों के दूध में औसतन 8.2 फीसदी वसा, 19 फीसदी ठोस तत्त्व, 4.11 फीसदी प्रोटीन, 205.72 मिग्रा कैल्शियम, 140.90 मिग्रा फास्फोरस, 3.82 माइक्रोग्राम जिंक, 0.24 माइकोग्राम कौपर व 0.117 माइक्रोग्राम मैंगनीज पाया जाता है.

भदावरी भैंस की खूबी

भदावरी भैंसों का कद मध्यम छोटा होता है. शरीर नुकीला, छोटा सिर, छोटी और मजबूत टांगें, काले खुर, एकसमान पुट्ठे, कौपर या हलके भूरे रंग की पलकें और काले रंग के लंबे सींग होते हैं. इन के शरीर पर बाल कम होते हैं. इन की टांगें छोटी व मजबूत होती हैं. घुटने के नीचे का हिस्सा हलका पीला व सफेद रंग का होता है. सिर के अगले हिस्से पर आंखों के ऊपर वाला भाग सफेदी लिए होता है. गरदन के निचले भाग पर 2 सफेद धारियां होती हैं. इन की सींगें तलवार के आकार की होती हैं. ये प्रति ब्यांत में औसतन 800-1000 लिटर दूध देती हैं.

भदावरी नस्ल के बड़े पशुओं का औसत वजन 300-400 किलोग्राम होता है. छोटा आकार व कम वजन की वजह से इन का आहार दूसरी नस्ल की भैंसों की अपेक्षा काफी कम होता है.

इसे कम संसाधनों में किसानों, पशुपालकों व भूमिहीन पशुपालकों द्वारा आसानी से पाला जा सकता है. जो भी मिल जाए, उस को खा कर अपना गुजारा कर लेती है. इस नस्ल की भैसों में कई बीमारियों के लड़ने की कूवत पाई जाती है. भदावरी भैंस के बच्चों की मृत्यु दर काफी कम है.

यों करें चारा प्रबंधन

भदावरी नस्ल की भैंसों के चारे में ऊर्जा, प्रोटीन, कैल्शियम, फास्फोरस, विटामिन ए की प्रचुर मात्रा होनी चाहिए. इस नस्ल की भैंसों को जरूरत के मुताबिक ही चारा खिलाएं ताकि दूध देने की कूवत में गिरावट न आने पाए. सूखे चारे के साथ ही हरा चारा खिलाने से इन की सेहत भी अच्छी रहती है. इन के चारे में दानों का विशेष खयाल रखना चाहिए. इस के लिए मक्की, जौ, जई, बाजरा, गेहूं का मिश्रण खिलाना चाहिए.

चारे के खुराक का मिश्रण बनाने के लिए तेल के बीजों की खली जिस में मूंगफली, तिल, सोयाबीन, अलसी, सरसों, सूरजमुखी की खली को मिलाया जा सकता है.

इसी के साथ गेहूं का चोकर, चावल का कन, नमक और दूसरे खनिज पदार्थ मिला कर खिलाना फायदेमंद होता है.

ऐसे लें दूध उत्पादन

भदावरी भैंस मुर्रा भैंस की तुलना में दूध तो थोड़ा कम देती है, लेकिन दूध में वसा की ज्यादा मात्रा होने के चलते गंभीर हालात में रहने की कूवत, बच्चों की कम मृत्यु दर और तुलनात्मक रूप से कम भोजन वगैरह गुणों के चलते यह नस्ल किसानों में काफी लोकप्रिय है.

भदावरी भैंस का औसत दूध उत्पादन 4-5 किलोग्राम प्रतिदिन है, लेकिन अच्छे पशु प्रबंधन द्वारा 8-10 किलोग्राम दूध प्रतिदिन हासिल किया जा सकता है.

भदावरी भैंसें एक ब्यांत यानी तकरीबन 300 दिन में अधिकतम 1,200 से 1,800 लिटर दूध देती हैं. इस तरह अगर माना जाए तो प्रतिदिन औसत दूध उत्पादन के आधार पर इस नस्ल के एक ब्यांत की अवधि 280 दिन की होती है.

ऐसे लें ज्यादा घी

कृषि विज्ञान केंद्र, बंजरिया, जनपद बस्ती में वरिष्ठ पशु विज्ञानी डाक्टर एसएन लाल के मुताबिक, भदावरी भैंसों से ज्यादा घी हासिल करने के लिए पशुपालक अगर कुछ विशेष चीजों पर ध्यान दें तो घी के उत्पादन को और भी ज्यादा बढ़ाया जा सकता है.

इस के लिए पशुपालक भदावरी नस्ल की इन भैंसों को हरे चारे और सूखे चारे का संतुलित आहार दे कर भी दूध में घी की मात्रा को बढ़ा सकते हैं.

सिर्फ हरा चारा खिलाने से दूध और उस में घी की मात्रा नहीं बढ़ती है, बल्कि हरे चारे से दूध तो बढ़ता है, लेकिन उस में चरबी कम हो जाती है. ऐसे में इस नस्ल की भैंस को 60 फीसदी हरा चारा और 40 फीसदी सूखा चारा मिला कर खिलाना चाहिए.

