Progressive Farmer : गुलाब की चीजें (Rose Products) बनाने वाले माली

Progressive Farmer : राजस्थान के राजसमंद जिले का खमनोर गांव गुलाब की खेती के लिए जाना जाता है. यहां के कई किसान गुलाब की खेती कर के व गुलाब के उत्पाद (Rose Products)  तैयार कर के अपनी रोजीरोटी चलाते हैं. इन में से एक किसान गणेश माली से जब भेंट की तो उन्होंने अपनी सफलता की कहानी बताई.

गणेश माली (Progressive Farmer) ने बताया कि उन के पास 3 बीघे जमीन है, जिस पर पिता किशन लाल सालों से गुलाब की खेती करते रहे हैं. अब उन के बूढ़े होने से यह काम गणेश ने संभाल लिया है. उन के दादा भी गुलाब की खेती किया करते थे. इस क्षेत्र में गुलाब की खेती बहुत पुरानी कही जा सकती है. गुलाब की खेती करतेकरते गणेश के पिताजी ने बाद में गुलकंद और गुलाबजल (Rose Products)  बनाना शुरू किया.

गणेश माली (Progressive Farmer) ने 2010 से गुलाब का शरबत (Rose Products) बनाना शुरू किया था. उदयपुर कृषि महाविद्यालय ने यहां के किसानों को शरबत बनाना सिखाया था, इस के लिए गणेश भी उदयपुर गए थे. पिछले साल उन्हें 50 हजार रुपए की आमदनी फूलों से हुई थी, वहीं गुलाब के फूलों से गुलकंद, शरबत व गुलाबजल बना कर बेचने से करीब 50 हजार रुपए की कमाई हुई थी. 2013 में उन्होंने गुलाब से तैयार की गई चीजों को बिहार में बेचने के लिए भेजा था.

उन्होंने बताया कि गुलाब से गुलाबजल (Rose Products) , इत्र व रस आसवन विधि द्वारा बनाए जाते हैं. इस विधि के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि इस के लिए खास तरीके से बनाई गई भट्ठी  पर तांबे का छोटे मुंह वाला एक बड़ा देग चढ़ाया जाता है, जिसे पानी से आधा भरने के बाद उस में करीब 5 हजार गुलाब के फूल डाले जाते हैं. बाद में देग का मुंह ढक्कन लगा कर बंद कर दिया जाता है.

देग के मुंह पर कपड़े की पट्टी बांध कर मिट्टी का लेप किया जाता है, ताकि भाप बाहर न निकले. दूसरी ओर इस देग के मुंह पर एक लंबा व घुमावदार पाइप लगा होता है, जिस का एक सिरा ठंडे पानी में रखे एक बरतन से जोड़ा जाता है, जिस में देग से निकलने वाली भाप ठंडी हो कर गुलाबजल में बदल जाती है. भट्ठी 7-8 घंटे चलती है. 5 हजार फूलों से करीब 50 बोतल गुलाबजल बनता है.

ज्यादा फूलों से कम गुलाबजल बनाए जाने पर वह बहुत बढि़या किस्म का होता है, जबकि ज्यादा माल तैयार करने पर गुलाबजल अच्छी किस्म का नहीं बनता. करीब 500 फूलों से 1 लीटर गुलाबजल तैयार किया जाए तो वह अच्छा होता है.

गणेश माली ने बताया कि वे अपने गुलाबों से तैयार गुलकंद 300 रुपए प्रति किलोग्राम, गुलाबजल 100 रुपए प्रति लीटर और शरबत 150 रुपए प्रति लीटर की दर से गणेश चैत्री रोज प्रोडक्शन के नाम से बेचते हैं.

गुलाब के इत्र के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि चंदन के तेल में गुलाब के रस का इस्तेमाल कर के इत्र बनाया जाता है. 1 लीटर चंदन के तेल को 1 से डेढ़ लाख फूलों के रस के साथ 10 बार छान कर इत्र बनता है.

उन्होंने बताया कि यह तरीका बहुत लंबा है और इस में मेहनत भी करनी पड़ती है.

1 किलोग्राम इत्र 2 से ढाई लाख रुपए में बिकता है, जिसे खरीदना हर किसी के बूते से बाहर है. कोई बड़ा सेठ ही इसे खरीदता है. ऐसे लोगों के कहने पर ही हम लोग गुलाब का इत्र बनाते हैं.

चैत्र महीने में होने वाली यह फसल

15 मार्च और 15 अप्रैल के बीच होती है. खासतौर से 20 दिनों की गुलाब की यह फसल मौसम पर टिकी होती है. चैत्री गुलाब की पंखुडि़यां पतली होने के कारण नाजुक होती हैं, जो गरमी बरदाश्त नहीं कर पातीं. उन्होंने बताया कि अच्छे मौसम में 1 बीघे में 2 लाख रुपए की फसल होती है, जिस में 50 हजार रुपए मजदूरी चली जाती है. लेकिन पिछले 5 सालों से पैदावार में कमी आ रही है, क्योंकि जिस समय गरमी चाहिए उस समय गरमी नहीं मिलती और जब सर्दी की जरूरत होती है, उस वक्त मौसम गरम हो जाता है.

Horticulture India : आत्मनिर्भर भारत में बागबानी क्षेत्र की अहम भूमिका

Horticulture India: आज बागबानी क्षेत्र कृषि उत्पादन में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रहा है और किसानों की आय बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रहा है. Horticulture India

सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ में कुलपति ने कॉलेज ऑफ हॉर्टिकल्चर का निरीक्षण किया और वहां पर चल रहे शोध कार्यों का अवलोकन किया. हॉर्टिकल्चर कॉलेज में उन्होंने हाईटेक नर्सरी जिसमें लौकी, खीरा बैगन और टमाटर का उत्पादन किया जा रहा है, उसका अवलोकन किया. इसके अलावा हाइड्रोपोनिक तकनीक द्वारा सलाद पत्ता एवं वर्टिकल फार्मिंग द्वारा स्ट्रॉबेरी के उत्पादन को देखा. Horticulture India

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हर्बल गार्डन गार्डन का भ्रमण करने के दौरान कुलपति ने और अधिक हर्बल पौधों का उत्पादन करने और इन पौधों को न्यूनतम दर पर किसानों को उपलब्ध कराने के लिए निर्देश दिए.

