बांस की खेती दे रोटी, कपड़ा और मकान

बांस एक बहुपयोगी घास है, जो हमारे जीवन में अहम जगह रखता है. इस को ‘गरीब आदमी का काष्ठ’, ‘लोगों का साथी’ और ‘हरा सोना’ आदि नामों से जाना जाता है. बांस के कोमल प्ररोह सब्जी व अचार बनाने और इस के लंबे तंतु रेऔन पल्प बनाने में प्रयोग किए जाते हैं, जिस से कपड़ा बनता है.

आवास (झोंपड़ी) व हलके फर्नीचर बनाने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में बांस प्रमुखता से प्रयोग किया जाता है. इस प्रकार यह आदमी की 3 प्रमुख जरूरतों जैसे रोटी, कपड़ा और मकान को पूरा करता है.

भारत बांस संसाधन से संपन्न है, क्योंकि यह देश के अधिकतर क्षेत्रों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. देश में इस समय बांस की लगभग 125 देशी व विदेशी प्रजातियां उपलब्ध हैं. पूरे देश के 89.6 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में बांस वाला वन क्षेत्र है, जो पूरे वन क्षेत्रफल का तकरीबन 12.8 फीसदी है.

आमतौर पर गांव में लोग अपने घर के आसपास ही काफी अधिक मात्रा में बांस उगाते हैं, ताकि उस से वे अपने रोजाना की जरूरतें पूरी कर सकें.

जलवायु और मिट्टी

बहुत ठंडे क्षेत्रों को छोड़ कर लगभग हर प्रकार के क्षेत्रों में बांस का रोपण किया जा सकता है. इस के लिए उचित जल निकास वाली बलुई दोमट मिट्टी सर्वोत्तम रहती है. बांस जलोढ़, पथरीली व लाल मिट्टी में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है.

प्रमुख प्रजातियां

वर्तमान में देश में बांस के 23 वंश (जेनरा) और 125 जातियां (स्पीसीज) पाई जाती हैं. क्षेत्र व जलवायु के हिसाब से बांस की अलगअलग प्रजातियां उपयुक्त होती हैं. उत्तरपूर्वी भारत (पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ आदि) में रोपण के लिए उपयुक्त जातियां (स्पीसीज ) हैं.

* बैंबूसा बाल्कोवा

* बैंबूसा टुल्डा

* डैंड्रोकेलेमस स्ट्रिक्टस

प्रारंभ की 2 जातियों में बांस की कटाई ज्यादा आसान रहती है.

प्रवर्धन तकनीकी

पौधशाला में तैयार पौधे श्रेष्ठ माने जाते हैं, क्योंकि इस तरह के पौधे स्वस्थ व तेज वृद्धि करने वाले होते हैं. बांस का प्रवर्धन पौधशाला में सीधे बीज की बोआई, प्रकंद रोपण, प्रशाखा (औफसैट), रोपण व नाल (कलम) रोपण द्वारा किया जाता है. प्रमुख विधियों की संक्षिप्त तकनीकी इस तरह है :

* बीज द्वारा सीधी बोआई : यह सब से सरल विधि है. इस में बांस के ताजा बीज को पौधशाला की क्यारियों में बोआई करते हैं. जब पौधे 8 से 10 सैंटीमीटर के हो जाते हैं, तब इन पौधो को पौलीथिन की थैलियों में दोबारा रोपित किया जाता है.

पर, अधिकतर बांस की जातियों (स्पीसीज) में पुष्पन व बीजीकरण सामूहिक (ग्रिगेरियस) रूप में औसतन 40 से 50 साल के बाद होता है, जिस के कारण बांस का बीज उपलब्ध नहीं हो पाता है और बीजजनित पौधे धीमी वृद्धि करते हैं. इस वजह से आमतौर पर बांस का प्रवर्धन बीज से नहीं किया जाता है.

* प्रकंद रोपण : इस विधि में जीवित प्रकंद का 1-2 आंखों वाला तकरीबन 30 सैंटीमीटर लंबा भाग 45 घन  सैंटीमीटर आकार के गड्ढे में रोपित किया जाता है.

गड्ढे में गोबर की खाद व मिट्टी का मिश्रण रोपण से पहले भर लिया जाता है.

* प्रशाखा (औफसैट) रोपण : यह एक प्रचलित विधि है. इस में प्रशाखा को रोपित किया जाता है. इस विधि में इस बात का ध्यान रखना जरूरी रहता है कि प्रशाखा में प्रकंद भाग के साथ एकवर्षीय कोमल नाल (कंड) का भी लगभग 70 से 80 सैंटीमीटर लंबा भाग जुड़ा हो.

प्रशाखा को तैयार करने के लिए सब से पहले बांस की कोठी से एकवर्षीय नाल को 70-80 सैंटीमीटर लंबाई पर तिर्यक रूप से काट कर इस को प्रकंद व जड़ सहित खोद लेते हैं. खोदते समय यह ध्यान रखें कि प्रकंद में कम से कम एक आंख जरूर हो.

इस तरह से तैयार प्रशाखा (औफसैट) को वर्षा ऋतु की शुरुआत में पर्याप्त आकार व गहराई के गड्ढे में इस प्रकार रोपित करते हैं कि 2-3 अंतर्गांठें (इंटरनोड) मिट्टी में दब जाएं व आंख को कोई क्षति न पहुंचे.

* बांसुरी विधि या नाल रोपण : अन्य विधियों जैसे प्रकंद, बीज आदि की तुलना में बांसुरी विधि बांस प्रर्वधन की एक उत्तम विधि है, जिस के द्वारा नर्सरी में कम समय में गुणवत्ता वाले व तेज वृद्धि करने वाले बांस के पौधे तैयार किए जा सकते हैं.

शुआट्स, इलाहाबाद द्वारा विकसित इस विधि से पौधे तैयार करने के लिए अप्रैल माह में 18-24 माह पुराने, खोखले व पके बांस (गांठ पर कलीयुक्त) का चयन कर इस के 2-2 गांठ वाले टुकड़े काट लें और 2 गांठों के बीच 1 वर्ग इंच का छेद बना लें.

इस के बाद इन टुकड़ों को क्लोरोपाइरीफास 20 ईसी के 2.5 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी के घोल में डुबो कर नर्सरी बैड में 8-10 सैंटीमीटर की गहराई तक मिट्टी में दबा दें. छेद को किसी साफ प्लास्टिक शीट से ढक दें, ताकि छेद में मिट्टी न जा सके.

तने के छेद के अंदर 100 पीपीएम नैप्थलिन एसिटिक एसिड (एनएए) घोल डालें और शुरू के 2-3 माह तक हर हफ्ते प्लास्टिक शीट हटा कर निरीक्षण करते रहें व बांस के टुकड़ों के अंदर पानी कम होने पर जरूरत के मुताबिक पानी डालते रहें.

इस विधि द्वारा रोपित कलम/नाल से 10-12 दिनों में नए कल्ले व 45-60 दिनों में जड़ें आ जाती हैं. 6 से 9 माह के बाद इन कलमों को जमीन से जड़ सहित खोद कर आरी से गांठों को काट लें. इन गांठों को बड़ी पौलीथिन की थैली में दोबारा रोपित कर दें. 1-2 माह बाद पौध रोपण के लिए तैयार हो जाती है.

रोपण तकनीकी

रोपण की दूरी : बांस को खेत में 2 प्रकार से लगाया जा सकता है. पहले तरीके में मेंड़ पर 7-8 मीटर की दूरी पर और दूसरे तरीके में पंक्ति से पंक्ति एवं लाइन से लाइन 9-10 मीटर की दूरी पर पूरे खेत में सघन रोपण किया जा सकता है. प्रारंभ के कुछ वर्षों में बांस की कतारों के बीच उपयुक्त फसलें उगाई जा सकती हैं. डैंड्रोकेलेमस प्रजाति के रोपण के लिए रोपण की दूरी कम की जा सकती है.

रोपण की विधि : मार्चअप्रैल माह में उपरोक्त रोपण की दूरी पर 45 घन सैंटीमीटर आकार का गड्ढा खोद लें व खुदी हुई मिट्टी को गड्ढे के पास ऋतुक्षरण के लिए छोड़ दें, जिस से कड़ी धूप की वजह से गड्ढा कीट व रोगाणुओं से मुक्त हो सकें.

वर्षा ऋतु प्रारंभ होने के 10 से 15 दिन पहले उक्त गड्ढों में गड्ढे की ऊपरी सतह की मिट्टी के साथ सड़ी गोबर की खाद (4:1 के अनुपात में), 50 ग्राम यूरिया, 100 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट व 50 ग्राम म्यूरेट औफ पोटाश और 25 ग्राम क्लोरोपाइरीफास धूल मिला कर भर दें. गड्ढों में भरी मिट्टी भूमितल से कुछ ऊंची होनी चाहिए. वर्षा ऋतु (जुलाईअगस्त माह) के समय उक्त गड्ढों में विभिन्न विधियों से तैयार पौधों, प्रकंद, कलम आदि का रोपण करना चाहिए.

बांस की फसल का प्रबंधन

खाद और उर्वरक : पौधों की अच्छी वृद्धि के लिए रोपण के लगभग 45-50 दिन बाद व 7-8 माह के बाद प्रति पौध 50 ग्राम यूरिया रोपित पौधे के चारों तरफ मिला दें.

बाद के वर्षों में बांस के लिए किसी विशेष खाद और उर्वरकों की जरूरत नहीं पड़ती है. फिर भी अच्छी वृद्धि के लिए प्रति वर्ष अगस्तसितंबर माह में 50 ग्राम यूरिया व 50 ग्राम डीएपी और सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति पुंज देनी चाहिए. हर एक पुंज को पुवाल या पत्ती के पलवार (मल्च) से ढकने पर नए बांस के कल्ले आने में आसानी रहती है.