अचानक ही पशु के आहार में बदलाव न करें. थनों से दूध निकालते समय इस बात का ध्यान रखें कि पड़वा को आखिरी में आने वाला दूध न पिलाएं क्योंकि घी की मात्रा आखिरी में आने वाले दूध में सब से ज्यादा होती है.

उपज न हो बरबाद

खेती से ज्यादा कमाई के लिए अनाज, फलों व सब्जियों वगैरह की वाजिब कीमत मिलना व उन्हें महफूज रखना जरूरी है. कुल पैदावार का तकरीबन 16 फीसदी से 25 फीसदी हिस्सा खराब हो जाता है. इस से अरबों रुपए का नुकसान होता है. बंपर पैदावार से कहीं टमाटरों की लागत नहीं निकलती तो कहीं कोल्ड स्टोरेज में आलू रखने की जगह नहीं मिलती.

परेशान किसानों को अकसर अपनी उपज सड़कों पर फेंकने को मजबूर होना पड़ता है या फिर खुदकुशी करने को मजबूर होना पड़ता है. इस के लिए किसानों को अपनी प्रोसैसिंग इकाइयां लगाने के लिए बढ़ावा देना लाजिमी है. अगर सरकार व किसान चाहें तो ये काम करना मुश्किल नहीं हैं.

चूहे, नमी, फफूंद व कीड़ों वगैरह के चलते गोदामों की कमी से खुले में पड़े रहने, बारिश में भीगने, लापरवाही, बदइंतजामी व प्रोसैसिंग न होने से हर साल काफी अनाज खराब होता है.

वहीं दूसरी ओर खाद्यान्न की खरीद से गोदामों में रखने तक खूब हेराफेरी होती है. अनाज कम भुगतान ज्यादा. इसे छिपाने के लिए भ्रष्ट मुलाजिम अनाज सड़ाते हैं, फिर उसे ठिकाने लगाने के लिए करोड़ों रुपए लगाते हैं. मेरठ के वेयरहाउस में एक मुलाजिम चावलों पर पानी डालते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया था.

हापुड़ में हजारों बोरे गेहूं स्टेशन पर ही पड़ापड़ा सड़ गया था. इसलिए सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ा था कि अनाज बचा नहीं सकते तो गरीबों में बांट दो.

कागजी घोड़े

बहुत से इलाकों में आंधीतूफान व पानी के कटाव जैसी कुदरती आपदाओं से भी उपजाऊ जमीन का काफी नुकसान होता है. इस के लिए राज्यों में भूमि संरक्षण विभाग व भूमि सुधार निगम वगैरह सरकारी एजेंसियां चल रही हैं, लेकिन कुछ अपवाद छोड़ दें तो ज्यादातर किसानों को पता ही नहीं चलता.

भारत में जमीन की कमी नहीं है. अनाज की प्रति हेक्टेयर उपज बहुत कम है. मसलन, भले ही हम खेती में खुद को अगड़ा समझें, नेता व अफसर अपनी तारीफों के पुल बांध कर कितने ही गाल बजाएं, लेकिन सचाई इस के ठीक उलट दिखाई देती है.

खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing)

बचने के उपाय

खेती के लिए जमीन सब से पहली जरूरत है, लेकिन अपने देश का अजब हाल है. जमीन का महकमा मंत्रालय के बजाय ग्रामीण विकास मंत्रालय के तहत आता है.

जाहिर है, जमीन को प्लास्टिक की तरह बढ़ा नहीं सकते, लेकिन खराब होने से बचा तो सकते हैं. मौजूदा जमीन का बेहतर इस्तेमाल तो कर सकते हैं. मसलन, पहाड़ी इलाकों में बहुत से ढलान सपाट हैं. वहां सीढ़ीनुमा खेत बनाए जा सकते हैं. ऊसर जमीन को सुधार सकते हैं. जागरूकता, प्रचारप्रसार व ट्रेनिंग की कमी में बहुत से किसान नहीं जानते खेत में पानी भर जाने, पानी की निकासी न होने, जमीन को खाली छोड़ने, हरी व गोबर की सड़ी खाद न देने और खारा पानी से सिंचाई करने से जमीन ऊसर हो जाती है.

मेड़बंदी, जुताई, नमक की परत खुरच कर निकाल देने, खेत को एकसार करने, प्रेसमड शीरा, जलकुंभी, धान की पुआल व भूसी, पायराइट व जिप्सम से भी ऊसर जमीन सुधारी जा सकती है.

हमारे यहां जमीन कम नहीं है. जरूरत है असल समस्या का समाधान करने की. ज्यादातर किसान छोटे, गरीब व कम पढ़ेलिखे हैं. वे जमीन की सेहत के लिए जरूरी सभी 16 पोषक तत्त्वों की अहमियत नहीं समझते, इसलिए वे न तो अपने खेत की मिट्टी की जांच कराते हैं और न ही रिपोर्ट के मुताबिक खुराक दे कर उन की कमी को पूरा करते हैं इसलिए पैदावार कम होती है.

