छत्तीसगढ़ के बस्तर कोंडागांव में प्रकृति आधारित खेती का एक ऐसा अनूठा मॉडल अब राष्ट्रीय स्तर पर वैज्ञानिक मान्यता हासिल कर चुका है, जिसकी चर्चा देशभर में है. यह काम डॉ. राजाराम त्रिपाठी द्वारा विकसित ‘नेचुरल ग्रीनहाउस (Natural Greenhouse) मॉडल’ पर आधारित शोध भारत के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल Current Horticulture के नवीनतम अंक में प्रकाशित हुआ है. यह उपलब्धि केवल बस्तर या छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि देशभर में टिकाऊ, कम लागत और जलवायु-अनुकूल खेती की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है.
वैज्ञानिक मंच पर बनाई पहचान
Current Horticulture का प्रकाशन सोसायटी फॉर हॉर्टिकल्चर रिसर्च एंड डेवलपमेंट (SHRD) द्वारा किया जाता है. यह उद्यानिकी एवं कृषि विज्ञान का प्रतिष्ठित शोध जर्नल है, जिसमें प्रकाशित होने वाले शोधों की देश के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिकों द्वारा वैज्ञानिक समीक्षा (Peer Review) की जाती है. इसलिए किसी तकनीक का इस जर्नल में प्रकाशित होना उसकी वैज्ञानिक उपयोगिता और विश्वसनीयता का महत्वपूर्ण प्रमाण माना जाता है.
क्या है नेचुरल ग्रीनहाउस मॉडल?
यह मॉडल प्राकृतिक वृक्षों की सहायता से खेत में ऐसा सूक्ष्म प्राकृतिक वातावरण तैयार करता है, जो तापमान, नमी और को संतुलित रखने में मदद करता है. इससे फसलों को अत्यधिक गर्मी, सूखे और अन्य जलवायु संबंधी चुनौतियों से सुरक्षा मिलती है और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों को देखते हुए इसे भविष्य की टिकाऊ खेती के प्रभावी विकल्प के रूप में देखा जा रहा है.
लागत में कम, काम में दम
आमतौर पर पारंपरिक प्लास्टिक का पॉलीहाउस लगाने में एक एकड़ पर लगभग 40 लाख रुपए तक खर्च आता है, जबकि नेचुरल ग्रीनहाउस मॉडल केवल 1.5 लाख की लागत में तैयार किया जा सकता है. इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें उपयोग किए जाने वाले वृक्ष समय के साथ अच्छी कीमत देते हैं. इसके अलावा हर वर्ष लगभग 6 टन हरित खाद (ग्रीन मैन्योर) भी प्राप्त होती है.
इस मॉडल में लगाए गए वृक्षों पर काली मिर्च की लताओं को चढ़ाया जाता है जो दो-तीन वर्ष बाद ये लताएं उत्पादन देना शुरू कर देती हैं और 70 से 100 फीट तक की ऊंचाई तक फैल जाती हैं.
एक एकड़ क्षेत्र में काली मिर्च से हर वर्ष लगभग 5 से 10 लाख रुपए तक अतिरिक्त आय प्राप्त होने की संभावना बताई गई है. इस प्रकार वर्टिकल फॉर्मिंग के जरिए सीमित जमीन का अधिकतम उपयोग और अधिक लाभ की संभावनाएं बनती हैं.
एक साथ कई लाभ
नेचुरल ग्रीनहाउस मॉडल केवल संरक्षित खेती तक सीमित नहीं है इसके प्रमुख लाभ हैं—
# वर्षा जल संरक्षण
# बड़ी मात्रा में हरित खाद एवं जैविक बायोमास का उत्पादन
# मिट्टी की उर्वरता में सुधार
# कार्बन संरक्षण
# बहुफसली खेती की सुविधा
# खेती की लागत में कमी और आय में वृद्धि
इन विशेषताओं के कारण यह मॉडल पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ कृषि, दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
वैज्ञानिक जर्नल में प्रकाशित होने से पहले ही यह मॉडल देश के अनेक राज्यों के प्रगतिशील किसानों द्वारा अपनाया जा चुका है. अब वैज्ञानिक मान्यता मिलने के बाद इसकी तकनीकी विश्वसनीयता और बढ़ गई है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि इससे प्रकृति आधारित कृषि प्रणालियों पर नए शोध और नवाचार को भी प्रोत्साहन मिलेगा.
काली मिर्च के लिए मिली पहचान
डॉ. राजाराम त्रिपाठी इससे पहले ‘मां दंतेश्वरी ब्लैक पेपर-16 (MDBP-16)’ नामक उच्च उत्पादक काली मिर्च की किस्म विकसित कर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके हैं. यह किस्म दक्षिण भारत के बाहर भी कई राज्यों में सफलतापूर्वक उगाई जा रही है और अधिक उत्पादन क्षमता के कारण किसानों में लोकप्रिय हो रही है.
अपनी इस उपलब्धि पर डॉ. राजाराम त्रिपाठी का कहना है कि जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निबटने के लिए प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने वाली खेती ही भविष्य का रास्ता है.
कृषि के भविष्य की नई दिशा
बस्तर में विकसित यह मॉडल अब केवल एक स्थानीय प्रयोग नहीं, बल्कि वैज्ञानिक रूप से मान्यताप्राप्त ऐसी तकनीक बन चुका है, जो कम लागत, पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य को एक साथ पूरा करने की क्षमता रखता है. यदि इसका व्यापक स्तर पर प्रसार होता है, तो यह भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया में भी टिकाऊ कृषि के एक प्रभावी मॉडल के रूप में स्थापित हो सकता है.





