Modern Farming: आधुनिक खेती अपना कर पाई तरक्की की राह

Modern Farming: उत्तर प्रदेश के जिला महाराजगंज से 15 किलोमीटर दूर गांव अंजना के एक किसान ने खेती की बहुत कम जमीन पर कुछ ऐसा किया कि उन के हालात में तो सुधार आया ही, साथ ही उन्होंने आसपास के सैकड़ों परिवारों को रोजगार के अवसर भी मुहैया किए.

कृषि में स्नातक नागेंद्र पांडेय ने जब पढ़ाई पूरी कर के नौकरी की तलाश शुरू की तो उन्हें यह नहीं पता था कि वे पूर्वांचल के जिलों में खेती की मिसाल बन जाएंगे.

नागेंद्र पांडेय ने अपनी कृषि की शिक्षा का इस्तेमाल अपनी खेती में करने की ठानी. उन्होंने महसूस किया कि अकसर छोटी जोत के किसान खाद व रसायनों की किल्लत से परेशान होते हैं और महंगी खादों का इस्तेमाल करने से भी उन को खास उत्पादन व लाभ नहीं मिल पाता है.

20 केंचुओं से शुरू किया कारोबार

फिर क्या था किसान नागेंद्र पांडेय ने यह तय कर लिया कि वे अपनी थोड़ी सी जमीन में जैविक खादों को तैयार करेंगे और बाकी बची जमीन में जैविक खेती (Modern Farming) करेंगे. उन्होंने इस के लिए सब से पहले वर्मी कंपोस्ट तैयार करने की सोची. उन्होंने वर्मी खाद तैयार करने में इस्तेमाल किए जाने वाले केंचुओं की प्रजातियों के लिए कृषि व उद्यान महकमे से संपर्क किया, लेकिन उन्हें विभाग से केंचुए नहीं मिल पाए. इस के बाद वे गोरखपुर जिले के कैंपियरगंज से सिर्फ 20 केंचुओं का  इंतजाम कर पाए.

वे आइसीनिया फोरिडा प्रजाति के उन 20 केंचुओं को घर ले कर आए और पशुओं को चारा खिलाने वाली नाद में वर्मी कंपोस्ट में प्रयोग होने वाले गोबर व पत्तियों के बीच डाला. यह केंचुओं की नियमित देखभाल का ही नतीजा था कि 45 दिनों बाद 2 किलोग्राम केंचुए तैयार हो चुके थे.

नागेंद्र पांडेय ने साल 2001 में किसी की मदद के बगैर ही 1 वर्मीपिट बनवाया और फिर शुरू हुआ उन के जीवन में बदलाव का एक नया अध्याय.

बड़े वर्मी खाद के उत्पादक :

नागेंद्र पांडेय द्वारा 20 केंचुओं से शुरू किया गया वर्मी खाद उत्पादन इस समय पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिलों के किसानों के लिए मिसाल बन चुका है. उन्होंने वर्मी खाद व वर्मी के केंचुओं को किसानों को बेच कर जहां एक तरफ  जैविक खेती (Modern Farming) को बढ़ावा देने का काम किया है, वहीं इसी वर्मी कंपोस्ट की यूनिटों के सहारे उन्होंने सैकड़ों परिवारों को रोजगार दे रखा है.

मिलती है गुणवत्तायुक्त खाद

नागेंद्र के यहां तैयार होने वाली वर्मी खाद में किसी तरह की मिलावट नहीं की जाती है. वे समयसमय पर खाद की गुणवत्ता की जांच के लिए लैब टेस्ट कराते रहते हैं, इसलिए उन की खाद से पौधों की बढ़वार व उपज दोनों अच्छी होती है.

नागेंद्र पांडेय के वर्मीपिट पर रोज सैकड़ों महिलाएं काम करने आती हैं. वे वर्मी कंपोस्ट की पलटाई व पैकेजिंग वगैरह करती हैं.

शहतूत की नर्सरी से हो रहे मालामाल :

वर्मी कंपोस्ट के अलावा नागेंद्र पांडेय द्वारा 1 एकड़ में शहतूत की नर्सरी हर साल तैयार की जाती है, जिस से 10 लाख 50 हजार पौधे प्राप्त होते हैं. एस 1 (64) नाम की प्रजाति न केवल सामान्य प्रजातियों से ज्यादा पत्तियों का उत्पादन देती है, बल्कि इसे रेशमकीटपालन के लिए सब से मुफीद माना जा सकता है.

वाटर हार्वेस्टिंग का नायाब तरीका :

किसान नागेंद्र पांडेय ने खेतों की सिंचाई में इस्तेमाल होने वाले पानी व बारिश के पानी के लिए एक तालाब खुदवा रखा है, जिस में सीधा पाइप लगा कर खेत को जोड़ा गया है. वहां से फालतू पानी पाइप के रास्ते गड्ढे में जमा हो जाता है, जिस का इस्तेमाल वे वर्मी पिट की नमी बनाने व खेतों की सिंचाई के लिए करते हैं.

वर्मी वास की रहती है मांग

नागेंद्र पांडेय ने ‘साश्वत’ नाम से जैविक खेती को बढ़ावा देने वाला एक समूह बना रखा है, जिस के जरीए वे अपनी विद्या का प्रचारप्रसार भी करते हैं. वे केंचुओं से वर्मी वास बनाते हैं, जिस में मटके में गोबर मिला कर उसे ऊपर टांग कर पानी डाल दिया जाता है. इस में केंचुओं के हार्मोन मिल कर बूंदबूंद बाहर आते हैं, जो फसलों में छिड़काव के काम आते हैं.

किसान नागेंद्र ने जैविक खेती की दिशा में जो कोशिशें की हैं, वे दूसरे किसानों के लिए मिसाल हैं. उन्होंने न केवल जैविक खेती को बढ़ावा दिया है, बल्कि कई परिवारों को रोजगार भी मुहैया कराने में अहम किरदार निभाया है.

Pesticides : फलसब्जियों में जहर कीटनाशकों का कहर

Pesticides : आज के दौर में अनाज से ले कर फलसब्जी यहां तक कि फूल भी बिना रासायनिक उर्वरक (Pesticides) का इस्तेमाल किए पैदा नहीं हो रहे हैं. कम समय में अधिक उपज लेना, साल में ज्यादा फसल लेना, ये ऐसे मुद्दे हैं, जिन की वजह से किसानों को अधिकतर खेती में रासायनिक उर्वरक (Pesticides) इस्तेमाल करने पड़ते हैं. इन सब से किसान को पैदावार तो मिल जाती है, लेकिन इस अधिक पैदावार के साथसाथ जहरीली होती फसल से अनेक बीमारियां भी मिलती हैं, जिन से घिर कर लोग डाक्टरों के यहां चक्कर लगाते हैं.

समयसमय पर सरकारी कानून बनते हैं, सूचनाएं, अधिसूचनाएं आती हैं कि खेती में इस्तेमाल हो रहे जहरीले रसायनों पर रोक लगाई जाए. नियम बनते हैं, सरकारी खेल चलता है, सरकार द्वारा बनाए गए नियमों को लागू करने के लिए समितियों का गठन होता है, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात. नियमों को दरकिनार कर पूरे देश की मंडियां और बाजार जहरीले रसायनों से पलीबढ़ी सब्जियों व फलों से भरे पड़े हैं.

जहरीले रसायन क्यों?

अब से लगभग 30-35 साल पहले भारत में हरित क्रांति का दौर आया था. उस दौर में विदेशों से अनेक तरह के बीज भारत में आए, ताकि हम अधिक पैदावार ले सकें. लेकिन बीजों के साथसाथ अनेक तरह के खरपतवारों के बीज भी आ गए. गाजरघास भी उन्हीं बीजों का परिणाम है, जिस ने आज खेतों में नाजायज कब्जा जमा रखा है. जाहिर सी बात है कि जब बीजों के साथ खरपतवार भी आएंगे, तो उन्हें खत्म करने के लिए उन के पीछेपीछे जहरीले रसायन व कीटनाशक (Pesticides) भी आएंगे. देखते ही देखते पूरे देश में फसलों पर जहरीले रसायनों ने कब्जा कर लिया.