लाभकारी है बागबानी

कुलपति डॉ. त्रिवेणी दत्त ने कहा कि भारत में बागबानी (हॉर्टिकल्चर) की वर्तमान स्थिति अत्यंत सशक्त और आशाजनक है. फल, सब्जी, फूल, मसाले और औषधीय पौधों के उत्पादन में भारत विश्व के अग्रणी देशों में शामिल है. आज बागबानी क्षेत्र कृषि उत्पादन में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रहा है और किसानों की आय बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रहा है. सीमित भूमि में अधिक उत्पादन, कम समय में बेहतर लाभ और निर्यात की व्यापक संभावनाएं इस क्षेत्र की प्रमुख विशेषताएं हैं.

तकनीक से तरक्की

कृषि की आधुनिक तकनीकों, संरक्षित खेती, ड्रिप सिंचाई और उच्च गुणवत्ता वाली किस्मों के उपयोग से उत्पादन एवं गुणवत्ता में निरंतर वृद्धि हो रही है. बागबानी से पोषण सुरक्षा सुनिश्चित होती है तथा ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर सृजित होते हैं. आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य की प्राप्ति में बागबानी क्षेत्र की भूमिका निरंतर बढ़ रही है. Horticulture India

डॉक्टर त्रिवेणी दत्त ने बताया कि भारत में हॉर्टिकल्चर क्रॉप्स की मांग लगातार बढ़ रही है और जिन किसानों ने कृषि के विविधीकरण को अपनाकर हॉर्टिकल्चर क्रॉप्स का अपनी खेती में समावेश कर लिया है, उनकी आय में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है.

किसानों को मिल रहे अच्छे दाम

प्रोफेसर आरएस सेंगर का कहना है कि दिल्ली के पास यह क्षेत्र होने के कारण सब्जी और फल-फूल के दाम किसानों को अच्छे मिल सकते हैं, इसलिए यहां के किसानों को इस ओर भी ध्यान देना होगा.

आज बागबानी का क्षेत्र किसानों के लिए उन्नति की नई राह बना रहा है. Horticulture India

Guava Farming : प्रकृति प्रेम ने शिक्षक को बनाया किसान

मध्य प्रदेश की राजधानी से करीब 500 किलोमीटर दूर सतना जिले का छोटा सा गांव है किटहा, जहां पहाड़ों की हरियाली है, वहां 42 वर्षीय मनोज कुमार पांडेय ने अपने जीवन को शिक्षा और खेती के दो पहलुओं में साकार किया है. मनोज न केवल एक समर्पित शिक्षक हैं, बल्कि एक संघर्षशील किसान भी हैं, जिन्होंने अपने परिश्रम और दूर दृष्टि से अमरूद की खेती (Guava Farming) के माध्यम से अपनी पहचान बनाई है.

अमरूद की खेती (Guava Farming) की नई शुरुआत

प्याज की खेती में नुकसान के बाद, मनोज ने 2022 में अमरूद की खेती (Guava Farming) शुरू करने का निर्णय लिया. यह कदम आसान नहीं था, लेकिन उनकी दूरदृष्टि और मेहनत ने इसे संभव बनाया. उन्होंने शुरुआत में 50 पेड़ लगाए, जिन्हें संजय निकुंज उद्यान अमिलपुर से 40-50 रुपये प्रति पेड़ की कीमत पर खरीदा. इसके बाद, 250 पेड़ मझगवां की गहिरा नर्सरी से मात्र 10-12 रुपये प्रति पेड़ की दर पर लाए और करीब 0.5 एकड़ जमीन पर 300 अमरूद के पेड़ों का बगीचा तैयार करने में उन्होंने लगभग 90,000 रुपये खर्च किए. पेड़ों की देखभाल, खाद, बीज, पानी, और मजदूरी में यह लागत आई.

मनोज बताते हैं – “पहले साल केवल तैयारी और देखभाल में वक्त लगा. लेकिन मुझे पता था कि यह मेहनत रंग लाएगी. खेती धैर्य का खेल है.”

अमरूद के बगीचे की सफलता

आज, उनके बगीचे में रायपुर और इलाहाबाद की किस्म के अमरूद के पेड़ हैं, जो 10 फीट से भी ऊंचे हो गए हैं. हर पेड़ से 20-25 किलो अमरूद का उत्पादन हो रहा है. उन्होंने इस साल 50-60 क्विंटल अमरूद की उपज प्राप्त की, जो लोकल बाजार में 2000-2500 रुपये प्रतिदिन बिक रही है.

मनोज गर्व से बताते हैं – “इस साल का मुनाफा 70 से 75 हजार रुपये तक होगा. पिछले साल की लागत निकालने के बाद यह सीधा लाभ है. यह मेरी मेहनत और धैर्य का फल है.”

शिक्षक से किसान बनने की यात्रा

मनोज कुमार पांडेय पेशे से प्राथमिक शिक्षक हैं. वह अपने गांव से 5 किमी दूर जैतवारा के शासकीय उच्चतर माध्यमिक कन्या विद्यालय के प्राथमिक विभाग में कार्यरत हैं. शिक्षा के प्रति उनकी निष्ठा और बच्चों को बेहतर भविष्य देने की लगन अद्वितीय है. मनोज बताते हैं – “गांव में शिक्षक होना सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है. बच्चों को बेहतर शिक्षा देना मेरी प्राथमिकता है, लेकिन खेती से जुड़ाव मुझे अपने पूर्वजों की धरती से जोड़ता है.”

मनोज के पिता विद्याधर पांडेय, जो पेशे से जिला एवं सत्र न्यायालय में शपथ आयुक्त थे, ने भी उन्हें मेहनत और लगन की शिक्षा दी. यही कारण है कि अपने व्यस्त शैक्षणिक कार्यक्रम के बावजूद, मनोज ने अपनी खाली समय का उपयोग खेती के लिए किया.

