दुधारू पशुओं (Milch Animals) को दें हरा चारा

पशुओं से अगर ज्यादा दूध लेना है तो यह जरूरी है कि वे सेहतमंद रहें. अगर पशुपालक दुधारू पशुओं को हरा चारा दें और सही प्रबंध करें तो वे अपने पशुओं को ठीक से रख सकते हैं.

दुधारू पशुओं की देखभाल करना बहुत ही जरूरी है, क्योंकि इन से ज्यादा दूध लेने से ज्यादा पैसा मिलता है. मानव शरीर के लिए पशुजनित प्रोटीन भी जरूरी है, जो शाकाहारी इनसान को केवल दूध से ही मिल सकता है.

दुधारू पशुओं से ज्यादा दूध लेने के लिए ज्यादा पोषक तत्त्वों की जरूरत पड़ती है. ये पोषक तत्त्व हैं चिकनाई, कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, विटामिन, खनिज पदार्थ, लवण और पानी. इस के लिए दुधारू पशुओं को संतुलित आहार देना चाहिए, जो उन के स्वास्थ्य से संबंधित सभी तरह की जरूरतों को पूरा कर सके और उन्हें सेहतमंद रखने के लिए उसे पोषक तत्त्व ठीक अनुपात और सही मात्रा में मुहैया करा सके.

संतुलित आहार है जरूरी

दूध का उत्पादन 2 बातों पर ज्यादा निर्भर करता है:

* पशु के दूध देने की कूवत.

* पशु का रखरखाव, देखभाल और आहार.

आहार की मात्रा पशु द्वारा दिए गए दूध की मात्रा और उस में चिकनाई और प्रतिशत पर निर्भर है. दूध अयन में बनता है. दुधारू पशु को ऐसे पोषक तत्त्व और ज्यादा खिलाने चाहिए, जो दूध में निकले हुए तत्त्वों की कमी को पूरा कर सकें. साथ ही, उन तत्त्वों को भी पूरा करें, जो इस क्रिया के पूरा होने में खत्म हुए हों.

दुधारू पशुओं (Milch Animals)

ऊर्जा भी है जरूरी

दुधारू पशुओं के शरीर से दूध के साथ कार्बोहाइड्रेट और चिकनाई बाहर निकलती है. इस नुकसान को पूरा करने के लिए पशु को 5 फीसदी चिकनाई और अच्छे कार्बोहाइड्रेट वाले हरे चारे जैसे ज्वार, मक्का, लोबिया, ग्वार, बरसीम, जई वगैरह खिलाने चाहिए. इन्हें खिलाने से दूध में निकले जरूरी तत्त्वों की कमी पूरी हो जाती है.

प्रोटीन भी जरूर दें

दूध बनने में कार्बोहाइड्रेट अहम भूमिका निभाता है और उसे शरीर से बाहर निकलने में प्रोटीन का नुकसान होता है. इस कमी को पूरा करने के लिए हम आमतौर पर पशु को एक किलोग्राम टाइप 1 दाना या पैलेट खिलाते हैं, लेकिन यदि हमारे पास फलीदार हरा चारा हो तो 12 किलोग्राम हरे चारे से उस की यह जरूरत पूरी की जा सकती है. हरे फलीदार चारे को हमेशा सूखे भूसे के साथ मिला कर देना चाहिए वरना पेट में गैस बन सकती है.

खनिज लवणों की जरूरत

दूध में कैल्शियम और फास्फोरस की मात्रा शरीर से काफी निकलती है. इन की भरपाई के लिए फलीदार हरा चारा जैसे लूसर्न, बरसीम, ग्वार, लोबिया वगैरह में कैल्शियम और गेहूं के चोकर में फास्फोरस काफी मात्रा में होने के चलते दुधारू पशुओं को आहार में खिलाना चाहिए.

वहीं दूसरी ओर दूध में तमाम तरह के विटामिन पाए जाते हैं. इन का दूध के बनने और शरीर से बाहर निकलने में बहुत अधिक महत्त्व हैं. खासतौर से चिकनाई में घुलनशील विटामिन ए और विटामिन डी, जो शरीर में नहीं बनते, उन्हें चारे द्वारा पशुओं को खिलाने चाहिए.

पशुओं को हरा चारा खिलाने से विटामिन ए मिलता है, वहीं धूप में पशु को खड़ा कर के अथवा चारागाहों में चराने से चमड़ी पर सूरज की किरणों के प्रभाव से विटामिन डी मिलता है. खिलाए जाने वाले दानों से काफी मात्रा में पशु को विटामिन ई मिल जाता है. बी श्रेणी के विटामिन और विटामिन सी पशु के शरीर के अंदर भोजन प्रणाली में जीवाणुओं द्वारा हरे चारे पर प्रतिक्रिया हो कर खुद ही बन जाते हैं और इस तरह उन की जरूरत पूरी हो जाती है.

हरे चारे की उपयोगिता

दुधारू पशुओं (Milch Animals)* हरा चारा स्वादिष्ठ, रुचिकर, पौष्टिक और जल्दी पचने वाला होता है.

* हरे चारे से पशुओं को सभी पोषक तत्त्व मिल जाते हैं, खासकर विटामिन ए, प्रोटीन, पानी और खनिज पदार्थ. दुधारू पशुओं को इन की जरूरत बहुत ज्यादा होती है.

* पशुओं को हरा चारा खिलाने से दाने की बचत होती है.

* हरे चारे द्वारा पालनेपोसने में खर्च की कमी से उत्पादन की लागत भी कम हो जाती है.

* किसान एक साल में इन हरे चारों की कई फसलें ले सकता है. इस से उसे सालभर में प्रति हेक्टेयर अच्छी आमदनी हो जाती है.

* अधिक रेशेदार होने की वजह से ये चारे राशन की मात्रा बढ़ाते हैं, जो भोजन प्रणाली के तनाव के लिए जरूरी है. इस तरह तनाव पा कर ही भोजन प्रणाली अपना पूरा काम करने में समर्थ होती है.

* ये चारे भोजन प्रणाली के अंदर अधिक पानी सोख कर के मृदुरेचक प्रभाव पैदा करते हैं.

* ये चारे ज्यादा सस्ते और शक्तिदायक होते हैं.

* जुगाली करने वाले पशुओं में इन का और भी ज्यादा महत्त्व है. रूमेन (प्रथम अमाशय) में मौजूद जीवाणुओं के लिए ये चारे अनुकूल अवस्थाएं प्रदान करते हैं:

* चारे के रेशे या न पचने वाले तंतुओं को तोड़ कर ये जीवाणु उन से उड़नशील चिकने अम्ल पैदा करते हैं जो कि शरीर के लिए ताकत देते हैं.

* ये जीवाणु इन चारे से कुछ जरूरी अमीनो एसिड और विटामिन भी तैयार करते हैं.

* ये चारे भोजन प्रणाली की दीवारों में संकुचन और विमोचन क्रियाओं के पूरा होने में भी जरूरी भूमिका निभाते हैं.

* ये चारे पाचक रसों की क्रिया के लिए अधिक बड़ी सतह बनाते हैं, जिस से उन का असर भोजन पर अच्छी तरह हो सके.

* पशुओं को उन की शुष्क पदार्थ की पूरी जरूरत का दोतिहाई हिस्सा इन्हीं चारों से दिया जाता है.

साफ पानी का हो इंतजाम

दुधारू पशुओं को भरपूर मात्रा में हर समय साफ ताजा रंगहीन, गंधहीन, कीटाणुरहित पानी देना चाहिए. पशु के शरीर में तकरीबन 70 फीसदी भाग और उस के दूध में तकरीबन 87 फीसदी भाग में पानी होता है.

बता दें, शरीर में पानी की 10 फीसदी कमी होने पर पशुओं में बेचैनी होने, कांपने अथवा कमजोरी आने के लक्षण पैदा हो जाते हैं और 20 फीसदी कमी होने पर पशु मर जाता है. हरे चारे में तकरीबन 70-80 फीसदी भाग पानी या नमी का होता है, जो पशु के पोषण में बहुत उपयोगी होता है.

किसानों के लिए समस्या छुट्टा जानवर (Stray Animals)

मवेशी कभी किसानों की आय का एक जरीया होते थे. जब भी किसान को अपनी जरूरत के लिए पैसा चाहिए होता था, तो वह पशुओं को बेच कर अपना काम चला लेता था. किसान तब गाय और बछड़े में कोई अंतर नहीं समझता था.

बैल और भैंसा खेत में काम करने के लिए होते थे. जरूरत न होने पर बैल को बेचा भी जाता था, लेकिन आज खेत की जुताई से ले कर बाकी कामों के लिए मशीनों का ही इस्तेमाल होने लगा है.

ऐसे में खेत से बैल का काम गायब होता जा रहा है. अब बैल और बछड़े किसानों के लिए बेकार हो गए हैं, इसलिए अब ये छुट्टा जानवरों की तरह किसानों की फसलों को चौपट कर रहे हैं. यही नहीं, जब किसान इन्हें अपने खेत में जाने से रोकते हैं, तो ये हिंसक हो कर गांव के लोगों पर हमला करने लगते हैं. शहरों के भी ऐसे ही हालात हैं. गाय यहां सड़कों पर घूमती मिल जाती है. सड़क दुर्घटना का यह सब से बड़ा कारण बनती जा रही है.