आज लोगों की भलाई के लिए नित नई खोजें होती हैं, लेकिन आज के कारोबारी कहीं न कहीं किसी न किसी तरह से अपना हित साधने में लगे हैं, चाहे इस से समाज का कितना ही नुकसान क्यों न हो.

माना कि जहरीले रसायनों (Pesticides) के इस्तेमाल से फसल से खरपतवार खत्म होते हैं, कीटों का नाश होता है, लेकिन जब जहरीले रसायनों का उपयोग अंधाधुंध शुरू हो जाता है, तो फायदे की जगह नुकसान भी होता है. आज रातोंरात फलसब्जियों को बढ़ानेपकाने के लिए इंजैक्शन द्वारा उन में जहरीले रसायन डाले जा रहे हैं.

फलों व सब्जियों में चमक लाने के लिए उन पर मोम, तेल, ग्रीस वगैरह लगाए जाते हैं. अदरक से मिट्टी हटाने के लिए उसे तेजाब में धोया जाता है. ये ऐसे शौर्टकट हैं, जिन से एकआध खास वर्ग को तो बहुत फायदा होता है, लेकिन तमाम लोगों को मिलती हैं बीमारियां, अस्पताल के चक्कर व आर्थिक नुकसान.

फलों को पकाने में प्रयोग

फलों की आज बाजार में बहुत खपत है. उसी खपत को पूरा करने के लिए कम समय में ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए फलों को कच्चा ही तोड़ लिया जाता है और उन्हें जल्दी पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड (जिसे आम बोलचाल की भाषा में लोग कार्बेड कह देते हैं) का इस्तेमाल किया जाता है. इस से जो जहरीली गैस निकलती है, उस से फल बहुत जल्दी पक जाते हैं. यह ऐसी प्रक्रिया है, जिस से फल पक तो जल्दी जाते हैं, लेकिन इन फलों में न तो कुदरती स्वाद ही होता है न ही ये सेहत के लिए बेहतर होते हैं.

खेतों में रासायनिक खाद

फसल बोने के साथ ही किसान की मजबूरी हो जाती है कि वह रासायनिक खाद इस्तेमाल करे और जब तक फसल पक कर तैयार होती है, तब तक 2-3 बार उस फसल में रसायन का इस्तेमाल किसी न किसी रूप में किसान करता है. अगर किसान ऐसा न करे तो उस की फसल ही चौपट हो जाएगी. या तो खरपतवार फसल को बढ़ने ही नहीं देंगे या कीट फसल को नष्ट करेंगे. इसलिए आज जरूरी हो गया है कि हम रासायनिक खेती को छोड़ कर जैविक खेती करें, जिस से हमें हानिरहित भरपूर फसल मिले.

Pesticides

खराब पानी का असर

देहाती क्षेत्रों के अलावा अगर हम शहरों की बात करते हैं, तो देश की राजधानी दिल्ली भी इस जहर से अछूती नहीं है. दिल्ली शहर में दर्जनों गंदे नाले यमुना नदी में मिलते हैं और यमुना नदी के किनारे होने वाली फसलों में इसी गंदे पानी का इस्तेमाल होता है. आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि यह पानी किस हद तक जहरीला होता है. नालों के पानी में मलमूत्र, फैक्टरी से निकले रसायन, तेजाब वगैरह जहरीली चीजें मिली होती हैं.

पिछले साल दिल्ली की यमुना नदी में पानी की हर 3 महीने में जांच की गई. इस जांच के नतीजे चौंकाने वाले थे. निजामुद्दीन पुल के पास 100 मिलीलीटर पानी में 9.3 करोड़ मलीय कौलिफोर्म पाए गए. ओखला बैराज के पास प्रति 100 मिलीलीटर पानी में 5.2 करोड़ मलीय कौलिफोर्म पाए गए, यही नहीं, इसी यमुना नदी के पानी में कई जगहों पर तो आक्सीजन की मात्रा शून्य पाई गई. अब आप खुद अंदाजा लगाएं कि बिना आक्सीजन कोई जीवित कैसे रह सकता है. हां, जलखुंभी इस पानी में खूब पनपती है.

इसी तरह उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर को लें. वहां चमड़े का कारोबार होता है. वहां पर भी फैक्टरियों से निकले जहरीले पानी का खेती में इस्तेमाल हो रहा है. ऐसे उदाहरण देश के हर कोने में मिल जाएंगे, तो क्यों हम आज लोगों के जीवन से खिलवाड़ कर रहे हैं? क्यों लोगों के जीवन में जहर घोल रहे हैं?

आज हम केवल इस तरह के खानपान के चलते ही उलटी, डायरिया, पेट दर्द, पेशाब की बीमारियां, आंतों में इन्फैक्शन, त्वचा रोग, अपच, किडनी वगैरह के रोगों से घिरे हुए हैं. ऐसा न हो, इस के लिए सभी को सुधरना होगा. केवल अपना फायदा न देख कर समाज को भी देखना होगा. हमें खेती में सुधार लाना होगा.

बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट

साल 2002 से भारत में बीटी और जीएम बीजों (जैव संशोधित बीज) की शुरुआत हुई. इस को ले कर भारत में बवाल भी हुआ. मोनसेंटो जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनी ने इन बीजों को कृषि बाजार में यह कह कर उतारा था कि बीटी कपास और बीटी बैगन पर कीड़ा नहीं लगेगा, जिस से पैदावार तो बढ़ेगी, ही कीटनाशक का खर्च भी बचेगा. यह सब कह कर बीटी बीजों की कीमत सामान्य बीजों की तुलना में कई गुना रखी गई और बहुराष्ट्रीय कंपनी मोनसेंटो ने खूब कमाई की. लेकिन 3 साल बाद पता चला कि ऐसा कुछ नहीं है, उन बीजों द्वारा बोई गई फसल पर भी कीटों का प्रकोप हुआ. तब तक तो कंपनी अपना खेल खेल चुकी थी.

इसी तरह से अनेक कंपनियां हर बार नईनई वैराइटी के बीज विकसित करती हैं, जिन से होने वाली फसल पैदावार से आगे बोने के लिए भी बीज नहीं मिल पाते. मतलब साफ है कि किसान हर बार इन कंपनियों के बीज खरीदे. किसान का पीछा कंपनियां यहां भी नहीं छोड़तीं. जब कभी फसल में कीट का प्रकोप होगा तो उन्हीं कंपनियों द्वारा बनाए गए कीटनाशक ही उन बीजों द्वारा बोई गई फसल पर कारगर होते हैं. इस से साफ पता चलता है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने फंदे में किसान को किस कदर जकड़ रखा है. इसलिए अभी भी वक्त है, हमें इन से बचना होगा और जैविक खेती को बढ़ावा देना होगा.

जैविक खेती कीजिए

वर्मी कंपोस्ट खाद के इस्तेमाल से खेत, फसल और इनसान सेहतमंद रहते हैं. वर्मी कंपोस्ट खाद फसल व सेहत के लिए बहुत ही फायदेमंद है. फसल कटने के बाद उस खेत की उपजाऊ शक्ति कमजोर हो जाती है. ऐसे में किसानों को अपने खेत में उपजाऊ शक्ति बनाए रखने के लिए वर्मी कंपोस्ट यानी प्राकृतिक खाद का इस्तेमाल करना चाहिए. यह फायदे का सौदा है.

वर्मी कंपोस्ट का फसल में इस्तेमाल करने से खेत में नमी बरकरार रहती है. इस से फलफूल व सब्जियों वगैरह की जिंदगी बढ़ जाती है. फसल की रंगत ही बदल जाती है और फसल की पैदावार भी बढ़ जाती है.

यह रासायनिक खादों से सस्ती खाद है और फसल को अनेक बीमारियों के प्रकोप से बचाती है. इस के इस्तेमाल से पैदा हुई पौष्टिक व साफ सब्जियां हमारे स्वास्थ्य को ठीक रखती हैं.

वर्मी कंपोस्ट इस्तेमाल करने का तरीका

वर्मी कंपोस्ट एक ऐसी कुदरती खाद है, जिसे किसान किसी भी फसल में किसी भी समय इस्तेमाल कर सकते हैं.

इस से खास फायदा उस वक्त होता है, जब यह मिट्टी में मिल जाए. वर्मी कंपोस्ट खाद की आधी मात्रा जमीन की तैयारी करते समय जरूर डालें. फिर एक बार ट्रांसप्लांटिंग के समय डालें या फिर जब 2 पत्ते की स्टेज हो तब डालें. इस के बाद जब फसल पर फूल आने लगें, तब भी प्राकृतिक खाद डालें.