पुंज की टैंडिंग व शाखा कर्तन क्रिया  : मरे हुए पौधों व पुंज में बीमारी एवं कीड़ों द्वारा प्रभावित कलम को काट कर निकाल देें व पुंज से सभी प्रकार की झाडि़यों व लताओं को भी समयसमय पर निकालते रहें. जब (खासकर जुलाईसितंबर माह में) नई कोंपलें निकल रही हों, तब उस समय पुंज में किसी भी प्रकार की क्रिया नहीं करनी चाहिए. इस समय साफसफाई आदि कामों के प्रभाव से नई कोंपलें प्रभावित हो सकती हैं.

बांस के रोपण के 15-16 महीने बाद नीचे की शाखाओं को काटा जा सकता है, पर 4-5 वर्ष पुराने बांस पुंज में यह क्रिया करनी ज्यादा लाभप्रद रहती है. शाखा कर्तन क्रिया हमेशा अक्तूबर से फरवरी माह के बीच करनी चाहिए. इस क्रिया के फलस्वरूप बांस निकालना आसान हो जाता है व पशुओं के लिए बांस की पत्तियों के रूप में चारा प्राप्त हो जाता है.

कीट व रोग प्रबंधन : बांस की पौधशाला में मुख्यत: डंपिंग औफ (आर्द्रगलन रोग) लगता है, जो एक फफूंदजनित रोग है. इस के नियंत्रण के लिए व्यापारिक ग्रेड की फार्मालीन को (15-20 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी के साथ) क्यारी की मिट्टी में डालना (ड्रैंचिंग) चाहिए.

इस के अतिरिक्त कार्बंडाजिम (2 ग्राम प्रति लिटर पानी) से भी क्यारियों का उपचार किया जा सकता है. रोपण से पहले भी पौधों को उक्त फफूंदनाशी से उपचारित करना बेहतर रहता है. प्रकंदों के रोपण के समय भी प्रकंद को कार्बंडाजिम के घोल में 3 से 5 मिनट डुबोने पर फफूंदजनित रोगों से बचाव में सहायता मिलती है.

बांस में झाड़ू रोग, राइजोम राट, बेसल कलम राट आदि बीमारियां लगती हैं, जिन्हें उचित फफूंदनाशी जैसे कार्बंडाजिम (3 ग्राम प्रति लिटर पानी), डाइथेन एम. 45 (3 ग्राम प्रति लिटर पानी), मैनकोजेब (2 ग्राम प्रति लिटर पानी) द्वारा रोग लगने की शुरुआती अवस्था में उपचार करने से रोका जा सकता है. यदि कोई बांस का पुंज फफूंद से पूरी तरह संक्रमित है, तो इस को पूरी तरह जला देना ज्यादा उचित रहता है.

बांस को 50 से अधिक प्रकार के कीट हानि पहुंचाते हैं, जिन में से सफेद ग्रब, दीमक, कटवर्म और तना छेदक कीट प्रमुख हैं. पौधशाला व रोपण में सफेद ग्रब व कटवर्म से बचाव के लिए फ्यूरोडौन 3 जी दवा (500 ग्राम प्रति 10 वर्गमीटर क्यारी या 100-150 ग्राम प्रति पुंज) का प्रयोग करना चाहिए.

दीमक के नियंत्रण के लिए क्लोरोपाइरीफास (2 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी) घोल का छिड़काव करें. लीफ रोलर कीट बांस की पत्तियों को मोड़ कर बीड़ी की तरह बना देता है, जिस के नियंत्रण के लिए कारटौप हाईड्रोक्लोराइड (1 ग्राम प्रति लिटर पानी) के घोल का छिड़काव करें.

नए कल्लों एवं बांस प्ररोह को तना छेदक भी बहुत नुकसान पहुंचाता है, जिस के नियंत्रण के लिए हरे बांस एवं कल्लों की सब से नीचे की अंतर्गांठ (इंटरनोड) के ऊपरी भाग पर बारीक छेद कर लें, फिर उस छेद में डाईक्लोरोवाश कीटनाशी (2 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी) का घोल किसी इंजैक्शन या पिचकारी की सहायता से डाल दें, जिस से तना छेदक कीट नष्ट हो जाएगा.

कटाई, उपज और आमदनी

बांस की कटाई रोपण के 4-5 वर्षों के बाद प्रारंभ की जा सकती है. कटाई हमेशा सर्दी (नवंबरफरवरी माह) में ही करना उचित रहता है. 4-5 वर्षों के बाद प्रति बांस पुंज लगभग 6-10 बांस हर साल प्राप्त किया जा सकता है.

इस प्रकार 10×10 मीटर पर रोपित बांस के 1 हेक्टेयर रोपण (रोप वन) से लगभग 600 से 1,000 बांस हर साल प्राप्त किया जा सकता है. यदि एक बांस का औसत मूल्य 100 रुपए रखा जाए, तो 1 हेक्टेयर खेत से लगभग 60,000-1,00,000 रुपए कुल आय हर साल प्राप्त की जा सकती है.

बांस के रोपण और प्रारंभ के 2-3 वर्षों तक ही लागत लगती है, जो 22,000 से 25,000 रुपए प्रति हेक्टेयर है. इस प्रकार 4-5 वर्षों के बाद बिना किसी विशेष लागत के बांस के 1 हेक्टेयर रोपण से औसतन 60,000 से 1,00,000 रुपए हर साल आसानी से प्राप्त किया जा सकता है.

बांस को कागज मिल और शहर की बांस मंडियों में बेचा जा सकता है. शहरों व गांवों में घर बनाने के दौरान बांस की अच्छी मांग रहती है.

सूरजमुखी की खेती

हमारे देश में तिलहनी फसलों का उत्पादन उतना नहीं है, जितना होना चाहिए. तिलहनी फसलें ही ऐसी फसल हुआ करती हैं, जिन में लागत कम व शुद्ध लाभ दोगुनातिगुना मिलने की संभावना रहती है. ऐसे में सूरजमुखी एक बड़ी ही महत्त्वपूर्ण फसल है. इस में 40 से 45 फीसदी शुद्ध तेल निकलता है. इस की खली में प्रोटीन बहुत अधिक मात्रा में होता है, जो मुरगियों और पशुओं को आहार दे कर उन के स्वास्थ्य को उत्तम बनाता है.

इस का तेल हृदय रोगियों के लिए बहुत ही फायदेमंद होता है.  सूरजमुखी के तेल की भी मांग बहुत है. सूरजमुखी का उत्पादन यदि समूहों में किया जाए, तो उत्पादन मूल्य बहुत बढि़या मिलने की संभावना रहती है.

भूमि

सूरजमुखी की खेती के लिए गहरी दोमट भूमि अच्छी मानी गई है. बीज के जमाव के लिए उचित नमी होना आवश्यक है. सिंचाई का उचित प्रबंध होना चाहिए और जल निकास की अच्छी एवं उत्तम व्यवस्था होनी चाहिए.

बोने का समय व बीज दर

वैसे तो इस फसल को खरीफ, रबी और जायद तीनों मौसम में आसानी से बोया जा सकता है और अच्छा उत्पादन भी प्राप्त किया जा सकता है, परंतु जायद में ज्यादातर खेत खाली छोड़े जाते हैं, तो उस समय यह फसल और भी लाभकारी साबित होगी.

यह फसल 90 से 110 दिन में तैयार हो जाती है. जायद में मार्च का प्रथम पखवारा बोआई के लिए अच्छा होता है. प्रति हेक्टेयर 10 से 12 किलोग्राम बीज की आवश्यकता पड़ती है. बोने से पहले प्रति किलोग्राम बीज को 2 से 3 ग्राम थीरम अथवा कार्बंडाजिम से शोधित कर लेना चाहिए. इसे 60-20 सैंटीमीटर की दूरी पर बोना चाहिए. बीज को 3 से 4 सैंटीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए, जिस से पौधों में आपस की दूरी 20 सैंटीमीटर हो जाए.

उन्नत किस्में

मौडर्न ड्वार्फ के केबीएसएस-1 सनराइज सेलैक्शन, संजीव-95, आईसीआई-36, एसएच-3332 इत्यादि.

उर्वरक

60 से 80 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस, 40 किलोग्राम पोटाश और 150 से 200 किलोग्राम जिप्सम प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिए.

सिंचाई

अच्छी पैदावार के लिए 6 से 8 सिंचाइयों की आवश्यकता पड़ती है. पहली सिंचाई बोआई के 15 से 20 दिन बाद करनी चाहिए. बाकी सिंचाइयां 10 से 12 दिन के अंतराल पर करनी चाहिए. दाना बनते समय हलकी सिंचाई करनी चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण और मिट्टी चढ़ाना

बोआई के 15 से 20 दिन बाद और पहली सिंचाई से पूर्व खेत में से खरपतवार को निकाल देना चाहिए. जब पौधों की ऊंचाई घुटनों के बराबर हो जाए, तब लाइनों पर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए. एक बार में 10 से 15 सैंटीमीटर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए. खरपतवारों को पेंडीमेथलिन 30 फीसदी 3.30 लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से बीज जमाव से पहले और बोआई के 2-3 दिन बाद 800 से 1,000 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव कर नियंत्रण किया जा सकता है.

परसेंचन क्रिया

अच्छी पैदावार व अच्छी गुणवत्ता के लिए अच्छी तरह से फूल आ जाने पर हाथ में दस्ताने पहन कर फल के मुंडक पर चारों ओर धीरे से पहले किनारे वाले भाग में उस के बाद बीच के भाग में प्रात:काल घुमाना चाहिए.