पहले तो ये छुट्टा जानवर खेतों में खड़ी फसल को ही नुकसान पहुंचाते थे, लेकिन अब लोगों को भी घायल करने लगे हैं. यही नहीं, फसलों को जानवरों से बचाने के लिए किसान अब खेतों के चारों तरफ तार की बाड़ लगाने लगे हैं. किसानों को रात में अब खेतों में सोना पड़ रहा है, जिस से उन्हें कई तरह की दुर्घटनाओं का शिकार होना पड़ रहा है.

शहर के जानवर पहुंच रहे हैं गांव : कई इलाकों में तो नीलगाय खेतों को नुकसान पहुंचाती थी. इस वजह से किसान फसलों की बोआई नहीं कर पा रहे थे. कुछ किसानों ने तो मटर, आलू और सरसों जैसी फसलों की बोआई ही बंद कर दी थी, लेकिन अब किसानों के सामने नीलगाय से ज्यादा परेशानी इन छुट्टा जानवरों से है.

गाय के नाम पर गौरक्षक पूरे देश में तांडव मचा चुके हैं. ऐसे में यह कारोबार बंद हो चुका है. लिहाजा, लोग अब अपने जानवरों को छुट्टा छोड़ देते हैं. पहले हर गांव में पशुओं के चारागाह के नाम पर काफी सरकारी जमीन खाली पड़ी होती थी, लेकिन अब यह जमीन खत्म हो गई है. गांव के किनारे बने जंगल भी खत्म हो गए हैं, इसलिए जानवर चरने के लिए अब खेतों में जाने लगे हैं.

यह समस्या पूरे देश की है खासकर उत्तर भारत में उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और पंजाब इस से ज्यादा प्रभावित हैं. ये ऐसे प्रदेश हैं, जहां खेती के लिए जानवरों का इस्तेमाल होता था.

नाम की गौरक्षा : जानवरों की खरीदबिक्री की यह दिक्कत गौरक्षा से शुरू हुई. गौरक्षा के नाम पर हिंदुत्व वोट बैंक को भावनात्मक तरीके से जोड़ा गया. गाय के साथ लोग जुड़ते गए, लेकिन यह भूल गए कि देश में गाय और उस की नस्ल के जानवरों को रखने के लिए कोई इंतजाम नहीं हैं. पहले तहसील स्तर पर जानवरों को रखने के लिए कैदखाने बनाए जाते थे, जिस का भी जानवर छुट्टा पाया जाता था, उसे वहां बंद कर दिया जाता था.

जब उस का मालिक उसे लेने जाता था, तो उसे जानवर को रखने पर आने वाला खर्च देना पड़ता था. अब ऐसे कैदखाने बंद हो गए हैं. शहरों में भी छुट्टा जानवरों को पकड़ने और रखने के इंतजाम होते थे. अब ऐसे प्रयोग बंद हो गए हैं.

सड़कों पर भी ऐसे जानवरों को घूमते, टहलते और आराम फरमाते देखा जा सकता है. सरकार बारबार कह रही है कि ऐसे जानवरों को रखने के लिए सरकारी इंतजाम किए जा रहे हैं, पर इन का असर कहीं नहीं दिख रहा है.

गौरक्षा के नाम पर वोट हासिल करने वाली सरकार भी इस तरफ कोई रुचि नहीं दिखा रही है. इस वजह से शहर से ले कर गांव तक अब छुट्टा जानवरों का आतंक है. इस से यदि जल्द नजात नहीं मिली तो समस्या ज्यादा गंभीर हो जाएगी.

पशुपालन में खनिज मिश्रण का महत्त्व

पशुओं की सेहत और ज्यादा उत्पादन हासिल करने के लिए उन के आहार में कई तरह के खनिज तत्त्वों की जरूरत पड़ती है. जैसे कैल्शियम, फास्फोरस, मैग्नीशियम, तांबा, लोहा, जस्ता, सोडियम, पोटेशियम,  मैंगनीज, कोबाल्ट, आयोडीन वगैरह.

खनिज मिश्रण, भी ऐसे ही खनिज तत्त्वों का मिश्रण हैं. ये तत्त्व पशुओं को बहुत कम मात्रा में चाहिए होते हैं, लेकिन पशु आहार में इन की कमी या सही अनुपात न होने से पशु तमाम तरह की बीमारियों के शिकार हो जाते हैं और वे दूसरी बुरी आदतें जैसे मिट्टी, कपड़ा, कागज वगैरह खाना व पेशाब चाटना शुरू कर देते हैं. इसलिए पशुपालन के लिए उन के खाने में रोजाना सही मात्रा में खनिज मिश्रण देना बहुत ही जरूरी है.

खनिजों की कमी के कारण

गहन जुताई, ज्यादा फसलें लेना और ज्यादा उपज वाली किस्मों के प्रचलन से मिट्टी में खनिजों की कमी लगातार बढ़ती जा रही है. मिट्टी और पानी में कुछ खनिज तत्त्वों की कमी के कारण उस क्षेत्र के चारे में उन तत्त्वों की कमी हो जाती है.

इस तरह का चारा पशुओं को खिलाने से उन में खनिज तत्त्वों की कमी व असंतुलन हो जाता है. फलीदार हरे चारे जैसे बरसीम, रिजका वगैरह में कैल्शियम ज्यादा मात्रा में पाया जाता है, जबकि अफलीदार चारे जैसे कि मक्का, ज्वार, जई वगैरह में इन की काफी कमी होती है.

खनिज तत्त्वों की कमी में होने वाली समस्याएं : सब से खास बात यह है कि पशु दूध देने के मामले में पिछड़ जाते हैं.

साथ ही, पशुओं को भूख न लगना और बढ़वार में कमी हो जाना, प्रजनन शक्ति धीरेधीरे खत्म होना, बांझपन और समय पर गाभिन न होना, बच्चा न ठहरना जैसी तमाम समस्याएं पशुओं को घेर लेती हैं, जिन का नुकसान पशुओं के साथसाथ पशुपालक को भी भुगतना पड़ता है.

पशुपालन (animal husbandry)

पशुओं को खनिज मिश्रण खिलाने के फायदे : यह मिश्रण पशुओं की हड्डियों को मजबूत बनाता है. साथ ही, उन का हाजमा भी ठीक रहता है व पाचनशक्ति बढ़ाता है. यह पशुओं को तमाम तरह की बीमारियों से भी बचाता है.

वैसे तो इस के सेवन से पशु मिट्टी, कपड़ा, कागज इत्यादि नहीं खाते और पशुओं की पैदावार कूवत बढ़ती है. 2 ब्यांत के बीच का अंतर कम होता है और पशु को बच्चा देते समय ज्यादा परेशानी नहीं होती. इस के अलावा बच्चा न ठहरना या गरमी में न आने की परेशानी को यह खनिज मिश्रण दूर करता है.

खनिज मिश्रण खिलाने की विधि : खनिज मिश्रण को दाना मिश्रण के साथ मिला कर खिलाएं. साधारण नमक पशु आहार का स्वाद, भूख व पाचकता को बढ़ाता है. इसलिए खनिज मिश्रण के साथ नमक 2:1 के अनुपात में दें.

बछड़े में डायरिया (Diarrhea) का प्रकोप

गोवत्स यानी गाय के बछड़े बचपन से ही स्वस्थ हों, तो भविष्य में उन का दूध उत्पादन बेहतर होता है. लेकिन उन के जीवन के पहले 3 हफ्ते में दस्त (डायरिया) एक सामान्य और गंभीर समस्या बन कर सामने आ सकती है. यदि इस समस्या पर समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो यही उन के मरने का कारण बन सकती है. साल 2007 में यूएस डेयरी की एक रिपोर्ट में पाया गया कि 57 फीसदी वीनिंग गोवत्सों की मृत्यु दस्त के कारण हुई, जिन में अधिकांश गोवत्स 1 माह से छोटे थे.

दस्त होने के कई कारण हो सकते हैं. सही समय पर दूध न पिलाना, दूध का अत्यधिक ठंडा होना या ज्यादा मात्रा में देना, रहने की जगह का साफसुथरा न होना या फफूंद लगा चारा खिलाना, बछड़ों में दस्त के प्रमुख कारण हैं. इसके अलावा बछड़ों में दस्त अकसर एंटरोपैथोजेनिक ई.कोलाई नामक जीवाणु के कारण होता है. यह जीवाणु आंत से चिपक कर घाव पैदा करता है, जिस से आंत के एंजाइम की गतिविधि घट जाती है. इस वजह से भोजन का पाचन प्रभावित होता है और खनिज पदार्थ अवशोषित होने के बजाय मल के माध्यम से बाहर निकल जाते हैं.

कुछ ई.कोलाई वेरोटोक्सिन का उत्पादन करते हैं, जिस से अधिक गंभीर स्थिति जैसे खूनी दस्त हो सकते हैं. 2 से 12 सप्ताह के बछड़ों में साल्मोनेला प्रजाति के जीवाणुओं के कारण दस्त आमतौर पर देखा जाता है. इस के अलावा कोरोना वायरस, रोटा वायरस जैसे वायरस और जियार्डिया, क्रिप्टोस्पोरिडियम पार्वम जैसे प्रोटोजोआ भी दस्त के सामान्य कारण हैं.

दस्त के लक्षणों को पहचानना महत्वपूर्ण है. बछड़े की धंसी हुई आंखें, तरल पदार्थों का सेवन कम होना, लेटना, हलका बुखार, ठंडी त्वचा और सुस्ती इस समस्या के संकेत हैं. यदि बछड़ा बारबार लेट रहा हो, खुद से खड़ा नहीं हो पा रहा हो और खींचने पर आंखों के पास की त्वचा वापस आने में 6 सेकंड से अधिक समय ले रही हो, तो तुरंत पशु चिकित्सक से परामर्श लें.

