आधुनिक खेती (Modern Farming) की ओर युवा किसान ज्ञान चंद

बलिया जिला मुख्यालय से 64 किलोमीटर व सीयर ब्लौक से 4 किलोमीटर उत्तरपश्चिम दिशा में स्थित पड़री गांव है. इस गांव के युवा किसान ज्ञान चंद शर्मा हैं. इन्होंने स्नातक की तालीम हासिल की है. इस युवा किसान के प्रक्षेत्र का भ्रमण कर उन से चर्चा की.

ज्ञान चंद शर्मा ने बताया कि उन की पुश्तैनी जमीन महज 2 एकड़ है और वे 13 एकड़ जमीन 15,000 रुपए प्रति एकड़ की दर से किराए पर ले कर खेती करते हैं. इसे आम भाषा में ‘पोत’ कहते हैं.

किसान ज्ञान चंद शर्मा के पास आधुनिक कृषि यंत्र जैसे- रोटावेटर, डिस्क हैरो, लेजर लैवलर, गाजर बोने व खोदने का यंत्र, गाजर की सफाई व पानी से धुलाई करने का यंत्र, स्प्रिंकलर सैट, टपक सिंचाई यंत्र आदि की सुविधा है.

खरीफ में बासमती धान, बैगन, टमाटर व खीरा की खेती उन्होंने की थी. वर्तमान में रबी सीजन में सरसों, गेहूं, बैगन आधा एकड़ में, शिमला मिर्च आधा एकड़ में, फैं्रचबीन व टमाटर की भी आधे एकड़ में उन की फसल लहलहा रही है.

Young Farmer

10 एकड़ क्षेत्रफल में लाल गाजर की फसल लगी थी, जिस की खुदाई कर उन्हें बेचा जा चुका है. अभी आधा एकड़ क्षेत्रफल में पीला गाजर तैयार होने की स्थिति में है.

गाजर व अन्य फसलों से खाली हुए खेतों में जायद सीजन के लिए खीरा आधा एकड़ में और तरबूज 10 एकड़ में लगा चुके हैं. जैविक विधि से भी वे कीटों का प्रबंधन करते हैं.

किसान ज्ञान चंद शर्मा ने बताया कि कम से कम 50 एकड़ में इस तरह की खेती करने का लक्ष्य है और अपने बेटे को खेती में स्नातक करा कर नौकरी न करा कर खेती के काम में ही लगाना चाहते हैं.

ऐसी सोच रखने वालों में ये पहले किसान मिले, जो अपने बेटे को खेतीकिसानी में ही पारंगत कराना चाहते हैं. इन के प्रक्षेत्र को देखने के लिए प्रतिदिन बाहर से भी किसान आते रहते हैं. अन्य युवाओं को ऐसे किसानों से प्रेरणा लेनी चाहिए.

अधिक जानकारी के लिए किसान ज्ञान चंद शर्मा के मोबाइल नंबर 9721012998 पर संपर्क कर सकते हैं.

चना फसल की करें सुरक्षा

सीहोर: विगत एक सप्ताह से मौसम में परिवर्तन होने के कारण रबी मौसम की प्रमुख फसलें गेहूं व चना फसल में रोग व कीटों के प्रकोप की पूरी संभावना बनी हुई है. विकसित भारत संकल्प यात्रा के दौरान जिले के विभिन्न गांवों में कृषि विकास विभाग के मैदानी अमले एवं कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों द्वारा किसानों के खेतों का भ्रमण कर के फसलों में आने वाली समस्याओं से रूबरू कराते हुए उन के बेहतर उपायों से किसानों को अवगत कराया जा रहा है.

उपसंचालक, कृषि एवं कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक द्वारा बताया गया कि चना फसल वर्तमान समय में पुष्पन, फलन वाली अवस्था पर है. इस अवस्था में मौसम में परिवर्तन जैसे दिन में न्यूनतम तापमान, हलकी बारिश होने के कारण पौधों में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया सुचारु रूप से न होने के चलते चना फसल में पुष्पन प्रभावित होने के साथसाथ फसल के पुष्प भी पीले पड़ कर सूख रहे हैं, जिस के चलते फसल में माली नुकसान होने की पूरी संभावना है और साथ ही फसल में चने की सूंडी व इल्ली के साथसाथ उकटा व जड़सड़न रोग के प्रकोप के कारण भी फसल सूख रही है.

किसानों को सलाह है कि चना फसल की सुरक्षा के लिए इमामेक्टिन बेंजोएट, प्रोफेनोफास 200 ग्राम प्रति एकड़ या क्लोरोइन्ट्रानिलीप्रोल, लेंब्डासाइलोथ्रिन 80 मिलीलिटर प्रति एकड़ के साथ फ्लूपायरौक्साइड, पायरोक्लोरोस्ट्रोबिन 150 मिलीलिटर प्रति एकड़ या एजोक्सीस्ट्रोबिन, टेबूकोनोजोल 150 मिलीलिटर प्रति एकड़ के साथ एनपीके 19ः19ः19, एक किलोग्राम प्रति एकड़ से 150 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें.

उपसंचालक कृषि ने बताया कि जिले की मुख्य फसल गेहूं में भी वर्तमान समय में जड़ माहू कीट व कठुआ इल्ली का प्रकोप शुरुआती अवस्था से ही फसल पर बना हुआ है, जिस के चलते फसल पीली पड़ कर सूख रही है व इल्ली के प्रकोप के कारण फसल की वानस्पतिक वृद्धि व बालियां प्रभावित हो रही हैं.

इसलिए किसानो को सलाह है कि उक्त कीटों के निदान के लिए इमामेक्टिन बेंजोएट, प्रोफेनोफास 200 ग्राम प्रति एकड़ के साथ एनपीके 19ः19ः19, एक किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से 150 लिटर पानी में घेाल बना कर छिड़काव करें.

साथ ही, अपनी फसलों की सुरक्षा के लिए सतत् कृषि विभाग के अधिकारियों एवं कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों के संपर्क में रहें.

गन्ना सुधार के लिए जैव प्रौद्योगिकी की बढ़ती भूमिका

गन्ना एक बारहमासी फसल है, जो 12 से 18 महीने की अवधि के बीच पक कर तैयार होती है. आमतौर पर भारत में 12 महीने के लिए गन्ना लगाया जाता है. इस को खेत में जनवरीफरवरी माह में रोपा जाता है. 16 से 18 महीने के लिए दक्षिण भारत के राज्यों में जैसे आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में जुलाई से अगस्त माह में लगाया जाता है. इस के अलावा अक्तूबर से नवंबर माह में गन्ने को लगाया जा सकता है, जिस को पूर्व मौसमी 15 महीने की फसल के नाम से भी जाना जाता है.

भारत में 300 मिलियन तक गन्ने का उत्पादन होता है. तकरीबन 35 फीसदी मात्रा गुड़ व खांडसारी के कुल उत्पादन के लिए इस्तेमाल में लाई जाती है. गन्ना उत्पादन कर्नाटक, तमिलनाडु की तुलना में उत्तर प्रदेश में प्रमुख रूप से किया जाता है.

देश में तकरीबन 4 करोड़ किसान अपनी जीविका के लिए गन्ने की खेती पर निर्भर हैं और इतने ही खेतिहर मजदूर भी, जो गन्ने के खेतों में काम कर के अपनी आजीविका चलाते हैं.

गन्ने के महत्त्व को इसी बात से समझा जा सकता है कि देश में निर्मित सभी प्रमुख मीठे उत्पादों के लिए गन्ना एक प्रमुख कच्चा माल है. यही नहीं, इस का उपयोग खांडसारी उद्योग में भी किया जाता है.

उत्तर प्रदेश गन्ने की कुल गन्ना उपज का 35.81 फीसदी, महाराष्ट्र 25.4 फीसदी और तमिलनाडु 10.93 फीसदी पैदा करते हैं यानी ये तीनों राज्य देश के कुल गन्ने का 72 फीसदी उत्पादन करते हैं. इधर पिछले 2 दशकों से दक्षिण के राज्यों में गन्ने की उपज में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है. इन राज्यों में प्रति हेक्टेयर गन्ने की उपज भी उत्तर भारत की तुलना में अधिक है. यही वजह है कि ज्यादातर नई चीनी मिलें इन राज्यों में लगाई गई हैं.

गन्ना एक फसल से अधिक

जब लोग गन्ने के बारे में सोचते हैं, तो तुरंत इसे टेबल शुगर के साथ जोड़ देते हैं. सब से लोकप्रिय स्वीटनर को कैमिकल रूप से सुक्रोज के रूप में भी जाना जाता है.