बीज उत्पादन 

(मुक्त परागित)

खेत का चयन : बीज उत्पादन के लिए उगाई जाने वाली फसल में खेत का चयन काफी महत्त्व रखता है, इसलिए सुरजमुखी के बीज उत्पादन के लिए ऐसे खेत का चुनाव करना चाहिए, जिस में पिछले मौसम में इस की फसल न ली गई हो. खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए. इस की खेती के लिए मृदा गहरी, उपजाऊ और उदासीन पीएच वाली होनी चाहिए. वैसे, चिकनी मिट्टी में भी उत्पादन सफलतापूर्वक किया जा सकता है.

पृथक्करण-1 : यह अंशत: स्व एवं संकर परागित फसल है. संकर परागण की मात्रा कीट सक्रियता के अनुसार 18-60 तक भिन्नभिन्न हो सकती है. इस के बीज खेतों को चारों ओर से 400 मीटर, आधार बीज के लिए और 200 मीटर की दूरी प्रमाणित बीज फसल के लिए होनी चाहिए.

सस्य क्रियाएं : खेत की तैयारी के समय इस के उत्पादन के लिए मिट्टी भुरभुरी होनी चाहिए. इस के लिए एक गहरी जुताई हल से कर के 2-3 जुताई हैरो से करनी चाहिए.

सूरजमुखी के बीज का छिलका मोटा होता है और पानी को धीरेधीरे सोखता है, इसलिए खासकर सर्दियों व गरमियों की बोआई के लिए बोने से पूर्व सिंचाई की विशेष आवश्यकता होती है.

बीज एवं बोआई : आधार बीज उत्पादन के लिए प्रजनक अथवा आधार बीज और प्रमाणित बीज के लिए आधार बीज प्रयोग करना चाहिए. बीज किसी मान्य स्रोत से ही लेना चाहिए.

सूरजमुखी को किसी ऋतु विशेष में नहीं उगाया जाता है. उस के लिए सिर्फ हिमांक तापमान ही हानिकारक होता है, इसलिए इस समय को छोड़ कर किसी भी समय भूमि की तैयारी के अनुसार इस की बोआई की जा सकती है.

उदाहरण के लिए, देश के पूर्वी भागों में आर्मवार्ट्स जाति की बोआई जल्दी पकने वाली गेहूं के बाद फरवरी मार्च में की जाती है. रबी के लिए नवंबर और वसंत ऋतु के लिए जनवरी के बाद के सप्ताहों तक व खरीफ में मानसून के बाद यदि सिंचाई के साधन उपलब्ध हैं, तो पौधे लगाने का समय उपयुक्त है.

बीज दर : एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए 10 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है. बीज को बोआई से पहले मेंकोजेब से या फिर केप्टान की 3 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित कर लेना चाहिए.

पौधों में दूरी : खेत में पौधे लगाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि 2 पंक्तियों के बीच की दूरी 60-80 सैंटीमीटर और पौधों के बीच की दूरी 20-25 सैंटीमीटर रहनी चाहिए. बीज 2-4 सैंटीमीटर से ज्यादा गहराई पर नहीं डालना चाहिए.

उर्वरक : अच्छी पैदावार लेने के लिए सूरजमुखी की फसल को 80 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है. पोटाश और फास्फोरस देने से पहले मिट्टी की जांच करवा कर आवश्यकतानुसार मात्रा देनी चाहिए.

सामान्यत: सूरजमुखी की फसल को 40 किलोग्राम फास्फोरस एवं 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई के समय ही खेत में बिखेर कर या हैरो के पीछे मिट्टी में मिला देना चाहिए. नाइट्रोजन की 50 किलोग्राम मात्रा बोआई के समय और शेष मात्रा को 40-45 दिनों के पश्चात जब पौधों के तनों के पास मिट्टी चढ़ाते समय देनी चाहिए.

सिंचाई : सूरजमुखी की फसल अन्य तिलहनी फसलों की अपेक्षा कम सिंचाई में ही अधिक उपज देती है. वसंत से ग्रीष्म ऋतु तक की बोआई के लिए बोने से पूर्व सिंचाई करना आवश्यक है. रबी की फसल के लिए भी सिंचाई आवश्यक है. इस से जमाव एक सा होता है और फसल एक सी होती है.

खरीफ की फसल में आवश्यकतानुसार ही सिंचाई करनी चाहिए. इस फसल में फूल आने की अवस्था और फली बनने के समय सिंचाई बहुत जरूरी होती है.

खरपतवार एवं निराईगुड़ाई : बोआई के पहले 6 सप्ताहों में फसल नाजुक होती है, इसलिए समयसमय पर खरपतवारों को निकालते रहना चाहिए. इस के बाद इन का प्रभाव फसल पर बहुत जल्दी हो जाता है. बड़े पौधे जमीन से उखड़ कर गिर जाते हैं, क्योंकि उन का सिर भारी होता है, इसलिए 10-15 सैंटीमीटर मिट्टी जड़ों पर चढ़ानी आवश्यक होती है.

फसल सुरक्षा

बीमारियां : वर्षा ऋतु में आल्टरनेरिया अंगमारी से भारी क्षति होती है. काले भूरे रंग एवं काले रंग के धब्बे किसी भी पौधे में देखे जा सकते हैं. उन के उपचार के लिए मेंकोजेब व जिनेब के 0.25 घोल का छिड़काव 1-2 सप्ताह के अंतर पर करते रहना चाहिए.

अन्य बीमारियों का फसल पर इतना प्रभाव नहीं पड़ता है. मार्च की बोआई में स्केलेरोटिनिया म्लानी जड़ों में व चारकोल विगलन का प्रकोप हो जाता है, इसलिए रोगग्रसित पौधों को उखाड़ कर जला देना चाहिए.

मुंडक सड़न रोग : कवकों के संक्रमण से मुंडक में सड़न पैदा हो जाती है. रोग ज्यादा फैलने पर मुंडक सड़ कर काले रंग में परिवर्तित हो जाता है और दाना बनना रुक जाता है. इसे मेंकोजेब 2.5 किलोग्राम या कार्बंडाजिम 2.0 किलोग्राम की मात्रा 800-1,000 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए.

दीमक/गुजिया कीट : दीमक सफेद मटमैले रंग का होता है. गुजिया भूरे मटमैले रंग का कीट होता है. यह नए पौधों की सतह के नीचे से नुकसान पहुंचाता है.

इसे क्लोरोपायरीफास 20 ईसी 3.75 लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से 600 से 800 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव कर के नियंत्रित किया जा सकता है.

कटाई : जब मुंडक का निचला भाग पीले भूरे रंग में बदल जाए, तब कटाई करनी चाहिए. सभी मुंडक एकसाथ तैयार नहीं होते, इसलिए इन की कटाई 2-3 चरणों में की जाती है. कटाई के बाद मुंडक को पूर्ण रूप से सुखा कर डंडे से पीट कर दानों को अलग कर लिया जाता हैं.

कीट : सामान्यत: इस फसल में विशेष कीटों का प्रभाव नहीं देखा जाता, परंतु कृंतक कृमि व जैसिड कभीकभी नुकसान करते हैं. इसलिए कृंतक कृमि के नियंत्रण के लिए 15 किलोग्राम हेप्टाक्लोर प्रति हेक्टेयर व जैसिड के लिए 1-2 स्प्रे 0.025 फीसदी औक्सीडिमेटान मिथाइल 25 ईसी का छिड़काव करना चाहिए.

चिडि़या द्वारा नुकसान : सूरजमुखी की फसल पकती है, उस समय कोई दूसरी फसल तैयार नहीं होती है, इसलिए चिडि़या द्वारा इसे काफी नुकसान होता है. चिडि़या को उड़ाने के लिए बच्चों या महिलाओं की सहायता लेनी चाहिए.

अवांछित पौधों को निकालना : रोगिंग (अवांछित पौधों को निकालना) 2 बार की जाती है :

* फूल आने से पहले.

* पकने के समय पर.

लंबे पौधे निकालना : जो पौधे अन्य पौधों से अधिक लंबे होते हैं, उन्हें निकाल देना चाहिए, क्योंकि ये बाध्य निषेचन या एक ही जाति के विभिन्न ऊंचाई के पौधों के निषेचन से पैदा होते हैं.

* शीघ्र व देर से पकने वाले पौधों को भी निकाल देना चाहिए, क्योंकि ये बीज की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं.

* रोगग्रस्त पौधों की भी छंटाई कर देनी चाहिए.

जंगली जाति के पौधे : इन पौधों को निकालना आवश्यक होता है, अन्यथा बीज की गुणवत्ता खत्म हो जाती है. साथ ही, रोगग्रस्त पौधों की भी छंटाई कर देनी चाहिए.

उपज : औसतन उपज 15 से 20 क्विंटल दाना प्रति हेक्टेयर मिलने की संभावना रहती है.

कटाई एवं मंड़ाई : जब सूरजमुखी का फूल पक जाता है, तो उस का छिलका भूरे रंग का हो जाता है. सिरों को तोड़ कर धूप में सुखा लेना चाहिए और छड़ी से पीट कर दाने निकाल देने चाहिए.

केले पर मंडराया संकट, लग रही फंगस

केले की बागबानी से इन दिनों किसान अच्छा मुनाफा ले रहे हैं, लेकिन हाल ही में आई एक खबर ने केले की खेती करने वाले किसानों के सामने नई मुसीबत खड़ी कर दी है. पता चला है कि केले की प्रजाति को एक खास फंगस ने अपनी चपेट में ले लिया है.

उचित देखभाल की कमी में यह रोग लगता है. जब तक कुछ समझ में आता है, तब तक केले की पूरी फसल खराब हो जाती है. दुनियाभर के वैज्ञानिक और किसान चिंतित हैं और उपाय खोज रहे हैं.