Guava Farming

प्याज की खेती में असफलता से मिली प्रेरणा

साल 2010 से 2012 के बीच, मनोज ने प्याज की खेती में अपनी किस्मत आजमाई. दो एकड़ जमीन पर प्याज की खेती करने में तीन सालों में करीब तीन लाख रुपये की लागत आई. हालांकि, असमय बारिश और बाजार में उचित मूल्य न मिलने के कारण, उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा. मनोज उस समय को याद करते हुए कहते हैं कि, प्याज की खेती ने मुझे सिखाया कि खेती सिर्फ मेहनत नहीं, बल्कि समझदारी और सही योजना का खेल है. तब मैंने सीखा कि हमें हमेशा विकल्प तैयार रखना चाहिए.

खेती और जीवन का संतुलन

मनोज के जीवन में शिक्षा और खेती का अनूठा संतुलन देखने को मिलता है. वह सुबह बच्चों को पढ़ाने जाते हैं और शाम को अपने बगीचे की देखभाल करते हैं. उनके इस समर्पण ने गांव के अन्य किसानों को भी प्रेरित किया है. मनोज का मानना है कि खेती को आधुनिक तकनीक और परंपरागत ज्ञान के साथ जोड़ा जाए तो सफलता सुनिश्चित है. उनका कहना है – “खेती में जोखिम जरूर है, लेकिन सही प्लानिंग और मेहनत से इसे फायदेमंद बनाया जा सकता है. अगर मैं शिक्षक होते हुए ऐसा कर सकता हूं, तो बाकी किसान भी कर सकते हैं.”

भविष्य की योजना

मनोज कहते हैं – “मेरे लिए हर अमरूद सिर्फ एक फल नहीं, बल्कि मेरी मेहनत और सपनों का प्रतीक है. जब लोग मेरे बगीचे में आकर मेरी तारीफ करते हैं, तो मुझे लगता है कि मेरी मेहनत सार्थक हुई.”

वे अब अपनी खेती का विस्तार करना चाहते हैं. उनकी योजना है कि वह अन्य फलों जैसे आम और नींबू की खेती भी शुरू करें. साथ ही, वह किसानों को प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का सपना देखते हैं. उनका मानना है कि, सतना जिले के किसान अगर मिल-जुलकर काम करें तो इसे फलों की खेती का हब बनाया जा सकता है.

एक प्रेरणादायक कहानी

मनोज कुमार पांडेय की कहानी सिर्फ एक किसान की नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की है जिसने संघर्षों से लड़कर अपने जीवन को बेहतर बनाया. यह कहानी हमें सिखाती है कि मेहनत, लगन, और धैर्य से कोई भी चुनौती को अवसर में बदला जा सकता है. मनोज की यह यात्रा हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है जो हार मानने की बजाय नए रास्ते तलाशने का साहस रखता है.

Guava : अमरूद की खेती से ज्यादा मुनाफा कैसे कमाएं

Guava : अमरूद कभी इतना सस्ता बिकता था कि इसे लोग गरीबों का सेब कहते थे. लेकिन अब जैसेजैसे अमरूद (Guava) की अहमियत लोगों को पता चलने लगी है, तो यह किसी भी दूसरे फल से पीछे नहीं रहा.

अमरूद (Guava) को आमतौर पर किसी भी प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है. फिर भी अच्छी पैदावार के लिए बलुई दोमट मिट्टी ज्यादा ठीक है. कभीकभी क्षारीय मिट्टी में उकटा रोग हो सकता है.

पौध लगाने का समय : अमरूद की पौध जुलाईअगस्त में लगाई जाती है, लेकिन जहां सिंचाई के सही साधन हैं वहां फरवरीमार्च के महीने में भी पौधे रोपे जा सकते हैं.

पौध रोपने से पहले जमीन को अच्छी तरह से जोत कर एकसार कर लें और 6 मीटर की दूरी पर गड्ढे खोद लें. गोबर की खाद व आर्गेनिक खाद को उन गड्ढों की मिट्टी में अच्छी तरह से मिला दें. इस मिट्टी को वापस उन गड्ढों में भर दें. इस के बाद गड्ढों की सिंचाई कर दें. ऐसा करने से मिट्टी गड्ढे में बैठ जाएगी. इस के बाद पौधों को उन गड्ढों के बीच में लगा दें व फिर से हलकी सिंचाई कर दें.

अगर हम सिंचाई से पहले ही पौधे गड्ढे में लगा देंगे, तो गड्ढे में सिंचाई करने पर पौधे इधरउधर हो जाएंगे यानी ठीक से नहीं लग पाएंगे.

पौधों की सिंचाई सर्दी के मौसम में 10-15 दिनों में करनी चाहिए, जबकि गरमी के दिनों में 1 हफ्ते में पौधों को पानी देना चाहिए.

खरपतवार व कीट रोकथाम: पौधे लगाने के 15-20 दिनों बाद  निराईगुड़ाई कर के तमाम खरपतवार निकाल दें. गड्ढों को ठीक कर के उन्हें खूबसूरत थालों का रूप भी दे दें, जिस से ज्यादा पानी बरबाद न हो व बाग की सुंरदता भी बनी रहे.

पौधों व फलों में बरसात के दिनों में कीटों का प्रकोप ज्यादा रहता है, जिस से पौधों व फलों की बढ़वार पर असर तो पड़ता ही है फलों की गुणवत्ता भी खराब हो जाती है, जिस से बाजार भाव भी कम मिलता है.

अमरूद (Guava) के पेड़ों पर छाल खाने वाले कीट, फलछेदक कीट, फल में अंडा देने वाली मक्खी व शाखाबेधक कीट लगते हैं. इन के प्रकोप से बचने के लिए नीम की पत्तियों को पानी में अच्छी तरह उबाल लें फिर उस को ठंडा कर के उस से पेड़ों पर छिड़काव करें.

Guava

कीटों के अलावा अमरूद (Guava) में दूसरी बीमारियां भी होती हैं, जिन में उकटा रोग व तना कैंसर प्रमुख हैं. इस प्रकार के रोगों से बचाव के लिए रोगी पौधे को निकाल कर नष्ट कर दें या रोग से पीडि़त डाली को काट कर हटा दें और उसे जला कर खत्म कर दें. जहां से डाली काटी है, वहां कटे हिस्से पर ग्रीस लगा दें. पेड़ के रोग पीडि़त भाग को खेत में यों ही न फेकें, वरना उस से दूसरे स्वस्थ पेड़ों में भी रोग लगने का खतरा रहता है.

