Rice Crops. देश में तकरीबन 45 मिलियन हेक्टेयर रकबे में धान की खेती की जाती है. कहींकहीं तो धान की 2 फसलें तक किसान लेते हैं. यह बहुत नाजुक फसल है. नर्सरी से ले कर कटाई तक कभी भी कोई भी कीट या बीमारी फसल को पूरी तरह तबाह कर सकती है.

खेती की बढ़ती लागत के चलते किसानों के ऊपर ज्यादा पैदावार लेने का दबाव बना रहता है. इसलिए जरूरी हो जाता है कि खेती में वैज्ञानिक तकनीकों को अपना कर ज्यादा पैदावार ली जाए.

ज्यादा पैदावार लेने के लिए बहुत सी बातों को ध्यान में रखना पड़ता है, जैसे अच्छी किस्में, खेत की उपजाऊ ताकत, संतुलित मात्रा में खाद, समय पर बोआई, समय पर कीटबीमारी की रोकथाम और खरपतवार की रोकथाम वगैरह.

कैसे करें रोकथाम

यहां हम धान की फसल में खरपतवारों की रोकथाम के बारे में बता रहे हैं:

खरपतवार फसल की पैदावार 10 से 90 फीसदी तक कम कर देते हैं और फसल को दी जाने वाली खुराक को छीन लेते हैं, जिस का सीधा असर पैदावार पर पड़ता है.

खरपतवारों की रोकथाम के लिए बहुत सी बातों पर ध्यान देने की जरूरत होती है, जैसे बीज में किसी भी तरह के खरपतवार के बीज नहीं मिले होने चाहिए. खेत की तैयारी के समय पूरी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद डालनी चाहिए. फसल की कटाई के समय खरपतवार के बीज अलग करना, पानी देने की नालियों मेंड़ों पर खरपतवार नहीं उगने देना वगैरह बातों को ध्यान में रखना चाहिए.

अच्छी पैदावार हासिल करने के लिए हमेशा प्रमाणिक बीज का ही इस्तेमाल करें, गरमी के मौसम में खेत का पलेवा कर के 15-20 दिन बाद गहरी जुताई कर के खरपतवारों को खत्म कर दें. पौध रोपाई के 20-25 दिन बाद निराईगुड़ाई कर के खरपतवारों के पौधे खेत से निकाल दें.

धान की खेती अगर श्री विधि से की जाती है तो पानी की काफी बचत होती है और लागत में कमी आती है, पैदावार भी ज्यादा मिलती है. इस तरीके को सिस्टम आफ राइस इंटेंसीफिकेशन यानी एसआरई कहते हैं. इस में पौध रोपाई के 10, 20 और 30 दिन बाद खेत में 3-4 सेंटीमीटर पानी भर कर कोनो वीडर मशीन को चला कर खरपतवारों को कुचल कर मिट्टी में मिला देते हैं और बचे पौधों को हाथ से उखाड़ कर निकाल देते हैं. Rice Crops

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