Organic Farming : जैविक खेती से फायदा

Organic Farming : आजकल खेती से ज्यादा उपज लेने के लिए कई तरह की रासायनिक खादों व दवाओं का इस्तेमाल किया जा रहा है. करीब 80 फीसदी किसान खेतों में रासायनिक खादों और जहरीली दवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिस से उपज तो बढ़ी है, लेकिन इनसानों की जिंदगी में इस का बुरा असर हो रहा है. इसी वजह से आज हमें नईनई बीमारियां घेर रही हैं.

आंकड़ों के मुताबिक आज के समय में सब से ज्यादा जहर पंजाब राज्य के उत्पादों में पाया गया है. एलड्रिन नामक दवा ब्लड कैंसर का कारण बनी, तो उस पर रोक लगी. इसी तरह एंडोसलफान नामक दवा ने दिमागी तंत्र प्रणाली को प्रभावित किया, तो उस पर भी रोक लगाई गई. फिर भी इस तरह की दवाएं मिलतेजुलते नामों से आज भी बाजार में मिल रही हैं और लोगों की जिंदगियों से खिलवाड़ कर रही हैं.

आज ऐसा दौर आ चुका है कि हम रासायनिक खेती से हट कर जैविक खेती (Organic Farming) की ओर कदम बढ़ाएं.

कैसे करें जैविक खेती?

आज कई तरीकों से जैविक खादें बनाई जाती है, जैसे गोबर की खाद, वर्मी कंपोस्ट व तरल जैविक हरी खाद वगैरह. गोबर की खाद को कम से कम 3 महीने तक गड्ढों में सड़ा कर कंपोस्ट खाद बनाएं और फसल लगाने के पहले खेत में डालें. यह हमारी सब से पुरानी पारंपरिक खाद है.

ढैंचा, लोबिया, उड़द व मूंग वगैरह को हरी खाद के लिए उगाएं और फिर जुताई कर के खेत में मिला कर सड़ा दें. यह भी एक अच्छा तरीका है. पुराने किसान आज भी इसे इस्तेमाल में लाते हैं.

केंचुओं के द्वारा वर्मी कंपोस्ट तैयार किया जाता है. यह बहुत ही उत्तम खाद होती है. इसे आजकल तमाम लोग इस्तेमाल कर रहे हैं.

* जैविक खाद का मिश्रण तैयार करें (गोबर, मूत्र, गुड़, दाल और जीवाणु खाद मिला कर) और फसल में 5-6 बार तक इस्तेमाल करें. इसे बनाने के लिए इन सब को सड़ा कर तरल जैविक पदार्थ तैयार किया जाता है.

* दानेदार रासायनिक खाद की जगह एनपीके पाउडर और चिलेटेड सूक्ष्म पोषक तत्त्वों को खड़ी फसल में स्प्रे करें.

* नीम और गौमूत्र वाले कीटनाशकों का ज्यादा इस्तेमाल करें.

* अच्छी गुणवत्ता वाले जैविक खेती (Organic Farming) से उत्पादित बीजों का इस्तेमाल करें.

* खरपतवार निकालने के लिए खड़ी फसल में निराईगुड़ाई करें. गरमियों में खेत की जुताई कर के खेत को कुछ दिनों के लिए खाली छोड़ दें.

इस प्रकार के कुछ तरीकों को अपना कर जमीन, स्वास्थ्य और पर्यावरण को बचाया जा सकता है और कम खर्च में टिकाऊ खेती की जा सकती है.

जैविक खादों से फायदे

* पौधों की ताकत बढ़ती है और उन में ज्यादा सर्दीगरमी से लड़ने की कूवत पैदा हो जाती है.

* फूलों और फलों की पैदावार में बढ़ोतरी होती है.

* जैविक खादें हर फसल के लिए फायदेमंद होती हैं.

* इन में नुकसान देने वाले जीवाणु नहीं होते हैं.

* फल, सब्जी, अनाज देखने में सुंदर और स्वादिष्ठ होते हैं.

* पैदावार में बढ़ोतरी होती है और बीमारियों के प्रति लड़ने की ताकत बढ़ती है.

* बीजों का अंकुरण अच्छी तरह होता है.

* तैयार फल व सब्जियां हानिकारक रसायनों से रहित और पौष्टिक होती हैं.

* लगातार जैविक खेती (Organic Farming) करने से पैदावार में बढ़ोतरी होती है.

* जैविक खाद के इस्तेमाल से पौधों में तमाम बीमारियों व कीड़ों से लड़ने की कूवत बढ़ती है, नतीजतन रासायनिक कीटनाशकों, रोगनाशकों व खरपतवारनाशकों का इस्तेमाल कम से कम हो जाता है. इस से किसानों का खर्च भी बचता है.

आरगैनिक खेती के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए जैलदार बंधु आरगैनिक कृषि फार्म के मोबाइल नंबरों 09416392681, 09068506781 पर संपर्क कर सकते हैं.

मूत्रगोबर से बनाते हैं जीवामृत

गुजरी गांव (मध्य प्रदेश) के किसान अभिषेक गर्ग सिर्फ 1 गाय के मूत्र और गोबर में अन्य पदार्थो को मिला कर जैविक घोल तैयार करते है और उस तरल जैविक घोल को अपनी फसल में खाद के तौर पर इस्तेमाल करते हैं. उन के अमरूद के बाग इसी जैविक घोल के इस्तेमाल से लहलहा रहे हैं.

अभिषेक गर्ग ने इस घोल का नाम जीवामृत रखा है. उन का कहना है कि सिर्फ 1 गाय से तैयार इस जीवामृत से 30 एकड़ में खेती की जा सकती है, जो रासायनिक खाद की तुलना में बहुत किफायती है.

जीवामृत  बनाने का तरीका : गाय से रोजाना मिलने वाले 10 किलोग्राम गोबर और गोमूत्र से तैयार मिश्रण में 1 किलोग्राम बेसन, 1 किलोग्रम गुड़, 1 किलोग्राम मिट्टी व 1 किलोग्राम मौसमी फसल डाल कर इस घोल को 7 दिनों तक सड़ाएं और पूरे हफ्ते तक हर रोज इसे 2 बार 5 मिनट तक हिलाएं. 1 हफ्ते बाद जैविक घोल तैयार हो जाता है. इस घोल को छान कर फसल पर समयसमय पर छिड़काव करते रहें. किसान इस जैविक घोल को ज्यादा मात्रा में भी बना सकते हैं. अनुपात के मुताबिक केवल सामान की मात्रा बढ़ा लें.

रासायनिक खाद व जहरीली दवाओं के नुकसान

खेती की मिट्टी कठोर हो जाने से उस की पानी सोखने की कूवत कम हो जाती है और बीजों का जमाव भी कम होने लगता है. तमाम तरह के फंगस, वायरस वगैरह की बीमारियां (जड़ व तना गलन, मरोडि़या, उखेड़ा, पीला और काला रतुआ, कंडुआ वगैरह) फसल में लगने लगती हैं और एक समय ऐसा आता है, जब कीटनाशकों का असर भी कम हो जाता है.

रसायनों के इस्तेमाल से अनाज, सब्जी, फल व चारा वगैरह जहरीले होने लगते हैं. इनसानों और जानवरों में बीमारियों को बढ़ावा मिलता है और कैंसर, टीबी, डायबिटीज, हार्ट अटैक, स्वाइन फलू, जैसी बीमारियां भी मुंह बाए खड़ी रहती हैं.