बरसों पहले संगरिया, राजस्थान में रेतीले टीबे थे. अब वहां फलदार पेड़ हैं. रुद्रपुर, उधमसिंह नगर की दलदली जमीन व मवाना, मेरठ के पास गंगा के खादर को पंजाब के किसानों ने सुधार कर उम्दा खेती लायक बना दिया. इसी तरह सरकार अगर चंबल के बीहड़ों की जमीन भी पंजाब के किसानों को सौंप दे तो वहां की तसवीर बदल सकती है.

विश्व बैंक परियोजना (World Bank Project) द्वारा संचालित कामों का अवलोकन

उदयपुर : 4 अप्रैल, 2024. महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर में राष्ट्रीय कृषि उच्च शिक्षा परियोजना, जो कि विश्व बैंक द्वारा संचालित है, उस के टीम लीडर डा. बेकजोड शेमसीव ने विश्वविद्यालय की विभिन्न इकाइयों में विश्व बैंक परियोजना द्वारा संचालित कामों का अवलोकन किया.

उन्होंने विश्वविद्यालय के कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक एवं अधिकारियों के साथ संवाद किया और डेयरी एवं खाद्य अभियांत्रिकी महाविद्यालय के नवीनीकृत प्रयोगशाला का दौरा किया.

प्रौद्योगिकी एवं अभियांत्रिकी महाविद्यालय, उदयपुर के एक्पेरिंयन्शल लर्निंग यूनिट (नई खाद्य प्रसंस्करण प्रयोगशाला इकाई) में छात्रों द्वारा बनाए जा रहे उत्पादों को देखा एवं उस की तहेदिल से सराहना की.

इस अवसर पर डा. बेकजोड शेमसीव ने विश्वविद्यालय के सभागार में विश्व बैंक परियोजना के अंतर्गत विदेश में प्रशिक्षण लेने गए संकाय सदस्यों एवं छात्रों से एकएक कर के वार्ता की एवं प्रशिक्षण के अनुभव के आधार पर नई तकनीकी का उपयोग करते हुए विश्वविद्यालय में नई परियोजना लाने एवं उस पर काम करने के लिए प्रेरित किया.

विश्वविद्यालय के कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने बताया कि इस परियोजना के माध्यम से विश्वविद्यालय के 11 संकाय सदस्यों एवं 71 छात्रों को विदेश में प्रशिक्षण करने का अवसर प्राप्त हुआ.

विश्व बैंक परियोजना (World Bank Project)

छात्रों ने जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में सतत कृषि विकास के लिए स्मार्ट कृषि प्रौद्योगिकियों पर प्रशिक्षण एवं हवा, पानी और मिट्टी के विश्लेषण के लिए अत्याधुनिक उपकरणों के उपयोग पर प्रशिक्षण प्राप्त किया. इस के अतिरिक्त विश्वविद्यालय सभी सांगठनिक महाविद्यालयों में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए आधुनिक उपकरण खरीदे गए, जो अनुसंधान के लिए काफी मददगार साबित हुए.

इस परियोजना के द्वारा विश्वविद्यालय की अनुसंधान गतिविधियों को भी बढ़ावा मिला, जिस के द्वारा विश्वविद्यालय के अनुसंधान प्रकाशन में आशातीत प्रगति हुई है एवं विश्वविद्यालय का एच इंडेक्स वर्ष 2019 में 38 था, जो आज बढ़ कर 72 हो गया है. इस दौरान विश्वविद्यालय ने 17 पेटेंट प्राप्त किए हैं और विश्वविद्यालय के कई छात्रों ने इस से प्रेरित हो कर अपना स्वयं का स्टार्टअप प्रारंभ कर दिया है.

कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने बताया कि परियोजना के द्वारा विश्वविद्यालय का चहुंमुखी विकास हुआ है और विशेष रूप से स्नातक छात्रों को विदेश में प्रशिक्षण के साथसाथ शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक विकास हुआ है.

महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर में यह परियोजना भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (भारत सरकार) और विश्व बैंक की वित्तीय सहायता से विगत 5 सालों से लागू की जा रही थी. इस परियोजना का कार्यकाल 1 जनवरी, 2019 से 31 दिसंबर, 2023 तक रहा.

परियोजना प्रभारी डा. पीके सिंह ने परियेाजना के अंतर्गत कराए गए विभिन्न कामों का एक प्रतिवेदन विश्व बैंक के टीम लीडर डा. बेकजोड शेमसीव के सम्मुख प्रस्तुत किया.

अंत में डा. लोकेश गुप्ता, अघिष्ठाता, डेयरी एवं खाद्य अभियांत्रिकी महाविद्यालय, उदयपुर ने विश्व बैंक की टीम के लीडर डा. बेकजोड शेमसीव का पहली बार विश्वविद्यालय में आने पर स्वागत किया एवं आभार जताया. साथ ही, विश्वविद्यालय के अन्य अधिकारियों का स्वागत करते हुए आभार जताया.

अगले 10 सालों में क्या खेती का स्वरूप (Nature of Farming) बदलेगा?

सवाल : क्या अगले 10 सालों में खेतीबारी का स्वरूप बदलेगा? यदि हां, तो कैसे?