उपज : पेड़ों पर फूल आने के 3 महीने बाद से फल पकने लगते हैं. जब फलों का रंग हलका पीलापन लेने लगे, तब उन को तोड़ लें. उन्हें साथसाथ मंडी में भेजते रहें, क्योंकि अमरूदों का ज्यादा समय तक भंडारण नहीं कर सकते. ज्यादा समय तक रखने से अमरूदों (Guava) का ताजापन खत्म होने लगता है. आमतौर पर एक ठीकठाक अमरूद के पेड़ से तकरीबन 500 अमरूद मिल जाते हैं.

Marigold Flowers : मालदार बनाए गेंदा फूल

Marigold Flowers  : चमकीले पीले और मैरून रंग के गेंदे के फूलों (Marigold Flowers) की खेती से किसानों की जिंदगी में हरियाली आ सकती है. विवाह समेत कई उत्सवों और जलसों में सजावट के साथ ही कई तरह की दवाओं को बनाने में भी गेंदे के फूलों (Marigold Flowers) का इस्तेमाल होता है. इस की सब से बड़ी खासीयत यह है कि पूरे साल इस की खेती की जा सकती है. इस की खेती किसानों को मालदार बनाती है.

कृषि वैज्ञानिक बृजेंद्र मणि बताते हैं कि गेंदे के फूल 2 किस्म के होते हैं. एक है अफ्रीकन किस्म और दूसरी है फ्रेंच किस्म. अफ्रीकन किस्म के गेंदे के फूल और पौधे दोनों का आकार बड़ा होता है. पूसा नारंगी, पूसा बसंती, अफ्रीकन एलो, जाइट डबल, जाइट औरेंज इस की खास किस्में हैं. फ्रेंच गेंदे के पौधे और फूल दोनों ही छोटे होते हैं. कपिड एलो, रस्ती एलो, रेड ब्रोकेड, बटर स्कौच, लोकल इस की मुख्य किस्में हैं.

गेंदे के फूलों (Marigold Flowers) की खेती से किसानों को भरपूर कमाई होती है. बाजार में इन की मांग और खपत हमेशा बरकरार रहती है. 1 हेक्टेयर खेत में 10 से 15 लाख फूल पैदा किए जा सकते हैं. हर साल प्रति हेक्टेयर से 5 से 8 लाख रुपए तक की कमाई हो सकती है. थोक बाजार में गेंदे के फूल की बड़ी माला 8 रुपए में और छोटी माला 4 रुपए में मिलती है, जबकि खुदरा बाजार में बड़ी माला 15 से 20 रुपए और छोटी माला 8 से 12 रुपए में बिकती है.

गेंदे की खेती करने वाली पटना से सटे मसौढ़ी प्रखंड के कटका गांव की किसान रजिया सुल्ताना कहती हैं कि पूरे साल लगातार फूल लेने के लिए बीजों की नर्सरी 3 बार उगानी पड़ती है.

Marigold Flowers

पहली बार मईजून महीने में बीज को लगा कर जुलाई महीने में पौधों की रोपनी की जाती है. दूसरी बार बीजों को सितंबर के आखिरी महीने में और फिर पौधों को नवंबर के पहले हफ्ते में लगाया जाता है. तीसरी बार जनवरीफरवरी में बीज लगाए जाते हैं और उस से उगे पौधों को मार्च में लगा दिया जाता है.

गेंदे के पौधों को बीज और कटिंग दोनों ही तरीकों से तैयार किया जा सकता है. बीज से तैयार पौधे कटिंग के जरीए तैयार पौधों से ज्यादा मजबूत और उपजाऊ होते हैं. केवल फ्रेंच गेंदे और वर्ण संकर पौधों की कटिंग से बने पौधे बीज वाले पौधों से बेहतर होते हैं.

किसानों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जब पौधे 4-5 पत्तियों वाले हो जाएं तो उन की रोपनी कर देनी चाहिए. बड़े पौधे वाली किस्मों को लाइन से लाइन 45 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे 35 सेंटीमीटर की दूरी पर लगाना चाहिए. गरमी के मौसम में हफ्ते में 2 बार सिंचाई करनी चाहिए, जबकि बलुई मिट्टी में 2-3 दिनों के अंतराल पर पानी डालने की जरूरत होती है.

गेंदे की व्यावसायिक खेती के लिए मिट्टी की जुताई कर के उसे भुरभुरा बना लें. इस की खेती के लिए गहरी बलुई, दोमट और उवैर मिट्टी काफी मुफीद है. इस की खेती उसी जमीन पर करें, जहां से पानी की निकासी का अच्छा इंतजाम हो. खेत की मिट्टी को भुरभुरा बना कर प्रति हेक्टेयर 350 किलोग्राम नाइट्रोजन व 200 किलोग्राम फास्फोरस डालनी चाहिए. 250 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर डालने से फूलों का उत्पादन काफी बढ़ जाता है.

अफ्रीकन गेंदे के अच्छे फूलों की पैदावार के लिए रोपनी के 30 से 40 दिनों के बाद जब पहली कली नजर आए, तो शाखाओं के अगले भाग को 2 से 3 सेंटीमीटर काट कर निकाल देने से शाखाओं की संख्या बढ़ जाती है. इस से पौधे ज्यादा घने और झाड़ीदार हो जाते हैं,जिस वजह से फूलों का आकार और संख्या दोनों बढ़ जाती है.

रोपे जाने के 60 से 70 दिनों के बाद पौधे फूल देने के लिए पूरी तरह से तैयार हो जाते हैं. गेंदे के फूलों (Marigold Flowers) को सुबह या शाम के वक्त ही तोड़ना चाहिए. फूलों की तोड़ाई के समय अगर खेतों में नमी हो तो तोड़े गए फूल ज्यादा समय तक ताजा रहते हैं.

Horticulture Crops : बागबानी फसलें किसानों को दे रही हैं लाभ

Horticulture Crops : किसान अपने खेतों में परंपरागत फसलें जैसे गेहूं, चना, मटर, सरसों, जौ, बाजरा, मक्का, ज्वार, धान आदि बो कर उत्पादन करते हैं, पर अगर वे अपने कुछ खेतों में बागबानी (Horticulture Crops) फसलें बोएं तो उन्हें अच्छाखासा लाभ होगा.