दस्त से बचाव के लिए गर्भावस्था के अंतिम 3 महीनों में गाय के पोषण का विशेष ध्यान रखना चाहिए, ताकि बछड़ा स्वस्थ और मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता के साथ जन्म ले. बछड़े को जन्म के 2 से 6 घंटे के भीतर खीस पिलाना आवश्यक है. यदि बछड़ा डिस्टोकिया (कठिन प्रसव) से पैदा हुआ हो, तो उस के सिर और जीभ पर सूजन के कारण वह खीस को ठीक से नहीं पी पाएगा. ऐसे में बछड़े की विशेष देखभाल करनी चाहिए.

इस के अतिरिक्त बछड़े को बाहरी तनाव जैसे अधिक ठंड, बारिश, नमी, गरमी और प्रदूषण से बचाना चाहिए. समय पर टीकाकरण भी आवश्यक है, ताकि बछड़ा स्वस्थ रह सके.

यदि बछड़े को दस्त हो जाए, तो सब से पहले शरीर में पानी और इलैक्ट्रोलाइट्स की कमी को पूरा करना जरूरी है. इस के लिए हर दिन 2-4 लिटर इलैक्ट्रोलाइट घोल पिलाएं. घर पर ही इलैक्ट्रोलाइट घोल बनाने के लिए :

1 लिटर गरम पानी में 5 चम्मच ग्लूकोज, 1 चम्मच सोडा बाइकार्बोनेट और 1 चम्मच टेबल नमक मिलाएं. यानी चम्मच = 5 ग्राम लगभग.

नेबलोन आयुर्वेदिक पाउडर (10-20 ग्राम) को सादा पानी या चावल के मांड में मिला कर दिन में 2-3 बार पिलाएं. यदि स्थिति गंभीर हो, तो हर 6 घंटे पर दें. दस्त करने वाले आंतरिक परजीवियों से बचाव के लिए अलबेंडाजोल, औक्सीक्लोजानाइड और लेवामिसोल जैसे डीवार्मर्स समयसमय पर देना चाहिए. यदि आवश्यक हो तो पशु चिकित्सक की सलाह से एंटीबायोटिक्स का उपयोग करें.

बछड़ों में दस्त की समस्या को समय पर पहचान कर उचित देखभाल और उपचार से इसे नियंत्रित किया जा सकता है.

ओडिशा में बढ़ेगा दूध उत्पादन

मयूरभंज : राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने बीते 13 जनवरी, 2025 को ओडिशा के मयूरभंज जिले में डेयरी और पशुधन क्षेत्र में महत्वपूर्ण पहलों की एक श्रृंखला का वर्चुअल माध्यम से उद्घाटन किया.

मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के तहत पशुपालन और डेयरी विभाग की अगुआई में इन कार्यक्रमों का उद्देश्य ग्रामीण स्तर पर आजीविका को बढ़ाना, पशुधन उत्पादकता में सुधार करना और क्षेत्र में महत्वपूर्ण पोषण संबंधी चुनौतियों का समाधान करना है.

इस कार्यक्रम में मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय और पंचायती राज मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह, केंद्रीय  शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी और पंचायती राज राज्य मंत्री प्रो. एसपी सिंह बघेल, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी और अल्पसंख्यक मामलों के राज्य मंत्री  जौर्ज कुरियन  और ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी सहित कई व्यक्ति उपस्थित थे.

कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने ‘राष्ट्रीय गोकुल मिशन’ के तहत मयूरभंज में ‘मवेशी प्रेरण’ कार्यक्रम का उद्घाटन किया. इस पहल में ओडिशा के मयूरभंज जिले में चुने गए लाभार्थियों को 3,000 उच्च आनुवंशिक गुणवत्ता वाले मवेशियों का वितरण किया गया. पशुपालन और डेयरी विभाग की ‘राष्ट्रीय गोकुल मिशन’ योजना के तहत राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड द्वारा मयूरभंज में 5 सालों में 37.45 करोड़ रुपए के आवंटन के साथ उत्पादकता वृद्धि परियोजना कार्यान्वित की जा रही है.

इस कार्यक्रम का उद्देश्य दूध उत्पादन को बढ़ाना, ग्रामीण आय को मजबूत करना और टिकाऊ पशुधन विधियों को बढ़ावा देना है. कार्यक्रम के हिस्से के रूप में गिफ्ट मिल्क प्रोग्राम भी शुरू किया गया. साथ ही, कुपोषण से निबटने और बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार के लिए डिजाइन किए गए  इस कार्यक्रम में मयूरभंज जिले के लगभग 1,200 स्कूली बच्चों को विटामिन ए और डी से भरपूर 200 मिलीलिटर फ्लेवर्ड दूध प्रदान किया जाएगा.

इस पहल का वर्चुअल उद्घाटन करते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने पोषण और शिक्षा पर ऐसे कार्यक्रमों के सकारात्मक प्रभाव पर भी ध्‍यान दिया और उम्मीद जताई कि इस तरह के प्रयास देशभर में इसी तरह के कार्यक्रमों के लिए एक मौडल के रूप में काम करेंगे. इस के अलावा, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने ओडिशा राज्य में दूध खरीद, प्रसंस्करण और विपणन को मजबूत करने के लिए एक बाजार सहायता कार्यक्रम शुरू किया.

इस पहल का उद्देश्य राज्य में दूध खरीद क्षमता को 5 लाख लिटर प्रतिदिन से बढ़ा कर 10 लाख लिटर प्रतिदिन करना है. यह कार्यक्रम किसानों के लिए बेहतर लाभ सुनिश्चित करने के लिए ब्रांडिंग और वितरण नैटवर्क बनाने पर केंद्रित है.

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने डेयरी क्षेत्र में दूरदर्शी नीतियों और अभिनव कार्यक्रमों के  माध्यम से बदलाव लाने में पशुपालन और डेयरी विभाग के प्रयासों की भी सराहना की. उन्होंने दूध उत्पादन में भारत के प्रयासों पर प्रकाश डाला, जो पिछले दशक में वैश्विक रुझानों को पार करते हुए 6 फीसदी सालाना दर से बढ़ा है.

राष्ट्रपति ने पशुधन उत्पादकता बढ़ाने और डेयरी फार्मिंग में लाभ को बढ़ाने के लिए कृत्रिम गर्भाधान और उच्‍च गुणवत्तायुक्‍त वीर्य संवर्धन जैसी उन्नत तकनीकों को अपनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया.

केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने भी ‘राष्ट्रीय गोकुल मिशन’ की सफलता पर जोर दिया, जिस ने देशी गोजातीय नस्लों की नस्ल सुधार और उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. उन्होंने ग्रामीण आर्थिक विकास को गति देने और किसानों के लिए बाजार संपर्क में सुधार करते हुए महत्‍वपूर्ण डेयरी पहलों के लिए निरंतर समर्थन प्रदान करने के लिए पशुपालन व डेयरी विभाग और राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) के प्रयासों की भी सराहना की.

ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने कहा कि स्थायी ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा देने में पशुधन की महत्वपूर्ण भूमिका है. उन्होंने नवोन्मेषी और किसान केंद्रित कार्यक्रमों के माध्यम से डेयरी और पशुधन क्षेत्रों को आगे बढ़ाने के लिए राज्य की प्रतिबद्धता पर जोर दिया.

इस कार्यक्रम में ओडिशा के वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्री  गणेश राम सिंह खुंटिया, ओडिशा के पशु संसाधन विकास, मत्स्यपालन और एमएसएमई मंत्री  गोकुलानंद मल्लिक, पशुपालन और डेयरी विभाग की सचिव अलका उपाध्याय, पशुपालन और डेयरी विभाग की अतिरिक्त सचिव  वर्षा जोशी, राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के अध्यक्ष मीनेश शाह, ओडिशा के मत्स्यपालन और पशु संसाधन विकास विभाग के प्रधान सचिव सुरेश कुमार वशिष्ठ और अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित थे.

पशुपालन में 40 योजनाओं का शुभारंभ : पशुपालकों को होगा मुनाफा

पुणे : पुणे के जीडी मदुलकर नाट्यगृह में 13 जनवरी, 2025 को उद्यमिता विकास सम्मेलन 2025, जिस का विषय था “उद्यमियों को सशक्त बनाना, पशुधन अर्थव्यवस्था में बदलाव लाना” का आयोजन किया गया.

इस कार्यक्रम का उद्घाटन केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री  राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने राज्य मंत्री एसपी सिंह बघेल और जौर्ज कुरियन के साथ किया.  इस अवसर पर महाराष्ट्र की पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्री  पंकजा मुंडे भी मौजूद थीं.

इस सम्मेलन के दौरान केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने कुल 40 परियोजनाओं का शुभारंभ किया. इन में से 20 परियोजनाएं राष्ट्रीय पशुधन मिशन और 20 परियोजनाएं पशुपालन अवसंरचना विकास निधि के तहत शामिल हैं.