Krishi Vigyan Kendra : वैज्ञानिक सलाहकार समिति की बैठक

Krishi Vigyan Kendra : आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या द्वारा संचालित कृषि विज्ञान केंद्र (Krishi Vigyan Kendra) बलिया पर वैज्ञानिक सलाहकार समिति की 25वीं बैठक हुई. बैठक की अध्यक्षता विश्वविद्यालय प्रतिनिधि डा. जेपी सिंह प्रभारी कृषि विज्ञान केंद्र गाजीपुर ने की. कार्यक्रम में मुख्य अतिथि प्रगतिशील किसान उपेंद्र सिंह राय थे. अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय प्रतिनिधि डा. जेपी सिंह प्रभारी कृषि विज्ञान केंद्र गाजीपुर, डा. संजीत कुमार वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष कृषि विज्ञान केंद्र बलिया, अलका श्रीवास्तव जिला उद्यान अधिकारी बलिया, मोहित यादव डीडीएम नाबार्ड, प्रगतिशील किसान उपेंद्र सिंह, संतोष कुमार सिंह, हरेराम चौरसिया, अनंत कुमार सिंह, विमलेश राय, मणि शंकर तिवारी, आनंद सिंह, सुशील श्रीवास्तव आदि प्रगतिशील किसानों के साथ मौजूद रहे.

केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डा. संजीत कुमार ने बैठक में उपस्थित सभी अधिकारियों, कर्मचारीगण वैज्ञानिकों एवं प्रगतिशील किसानों का स्वागत किया, उन्होंने कहा कि कृषि विज्ञान केंद्र (Krishi Vigyan Kendra) बलिया जनपद के किसानों एवं खेतीबारी से जुड़े लोगों, व्यावसायियों को एकीकृत कृषि प्रणाली, उन्नत बीज उत्पादन तकनीक, सब्जियों की वैज्ञानिक खेती, मशरूम उत्पादन तकनीक, केंचुआ खाद उत्पादन तकनीक, नाडेप उत्पादन तकनीक, सब्जियों के नर्सरी उत्पादन तकनीक, प्राकृतिक खेती, फलों एवं सब्जियों का संरक्षण, पशुपालन, बकरीपालन, मुरगीपालन, मधुमक्खीपालन, विभिन्न फसलों में एकीकृत पोषक तत्त्व प्रबंधन, एकीकृत कीट एवं रोग प्रबंधन, भंडारगृह में बीज एवं कृषि उत्पादों का संरक्षण, बीज संसाधन एवं विपणन, कृषि उत्पादों का विपणन आदि विषयों पर प्रशिक्षण प्रदान कर के जनपद के किसानों, महिलाओं, एफपीओ के पदाधिकारियों/सदस्यों एवं ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षित कर रहा है, जिस से किसानों द्वारा उत्पादित फसल लागत कम कर के किसानों की आय वास्तविक आय मे वृद्धि के साथसाथ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर भी बढ़ रहे हैं.

इस कार्यक्रम में केंद्र के वैज्ञानिकों डा. सोमेंद्र नाथ ने शस्य विज्ञान, डा. मनोज कुमार ने पादप प्रजनन एवं अनुवंशिकी, डा. अभिषेक यादव ने पादप सुरक्षा, डा. अनिल पाल ने मृदा विज्ञान, डा. अवधेश कुमार ने उद्यान विज्ञान के साथसाथ अपनेअपने अनुभाग की प्रगति आख्या एवं वर्ष 2025-26 की कार्ययोजना प्रस्तुत की. प्रक्षेत्र प्रबंधक डा. सतीश कुमार यादव ने केंद्र के प्रक्षेत्र की वार्षिक प्रगति आख्या एवं वर्ष 2025-26 की कार्ययोजना प्रस्तुत की.

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय प्रतिनिधि डा. जेपी सिंह ने कहा कि कृषि विज्ञान केंद्र (Krishi Vigyan Kendra) बलिया वास्तव में कड़ी मेहनत, लगन एवं उत्साहपूर्वक कार्य कर रहा है जो केंद्र की व्यवस्था, वैज्ञानिकों द्वारा प्रस्तुतिकरण, किसानों से साथ संवाद एवं केंद्र के प्रक्षेत्र भ्रमण के अवलोकन से स्पष्ट दिखाई दिया. इस के लिए मैं केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डा. संजीत कुमार तथा केंद्र के वैज्ञानिकों/कर्मचारियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं देता हूं. साथ ही साथ डा. जेपी सिंह ने किसानों एवं एफपीओ संचालकों से संवाद कर उन की प्रगति के बारे में विस्तृत जानकारी लेते हुए खेतीबारी के विकास के बारे में विस्तृत चर्चा की. उन्होंने बैठक में उपस्थित सभी वैज्ञानिकों, अधिकारियों, किसानों के साथ केंद्र पर चल रही प्राकृतिक खेती प्रदर्शन इकाई, केंचुआ खाद उत्पादन इकाई, नाडेप खाद उत्पादन इकाई, बीज उत्पादन इकाई, मशरूम उत्पादन इकाई, अरहर की मेंड़ पर बोई गई फसल, मक्का की फसल में एकीकृत पोषक तत्त्व प्रबंधन प्रदर्शन इकाई, एकीकृत बागबानी प्रदर्शन इकाई आदि का अवलोकन किया.

इस कार्यकम में केंद्र के सभी वैज्ञानिकों सहित कार्यालय अधीक्षक अमित तिवारी, कार्यक्रम सहायक धर्मेंद्र कुमार, स्टेनोग्राफर राकेश कुमार सिंह, परिचर राम तोल आदि के साथसाथ जनपद के लगभग 35 प्रगतिशील किसान उपस्थित रहे.

Vermicompost : किसान प्रशिक्षण में वर्मीकंपोस्ट बनाने की मिली जानकारी

Vermicompost : महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के अधीन कृषि विज्ञान केंद्र चित्तौड़गढ़ द्वारा राज्यपाल स्मार्ट विलेज पहल कार्यक्रम के तहत एक दिवसीय वर्मीकंपोस्ट (Vermicompost) उत्पादन तकनीकी विषय पर चयनित गांव पायरी पंचायत समिति बड़ीसादड़ी में पिछले दिनों 22 अगस्त, 2025 को आयोजित किया गया.

इस प्रशिक्षण में 43 किसान सहित कई महिला किसानों ने भाग लिया. इस कार्यक्रम में डा. आरएल सोनी, निदेशक प्रसार, प्रसार शिक्षा निदेशालय, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर ने बताया कि राज्यपाल स्मार्ट विलेज के तहत चयनित गांव पायरी अब स्मार्ट गांव बनेगा.

डा. आरएल सोनी ने बताया कि योजना के तहत कृषि के क्षेत्र में नई तकनीकों का इस्तेमाल कर गांव में फसल, सब्जी उत्पादन, पशुपालन, मुरगीपालन, बागबानी द्वारा किसानों को अधिक आमदनी कमाने के लिए प्रेरित किया जाएगा.

इस के साथ ही, कृषि विज्ञान केंद्र, चित्तौड़गढ़ द्वारा स्मार्ट विलेज पायरी ग्राम पंचायत के जनजाति क्षेत्र के किसानों के लिए लगाए गए विभिन्न प्रदर्शनों मुरगीपालन इकाई, वर्मीकंपोस्ट इकाई, अजोला इकाई बीज भंडारण के लिए कोठी प्रदर्शन आदि के बारे में किसानो से बातचीत की गई और किसानों के यहां लगाई गई इकाइयों का भी अवलोकन किया गया.

डा. आरएल सोलंकी, कृषि विज्ञान केंद्र चित्तौड़गढ़ ने मृदा स्वास्थ्य के लिए जैविक खादों का प्रयोग, वर्मीकंपोस्ट बनाने की कई विधियां समेत जैविक खाद वर्मीवाश तैयार करने की तकनीकी जानकारी दी. साथ ही, किसानों को खरीफ फसलें मक्का में फौलआर्मी और सोयाबीन में येलो मोजेक को नियत्रंण करने की दवा छिड़काव करने की प्रायोगिक जानकारी दी. कृषि विज्ञान केंद्र  चितौड़गढ़ की दीपा इंदौरिया, कार्यक्रम सहायक ने पोषण वाटिका लगाने की तकनीकी जानकारी दी. इस प्रशिक्षण में प्रगतिशील किसान लाल सिंह मीणा, लक्ष्मण सिंह मीणा, नानू सिंह मीणा आदि उपस्थित थे.