वास्तव में जीनस सैकरम की यह घास दुनियाभर में उत्पादित सुक्रोज का 80 फीसदी है, बाकी 20 फीसदी गन्ने से आती है.

सुक्रोज रस हासिल करने के लिए हर साल तकरीबन 2 बिलियन मीट्रिक टन गन्ना डंठल चीनी मिलों में पेराई के लिए दिया जाता है. लेकिन इस फसल के भीतर अन्य फसल की तुलना में शर्करा की मात्रा ज्यादा होती है. इसीलिए गन्ना किसान ज्यादा मात्रा में इसे उगा कर अपनी आमदनी बढ़ाते हैं.

पारंपरिक तकनीकों के साथ गन्ने में फाइबर से ले कर और भी विभिन्न तरीके के कैमिकल मिलते हैं, जो  बहुत ही लाभदायक होते हैं.

आधुनिक युग के दौर में जैव प्रौद्योगिकी के साथ इस फसल को अब और अधिक विविध तरीकों से उगाया और इस्तेमाल किया जा सकता है.

प्लांट जैनेटिक इंजीनियरिंग, नए जीन डालने व मौजूदा वाले को संशोधित करने की प्रक्रिया गन्ने को न केवल सुक्रोज के, बल्कि एक अधिक कुशल उत्पादक में बदलने की कोशिश की जा सकती है. साथ ही, जैव प्रौद्योगिकी विधि से प्राप्त गन्ना चिकित्सा, औद्योगिक उपयोगों व जैव ईंधन का प्रमुख विकल्प बन सकता है.

सुक्रोज उत्पाद को बढ़ावा

गन्ने की सुक्रोज सामग्री को बढ़ाने के लिए आनुवंशिक बदलाव किया जा रहा है. इस काम के लिए शर्करा उत्पादन से संबंधित जीन व उन का अनुक्रमण क्रम की सम?ा की जरूरत होती है. वैज्ञानिकों ने इन प्रक्रियाओं को बढ़ाने वाले प्रमुख एंजाइमों की पहचान की है, जिन्हें आनुवंशिक इंजीनियरिंग के द्वारा स्टैम 1 जीन में परिवर्तन के द्वारा सुक्रोज की मात्रा अधिक या कम की जा सकती है. इस से गन्ने के उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है.

गन्ने में सुक्रोज पैदावार को बढ़ावा देने के लिए आनुवंशिक शोध करना अहम है. उदाहरण के लिए, पहले कदम के रूप में दक्षिण अफ्रीकी वैज्ञानिकों ने आनुवंशिक रूप से एक विशेष एंजाइम 2 को गन्ने की जीनोम से निकाल दिया. इस प्रक्रिया को हम जीन नाक आउट के रूप में जानते हैं.

गन्ने से जैव ईंधन बनाना

सुक्रोज का व्यापक रूप से किण्वन के माध्यम से जैव ईंधन इथेनाल बनाने के लिए उपयोग किया जाता है. इथेनाल जीवाश्म ईंधन का एक विकल्प प्रदान करता है, जो पैट्रोलियम पर निर्भरता कम कर सकता है और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर अंकुश लगा सकता है.

इथेनाल उत्पादन के लिए जैव प्रौद्योगिकी गन्ने की पत्तियों और बैगास (कुचले हुए डंठल से बचे हुए अवशेष) में सैल्यूलोज का दोहन करने की प्रक्रिया प्रयोग में लाई जाती है.

सैल्यूलोज की जटिल रासायनिक संरचना को एंजाइमों द्वारा सरल शर्करा में बदला जा सकता है, जिसे इथेनाल में किण्वित किया जा सकता है.

आस्ट्रेलिया में शोधकर्ताओं ने गन्ने में माइक्रोबियल जीन डाला है, जिस से ट्रांसजैनिक पौधों को बनाया जा सकता है. इन ट्रांसजैनिक गन्ने की प्रजातियों में सैल्यूलोज डिग्रेडिंग एंजाइम का उत्पादन प्रमुख रूप से गन्ने की पत्तियों में होता रहता है. दोनों माध्यमों द्वारा सैल्यूलोजिक इथेनाल तकनीक को आगे बढ़ाया जा सकता है.

गन्ने में दूसरे प्रमुख उत्पादों के लिए जैव प्रौद्योगिकी

गन्ने को सूरज की रोशनी के माध्यम से बायोमास में बदलने के लिए खेती एक प्रमुख माध्यम है. वैज्ञानिक गन्ने को चिकित्सा और औद्योगिक अनुप्रयोगों के लिए कुछ पदार्थों के सहउत्पादन के लिए एक आदर्श पौधे के रूप में इस की उपयोगिता बढ़ जाती है.

इतना ही नहीं, गन्ने की कोशिकाओं के भीतर आनुवंशिक तंत्र को इन पदार्थों के उत्पादन के लिए निर्देशित किया जा सकता है, जिस से पूरे पौधे को जैव ईंधन में बदल दिया जाता है.

Sugarcane

फसल उत्पादकता में वृद्धि

उलट पर्यावरणीय हालात, कीटों से बचाने और दूसरे जीवों से हिफाजत के लिए जीनों को गन्ने में डाला जा सकता है. इंडोनेशिया में व्यावसायिक रूप से जारी पहला ट्रांसजैनिक गन्ना सूखा प्रतिरोधक किस्म है.

इस किस्म में बीटाइन के उत्पादन के लिए जिम्मेदार एक जीवाणु जीन होता है, एक यौगिक, जो पौधों की कोशिकाओं को स्थिर करता है, जब खेत में पानी की कमी होती है,

इस जीवाणु के जीन को जैनेटिक इंजीनियरिंग की तकनीक द्वारा गन्ने में डाला जाता है.

कीटों, रोग पैदा करने वाले रोगाणुओं और विषैले खरपतवारों को नियंत्रित करने के लिए ट्रांसजैनिक दृष्टिकोण विकसित किए गए हैं.

उदाहरण के लिए, एक मिट्टी के जीवाणु से एक जीन का परिचय गन्ने को स्टेबनेर कीड़ों से बचाता है और एक हानिकारक वायरस द्वारा गन्ने का संक्रमण वायरस से प्राप्त जीन को डालने से रोका जा सकता है.

गन्ना सुधार में मार्कर की उपयोगिता

नकदी फसल होने के चलते गन्ने के घटते उत्पादन को बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं. उन्नतशील रोग से रहित गन्ने की प्रजातियों का विकास कृषि वैज्ञानिकों के लिए चुनौती भरा काम है. बायोटैक्नोलौजी की मदद से वैज्ञानिक गन्ने की प्रजाति में सुधार के लिए काम कर रहे हैं.

विश्व के प्रगतिशील राष्ट्र अमेरिका, आस्ट्रेलिया में गन्ने की प्रजातियों के सुधार काफी लोकप्रिय हो रहे हैं. इन की सहायता से गन्ने की आनुवंशिक समस्याओं के समाधान में कामयाबी मिली है.

फिंगरप्रिंटिंग के माध्यम से गन्ने की विविध प्रजातियों की पहचान संबंधित सभी वैज्ञानिक सूचनाओं जैविक डेटाबेस को आसानी से सुरक्षित रखा जाता है. ऐसे शोध कामों की बदौलत ही पौधों को प्रक्षेत्र में उगाए जाने वाले खर्च से भी बचाया जा सकता है.

इन दिनों कृषि वैज्ञानिक फसलों के विविध स्वरूप जैसे नैनो बायोटैक्नोलौजी पर शोध काम में मार्कर को सब से भरोसेमंद माना गया है. वह दिन दूर नहीं, जब गन्ने को जाननेपहचानने के लिए विश्व को मार्कर का एक डिस्टल आधार जारी करने की जरूरत पड़ेगी और आने वाले समय में आणविक मार्कर को और क्वांटिटी के महत्त्व से गन्ना सुधार में क्रांति आएगी.

महिला किसानों के हिसाब से बनते कृषि यंत्र

आज देश में खेती के काम में 35 फीसदी से ज्यादा भागीदारी महिलाओं की है और खेती के अनेक काम ऐसे हैं, जिन में कृषि यंत्रों का इस्तेमाल किया जाता है. खेती में काम आने वाले कृषि यंत्र आमतौर पर पुरुषों को ही ध्यान में रख कर बनाए जाते हैं, लेकिन अब कृषि यंत्र बनाने वाले महिलाओं को ध्यान में रख कर भी यंत्र बना रहे हैं, ताकि इन यंत्रों का इस्तेमाल खेतिहर महिलाएं आसानी से कर सकें.

जानकारों का कहना है कि आने वाले समय में खेती के कामों में महिलाओं की भागीदारी और बढ़ेगी, क्योंकि आजकल देखने में आ रहा है कि ज्यादातर नौजवान शहरों की तरफ आ रहे हैं. शहरों में आ कर वे कुछ रोजगार भी कर सकें.