उत्तर प्रदेश की विविधतापूर्ण जलवायु सभी प्रकार की बागबानी फसलों के उत्पादन के लिए उपयुक्त है. बागबानी फसलों के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के फलों पपीता, अमरूद, केला, आम, अंगूर, और बेल आदि शाकभाजी में फूलगोभी, बंदगोभी, मटर, टमाटर, शलगम, आलू, प्याज, लौकी, कद्दू, गाजर आदि, मसालों में धनिया, हलदी, सौंफ, जीरा, मिर्च, लहसुन आदि, औषधीय खेती में एलोवेरा, अश्वगंधा, सर्पगंधा, पिपरमैंट, शतावरी, तुलसी, ब्राह्मी आदि फसलें बो कर किसान अच्छाखासा लाभ प्राप्त कर रहे हैं. बागबानी खेती के लिए सरकार अनुदान भी दे रही है, जिस का लाभ किसानों को मिल रहा है.

उत्तर प्रदेश के कृषि सैक्टर के विकास में लगभग 28 फीसदी औद्यानिक फसलों का योगदान होता है. प्रदेश में अधिकतर छोटे, लघु और मध्यम किसानों द्वारा परंपरागत खेती के स्थान पर बागबानी खेती को अपना कर फसलें उत्पादित कर आर्थिक लाभ लिया जा रहा है.

Horticulture Crops

बागबानी फसलों का कृषि एवं संवर्गीय क्षेत्र के सकल घरेलू उत्पादन में महत्त्वपूर्ण योगदान है. बागबानी फसलें (Horticulture Crops) इकाई क्षेत्र से अधिक आय, रोजगार एवं पोषण उपलब्ध कराने में सक्षम है.

बागबानी फसलें (Horticulture Crops) विविधतापूर्ण होती हैं. बढ़ती मांग तथा कृषि में महत्त्वपूर्ण योगदान, फसलों के व्यावसायीकरण, विविधीकरण से प्रदेश सरकार बागबानी फसलों के क्षेत्रफल में विस्तार करते हुए किसानों को हर तरह की सुविधा दे रही है. प्रदेश सरकार पुराने आम, अमरूद, आंवला आदि के अनुत्पादक बागों का जीर्णाेद्वार करा कर उन के उत्पादन में बढ़ोतरी कर रही है, साथ ही गुणवत्तायुक्त रोपण सामग्री का उत्पादन कर पौधों को अधिक से अधिक रोपण हेतु किसानों, उत्पादकों को दे रही है, जिस से संबंधित फसल का वे अधिक से अधिक उत्पादन कर सकें. विभिन्न फलों/शाकभाजी/मसालों/औषधियों की फसलों के तुड़ाई/कटाई के बाद उन के रखरखाव के उचित प्रबंधन, वाजिब मूल्य पर विक्रय करा कर किसानों को उन की फसल का मूल्य दिलाने सहित बागबानी फसलों को बढ़ावा देते हुए सरकार प्राथमिकता से क्रियान्वयन करा रही है.

प्रदेश के उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग द्वारा प्रदेश में फल, शाकभाजी, आलू, पुष्प, मसाले, औषधीय एवं सगंधपौधों, पान विकास के साथसाथ सहायक उद्यम के रूप से मौनपालन, मशरूम उत्पादन, खाद्य प्रसंस्करण, पान की खेती आदि के लिए विभिन्न योजनाएं संचालित की हैं, जिन का लाभ किसानों को दिया जा रहा है. प्रदेश में एकीकृत बागबानी विकास मिशन, ड्रिप/स्प्रिंकलर सिंचाई की स्थापना, औषधीय पौध मिशन, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति बाहुल्य क्षेत्र में बागबानी विकास के माध्यम से कृषकों को अनुदान देते हुए उन के उत्पादन में वृद्धि की जा रही है.

Horticulture Crops

प्रदेश में विभिन्न फसलों को खाद्य प्रसंस्करण करने के लिए स्थापित इकाइयों में आवश्यक मानव संसाधन की दृष्टि से भी बागबानी फसलों के किसानों, कृषि मजदूरों को रोजगार प्राप्त हो रहा है.

प्रदेश सरकार द्वारा संचालित विभिन्न योजना के तहत प्रदेश में एक लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में नवीन उद्यान रोपण, शाकभाजी बीज, पुष्प, मसाला औषधीय फसलों का विस्तार किया गया है. औफ सीजन हाई वैल्यू सब्जी व पुष्प उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए ग्रीन हाउस एवं शेडनैट हाउस का निर्माण कराते हुए किसानों को लाभान्वित किया गया.

कृषि कल्याण अभियान के अंतर्गत गांवों में किसानों को तकनीकी जानकारी व पौधे तथा बीज वितरित किएजा रहे हैं. प्रदेश के किसानों को उच्चगुणवत्ता के फल व सब्जी के पौधों की उपलब्धता तथा नवीन तकनीकी हस्तांतरण के उद्देश्य से इजराइल सरकार के तकनीकी सहयोग से जनपद बस्ती में फल एवं कन्नौज में शाकभाजी, कौशांबी में फल तथा चंदौली में सब्जी, सहारनपुर में फल तथा लखनऊ में और्नामैंटल सैंटर औफ ऐक्सीलैंस की स्थापना की गई है. कई जिलों में मिनी सैंटर स्थापित किए जा चुके हैं.

