Successful Farmer:
“कभी महक की तरह हम गुलों से उड़ते हैं,
तो कभी धुएँ की तरह पर्वतों से उड़ते हैं.
ये कैंचियां हमें उड़ने से क्या खाक रोकेंगी,
कि हम परों से नहीं, हौसलों से उड़ते हैं.”
बिहार के पटना जिले के बिहटा प्रखंड स्थित कंचनपुर गांव के प्रगतिशील किसान सुधांशु कुमार की कहानी सुनते समय यह शेर बार-बार याद आता है. यह कहानी केवल एक किसान की नहीं है, बल्कि उस बदलाव की कहानी है जिसने भारतीय खेती को बैलों और हल से निकालकर ट्रैक्टर, जीरो टिलेज, हैप्पी सीडर और ड्रोन तक पहुंचाया है.
करीब चार दशक से खेती कर रहे सुधांशु कुमार उन किसानों में शामिल हैं जिन्होंने समय के साथ खुद को बदला, नई तकनीकों को अपनाया और खेती को सिर्फ परंपरा नहीं बल्कि एक आधुनिक व्यवसाय के रूप में स्थापित करने की दिशा में काम किया. आज उनके खेतों में आधुनिक कृषि यंत्रों की गूंज सुनाई देती है, लेकिन इस सफर की शुरुआत बेहद साधारण परिस्थितियों से हुई थी.
विरासत में मिली खेती, लेकिन सोच रही आधुनिक
पटना के नजदीक स्थित कंचनपुर गांव में सुधांशु कुमार का परिवार पीढ़ियों से खेती करता आ रहा है. उनके दादा और पिता जिस खेती को पारंपरिक तरीके से करते थे, उसी खेती को उन्होंने नई तकनीकों के साथ आगे बढ़ाया.
वे बताते हैं कि जब उन्होंने खेती की जिम्मेदारी संभाली तब अधिकांश काम बैलों और मजदूरों के भरोसे होता था. खेतों की जुताई बैलों से होती थी, कटाई मजदूर करते थे और मड़ाई में कई दिन लग जाते थे. बारिश समय पर न हो या मजदूर न मिलें तो पूरी फसल प्रभावित हो जाती थी.
धीरे-धीरे उन्हें महसूस हुआ कि यदि खेती को लाभकारी बनाना है तो खेती के तौर-तरीकों को बदलना होगा. यही सोच आगे चलकर उनके कृषि यंत्रीकरण अभियान की नींव बनी.
खेतों में विविधता, जोखिम कम करने की रणनीति
सुधांशु कुमार के यहां खेती किसी एक फसल तक सीमित नहीं है. धान, गेहूं, सरसों, मक्का, चना, मसूर, तिलहन और सब्जियों की खेती के साथ-साथ वे समय-समय पर गन्ने की फसल भी लेते हैं. उनका मानना है कि बदलते मौसम और बाजार के दौर में केवल एक फसल पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है. इसलिए फसल विविधीकरण जरूरी है.
खेती के साथ उन्होंने बागवानी को भी अपनाया है. उनके खेत और घर के आसपास आम, अमरूद, कटहल, नींबू और अनार जैसे फलदार पौधे लगे हैं. यह न केवल अतिरिक्त आय का स्रोत है बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान देता है.
जैविक और रासायनिक खेती का संतुलन
आज जब खेती में जैविक और रासायनिक खेती को लेकर बहस चलती रहती है, तब सुधांशु कुमार संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की बात करते हैं. वे बताते हैं कि, पहले उनके पूर्वज पूरी तरह जैविक खेती करते थे. गोबर, गौमूत्र और खेतों के अवशेषों से खाद बनाई जाती थी. लेकिन समय के साथ पशुओं की संख्या कम हुई और जैविक संसाधनों की उपलब्धता भी घट गई.
ऐसे में आज वे मिश्रित पद्धति अपनाते हैं. धान, गेहूं और सरसों जैसी मुख्य फसलों में वैज्ञानिक सिफारिशों के अनुसार रासायनिक उर्वरकों का उपयोग करते हैं, जबकि सब्जियों और बागवानी फसलों में जैविक उत्पादों को प्राथमिकता देते हैं. उनका मानना है कि मिट्टी की सेहत बनाए रखने के लिए दोनों के बीच संतुलन जरूरी है.
खेत में ही तैयार करते हैं जैविक कीटनाशक
सुधांशु कुमार केवल बाजार पर निर्भर रहने वाले किसान नहीं हैं. वे पारंपरिक ज्ञान का भी उपयोग करते हैं. गोमूत्र, नीम की पत्तियां, धतूरा और अन्य स्थानीय वनस्पतियों से तैयार जैविक घोलों का उपयोग वे इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट (IPM) के तहत करते हैं. इससे कीट नियंत्रण में मदद मिलती है और मिट्टी तथा पर्यावरण पर दुष्प्रभाव भी कम पड़ता है.