इस के पीछे चाहे खेती में कम मुनाफे की वजह हो या कोई और वजह भी हो सकती है, क्योंकि खेती में खेत बोते समय और उस की कटाई के समय ही ज्यादा काम होता है. बीचबीच में खेती में निराईगड़ाई व पानी की उचित देखभाल की जरूरत होती है. इस काम में अब गांव की औरतें भी मर्दों का हाथ बंटाने लगी हैं. यही वजह है कि आने वाले समय में महिलाओं के मुताबिक ही कृषि यंत्रों को बनाया जाए, जिस से महिलाओं को उन्हें इस्तेमाल करने में आसानी हो.

खेती में महिलाओं की भागीदारी और कृषि यंत्र

खेतिहर महिलाओं पर किए गए एक शोध के मुताबिक, महिलाओं के लिए बनाए जाने वाले इन कृषि उपकरणों का डिजाइन तैयार करने में शरीर के 79 आयामों की पहचान की गई है. इस आधार पर तैयार किए गए.

ऐसे आधुनिक कृषि औजारों और उपकरणों का उपयोग महिलाएं काफी सहजता से कर सकती हैं.

महिलाओं के हिसाब से उपकरण

शोधकर्ताओं के मुताबिक, भारतीय महिला कृषि श्रमिकों की औसत ऊंचाई आमतौर पर 151.5 सैंटीमीटर और औसत वजन 46.3 किलोग्राम होता है. खेती के कामों में वजन उठाने संबंधी काम बहुत होते हैं. इन सब को ध्यान में रख कर इन कृषि उपकरणों को डिजाइन किया गया है.

उदाहरण के लिए, काम करते समय शरीर की प्रमुख मुद्राओं जैसे खडे़ हो कर, बैठ कर,  झुक कर वगैरह को ध्यान में रखते हुए 16 शक्तिमानकों का इस्तेमाल उपकरणों को डिजाइन करने में किया गया है.

इस के अलावा महिला श्रमिकों की ऊंचाई और वजन, काम करते समय अधिकतम औक्सिजन की खपत दर, दिल की गति की दर, हाथ की चौड़ाई, उंगलियों के व्यास, बैठ कर काम करने की ऊंचाई और कमर की चौड़ाई जैसी बातों को भी ध्यान में रखा गया है.

पुराने उपकरणों में बदलाव

महिलाओं की शारीरिक कूवत के आधार पर पुराने प्रचलित कृषि उपकरणों में बदलाव कर कई नए उपकरण बनाए गए हैं, ताकि उन्हें इस्तेमाल करने में सहूलियत हो.

इन में बीजोपचार, हस्त रिजर, उर्वरक ब्राडकास्टर, हाथ से चलने वाला बीज ड्रिल, नवीन डिबलर, रोटरी डिबलर, 3 पंक्तियों वाला चावल ट्रांसप्लांटर, 4 पंक्तियों वाला धान ड्रम सीडर, व्हील हो, कोनो वीडर, संशोधित हंसिया, मूंगफली स्ट्रिपर, पैरों से चलने वाला धान थ्रेशर, धान विनोवर, ट्यूबलर मक्का शेलर, रोटरी मक्का शेलर, टांगने वाला ग्रेन क्लीनर, बैठ कर प्रयोग करने वाला मूंगफली डिकोरटिकेटर, फल हार्वेस्टर, कपास स्टौक पुलर और नारियल डीहस्कर वगैरह खास हैं.

Women Farmerमहिलाओं को प्रशिक्षित करना जरूरी

केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, भोपाल से जुडे़ प्रमुख अध्ययनकर्ता डाक्टर सीआर मेहता का कहना है कि इन उपकरणों के सही तरीके से इस्तेमाल करने के लिए महिला श्रमिकों को जागरूक और प्रशिक्षित करना  जरूरी है. साथ ही, निर्माताओं को ऐसे कृषि औजार बनाने के लिए प्रोत्साहित करना और उन्हें ग्रामीण क्षेत्रों में मुहैया करना भी जरूरी है. उपकरण खरीदने के लिए बैंक और अन्य संगठनों से कर्ज लेने के लिए महिलाओं की सहायता भी जरूरी है.

शोधकर्ताओं का यह भी मानना है कि राज्य के कृषि विभागों को इस गतिविधि में मुख्य भूमिका निभानी होगी, क्योंकि उन की पहुंच देश के गंवई इलाकों तक आसानी से होती है. समयसमय पर वे लोग ऐसे आयोजन भी करते रहते हैं, जहां कृषि की जानकारी के लिए ढेरों किसान इकट्ठा होते हैं.

जरूरत है, इन महिलाओं की भागीदारी बढे़ और नईनई जानकारी ले कर खेती के काम को मशीनों के जरीए आसान बना सके.

मशीनों और उपकरणों की खरीद पर सब्सिडी

ट्रैक्टर : 20 पीटीओ हौर्सपावर तक के ट्रैक्टर की अनुमानित लागत 3.00 लाख रुपए प्रति इकाई है. इस पर मिलने वाली छूट महिलाओं के लिए लागत का 35 फीसदी है यानी अधिकतम 1.00 लाख रुपए प्रति इकाई तक, जबकि पुरुषों के लिए लागत का महज 25 फीसदी है. मतलब, अधिकतम रुपए 0.75 लाख प्रति इकाई.

पावर टिलर : 8 हौर्सपावर से कम के पावर टिलर की अनुमानित लागत 1.00 लाख रुपए प्रति इकाई है. इस पर मिलने वाली सब्सिडी महिलाओं के लिए अधिकतम 0.50 लाख रुपए प्रति इकाई है, जबकि पुरुषों के लिए अधिकतम 0.40 लाख रुपए प्रति इकाई.

वहीं दूसरी ओर 8 हौर्सपावर या उस से ज्यादा के पावर टिलर की लागत 1.50 लाख रुपए प्रति इकाई है, जबकि इस पर मिलने वाली अधिकतम छूट 0.75 लाख रुपए प्रति इकाई है, वहीं पुरुषों के लिए अधिकतम 0.60 लाख रुपए प्रति इकाई.

Women Farmerट्रैक्टर व पावर टिलर से चलने वाले उपकरण (20 हौर्सपावर से कम) : भूमि विकास, जुताई और बीज की क्यारी बनाने के उपकरणों की अनुमानित लागत 0.30 लाख रुपए प्रति इकाई है. इस पर मिलने वाली छूट महिलाओं के लिए अधिकतम 0.15 लाख रुपए है, जबकि पुरुषों के लिए 0.12 लाख रुपए प्रति इकाई.

बोआई, रोपाई, कटाई औैर खुदाई के यंत्र की अनुमानित लागत 0.30 लाख रुपए प्रति इकाई है. इस पर मिलने वाली छूट अधिकतम 0.15 लाख रुपए प्रति इकाई है, जबकि पुरुषों के लिए रुपए 0.12 लाख प्रति इकाई.

प्लास्टिक मल्चिंग मशीन की लागत 0.70 लाख रुपए प्रति इकाई है. इस पर मिलने वाली छूट महिलाओं के लिए 0.35 लाख रुपए प्रति इकाई है, जबकि पुरुषों के लिए 0.28 लाख रुपए प्रति इकाई.

पौध संरक्षण उपकरण

मैन्यूअल स्पे्रयर, नैपसैक यानी पैरों से चलने वाला प्रति स्प्रेयर (लागत 0.012 लाख रुपए प्रति इकाई), वहीं इस पर मिलने वाली छूट महिलाओं के लिए अधिकतम 0.006 लाख रुपए प्रति इकाई है, जबकि पुरुषों के लिए 0.005 लाख रुपए प्रति इकाई.

पावर चालित नैपसैक स्प्रेयर, पावर चालित ताइवानी स्पे्रयर की क्षमता वाले 8-12 लिटर की अनुमानित लागत मानक 0.062 लाख रुपए प्रति इकाईर् है.

इस पर मिलने वाली सब्सिडी यानी छूट महिलाओं के लिए अधिकतम 0.031 लाख रुपए प्रति इकाई है, जबकि पुरुषों के लिए 0.025 लाख रुपए प्रति इकाई.

पावर नैपसैक स्प्रेयर या पावर चालित ताइवानी स्पे्रयर की क्षमता वाले 12-16 लिटर की अनुमानित लागत मानक 0.078 लाख रुपए प्रति इकाईर् है. इस पर मिलने वाली छूट महिलाओं के लिए अधिकतम 0.038 लाख रुपए प्रति इकाई है, जबकि पुरुषों के लिए 0.03 लाख रुपए प्रति इकाई.

