Moong Bean Cultivation: रबी की फसल कटाई के तुरंत बाद जायद में मूंग की खेती करने का सही समय होता है और यह कम समय में तैयार होने वाली फसल है, जो किसानों को अतिरिक्त मुनाफा देती है. साथ ही भूमि की उर्वराशक्ति बनाए रखने में सहायता मिलती है.
लगाएं इन किस्मों को
–पूसा विशाल : यह किस्म लगभग 60 दिन में पक कर तैयार होती है. इसका दाना मोटा होता है.
–पंत मूंग 1 : मूंग की यह उन्नत किस्म 75 दिन में पक कर तैयार होती है. इसके अलावा जायद के मौसम में फसल को 65 दिन में पक सकती है. इसके दाने छोटे होते हैं.
–समर मूंग लुधियाना (एस. एम. एल. 668) (2003) : 60-65 दिन में पकने वाली यह किस्म 12 से 14 क्विंटल प्रति हैक्टर तक उपज देती है.
–एस. एम. एल. 668 : मूंग की यह किस्म भी जल्दी तैयार होने वाली किस्मों में से एक हैं, इसकी फलियां नीचे की ओर गुच्छे के रूप में झुकी होती हैं और इस किस्म के दाने मोटे होते हैं.
–आरएमजी 268 : मूंग की यह किस्म उन स्थानों के लिए अच्छी मानी जाती है जहां कम बारिश या सामान्य बारिश होती है. यह किस्म सूखे के लिए प्रतिरोधी होती है. इस किस्म में अन्य किस्मों से ज्यादा पैदावार मिल सकती है.
–जवाहर मूंग 3 : मूंग की यह किस्म जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर द्वारा वर्ष 2006 में जारी की गई थी. यह किस्म ग्रीष्म और खरीफ दोनों के लिए उपयुक्त मानी गई है. मूंग की इस किस्स को पकने में 60 से 70 दिन का समय लगता है.
–पी. एस. 16 : यह किस्म लगाने से फसल 60-65 दिन में पककर तैयार हो जाती है. इसका पौधा सीधा और लंबा बढ़ता है. मूंग की यह किस्म बारिश और ग्रीष्म, दोनों मौसम के लिए उपयुक्त है.
मूंग की एक अलग वैराइटी
–मूंग जनकल्याणी : यह किस्म बनारस के किसान प्रकाश सिंह द्वारा विकसित कुदरत कृषि शोध संस्था वाराणसी की किस्म है, जो 2 से 3 पानी में पककर तैयार हो जाती है. इस किस्म की खासियत यह है कि इसकी फली लंबी गुच्छों में होती है और इसका दाना मोटा और गहरे हरे रंग का चमकदार होता है. मूंग की इस किस्म से प्रति एकड़ उत्पादन 6-7 क्विंटल पैदावार प्राप्त की जा सकती है. यह किस्म पीला मोजेक, चूर्णित आसिता रोग के प्रति सहनशील है.
-यह किस्म उत्तरप्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, हरियाणा, बंगाल, छत्तीसगढ़, पंजाब आदि राज्यों के लिए तैयार की गई है.
कैसे करें जायद मूंग की बोआई
रबी फसलों के कटने के तुरंत बाद खेत की जुताई करके 4-5 दिन छोड़ कर पलेवा करना चाहिए. पलेवा के बाद 2-3 जुताइयां देशी हल या कल्टीवेटर से करके पाटा लगाकर खेत को समतल एवं भुरभुरा बना लेना चाहिए. इससे उसमें नमी संरक्षित हो जाती है व बीजों से अच्छा अंकुरण मिलता हैं और जायद मूंग हेतु 20 किलोग्राम नाइट्रोजन व 40 किलोग्राम फॉस्फोरस प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है.
कब करें बोआई
जायद मूंग की बोआई रबी फसल कटने के तुरंत बाद मार्च में की जाती है. इसके लिए 15-20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से बीज की आवश्यकता होती है. बोआई में कतार से कतार की दूरी 25 सेंटीमीटर और पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर रखनी चाहिए और कृषि यंत्र से बोआई करने पर अधिक पैदावार मिलती है.
अच्छी उपज के लिए बीज उपचार जरुरी
मूंग के बीजों को बोआई से पहले प्रति किलो बीज को 3 ग्राम थाइरम एवं कार्बेन्डाजिम या आधा ग्राम कार्बेन्डाजिम से उपचारित करें.
कब करें सिंचाई
फूल आने से पूर्व तथा फली में दाना बनते समय सिंचाई अत्यंत आवश्यक है. इसके अलावा तापमान एवं जमीन में नमी के अनुसार सिंचाई देनी चाहिए.
मूंग की खेती कम समय में तैयार होने वाली फसल है, जिसमें कीट रोग की रोकथाम कर अतिरिक्त मुनाफा लिया जा सकता है.