उनका मानना है कि यदि किसान स्थानीय संसाधनों का सही उपयोग करें तो रसायनों पर निर्भरता काफी हद तक कम की जा सकती है.
नकली खाद और बीज बड़ी चुनौती
खेती में आधुनिकता के साथ नई चुनौतियां भी आई हैं. इनमें नकली खाद, नकली बीज और नकली कृषि रसायनों की समस्या सबसे गंभीर है. सुधांशु कुमार कहते हैं कि अधिकांश किसान पैकेट देखकर उत्पाद खरीद लेते हैं क्योंकि नकली और असली पैकेट में फर्क करना आसान नहीं होता.
उनका मानना है कि कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र और कृषि वैज्ञानिकों को इस दिशा में विशेष जागरूकता अभियान चलाने चाहिए ताकि किसान असली और नकली उत्पादों की पहचान कर सकें. वे कहते हैं कि एक गलत बीज या नकली दवा किसान की पूरे सीजन की मेहनत पर पानी फेर सकती है.
जब गांव में आया पहला ट्रैक्टर
सुधांशु कुमार के कृषि जीवन का सबसे बड़ा मोड़ वर्ष 1988-90 के आसपास आया, जब उन्होंने पहला HMT ट्रैक्टर खरीदा. उस समय गांव में ट्रैक्टर बेहद कम थे. परिवार के कुछ लोगों को लगता था कि इतनी बड़ी खरीद जोखिम भरी हो सकती है, लेकिन उन्होंने साहसिक फैसला लिया. आज वे मुस्कुराते हुए कहते हैं कि उस समय लिया गया वही निर्णय उनकी खेती की दिशा बदलने वाला साबित हुआ.
ट्रैक्टर आने के बाद खेतों की जुताई तेज हुई, समय बचा और उत्पादन बढ़ाने की संभावनाएं भी खुलीं. इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.
बैंक लोन से खरीदी मशीनें, किराये से चुकाया कर्ज
कृषि यंत्रीकरण आसान नहीं था. मशीनें महंगी थीं और बैंक भी किसानों को मशीनरी के लिए आसानी से ऋण देने को तैयार नहीं होते थे. सुधांशु कुमार ने पहला ट्रैक्टर बैंक ऋण लेकर खरीदा. उन्होंने उसका उपयोग केवल अपने खेतों तक सीमित नहीं रखा बल्कि आसपास के किसानों को किराये पर भी उपलब्ध कराया.
किराये से होने वाली आय से उन्होंने समय से पहले बैंक का कर्ज चुका दिया. इससे बैंक का भरोसा बढ़ा और बाद में उन्हें अन्य कृषि यंत्रों के लिए भी ऋण मिलने लगा. आज उनका अनुभव बताता है कि यदि किसान योजनाबद्ध तरीके से काम करें तो कृषि यंत्र स्वयं अपनी लागत निकाल सकते हैं.
आधुनिक मशीनों से बदल गई खेती की तस्वीर
आज सुधांशु कुमार के पास ट्रैक्टर, कल्टीवेटर, डिस्क हैरो, रोटावेटर, थ्रेशर, कंबाइन हार्वेस्टर, स्ट्रॉ रीपर, जीरो टिलेज मशीन, हैप्पी सीडर, लेजर लैंड लेवलर और पावर स्प्रेयर जैसे अनेक आधुनिक कृषि यंत्र हैं. इन मशीनों की मदद से खेती के लगभग सभी कार्य समय पर पूरे हो जाते हैं.
वे बताते हैं कि पहले जिन कार्यों में कई दिन लग जाते थे, अब वे कुछ घंटों में पूरे हो जाते हैं. मजदूरों की कमी के दौर में यह बदलाव किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है.
जीरो टिलेज और हैप्पी सीडर ने दिखाई नई राह
सुधांशु कुमार आधुनिक तकनीकों में जीरो टिलेज और हैप्पी सीडर को खेती में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाली तकनीक मानते हैं. पहले धान कटाई के बाद खेत में बचे अवशेषों को जलाना पड़ता था. इससे पर्यावरण प्रदूषण भी होता था और मिट्टी की उर्वरता भी प्रभावित होती थी.
अब हैप्पी सीडर और जीरो टिलेज मशीनों की मदद से उन्हीं अवशेषों के बीच सीधे गेहूं की बुवाई हो जाती है. इससे डीजल की बचत होती है, जुताई का खर्च कम होता है, समय बचता है और फसल अवशेष धीरे-धीरे सड़कर जैविक खाद का काम करते हैं. उनके अनुसार यह तकनीक खेती की लागत घटाने और मिट्टी को स्वस्थ बनाए रखने का प्रभावी तरीका है.