जवाब : उत्तर प्रदेश की लगभग सभी खेती वाली जमीनों का अध्ययन किया जाए, तो वर्तमान समय में खेती के लिए किराए पर जमीन गुणवत्ता के अनुसार 20,000 से 50,000 रुपए प्रति एकड़ सालाना किराए पर मिल रही है. जो भी खेती करने वाला परिवार अपनी पैतृक या लीज की जमीन से उपरोक्त धनराशि के बराबर यानी 20-50 हजार रुपया प्रति एकड़ सालाना की बचत नहीं कर पा रहा है, वह परिवार लगातार खेती के व्यवसाय से बाहर होता जा रहा है.

भारत में लगभग 1,1000 परिवार प्रतिदिन खेती छोड़ रहे हैं. इस समय भारत की जीडीपी में कृषि का योगदान महज 11 फीसदी तक सिमट गया है. यह दायरा आने वाले समय में लगातार घटता ही जाएगा. खेती से साल में एक या दो बार फसल लेने वालों के बजाय रेग्युलर सहफसलों, मल्टीस्टोरी क्रापिंग, सब्जी की खेती, पशुपालन करने वाले या जो लोग खेती के साथसाथ उस से जुड़े अन्य कोई भी काम कर रहे हैं, वे लोग ही सर्वाइव कर सकेंगे.

आने वाले समय में खेती के क्षेत्र में अधिक मुनाफा तभी संभव है, जब हम कृषि विशेषज्ञ की देखरेख में खेती को उचित दिशा देंगे, खेती में आधुनिक तकनीकों को अपनाएंगे. इस के लिए किसान को जागरूक रहना होगा. कृषि को मौडर्न तरीके से करना होगा. सरकारी योजनाओं की जानकारी ले कर उन का लाभ उठाना होगा.

किसानों को अपने उत्पाद के लिए प्रोसैसिंग से जुड़ना होगा. अपने उत्पाद की कीमत भी खुद ही तय करनी होगी. ऐसे अनेक काम हैं, जिन्हें किसान अपनाएंगे, तो निश्चित ही किसान के लिए खेती अधिक लाभकारी बन सकेगी.

सरकार जैसे ही कांट्रैक्ट फार्मिंग विधेयक पास करा ले जाएगी तो भारत की खेतीबाड़ी में चमत्कारिक परिवर्तन देखने को मिलेगा. पढ़ेलिखे बेरोजगार सरकारी नौकरी ढूंढ़ कर असफल हो जाने के बाद इसी क्षेत्र में पनाह पाएंगे.

उपरोक्त बाधाओं को दूर कर के “प्राकृतिक खेती के आधार पर सस्टनेबल कृषि के द्वारा” भारत क्वालिटीयुक्त भोजन में भी विश्वगुरु अगले 10-15 सालों में बन सकता है.

किसान (Farmers) हो सकते हैं मालामाल

भारत में फलों की पैदावार में कोई कमी नहीं है, लेकिन फल जल्दी खराब होने वाली चीज है, जिस के लिए भंडारण की समस्या काफी पेचीदा मसला है.

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के एक अनुमान के मुताबिक, 30 से 40 फीसदी फल बाजार में पहुंचने से पहले ही खराब हो जाते हैं. अगर अनाज की बात करें तो उस के रखरखाव में इतनी मुश्किलें नहीं आतीं, जितनी फल को स्टोर करने में आती हैं.

देश में फल इसलिए भी जल्दी खराब होने लगते हैं कि उत्पादन के अनुपात में कोल्डस्टोरेज नहीं हैं. दूसरी अहम बात यह है कि एक जगह से दूसरी जगह लाने व ले जाने के लिए संसाधनों की कमी है.

छोटे किसानों की परेशानी यह होती है कि उन के पास इतना पैसा नहीं होता है कि वे लोग लंबे समय तक के लिए अपने उत्पाद को सहेज कर कोल्डस्टोर में रख सकें. सरकार इस के लिए काम कर रही है, लेकिन कुछ ऐसे तरीके भी हैं जिन का इस्तेमाल कर के किसान फलों से होने वाले नुकसान को कम कर सकते हैं और अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं.

जैम और मुरब्बा : किसान अपनी लागत निकालने के लिए औनेपौने दामों पर फलों को बेचने को मजबूर हो जाते हैं. उन्हें मालूम है कि अगर समय पर फलों को बेचा नहीं गया तो वे खराब हो जाएंगे, जिस से लागत निकालना भी मुश्किल हो जाएगा.

फलों को सीधे बाजार में बेचने के बजाय किसान जैम और मुरब्बा बना कर बेचें तो उन का मुनाफा दोगुना बढ़ सकता है.

फ्रूट जूस या स्क्वैश : जैम और मुरब्बा के अलावा फलों से जूस, स्क्वैश या फ्रूट पल्प भी बनाया जा सकता है. आज के समय में इस तरह के कारोबार से काफी मुनाफा कमाया जा रहा है.

किसानों को चाहिए कि वे कुछ समय की ट्रेनिंग ले कर घर पर ही इस तरह के प्रोडक्ट बना कर बाजार में उतार सकते हैं. इस तरह के जो भी प्रोडक्ट तैयार होते हैं, उन को सालभर तक आसानी से स्टोर कर के बेचा जा सकता है.