इस सम्मेलन में आए मंत्रियों ने प्रदर्शनी स्टालों का दौरा किया, उद्यमियों से बातचीत की और उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले राज्यों को सम्मानित किया गया. पशुपालन अवसंरचना विकास निधि के लिए महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु और उद्यमिता कार्यक्रम के लिए कर्नाटक, तेलंगाना और मध्य प्रदेश राज्यों को सम्मानित किया गया. साथ ही, कैनरा बैंक, भारतीय स्टेट बैंक और एचडीएफसी जैसे बैंकों को इन योजनाओं के तहत क्रेडिट सहायता के लिए भी सम्मानित किया गया.

मंत्रियों ने पशुपालन अवसंरचना विकास निधि और राष्ट्रीय पशुधन मिशन लाभार्थियों की सफलता की कहानियों पर प्रकाश डालने वाले 2 संग्रहों का अनावरण किया. राष्ट्रीय पशुधन मिशन 2.0 का शुभारंभ किया और राष्ट्रीय पशुधन मिशन योजना के लिए एक निगरानी डैशबोर्ड भी लौंच किया गया.

इस के अतिरिक्त पशुपालन और डेयरी विभाग ने 14 जनवरी से 13 फरवरी, 2025 तक “पशुपालन और पशु कल्याण माह” घोषित किया, जिस के दौरान देशभर में जागरूकता अभियान और शैक्षिक गतिविधियां आयोजित की जाएंगी.

केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने पंकजा मुंडे और महाराष्ट्र सरकार को इस सम्मलेन की मेजबानी के लिए धन्यवाद किया. उन्होंने ग्रामीण आर्थिक विकास में पशुपालन की भूमिका, “एफएमडीमुक्त भारत”  को प्राप्त करने के लिए एफएमडी टीकाकरण कार्यक्रमों की आवश्यकता और महाराष्ट्र सहित 9 एफएमडीमुक्त क्षेत्रों के बनाने पर जोर दिया.

उन्होंने  सरकारी उद्यमिता कार्यक्रमों में अधिक से अधिक भागीदारी को प्रोत्साहित किया और बैंकों से किसानों व महिला उद्यमियों का समर्थन करने के लिए लोन प्रक्रियाओं को आसान बनाने का निवेदन किया.

उन्होंने आगे बताया कि 24 जून, 2020 को ‘आत्मनिर्भर भारत’ पैकेज के तहत शुरू किया गया पशुपालन अवसंरचना विकास निधि 17,296 करोड़ रुपए की धनराशि के साथ  डेयरी प्रसंस्करण, मांस प्रसंस्करण, चारा उत्पादन और पशु चिकित्सा के बुनियादी ढांचे में परियोजनाओं को बढ़ावा दे रहा है, जिसे अब अतिरिक्त वित्त पोषण और विस्तारित लाभों के साथ बढ़ाया गया है. अब तक 10,356.90 करोड़ रुपए की लागत वाली 362 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है, जिस में 247.69 करोड़ रुपए ब्याज सब्सिडी जारी की गई है.

केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने बताया कि साल 2021 में शुरू की गई पुनर्गठित राष्ट्रीय पशुधन मिशन योजना के तहत राष्ट्रीय पशुधन मिशन- उद्यमिता विकास कार्यक्रम गतिविधि मुरगीपालन, भेड़, बकरी, सूअर, ऊंट और अन्य पशुधन के साथसाथ चारा उत्पादन और ग्रेडिंग बुनियादी ढांचे में परियोजनाओं के लिए 50 फीसदी पूंजी सब्सिडी (50 लाख रुपए तक) प्रदान करती है. अब तक 2,182.52 करोड़ रुपए की कुल लागत वाली 3,010 परियोजनाओं को 1,005.87 करोड़ रुपए की सब्सिडी के साथ मंजूरी दी गई है. यह योजना आनुवंशिक विकास कार्यक्रम, चारा एवं खाद्य पहल और राज्य वर्गीकरण के आधार पर प्रीमियम सब्सिडी के साथ पशुधन बीमा भी प्रदान करती है.

महाराष्ट्र की पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्री पंकजा मुंडे ने इस क्षेत्र के विकास, उत्पादकता वृद्धि के लिए उद्यमिता के महत्व पर जोर दिया और बैंकों से किसानों के लिए लोन प्रक्रिया को सरल बनाने का अनुरोध किया.

राज्य मंत्री जौर्ज कुरियन ने पुणे की एक शैक्षणिक केंद्र के रूप में प्रशंसा की और पशुपालन अवसंरचना विकास निधि  और राष्ट्रीय पशुधन मिशन के माध्यम से 15,000 से अधिक नौकरियों का सृजन होगा, इस की भी जानकारी दी.

मंत्री एसपी सिंह बघेल ने पारंपरिक प्रथाओं की तुलना में नवीन पशुपालन तकनीकों को अपनाने की वकालत की और सटीक पशुधन गणना और बेहतर प्रजनन प्रथाओं के महत्व पर बल दिया.

कार्यक्रम की शुरुआत भारत सरकार की सचिव अलका उपाध्याय के भाषण से हुई, जिन्होंने पशुपालन को “उदयशील क्षेत्र” बताया, जिस में निवेश की अपार संभावनाएं हैं. उन्होंने लंपी स्किन डिजीज के लिए वैक्सीन बनाने के महाराष्ट्र के प्रयासों की सराहना की और निजी क्षेत्र के निवेश, प्रयोगशाला मान्यता और उत्पादकता बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया.

इस सम्मलेन में गोसेवा आयोग के अध्यक्ष शेखर मुंदड़ा और कई सांसदों व परिषद के सदस्यों सहित कई प्रमुख व्यक्तियों ने भी भाग लिया. सम्मेलन में 2 तकनीकी सत्र हुए, ‘पशुधन क्षेत्र  विकास को गति देना: उद्यमिता, प्रसंस्करण और अवसर’ और ‘पशुधन क्षेत्र और लोन सुविधा में बैंकों और एमएसएमई की भूमिका’, जहां विशेषज्ञों ने निवेश और उद्यमिता के अवसरों पर चर्चा की.

पशुओं की वैक्सीन नवाचार (Innovation) पर हुआ सम्मेलन

हैदराबाद : मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के तहत पशुपालन और डेयरी विभाग ने इंडियन इम्यूनोलौजिकल्स लिमिटेड और राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) के सहयोग से पिछले दिनों हैदराबाद में “महामारी की तैयारी और वैक्सीन नवाचार पर सम्मेलन” का आयोजन किया.

इस सम्मेलन का उद्घाटन मुख्य अतिथि के रूप में नीति आयोग के सदस्य स्वास्थ्य प्रो. डा. विनोद के. पौल ने किया. इस अवसर पर उन्होंने कहा कि भविष्य की महामारियों से अच्छी तरीके से निबटने के लिए हमें पशु चिकित्सा के बुनियादी ढांचे को और अधिक मजबूत करने की आवश्यकता है.

उन्होंने आगे यह भी कहा कि इस में उभरती बीमारियों का शीघ्र पता लगाने और तेजी से प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने के लिए नैदानिक सुविधाओं को बढ़ाना शामिल है. अगली पीढ़ी के पशु टीकों के विकास और उत्पादन के लिए उन्नत प्लेटफार्मों की स्थापना के महत्व पर भी उन्होंने जोर दिया, जो कि जूनोटिक रोगों के फैलाव को रोकने, पशु और इनसानी सेहत दोनों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं.

इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि इन महत्वपूर्ण घटकों को मजबूत करने के पीछे ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण के तहत एक लचीला स्वास्थ्य देखभाल ढांचा बनाने के बड़े लक्ष्य के साथ मिल कर चलना है.

पशुपालन एवं डेयरी विभाग की सचिव अलका उपाध्याय ने कहा कि सरकार को बेहतर उत्पादकता के लिए पशु स्वास्थ्य पर अधिक खर्च करने की आवश्यकता है और अंतिम छोर तक डिलीवरी को प्रभावी बनाने के लिए आपूर्ति श्रंखला और कोल्ड चेन प्रणालियों में भी सुधार करने की जरूरत है.

पशुपालन आयुक्त डा. अभिजीत मित्रा ने पशुओं के लिए टीकों की सुरक्षा और पूर्वयोग्यता सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया.

इस सम्मलेन का उद्देश्य ‘वन हेल्थ’ के विभिन्न पहलुओं की समझ को बढ़ावा देना था, जिस में टीकाकरण कार्यक्रमों को बढ़ाने, पशुधन के स्वास्थ्य में सुधार, महामारी की तैयारी के लिए लचीली आपूर्ति श्रंखलाओं को बनाना, महामारी प्रतिक्रियाओं को मजबूत करना, रोग निगरानी को आगे बढ़ाना और टीका परीक्षण को सुव्यवस्थित करना, स्वास्थ्य सेवा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता को बढ़ावा देना, कोशिका और जीन थेरेपी टीकों और अनुमोदन के लिए नियामक मार्गों पर ध्यान केंद्रित करना शामिल था.

इस कार्यक्रम में पशुपालन एवं डेयरी विभाग के संयुक्त सचिव रमाशंकर सिन्हा, इंडियन इम्यूनोलौजिकल्स लिमिटेड के प्रबंध निदेशक डा. के. आनंद कुमार, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण के सदस्य सचिव डा. संजय शुक्ला, निवेदी के निदेशक डा. बीआर गुलाटी सहित स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के विशेषज्ञ, वैक्सीन उद्योग, सीडीएससीओ आदि के सदस्य भी उपस्थित थे.

भारत : वैश्विक वैक्सीन हब

भारत को वैश्विक टीकाकरण केंद्र के रूप में जाना जाता है, जिस में 60 फीसदी  से अधिक टीके भारत में बनते हैं और 50 फीसदी  से अधिक टीका निर्माता हैदराबाद से टीकों का उत्पादन  करते हैं.