Vermicompost : कचरे से बनाएं वर्मीकंपोस्ट

Vermicompost : केंचुए के द्वारा जीवांश पदार्थों (कार्बनिक पदार्थों) को अपघटित कर वर्मी कंपोस्ट (Vermicompost) तैयार की जाती है. इस विधि में कूड़ेकचरे (भोजन अवशेष, फल एवं सब्जियों आदि के छिलके और सब्जी मंडी का कचरा आदि), फसलों के अवशेष (पुआल, भूसा, पत्तियां, खरपतवार, डंठल, गन्ने की खोई, गोबर और बायोगैस के अवशेष आदि) एवं कृषि उद्योग (तेल मिल, चीनी मिल, शराब मिल, प्रसंस्करण उद्योग आदि) से जुड़े अपशिष्ट पदार्थ जैसे व्यर्थ पदार्थों को पुन: उपयोगी पदार्थ वर्मी कंपोस्ट में परिवर्तित कर दिया जाता है.

कैसे बनाएं वर्मी कंपोस्ट (Vermicompost)?

किसी ऊंचे छायादार स्थान जैसे किसी वृक्ष के नीचे अथवा शैड में 2×2×1 मीटर क्रमश: लंबाई, चौड़ाई और गहराई वाला एक गड्ढा बनाएं अथवा गड्ढा नहीं बना पाने की स्थिति में इसी माप का लकड़ी अथवा प्लास्टिक की पेटी का उपयोग भी किया जा सकता है, जिस की निचली सतह पर जल निकासी के लिए 10-12 छेद बना देने चाहिए.

Vermicompost

सब से नीचे ईंट या पत्थर की 11 सैंटीमीटर की एक परत बनाएं. इस के बाद 20 सैंटीमीटर की मोरंग अथवा बालू की दूसरी सतह बना कर उसे पानी के हलके से छिड़काव से इसे नम बना देना चाहिए. इस के बाद इस परत के ऊपर अधसड़ा गोबर डाल कर एक किलोग्राम प्रति गड्ढे की दर से ‘आइसीनिया फोटिडा’ एवं ‘यूड्रिलम यूजिनी’ प्रजाति के लाल केंचुओं को इस में छोड़ देना चाहिए.

इस के ऊपर 5-10 सैंटीमीटर घरेलू कचरे और फसल अवशेषों को बिछा देना चाहिए. इस के बाद लगभग 20-25 दिन तक आवश्यकता के अनुसार पानी का हलका छिड़काव करते रहें. इस के बाद प्रति 2 सप्ताह के बाद 5-10 सैंटीमीटर सड़ने योग्य कूड़ेकचरे की तह तब तक लगाते रहें, जब तक कि पूरा गड्ढ़ा भर न जाए और प्रतिदिन छिड़काव भी करते रहें.

कार्बनिक पदार्थ के ढेर पर लगभग 50 फीसदी नमी का होना आवश्यक है.

6-7 सप्ताह में वर्मी कंपोस्ट (Vermicompost) बन कर तैयार हो जाती है. वर्मी कंपोस्ट के बनने के बाद 2-3 दिन तक पानी के छिड़काव को बंद कर, इस खाद के ढेर को छाया में सुखा लें. फिर इसे 2 मिलीमीटर छनने से छान कर अलग कर देना चाहिए और इस प्रकार से तैयार हुई इस खाद को आवश्यक मात्रा में प्लास्टिक की थैलियों में भर देते हैं.

केंचुए का कल्चर या इनाकुलम तैयार करना

केंचुए कूड़े के ढेर को नीचे की तरफ से कंपोस्ट में बदलते हुए ऊपर की तरफ बढ़ते हैं. इसलिए पूरे गड्ढे में कंपोस्ट खाद तैयार हो जाने के बाद इस की ऊपरी सतह पर कूड़े की एक नई परत बिछा दें. फिर पानी का छिड़काव कर इसे नम बना लें. अब इस सतह की ओर सभी केंचुए आकर्षित हो जाएंगे. तब इन्हें हाथ या किसी अन्य चीज की सहायता से किसी दूसरे स्थान पर एकत्र कर सकते हैं और फिर किसी दूसरे नए गड्ढे में अंतक्रमण हेतु उपयोग कर सकते हैं.

वर्मी कंपोस्ट के लाभ

* मृदा की संरचना, वायु संचार, जल धारण क्षमता एवं मृदा के भौतिक एवं जैविक गुणों में भी अपेक्षित सुधार आता है.

* नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करने वाले जीवाणुओं की संख्या में आशातीत वृद्धि होती है.

* इस से स्वच्छता में वृद्धि और प्रदूषण पर नियंत्रण होता है.

* यह लघु कुटीर उद्योग के रूप में लाभकारी होता है, जो रोजगार के नए अवसरों का भी सृजन करता है.

* इस से कृषि उत्पादों के स्वाद, गुणवत्ता और उपज में वृद्धि होती है.

* यह रासायनिक उर्वरकों की खपत को कम कर के मृदा और मानव स्वास्थ्य के प्रति एक सुरक्षित एवं प्रभावकारी उपाय है.

Shubhavari Chauhan : एक युवा किसान की प्रेरणादायक कहानी

Shubhavari Chauhan : भारत की कृषि परंपरा सदियों पुरानी है, लेकिन आधुनिक समय में इसे वैज्ञानिक और व्यावसायिक दृष्टिकोण के साथ अपनाने वाले किसान कम ही हैं, खासकर युवा और महिलाएं. ऐसे ही एक प्रेरणास्रोत का नाम है शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan). उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले की इस युवा महिला किसान ने न केवल कम उम्र में जैविक खेती को अपनाया, बल्कि गाय के घी और अन्य कृषि उत्पादों के माध्यम से देशविदेश में अपनी पहचान बनाई है.

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) का जन्म 4 अप्रैल, 2005 को उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के कोठड़ी गांव में हुआ था. उन का पालनपोषण एक शिक्षित एवं कृषि प्रेमी परिवार में हुआ. उन के पिता संजय चौहान कृषि के विशेषज्ञ हैं, जिन्होंने एम.एस.सी के बाद भी खेती को अपने जीवन का ध्येय बनाया. उन की माता ममता चौहान संस्कृत में स्नातकोत्तर हैं और परिवार में भारतीय संस्कृति व पारंपरिक ज्ञान का गहरा प्रभाव है.

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) की प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही विद्यालय से हुई. फिलहाल वह सहारनपुर के मुन्ना लाल गर्ल्स डिग्री कालेज से बी.ए. फाइनल ईयर की छात्र हैं. पढ़ाई के साथसाथ उन्होंने बचपन से ही खेतखलिहान और पशुपालन में गहरी रुचि ली.

कृषि में प्रवेश और नवाचार

शुभावरी चौहान(Shubhavari Chauhan) ने मात्र 10 साल की आयु में अपने पिता के साथ खेती करना शुरू किया था. शुरुआत गन्ने की पारंपरिक खेती से हुई, लेकिन जल्द ही उन्होंने रासायनिक खाद और कीटनाशकों से दूर रहते हुए जैविक खेती को अपनाने का निश्चय किया.

उन्होंने गन्ने की जैविक खेती के साथसाथ पारंपरिक कोल्हू से गुड़ और शक्कर बनाने का काम  शुरू किया. इस के लिए उन्होंने स्थानीय मजदूरों को रोजगार दिया और पुराने पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विपणन तकनीकों के साथ जोड़ा.

कुछ ही सालों में शुभावरी चौहान ने आम (दशहरी, लंगड़ा, मल्लिका) की. इस के साथ ही,  बागबानी में टमाटर, मिर्च, धनिया, हल्दी और अन्य सब्जियों की खेती को भी जैविक पद्धति से अपनाया. उन्होंने ड्रिप सिंचाई और वर्मी कंपोस्ट जैसी नवीन तकनीकों को अपना कर जल और मृदा संरक्षण में भी योगदान दिया.

Shubhavari Chauhan

पशुपालन और देसी गाय का घी

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) की सब से बड़ी पहचान ‘देसी गाय के घी’ के उत्पादन और निर्यात के क्षेत्र में बनी. उन्होंने 20–30 देशी नस्ल की गायें पाल रखी हैं, जिन्हें केवल जैविक चारा और आयुर्वेदिक उपचार दिया जाता है. उन के द्वारा उत्पादित ‘बिलौनी घी’ की मांग केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पेरिस, दुबई, लंदन और सिंगापुर तक फैली हुई है.

बिलौनी घी की कीमत 1800 से 2000 रुपए प्रति किलो तक होती है, और हर साल वे 70 से 80 किलो घी औनलाइन बेचती हैं. यह घी ‘शुद्धता’ और ‘स्वदेशी तकनीक’ के कारण ग्राहकों के बीच काफी लोकप्रिय है.