केले में यह फंगस महामारी जैसा है. दुनिया में 99 फीसदी केलों की फसलों में फंगस से खतरा पैदा हो गया है. यहां तक कि यह बीमारी 20 से अधिक देशों में फैल गई है. दुनियाभर के किसानों को यह  चिंता है कि कहीं इस खतरनाक फंगस से केले का वजूद ही खत्म न हो जाए.

अचानक फैले फंगस से निबटने के लिए किसान और वैज्ञानिक तमाम तरह के उपाय अपनाने पर काम कर रहे हैं. यह फंगस लक्षण दिखने से पहले ही फैल जाता है और पौधे पर लगने के बाद इसे रोकना नामुमकिन है.

इस बीमारी में केले के पत्ते हरे रंग की तुलना में अधिक पीले और किनारे काले पड़ जाते हैं.

अगर इस फंगस की रोकथाम न की गई तो केले की खेती करने वाले किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ सकता है.

अनार: मैदानी इलाकों में भी लें अच्छी पैदावार

भारत में अनार का कुल रकबा 2018-19 में 2,46,000 हेक्टेयर है और उत्पादन 28,65,000 मीट्रिक टन है, वहीं अगर एक हेक्टेयर की बात करें तो अनार का कुल उत्पादन तकरीबन 11.69 टन प्रति हेक्टेयर है. अनार गरम और गरम व ठंडी जलवायु वाले देशों का काफी लोकप्रिय फल है.

भारत में इस की खेती खासतौर से महाराष्ट्र में की जाती है. राजस्थान, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, कर्नाटक, गुजरात में छोटे लैवल पर इस के बगीचे देखे जा सकते हैं. इस का रस जायकेदार और औषधीय गुणों की वजह से फायदेमंद होता है.

अनार की खेती के लिए कम लागत, लगातार उच्च तापमान, लंबी भंडारण अवधि जैसी खूबियों के चलते इस का क्षेत्रफल लगातार बढ़ रहा है.

आबोहवा : यह हलकी सूखी जलवायु में बढि़या तरह से उगाया जा सकता है. फलों के बढ़ने व पकने के समय गरम और शुष्क जलवायु की जरूरत होती है. लंबे समय तक ज्यादा तापमान बने रहने से फलों में मिठास बढ़ती है, वहीं नम जलवायु रहने से फलों की क्वालिटी पर बुरा असर होता है.

जमीन  : अनार अनेक तरह की मिट्टी में उगाया जा सकता है, पर बढि़या जल निकास के इंतजाम वाली रेतीली दोमट मिट्टी सब से बढि़या होती है. फलों की गुणवत्ता व रंग भारी

मिट्टी के मुकाबले हलकी मिट्टियों में अच्छा होता है. अनार के लिए मिट्टी लवणीयता 9.00 ईसी प्रति मिलीलिटर और क्षारीयता 6.78 ईएसपी तक सहन कर सकता है.

खास प्रजाति

भारतीय प्रजाति : अर्कता, भगवा, ढोकला, जी 137, गणेश, जलोर सीडलैस, ज्योति, कंधारी, मृदुला, फूले फगवा, रूबी के 1 वगैरह.

प्रजाति इगजोटिक : अगेती वंडरफुल, ग्रांड वंडरफुल वगैरह.

खास किस्म और खूबियां 

गणेश : इस किस्म के फल मध्यम आकार के, बीज मुलायम और गुलाबी रंग के होते हैं. यह महाराष्ट्र की खास किस्म है.

ज्योति : फल मध्यम से बड़े आकार के, चिकनी सतह व पीलापन लिए हुए लाल रंग के होते हैं. एरिल गुलाबी रंग के बीज काफी मुलायम, बहुत मीठे होते हैं. प्रति पौधा 8-10 किलोग्राम उपज ली जा सकती है.

मृदुला : फल मध्यम आकार के, चिकनी सतह वाले लाल रंग के होते हैं. एरिल गहरे लाल रंग का बीज मुलायम, रसदार और मीठे होते हैं. प्रति पौधा 8-10 किलोग्राम उपज ली जा सकती है.

भगवा : इस किस्म के फल बड़े आकार के भगवा रंग के, चिकने चमकदार होते हैं. एरिल मनमोहक लाल रंग की और बीज मुलायम होते हैं. बढि़या देखरेख करने पर प्रति पौधा 30-38 किलोग्राम उपज ली जा सकती है.

अर्कता : यह एक अधिक उपज देने वाली किस्म है. फल बड़े आकार के, मीठे और मुलायम बीजों वाले होते हैं. एरिल लाल रंग की व छिलका मनमोहक लाल रंग का होता है. बढि़या देखरेख करने पर प्रति पौधा 25-30 किलोग्राम उपज ली जा सकती है.

प्रवर्धन

कलम द्वारा : एक साल पुरानी शाखाओं से 20-30 सैंटीमीटर लंबी कलमें काट कर पौधशाला में लगा दी जाती हैं और इंडोल ब्यूटारिक अम्ल (आईबीए) 3,000 पीपीएम से कलमों को उपचारित करने से जड़ें जल्दी व ज्यादा तादाद में निकलती हैं.

गूटी द्वारा : अनार का व्यावसायिक प्रवर्धन गूटी द्वारा किया जाता है. इस विधि में जुलाईअगस्त माह में एक साल पुरानी पैंसिल समान मोटाई वाली स्वस्थ पकी 45-60 सैंटीमीटर लंबाई की शाखाओं को छांटें.

छांटी गई शाखाओं से कलिका के नीचे 3 सैंटीमीटर चौड़ी गोलाई में छाल पूरी तरह से निकाल दें. छाल निकाली गई शाखा के ऊपरी भाग में आईबीए 10,000 पीपीएम का लेप लगा कर नमी वाला स्फेगनम मास चारों ओर लगा कर पौलीथिन की शीट से ढक कर सुतली से बांध दें. जब पौलीथिन से जड़ें दिखाई देने लगें, उस समय शाखा को स्केटियर काट कर क्यारी या गमलों में लगा दें.

पौध की रोपाई : आमतौर पर पौध रोपण की आपसी दूरी मिट्टी की क्वालिटी व जलवायु पर निर्भर करती है. आमतौर पर 4-5 मीटर की दूरी पर अनार को रोप दिया जाता है.

सघन रोपण विधि में 5×2 मीटर (1,000 पौधे प्रति हेक्टेयर), 5×3 मीटर (666 पौधे प्रति हेक्टेयर) 4.5×3 (740 पौधे प्रति हेक्टेयर) की आपसी दूरी पर रोपण किया जा सकता है.

पौध रोपने के तकरीबन एक महीने पहले 60×60×60 सैंटीमीटर (लंबाई × चौड़ाई × गहराई) आकार के गड्ढे खोद कर 15 दिनों के लिए खुला छोड़ दें. इस के बाद गड्ढे की ऊपरी मिट्टी में 20 किलोग्राम सड़ी गोबर की खाद, 1 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट, 50 ग्राम क्लोरोपाइरीफास चूर्ण मिट्टी में मिला कर गड्ढों को सतह से 15 सैंटीमीटर की ऊंचाई तक भर दें.

खाद व उर्वरक : पौधों की उम्र के मुताबिक कार्बनिक खाद व नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का इस्तेमाल करें. नाइट्रोजन व पोटाशयुक्त उर्वरकों को 3 हिस्सों में बांट कर पहली खुराक सिंचाई के समय बहार प्रबंधन के बाद और दूसरी खुराक 3-4 हफ्ते बाद दें, फास्फोरस की पूरी खाद को पहली सिंचाई के समय दें. जिंक, आयरन, मैगनीज और बोरोन की 25 ग्राम की मात्रा प्रति पौधे डालें.

जब पौधों पर फूल आना शुरू हो जाएं, तो उस में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश 12:61:00 को 8 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से एक दिन के फासले पर एक महीने तक दें.

जब पौधों में फल लगने शुरू हो जाएं तो नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश 19:19:19 को ड्रिप की मदद से 8 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से एक दिन के अंतराल पर एक महीने तक दें.

जब पौधों पर पूरी तरह से फल आ जाएं तो नाइट्रोजन और फास्फोरस 00:52:34 या मोनोपोटैशियम फास्फेट 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की मात्रा को एक दिन के अंतराल पर एक महीने तक दें.

फल की तुड़ाई के एक महीने पहले कैल्शियम नाइट्रेट की 12.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की मात्रा को ड्रिप की सहायता से 15 दिनों पर 2 बार दें.

ऐसे करें सिंचाई 

अनार के पौधे सूखा सह लेते हैं, पर अच्छे उत्पादन के लिए सिंचाई का खास फायदा है. मृग बहार की फसल लेने के लिए सिंचाई मई माह के मध्य से शुरू कर के मानसून आने तक नियमित रूप से करनी चाहिए.

बारिश आने के बाद फलों के अच्छे विकास के लिए लगातार सिंचाई 10-12 दिन के फासले पर करनी चाहिए. ड्रिप सिंचाई अनार के लिए उपयोगी साबित हुई है. इस में 43 फीसदी पानी की बचत और 30-35 फीसदी उपज में इजाफा हुआ है.

संधाई व काटछांट : अनार की 2 तरह से संधाई की जा सकती है. एक, तना विधि द्वारा. इस विधि में एक तने को छोड़ कर बाकी सभी बाहरी टहनियों को काट दिया जाता है. दूसरी, बहु तना विधि द्वारा. इस विधि में 3 से 4 तने छूटे हों, बाकी टहनियों को काट दिया जाता है.

इस तरह साधे हुए तने में रोशनी बढि़या मिलती है. रोगग्रस्त हिस्से के 2 इंच नीचे तक छंटाई करें और तनों पर बने सभी कैंकर को गहराई से छील कर निकाल देना चाहिए. छंटाई के बाद 10 फीसदी बोर्डो पेस्ट को कटे हुए हिस्से पर लगाएं. बारिश के समय में छंटाई के बाद तेल वाला कौपर औक्सीक्लोराइड और 1 लिटर अलसी का तेल का इस्तेमाल करें.