पावर नैपसैक स्पे्रयर या पावर चालित ताइवानी स्पे्रयर की क्षमता 16 लिटर से ज्यादा की अनुमानित लागत 0.20 लाख रुपए प्रति इकाई है, वहीं इस पर मिलने वाली सब्सिडी यानी छूट महिलाओं के लिए अधिकतम 0.10 लाख रुपए प्रति इकाई है, जबकि पुरुषों के लिए 0.08 लाख रुपए प्रति इकाई.

ट्रैक्टरधारक या फिर चालित स्पे्रयर 20 हौर्सपावर से कम की अनुमानित लागत 0.20 लाख रुपए प्रति इकाई है. इस पर मिलने वाली छूट महिलाओं के लिए अधिकतम 0.10 लाख रुपए प्रति इकाई है, जबकि पुरुषों के लिए 0.08 लाख रुपए प्रति इकाई.

ट्रैक्टर रखने वाले या चलाने वाले स्पे्रयर 35 हौर्सपावर से ज्यादा की लागत मानक 1.28 लाख रुपए प्रति इकाई है. इस पर महिलाओं के लिए लागत का 50 फीसदी यानी अधिकतम 0.63 लाख रुपए प्रति इकाई, जबकि पुरुषों के लिए लागत का 40 फीसदी यानी अधिकतम 0.50 लाख रुपए प्रति इकाई.

पर्यावरण हितैषी लाइट ट्रैप की लागत 0.088 लाख रुपए प्रति इकाई है. इस पर मिलने वाली छूट महिलाओं के लिए अधिकतम 0.014 लाख रुपए प्रति इकाई है, जबकि पुरुषों के लिए 0.12 लाख रुपए प्रति इकाई है.

फसल के डंठल और जड़ें खेत में मिलाए मोबाइल श्रेडर

फसल कटाई के बाद फसलों की जड़ें खेत में रह जाती हैं, जिन्हें खेत में मिलाना या उखाड़ना मुश्किल काम होता है. इस काम में काफी मेहनत और खर्चा भी होता है. इस फसल अवशेषों का प्रबंधन कृषि यंत्रों से किया जाए तो किसान के लिए यह काम आसान हो जाता है.

‘शक्तिमान’ के नाम से कृषि यंत्र बनाने वाली तीर्थ एग्रो टैक्नोलौजी कंपनी का कहना है कि हाथ से खेत में फसल के डंठल का सफाया करने के लिए प्रति एकड़ 4 एकड़ जनशक्ति की जरूरत पड़ती है. खेत की फसल के डंठल को बाहर खींचने, काटने, जमा करने और सुखाने व जलाने का काम बड़ा ही मुश्किल और समय लेने वाला होता है. साथ ही, यह तरीका ईंधन संसाधनों को बरबाद करने वाला भी है.

इस काम को आसान बनाने वाला कृषि यंत्र मोबाइल श्रेडर है. इस यंत्र से कटे हुए डंठल, फसल अवशेष खेत में फैला कर मिला सकते हैं. इस के अलावा ट्रौली में भी इकट्ठा कर सकते हैं. ईंधन के रूप में भी यह इस्तेमाल कर सकते हैं.

इस मोबाइल श्रेडर से इन कृषि अवशेषों से पेपर पल्प व लकड़ी को औद्योगिक इकाइयों में भी उपयोग में लाया जा सकता है.

यह मोबाइल श्रेडर यंत्र फसल की जड़ों को बारीक काट कर खेत में फैलाने में सक्षम है. नष्ट किए गए फसल अवशेषों से खेत में ही जैविक खाद बनाई जा सकती है, जिस से खेत की मिट्टी में भी सुधार होता है. मिट्टी में नमी बनी रहती है और खेत में घासफूस, खरपतवार की भी रोकथाम होती है.

इस मोबाइल श्रेडर यंत्र को 40 हौर्सपावर या अधिक हौर्सपावर वाले टै्रक्टर के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है, जो एक घंटे में एक एकड़ खेत को कवर कर सकता है.

अधिक जानकारी के लिए किसान फोन नंबर 91-2827661637 पर संपर्क कर सकते हैं.

बागानों में निराईगुड़ाई के लिए इस्तेमाल करें कल्टीवेटर

बागानों में फलदार पेड़ों के नीचे खरपतवार को हटाने की समस्या बनी रहती है, जिस के लिए किसानों को अधिक मेहनत करनी पड़ती है. इस पर ज्यादा मेहनत और रकम भी खर्च होती है. हाथ के औजारों से खरपतवार सही तरीके से हट भी नहीं पाती. यही वजह है कि वहां फिर से खरपतवार पैदा होने का डर बना रहता है. इस तरीके से खरपतवार हटाने में जमीन भी उपजाऊ नहीं बन पाती है. अगर इस के स्थान पर इंटरकल्टीवेटर का उपयोग किया जाए, तो यह ज्यादासुविधाजनक और सस्ता होने के साथ जमीन ज्यादा उपजाऊ बन सकती है.

एग्रीकल्चरर इंटरकल्टीवेटर डीजल या पैट्रोल से चलता है. इसे हाथ से चला कर किसान फलदार पेड़ों के नीचे उगी खरपतवार को पूरी तरह हटा देता है. साथ ही, जमीन को भी उपजाऊ बना देता है. इस की वजह से पेड़ों को पर्याप्त पोषण मिलने की वजह से उन में ज्यादा फल लगते हैं, जिस से किसान की आमदनी बढ़ जाती है.

इंटरकल्टीवेटर में लगे रोटर खरपतवार को काट कर जमीन में मिला देते हैं, जो पेड़ों के लिए खाद का काम करती है. इस कल्टीवेटर को आसानी से इधरउधर घुमा कर पेड़ के नीचे और आसपास उगी खरपतवार पूरी तरह टुकड़ेटुकड़े हो कर मिट्टी में मिल जाती है. जब पानी दिया जाता है, तो खरपतवार के टुकड़े उपजाऊ खाद में बदल जाते हैं. इंटरकल्टीवेटर से खरपतवार साफ करना भी ज्यादा सुविधाजनक होने के साथ सस्ता भी है. एक पेड़ के नीचे से मजदूरों द्वारा खरपतवार हटाने में तकरीबन 30-40 रूपए का खर्चा आता है, जबकि इंटरकल्टीवेटर से खरपतवार हटाने में 10 रुपए से भी कम का खर्चा होता है.

पेड़ों के नीचे के अलावा इन के बीच में बनी जमीन को भी इंटरकल्टीवेटर उपजाऊ बना देता है, क्योंकि कल्टीवेटर में लगे रोटर जमीन को खोद कर उसे इस तरह मिला देते हैं कि जमीन के गुणकारी तत्त्व मिट्टी में बने रहते हैं.

भरतपुर की लुपिन फाउंडेशन संस्था ने वैर पंचायत समिति क्षेत्र के नयावास और गोठरा गांव के 16 किसानों को एग्रीकल्चरर इंटरकल्टीवेटर अनुदान पर मुहैया कराए हैं.

वैसे, इंटरकल्टीवेटर ज्यादामंहगा भी नहीं आता. भारत में निर्मित कंपनियां किसानों को तकरीबन 35,000 रुपए में मुहैया करा रही हैं, जिस में घंटेभर में तकरीबन 1लिटर डीजल की खपत होती है. इस का सब से ज्यादा इस्तेमाल लीची, अनार, अमरूद, नीबू वगैरह बागानों में किया जाता है, क्योंकि इन फलदार पौधों के तने काफी नीचे तक फैल जाते हैं. इन पेड़ों के नीचे उगी खरपतवार को हटाने में काफी परेशानी होती है.

गोठरा गांव के बागान मालिक भगवान सिंह ने बताया कि इंटरकल्टीवेटर हासिल हो जाने के बाद उसे पेड़ों के नीचे निराईगुड़ाई करने में आसानी हुई है और उत्पादन भी तकरीबन 25 फीसदी तक बढ़ गया है. इसी तरह  गोठरा के मान सिंह तो खरपतवार से काफी परेशान था, जिसे इंटरकल्टीवेटर मिलने के बाद वह एक दिन में ही पूरे बागान के पेड़ों के नीचे पैदा हुई खरपतवार को हटाने में सक्षम हो गया है. इस के अलावा वह आसपास की जमीन को भी इंटरकल्टीवेटर के माध्यम से खुदाई कर उपजाऊ बना रहा है.

गन्ना फसल को रोगों से बचाएं

गन्ना लंबी अवधि वाली फसल है, जिस के कारण इस फसल में रोगों की संभावनाएं बनी रहती हैं. गन्ना फसल में ये रोग अपने क्षेत्रानुसार अलगअलग भी हो सकते हैं, इसलिए समय रहते रोगों का निदान जरूरी है, तभी हम अच्छी उपज भी ले सकेंगे.