पर्यावरण और जल संरक्षण में योगदान

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) ने कृषि को केवल उत्पादन का माध्यम नहीं माना, बल्कि इसे एक सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के रूप में भी अपनाया. उन्होंने अपने खेतों में नीम, सहजन, कनेर जैसे पौधे लगाए जो वायु प्रदूषण को कम करने में सहायक हैं. जल संकट से निबटने के लिए उन्होंने अपने खेतों में छोटे बांध बनाए, वर्षा जल संचयन और ड्रिप सिंचाई के माध्यम से जल संरक्षण की दिशा में शुभावारी चौहान (Shubhavari Chauhan) ने महत्वपूर्ण काम किया है.

तकनीक और सोशल मीडिया का उपयोग

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) ने डिजिटल तकनीकों को भी अपनाया है. वह सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स जैसे इंस्टाग्राम और यूट्यूब के माध्यम से खेती के टिप्स, वीडियो ब्लौग, घी निर्माण प्रक्रिया, आम की पैकिंग आदि से जुड़े वीडियो पोस्ट करती हैं, उन के हजारों फौलोवर्स हैं, जो उन के काम से प्रेरणा लेते हैं. उन का एकमात्र उद्देश्य है “युवा किसानों को जोड़ो, मिट्टी से जोड़ो.”

सम्मान और पुरस्कार

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) को उन के उल्लेखनीय कार्यों के लिए कई राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय पुरस्कार प्राप्त हुए हैं. कुछ प्रमुख सम्मानों में शामिल हैं:

  • कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही द्वारा सम्मानित किया गया

– “बेस्ट यंग फार्मर अवार्ड” (2024) – फार्म एंड फूड पत्रिका द्वारा, लखनऊ में.

– “वानी पुरस्कार” (2024) – मृदा संरक्षण और जैविक खेती के लिए.

– किसान दिवस (2023) पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा राज्य स्तरीय किसान सम्मान.

– कृषि विज्ञान केंद्र और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR) से विशेष प्रशस्ति पत्र.

इन पुरस्कारों के साथसाथ वे कृषि संगोष्ठियों, वेबिनार और महिला सशक्तिकरण कार्यक्रमों में भी वक्ता के रूप में शामिल होती हैं.

Shubhavari Chauhan

आर्थिक प्रभाव और रोजगार

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) का सालाना टर्नओवर लगभग 25 लाख रुपए है. वह अपने गांव और आसपास के क्षेत्र में 25 से 30 लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार देती हैं. उन का यह मौडल “गांव में रहो, गांव को समृद्ध करो” – आज अन्य युवाओं के लिए उदाहरण बन चुका है.

उनका मानना है कि “अगर सही मार्गदर्शन और ईमानदारी से मेहनत की जाए तो खेती भी करोड़ों का व्यवसाय बन सकता है.”

भविष्य की योजनाएं

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) अब खेती को और बड़े स्तर पर ले जाने की तैयारी कर रही हैं. उन की योजनाएं हैं:

– औनलाइन ब्रांड बनाना – “Shubhavari Organic”

– डेयरी यूनिट का विस्तार

– फार्म टूरिज्म की शुरुआत – जहां लोग जैविक खेती, पशुपालन, घी निर्माण की प्रक्रिया को सीधे देख सकें.

– ग्राम महिला स्वावलंबन केंद्र – महिलाओं को स्वरोजगार और प्रशिक्षण देने हेतु.

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) की कहानी आज के युवाओं, विशेष रूप से लड़कियों के लिए एक प्रेरणा है. जहां अधिकांश युवा शहरी जीवन और नौकरी की ओर भागते हैं, वहीं शुभावरी चौहान ने गांव में रह कर ही अपनी पहचान बनाई है. उन्होंने यह साबित कर दिखाया कि यदि लगन और सच्ची मेहनत हो, तो खेती केवल आजीविका नहीं, बल्कि सम्मान और समृद्धि का मार्ग बन सकती है.

उन की यात्रा भारत की नई कृषि क्रांति का उदाहरण है जो ज्ञान, परंपरा, नवाचार और स्वदेशी सोच से प्रेरित है. शुभावरी चौहान न केवल एक किसान हैं, बल्कि एक आंदोलन की शुरुआत हैं.

अच्छे बीज (Good Seeds) और प्राकृतिक खेती पर जोर

Good Seeds : एमपीयूएटी के कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने कहा कि आजादी के समय हमारे देश की स्थिति ठीक नहीं थी. लाल गेहूं आयात कर बमुश्किल अपना पेट भर पाते थे, लेकिन आज स्थिति उलट है. गेहूं और चावल की भरपूर पैदावार है और उस का भंडारण करने के लिए सुविधाओं की भी कमी है. फल और दूध उत्पादन में भी भारत अग्रणी है. अब समय आ गया है कि किसान समृद्धि की ओर बढ़ें.

डा. कर्नाटक पंचायत समिति भींडर के हींता गांव में विकसित कृषि संकल्प अभियान ( प्री खरीफ अभियान ) के तहत कृषक संवाद एवं गोष्ठी में जुटे किसानों को संबोधित कर रहे थे. गोष्ठी में लगभग 300 किसानों ने भागीदारी की. उन्होंने किसानों को नसीहत दी कि कृषि का मूल आधार अच्छा बीज का होना है. अच्छा बीज, अच्छी फसल से ही किसान समृद्ध हो सकता है. इस के लिए खेत में हर तीसरे वर्ष बीज बदलना जरूरी है. अब समय है कि रासायनिक उर्वरकों से दूरी बनाएं तथा गोबर की खाद और वर्मीकंपोस्ट का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग कर खेती की सेहत और खेत की मिट्टी को सुधारें. जल, जंगल, जमीन, जंतु का संरक्षण के साथ ही किसानों के लिए ऐसा माहौल तैयार करें कि धरती पुत्र भी कह उठे- ’मैं किसान हूं, इस देश की जान हूं’.

निदेशक अनुसंधान डा. अरविंद वर्मा ने कहा कि वर्तमान में जल संचयन और जल उपयोग की दक्षता अत्यंत जरूरी है. कृषि संकल्प अभियान का प्रमुख ध्येय है कि कृषि प्रयोगशालाओं में होने वाले शोध को किसानों तक पहुंचाया जाए. पोषण सुरक्षा के साथ जल संसाधन, हवापानी, जीवजंतु की रक्षा के लिए प्राकृतिक खेती की ओर जाना होगा. मृदा स्वास्थ्य कार्ड की उपयोगिता बताते हुए डा. वर्मा ने कहा कि सिफारिश के अनुसार ही उर्वरक का प्रयोग करें. खेतों में अधिकाधिक कार्बनिक पदार्थ का इस्तेमाल करें. इस से जमीन की सेहत भी सुधरेगी और किसानों को भी गुणवत्तापूर्ण खाद्यान मिल सकेगा.

उन्होंने एमपीयूएटी द्वारा विकसित प्रताप संकर मक्का-6 को खेतों में बोने को कहा. इस की उपज 60-65 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है. बीजोपचार व खरीफ में किसानों को अधिक उपज लेने के गुर बताए.

कृषि अधिकारी सत्यनारायण मेनारिया ने कृषि विभाग द्वारा चलाई जा रही कृषि की लाभकारी योजनाएं , तारबंदी, खेत तलाई, स्प्रिंकलर, प्रदर्शन आदि की जानकारी भी दी. सीटीएई के डा. मनजीत सिंह व डा. मालव ने भी मृदा परीक्षण एवं खरीफ में बोई जाने वाली प्रमुख फसलों मक्का, सोयाबीन, उड़द की उन्नत किस्मों, बोआई के समय बरती जाने वाली सावधानियां, कीटबीमारी व नियंत्रण के बारे में जानकारी दी.

केवीके वल्लभनगर के प्रभारी डा. मनीराम ने केवीके पर किसानों के लिए उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी भी दी.

प्रसार शिक्षा निदेशक डा. आरएल सोनी ने कहा कि कृषि के साथसाथ पशुपालन भी जरूरी है. कृषि व पशुपालन एकदूसरे के पूरक हैं. उन्होंने देशी गिर, कांकरेज साहीवाल नस्लों के गौपालन करने को कहा. कार्यक्रम का संचालन प्रोफैसर डा. लतिका व्यास ने किया.