बहार नियंत्रण : अनार में साल में 3 बार जूनजुलाई (मृग बहार), सितंबरअक्तूबर (हस्त बहार) व जनवरीफरवरी (अंबे बहार) में फूल आते हैं. व्यावसायिक तौर पर केवल एक बार ही फसल ली जाती है और इस का निर्धारण पानी की मौजूदगी व बाजार की मांग के मुताबिक किया जाता है.

जिन इलाकों में सिंचाई की सुविधा नहीं होती है, वहां मृग बहार से फल लिए जाते हैं. जिन इलाकों में सिंचाई की सुविधा है, वहां अंबे बहार से फल लिए जाते हैं. बहार नियंत्रण के लिए जिस बहार से फल लेने हों, उस के फूल आने से 2 माह पहले सिंचाई बंद कर देनी चाहिए. रासायनिक बहार नियमन के लिए इथ्रेल की उच्च सांध्रता (1 से 2 मिलीलिटर प्रति लिटर) का इस्तेमाल किया जाता है.

तुड़ाई : अनार बेमौसम वाला फल है. जब फल पूरी तरह से पक जाएं, तभी पौधों से तोड़ना चाहिए. पौधों में फल सेट होने के बाद 120-130 दिन बाद तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं. पके फल पीलापन लिए लाल हो जाते हैं.

उपज : पौध रोपण के 2-3 साल बाद फलना शुरू कर देते हैं, लेकिन व्यावसायिक रूप से उत्पादन रोपण के तकरीबन 4-5 साल बाद ही लेना चाहिए. अच्छी तरह से विकसित पौधा 60-80 फल हर साल 25-30 साल तक देता है.

चमेली की खेती महकती जिंदगी

भारत में चमेली की खेती कई इलाकों में की जाती है, लेकिन तमिलनाडु पहले स्थान पर है. उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद, जौनपुर और गाजीपुर जिलों में भी इसे उगाया जाता है. इस के फूल आमतौर पर सफेद रंग के होते हैं, लेकिन कहींकहीं पीले रंग के फूलों वाली चमेली भी पाई जाती है.

चमेली के फूल, पेड़ व जड़ तीनों ही औषधीय चीजें बनाने में इस्तेमाल होते हैं. इस के फूलों से सजावट के अलावा तेल और इत्र भी तैयार किए जाते हैं. भारत से चमेली के फूलों को श्रीलंका, सिंगापुर और मलयेशिया भेजा जाता है.

आबोहवा और मिट्टी : इस की खेती गरम व नम जलवायु में अच्छी तरह से होती है. गरम जलवायु में पानी की अच्छी सहूलियत और लंबे समय तक उजाला चमेली के लिए अच्छा माना जाता है.

चमेली की खेती कई तरह की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन बलुई दोमट मिट्टी, जिस में पानी न रुकता हो और जिस का पीएच मान 6.5-7.5 हो, ज्यादा अच्छी रहती है.

किस्में : भारत में चमेली की तकरीबन 80 किस्में पाई जाती हैं, किंतु कारोबारी खेती के लिए 3 किस्मों को उगाया जाता है :

जैस्मिनम

औरिकुलेटम : यह झाडि़यों वाली किस्म है, जो पूरे साल फूल देती है. इस में सब से ज्यादा फूल मानसून के समय आते हैं. इस के फूलों में महक बहुत होती है और इन से 0.24 से 0.42 फीसदी तक तेल हासिल होता है.

जैस्मिनम सैमबैक : यह किस्म फूल की पैदावार के लिए बेहद अच्छी है.

जैस्मिनम ग्रांडीफ्लोरम : इस के पौधे आधे बेल वाले होते हैं और इन में फूल जून से सितंबर महीने में आते हैं. इस के फूलों से 0.24 से 0.42 फीसदी तेल हासिल किया जाता है.

पौध तैयार करना : चमेली की कलम कटिंग द्वारा तैयार की जाती है. इस की कटिंग जनवरीफरवरी महीने में लगानी चाहिए, क्योंकि इस समय इस में सब से ज्यादा जड़ें निकलती हैं.

खेत की तैयारी : चमेली की खेती के लिए सब से पहले खेत की 2-3 बार गहरी जुताई करते हैं. इस के बाद 1.5×1.5 मीटर की दूरी पर 30×30 सैंटीमीटर आकार के गड्ढे खोद लेते हैं. इन गड्ढों में 10-15 किलोग्राम कंपोस्ट खाद और मिट्टी भर देते हैं.

जड़ निकली हुई कटिंग को इन गड्ढों के बीच में लगा कर सिंचाई कर देते हैं. कटिंग की रोपाई का सब से अच्छा समय जून से ले कर अक्तूबर माह तक होता है. एक एकड़ खेत के लिए तकरीबन 1,800 कटिंग की जरूरत होती है.

खरपतवार खत्म करने के लिए पहली निराई रोपाई के 3-4 हफ्ते बाद करनी चाहिए. पौधों की कटाईछंटाई करने के बाद थालों व पानी की नालियों को अच्छी तरफ साफ कर के 10-15 सैंटीमीटर की गहराई तक खुदाई करनी चाहिए और उस में खाद व उर्वरक मिलाना चाहिए. यह काम हर 2-3 महीने बाद दोहराते रहना चाहिए.

कटाईछंटाई : चमेली की फसल में साल में एक बार कटाईछंटाई की जाती है.

सिंचाई : चमेली को ज्यादा पानी की जरूरत होती है. रोपाई के तुरंत बाद एक सिंचाई कर देनी चाहिए. इस के बाद जरूरत के मुताबिक हफ्ते में 1-2 बार सिंचाई करते रहें. जब फूल आने शुरू हो जाएं, तो नमी बनाए रखने के लिए सिंचाई करते रहें.

फसल सुरक्षा : चमेली पर मिली बग, जैस्मिन बग, बड वर्म, रैड स्पाइडर माइट, पत्ती काटने वाली सूंड़ी और सफेद मक्खी का हमला होता है.

इन कीटों की रोकथाम के लिए मोनोक्रोटोफास व सल्फर का इस्तेमाल करें. सरकोस्पोरा व जड़ विगलन बीमारी के लिए कौपर औक्सीक्लोराइड का इस्तेमाल करें.

फूलों की तुड़ाई व उपज : फूलों की तुड़ाई उस समय करनी चाहिए, जब कलियां पकी हों, लेकिन खिली न हों. फूलों की तुड़ाई हमेशा सुबह सूरज निकलने से पहले ही करें.

वैज्ञानिक तकनीक से चमेली की एक  एकड़ फसल से पहले साल 600 से 800 किलोग्राम, दूसरे साल 1,400 से 1,500 किलोग्राम और तीसरे साल 2,200 से 2,500 किलोग्राम फूल हासिल होते हैं. चौथे साल में यह उपज बढ़ कर तकरीबन 3,500 किलोग्राम तक पहुंच जाती है, जो 7-8 साल तक बनी रहती है.

घरआँगन में सब्जियां

अच्छी सेहत के लिए खाने में रोजाना ताजा फलसब्जियां खानी चाहिए, पर तेजी से बढ़ती महंगाई की वजह से फल और सब्जियों के दाम भी आसमान छूने लगे हैं. इस के चलते हमारी खुराक में रोज फलसब्जियों की कमी होती जा रही है. बाजार में मिलने वाली सब्जियों व फलों में खतरनाक कैमिकलों व रंगों के इस्तेमाल की कहानी भी हमें आएदिन सुनने को मिलती है.

वैज्ञानिकों के मुताबिक, हमें पर्याप्त पोषण के लिए रोजाना 300 ग्राम सब्जियां खानी चाहिए, जबकि अभी हम महज 50 ग्राम सब्जियां ही ले पा रहे हैं. इस से बचने का सब से अच्छा उपाय है कि हम अपनी जरूरतों के मुताबिक कुछ फलसब्जियां खुद उगाएं. इस से न केवल सेहत सुधरेगी, बल्कि हमें बाजार के मुकाबले अच्छी और साफसुथरी फलसब्जियां भी खाने को मिलेंगी. तजरबों से यह बात साबित हो चुकी है कि पौधों के उगाने व उन की देखभाल करने से हमारा तनाव कम होता है और खुशी मिलती है.

बढ़ती हुई आबादी ने खेती की जमीन को काफी कम किया है. शहरों में तेजी से आबादी बढ़ी  है, जिस से लोगों के रहने की जगह में भी कमी होने लगी है. बहुमंजिला इमारतों व शहरी आवासों में फलसब्जियों को उगाने के लिए जरा भी जगह नहीं मिल पा रही है.

अब हमें गमलों, बालकनी, आंगन, बरामदा, लटकने वाली टोकरियों या घरों की छतों पर, जहां कहीं भी खुली धूप और हवा मिल सकती हो और पानी की सहूलियत हो, पौधे उगाने की तकनीक का सहारा लेना चाहिए. अगर आप ने थोड़ी सी भी सावधानी बरती, तो आसानी से कम जगह में पौधे उगा कर किचन गार्डन का आनंद उठा सकते हैं.

कैसी हो जगह : आप अपने घर या आसपास की कोई भी खाली जगह, जो खुली हो, का चुनाव कर सकते हैं. पौधों के लिए सुबह की धूप बहुत जरूरी होती है. साथ ही, उस जगह पर पानी देने और ज्यादा पानी को निकालने की सहूलियत होनी चाहिए. ऐसी जगहों में घर के आंगन, छत, बालकनी, खिड़कियों के किनारे वगैरह शामिल हो सकते हैं.