पशुपालन एवं डेयरी विभाग, केंद्र सरकार से सौ फीसदी वित्तीय सहायता के साथ पशुधन में दुनिया का सब से बड़ा टीकाकरण कार्यक्रम लागू कर रहा है, जिस में खुरपकामुंहपका रोग के 102 करोड़ टीकाकरण किए गए. वहीं ब्रुसेलोसिस के 4.23 करोड़ टीकाकरण किए गए.

दूसरी ओर, पेस्ट डेस पेटिट्स रूमिनेंट्स यानी पीपीआर के 17.3 करोड़ टीकाकरण किए गए, क्लासिकल स्वाइन फीवर के 0.59 करोड़ टीकाकरण किए गए और लंपी स्किन डिजीज के 26.38 करोड़ टीकाकरण किए गए के लिए साझा पैटर्न शामिल हैं, जिस के तहत प्रत्येक पशु को भारत पशुधन यानी राष्ट्रीय डिजिटल पशुधन मिशन में दर्ज एक विशिष्ट पहचान संख्या प्राप्त होती है, जो टीकाकरण कार्यक्रम पर नजर रखती है और पता लगाने की क्षमता सुनिश्चित करती है. इस तरह के टीकाकरण कार्यक्रमों से देश में प्रमुख पशु रोगों की घटनाओं में काफी कमी आई है.

पशुओं के लिए बरसीम एक पौष्टिक दलहनी चारा (Pulse Fodder)

बरसीम हरे चारे की एक आदर्श फसल है. यह खेत को अधिक उपजाऊ बनाती है. इसे भूसे के साथ मिला कर खिलाने से पशु के निर्वाहक एवं उत्पादन दोनों प्रकार के आहारों में प्रयोग किया जा सकता है.

बरसीम शीतोष्ण जलवायु वाले भागों में उगाई जाने वाली फसल है. अधिक ठंड व पाले से इस के उत्पादन में कमी हो जाती है. बोआई के समय तापमान 25-30 डिगरी सैंटीग्रेड और वानस्पतिक बढ़ोतरी के लिए 15-25 डिगरी सैंटीग्रेड सही रहता है.

भूमि

बरसीम एक दलहनी फसल है, इसलिए इस की जड़ों में सूक्ष्म जीवाणु पाए जाते हैं. हर एक अवस्था में इन जड़ग्रंथियों में रह रहे जीवाणुओं का जिंदा रहना फसल की बढ़वार के लिए बेहद जरूरी है, इसलिए बरसीम की खेती के लिए भूमि में उचित जल निकासी और अच्छा मृदा वायु का संचार होना चाहिए.

इस की खेती सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन भारी दोमद मिट्टी, जिस में पानी सोखने की क्षमता अधिक होती है, इस फसल के लिए अधिक लाभदायक है. बरसीम की खेती सामान्य मिट्टी से ले कर क्षारीय मिट्टी तक में अच्छी तरह से उगाई जा सकती है, लेकिन अम्लीय मिट्टी इस की खेती के लिए अच्छी नहीं होती है.

उन्नतशील प्रजातियां

बरसीम में गुणसूत्र के आधार पर 2 तरह की प्रजातियां द्विगुणित और चतुर्गुणित पाई जाती हैं. द्विगुणित प्रजातियां मिसकावी, वरदान, बरसीम लुधियाना-1 हैं, वहीं चतुर्गुणित प्रजातियों में पूसा जौइंट, टाइप-526, 678, 780 हैं.

खेत की तैयारी

एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने के बाद 4-5 बार हैरो या देशी हल लगा कर पाटा से खेत को समतल कर लेना चाहिए. साथ ही, जरूरत के मुताबिक समान सिंचाई के लिए क्यारियां भी बना लेनी चाहिए.

बोआई की विधि

आमतौर पर बरसीम की बोआई की 2 प्रमुख विधियां हैं :

पानी भरे खेत में बोआई : पानी भरे खेत में पटेला चला कर पानी गंदला करने के बाद छिटकवां विधि से बोआई की जाती है. इस विधि में खेत की तैयारी धान में पौध रोपण करने की तरह से ही की जाती है.

गंदले पानी में बोआई करने से मिट्टी की एक हलकी परत बीजों के ऊपर चढ़ जाती है, जिस से वे ढंक जाते हैं और उन्हें चिडि़या या दूसरे पक्षी नहीं खा पाते और पर्याप्त नमी होने के कारण बीज का अंकुरण भी बहुत अच्छा होता है.

सूखे खेत में बोआई : इस विधि में अच्छी प्रकार की भुरभुरी मिट्टी तैयार कर समतल किए गए खेत में पहले ही सिंचाई के लिए क्यारियां बना कर बोआई छिटकवां विधि द्वारा या लाइन में देशी हल की सहायता से की जाती है.

लाइन में बोआई करने पर लाइन से लाइन की दूरी 15-20 सैंटीमीटर रखनी चाहिए और बीज की गहराई 15-20 सैंटीमीटर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. साथ ही, अंकुरण के लिए पर्याप्त नमी बनाए रखने के लिए बोआई के तुरंत बाद खेत में पानी लगा दिया जाना चाहिए.

बीज दर

द्विगुणित किस्मों के बीजों की दर 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर और चतुर्गुणित किस्मों के बीजों का आकार में बड़ा होने के कारण 30-40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर होती है.

बीजोपचार

बरसीम के बीज में आमतौर पर कासनी का बीज मिला रहता है. बीज को 5 फीसदी नमक के घोल में डुबो कर इसे अलग कर लें (कासनी का बीज पानी के ऊपर आ जाता है). बीज का उपचार दलहनी फसल होने के कारण राइजोबियम कल्चर से होना बहुत जरूरी है.

बरसीम में राइजोबियम ट्राईफोली नामक बैक्टीरिया का कल्चर में इस्तेमाल किया जाता है. इस के प्रयोग से पौधों में अच्छी प्रकार से जड़गांठों में मौजूद बैक्टीरिया हवा से नाइट्रोजन प्राप्त करते हैं.

कल्चर प्रयोग के लिए सब से पहले 100 ग्राम गुड़ को 1 लिटर पानी में उबाल कर ठंडा कर लें. उस के बाद इस में राइजोबियम कल्चर को घोल कर फिर बीज के बराबर मात्रा में भुरभुरी मिट्टी ले कर धीरेधीरे छिड़क कर इस प्रकार मिलाएं कि मिट्टी के ढेले न बनें.

इस संवर्धित घोल से तैयार की गई कल्चरयुक्त मिट्टी को 24 घंटे भिगोए गए बीज के साथ मिला कर बोआई के लिए प्रयोग कर सकते हैं.

ध्यान रखने वाली बात यह है कि कल्चर बीज को 24 घंटे से अधिक नहीं रखना चाहिए, क्योंकि फिर बैक्टीरिया नष्ट होने लगते हैं.

उर्वरक

बरसीम दलहनी फसल होने के कारण इस की जड़ों में राइजोबियम बैक्टीरिया होते हैं, जो खुद हवा से नाइट्रोजन लेते हैं, इसलिए फसल को बाहर से कम नाइट्रोजन देने की जरूरत पड़ती है.

उन्नत फसल के उत्पादन के लिए 25-30 किलोग्राम नाइट्रोजन और 50-60 किलोग्राम फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की जरूरत पड़ती है. अधिक उपज लेने के लिए हर एक कटाई के बाद पानी लगा कर 5-6 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से यूरिया का छिड़काव करना चाहिए. साथ ही, लक्षण दिखाई पड़ने पर सूक्ष्म तत्त्वों का प्रयोग करना लाभकारी होता है.

सिंचाई

बरसीम ठंडे मौसम में (मार्च माह तक) 15-20 दिन के अंतर पर सिंचाई की जरूरत पड़ती है. हर एक कटाई के बाद हलका पानी लगा देने से उत्पादन में बढ़ोतरी होती है.

फसल चक्र

खरीफ की फसल के बाद रबी के मौसम में बरसीम की खेती आसानी से की जा सकती है. बरसीम की खेती से अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए निम्न प्रकार से फसल चक्र अपनाने पर मिट्टी की गुणवत्ता में बढ़ोतरी के साथसाथ अधिक आय भी प्राप्त की जा सकती है.

फसल सुरक्षा

चारे की फसल होने के कारण चूंकि बारबार कटाई की जाती है, इसलिए रोग और कीड़ों का प्रकोप आमतौर पर दिखाई नहीं पड़ता है. इसलिए फसल सुरक्षा के उपायों की जरूरत पड़ती है.

परंतु रोग प्रतिरोधी किस्म की प्रजातियां बोने से जड़ गलन और गेरुई जैसे रोगों की संभावना नहीं रहती है, इसलिए बोआई के लिए उन्नतशील रोगरोधी प्रजातियों को बोएं.

कटाई

पहली कटाई बोआई के 50-60 दिन बाद करनी चाहिए. इस के बाद 30-35 दिन के अंतराल पर 5-6 कटाई की जाती है. कटाई हमेशा जमीन से 6-10 सैंटीमीटर की ऊंचाई से काटी जानी चाहिए, जिस से पौधे की दोबारा वृद्धि में भाग लेने वाली कलिकाओं को नुकसान न पहुंचे.