अमचूर बनाना : भारत में आम की पैदावार काफी होती है, लेकिन तेज हवा और आंधीतूफान आने से आम पकने के पहले ही टूट कर गिर जाते हैं. इन्हें बहुत कम कीमत पर बेचना पड़ता है. अगर कच्चे आम की फांकों को सुखा कर उस का अमचूर बना लिया जाए तो फायदे का सौदा हो सकता है.

एक अनुमान के मुताबिक, 15-20 फीसदी आम पकने से पहले ही तेज हवा या आंधीतूफान से गिर जाते हैं. तुड़ाई के दौरान भी 10 फीसदी फल फट जाते हैं. ऐसे फलों की बाजार में कुछ खास कीमत नहीं मिलती. अगर ऐसे आमों को बाजार में बेचने के बजाय इन का अमचूर बना कर बेचा जाए तब एक किलोग्राम अमचूर 250 से 300 रुपए किलोग्राम तक में बिक जाता है.

हमारे देश में फलों और सब्जियों को धूप में सुखा कर रखने का रिवाज बहुत पहले से चला आ रहा है. घर पर बड़ेबूढ़ों से कहते सुना जाता है कि पहले हम लोग फल और सब्जियां सुखा कर कईकई दिनों तक इस्तेमाल करते थे.

आज के समय में घरों से रेफ्रिजरेटर होने के बावजूद एक हफ्ते से ज्यादा फल या सब्जी चला पाना मुश्किल है. जो काम पहले खुद के लिए किया जाता था, अगर वही काम व्यावसायिक पैमाने पर किया जाए तो इस से अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है.

बाजार में अब ऐसी मशीनें भी मिलने लगी हैं, जिन से फलों और सब्जियों की क्वालिटी कम किए बिना उन्हें सुखाया जा सकता है. सुखाए गए खुबानी, अंजीर, कटहल, आंवला, अंगूर, पपीता, आम वगैरह बाजार में अच्छी कीमत पर बिक जाते हैं.

इस के अलावा छोटेबड़े पैमाने पर अचार, चटनियां बनाने का काम शुरू कर के भी फायदा कमाया जा सकता है.

ज्यादा मुनाफा हासिल करने के लिए इस तरह के काम को आसानी से किया जा सकता है. इस के लिए किसी बड़ी मशीन की जरूरत भी नहीं होती, साथ ही, घरपरिवार के लोग मिल कर अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं.

छोटे उद्योग लगाने के लिए सरकार भी किसानों को मदद के साथ ट्रेनिंग भी देने का काम करवा रही है. ऐसे तरीकों से खेती पर किसानों का निर्भर होना कम होगा, बल्कि फायदा भी  ज्यादा होगा.

आइसक्रीम की इकाई (Ice-Cream Unit) लगाएं मुनाफा कमाएं

यह बड़ी पुरानी कहावत है कि हमारे देश में दूध की नदियां बहती थीं यानी पहले भी दूध का उत्पादन बहुतायत में होता था. दूध व उस का इस्तेमाल हमारे जीवन में इस तरह रचाबसा था कि ‘दूधो नहाओ पूतो फलो’ व ‘दूध का कर्ज उतारने’ जैसे बहुत से मुहावरे रोजमर्रा की आम बोलचाल में बखूबी इस्तेमाल किए जाते हैं.

खानपान में बदलाव के बावजूद दूध आज भी ज्यादातर लोगों की सब से बड़ी जरूरत है इसलिए डेरी उद्योग में पैर जमाने, आगे बढ़ने व कमाने की बहुत गुंजाइश है. दूध जल्दी खराब होने वाली बड़ी नाजुक चीज है इसलिए इस के उत्पादन, भंडारण, रखरखाव व बिक्री में जल्दी, पुख्ता इंतजाम, बहुत साफसफाई और सूझबूझ की जरूरत होती है.

चाहे खेती हो या डेरी, ज्यादा कमाई के लिए किसानों को उद्यमी बनना होगा. दरअसल, ज्यादातर किसानों को उन के दूध की वाजिब कीमत नहीं मिलती. इसलिए दूध का बेहतर इस्तेमाल उस की चीजें बना कर बेचने से हो सकता है. मसलन, कुछ पशुपालक दूध से दही, मावा, पनीर, मक्खन व घी वगैरह चीजें बनाते रहे हैं, लेकिन ये तो सिर्फ 5 चीजें हैं, जबकि अमूल कोआपरेटिव दूध से छाछ, लस्सी, दही, चीज व आइसक्रीम वगैरह 50 चीजें बना कर बेच रही है.

जरूरत है नए नजरिए की. ग्राम नबीपुर, जिला शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश के प्रगतिशील किसान ज्ञानेश तिवारी सुधरे तरीकों से अपनी डेरी में 400 लिटर दूध का उत्पादन कर के लाखों रुपए हर महीने कमा रहे हैं.

मसलन, अब आइसक्रीम की मांग तेजी से बढ़ रही है. इसलिए डेरी का काम करने वालों को ध्यान दे कर इस नए काम में अपना हाथ आजमाना चाहिए.