लाल सड़न रोग ऐसे पहचानें लक्षण

* लाल सड़न एक फफूंदजनित रोग है. इस रोग के लक्षण अप्रैल से जून महीने तक पत्तियों के निचले भाग (लीफ शीथ के पास) से ऊपर की तरफ मध्य सिरे पर लाल रंग के धब्बे मोतियों की माला जैसे दिखते हैं.

* जुलाईअगस्त महीने मेें ग्रसित गन्ने की अगोले की तीसरी से चौथी पत्ती एक किनारे या दोनों किनारों से सूखना शुरू हो जाती है. नतीजतन, धीरेधीरे पूरा अगोला सूख जाता है.

* तने के अंदर का रंग लाल होने के साथ ही उस पर सफेद धब्बे भी दिखाई देते हैं. तना अंदर से सूंघने पर सिरके या अल्कोहल जैसी गंध आती है.

प्रबंधन के उपाय

* किसान अवमुक्त रोग रोधी गन्ना किस्म की ही बोआई करें.

* लाल सड़न रोग से अधिक प्रभावित क्षेत्रों में किस्म को. 0238 की बोआई न करें. इस के स्थान पर अन्य स्वीकृत गन्ना किस्म की रोगरहित नर्सरी तैयार कर बोआई का काम करें.

* बोआई के पहले कटे हुए गन्ने के टुकड़ों को 0.1 फीसदी कार्बंडजिम 50 डब्ल्यूपी या थियोफनेट मिथाइल 70 डब्ल्यूपी के साथ रासायनिक शोधन जरूर करें.

* मृदा का जैविक शोधन मुख्यत: ट्राइकोडर्मा या स्यूडोमोनास कल्चर से 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 100-200 किलोग्राम कंपोस्ट खाद में 20-25 फीसदी नमी के साथ मिला कर जरूर करें.

* बोआई के पहले कटे हुए गन्ने के टुकड़ों को सेट ट्रीटमैंट डिवाइस (0.1 फीसदी कार्बंडाजिम 50 डब्ल्यूपी या थियोफनेट मिथाइल 70 डब्ल्यूपी, 200 एचजीएमएम पर 15 मिनट) या हौट वाटर ट्रीटमैंट (52 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान पर 2 घंटे) या एमएचएटी (54 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान, 95-99 फीसदी आर्द्रता पर ढाई घंटे) के साथ शोधन जरूर करें.

* अप्रैल से जून माह तक अपने खेत की लगातार निगरानी करते रहें. पत्तियों के मध्य सिरे के नीचे रुद्राक्ष/मोती के माला जैसे धब्बे के आधार पर पहचान कर पौधों को जड़ सहित निकाल कर नष्ट कर दें और गड्ढे में 10 से 20 ग्राम ब्लीचिंग पाउडर डाल कर ढक दें या 0.2 फीसदी थियोफनेट मिथाइल के घोल की ड्रैचिंग करें.

* रोग दिखाई देने पर ऊपर बताई गई प्रक्रिया जुलाईअगस्त महीने में भी लगातार जारी रखें.

* अप्रैल से जून महीने तक 0.1 फीसदी थियोफनेट मिथाइल 70 डब्ल्यूपी या कार्बंडाजिम 50 डब्ल्यूपी का पर्णीय छिड़काव करें.

* ज्यादा वर्षा होने पर लाल सड़न रोग से संक्रमित खेत का पानी किसी दूसरे खेत में रिसाव को रोकने के लिए उचित मेंड़ बनाएं.

* लाल सड़न रोग से प्रभावित क्षेत्रों में 10 फीसदी संक्रमण से ज्यादा वाले रोगग्रस्त फसल की पेड़ी न लें.

* लाल सड़न रोग से संक्रमित खेत में तुरंत कोई अन्य रोग रोधी गन्ना किस्म की बोआई कम से कम एक साल तक न करें और सुविधानुसार गेहूं, धान, हरी खाद या उपयुक्त फसलों के साथ फसलचक्र अपना कर ही बोआई करें.

* संक्रमित गन्ने की कटाई के बाद उस अवशेषों को खेत से पूरी तरह बाहर कर के नष्ट कर दें और गहरी जुताई कर फसलचक्र अपनाएं.

* अन्य प्रदेशों से बीज गन्ना लाने से पहले वैज्ञानिकों/शोध संस्थानों से अनुशंसा प्राप्त करनी चाहिए.

Suagrcaneपोक्का बोइंग रोग ऐसे पहचानें लक्षण

* यह फफूंदीजनित रोग है.

* इस रोग के स्पष्ट लक्षण विशेष रूप से जुलाई से सितंबर महीने (वर्षाकाल) तक प्रतीत होते हैं.

* पत्रफलक के पास की पत्तियों के ऊपरी व निचले भाग पर सिकुड़न के साथ सफेद धब्बे दिखाई देते हैं.

* चोटी की कोमल पत्तियां मुरझा कर काली सी पड़ जाती हैं और पत्ती का ऊपरी भाग सड़ कर गिर जाता है.

* ग्रसित अगोला के ठीक नीचे की पोरियों की संख्या अधिक व छोटी हो जाती हैं. पोरियों पर चाकू से कटे जैसे निशान भी दिखाई देते हैं.

प्रबंधन के उपाय

* किसी एक फफूंदीनाशक का घोल बना कर 15 दिन के अंतराल पर 2 बार छिड़काव करें.

* इस रोग के लक्षण प्रतीत होते ही कार्बंडाजिम 50 डब्ल्यूपी का 0.1 फीसदी (400 ग्राम फफूंदीनाशक) का 400 लिटर पानी के साथ प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें.

* कौपर औक्सीक्लोराइड 50 डब्ल्यूपी के 0.2 फीसदी (800 ग्राम फफूंदीनाशक) का 400 लिटर पानी के साथ प्रति एकड़ की दर से छिड़कें.

पत्ती की लालधारी व बैक्टीरियल टौप रौट रोग

ऐसे पहचानें लक्षण

* यह बैक्टीरियाजनित रोग है और इस रोग का असर जून से वर्षा ऋतु के अंत तक रहता है.

* पत्ती के मध्यशिरा के समानांतर गहरे लाल रंग की जलीय धारियां दिखाई देती हैं.

* इस के संक्रमण से गन्ने के अगोले के बीच की पत्तियां सूखने लगती हैं और बाद में पूरा अगोला ही सूख जाता है.

* पौधे के शिखर कलिका से तने का भीतरी भाग ऊपर से नीचे की ओर सड़ जाता है.

* गूदे के सड़ने से बहुत ज्यादा बदबू आती है और तरल पदार्थ सा प्रतीत होता है.

प्रबंधन के उपाय

* यांत्रिक प्रबंधन में संक्रमित पौधों को काट कर खेत से निकाल दें.

* रासायनिक प्रबंधन के लिए कौपर औक्सीक्लोराइड 50 डब्ल्यूपी का 0.2 फीसदी (800 ग्राम फफूंदीनाशक) और स्ट्रैप्टोसाइक्लिन का 0.01 फीसदी (40 ग्राम दवा) का 400 लिटर पानी के घोल के साथ प्रति एकड़ की दर से 15 दिन के अंतराल पर 2 बार छिड़काव करें.

घासीय प्ररोह रोग

ऐसे पहचानें लक्षण

* यह रोग फाइटोप्लाज्मा द्वारा संक्रमित होता है. इस का प्रभाव वर्षाकाल में अधिक होता है.

* रोगी पौधों की पत्तियों का रंग सफेद हो जाता है.

* थानों की वृद्धि रुक जाती है. गन्ने बौने और पतले हो जाते हैं और ब्यांत बढ़ जाने से पूरा थान झाड़ीनुमा हो जाता है.

प्रबंधन के उपाय

* ग्रसित पौधों को खेत से निकाल कर दूर नष्ट करें.

* आर्द्र वायु उष्मोपचार शोधन तकनीकी के अंतर्गत बीज गन्ने को 54 डिगरी सैंटीग्रेड वायु का तापमान, 95-99 फीसदी आर्द्रता पर ढाई घंटे तक उपचारित करें.

* जल उष्मोपचार से बीज गन्ने को 52 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान पर 2 घंटे के लिए शोधन करें.

* रोग की अधिकता की दशा में वाहक कीट के नियंत्रण के लिए कीटनाशक इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल की 200 मिलीलिटर प्रति हेक्टेयर का 625 लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें.

कंडुआ रोग

ऐसे पहचानें लक्षण

* यह फफूंदीजनित रोग है.