उपज

बरसीम से चारे की कुल उपज 1,000-1,200 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर मिलती है. वहीं दूसरी ओर पशुपालकों को यह सलाह दी जाती है कि बरसीम अधिक खिलाने से पशुओं में अफरा रोग हो जाता है, इसलिए इसे सूखे चारे के साथ मिला कर खिलाएं.

बरसीम सर्दी के मौसम में पौष्टिक चारे का एक उत्तम स्रोत है. इस में रेशे की मात्रा कम और प्रोटीन की औसत मात्रा 20 से 22 फीसदी होती है. चारे की पाचनशीलता 70-75 फीसदी होती है.

इस के अलावा इस में कैल्शियम और फास्फोरस भी काफी मात्रा में पाए जाते हैं, जिस के कारण दुधारू पशुओं को अलग से खली या दाना आदि देने की जरूरत कम पड़ती है.

बरसीम पशुओं के लिए बहुत ही लोकप्रिय चारा है, क्योंकि यह बेहद पौष्टिक एवं स्वादिष्ठ होता है.

दुधारू पशुओं की प्रमुख बीमारियां और उन का उपचार

दुधारू पशुओं में अनेक कारणों से बहुत सी बीमारियां होती हैं. सूक्ष्म विषाणु, जीवाणु, फफूंदी, अंत: व बाह्य परजीवी, प्रोटोजोआ, कुपोषण और शरीर के अंदर की चयापचय (मैटाबोलिज्म) क्रिया में विकार आदि. इन बीमारियों में बहुत सी जानलेवा हैं और कई बीमारियां तो पशु के दूध देने की क्षमता पर बुरा असर डालती “हैं.

कुछ बीमारियां तो एक पशु से दूसरे पशु को लग जाती हैं, इसलिए सावधान रहने की जरूरत है जैसे मुंहपका व खुरपका की बीमारी, गलघोंटू आदि को ‘छूतदार बीमारी’ कहते हैं.

यहां तक कि कुछ बीमारियां पशुओं से इनसानों में भी आ जाती हैं जैसे रेबीज, क्षय यानी टीबी की बीमारी. इन्हें ‘जुनोटिक बीमारी’ कहते हैं.

ऐसे में पशुपालकों को इन प्रमुख बीमारियों के बारे में जानना बेहद जरूरी है, ताकि उचित समय पर सही कदम उठा कर अपना माली नुकसान होने से बचा जा सके और इनसान की सेहत को ठीक बनाए रखने में भी सहयोग कर सके.

विषाणुजनित बीमारी खुरपका व मुंहपका

यह सूक्ष्म विषाणु यानी वायरस से पैदा होने वाली बीमारी को विभिन्न जगहों पर विभिन्न स्थानीय नामों से जाना जाता है, जैसे खरेडू, मुंहपका, खुरपका, चपका, खुरपा वगैरह. यह बहुत तेजी से फैलने वाली ‘छूतदार बीमारी’ है, जो कि गाय, भैंस, भेड़, बकरी, ऊंट, सूअर आदि पशुओं में होती है.

विदेशी और संकर नस्ल की गायों में यह बीमारी अधिक गंभीर रूप से पाई जाती है. हमारे देश में यह बीमारी हर जगह होती है. इस बीमारी से ग्रसित पशु ठीक हो कर बहुत ही कमजोर हो जाते हैं. इस वजह से दुधारू पशुओं में दूध का उत्पादन बहुत ही कम हो जाता है. यहां तक कि बैल भी काफी समय तक काम करने योग्य नहीं रहते. पशु शरीर पर बालों का कवर खुरदरा और खुर कुरूप हो जाते हैं.

वजह

मुंहपका व खुरपका बीमारी एक अत्यंत सूक्ष्ण विषाणु, जिस के अनेक प्रकार और उपप्रकार हैं, से होती है. इन की प्रमुख किस्मों में ओ, ए, सी, एशिया-1, एशिया-2, एशिया-3, सैट-1, सैट-3 और इन की 14 उपकिस्में शामिल हैं.

हमारे देश में यह बीमारी मुख्यत: ओ, ए, सी और एशिया-1 प्रकार के विषाणुओं द्वारा होती है. नम वातावरण, पशु की अंदरूनी कमजोरी, पशुओं और लोगों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर आनाजाना और नजदीकी क्षेत्र में बीमारी का प्रकोप ही इस बीमारी को फैलाने में सहायक कारक हैं.

संक्रमण से फैलती है बीमारी

यह बीमारी बीमार पशु के सीधे संपर्क में आने, पानी, घास, दाना, बरतन, दूध निकालने वाले व्यक्ति के हाथों से, हवा से और लोगों के आनेजाने से फैलती है.

इस के विषाणु बीमार पशु की लार, मुंह, खुर व थनों में पड़े फफोलों में बहुत अधिक संख्या में पाए जाते हैं. ये खुले में घास, चारा व फर्श पर 4 महीनों तक जीवित रह सकते हैं, लेकिन गरमी के मौसम में ये बहुत जल्दी नष्ट हो जाते हैं.

ये विषाणु जीभ, मुंह, आंत, खुरों के बीच की जगह, थनों व घाव आदि के द्वारा स्वस्थ पशु के खून में पहुंचते हैं और तकरीबन 5 दिनों के अंदर उस में बीमारी के लक्षण पैदा करते हैं.

लक्षण

इस बीमारी से ग्रसित पशु को 104-106 डिगरी फारेनहाइट तक बुखार हो जाता है. वह खानापीना व जुगाली करना बंद कर देता है. इस वजह से पशुओं का दूध देना कम हो जाता है, मुंह से लार गिरने लगती है और मुंह हिलाने पर चपचप की आवाज आती है. इसी कारण इसे ‘चपका बीमारी’ भी कहते हैं.

बुखार के बाद पशु के मुंह के अंदर, गालों, जीभ, होंठ, तालू व मसूड़ों के अंदर, खुरों के बीच और कभीकभी थनों पर छाले पड़ जाते हैं. ये छाले फटने के बाद घाव का रूप ले लेते हैं, जिस से पशु को बहुत दर्द होने लगता है. मुंह में घाव व दर्द के कारण पशु खापी नहीं पाता है. इस के चलते वह बहुत कमजोर हो जाता है. खुरों में दर्द के कारण पशु लंगड़ा कर चलने लगता है. गर्भवती मादा में कई बार गर्भपात भी हो जाता है.

नवजात बछड़े व बछिया बिना किसी प्रकार के लक्षण दिखाए मर जाते हैं. कई बार लापरवाही बरतने पर पशु के खुरों में कीड़े पड़ जाते हैं और कई बार खुरों के कवच भी निकल जाते हैं.

हालांकि व्यस्क पशु में मृत्युदर कम (तकरीबन 10 फीसदी) है, लेकिन इस बीमारी से पशुपालक को माली नुकसान बहुत ज्यादा उठाना पड़ता है. दूध देने वाले पशु बीमारी में कम दूध देते हैं. ठीक हुए पशुओं का शरीर खुरदरा और उन में कभीकभी हांफना शुरू हो जाता है. बैलों में भी भारी काम करने की क्षमता खत्म हो जाती है.

उपचार

इस बीमारी का कोई निश्चित उपचार नहीं है, लेकिन बीमारी की गंभीरता को कम करने के लिए लक्षणों के आधार पर पशु का उपचार किया जाता है.

बीमार पशु में सैकंडरी संक्रमण को रोकने के लिए उसे पशु चिकित्सक की सलाह पर एंटीबायोटिक के टीके लगाए जाते हैं. मुंह व खुरों के घावों को फिटकरी या पोटाश के पानी से धोते हैं. मुंह में बोरोग्लिसरीन व खुरों में किसी एंटीसैप्टिक लोशन या क्रीम का प्रयोग किया जा सकता है.

बीमारी से बचाव

* बचाव के लिए पशुओं को पौलीवेलेंट वैक्सीन के साल में 2 बार टीके अवश्य लगवाने चाहिए. बछड़े व बछिया में पहला टीका 1 माह की उम्र में, दूसरा टीका तीसरे माह की उम्र में और तीसरा 6 माह की उम्र में और उस के बाद नियमित सारिणी के अनुसार टीका लगाया जाना चाहिए.

* बीमार होने पर पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग कर देना चाहिए.

* बीमार पशु की देखभाल करने वाले व्यक्ति को भी स्वस्थ पशुओं के बाड़े से दूर रहना चाहिए.

* बीमार पशु के आनेजाने पर रोक लगा देनी चाहिए.

* बीमारी से प्रभावित क्षेत्र से पशु नहीं खरीदना चाहिए.

* पशुशाला को बहुत ही साफसुथरा रखना चाहिए.

* इस बीमारी से मरे पशु को खुला न छोड़ें और उसे जमीन में गाड़ देना चाहिए.

पशु प्लेग (रिंडरपेस्ट)

यह बीमारी भी एक विषाणु से पैदा होने वाली छूतदार बीमारी है, जो कि जुगाली करने वाले तकरीबन सभी पशुओं को होती है. इन में पशु को दस्त अथवा पेचिश लग जाती है.

यह बीमारी स्वस्थ पशु को बीमार पशु के सीधे संपर्क में आने से फैलती है. इस के अलावा बरतनों और देखभाल करने वाले व्यक्ति द्वारा भी यह बीमारी फैल सकती है.

इस में पशु को तेज बुखार हो जाता है और वह बेचैन हो जाता है. उस की आंखें सुर्ख लाल हो जाती हैं. पशु दूध देना कम कर देता है.