हर इलाके में किसी न किसी उपज की बहुतायत होती है. बाजार में उस उपज की भरमार रहने से उत्पादकों को वाजिब कीमत तो दूर कई बार लागत भी नहीं मिलती. केरल के नारियल उत्पादक भी इस समस्या से आजिज आ चुके थे. उन्होंने फूड प्रोसैसिंग को कमाई बढ़ाने का जरीया बनाया और ताजा नारियल की आइसक्रीम बना कर खुद इस मसले का हल खोजा.

आज केरल में टैंडर कोकोनट आइसक्रीम का कारोबार 100 करोड़ रुपए से भी ऊपर पहुंच चुका है इसलिए डेरी उद्यमी भी ऐसा कर सकते हैं.

पशुपालक अपनी डेरी के दूध से आइसक्रीम बना कर बेच सकते हैं. इस से उन की उत्पादन लागत दूसरों के मुकाबले कम हो सकती है. हालांकि पशुपालन व दूध उत्पादन सदियों से खेती के सहायक कामधंधों में शामिल व अहम रहा है, लेकिन पशु व उन के आहार की कीमत बढ़ने से डेरी उद्योग में भी लगातार बढ़ी है, इसलिए सिर्फ दूध निकाल कर बेचने से कहीं ज्यादा कमाई दूध से आइसक्रीम बना कर बेचने से की जा सकती है.

बढती मांग

आइसक्रीम की इकाई (Ice-Cream Unit)

चुसकी, मलाई बर्फ, कुलफी, सौफ्टी व आइसक्रीम वगैरह का चलन बहुत पुराना व ज्यादा है. देशभर में आइसक्रीम बनाने के बहुत से छोटेबड़े कारखाने चल रहे हैं. हालांकि आइसक्रीम की मांग अमूमन पूरे साल बनी रहती है, लेकिन गरमियों में आइसक्रीम की खपत व बिक्री बहुत ज्यादा बढ़ जाती है. तरहतरह के स्वाद वाली रंगबिरंगी आइसक्रीम बच्चों से ले कर बड़ेबुजुर्गों व घरों से होटलों तक में खूब पसंद की जाती है. शादीब्याह व दावतों में शहरी व गंवई इलाकों तक में बड़े पैमाने पर आइसक्रीम की खपत होती है.

भारत में आइसक्रीम का बाजार तकरीबन 1800 करोड़ रुपए सालाना का है, जो हर साल 20 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रहा है.

किसान चाहें तो कच्चा माल खरीद कर इस मैदान में उतर कर ज्यादा फायदा कमा सकते हैं, जरूरत है हिचक छोड़ कर पहल करने की.

बीते 80 सालों से आइसक्रीम बना रही अहमदाबाद की सब से पुरानी कंपनी वाडीलाल है. इस अकेली कंपनी की गुजरात में 35 फीसदी की हिस्सेदारी व पूरे देश के आइसक्रीम बाजार में 14 फीसदी की हिस्सेदारी है. यह कंपनी 150 किस्मों के फ्लेवर में 300 तरह के आइसक्रीम पैक तैयार करती है.

जानकारों के मुताबिक, अब आइसक्रीम के बाजार में इलाकाई कंपनियों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है. किसान आपस में मिल कर भी यह काम शुरू कर सकते हैं.

अमीर मुल्कों में प्रति आदमी आइसक्रीम की खपत 2 लिटर व भारत में उस से 10 गुना कम सिर्फ 200 ग्राम है. दूध से खुद आइसक्रीम बना कर बेचने का काम पशुपालकों के लिए खासा मुनाफे का सौदा हो सकता है. किसान चाहें तो जानकारी, ट्रेनिंग या तजरबा हासिल कर आइसक्रीम बनाने की इकाई लगा कर चला सकते हैं.

कमाई का अच्छा मौका

दूध से आइसक्रीम बनाने का काम शुरू कर के डेरी उद्यमी अपने बच्चों को घर बैठे फायदेमंद रोजगार मुहैया करा सकते हैं. यह काम करना कोई मुश्किल नहीं है. इस काम की सब से बड़ी खूबी यह है कि आइसक्रीम का बाजार बहुत बड़ा है. इसलिए दूध उत्पादक अपनी कूवत के मुताबिक इकाई लगा सकते हैं.

किसान आइसक्रीम बनाने की इकाई लगाने में सब से पहले यह फैसला करें कि यह काम उन्हें अकेले करना है या दूसरों के साथ मिल कर या साझेदारी फर्म, प्राइवेट लिमिटेड कंपनी या फिर अमूल की तरह कोआपरेटिव सोसायटी बना कर करना है. पशुपालक किसानों की अपनी संस्था अमूल बीते 25 सालों से कई तरह की आइसक्रीम बना कर देशभर में बेच रही है.

कारोबार के तयशुदा ढांचे के मुताबिक ही संबंधित रजिस्ट्रार के यहां फर्म, कंपनी या सोसायटी का रजिस्ट्रेशन कराया जाता है, उस के बाद बिक्री, व्यापार कर और एफएसएसएआई का लाइसैंस हासिल किया जाता है. ये सारे काम जिला उद्योग केंद्र की मदद से पूरे किए जा सकते हैं. इस के अलावा पूंजी, बिजली, पानी, कोल्ड स्टोर व वाहनों की जरूरत होती है.