पौधे लगाने की तैयारी : अगर पौधों को छत पर सीधे लगाना है, तो मिट्टी की परत 25-30 सैंटीमीटर मोटी होनी चाहिए.

छत पर मिट्टी डालने से पहले नीचे पौलीथिन की मोटी तह बना कर चारों ओर ईंटों से दबा दें, ताकि पानी और सीलन से छत महफूज रहे. उपजाऊ मिट्टी में सड़ी गोबर की खाद व बालू मिला कर अच्छी तरह तह बना दें.

Home Gardenगमलों में पौधे लगाने के लिए : पौधों के आकार व फसल के मुताबिक ही गमलों के आकार का चुनाव किया जाना चाहिए. पपीते जैसे बड़े पौधों के लिए कम से कम 75 सैंटीमीटर ऊंचे और 45 सैंटीमीटर चौड़े ड्रम को इस्तेमाल में लाना चाहिए. टमाटर, मिर्च जैसे पौधों के लिए 30×45 सैंटीमीटर आकार वाले मिट्टी के गमले अच्छे होते हैं.

सीमेंट या प्लास्टिक के गमलों से बचना चाहिए. गमलों के अलावा लकड़ी या स्टील के चौड़े बौक्स, ड्रम, प्लास्टिक के बड़े डब्बे या जूट की छोटी बोरियों में मिट्टी भर कर भी पौधों को लगाया जा सकता है.

मिट्टी डालने से पहले गमले या डब्बों में नीचे की सतह पर छेद बना कर पत्थर के टुकड़ों से ढक देना चाहिए. पौध लगाने से पहले हमें मिट्टी में सड़ी गोबर की खाद व बालू, मिट्टी के बराबर अनुपात में मिला कर भर लेना चाहिए. नीम की खली, पत्ती व जानवरों की खाद या वर्मी कंपोस्ट का भी इस्तेमाल किया जा सकता है.

पौधों का चुनाव : छत पर बगिया में पौधे लगाते समय मौसम, धूप व जगह वगैरह पर खासा ध्यान दिया जाना चाहिए. कम धूप वाली जगह या छायादार जगह पर पत्तीदार व जड़ वाली सब्जियां जैसे पालक, धनिया, पुदीना, मेथी, मूली वगैरह लगाई जा सकती है, जबकि फल देने वाले पौधे जैसे टमाटर, बैगन, मिर्च, शिमला मिर्च, सेम, स्ट्राबेरी, पपीता, केला, रसभरी और नीबू खुले व अच्छी धूप वाली जगह में लगाए जाने चाहिए. छत या गमलों के लिए फसलों की खास किस्मों का चुनाव करना चाहिए.

देखभाल : शुरू में पौधों को एकदूसरे के नजदीक लगाना चाहिए और बाद में घने पौधों में उचित दूरी बनाने के लिए बीच से कमजोर और बीमार पौधों को निकाल देना चाहिए.

बेल या फैलने वाले पौधों जैसे लौकी, तुरई, करेला, सेम वगैरह को सहारा दे कर ऊपर या दीवार पर चढ़ाना चाहिए. टमाटर, बैगन, मिर्च को भी सहारा दे कर ऊपर ले जाना चाहिए और पौधों को नीचे फैलने से रोकना चाहिए. समयसमय पर पौधों में हलका पानी देते रहना चाहिए.

छत पर व गमलों में पौधों का रंग पीला पड़ना एक आम समस्या है. अकसर धूप की कमी और पानी की अधिकता से पौधे पीले पड़ते हैं. अगर गमलों में उग रहे पौधों को पर्याप्त धूप न मिल रही हो, तो उन्हें दिन में खुली धूप में रखें. बाद में उन्हें अंदर करें.

पौधों की खुराक के लिए वर्मी कंपोस्ट, जैविक खाद, गोबर की खाद वगैरह को समयसमय पर पौधों में डालते रहें या फिर उसे मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें. अच्छे पोषण के लिए पानी में घुलने वाले एनपीके की उचित मात्रा भी दी जा सकती है.

लीची के खास कीट व रोग

लीची के फल अपने मनमोहक रंग, स्वाद और गुणवत्ता के चलते भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया में अपना खास पहचान बनाए हुए हैं. लीची के सफल उत्पादन के लिए मुनासिब किस्मों का चयन बेहतर कृषि तकनीक, कीट बीमारी के रोकथाम व पौध संरक्षक के तरीकों को अपना कर किसान मुनाफा ले सकते हैं.

लीची के प्रमुख कीट

लीची फल बेधक व टहनी बेधक : इस कीट के लार्वा नई कोपलों की मुलायम टहनियों के भीतरी भाग को खाते हैं. नतीजतन, ग्रसित टहनियों में फूल व फलन ठीक से नहीं होता है. इस के प्रकोप से फल झड़ जाते हैं.

नियंत्रण : फल के लौंग आकार होने पर इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल कीटनाशक का छिड़काव 0.5-0.7 मिलीलिटर या नोवाल्यूरान 10 ईसी 1.5 मिलीलिटर नामक कीटनाशक का 2 छिड़काव 10-15 दिनों के फासले पर करें.

लीची की मकड़ी : इस कीट के नवजात और वयस्क दोनों ही नई कोपलों, पत्तियों, पुष्पक्रमों व फलों से लगातार रस चूसते हैं.

इस के लक्षण शुरू में निचली सतह पर धूसर रंग के मखमली सतह के रूप में बनते हैं. परिणामस्वरूप प्रकाश संश्लेषण की क्रिया रुक जाती है.

नियंत्रण : जुलाई माह में क्लोरफेनापार 10 ईसी या प्रोपरगाइट 57 ईसी मकड़ीनाशक कैमिकल का 3 मिलीलिटर की दर से 15 दिनों के अंतराल पर 2 बार छिड़काव करना चाहिए.

लीची का बग : इस जाति के अर्भक व वयस्क दोनों ही नुकसान पहुंचाते हैं. ये मुलायम पत्तियों, टहनियों व फलों का रस चूस कर नुकसान पहुंचाते हैं.

रोकथाम : मिली बग अगर पौधे पर चढ़ गए हों तो क्लोरोपाइरीफास या मिथाइल डेमेटान या इमिडाक्लोप्रिड या रोगोर 0.08 फीसदी का छिड़काव करें.

नीबू का काला एफिड : कीटों द्वारा कोशिका रस चूस लिए जाने के कारण पत्तियां, कलियां और फूल मुरझा जाते हैं. इस के साथसाथ यह कीट एक किस्म के विषाणुओं को भी फैलाता है.

रोकथाम : इस कीट की रोकथाम के लिए औक्सीडिमेटान मिथाइल या फिर डाईमिथोएट के 0.03 या इमिडाक्लोप्रिड 17 एसएल घोल का छिड़काव करें.

लीची के प्रमुख रोग

पत्ती मंजर और फल झुलसा : इस रोग की शुरुआत पत्तियों के आखिरी सिरे पर ऊतकों के सूखने से होती है. इस के रोग कारक मंजरों को झुलसा देते हैं, जिस से प्रभावित मंजरों में कोई फल नहीं लग पाते.

रोकथाम : इस रोग पर नियंत्रण करने के लिए थायोफेनेट मिथाइल 75 डब्लूपी 2 ग्राम प्रति लिटर या डाईफेनोकोनाजोल 25 ईसी 1 मिलीलिटर प्रति लिटर या एजोक्सीस्ट्रोबिन 250 एससी 0.8 मिलीलिटर प्रति लिटर के घोल का छिड़काव करने से कुछ हद तक काबू पाया जा सकता है.

श्याम वर्ण यानी एंथ्रेक्नोज : यह फलों के साथसाथ पत्तियों और टहनियों को भी प्रभावित कर सकते हैं. फलों के छिलकों पर छोटेछोटे 0.2-0.4 सैंटीमीटर गहरे भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं.

रोग की अधिक तीव्रता की स्थिति में काले धब्बों का फैलाव फल के छिलकों पर आधे हिस्से तक हो सकता है.

रोकथाम : इस रोग की तीव्रता ज्यादा होने पर रोकथाम के लिए थायोफेनेट मिथाइल 75 डब्लूपी 2 ग्राम प्रति लिटर या डाईफेनोकोनाजोल 25 ईसी 1 मिलीलिटर प्रति लिटर के घोल का छिड़काव करें.

म्लानि या उकटा रोग : यह रोग पत्तियों के हलके पीले होने के साथसाथ मुरझाने से शुरू होती है जो क्रमिक उत्तरोत्तर बढ़ती हुई 4-5 दिनों में पेड़ को पूरी तरह सुखा देती है. जड़ों और फ्लोएम ऊतकों पर कुछ भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं, जो बाद में जाइलम ऊतकों में भी फैल जाते हैं. इस की वजह से पानी का बहाव रुक जाता है.

रोकथाम : हैक्साकोनाजोल 5 एससी 1 मिलीलिटर प्रति लिटर या कार्बंडाजिम 50 डब्लूपी 2 ग्राम प्रति लिटर से पेड़ के सक्रिय जड़ क्षेत्र को भिगोएं.

फल विगलन : इस रोग के फैलने से छिलका मुलायम और फल सड़ने लगते हैं. प्रभावित फलों के छिलके भूरे से काले रंग के हो जाते हैं. सड़े हुए भाग पर फफूंद दिखने लगती है. फल फटने के बाद विगलन रोग जनकों के माइसिलियम फटे हुए भाग में पहुंच जाते हैं.

रोकथाम : फल तुड़ाई के 15-20 दिन पहले पेडों पर कार्बंडाजिम 50 डब्लूपी 2 ग्राम प्रति लिटर या थायोफेनेट मिथाइल 50 डब्लूपी 2 ग्राम प्रति लिटर या एजोक्सीस्ट्रोबिन 23 एससी 1 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी के घोल का छिड़काव करें.