Vermi Compost : कमाई के हैं इस में मौके अपार

Vermi Compost : खेती में अंगरेजी खाद के साथ ही जहरीली दवाओं, रासायनिक कीटनाशकों के इस्तेमाल से पैदावार तो बढ़ी, लेकिन इन का असर हवा, पानी, मिट्टी समेत पूरे माहौल पर पड़ा है. इन्हें जल्दीजल्दी और ज्यादा मात्रा में डालने से उपज का स्वाद, गुण, इनसानी सेहत व समूची खाद्य श्रंखला गड़बड़ा गई है. धरती थकहार कर जहरीली व बंजर बन गई है. अंगरेजी खाद व दवाएं अब अपना असर खोने लगी हैं, इसलिए दुनियाभर के वैज्ञानिक अब नए रास्ते निकालने में लगे हुए हैं.

अंगरेजी खाद व कैमिकल्स से तोबा कर के अब देशी कंपोस्ट खाद को तरजीह दी जा रही है. कंपोस्ट से उगाए गए और्गैनिक फल, सब्जी, दालों व अनाज आदि की मांग, जागरूकता व बाजार कीमत लगातार बढ़ रही है.

जाहिर है कि यह सिलसिला आगे और तेजी से बढ़ेगा. ऐसे में वर्मी कंपोस्ट (Vermi Compost) बना कर बेचना कमाई का चोखा धंधा है.

कंपोस्ट खाद की मांग गांव के खेतों में ही नहीं, बल्कि कसबों और शहरों की नर्सरियों व कालोनियों में भी तेजी से बढ़ रही है. दरअसल, बहुत से लोग अंगरेजी खाद के असर से बचने के लिए अपने गमलों, किचन गार्डन आदि में अब कंपोस्ट खाद का इस्तेमाल करने लगे हैं. सेहत के लिए जागरूक हो रहे लोग अब घर की छतों पर भी जैविक खाद से फल, फूल व सब्जियां आदि उगाने लगे हैं.

उत्तर भारत के मेरठ, नोएडा, गाजियाबाद, गुड़गांव व दिल्ली में भी आंगन, दीवारों व छतों पर हरियाली रखने का चलन बढ़ रहा है, लेकिन इस मामले में बैंगलुरु पूरे देश में पहले स्थान पर है. वहां के बहुत से लोग कंपोस्ट की मदद से छतों पर और्गैनिक सब्जियां उगा कर दूसरे देशों को निर्यात कर के अच्छीखासी कमाई कर रहे हैं. वे अपनी उपज की क्वालिटी सुधारने के लिए वर्मी कंपोस्ट (Vermi Compost) का इस्तेमाल करते हैं.

वर्मी कंपोस्ट (Vermi Compost)

क्या है वर्मी कंपोस्ट (Vermi Compost)

घास, पत्ती, मिट्टी व गोबर के ढेर में कुछ केंचुए छोड़े जाते हैं. वे उसे खा कर अपना जो मल निकालते हैं, उसे वर्मी कंपोस्ट (Vermi Compost) कहते हैं. इस में नाइट्रोजन, सल्फर व पोटाश आदि पोषक तत्त्व होने के कारण यह खाद जमीन की सेहत व खेतीबागबानी के लिए बहुत ही फायदेमंद होती है. साथ ही, इसे तैयार करने में बदबू भी नहीं आती. कचरे का निबटारा भी आसानी से हो जाता है.

कचरे से कंपोस्ट बनाने का चलन सदियों पुराना है, लेकिन पहले गंवई इलाकों में लोग कंपोस्ट खाद बनाने के लिए कूड़ेकचरे को गड्ढे में दबा कर छोड़ देते थे. बहुत से लोग अब भी यही करते हैं. इस तरह से कंपोस्ट तैयार होने में तकरीबन 2 साल का वक्त लगता है, जबकि वर्मी कंपोस्ट (Vermi Compost) 2-3 महीने में तैयार हो जाती है. 100 वर्गफुट जगह में 1 टन वर्मी कंपोस्ट (Vermi Compost) बन जाती है, जो आधा हेक्टेयर जमीन में डालने के लिए काफी है.

इस काम की खासीयत यह है कि इसे घर के पिछवाड़े में छोटे पैमाने से ले कर बहुत बड़े पैमाने तक किया जा सकता है. वर्मी कंपोस्ट (Vermi Compost) में बतौर कच्चे माल के तौर पर काम आने वाला कचरा खेती, बागबानी, होटलों, कालोनियों, पार्कों, केंचुए वर्मी कंपोस्ट (Vermi Compost) बनाने वालों से व गोबर डेयरी व गौशालाओं आदि से मिल जाता है. विशेषज्ञों के अनुसार आइसेनियाफेटिडा किस्म के लाल केंचुए कंपोस्ट के लिए सब से बढि़या हैं, क्योंकि ये हर मौसम को आराम से सह लेते हैं.

1-2 किलोग्राम के पैकेट पौलीथिन की पन्नी में व बड़े 5,10 व 20 किलोग्राम को बैग या बोरे में पैक करें. अपने नाम, पते, ब्रांड और वजन आदि का लेबल लगा कर सप्लाई करें. बिक्री से पहले नियमकायदों की जानकारी के लिए अपने जिले के कृषि अधिकारी से सलाह ले सकते हैं.

वर्मी कंपोस्ट (Vermi Compost)

वर्मी कंपोस्ट (Vermi Compost) ऐसे बनाएं

वर्तमान में कूड़ाकचरा जलाने से अच्छा है उसे वर्मी कंपोस्ट (Vermi Compost) बनाना व उस से पैसे कमाना. इस के लिए समतल जगह पर रेत, मिट्टी की 6 इंची तह लगाएं. कचरे से कांच, धातु व पत्थर आदि निकाल कर अलग कर दें. घास, पत्ती, फल, सब्जियों आदि के गीले कचरे पर गोबर की तह लगा कर केंचुए छोड़ें. उन के ऊपर फिर गोबर व हरा कचरा डाल कर ढेर को पुआल, टाट या गन्ने की सूखी पत्तियों से ढक दें, ताकि सीधी व तेज धूप से नुकसान न हो.

इस के बाद रोज हजारे या स्प्रेयर से हलका पानी डालते रहें, ताकि थोड़ी नमी बनी रहे. हफ्ते में एक बार सावधानी से ढेर को पलट कर ऊपरनीचे कर दें. एक माह बाद केंचुए बढ़ने पर कचरे की और भी तह लगा सकते हैं. गोबर व हरे कचरे की मात्रा तकरीबन आधी आधी रख सकते हैं. साथ ही नमी भी 50 फीसदी से ज्यादा न हो.

वर्मी कंपोस्ट (Vermi Compost) खाद को उलटतेपलटते रहें और अंत में छानते वक्त सावधानी बरतें ताकि केंचुओं का नुकसान न हो. डेढ़ माह बाद पानी छिड़कना बंद कर दें. अब आप देखेंगे कि धीरेधीरे कचरा बदल कर हलकी, भुरभुरी व कत्थई रंग की वर्मी कंपोस्ट (Vermi Compost) में बदलने लगी है.

लौकी (Bottle Gourd) की खेती और फसल की सुरक्षा

लौकी बेल वाली फसल है और किसान इस की खेती कर के अच्छाखासा मुनाफा कमाते हैं. साथ ही यह सेहत के लिए भी काफी फायदेमंद मानी जाती है. यह कम समय में तैयार होने वाली फसल है.

खेत की तैयारी : लौकी की फसल वैसे तो हर तरह की जमीन में हो जाती है, लेकिन सही जल निकास वाली जीवांश से भरपूर दोमट मिट्टी इस की खेती के लिए फायदेमंद है. इस के लिए जमीन का पीएच मान 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए.

खेत की तैयारी के लिए सब  पहले हरी खाद डालनी चाहिए. इस के लिए 1 एकड़ जमीन में 2 किलोग्राम सतई, 4 किलोग्राम मूंग या दलहन, 1 किलोग्राम तिलहन और 2 किलोग्राम ढेंचा बीज ले कर बोआई करें. जैसे ही यह फसल 45 दिन की हो जाए, तभी हैरो से जुताई कर 1000 लिटर बायोगैस स्लरी या संजीवक खाद डालें और एक हफ्ते बाद मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई कर इसे खुला छोड़ दें.