* रोगी पौधों की पत्तियां छोटी, नुकीली और पंखे के आकार की होती जाती हैं. गन्ना लंबा व पतला हो जाता है.

* गन्ने के अगोले के ऊपरी भाग से काला कोड़ा निकलता है, जो कि सफेद पतली झिल्ली द्वारा ढका होता है.

प्रबंधन के उपाय

* बोआई के समय गन्ने के टुकड़ों को प्रोपिकोनाजोल 25 ईसी या कार्बंडाजिम 50 डब्ल्यूपी के 0.1 फीसदी घोल में 5-10 मिनट तक उपचारित करें.

* ग्रसित पौधों में बन रहे काले कोड़ों को बोरों से ढक कर खेत से निकाल कर दूर नष्ट करें.

* प्रोपिकोनाजोल 25 ईसी के 0.1 फीसदी घोल का 15 दिनों के अंतराल पर 2 बार छिड़काव करें.

* आर्द्र वायु उष्मोपचार या जल उष्मोपचार से शोधन करें.

गृह वाटिका में लगे पौधों को रखे हरा भरा

आज हमारे चारों ओर बड़ेबड़े भवनों का निर्माण होता जा रहा है, तो उन्हीं बिल्डिंगों के आसपास छोटेबड़े लौन, फुलवारी, बालकौनियों, यहां तक कि छतों पर भी कुछ न कुछ उपाय कर के कुछ फूलों, फलों, सब्जियों, सजावटी लताओं के पौधों को भी लगाया जा रहा है.

कहींकहीं जिन के पास बड़े आवास हैं, वे लोग अपने आवास के चारों ओर की चारदीवारी के अंदर बची हुई जगहों को गृह वाटिका में बदल कर दैनिक उपयोग के लिए सब्जियों, फूलों और फलों को उगा रहे हैं.

यह हकीकत है कि हम कितने भी आधुनिक क्यों न हो जाएं, हमारा पौधों के प्रति लगाव या कहें कि आकर्षण कम नहीं हो सकता है. मनुष्य की आवश्यकता और पेड़पौधों के आसपास रहने की आदत ने ही बागबानी की शुरुआत की है.

आजकल छोटे या बड़े कार्यालयों के बरामदे में रखने वाले और कम धूप में उग सकने वाले पौधे आसानी से मिल जाएंगे. मगर जितना ये पौधे हमें देखने में अच्छे लगते हैं, उतनी ही उन की देखरेख करने की भी आवश्यकता होती है. किसी भी गृह वाटिका में पौधों की वृद्धि, उत्पादन व सुंदरता पूरी तरह से वाटिका के प्रबंधन पर निर्भर करती है.

यदि दैनिक आवश्यकतानुसार फूल, फल व सब्जियां प्राप्त करने के लिए गृह वाटिका को बनाया गया है, तो हमें इस का प्रबंधन इस तरह करना चाहिए, जिस से कि कम लागत व कम से कम समय लगा कर अधिकतम उत्पादन को प्राप्त कर सकें. साथ ही, वे सुंदर व स्वच्छ भी बनी रहें. सुनियोजित रूप से गृह वाटिका का प्रबंधन कर के हम उस को हमेशा हराभरा बनाए रख सकते हैं, जिस के लिए हमें निम्नलिखित सुझावों को अपनाने की आवश्यकता है :

मृदा का शुद्धीकरण

सब से पहले जो भी मृदा हम उपयोग के लिए ले रहे हैं, उस का शुद्धीकरण करने की आवश्यकता होती है, अन्यथा मृदा में रहने वाले अनेक प्रकार के हानिकारक कीट या कवक पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं. जैसा कि देखा गया है कि गमलों, क्यारियों और नर्सरी के पौधों में सब से खतरनाक कवकजनित रोग तना सड़ने लगता है, जो पौधों की बढ़वार पूरी तरह से रोक देता है और पौधे सूख कर नष्ट हो जाते हैं.

इस रोग से बचने के लिए कैप्टान या थिरम को 5 ग्राम प्रति लिटर पानी के घोल का प्रयोग कवकनाशी के रूप में किया जा सकता है. यदि दीमक आदि का प्रकोप है, तो 2 से 4 मिलीलिटर क्लोरोपायरीफास को एक लिटर पानी में घोल कर लगभग 5 सैंटीमीटर गहराई तक की मिट्टी को तरबतर कर देने से दीमक नष्ट हो जाते हैं और हमारी पौधशाला कीटों व रोगों से सुरक्षित रहती है.

ऐसे करें बीजों की बोआई

गृह वाटिका में फूलों को सीधे बीज बो कर या पौधों की रोपाई द्वारा लगाया जाता है. हमेशा सीजन के अनुसार उगाने के लिए चयनित बीजों को किसी विश्वसनीय दुकान से ही लेना चाहिए. कुछ सब्जियां जैसे मटर, गाजर, मूली, शलजम, पालक, मेथी, बाकला, आलू, अदरक, हलदी और कुछ फूल जैसे हाली हार्ट, स्वीट पी आदि को निर्धारित समय पर तय दूरी पर बीज बो कर उगाया जाता है.

टमाटर, बैगन, मिर्च, गांठ गोभी, प्याज, फूलगोभी, पत्तागोभी आदि सब्जियों और अधिकांश मौसमी फूलों के बीज को पहले पौधशाला में उगाया जाता है, जिन में से बाद में स्वस्थ पौधों को क्यारियों में रोपा जाता है. इसलिए हो सके, तो उन के बीजों का उपचार भी कर लें.

कुछ पौधे ऐसे भी होते हैं, जो बरसात में खरपतवार की तरह हमें यहांवहां देखने को मिल जाते हैं, जैसे मकोय, भूमिआंवला, दूधीघास, अश्वगंधा, शतावर, तुलसी, दवनामरुआ, नागदोन, शंखपुष्पी आदि. इन की देखभाल के लिए कोई विशेष प्रबंध भी नहीं करना पड़ता. इसी तरह फलदार पेड़ों में भी पहले बीज या कलम से पौध तैयार करते हैं. बाद में उसे रोपण विधि से क्यारियों या वांछित स्थानों पर लगा देते हैं.

पौध प्रतिरोपण एक ऐसा उद्यान कार्य है, जिस में यदि पूरी सावधानी नहीं बरती गई, तो कभीकभी रोपे गए सारे पौधे नष्ट हो जाते हैं. पौध लगाते समय हम सभी को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए :

* पौध लगाते समय यह जानकारी अवश्य रखनी चाहिए कि पौधे वांछित किस्म के ही हों.

* पौधे स्वस्थ व निरोगी होने चाहिए.

* उखाड़े गए पौधे की जड़ें ढक कर रखनी चाहिए. उखाड़ने के बाद उन की यथाशीघ्र रोपाई कर देनी चाहिए.

* पौधो को निर्धारित दूरी पर ही लगाया जाना चाहिए.

* पौध रोपाई करते समय कुछ पत्तियां तोड़ देनी चाहिए और यदि शाखाएं अधिक हों, तो कुछ शाखाएं भी तोड़ देनी चाहिए.

* रोपण सायंकाल के समय करना उत्तम रहता है. इस से पौधों को रात के ठंडे तापमान में स्थापित होने का समय मिल जाता है.

* लगाते समय पौधे की जड़ों के पास अधिक उर्वरक नहीं देना चाहिए और उर्वरकों को पानी में घोल कर मिट्टी में मिलाया जाना अधिक उपयोगी रहता है.

* रोपण के तुरंत बाद उस की जड़ों के आसपास की मिट्टी को अच्छी तरह से दबा देना चाहिए, ताकि जड़ क्षेत्र में हवा न रहे.

* रोपण के तुरंत बाद सिंचाई अवश्य करनी चाहिए, जिस से पौधों की जड़ें मिट्टी के संपर्क में आ जाएं और वे तुरंत भोजन प्राप्त करना आरंभ कर दें.

* पेड़ों के लिए गड्ढा आवश्यकता से अधिक गहरा नहीं बनाना चाहिए.

* रोपण के समय पौधा सीधा खड़ा रहना चाहिए और उस का पर्याप्त भाग मिट्टी में दबा रहना चाहिए.

गृह वाटिका में लगाए गए पौधों को सहारा देना

लता वाली फसलों जैसे लौकी, तोरई, खीरा, करेला, अंगूर को सहारा देने की आवश्यकता होती है, क्योंकि यदि उन्हें सहारा न दिया जाए, तो वे भूमि पर फैल जाती हैं और उन पर लगने वाली सब्जियां भूमि के संपर्क में आने के कारण पूर्णाकार तक पहुंचने से पहले ही सड़ने लगती हैं, खासकर लौकी, जो लता वाली सब्जियों में काफी लंबी होती है. इस में यह देखा गया है कि यदि पौधों को सुचारु ढंग से सहारा दिया जाए और फलों को लटकने का अवसर मिल जाए, तो वे फल लंबे, चिकने व सुंदर होते हैं. यदि इन पौधों को सहारा नहीं दिया जाता है, तो इन में जो फल लगते हैं, वे आकार में टेढ़ेमेढ़े होते हैं.