अब बहुत तरह की आइसक्रीम बाजार में मिलती हैं, इसलिए दूध उत्पादक किसानों के साथसाथ फल उत्पादक किसान भी चाहें तो आइसक्रीम इकाई लगा कर अपनी उपज की ज्यादा कीमत पा सकते हैं.

मुंबई, दिल्ली, नोएडा, कानपुर, आगरा, लखनऊ, एर्णाकुलम आदि कई शहरों में आइसक्रीम पार्लर चला रही नेचुरल कंपनी की पहचान सब से अलग है, क्योंकि इस कंपनी की 18 किस्म की खास आइसक्रीम में ताजा फलों की भरमार रहती है.

कुदरती स्वाद के लिए मशहूर हो चुकी नेचुरल आइसक्रीम में शरीफा, चीकू, तरबूज, पपीता, अमरूद, ताजा नारियल, सीताफल, जामुन, स्ट्राबेरी, आम वगैरह कई चीजों का खूब इस्तेमाल किया जाता है इसलिए आइसक्रीम में अलग ही स्वाद होता है. खास बात यह भी है कि नेचुरल की पैक्ड आइसक्रीम को आसानी से कहीं भी लाया व ले जाया जा सकता है.

नई तकनीक से पैक की गई यह आइसक्रीम 6 घंटे तक नहीं पिघलती, क्योंकि नई पैकेजिंग तकनीक से अब नामुमकिन काम भी आसान हो गए हैं.

कच्चा माल व जरूरी चीजें

असल में आइसक्रीम दूध, क्रीम, वनीला, स्ट्राबेरी व दूसरी कई जायकेदार चीजों को मिला कर ठंडा कर के जमी हुई मिठाई की तरह होती है. इसे बनाने के लिए दूध, क्रीम, दूध पाउडर, चीनी, पानी, अंडे, क्रीम, रंग, मेवे, फलों के एसेंस, फ्लेवर टिकाऊ बनाने के लिए स्टैबलाइजर के तौर पर ग्वारगम या एथिल सैल्यूलोज आदि का इस्तेमाल किया जाता है ताकि उस के अंदर बर्फ के कण न जमें, वह चिकनी और आधी ठोस बनी रहे.

दूध में पानी व चीनी मिलाने के बाद उसे पाश्चुरीकृत करने के लिए 72 सैंटीग्रेड तापमान पर 30 मिनट तक गरम किया जाता है. इस के बाद उसे एकसमान करने के लिए लगातार घुमाया व चलाया जाता है ताकि सारा मिश्रण मिल जाए, उस में चिकनाई आ जाए व हवा भर जाए. इस के बाद उसे ठंडा किया जाता है. इस के बाद उस में जरूरत के मुताबिक वनीला या स्ट्राबेरी के एसेंस मिलाए जाते हैं.

यहां से शुरू होती है अलगअलग तरह के छोटेबड़े खांचों में भर कर 0 सैंटीग्रेड से नीचे तापमान में रख कर आइसक्रीम को जमाने की प्रक्रिया. बाद में आइसक्रीम को काजू, किशमिश, पिस्ता व बादाम आदि सूखे मेवों, चौकलेट की परत या चेरी डाल कर सजाने का काम किया जाता है.

आइसक्रीम जमाने के लिए कप, जार व फ्रीजर की जरूरत पड़ती है. अब ऐसी सभी सामग्री अपने देश में आसानी से मिल जाती है.

बाजार व बिक्री

आइसक्रीम की इकाई (Ice-Cream Unit)

याद रखें कि रोज नए फ्लेवर से आइसक्रीम का कलेवर बदल रहा है. नईनई आइसक्रीम खानपान व खुशियों का हिस्सा बन रही हैं.

आप का आजमाया हुआ नया व उम्दा नुसखा आइसक्रीम के बाजार में आप की अलग पहचान बना सकता है. साथ ही, आप की बिक्री तेजी से बढ़ सकती है, क्योंकि अब आइसक्रीम की औनलाइन डिलीवरी सीधे घरों तक हो रही है. जरूरत है बाजार में हो रहे बदलाव से फायदा उठाने की.

उत्पादक व उपभोक्ता अब औनलाइन मिल जाते हैं. इस सिस्टम से बीच के बिचौलिए कम हैं. इस से निर्माता का फायदा बढ़ता है. बाजार में ग्राहक बेशक राजा होता है, लेकिन उम्दा क्वालिटी व प्रचार भी काफी माने रखते हैं.

ध्यान रहे कि आइसक्रीम के बाजार में वही ज्यादा बिकेगा जो वाकई अच्छा होगा. अमीर मुल्कों से तरहतरह के गुर सीख कर आइसक्रीम की बिक्री बढ़ाने की राह में अभी बहुतकुछ करना बाकी है. मसलन, ब्रैड स्लाइस के बीच में आइसक्रीम की स्लाइस लगा कर बेचने की शुरुआत अभी तक अपने देश में नहीं हुई है, जबकि सिंगापुर वगैरह देशों में ऐसे कई तरीके सालों से बहुत कामयाब साबित हो रहे हैं, जिन्हें अपनाया जा सकता है.

