Vegetable Farming.उत्तर प्रदेश के बस्ती, अंबेडकर नगर, संतकबीर नगर व गोरखपुर समेत कई जिलों से बहने वाली घाघरा नदी की बाढ़ हर साल किसानों की हजारों हेक्टेयर फसल तहसनहस कर के चली जाती है और छोड़ जाती है अपने साथ लाई गई रेत. बाढ़ के कारण किसानों की खेती की जमीनें बेकार होती जा रही हैं और किसानों के सामने जीवनयापन की समस्या भी खड़ी होती जा रही थी.
इसी घाघरा नदी के द्वारा बरबाद की गई हजारों हेक्टेयर जमीन में किसानों ने खेती की तरकीब खोज कर बाढ़ के अभिशाप को झूठा साबित कर दिया है. घाघरा नदी द्वारा फैलाई रेत में किसानों ने सब्जियों की खेती कर अपनी माली हालत में सुधार लाने का काम कर दिखाया है.
यहां लहलहा रही हरीभरी सब्जियों की खेती में किसानों ने 24 घंटे मेहनत कर के नाममात्र की लागत से हजारों हेक्टेयर में कद्दू, लौकी, नेनुआ, तरबूज, खीरा ककड़ी की खेती कर के यह साबित कर दिया है कि खेती में किसी तरह की कठिनाई किसानों को मुंह मोड़ने के लिए मजबूर नहीं कर सकती.
यहां के किसान फरवरी महीने में इन सब्जियों की फसलों को उगाने की तैयारी करते हैं. गोबर की खाद को इस रेत में एक से डेढ़
फुट के गड्ढे बना कर भरते हैं. इस के बाद इन गड्ढों में मटकों से पानी भरा जाता है. एक हफ्ते बाद सब्जियों के बीज रोपित किए जाते हैं. 7 से 14 दिनों में रोपित किए गए बीज अंकुरित हो जाते हैं. फिर किसान मूज की बाड़ लगाते हैं जिस से हवाओं से उड़ने वाली रेत से पौधों को बचाया जा सके. फरवरी से जून महीने तक किसानों की जिंदगी अपने घरों से दूर दिनरात इसी रेत में गुजरती है.
लागत कम मुनाफा ज्यादा: किसानों को खेती के लिए न तो खेत की जुताई करवानी पड़ती है और न ही सब्जियों की फसलों में केमिकल व कीटनाशकों को इस्तेमाल करना पड़ता है. बस वह अपने घरों से इकट्ठा की गई गोबर की खाद को इन सब्जियों की फसल को देते हैं. जिस की वजह से इन की लागत नाममात्र की होती है. यहां फसलों में बीमारी या कीट का हमला होने पर किसान अपने घरों पर तैयार की गई जैविक कीटनाशी का इस्तेमाल करते हैं. यही वजह है कि किसानों को अपनी उपज का मार्केट में अच्छा दाम मिलता है.
अंबेडकर नगर जिले की टांडा तहसील के जिलाजीत यादव ने अपनी रेतीली जमीन में से 2 हेक्टेयर में तरबूज की फसल लगा रखी है. वे कहते हैं कि हम लोगों का 5 महीने का समय इसी रेत के बीच सब्जियों को उगाने से ले कर बेचने तक बीतता है. सब्जियों की देखभाल बहुत जरूरी है. 2 हेक्टेयर की फसल उगाने में पूरा खर्च मात्र 20 हजार रुपए आता है जबकि मईजून महीने तक हम लोग 3-4 लाख रुपए की आमदनी हासिल कर लेते हैं.
तकनीक का इस्तेमाल: हर साल बाढ़ की मार झेलने वाले किसान 5 महीने से कम समय में पूरे साल के जीवन यापन का इंतजाम यहां सब्जियां उगा कर कर लेते हैं. सब्जियों
की खेती घाटे का सौदा न बनने पाए इस के लिए ये लोग कृषि व उद्यान विभाग से सलाह लेने व सहायता लेने के साथ कम लागत में अधिक फसल देने वाली वैरायटी का चयन करते हैं.
किसानों ने घाघरा नदी की रेत में सब्जियों का उत्पादन कर के अच्छी आमदनी हासिल कर के यह साबित कर दिया है कि अगर खेती करने के तौरतरीकों को बदला जाए और नए तकनीकी ज्ञान का इस्तेमाल कर के खेती की जाए तो निश्चित ही बंजर जमीन भी हरा सोना उगल सकती है. Vegetable Farming