Horticulture Crops

प्रदेश सरकार बुंदेलखंड तथा विंध्य क्षेत्र में विभिन्न संचालित योजनाओं के लाभार्थी कृषकों को नए बागों को उन के खेतों पर स्थापना हेतु प्रोत्साहित करने के लिए लाभार्थियों को एक हेक्टेयर तक के बाग स्वयं फैंसिंग सुविधा के साथ लगाने पर प्रोत्साहन धनराशि भी उपलब्ध कराती है. बुंदेलखंड विशेष पैकेज के अंतर्गत भी कार्यक्रम संचालित करते हुए किसानों को सुविधा दी जा रही है. विभाग द्वारा उत्पादन इकाइयों पर उत्पादित छोटे पौधे, कलमी, बीज शोभाकर पौधे आदि बिना लाभहानि के लागत मूल्य पर जनसाधारण को सुलभ कराए जाते हैं. विभाग द्वारा मशरूम, पान, मधुमक्खी पालन सहित अन्य बागबानी फसलों की पूर्ण जानकारी के लिए किसानों/उत्पादकों को प्रशिक्षण भी दिया जाता है. प्रदेश सरकार द्वारा बागबानी विकास हेतु किसानों की दी जा रही सुविधाओं से किसान फसलों का उत्पादन करते हुए अपनी आय दोगुना कर रहे हैं.

Colorful Vegetables :छत पर उगाएं विदेशी और रंगीन सब्जियां

Colorful Vegetables : अगर आप छत पर खेती करने जा रहे हैं, तो कुछ चीजों का खास खयाल रखना होगा, नहीं तो फसल को नुकसान पहुंच सकता है. पहले तो यह सुनिश्चित कर लें कि आप छत पर उगाई जाने वाली सब्जियों में किसी भी प्रकार के रासायनिक कीटनाशक, फफूंदीनाशक या खाद उर्वरक का उपयोग नहीं करेंगे. पौधों को पोषण देने के लिए आप कोकोपीट, जैविक खाद थोड़ी मात्रा में यदि चाहें तो मिट्टी, वर्मी कंपोस्ट, घरेलू कचरा जैसे सब्जियों का अवशेष, फलों के छिलके, पेड़ों की पत्तियां और गाय के गोबर से बनी जैविक खाद का ही इस्तेमाल करें.

अगर छत पर उगाई गई सब्जियों में किसी तरह के कीटबीमारी का प्रकोप दिखाई पड़ता है तो आप फैरोमैन ट्रैप, नीम की खली, नीम का तेल, ब्युवेरिया बैसियाना, ट्राइकोडर्मा आदि का ही प्रयोग करें.

ऐसे करें सिंचाई प्रबंधन

गमलों की सिंचाई प्रबंधन का ध्यान रखना बेहद जरूरी है. बैग में पानी इतना ही डालें कि छिद्र से बहार न निकले. अत्यधिक पानी अथवा कम पानी दोनों ही स्थिति में पौधे की पैदावार पर विपरीत प्रभाव पड़ता है.

अधिक पानी वजह से पानी के साथ पोषक तत्त्व भी बह कर निकलने की संभावना रहती है, जिस का प्रभाव पौधे की बढ़वार पर पड़ता है, इसलिए छोटे ड्रिप सिस्टम का इस्तेमाल करें जो खास कर छत पर की जाने वाली खेती को ही ध्यान में रख कर बनाया जाता है.

अगर गमलों में लगाई गई सब्जियों की फसल के अलावा किसी प्रकार का खरपतवार दिखाई पड़े तो उसे हाथों से निकाल दें.

विदेशी या रंगीन सब्जियों से बढ़ाएं घर की सुंदरता

इन दिनों कुछ ऐसी सब्जियों की किस्में आ गई है, जो देखने में रंगबिरंगी तो होती ही हैं, इन में प्रचुर मात्रा में पोषक तत्त्व भी मौजूद होते हैं. इसी में एक है कद्दूवर्गीय सब्जी समर स्क्वैश या जुकीनी जिसे ‘चप्पन कद्दू’ के नाम से भी जाना जाता है. इसे आप अपने टैरेस, छत या गार्डन में आसानी से रोप सकते हैं, क्योंकि इस में कद्दू और लौकी की तरह लताएं नहीं निकलती हैं, बल्कि यह एक पौध के रूप में गमले में खूबसूरत फल देता है. यह कई रंगों और आकर की वैराइटी में उपलब्ध है. जहां इस की सब्जी जायकेदार होती है, वहीं इस का सलाद भी आसानी से बनाया जा सकता है. इस के अलावा रंगीन गोभी, रंगीन शिमला मिर्च, कई तरह की विदेशी सब्जियां भी आप रोप सकते हैं.

अगर आप इतनी चीजें कर लेते हैं तो कुछ ही दिनों में आप के छत पर हरीभरी सब्जियां लहलहाने लगेंगी. बस आप को इतना करना है कि पौधों में कोई बीमारी न आए और सब्जियों के पौधों को उचित मात्रा में पानी मिलता रहे.

Vegetables on Rooftops : खाली छतों पर उगाएं सब्जियां

Vegetables on Rooftops : शहरों में ताजा सब्जियों की उपलब्धता बहुत मुश्किल से ही हो पाती है, क्योंकि किसान द्वारा तुड़ाई के बाद मंडी में लाने और मंडी से फुटकर सब्जी विक्रेताओं तक पहुंचतेपहुंचते सब्जियों को औसतन 2 दिन लग जाते हैं. सब्जी बेचने वाले कभीकभी सब्जियों को ताजा दिखाने के लिए खतरनाक कैमिकल्स का भी उपयोग करते हैं. गांवदेहांत से शहर में ला कर सब्जी बेचने वालों की सब्जियां ताजा तो होती हैं, लेकिन मंडी से आई सब्जियों से वे थोड़ी महंगी होती है.

सब्जियों में अन्य फसलों की अपेक्षा कीटबीमारियों का प्रकोप ज्यादा देखा गया है. खासकर बैगन, भिंडी, गोभी, लोबिया जैसी सब्जियां कीटों से ज्यादा प्रभावित होती है. ऐसे में चाहे गांव से आईं ताजा सब्जियां हों या मंडी से आई सब्जियां हों, सभी में कीटबीमारियों की रोकथाम के लिए कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग किया जाता है.

विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादातर किसानों को यह ही नहीं पता होता है कि खादउर्वरक की संतुलित मात्रा कितनी होनी चाहिए. इस लिए मानक से ज्यादा कीटनाशकों का उपयोग मानव के सेहत के लिए काफी खतरनाक साबित हो रहा है.