उपज : लीची से प्रति पेड़ औसतन 1.5 से 2.0 क्विंटल उपज मिल जाती है. एक हेक्टेयर में तकरीबन 150 से 200 क्विंटल उपज मिल जाती है.

लीची की सफल बागबानी

भारत में लीची का उत्पादन  विश्व में दूसरे स्थान पर है. लीची के फल पोषक तत्त्वों से भरपूर और स्फूर्ति देने वाले होते हैं. इस के फल में शर्करा  की मात्रा 11 फीसदी, प्रोटीन 0.7 फीसदी, खनिज पदार्थ 0.7 फीसदी और वसा 0.3 फीसदी होती है.

लीची के फल से कई तरह के शरबत व जैम, नैक्टर कार्बोनेटैड पेय व डब्बाबंद उत्पाद बनाए जा सकते हैं. लीची नट फल को सुखा कर बनाया जाता है, जो कि बड़े ही चाव से खाया जाता है. लीची के कच्चे और खट्टे फलों को सुखा कर खटाई के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है.

Lichiसाल 2018-19 में भारत में लीची का रकबा 93,000 हेक्टेयर व उत्पादन 7,11,000 मिलियन टन हुआ. देश में लीची की बागबानी खासतौर से उत्तर बिहार, देहरादून की घाटी, उत्तर प्रदेश के तराई वाले इलाके और झारखंड के छोटा नागपुर इलाके में की जाती है.

जमीन और आबोहवा : लीची की बागबानी सभी तरह की मिट्टी, जिस में पानी के निकलने के इंतजाम वाली बलुई दोमट मिट्टी सब से कारगर पाई गई है. इस का पीएच मान 6.0 से 7.6 के बीच हो.

लीची के सफल उत्पादन के लिए नम या आर्द्र उपोष्ण जलवायु का होना जरूरी है. बारिश आमतौर पर 100-140 सैंटीमीटर पालारहित भूभाग व तापमान 15-30 डिगरी सैंटीग्रेड में पौधों की वानस्पतिक बढ़वार अच्छी होती है.

फलों की तुड़ाई के समय उच्च तापमान 30 डिगरी सैंटीग्रेड से ले कर 40 डिगरी सैंटीग्रेड और आपेक्षित आर्द्रता 84 फीसदी फायदेमंद है.

लीची की उन्नत किस्मों की सिफारिश : अर्ली बेदाना, शाही, त्रिकोलिया, अझोली, अर्ली लार्जरेड, कलकतिया, रोज सैंटेड, मुजफ्फरपुर, अर्ली सीडलैस, देहरादून, चाइना, स्वर्ण रूपा, सीएचईएस 2, कस्बा, पूर्वी वगैरह इस की उन्नत किस्में हैं.

लीची की खासमखास किस्मों का खुलासा

कलकतिया : इस किस्म के फल बड़े, लुभावने व फलों के गुच्छे घने लगते हैं. इस के फल रसभरे और स्वाद से भरे होते हैं.

देहरादून : यह लगातार फल देने वाली किस्म है. इस के फल लुभावने रंग वाले होते हैं. इस के फल मीठे, नरम, रसभरे और स्वाद होते हैं.

शाही : इस किस्म के फल गोल व गहरे लाल रंग वाले होते हैं. फल में गूदे की मात्रा ज्यादा होती है. इस किस्म के फल में खुशबू आती है. इस किस्म के 15-20 साल के पौधे से 100-120 किलाग्राम उपज हर साल हासिल की जा सकती है.

त्रिकोलिया : फल गोल व लाल रंग के होते हैं. फलों का वजन 14.5 ग्राम होता है, जिस में 11.4 ग्राम खाने योग्य गूदा पाया जाता है. पूरी तरह विकसित एक पेड़ से 90-110 किलोग्राम फल हर साल मिल जाते हैं.

रोज सैंटेड : इस किस्म के फलों में गुलाब जैसी खुशबू आती है और फल फटने की समस्या देखी गई है. पूरी तरह विकसित पौधे से 90-100 किलोग्राम फल लिया जा सकता है.

अर्ली बेदाना : फलों में बीज बहुत ही छोटा होता है. इस किस्म के फलों का वजन 18.4 ग्राम होता है. इस में 14.3 ग्राम गूदा पाया जाता है.

चाइना : फल बड़े ही नुकीले शंक्वाकार और चटकने की समस्या से मुक्त होते हैं. फलों का रंग गहरा लाल व गूदे की मात्रा अधिक होने के कारण इस की अत्यधिक मांग है. एक बड़े पेड़ से 120-150 किलोग्राम उपज हर साल मिल जाती है.

स्वर्ण रूपा : इस किस्म के फल देरी से पकते हैं. यह फल चटकने की समस्या से मुक्त होते हैं. फल लुभावने, गहरे गुलाबी रंग, जिन में बीज का आकार छोटा होता है. फल का गूदा अधिक जायकेदार व मीठा होता है.

सीएचईएस 2 : फल शंक्वाकार और गहरे लाल रंग व फलों का वजन 20-22 ग्राम व 15-20 फलों के गुच्छे में आते हैं.

कस्बा : फल बड़े यानी तकरीबन 20.2 ग्राम, गूदे की मात्रा अधिक व फल चटकने की समस्या से मुक्त होते हैं. इस किस्म के फल अलगअलग मंजरी पर आते हैं.

पूर्वी : फल छोटे और फलत अधिक होती है. एक बड़े पेड़ से तकरीबन 80-100 किलोग्राम फल की उपज हर साल मिल जाती है.

पौध तैयार करना : वैसे तो गूटी, भेंट कलम, दाब कलम, मुकुलन व बीज द्वारा पौधे तैयार कर सकते हैं, लेकिन व्यावसायिक खेती के लिए गूटी विधि द्वारा तैयार पौधों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए.

गूटी द्वारा पौध तैयार करने के लिए जूनजुलाई माह में चुनी हुई डाली पर शीर्ष से 40-50 सैंटीमीटर पहले गांठ के पास 2 सैंटीमीटर की छाल उतार कर छल्ला बना देते हैं. छल्ले के ऊपरी सिरे पर 1,000 पीपीएमआई बीए के पेस्ट का लेप लगा कर छल्ले को नम मौस घास से ढक कर 400 गेज की पौलीथिन का टुकड़ा लपेट कर सुतली से बांध देना चाहिए.

गूटी बांधने के तकरीबन 2 माह के अंदर जड़ें पूरी तरह से निकल आती हैं. इस समय डाली की तकरीबन आधी पत्तियों को निकाल कर व उसे मुख्य पौध से काट कर नर्सरी में कम छायादार जगह पर लगा देना चाहिए. इस प्रकार गूटी बांधने से जड़ें अच्छी निकलती हैं और पौध स्थापना अच्छी होती है.

पौध रोपण : लीची का पूरा विकसित पेड़ आकार में बड़ा होता है इसलिए इसे तकरीबन 10×10 मीटर की दूरी पर लगाना चाहिए.

लीची के पौधे की रोपाई से पहले खेत में लाइन बना कर पेड़ लगाने की जगह तय कर लेते हैं. इस के बाद निशान लगी जगह पर अप्रैलमई महीने में 90×90×90 सैंटीमीटर आकार के गड्ढे खोद कर मिट्टी को अच्छी तरह फैला देना चाहिए.

बारिश शुरू होते ही जून महीने में 2-3 टोकरी 25-30 किलोग्राम गोबर की सड़ी हुई खाद, 2 किलोग्राम करंज या नीम की खली, 1.0 किलोग्राम हड्डी का चूरा या सिंगल सुपर फास्फेट व 50 ग्राम हेप्टाक्लोर या 20 ग्राम थीमेट 10 जी को खेत की ऊपरी सतह की मिट्टी में अच्छी तरह मिला कर गड्ढे भर देने चाहिए.

बारिश में गड्ढे की मिट्टी दब जाने के बाद उस के बीच में खुरपी की मदद से पौधों की पिंडी के आकार की जगह बना कर पौधा लगा देना चाहिए.

पौधा लगाने के बाद उस के पास की मिट्टी को ठीक से दबा कर और एक थाला बना कर 2-3 बालटी यानी 25-30 लिटर पानी उस में डाल देना चाहिए.

सिंचाई : लीची के सफल उत्पादन के लिए मिट्टी में मुनासिब नमी का रहना बेहद जरूरी है. इस के लिए जल संरक्षण व मल्चिंग का इस्तेमाल लाभदायक माना जाता है.

लीची के पौधों में फल पकने के 6 हफ्ते पहले अप्रैल के शुरू में पानी की कमी से फल की बढ़वार रुक जाती है और फल चटकने लगते हैं इसलिए अप्रैल व मई माह में 2-3 दिनों के फासले पर हलकी सिंचाई करने से लीची के फलों में गूदे का विकास अच्छा और फल चटकने की समस्या कम हो जाती है.

पेड़ों की कटाईछंटाई : शुरू के 3-4 सालों की अवांछित शाखाओं को निकाल कर पौधों को तय आकार देना चाहिए. जमीन से तकरीबन आधा मीटर दूरी तक की शाखाओं को निकाल देना चाहिए ताकि मुख्य तने का सही विकास हो सके.

उस के बाद में 3-4 मुख्य शाखाओं को बढ़ने देना चाहिए जिस से पेड़ का आकार सुडौल, ढांचा मजबूत व फसल अच्छी आती है.

फलों को तोड़ते समय 10 सैंटीमीटर लंबी टहनी को तोड़ देना चाहिए, जिस से अगले साल स्वस्थ शाखाएं निकलती हैं और फसल अच्छी आती है.