इस के एक हफ्ते बाद 3 से 4 बार देशी हल से जुताई कर खेत में पाटा लगा कर समतल कर लें. उस के बाद 10-10 फुट पर 1 फुट गहरी और 2 फुट चौड़ी नालियां बना कर 3-3 फुट के अंतर पर थावले (थाले) बना कर हर थावले में 1 किलोग्राम वर्मी कंपोस्ट खाद या गोबर की सड़ी खाद और 200 ग्राम राख मिला कर थाला ढक दें. उस के बाद नालियों में सिंचाई के 5-6 दिन बाद लौकी के बीजों को बोएं. बोआई के दौरान हरेक थाले में 4 से 6 बीज बोएं.

खेती के लिए सही

समय : लौकी की खेती के लिए गरम और आर्द्र वातावरण काफी अच्छा रहता है, जबकि ज्यादा बारिश और बादलों से भरा आसमान इस की फसल को नुकसान पहुंचाते हैं. बिना पाले वाली जलवायु में लौकी की पैदावार काफी अच्छी होती है. इसलिए लौकी की खेती के लिए उत्तरमध्य भारत में फरवरी से जून का समय काफी मुफीद रहता है.

लौकी की अच्छी किस्में

पूसा समर लौंग : यह किस्म गरमियों और बरसात दोनों ही मौसम में अच्छी उपज देती है. इस की बेल में फल ज्यादा लगते हैं और 40 से 50 सैंटीमीटर तक लंबे होते हैं. इस की उपज 70 से 75 क्विंटल प्रति एकड़ तक हो जाती है.

पंजाब लौंग : यह किस्म काफी उपयोगी और अच्छी उपज देती है. इस के फल लंबे, हरे और कोमल होते हैं. बरसात में इसे लगाना ज्यादा अच्छा रहता है. इस की उपज 80 से 85 क्विंटल प्रति एकड़ होती है.

पंजाब कोमल : लौकी की यह अगेती मध्यम आकार की लंबे फल वाली अंगूरी रंग की किस्म है. इस के फल काफी समय तक ताजा रहते हैं और इस की उपज 150 क्विंटल प्रति एकड़ तक होती है.

पूसा नवीन : यह वसंत के मौसम की सब से अच्छी किस्म है. इस के फल दूसरी किस्मों की तुलना में जल्दी तैयार होते हैं. इस के फल छोटे, लंबे, बेलनाकार और मध्यम मोटाई के हरे रंग के होते हैं. फल का वजन 800 ग्राम के आसपास होता है.

कोयंबटूर: दक्षिण भारत की यह सब से अच्छी किस्म है. क्षारीय मिट्टी में यह अच्छी उपज देती है. इस की उपज 70 क्विंटल प्रति एकड़ है.

आजाद नूतन : यह प्रजाति काफी लोकप्रिय है, क्योंकि यह बीज की बोआई के 60 दिन बाद फल देना शुरू कर देती है. इस के फल 1 किलोग्राम वजनी होते हैं और उपज 80 से 90 क्विंटल प्रति एकड़ मिलती है.

सिंचाई और निराईगुड़ाई : लौकी की खेती के लिए सिंचाई काफी खास है. इस में पानी पूरे खेत में न दे कर केवल थाले में ही दें, ताकि फंगस कम नुकसान पहुंचा सकें.

वैसे तो गरमी के मौसम में 4 से 5 दिन में सिंचाई करनी चाहिए. सिंचाई के एक दिन बाद 200 ग्राम राख में 5 ग्राम हींग खेत में डालने से पौधे की बेल स्वस्थ रहती है और फल भी समय से पहले नहीं टूटते.

लौकी की फसल गरमी और बरसात की होने से इस में खरपतवार ज्यादा उगते हैं. समयसमय पर इन्हें खेत से निकालना चाहिए. साथ ही, समय पर जरूरत के मुताबिक निराईगुड़ाई करते रहना चाहिए.

कुदरती खाद का इस्तेमाल : लौकी की फसल में बीज बोने के 3 हफ्ते बाद जब पौध में 3-4 पत्ते निकलने लगते हैं, तब 2000 लिटर बायोगैस स्लरी या संजीवक खाद या फिर 10 किलोग्राम गोबर से बनी खाद प्रति एकड़ के हिसाब से इस्तेमाल करनी चाहिए. जब पौधों में फूल निकलने लगें तब दूसरी बार 1000 लिटर बायोगैस स्लरी या 1000 लिटर संजीवक खाद या फिर 20 किलोग्राम गोबर की खाद प्रति एकड़ की दर से डालें.

तीसरी बार इस खाद को पहली बार लौकी की तुड़ाई के बाद देने से अच्छी उपज हासिल होती है.

लौकी की खेती में कुदरती कीटरक्षक का समय पर छिड़काव करने से फसल पूरी तरह रोगमुक्त रहती है और अच्छी उपज हासिल होती है. लौकी की फसल पर लगने वाले कुछ खास रोगों का कुदरती निदान इस तरह करते हैं.

रैड बीटल : यह एक हानिकारक कीट है जो लौकी के पौधे की शुरुआती बढ़ोतरी के दौरान लगता है और पत्तियों को खाता है. इस वजह से पौधों की सही तरीके से बढ़वार नहीं हो पाती है. रैड बीटल की यह सूंड़ी काफी खतरनाक होती है. यह जमीन के भीतर पौधों की जड़ों को काट कर उन्हें नुकसान पहुंचाती है.

रोकथाम : रैड बीटल से लौकी की फसल को बचाने के लिए पतंजलि निंबादि कीटरक्षक काफी असरकारक है. 5 लिटर कीटरक्षक को 40 लिटर पानी में मिला कर हफ्ते में 2 बार छिड़काव करें. छिड़काव के बाद नीम की लकड़ी की राख छिड़कने से अच्छी पैदावार हासिल होती है.

फ्रूट फ्लाई : यह मक्खी लौकी की फसल में घुस कर अंडे देती है. इन अंडों से सूंड़ी निकलती है, जो फलों को नुकसान पहुंचाती है. इस से किसानों को अच्छी कीमत नहीं मिल पाती है.

रोकथाम : फ्रूट फ्लाई से फसल को बचाव के लिए जब लौकी की फसल पर फूल निकलने शुरू होते हैं, उस समय पतंजलि बायो रिसर्च इंस्टीट्यूट के ‘अभिमन्यु’ 100 मिलीलिटर को 3 लिटर खट्टी छाछ में 150 ग्राम कौपर सल्फेट पाउडर के साथ 40 लिटर पानी में मिला कर छिड़काव करें. यह छिड़काव हर हफ्ते करना जरूरी है.

पाउडरी मिल्ड्यू : यह रोग एरीसाइफी सिकोरेसिएरम नामक कवक के चलते होता है. इस फंगस की वजह से लौकी की बेल और पत्तियों पर सफेद गोलाकार जाल जैसा फैल जाता है, जो बाद में कत्थई रंग में तबदील हो जाता है. इस में पत्तियां पीली पड़ कर सूख जाती हैं.

रोकथाम : इस रोग से बचाव के लिए 5 लिटर खट्टी छाछ में 2 लिटर गोमूत्र और 30 लिटर पानी मिला कर 4 दिन के अंतर पर छिड़काव करें. इस रोग से होने वाले नुकसान से फसल बच जाती है.

लौकी का एंथ्रेक्नोज : लौकी की फसल में एंथ्रेक्नोज रोग क्लेटोटाइकम नामक फंगस के कवक के कारण होता है. इस रोग की वजह से पत्तियों पर लालकाले धब्बे बन जाते हैं. इस की वजह से पौधा सेहतमंद नहीं रह पाता है.

रोकथाम : 5 लिटर गोमूत्र में 2 किलोग्राम अमरूद या आड़ू के पत्ते उबाल कर ठंडा कर छानें, उस में 30 लिटर पानी मिला कर 3-3 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें.

लौकी की तोड़ाई: लौकी के फलों की तोड़ाई कोमल अवस्था में ही करनी चाहिए. कठोर फलों से सब्जी अच्छी नहीं बनती और बाजार में इस की कीमत भी सही नहीं मिलती.