Fruit Harvesting: फलों का इनसान की जिंदगी में काफी महत्त्व  है. फलों से तमाम तरह के विटामिन व प्रोटीन वगैरह जरूरी तत्त्व शरीर को मिलते हैं. रोजाना के भोजन में फलों को शामिल किया जाना जरूरी है. तमाम फलों से बनी चीजें सेहत के लिए हमेशा फायदेमंद होती हैं. यहां कुछ खास फलों की तोड़ाई (Fruit Harvesting) व  उन से बनने वाली चीजों की जानकारी दी जा रही है.

आम

आम उत्पादन में भारत का दुनिया में पहला नंबर है. देश में आम की 1000 से ज्यादा प्रजातियां उगाई जाती हैं, जिन में से करीब 20 प्रजातियां व्यावसायिक नजरिए से उगाई जाती हैं.

फल लगने के 12 से 16 हफ्ते के बाद आम पूरी तरह तैयार होता है. दशहरी व लंगड़ा आम 12 हफ्ते में, जबकि माल्लिका, आम्रपाली व चौंसा आम लगने के 14 से 16 हफ्ते बाद तैयार होते हैं.

फलों की तोड़ाई (Fruit Harvesting) तने के साथ करने पर आम के मुख से निकलने वाला रिसाव कम होता है व फल की गुणवत्ता बनी रहती है.

आमों को बांस की टोकरियों, अरहर की टोकरियों व लकड़ी के डब्बों में अखबार के कागज या सूखी पत्तियां बिछा कर पैक किया जा सकता है. पैकिंग के लिए फाइबर बोर्ड के हवादार डब्बे तैयार किए गए हैं, जो कि निर्यात के लिए बहुत अच्छे पाए गए हैं.

दशहरी, मल्लिका व आम्रपाली प्रजातियों के भंडारण के लिए 12 डिगरी सेल्सियस तापमान ठीक है, जबकि चौंसा व लंगड़ा आम 10 व 15 डिगरी सेल्सियस तापमान पर 2 से 3 हफ्ते तक रखे जा सकते हैं.

जब आमों की तोड़ाई उन के पकने से पहले कर के रासायनिक उपचार से उन्हें पकाया जाना हो, तो इथरैल का इस्तेमाल सही रहता है. इथरैल का इस्तेमाल (750 पीपीएम) 52 डिगरी सेल्सियस तापमान पर 5 मिनट तक फलों को डुबो कर किया जा सकता है.

जहां कच्चे आमों का इस्तेमाल खटाई, अमचूर, अचार, चटनी व पना वगैरह बनाने में किया जाता है, वहीं पके आमों से रस, जैली, जैम व आमपापड़ वगैरह बनाए जा सकते हैं.

केला

केला देश का दूसरा सब से ज्यादा उत्पादन किया जाने वाला फल है. आमतौर पर 80 से 120 दिनों में केले की विभिन्न प्रजातियां तैयार होती हैं. केले की पैकिंग के लिए राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र, त्रिची द्वारा 14 किलोग्राम क्षमता का डब्बा बनाया गया है.

केले को 13 से 15 डिगरी सेल्सियस तापमान व 90 फीसदी आर्द्रता पर 3 हफ्ते तक भंडारित किया जा सकता है. 250 पीपीएम इथरैल रसायन के घोल में डुबो कर कम पके केले को पकाया जा सकता है.

केले से अचार, चटनी, रस, सब्जी, सौस, आटा, शराब व टाफी वगैरह बनाए जा सकते हैं.

लीची

लीची की तोड़ाई सुबह या शाम को करनी चाहए व उन्हें छाया में रखना चाहिए. फलों को उन के आकार के आधार पर अलगअलग किया जा सकता है.

बांस की टोकरी में रख कर लीची को भेजने से फलों के खराब होने का खतरा रहता है, लिहाजा आजकल प्लास्टिक के थैलों व छेद वाले थैलों में लीची की पैकिंग की जाती है.

लीची पर सल्फर के इस्तेमाल से गूदे का रंग लाल बनाए रखा जा सकता है.

लीची को 6 फीसदी वैक्स के घोल में 1 मिनट तक डुबोने के बाद छेद वाले पालीथिन के थैले में रखने पर उस रंग व स्वाद 6 दिनों तक बरकरार रखा जा सकता है.

लीची का भंडारण 50 डिगरी सेल्सियस तापमान पर किया जाना सही रहता है.

लीची से रस, जैम व जैली वगैरह बनाए जा सकते हैं.

अमरूद

अमरूदों की तोड़ाई फल आने के 4 से 5 महीनों बाद जब उन का रंग हरे से पीले हरे में बदलता है, तब की जाती है.

अमरूद आमतौर पर सर्दी के मौसम में 6 से 9 दिनों तक व बारिश के मौसम में 2 से 4 हफ्ते तक भंडारित किया जा सकता है.

अमरूद से रस, चटनी व जैली वगैरह बनाए जाते हैं.

आंवला

आंवले को आमतौर पर बांस में लगी जाली के जरीए तोड़ा जाता है.

फल सुबह के समय तोड़े जाने चाहिए व उन्हें जमीन पर नहीं गिरने देना चाहिए, वरना वे खराब हो सकते हैं.

आंवले को कमरे के सामान्य तापमान पर 6 से 9 दिनों तक रखा जा सकता है. वैसे 5 से 6 डिगरी सेल्सियस तापमान पर आंवले को 2 महीने तक महफूज रखा जा सकता है.

आंवले का इस्तेमाल मुरब्बा, अचार, चटनी, रस, व टाफी वगैरह बनाने में किया जाता है.

पपीता

पपीते की भंडारण कूवत 5 से 6 दिनों तक होती है.

अच्छी पैकिंग कर के पपीते का भंडारण 2 हफ्ते तक के लिए किया जा सकता है.

पपीते का इस्तेमाल कैंडी व स्क्वैश वगैरह बनाने में किया जा सकता है.

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