आइसक्रीम बेचने के तरीकों में क्वालिटी जैसी बड़ी कंपनियां भी बरसों से एक ही कदमताल कर रही हैं. मसलन, आइसक्रीम के ज्यादातर पार्लर्स में 2 से 5 आइसक्रीम के बड़े पैक गत्ते के कटेफटे चोकोर डब्बों में रखे रहते हैं. स्कूप से कोन या कप में आइसक्रीम डाल कर देने का तरीका अब पुराना हो गया है.

सिंगापुर में आइसक्रीम को ट्रे में केक व मिठाई की तरह बेहद सुंदर ढंग से सजा कर रखा जाता है. उस के ऊपर इतनी उम्दा टौपिंग होती है कि देखते ही ग्राहक का मन उसे खानेखरीदने के लिए करने लगता है.

इस तरह पशुपालक किसान भी अगर बेहतर मार्केटिंग के नए व कारगर गुर सीख लें तो वे आइसक्रीम से जल्दी पैसे कमा कर खुशहाल हो सकते हैं. अमूल, इफको व पतंजली जैसी कई नामी कंपनियां इस बात का सुबूत हैं, जो बेहतर मार्केटिंग से बाजार में छा गईं व आज लाखोंकरोड़ों रुपए का कारोबार कर रहे हैं.

मशीनें यहां से लें

इच्छुक उद्यमी किसान पहले छोटे पैमाने पर आइसक्रीम बना सकते हैं. वाजिब दाम पर उम्दा क्वालिटी का माल दे कर बाजार में अपनी पैठ व अच्छी साख बना सकते हैं ताकि मशहूर हो सकें. फिर धीरेधीरे काम को आगे बढ़ाएं तो कामयाबी मिलनी तय है.

आइसक्रीम बनाने वाली आटोमैटिक मशीनों की जानकारी अलीबाबा डौट काम या इंडियामार्ट डाट कौम पर ली जा सकती है. इस के अलावा इन निर्माताओं से भी संपर्क किया जा सकता है:

मैं. केवीआर इंडस्ट्रीज , 6-33/1 निकट कूकरपल्ली बस स्टैंड, मूसापैट, हैदराबाद, पिन-500018. फोन : 0848606212

मै. शांति इंजीनियर्स, 11 अमेनियम स्ट्रीट, चौथा तल, बरावोराने रोड, बुर्रा बाजार, कोलकाता-700001, पश्चिम बंगाल.

आइसक्रीम जैसा फ्रोजन डेजर्ट

अमूल व मदर डेरी में दूध की चिकनाई से बनी आइसक्रीम असली होती है, लेकिन दूध की वसा के अलावा अब म्यूनीज, सोया क्रीम व पीनट बटर जैसी कई दूसरी किफायती चिकनाई भी खूब इस्तेमाल हो रही है. आइसक्रीम जैसी एक चीज फ्रोजन डेजर्ट भी बनने लगी है, जो सब्जियों की वसा से बनाई जाती है. इस की लागत भी बहुत कम है.

हमारे देश में अब फ्रोजन डेजर्ट का चलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है. जानकारों के मुताबिक, देश के आइसक्रीम बाजार में तकरीबन 40 फीसदी हिस्सेदारी फ्रोजन डेजर्ट की हो गई है.

ज्यादातर उपभोक्ता आइसक्रीम व फ्रोजन डेजर्ट के महीन अंतर को नहीं परख पाते और फ्रोजन डेजर्ट को भी आइसक्रीम समझ कर ही खा जाते हैं. इसी तरह अब दही से बनी आइसक्रीम फ्रोजन योगर्ट के नाम से बन कर बिक रही है.

ईस्मा : आइसक्रीम निर्माताओं की मददगार संस्था

हमारे देश में चल रहे आइसक्रीम उद्योग की सारी जानकारी मुहैया कराने के मकसद से अप्रैल, 2011 से इंडियन आइसक्रीम मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन ‘ईस्मा’ काम कर रही है. यह संस्था अपने सदस्यों को सरकारी नीतियों, फूड सेफ्टी की हिदायतों, उन के पालन, इंटरनैशनल बिजनैस, इंटरनैशनल स्टैंडर्ड समेत ट्रेनिंग वगैरह की सहूलियतें मुहैया कराती है.

‘ईस्मा’ आपसी सलाहमशवरे से चुनौतियों का मुकाबला करने, कारोबार बढ़ाने के उपाय खोजने, रणनीति व माहिरों के तजरबों का फायदा दिलाने का काम भी करती है, इसलिए आइसक्रीम बनाने वालों को इस संगठन का सदस्य बनना बहुत फायदेमंद रहता है.

इच्छुक उद्यमी निदेशक, इंडियन आइसक्रीम मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन यानी ‘ईस्मा’ ए-801, 8वां तल, टाइम स्क्वायर बिल्डिंग, सीजी रोड, नवरंगपुरा, अहमदाबाद 380009, फोन 7383354764 से संपर्क कर सकते हैं.