ड्रोन तकनीक से जुड़ता बिहार का किसान
कृषि विज्ञान केंद्र के माध्यम से सुधांशु कुमार को ड्रोन तकनीक का उपयोग देखने और समझने का अवसर मिला. उनके क्षेत्र में नैनो यूरिया और नैनो डीएपी के ड्रोन छिड़काव का प्रदर्शन किया गया, जिसमें लगभग 300 एकड़ क्षेत्र शामिल था. उन्होंने देखा कि जहां पारंपरिक छिड़काव में घंटों लग जाते हैं, वहीं ड्रोन कुछ ही मिनटों में एक एकड़ क्षेत्र को कवर कर सकता है.
वे मानते हैं कि आने वाले वर्षों में ड्रोन तकनीक कृषि क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी, विशेष रूप से बड़े किसानों और किसान समूहों के लिए.
सिंचाई: खेती की सबसे बड़ी जरूरत
बदलते जलवायु परिदृश्य में सिंचाई खेती की सबसे महत्वपूर्ण जरूरत बन चुकी है. सुधांशु कुमार बताते हैं कि पहले कुएं और वर्षा आधारित स्रोत पर्याप्त होते थे, लेकिन अब अधिकांश किसान बोरवेल और सबमर्सिबल पंप पर निर्भर हैं.
उनके यहां लगभग 300 फीट गहरा ट्यूबवेल है, जिसके माध्यम से सिंचाई की जाती है. वे मानते हैं कि समय पर पानी न मिले तो अच्छी से अच्छी फसल भी प्रभावित हो सकती है. इसलिए जल प्रबंधन भविष्य की खेती का सबसे महत्वपूर्ण विषय बनने जा रहा है.
मजदूरों की कमी और मशीनों का बढ़ता महत्व
बिहार जैसे राज्यों में बड़ी संख्या में लोग रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में जाते हैं. इसका सीधा असर खेती पर पड़ता है. सुधांशु कुमार कहते हैं कि आज सबसे बड़ी समस्या मजदूरों की उपलब्धता है. बुवाई और कटाई जैसे महत्वपूर्ण समय पर मजदूर नहीं मिलते. ऐसे में कृषि यंत्रीकरण कोई विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता बन गया है.
उनका स्पष्ट कहना है कि आने वाले समय में वही किसान सफल होगा जो तकनीक और मशीनों को अपनाएगा.
भंडारण और विपणन की व्यावहारिक समझ
फसल तैयार होने के बाद उसका सुरक्षित भंडारण और सही समय पर बिक्री भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. सुधांशु कुमार अपनी उपज को घर पर सुरक्षित भंडारित करते हैं और बाजार की स्थिति के अनुसार बिक्री का निर्णय लेते हैं.
कई बार वे खुद ट्रॉली से मंडी पहुंचते हैं, जबकि कई बार व्यापारी सीधे खेत पर आकर फसल खरीद लेते हैं. उनका मानना है कि किसान को केवल उत्पादन तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि बाजार की समझ भी विकसित करनी चाहिए.
किसानों के लिए संदेश
सुधांशु कुमार का संदेश बेहद सरल लेकिन प्रभावी है—समय के साथ बदलना सीखिए. वे कहते हैं कि खेती अब केवल परंपरागत अनुभव के भरोसे नहीं चल सकती. आधुनिक कृषि यंत्र, ड्रोन तकनीक, जीरो टिलेज, हैप्पी सीडर, लेजर लेवलर और वैज्ञानिक खेती के तरीके आज की जरूरत हैं. यदि किसान नई तकनीकों को अपनाएंगे तो लागत घटेगी, उत्पादन बढ़ेगा और खेती अधिक लाभकारी बनेगी.
हौसलों से उड़ान भरता किसान
सुधांशु कुमार की कहानी हमें बताती है कि खेती में सफलता केवल जमीन के आकार से तय नहीं होती, बल्कि सोच और दृष्टिकोण से तय होती है.
बैलों से शुरू हुआ उनका सफर आज ट्रैक्टर, कंबाइन हार्वेस्टर, जीरो टिलेज, हैप्पी सीडर और ड्रोन तकनीक तक पहुंच चुका है. उन्होंने यह साबित किया है कि यदि किसान सीखने के लिए तैयार हो, जोखिम उठाने का साहस रखता हो और समय के साथ खुद को बदलता रहे तो खेती को लाभकारी और सम्मानजनक व्यवसाय बनाया जा सकता है.
बिहार के इस किसान की यात्रा लाखों किसानों और कृषि क्षेत्र में भविष्य तलाश रहे युवाओं के लिए प्रेरणा है. यह कहानी बताती है कि खेती में तरक्की के लिए केवल पंख नहीं, हौसले चाहिए होते हैं.