इसी तरह कुछ लता वाले पुष्प भी होते हैं, जैसे मनी प्लांट, अपराजिता, रंगून क्रीपर, माधवी लता आदि, जिन को सुचारु रूप से सहारा दिया जाना आवश्यक होता है. थोड़ा सा ही सहारा मिलने पर उन की बढ़वार भी सही होती है और फूलों की गुणवत्ता भी बनी रहती है. ज्यादातर इस तरह के पौधों को बागड़ के पास उगाया जाता है, जिस से कि यह बाद में बागड़ पर चढ़ जाए और अच्छी तरह से फैल जाए. डहेलिया, ग्लेडियोलस, गुलदाउदी आदि में फूलों को सीधा रखने के लिए भी सहारा देना जरूरी होता है.

सहारा देने के लिए लकड़ी व बांस की बल्लियां, तार, डंडे, दीवार आदि प्रयोग किए जा सकते हैं. जहां जैसी सामग्री उपलब्ध हो, उसी के अनुसार प्रयोग किया जा सकता है. फूलों के लिए सुंदर दिखने वाले सहारे इस्तेमाल करने चाहिए. बांस को छील कर चिकनी बनाई हुई रंगरोगन लगी फट्टियां उपयुक्त रहती हैं.

फौर्मल पौधों के लिए सरकंडे की लकडि़यां अच्छी रहती हैं. डहेलिया व ग्लेडियोलस के लिए एक मजबूत लकड़ी पर्याप्त रहती है, जिस से पौधे के निकट जड़ों को बचाते हुए मिट्टी में गाड़ देना चाहिए. गुलदाउदी के पौधों को चारों ओर से कई लकडि़यां लगा कर एक घेरा सा बना दिया जाता है.

गृह वाटिका में लगे पौधों की कटाइछंटाई

गृह वाटिका में कुछ बहुवर्षीय पौधे भी लगाए जाते हैं, जिन्हें समयसमय पर कटाईछंटाई की आवश्यकता होती है. शोभाकारी झाड़ियों, फलदार पेड़ों, फूलों (जैसे आम, नीबू, संतरा, अनार, अमरूद, कटहल, गुड़हल, गुलाब, मोंगरा आदि) और कुछ बहुवर्षीय सब्जियों (जैसे परवल, कुंदरू आदि) में कटाईछंटाई की आवश्यकता पड़ती है.

ज्यादातर पर्णपाती पौधों में कटाईछंटाई दिसंबर से मार्च माह तक की जाती है और सदाबहार पौधों में जूनजुलाई व फरवरीमार्च, दोनों मौसमों में की जाती है. गुलाब में कटाईछंटाई अक्तूबर माह के पहले सप्ताह में की जाती है. रोगग्रस्त, सूखी और अनावश्यक शाखाओं को देखते ही निकाल देना चाहिए. ऐसी शाखाओं को काटने के लिए तेज चाकू या सिकेटियर का प्रयोग किया जाना चाहिए.

गृह वाटिका के पौधों की सुरक्षा

गृह वाटिका की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है, जितनी कि उसे बनाना. अवांछित पशुपक्षियों के अलावा राहगीरों और छोटे बच्चों से भी गृह वाटिका के पौधों का बचाव करना पड़ता है.

यदि घर के चारों ओर पक्की चारदीवारी नहीं है, तो कांटेदार तार या उपयुक्त पौधों की बाढ़ की रोक लगा देनी चाहिए. बाढ़ कंटीले तारों के अलावा कुछ पेड़पौधों से भी की जाती है, जो कि देखने में सुंदर और फूल वाली भी होती हैं.

छोटी बाड़ के लिए नागदोन, कनेर, करौंदा आदि का प्रयोग किया जा सकता है. नागदोन के पौधे गहरे हरे, हलके हरे रंगों में आते हैं. कुछ पौधे थोड़ा हरापन लिए सफेद पत्ती के होते हैं, जो देखने में भी बहुत आकर्षक लगते हैं. इस का प्रयोग बवासीर, पेट की कृमि (कीड़े) को दूर करने के लिए भी किया जाता है.

इस बाड़ के बाहर की तरफ और बड़े कंटीले पौधे लगाए जा सकते हैं जैसे कि बौगैन्वेलिया. यह विभिन्न रंगों में तो आता ही है, कंटीला भी होता है. इसे लगाने से 3 काम होते हैं, एक तो बगीचा सुंदर लगता है, रोजाना फूल भी मिल जाते हैं और कंटीली बाड़ भी बनी रहती है.

बौगैन्वेलिया कई रंगों वाली पाई जाती है और काफी जगह को घेरती है और घनी भी होती है. यह यदि बेल की तरह चढ़ा दी जाए, तो 2-3 मंजिल तक भी फैल जाती है यदि यह काटछांट कर के रखी जाए, तो बाड़ की तरह भी काम करती है.

इसी तरह फल के मौसम में तोते आदि पक्षियों को भगाने के लिए किसी पेड़ से टिन आदि बांध कर घर के भीतर से ही उसे बीचबीच में हिला कर, ध्वनि उत्पन्न करने की व्यवस्था करनी चाहिए, जिस से इस प्रकार के नुकसान पहुंचाने वाले पक्षियों से बचा जा सके. यदि आवश्यक हो, तो जालीदार नैट का भी उपयोग किया जा सकता है, जिस से पक्षियों के आने की संभावना न के बराबर हो जाती है.

अपने प्रतिदिन के कार्यों में से यदि थोड़ा सा समय निकाल कर हम सभी अपनी गृह वाटिका में दे सकें, उस की उचित देखभाल करें, तो आप को खुशी के साथसाथ एक स्वस्थ वातावरण, रंगबिरंगे फूल, ताजा सब्जियां और मौसमी फल भी प्राप्त किए जा सकते हैं. सुनियोजित रूप से गृह वाटिका का प्रबंधन कर के हम उस को हमेशा हराभरा बनाए रख सकते हैं.

नकदी फसल है गन्ना

की वर्ड : फार्म एन फूड आर्टिकल, गन्ना नकदी  का प्रमुख स्रोत है, क्योंकि दुनियाभर में 80 फीसदी चीनी गन्ने से ही बनती है. गन्ना उत्पादन में दुनियाभर में भारत का दूसरा स्थान है.

यदि पूरे देश में गन्ने की खेती में उत्तर भारत की हिस्सेदारी देखी जाए, तो यह कुल क्षेत्रफल का 55 फीसदी है. उत्तर प्रदेश की बात की जाए, तो वहां 40 से 45 दिनों में गन्ने की खेती होती है. तकरीबन 40,00,000 किसान सीधेतौर पर गन्ने की खेती से जुड़े हुए हैं.

गन्ने के साथ लें अंत:फसल

शरदकालीन में फसली खेती के लिए गेहूं, मटर, आलू, लाही, राई, प्याज, मसूर, धनिया, लहसुन, मूली, गोभी, शलजम, चुकंदर की खेती आज भी की जा सकती है. अब स्थिति ऐसी आ गई है कि नई किस्मों से उपज दक्षिण भारत की तरह और चीनी की रिकवरी महाराष्ट्र की तरह हो रही है.

किसानों को बेहतर ट्रेनिंग देने के साथसाथ बेहतर किस्म के बीज के उपयोग से गन्ने की पैदावार में बढ़ोतरी नहीं होती. इस के लिए कुछ और बातों का भी ध्यान रखना पड़ता है, जैसे उस की बोआई कैसे की जाए, पौधों से पौधों की दूरी कितनी होनी चाहिए, खादपानी, निराईगुड़ाई, खरपतवार नियंत्रण, गन्ने की बधाई वगैरह की जानकारी होना भी बेहद जरूरी है. इस के लिए जिला एवं कृषि विज्ञान केंद्रों के कृषि वैज्ञानिकों की मदद से किसानों को ट्रेनिंग दी जाती है.

किसानों को ट्रेनिंग देने के साथसाथ उन की देखरेख में कृषि विश्वविद्यालय भी काम कर रहा है.

गन्ने के साथ सहफसल खेती के लिए कम समय में पकने वाली फसलों को चुना जाना चाहिए, जो इलाके की जलवायु, मिट्टी की उपजाऊ कूवत और स्थानीय मौसम भी अनुकूल हो, जिन में बढ़वार प्रतिस्पर्धा न हो और जिस की छाया से गन्न्ना फसल पर उलटा असर न पड़े.