Vegetables on Rooftops

सब्जियों में खतरनाक कैमिकल्स के उपयोग से बचने के लिए लोगों में जैविक और प्राकृतिक तरीके से उगाई गई सब्जियों की मांग बढ़ती जा रही है. लेकिन जैविक तरीके से उगाई गई सब्जियां बड़ी मुश्किल से मिल पाती हैं. जैविक सब्जियों का दाम भी बाजार मूल्य से ज्यादा होता है.

शहरों में कीटनाशी उपयोग वाली सब्जियों से बचने, जैविक तरीके से उपजाई जाने वाली एक तरह की खेती को बढ़ावा दिए जाने की जरूरत है, जिस में हम बिना जमीन के ही अपनी खाली छतों पर सब्जियां और फल उगा कर पैसे की बचत तो कर ही सकते हैं, साथ ही जैविक तरीके से उगाई जाने वाली ये सब्जियां सेहत के भी फायदेमंद होती हैं. बिना मिट्टी और जमीन के ही अपने खाली छत पर खेती किए जाने को रूफटौप फार्मिंग या टैरेस फार्मिंग के नाम से जाना जाता है.

रूफटौप फार्मिंग एक बहुत अच्छा काम है, जो व्यक्ति को सप्ताहभर कुछ घंटों के लिए व्यस्त रखता है. इस से परिवार के लिए ताजा एवं रसायनमुक्त सब्जियां सुगमता से हर समय उपलब्ध रहती हैं.

छत पर उगाई जाने वाली सब्जियां आप के घर को गरमियों में ठंडा रखने में भी मददगार साबित होती हैं. छत पर की जाने वाली खेती के जरीए कई मैट्रो यानी बड़े शहरों में अब लोग अपने खाली छतों पर उगाई गई, देशीविदेशी सब्जियों का आनंद ले रहे हैं, साथ ही उन्हें प्रदूषण भरे माहौल से राहत भी मिल रही है.

बिहार सरकार द्वारा छत पर खेती यानी रूफटौप फार्मिंग को बढ़ावा देने के लिए अनुदान भी उपलब्ध कराया जा रहा है. कुछ ऐसी कंपनियां भी इस क्षेत्र में आ गई हैं, जो आप के लिए रूफटौप फार्मिंग का पूरा स्ट्रक्चर तैयार कर उस में पौधे तक रोप कर देती हैं.

Banana : चीनिया केला बड़ा अलबेला

Banana : फल और सब्जी के रूप में देश भर में केला काफी पसंद किया जाता है. यह स्वादिष्ठ, आयरन से भरपूर, आसानी से पचने वाला, सस्ता और लोकप्रिय फल है. हरे केले की सब्जी भी काफी लजीज होती है. इस के अलावा आटा और चिप्स बनाने में भी अब इस का इस्तेमाल बढ़ रहा है. देश में फलों के कुल क्षेत्रफल के 20 फीसदी हिस्से में केला उगाया जाता है.

केले की खेती के लिए 6 से 7.5 पीएच मान की अम्लीय मिट्टी काफी अच्छी मानी जाती है. खेतों की मिट्टी की जांच कराने के बाद उस का सही इलाज कर के किसी भी खेत में केले की खेती की जा सकती है. केला उत्पादक किसान बृजनंदन प्रसाद बताते हैं कि कृषि वैज्ञानिकों से सलाह ले कर उन्होंने पहले 2 बीघे खेत में केले की खेती शुरू की. 3-4 महीने में ही केले के पौधे लहलहाने लगे.

केले की खेती के लिए सब से अच्छी बात यह है कि इसे साल भर में कभी भी लगाया जा सकता है. इस के पौधों को मजबूत बनाने के लिए नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम की जरूरत होती है. प्रति हेक्टेयर केले के 3630 पौधे ही लगाने चाहिए और पौधों के बीच 1.82 मीटर की दूरी रखनी चाहिए.

चीनिया केला बिहार की लोकप्रिय किस्म है. इस के पौधे केले की दूसरी प्रजातियों की तुलना में ज्यादा कोमल, पतले और कम बढ़वार वाले होते हैं. राज्य के वैशाली जिले में चीनिया केले की बड़े पैमाने पर खेती की जाती है. इस के अलावा समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर जिलों में भी इस की खेती होती है.

चीनिया केले का तना लंबा, पतला और हलके हरे रंग का होता है. इस के पत्ते चौड़े और लंबे होते हैं. इस केले की घौद काफी कसी हुई होती है और उस में 8 से 10 हत्थे होते हैं. एक घौद का वजन 12 से 15 किलोग्राम तक होता है. हर घौद में 120 से 150 केले होते हैं. डंठल समेत एक केले की लंबाई 10 से 15 सेंटीमीटर होती है. इस के फल की नोक काफी पतली होती है. पके हुए चीनिया केले के छिलके का रंग चमकीला पीला होता है.

इस के फलों की भंडारण कूवत बाकी किस्म के केलों से बेहतर होती है. पके हुए फलों को कमरे के सामान्य तापमान पर 3-4 दिनों  के लिए भंडारित किया जा सकता है. एक फसल चक्र 16-17 महीने का होता है. प्रति हेक्टेयर 40 से 45 टन चीनिया केले की उपज मिल जाती है.

चीनिया केले का गूदा मुलायम, सफेद, सुगंधित और खट्टेमीठे स्वाद का अनोखा मिश्रण होता है. भंडारण की अवस्था में पके केले से सुगंध निकलती रहती है.

चीनिया केले के पौधों पर पत्तों के रोग और धारीदार विषाणु रोग के प्रकोप का खतरा ज्यादा होता है, लेकिन इस के पौधों पर पनामा रोग का असर नहीं के बराबर होता है. बहुवर्षीय खेती परंपरा के तहत आज भी वैशाली जिले के किसानों के बीच चीनिया केला काफी मशहूर है.

बिहार के अलावा चीनिया केले की किस्म बंगाल में अमृतपानी और चीनी चंपा व दक्षिण भारत में पूवन और पंचानकोदैन और केरल में कुन्नन नाम से जानी जाती है.

चीनिया के अलावा मालभोग, मिठाई, राजा, कैवेंडिस, कैवेंडिंस व इसम आदि केले की खास किस्में हैं. वहीं हरे या कच्चे केले को सब्जी के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है. सब्जी के रूप में केले की अबू, अवाक व टंडुक आदि किस्मों को पसंद किया जाता है.

