Blue-Green Algae.फसलों की पैदावार बढ़ाने में रासायनिक उर्वरकों का योगदान किसी से छिपा नहीं है. इन्हीं के इस्तेमाल से भारत में हरित क्रांति आई, लेकिन अंधाधुंध उर्वरकों के इस्तेमाल से कई समस्याएं पैदा हुईं. दूसरी ओर उर्वरकों के मूल्यों में लगातार इजाफा हो रहा है. इसीलिए कृषि वैज्ञानिक एक ऐसा विकल्प खोजने में लगे हैं, जो कम खर्च में अधिक मात्रा में पोषक तत्त्व मुहैया कराने में सक्षम हो.

धान का कम उत्पादन मिलने के कारणों में सब से प्रमुख कारण गोबर की खाद के साथ उर्वरकों का संतुलित व उचित मात्रा में न दिया जाना है. भारतीय किसान इस बात को भलीभांति जानता है. इस का इस्तेमाल करने से फसल का उत्पादन कितना बढ़ेगा यह भी वह अच्छी तरह जानता है, परंतु उस की लाचारी है कि उस के पास गोबर की खाद पर्याप्त मात्रा में नहीं है और रासायनिक उर्वरकों के मूल्यों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. छोटे व सीमांत किसान धान व अन्य फसलों में बहुत कम मात्रा में खाद व उर्वरकों का इस्तेमाल करते हैं. वर्तमान में किसान उर्वरकों के उपयोग में रुचि लेने लगे हैं, लेकिन कारखाने किसानों की मांग की पूर्ति करने में नाकाम हो रहे हैं.

इन हालात को ध्यान में रखते हुए छोटे व सीमांत किसान को उर्वरकों का सुगम व सस्ता विकल्प देने की जरूरत है. धान की सीधी बोआई, रोपाई की कोई भी तकनीक अपनाई जाए, उस में नीलहरित शैवाल का इस्तेमाल कर के धान की पैदावार को बढ़ाया जा सकता है.

नीलहरित शैवाल….

ऐसा एक विकल्प है नीलहरित शैवाल. इसे विशेषकर धान की फसल में इस्तेमाल करने से उत्पादन में काफी इजाफा हो जाता है, क्योंकि यह प्रकाश संश्लेषण के साथ नाइट्रोजन को मिट्टी में इकट्ठा करने की खास कूवत रखता है.

वायुमंडल में 70 फीसदी नाइट्रोजन पोषक तत्त्व के रूप में मौजूद है, लेकिन पौधे इस का सीधे इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं. इस वायुमंडलीय नाइट्रोजन को जमीन में इकट्ठा करने की कूवत नीलहरित शैवाल में है, जो खुद जैविक होेने के कारण कई उपयोगी अम्ल और विटामिन भी तैयार करता है. यह भूमि की विभिन्न दशाओं में सुधार कर के धान के विकास, बढ़वार व पैदावार में सहायक होता है. साथ ही धान के बाद उगाई जाने वाली फसल का उत्पादन बढ़ाने में भी सहायक होता है.

वैरायटी

नीलहरित शैवाल की अनेक वैरायटी पाई जाती हैं. इन में आलोसायरा, रग्नाविना, नास्टाक, एनाविनापसिस, कैलोथ्रिक्स फिशरैका, हैपलोसाइफोन, कैंपाइलोनिमा, सिलेंड्रोस्पर्मन, माइक्रोकीट, आलीप्रोथिक्स वगैरह प्रमुख हैं. ये आबोहवा में मौजूद गैस का यौगिकीकरण करती हैं.

धान की फसल में हमेशा पानी रहता है, उस में नीलहरित शैवाल का इस्तेमाल किया जा सकता है, जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन को ले कर पौधों को सीधे मुहैया कराने की खासीयत रखता है. जो धान के विकास, बढ़वार व उत्पादन में बढ़वार करने में सहायक होते हैं.

नीलहरित शैवाल की विशेषता

इसे किसान अपने खेत में खुद तैयार कर सकते हैं और इसे धूप में सुखा कर कई सालों तक सुरक्षित रखा जा सकता है.

इस के इस्तेमाल से भूमि की भौतिक, रासायनिक व जैविक दशा में सुधार होता है.

इस से लवणीय व क्षारीय भूमि में सुधार होता है और इस से प्रदूषण या कोई अन्य प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है.

ये सस्ते होते हैं, लगातार 2-3 सालों तक इस्तेमाल करने पर खेत में भलीभांति पनप जाते हैं और बाद में डालने की जरूरत नहीं होती है.

इस के इस्तेमाल से प्रति हेक्टेयर 20-30 किलो नाइट्रोजन की बचत होती है. Blue-Green Algae

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