बसंतकालीन गन्ने की खेती के साथ सहफसल खेती करनी है, तो उस के साथ उड़द, मूंग, भिंडी, लोबिया व हरी खाद वाली फसलों को लिया जा सकता है.

नर्सरी में तैयार गन्ने से बढ़ेगी कमाई

गन्ने की एक आंख की गोटी काट लें. गन्ना बीज को शोधित करने के लिए थायो सीनेट मिथाइल अथवा विश टीन की निर्धारित मात्रा के घोल में गन्ने के इन टुकड़ों को बरतनों में डुबो दिया जाता है. आधे घंटे तक डुबोने के बाद इन गन्ने के टुकड़ों को बाहर निकाल लिया जाता है. 18 से 20 वर्गमीटर समतल जमीन पर उर्वरक की बोरियां या प्लास्टिक शीट बिछा कर गोबर की सड़ी खाद एक से डेढ़ सैंटीमीटर मोटी बिछा दें. इस मिट्टी के ऊपर गन्ने के टुकड़ों को सीधी कतार में रख कर कम मात्रा में मिट्टी उन के ऊपर डाल दें.

जरूरत पड़ने पर पानी का छिड़काव कर दें. 20 से 30 दिन में पौधे निकलने शुरू हो जाएंगे. इन पौधों को सीधे खेत में लगाया जा सकेगा. इस से खेत में पौधों की तादाद समान रूप से होगी, जिस से उत्पादन भी अच्छा मिलेगा.

दक्षिण भारत के किसान गन्ने की प्रति हेक्टेयर 80 से 85 टन पैदावार करते हैं, जबकि उत्तर भारत के किसानों की प्रति हेक्टेयर औसत पैदावार महज 70 टन ही होती है. यही नहीं, गन्ने से चीनी की रिकवरी में उत्तर भारत के किसान महाराष्ट्र के किसानों से पिछड़ जाते हैं. महाराष्ट्र में उपज करने की चीनी की रिकवरी जहां  12 से 13 फीसदी है, वहीं उत्तर भारत में काफी कम थी, लेकिन प्रजाति 238 आने के बाद यहां की रिकवरी भी तकरीबन 13 फीसदी के करीब पहुंच गई है. इस प्रजाति ने किसानों के बीच गन्ने की खेती को और अधिक करने की ओर आकर्षित किया है.

लेकिन अब उत्तर भारत के किसानों के हालात में सुधार आने वाला है, क्योंकि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने ऐसे उन्नत बीजों का विकास किया है, जो न केवल भरपूर फसल देने में सक्षम है, बल्कि इस से चीनी की रिकवरी भी पहले की तुलना में ज्यादा हो सकेगी.

इन बीजों की उपलब्धता सभी किसानों को मुहैया कराने व खेती की तकनीकी और तरीकों से किसानों को अवगत कराने के लिए कृषि विश्वविद्यालय के टिशू कल्चर लैब के वैज्ञानिकों द्वारा किसानों को ट्रेंड किया जा रहा है.

डाक्टर आरएस सेंगर की अगुआई में उत्तर भारत के लिए विशेष रूप से विकसित कुछ किस्मों में सुधार का काम लगातार चल रहा है. सालों के अनुसंधान के बाद ऐसी किस्में तैयार की गई हैं, जिस से न केवल बेहतर उत्पादन मिल सकेगा, बल्कि इस में चीनी की रिकवरी भी काफी अच्छी हो सकेगी.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रजाति 238 से अधिक पैदावार लेने के लिए सब से पहले नर्सरी तैयार की जा रही है.

गन्ने की खेती में ध्यान रखने योग्य बातें

* जहां पानी रुकता हो, वहां पानी के निकलने का पुख्ता इंतजाम होना चाहिए.

* खाली जगहोंमें पहले से अंकुरित गन्ने के पेड़ों से गैस फिलिंग करनी चाहिए.

* अंत:फसल काटने के बाद जल्दी ही गन्ने में सिंचाई व नाइट्रोजन की टौप ड्रैसिंग कर के गुड़ाई कर देनी चाहिए.

* अंत:फसल के लिए अलग से संस्तुत की गई मात्रा के मुताबिक उर्वरकों को दिया जाना चाहिए.

किसानों को रोजगार

नई दिल्ली: पैट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने संसद में कहा कि असम राज्य देश में कुल कच्चे तेल के उत्पादन में लगभग 14 फीसदी और कुल प्राकृतिक गैस उत्पादन में लगभग 10 फीसदी का योगदान देता है. असम से पैट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के उत्पादन और आयात निर्भरता को कम करने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों से संबंधित प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि एशिया में पहली रिफाइनरी वर्ष 1889 में डिगबोई में कच्चे तेल के वाणिज्यिक पैमाने पर उत्पादन के बाद वर्ष 1901 में डिगबोई (असम) में स्थापित की गई थी.

उन्होंने सदन को बताया कि पिछले 4 वित्तीय वर्षों अर्थात 2019-20 से 2022-23 के दौरान राज्य सरकार को कच्चे तेल के लिए 9,291 करोड़ रुपए और गैस उत्पादन के लिए 851 करोड़ रुपए की रौयल्टी का भुगतान किया गया है.

उन्होंने विशेष रूप से नुमालीगढ़ रिफाइनरी विस्तार परियोजना, पूर्वोत्तर गैस ग्रिड, पारादीपनुमालीगढ़ कच्चे तेल की पाइपलाइन और एनआरएल बायोरिफाइनरी सहित पूर्वोत्तर क्षेत्र में 44,000 करोड़ रुपए की प्रमुख परियोजनाओं का उल्लेख किया. नुमालीगढ़ में 185 केएलपीडी क्षमता की 2जी रिफाइनरी बांस से इथेनाल का उत्पादन करेगी और स्थानीय किसानों के लिए रोजगार के बड़े अवसर सृजित करेगी.

उन्होंने सदन को यह भी बताया कि सभी पूर्वोत्तर राज्यों को शहरी गैस वितरण नैटवर्क के अंतर्गत शामिल किया जा रहा है, जिस से आम जनता को सस्ता और स्वच्छ खाना पकाने व वाहन के लिए ईंधन उपलब्ध कराया जा सके.

पैट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने सदन को बताया कि सरकार ने अनन्य आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) में ‘‘नो गो‘‘ क्षेत्रों को लगभग 99 फीसदी तक कम कर दिया है, जिस के चलते तकरीबन 1 मिलियन वर्ग किलोमीटर अब अन्वेषण और उत्पादन गतिविधियों के लिए मुक्त है.

सरकार द्वारा किए गए अन्य उपायों में नवीनतम प्रौद्योगिकियों का उपयोग करना, रुग्ण और पुराने कुओं का प्रतिस्थापन और पुनरुद्धार आदि शामिल हैं. सरकार पूंजीगत व्यय कर रही है और आने वाले वर्षों में उत्पादन बढ़ाने के लिए 61,000 करोड़ रुपए का लक्ष्य निर्धारित है.

उन्होंने ई एंड पी क्षेत्र में विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए उठाए गए परिवर्तनकारी कदमों का भी उल्लेख किया और कहा कि राष्ट्रीय तेल कंपनियों (ओएनजीसी और ओआईएल) ने सहयोग के लिए अंतर्राष्ट्रीय तेल कंपनियों के साथ समझौते किया है.

मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने नियत तिथि से पहले इथेनाल सम्मिश्रण लक्ष्यों को प्राप्त करने में सफलता पर प्रकाश डाला (वर्ष 2014 में 1.53 फीसदी से 2023 में 12 फीसदी तक) और कहा कि देश अब फ्लैक्स ईंधन इंजन वाहनों के लिए आगे बढ़ रहा है. ई20 (20 फीसदी इथेनाल मिश्रित ईंधन) पहले से ही 6,000 से अधिक खुदरा दुकानों पर उपलब्ध है और वर्ष 2025 तक पूरे देश में उपलब्ध होगा.

उन्होंने सीबीजी, ग्रीन हाइड्रोजन और इलैक्ट्रिक वाहनों जैसे वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का भी उल्लेख किया. साथ ही, उन्होंने बताया कि हाल ही में असम के शिवसागर में 483 करोड़ रुपए की कुल लागत से सूई-का-फा मल्टीस्पैशिलिटी (350 बिस्तर) अस्पताल का उद्घाटन करने का भी उल्लेख किया, जिस का खर्च ओएनजीसी ने अपनी सीएसआर गतिविधियों के अंतर्गत किया है, जो ऊपरी असम और अन्य राज्यों के पड़ोसी जिलों की आवश्यकताओं को पूरा करेगा.