कैसे बनाएं किसान बगीचे (Garden) की रूपरेखा

Garden : बगीचे की अच्छी योजना वही कही जाती है जिस में कि हर पेड़ को बढ़ने के लिए सही जगह मिल सके, पेड़ों की देखरेख करने में कोई परेशानी न हो व पेड़ देखने में सुंदर लगें. बगीचे में कम से कम खर्च हो, इस के लिए जहां तक हो सके पेड़ों को सीधी लाइन में लगाना अच्छा रहता है. बगीचे की रूपरेखा बनाने की खास विधियां इस तरह से हैं:

* वर्गाकार विधि

* आयताकार विधि

* त्रिभुजाकार विधि

* षट्भुजाकार विधि

* पंचभुजाकार विधि

* कंटूर विधि

वर्गाकार विधि : यह विधि सब से आसान है. इसे ज्यादातर किसान इस्तेमाल में लाते हैं. किनारों से करीब 6 मीटर जगह छोड़ कर पेड़ लगाने का काम शुरू करना चाहिए. इस विधि में पेड़ों को सीधी लाइन में लगाया जाता है और पेड़ से पेड़ व लाइन से लाइन की दूरी समान होती है.

इस विधि में सब से पहले एक आधार रेखा खींची जाती है, जो पौधे लगाने की दूरी के आधे अंतर पर खींची जाती है. माना कि पौधे लगाने की दूरी 10 मीटर है, तो पहली लाइन की दूरी 5 मीटर रखनी चाहिए. आधार रेखा के दोनों तरफ से समानांतर रेखाएं खींची जाती हैं और जहां पर ये रेखाएं खत्म होती हैं, वहीं पर इन को एक समानांतर रेखा से मिला देते हैं. इस के बाद तय दूरी पर आधार रेखा पर रेखाएं खींचते हैं. रेखाएं जहां पर एकदूसरे  को काटती हैं, उन जगहों पर पौधे लगाए जाते हैं. इस विधि द्वारा पौधे एक सीधी रेखा में होते हैं और पौधों में एक तय दूरी होने की वजह से बाग घना नहीं हो पाता है. इस से सिंचाई, निराईगुड़ाई, कीटनाशक का छिड़काव, पौधों की कटाईछंटाई व सधाई वगैरह बागबानी के काम करने आसान होते हैं. इस विधि में 2 लाइनों में 4 पौधे मिल कर एक वर्ग तैयार करते हैं.

आयताकार विधि : यह विधि वर्गाकार विधि की तरह ही होती है. इस में अंतर यह है कि लाइन से लाइन की दूरी पौधे से पौधे की दूरी से ज्यादा होती है. इस विधि में 2 लाइनों में 4 पौधे मिल कर एक आयत बनाते हैं, इसलिए इस को आयताकार विधि कहते हैं. पेड़ों को फैलने व बढ़ने के लिए सही जगह मिलती है, जिस से बागबानी संबंधी काम करने में आसानी रहती है.

त्रिभुजाकार विधि : इस विधि में लाइन व पौधे की आपसी दूरी वर्गाकार विधि की तरह ही होती है. इस विधि में अंतर यह है  कि दूसरी लाइन में पहली लाइन के 2 पौधों के बीच 1 पौधा लगाया जाता है. इस प्रकार 3 पौधे मिल कर एक त्रिभुज बनाते हैं. पेड़ों को फैलने व बढ़ने के लिए सही जगह मिल जाती है, जिस से बागबानी के काम करने में आसानी रहती है. इस विधि को अपनाने में कोई खास फायदा नहीं होता है.

षट्भुजाकार विधि : इस विधि में 6 पौधे मिल कर षट्भुजाकार आकार बनाते हैं और 7वां पौधा इन के बीच में लगाया जाता है. इस विधि में पौधों को फैलने व बढ़ने के लिए सही जगह मिलती है. इस विधि में बगीचा ज्यादा घना होता है, लेकिन बागबानी के काम करने में आसानी रहती है. इस विधि में 15 फीसदी ज्यादा पेड़ लगाए जाते हैं. यह विधि मुश्किल होने की वजह से कम इस्तेमाल में लाई जाती है. इस विधि में लाइन की दूरी पौधों की दूरी से कम होती है. इस विधि में पौधों का फासला हर दिशा में बराबर होता है.

पंचभुजाकार विधि : यह विधि वर्गाकार विधि की तरह ही होती है. इस में अंतर इतना होता है कि हर वर्ग के बीच में एक पौधा ज्यादा लगाया जाता है. इस विधि में वर्गाकार विधि से लगभग दोगुने ज्यादा पेड़ लगाए जाते हैं, जिस से बगीचा ज्यादा घना हो जाता है. इस वजह से बागबानी के काम करने में परेशानी होती है. इस विधि में चारों कोनों में स्थायी पौधे लगाए जाते हैं और बीच में पूरक पौधे (जैसे पपीता, फालसा, अनन्नास आदि जल्दी फल देने वाले पौधे) लगाए जाते हैं. जब स्थायी पौधों का फैलाव ज्यादा हो जाता है, तो पूरक पौधों को काट कर निकाल देते हैं.

कंटूर विधि : यह विधि ज्यादातर पहाड़ी इलाकों में जहां जमीन ऊंचीनीची या ऊबड़खाबड़ होती है, अपनाई जाती है. इस में पौधे सीधी लाइन में न लगा कर जमीन की बाहरी रेखा के मुताबिक लगाए जाते हैं. पौधों को पानी की जरूरत पड़ने पर बरतनों से पानी दिया जाता है. इस विधि में दूसरी विधियों के मुकाबले पौधों की संख्या कम होती है.

शहरों के पास वाले ज्यादातर बागों में पंचभुजाकार विधि का इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि शहरों के पास की जमीन ज्यादा महंगी होती है और इस विधि में अन्य विधियों के मुकाबले ज्यादा पौधे लगाए जाते हैं.

इस विधि में पूरक पौधों से उस वक्त आमदनी मिलनी शुरू हो जाती, जब स्थायी पौधे बढ़ रहे होते हैं. इस विधि से बाग से जल्दी ही फल मिलने लगते हैं.