Cluster Beans. राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, गुजरात वगैरह राज्यों के किसान अपनी कम उपजाऊ जमीन में ग्वार की खेती कर के अच्छा मुनाफा हासिल कर सकते हैं. ग्वार की खेती के लिए इन बातों का खयाल रखें:

आबोहवा

ग्वार की अच्छी खेती के लिए गरम आबोहवा की जरूरत होती है. इस की खेती शुष्क इलाकों में की जाती है, क्योंकि इस में सूखे को सहन करने की कूवत होती है. इसे गरम व चमकीले दिनों की जरूरत होती है.

खेत की तैयारी

वैसे तो ग्वार को कई प्रकार की मिट्टियों में उगाया जा सकता है, पर सही पानी निकासी वाली गहरी दोमट मिट्टी सब से अच्छी मानी गई है. इसे रेतीली दोमट मिट्टी में भी आसानी से उगाया जा सकता है.

खेत में 2-3 बार हैरो चला कर खरपतवारों को खत्म कर देना चाहिए. इस के बाद पानी लगा कर 2 बार आरपार जुताई करनी चाहिए.

खाद व उर्वरक

आमतौर पर किसान ग्वार की फसल में खाद व उर्वरकों का इस्तेमाल नहीं करते हैं. अच्छी क्वालिटी वाली उपज के लिए मिट्टी की जांच के आधार पर खाद व उर्वरकों का इस्तेमाल करना जरूरी है. अगर किसी वजह से मिट्टी की जांच न हो सके, तो प्रति हेक्टेयर 8-10 टन गोबर की खाद, 20 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस और 30 किलोग्राम पोटाश का इस्तेमाल करें.

गोबर की खाद को खेत की तैयारी से पहले खेत में समान रूप से बिखेर कर मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई करनी चाहिए. नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश का मिश्रण बना कर आखिरी जुताई के समय खेत में डालना चाहिए. अगर आप की मिट्टी में जिंक की कमी हो, तो वहां पर 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 3 साल में एक बार डालनी चाहिए.

बोने का समय व तरीका

ग्वार की ग्रीष्म कालीन फसल को आमतौर पर मार्च में बोया जाता है, जबकि खरीफ फसल की बोआई का सही समय जून के चौथे हफ्ते से जुलाई के तीसरे हफ्ते तक है. ज्यादा अगेती व ज्यादा पछेती फसल बोने से बढ़वार ज्यादा होती है, जिस से उपज व गुणवत्ता दोनों पर खराब असर पड़ता है.

बीज की मात्रा

बीज की मात्रा उस के उगाने के उद्देश्य पर निर्भर करती है. अगर इसे दाने के लिए उगाया जा रहा है, तो प्रति हेक्टेयर 15-20 किलोग्राम बीज काफी होता है, जबकि चारे वाली फसल के लिए 40-45 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है.

बीज उपचार

ग्वार को फफूंदीजनक बीमारी से बचाने के लिए बीज को बोने से पहले 100 मिलीलीटर स्ट्रेप्टोसाइक्लिन के घोल में 5 घंटे तक भिगोएं. फिर नाइट्रोजन के स्थिरीकरण के लिए बीजों को राइजोबियम कल्चर से उपचारित कर छाया में सुखा कर बोएं.

बोने की विधि

बीज के लिए ग्वार की बोआई के लिए उचित विधि को अपनाना चाहिए, जो उस की उगाई जाने वाली किस्मों पर निर्भर करती है. यदि आप शाखादार किस्म उगाने जा रहे हैं, तो 45×15 सेंटीमीटर और शाखा रहित किस्म के लिए 30×15 सेंटीमीटर की दूरी रखनी चाहिए. बीजों को सीडड्रिल या पोरा विधि से बोया जा सकता है. बीज 4-6 सेंटीमीटर गहराई पर बोने चाहिए.

सिंचाई व जल निकास

ग्वार की सिंचाई इस बात पर निर्भर करती है कि उसे कब बोया गया है. गरमी वाली फसल में खरीफ की तुलना में अधिक सिंचाइयों की जरूरत होती है. गरमी वाली फसल में तापमान के आधार पर सिंचाई करते रहें, जबकि खरीफ में आमतौर पर सिंचाई की जरूरत नहीं होती है. अगर काफी अरसे तक बारिश न हो, तो जरूरत के हिसाब से सिंचाई करें.

कटाई व उपज

रेतीली दोमट में उगाई जाने वाली फसल 110-120 दिनों में तैयार हो जाती है. भारी मिट्टी में उगाई जाने वाली फसल पकने में कुछ अधिक समय लेती है. फसल पकने पर फलियां सूख जाती हैं और पत्तियां गिर जाती हैं. इस अवस्था में फसल की कटाई कर लेनी चाहिए. कटाई करने के बाद फसल को सूखने के लिए छोड़ देना चाहिए. बाद में गहाई कर के दाने अलग कर लिए जाते हैं.

ग्वार की उन्नत किस्में

एफएस 277

यह शाखा रहित सीधी बढ़ने वाली किस्म है. इस की पत्तियां चौड़ी, कटावदार व गहरे रंग की होती हैं. तनों पर फलियां गुच्छों में लगती हैं. इस का दाना मोटा, गहरे भूरे रंग का होता है. इस की प्रति हेक्टेयर 10 से 20 क्विंटल तक उपज होती है.

एचजी 75

यह शाखादार व मध्यम ऊंचाई तक बढ़ने वाली किस्म है, जो 110-120 दिनों में तैयार हो जाती है. तने व शाखाओं पर गुच्छों में फलियां लगती हैं. दाना मोटा व क्रीम के रंग जैसा होता है. इस की प्रति हेक्टेयर 18 से 20 क्विंटल उपज होती है.

दुर्गापुरा सफेद

इस किस्म के पौधे 110-120 सेंटीमीटर तक ऊंचे बढ़ते हैं. इस के दाने सफेद रंग के होते हैं. इस की प्रति हेक्टेयर 7 से 9 क्विंटल तक उपज होती है.

आरजीसी 471

इस किस्म के पौधे 110-120 सेंटीमीटर तक ऊंचे बढ़ते हैं, जो बहुत सारी शाखा वाले होते  हैं. इस की प्रति हेक्टेयर 10 से 14 क्विंटल तक उपज होती है.

आरजीपी 104

यह किस्म 90-95 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. इस का पौधा झाड़ीनुमा होता है, जिस पर काफी शाखाएं होती हैं. इस की पत्तियां हरी व रोएंदार होती हैं. इस की प्रति हेक्टेयर 10 से 12 क्विंटल तक उपज होती है.

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