2-3 दिन बाद पशु के मुंह, होंठ, मसूड़े व जीभ के नीचे दाने निकल आते हैं, जो बाद में घाव का रूप ले लेते हैं. पशु के मुंह से लार निकलने लगती है और उसे पतले व बदबूदार दस्त लग जाते हैं, जिन में खून भी आने लगता है.

इस बीमारी में पशु के शरीर में पानी की बेहद कमी हो जाती है. इस वजह से वह बहुत कमजोर हो जाता है. यहां तक कि अगर समय रहते इलाज न मिले, तो पशु की 3-9 दिनों में मौत हो जाती है.

इस बीमारी के प्रकोप से दुनियाभर में लाखों की तादाद में पशु मरते हैं, लेकिन अब विश्वस्तर पर इस बीमारी के उन्मूलन की योजना के तहत भारत सरकार द्वारा लागू की गई रिंडरपेस्ट इरेडिकेशन परियोजना के तहत रोग निरोधक टीकों के लगातार प्रयोग से यह बीमारी प्रदेश और देश में तकरीबन खत्म सी हो चुकी है.

दुधारू पशु (dairy animal)पशुओं में पागलपन (रेबीज)

इस बीमारी को पैदा करने वाले सूक्ष्म विषाणु कुत्ते, बिल्ली, बंदर, गीदड़, लोमड़ी या नेवले के काटने से स्वस्थ पशु के शरीर में प्रवेश करते हैं और नाडि़यों के द्वारा दिमाग में पहुंच कर उस में बीमारी के लक्षण पैदा करते हैं.

बीमारी से ग्रसित पशु की लार में यह विषाणु बहुतायत में होते हैं. बीमार पशु द्वारा दूसरे पशु को काट लेने अथवा शरीर में पहले से मौजूद किसी घाव के ऊपर रोगी की लार लग जाने से यह बीमारी फैल सकती है.

यह बीमारी रोगग्रस्त पशुओं से मनुष्यों में भी आ सकती है, इसलिए इस बीमारी के प्रति सावधान रहने की जरूरत है. एक बार पशु अथवा मनुष्य में इस बीमारी के लक्षण पैदा होने के बाद उस का फिर कोई इलाज नहीं है और उस की मृत्यु निश्चित है.

विषाणु के शरीर में घाव आदि के माध्यम से प्रवेश करने के बाद 10 दिन से 210 दिनों तक की अवधि में यह बीमारी हो सकती है. मस्तिष्क के जितना अधिक नजदीक घाव होता है, उतनी ही जल्दी बीमारी के लक्षण पशु में पैदा हो जाते हैं. जैसे सिर अथवा चेहरे पर काटे गए पशु में एक हफ्ते के बाद यह बीमारी पैदा हो सकती है.

लक्षण

रेबीज आमतौर पर 2 रूपों में देखी जाती है. पहला, जिस में बीमारी से ग्रसित पशु काफी भयानक हो जाता है और दूसरा, जिस में वह बिलकुल शांत रहता है. पहले अथवा उग्र रूप में पशु में बीमारी के सभी लक्षण स्पष्ट दिखाई देते हैं, लेकिन शांत रूप में बीमारी के लक्षण बहुत कम अथवा नहीं के बराबर होते हैं.

कुत्तों में इस बीमारी की शुरुआती अवस्था में व्यवहार में परिवर्तन हो जाता है और उस की आंखें अधिक तेज नजर आती हैं. कभीकभी शरीर का तापमान भी बढ़ जाता है. 2-3 दिन के बाद उस की बेचैनी बढ़ जाती है और उस में बहुत ज्यादा चिड़चिड़ापन आ जाता है. वह काल्पनिक वस्तुओं की ओर अथवा बिना किसी प्रयोजन के इधरउधर काफी तेजी से दौड़ने लगता है और रास्ते में जो भी मिलता है, उसे काट लेता है.

अंतिम अवस्था में पशु के गले में लकवा हो जाने के कारण उस की आवाज बदल जाती है, शरीर में कंपकंपी, चाल में लड़खड़ाहट आ जाती है और वह लकवाग्रस्त हो कर अचेतन अवस्था में पड़ा रहता है. इसी अवस्था में उस की मौत हो जाती है.

गाय व भैंसों में इस बीमारी के गंभीर लक्षण दिखते हैं. पशु काफी उत्तेजित अवस्था में दिखता है और वह बहुत तेजी से भागने की कोशिश करता है. वह जोरजोर से रंभाने लगता है और बीचबीच में जम्हाइयां लेता हुआ दिखाई देता है. वह अपने सिर को किसी पेड़ अथवा दीवार के साथ टकराता है. कई पशुओं में पागलपन के लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं. बीमारी से ग्रसित पशु दुर्बल हो जाता है और उस की मौत हो जाती है.

मनुष्य में इस बीमारी के प्रमुख लक्षणों में उत्तेजित होना, पानी अथवा कोई खाने की चीज को निगलने में काफी तकलीफ महसूस करना और आखिर में लकवा होना आदि है.

उपचार व रोकथाम

एक बार लक्षण पैदा हो जाने के बाद इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है. जैसे ही किसी स्वस्थ पशु को इस बीमारी से ग्रसित पशु काट लेता है, उसे तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सालय में ले जा कर इस बीमारी से बचाव का टीका लगवाएं. इस काम में लापरवाही बिलकुल नहीं बरतनी चाहिए, क्योंकि ये टीके तब तक ही प्रभावकारी हो सकते हैं, जब तक कि पशु में बीमारी के लक्षण पैदा नहीं होते.

पालतू कुत्तों को इस बीमारी से बचाने के लिए नियमित रूप से टीके लगवाने चाहिए. साथ ही, आवारा कुत्तों को समाप्त कर देना चाहिए. पालतू कुत्तों का पंजीकरण स्थानीय संस्थाओं द्वारा करवाना चाहिए और उन के नियमित टीकाकरण की जिम्मेदारी पशु मालिक को निभानी चाहिए.

जीवाणुजनित बीमारी गलघोंटू

गायभैंसों में होने वाली एक बहुत ही घातक और छूतदार बीमारी है, जो कि अधिकतर बरसात के मौसम में होती है. यह गायों की अपेक्षा भैंसों में अधिक पाई जाती है.

यह बीमारी तेजी से फैल कर बड़ी तादाद मे पशुओं को अपनी चपेट में ले कर उन की मौत का कारण बन जाती है. इस से पशुपालकों को काफी नुकसान उठाना पड़ता है.

इस बीमारी के प्रमुख लक्षणों में तेज बुखार, गले में सूजन, सांस लेने में तकलीफ,  सांस लेते समय तेज आवाज होना आदि शामिल हैं. कई बार बिना किसी स्पष्ट लक्षणों के ही पशु की अचानक मौत हो जाती है.

उपचार व रोकथाम

इस बीमारी से ग्रसित हुए पशु को तुरंत ही पशु चिकित्सक को दिखाना चाहिए, अन्यथा पशु की मौत हो जाती है. सही समय पर उपचार दिए जाने पर इस बीमारी से ग्रसित पशु को बचाया जा सकता है.

इस बीमारी की रोकथाम करने के लिए रोगनिरोधक टीके लगाए जाते हैं. पहला टीका 3 माह की उम्र में, दूसरा टीका 9 माह की उम्र में और इस के बाद हर साल यह टीका लगाया जाता है. ये टीके पशु चिकित्सा संस्थानों में मुफ्त में लगाए जाते हैं.

लंगड़ा बुखार

जीवाणुओं से फैलने वाली यह बीमारी गायभैंसों दोनों को होती है, लेकिन गायों में यह बीमारी अधिक देखी जाती है. इस से अच्छे व स्वस्थ पशु ही ज्यादातर प्रभावित होते हैं.

इस बीमारी में पिछली अथवा अगली टांगों के ऊपरी भाग में भारी सूजन आ जाती है, जिस से पशु लंगड़ा कर चलने लगता है या फिर बैठ जाता है. पशु को तेज बुखार हो जाता है और सूजन वाली जगह को दबाने पर कड़कड़ की आवाज आती है.

उपचार व रोकथाम

बीमारी से ग्रसित पशु के उपचार के लिए तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सालय में संपर्क करना चाहिए, ताकि पशु को शीघ्र उचित उपचार मिल सके. देर करने से पशु का बचना लगभग असंभव हो जाता है, क्योंकि जीवाणुओं द्वारा पैदा हुआ जहर शरीर में पूरी तरह से फैल जाता है और पशु मर जाता है.

उपचार के लिए पशु को ऊंची डोज में प्रोकेन पेनिसिलीन के टीके लगाए जाते हैं और सूजन वाली जगह पर भी इसी दवा को सूई द्वारा मांस में डाला जाता है.

इस बीमारी से बचाव के लिए पशु चिकित्सक संस्थाओं में रोग निरोधक टीके मुफ्त में लगाए जाते हैं, इसलिए पशुपालकों को इस सुविधा का अवश्य लाभ उठाना चाहिए.

दुधारू पशु (dairy animal)

पशुओं का छूतदार गर्भपात

जीवाणुजनित इस बीमारी में गायभैंसों में गर्भावस्था के अंतिम 3 माह में गर्भपात हो जाता है. यह बीमारी पशुओं से मनुष्यों में भी आ सकती है. मनुष्यों में यह उतारचढ़ाव वाला बुखार ‘एजोलेंट फीवर’ नामक बीमारी पैदा करता है.