अंत:फसल करें : लीची के पेड़ पूरी तरह तैयार होने में तकरीबन 15-16 साल का समय लगता है, इसलिए लीची के पौधों के बीच की खाली पड़ी जमीन का इस्तेमाल दूसरे फलदार पौधों व दलहनी फसलों या सब्जियों को लगा कर किया जा सकता है.

इस के अलावा मिट्टी की उर्वराशक्ति में भी काफी इजाफा होता है. लीची के बाग में अमरूद, शरीफा व पपीता जैसे फल के पेड़ लगाए जा सकते हैं.

फूल और फल : गूटी द्वारा तैयार लीची के पौधों में 4-5 सालों के बाद फूल व फल आना शुरू हो जाता है. फूल आने के समय से तकरीबन 2 माह पहले पौधों में सिंचाई बंद करने से मंजर बहुत ही बढि़या आते हैं.

लीची में परागण मधुमक्खियों द्वारा होता है इसलिए फूल आने के समय कीटनाशक दवाओं का इस्तेमाल न करें वरना फलों पर बुरा असर पड़ेगा.

लीची में मुख्य रूप से नर, मादा व उभयलिंगी फूल आते हैं, जिन में से केवल मादा व उभयलिंगी फूलों में ही फल बनते हैं इसलिए अधिक फलन के लिए मादा फूलों का परागण जरूरी होता है.

फलों का फटना : फल विकसित होने के समय मिट्टी में नमी की कमी और तेज गरम हवाओं से फल अधिक फटते हैं. आमतौर पर जल्दी पकने वाली किस्मों में फल चटकने की समस्या देर से पकने वाली किस्मों की अपेक्षा अधिक पाई जाती है. इस के लिए वायुरोधी पेड़ों को बाग के चारों तरफ लगाएं और फरवरी माह में पौधों के नीचे मल्चिंग करें.

मिट्टी में नमी बनाए रखने के लिए अप्रैल महीने के पहले हफ्ते से फलों के पकने और उन की तुड़ाई तक बाग की हलकी सिंचाई करते रहनी चाहिए और पौधों पर पानी का छिड़काव करें.

अप्रैल माह में पौधों पर 10 पीपीएम एनएए और 0.4 फीसदी बोरेक्स के छिड़काव से फलों के फटने की समस्या कम हो जाती है.

फलों का झड़ना : जमीन में नाइट्रोजन व पानी की कमी और गरम व तेज हवाओं के चलते लीची के फल छोटी अवस्था में ही झड़ने लगते हैं. फल लगने के बाद जमीन में नाइट्रोजन व पानी की कमी न होने दें और जरूरत पड़ने पर एनएए (प्लैनाफिक्स) के 100 पीपीएम घोल का छिड़काव करें.

कीवी के मिलते हैं अच्छे दाम

अगर बागबानों ने कीवी अच्छी तरह से नहीं पकाई हो तो मंडियों में इस फल को बेचना मुश्किल हो जाता है. कीवी गुणकारी फल है. अगर बगीचे में कीवी लगाई है, तो इसे बंदर, पक्षी आदि जंगली जानवर खाना पसंद नहीं करते. इस वजह से बागबान इस की पैदावार बेफिक्र हो कर करते हैं और इस फल को मंडियों तक पहुंचाने में कोई जल्दबाजी नहीं करते.

हिमाचल प्रदेश अपनी पहचान सेब उत्पादक राज्य के रूप में बनाए हुए है. अकेले सेब से हर साल बागबान तकरीबन साढे़ 5 हजार करोड़ रुपए का कारोबार करते हैं. सेब के गिरते दाम के कारण अब बागबान अन्य फलों नाशपाती, आडू, प्लम, बादाम आदि के साथसाथ कीवी की पैदावार करने लगे हैं.

कीवी की बेल लगाने के लिए खास ध्यान यह रखना पड़ता है कि 3 मादा के साथ एक नर बेल लगानी पड़ती है, तभी जा कर बागबानोंं को अच्छी पैदावार मिल पाती है. बागबानी विशेषज्ञ इसी अनुपात में कीवी की बेल लगाने की सलाह देते हैं.

प्रदेश में कीवी का उत्पादन बागबानों में लोकप्रिय होता जा रहा है और इस से मोटी कमाई कर रहा है. शिमला जिले के परांचा गांव के प्रगतिशील बागबान केदार सिंह केदारटा और आत्माराम केदारटा सहित अन्य बागबान कहते हैं कि कीवी का उत्पादन करने में ज्यादा सिरदर्दी नहीं होती. कीवी पर सेब की तरह मेहनत नहीं करनी पड़ती और न ही 16-17 बार कीटनाशक दवाओं का स्प्रे करना पड़ता है.

कीवी का बगीचा एक बार तैयार हो जाए, तब बागबानों की चांदी होती है. बागबान आत्माराम केदारटा बताते हैं कि वे 5 हजार फुट की ऊंचाई वाले इलाके में कीवी की पैदावार कर रहे हैं. कीवी को जंगली जानवर और पक्षी भी नुकसान पहुंचाते हैं. उन का कहना है कि वे एक पौधे से तकरीबन 7 क्विंटल तक कीवी की पैदावार कर रहे हैं और वह पूरी तरह से तैयार फल मंडियों में बेचते हैं.

ये बागबान शिमला, सोलन, परमाणु, चंडीग, दिल्ली की मंडियों में कीवी बेचते हैं. चंडीगढ़ व दिल्ली की मंडियों में कीवी की मांग ज्यादा रहती है. यहां पर पकी हुई कीवी के मुंहमांगे दाम मिलते हैं, बशर्ते फल का आकार और क्वालिटी अच्छी हो. प्रदेश में कुछ सालों से बागबानों ने सेब व अन्य फलों के साथसाथ कीवी की पैदावार को भी प्रमुख व्यवसाय के रूप में अपना रखा है.

कीवी की पैदावार बागबान इसलिए भी कर रहे हैं, क्योंकि इस में उत्पादन लागत सेब की अपेक्षा काफी कम रहती है और कीटनाशकों पर खर्च होने वाली रकम को भी बचाया जा सकता है.

कीवी को मंडियों में सेब की अपेक्षा अधिक दाम मिलते हैं और इस की पैकिंग में भी अपेक्षाकृत कम खर्चा आता है. इस के अलावा कीवी के खराब होने का डर भी नहीं होता और इसे ज्यादा दिनों तक भंडारित किया जा सकता है. मंडियों में जब कीवी को अच्छे दाम मिलने शुरू होते हैं, तो बागबान अपनी तैयार फसल बेचने पहुंच जाते हैं.

केले की खासीयत

आज के खाद्य वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च में केले को बहुत ज्यादा उपयोगी पाया है. जरमनी के गोली जन विश्वविद्यालय के प्रोफैसर फूडल ने अपनी रिसर्च के आधार पर सलाह दी है कि डिप्रैशन के शिकार आदमी को केले का सेवन करना चाहिए. प्रोफैसर फूडल के मुताबिक, केले में सेरोटोनिन नामक तत्त्व पाया जाता है. इस से मानसिक परेशानियों से छुटकारा मिलता है.

रूसी वैज्ञानिकों ने भी अपनी रिसर्च के नतीजों के आधार पर बताया है कि केला खाने से शरीर का समुचित विकास होता है. इस का नियमित सेवन करने वाले की सेहत बहुत अच्छी रहती है.

ब्रिटेन के औस्टन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने अपने अनुसंधान के आधार पर बताया है कि पेट के अल्सर के लिए केले से अच्छी कोई और दवा नहीं है.

वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक का विकास किया है, जिस में रोग निरोधक औषधि टिंकू को केले के फल में समावेशित किया जा सकेगा. इस प्रकार रोग निरोधक दीपों के रूप में केले के फल को खाने से काम चल जाएगा और इनसान अनेक रोगों से सुरक्षित रह सकेगा.

केले की खासीयत

केले में पोटैशियम जैसे हाई ब्लडप्रैशर को कंट्रोल करने वाले जरूरी तत्त्व के अलावा विटामिन बी और सी व नियासिन राइबोफ्लेविन जैसे उपयोगी तत्त्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं. केले में पोटैशियम, सोडियम, मैग्नीशियम भी पाया जाता है. इन तत्त्वों की उपस्थिति वाला केला खाने से खून में बढ़ोतरी होती है, जिस से बहुत से रोगों पर रोक लग जाती है.

केले में कोलैस्ट्रौल बिलकुल नहीं पाया जाता है. इस में सेब से डेढ़ गुना ज्यादा प्राकृतिक शर्करा पाई जाती है. बच्चों के लिए केला विशेष उपयोगी होता है. कमजोर बच्चों के लिए यह उपयोगी आहार माना जाता है.

केले के कच्चेपक्के फल, फूल और तने के बीचोंबीच पाए जाने वाले सफेद फोर, जमीन के अंदर का प्रबंध और तने के रस में भी प्रचुर लौह तत्त्व मौजूद होते हैं. इस के कच्चे फल के अलावा फूल की सब्जी बनाई जाती है. यह सब्जी शरीर के लिए लाभदायक होती है. केले के छिलके से प्राप्त रेशों से चटाई और कपड़ा बनाया जाता है.

कैसे खाएं केला

सुबह के नाश्ते में केला खाना अच्छा है, लेकिन इसे खाली पेट नहीं खाना चाहिए. इस के साथ ड्राई फ्रूट, सेब और दूसरे फलों का भी सेवन करना चाहिए. अगर इसे खाली पेट खाया जाए, तो पाचन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं.

केला ही नहीं, बल्कि दूसरे फलों को भी खाली पेट खाने से बचना चाहिए, क्योंकि खाली पेट यदि फलों को खाया जाता है, तो वे कभीकभी हानिकारक भी साबित होते हैं.