पशुओं में गर्भपात से पहले अंग से अपारदर्शी पदार्थ निकलता है और गर्भपात के बाद पशु की जेर रुक जाती है. इस के अलावा यह जोड़ों में सूजन यानी अर्थराइटिस पैदा कर सकता है.

उपचार व रोकथाम

अब तक इस बीमारी का कोई प्रभावी इलाज नहीं है. अगर इलाके में इस बीमारी के 5 फीसदी से अधिक पौजीटिव केस हों, तो बीमारी की रोकथाम करने के लिए बछियों में 3-6 माह की उम्र में ब्रूसेल्ला एबोर्ट्स स्ट्रेन-19 के टीके लगाए जा सकते हैं. पशुओं में प्रजनन की कृत्रिम गर्भाधान पद्धति अपना कर भी इस बीमारी से बचा जा सकता है.

पशुओं के पेशाब में खून आना

यह बीमारी पशुओं में एक कोशिकीय जीव, जिसे प्रोटोजोआ कहते हैं, से होती है. बबेसिया प्रजाति के प्रोटोजोआ पशुओं के रक्त में चिचडि़यों के माध्यम से प्रवेश कर जाते हैं और वे रक्त की लाल रक्त कोशिकाओं में जा कर अपनी संख्या बढ़ाने लगते हैं, जिस के फलस्वरूप लाल रक्त कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं.

लाल रक्त कोशिकाओं में मौजूद हीमोग्लोबिन पेशाब के द्वारा शरीर से बाहर निकलने लगता है, जिस से पेशाब का रंग कौफी के रंग जैसा हो जाता है. कभीकभी उसे खून वाले दस्त भी लग जाते हैं. इस में पशु खून की कमी हो जाने से बहुत कमजोर हो जाता है. पशु में पीलिया के लक्षण भी दिखाई देने लगते हैं और समय पर इलाज न कराया जाए, तो पशु की मौत हो जाती है.

उपचार व रोकथाम

यदि समय पर पशु का इलाज कराया जाए, तो पशु को इस बीमारी से बचाया जा सकता है. इस में बिरेनिल के टीके पशु के भार के अनुसार मांस में दिए जाते हैं और खून बढ़ाने वाली दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है.

इस बीमारी से पशुओं को बचाने के लिए उन्हें चिचडि़यों के प्रकोप से बचाना जरूरी है, क्योंकि यह बीमारी चिचडि़यों के द्वारा ही पशुओं में फैलती है.

पशुओं के शरीर पर जुएं,चिचड़ी व पिस्सू का प्रकोप

पशुओं के शरीर पर बाह्म परजीवी जैसे कि जुएं, पिस्सू या चिचड़ी आदि का प्रकोप होने पर वे पशुओं का खून चूसते हैं, जिस से पशु में खून की कमी हो जाती है और वे कमजोर हो जाते हैं. साथ ही, इन पशुओं की दूध देने की क्षमता भी घट जाती है और वे दूसरी बहुत सी बीमारियों के शिकार हो जाते हैं.

बहुत से परजीवी जैसे कि चिचडि़यों आदि पशुओं में कुछ अन्य बीमारी भी कर देते हैं. पशुओं में बाह्म परजीवी के प्रकोप को रोकने के लिए अनेक दवाएं हैं, जिन्हें पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार प्रयोग कर इन से बचा जा सकता है.

पशुओं में अंत:परजीवी प्रकोप

पशुओं की पाचन नली में भी अनेक प्रकार के परजीवी पाए जाते हैं, जिन्हें अंत:परजीवी कहते हैं. ये पशु के पेट, आंत, लिवर, उस के खून व खुराक पर निर्वाह करते हैं, जिस से पशु कमजोर हो जाता है और वह दूसरी बहुत सी बीमारियों का शिकार हो जाता है. इस से पशु की उत्पादन क्षमता में भी कमी आ जाती है.

पशुओं को उचित आहार देने के बावजूद अगर वे कमजोर दिखाई दें, तो इस के गोबर के नमूनों का पशु चिकित्सालय में परीक्षण करना चाहिए. परजीवी के अंडे गोबर के नमूनों में देख कर पशु को उचित दवा दी जाती है, जिस से परजीवी नष्ट हो जाते हैं.

कृषि विविधीकरण (Agricultural diversification): आमदनी का मजबूत जरीया

लगातार बढ़ रही कृषि उत्पादन लागत एवं जलवायु परिवर्तन को देखते हुए किसानों को चाहिए कि वे कृषि में विविधीकरण अपनाएं, जिस से कि वे टिकाऊ खेती, औद्यानिकीकरण, पशुपालन, दुग्ध व्यवसाय, मधुमक्खीपालन, मुरगीपालन सहित अन्य लाभदायी उद्यम को करते हुए अपने परिवार की आय को बढ़ाने के साथसाथ स्वरोजगार भी कर सकें.

कृषि विविधीकरण का उद्देश्य

कृषि विविधीकरण का उद्देश्य कृषि के साथसाथ वे सभी कामों के करने से है, जिन से पर्यावरण सुरक्षित रहे और किसानों को लाभ  हो. हवा, जमीन, जानवर, जंगल, जो कि हमारी प्राकृतिक संपदाएं हैं, उन में गुणवत्ता बनी रहे और किसान इन से लगातार अच्छा उत्पादन लेते रहें. जैसे कि मिट्टी की सेहत को बनाए रखने के लिए मिट्टी जांच की संस्तुतियों के अनुसार जैविक विधियों से ज्यादा से ज्यादा आवश्यक पोषक तत्त्वों का भूमि में प्रयोग करें, जिस से कि मिट्टी में जीवांश पदार्थ की मात्रा बढ़ सके.

उचित फसल चक्र अपनाएं, कम दिनों की फसलें एवं उन की प्रजातियां उगाएं, आवश्यकतानुसार उचित मात्रा में बौछारी एवं टपक विधि से फसलों की सिंचाई करें. बाजारोन्मुखी औद्यानिक फसलों एवं पौध को पौलीहाउस या शैडनैटहाउस द्वारा समय की मांग के अनुसार उत्पादन करें. साथ ही, उत्पादन में मूल्य संवर्धन कर के बेच कर अधिक लाभ लें.

वर्तमान समय की मांग को देखते हुए शीतकालीन गन्ने के साथसाथ मसूर, चना, दाल वाली मटर, सब्जी की मटर जैसी दलहनी और तिलहन में पीली सरसों का उत्पादन भी करें.

वसंतकालीन गन्ने में अंत:फसली के रूप में लोबिया, उड़द, मूंग भी ले सकते हैं. गन्ने से गुड़, शीरा, सिरका बना कर बेचने से निश्चित रूप से लाभ होता है.

कृषि विविधीकरण (Agricultural diversification)

प्रत्येक किसान के पास गृहवाटिका अवश्य होनी चाहिए, जिस से मौसम के अनुसार लहसुन, प्याज, धनिया, मेथी, मूली, भिंडी, कद्दू, लौकी, पालक, मिर्च, शिमला मिर्च, अदरक, बैगन, टमाटर, सब्जी मटर इत्यादि पैदा करें. फलस्वरूप, गुणवत्तायुक्त ताजी सब्जियों को खाएं, जिस से उन का स्वास्थ्य अच्छा रहे और पैसे की भी बचत हो. केले में धनिया, मेथी, बरसीम की अंत:फसल ले कर प्रति इकाई क्षेत्रफल में अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है.

कृषि से संबंधित अन्य व्यवसाय

शहरीकरण के चलते पशुपालन को बढ़ावा देने की जरूरत है, क्योंकि समय की मांग है कि किसान दूध बेचने के बजाय उस का घी, मक्खन, दही, पनीर, छाछ इत्यादि बना कर बेचें, जिस से कि उन को अधिक लाभ हो व उन्नत नस्ल की भैंस मुर्रा, भदावरी, गाय हरियाणा, साहीवाल, थारपारकर, बकरियों में जमुनापारी एवं बरबरी को पालें.

मछलीपालन के लिए रोहू, कतला, सिल्वर कार्प, ग्रास कार्प और कौमन कार्प का प्रयोग करें. औद्योगिक फसलों में बटन मशरूम का उत्पादन करें, क्योंकि इस का बाजार उपलब्ध है.

आवागमन के अच्छे साधन होने की वजह से गेंदा, गुलाब, जरबेरा, ग्लैडिओलस, रजनीगंधा इत्यादि फूलों की खेती करें एवं इत्र के लिए पामारोजा, लैमनग्रास, गुलाब, खस जैसे सगंधीय पौधों की खेती भी कर सकते हैं.

बैकयार्ड मुरगीपालन भी एक कम लागत का लाभदायी घरेलू उद्यम है. वनराजा, कैरीप्रिया, ग्रामप्रिया, कड़कनाथ की उत्पादन क्षमता अधिक है. इन से तकरीबन 200 अंडे हर साल लिए जा सकते हैं. इन के ब्रायलर 40 दिन पर एक से डेढ़ किलो तक के हो जाते हैं.

मधुमक्खीपालन भी कम लागत का एक अच्छा उद्यम है. 50 बक्सों के साथ यह व्यवसाय शुरू किया जा सकता है, जिस से 5 क्विंटल तक शहद हर साल लिया जा सकता है.

इस के अतिरिक्त बटेरपालन भी एक अच्छा व्यवसाय है. किसान संबंधित विभागों से नियमित संपर्क करते रहें, जिस से कि योजनाओं की समय पर जानकारी ले कर उस का उपयोग कर सकें.