Profitable Farming : दो छोटे गाँव भर्री और पिपरोखर आज पूरे देश में चर्चा का विषय बने हुए हैं. कभी पारंपरिक खेती में घाटे से जूझने वाले किसान अब फूलगोभी की खेती से लाखों की कमाई कर रहे हैं (Profitable Farming) . यहाँ की मिट्टी को अब लोग ‘सफेद सोना’ कहने लगे हैं, क्योंकि इसने किसान परिवारों की किस्मत बदल दी है. हमारे पत्रकार साथी वहां के किसानों से मिले और जानी उनकी सफलता की कहानी, उन्ही की ज़ुबानी –
40 साल पुरानी तकनीक बनी आमदनी का आधार
मध्यप्रदेश के बघेलखंड क्षेत्र के सतना जिले की दो ग्राम पंचायत फूलगोभी का गढ़ बन चुकी है. इन पंचायतों के किसान रबी और खरीफ की पारंपरिक खेती के संक्रमण काल के बीच के समय का सदुपयोग करते हुए फूलगोभी की खेती करते आ रहे हैं. यह खेती कम समय में तेज आमदनी देने वाली फसलों में से एक है. इस आमदनी बढ़ाने वाली खेती के चार दशक हो चुके हैं. धीरे-धीरे आस-पास के दर्जनों गाँवों ने भी इस मॉडल को अपनाया और आज यह खेती 200 से अधिक हेक्टेयर में फैल चुकी है.
3 एकड़ से लाखों की कमाई
तीन एकड़ जमीन में फूलगोभी की खेती करने वाले भर्री गांव के किसान विजय कुमार त्रिपाठी (52 वर्ष) बताते हैं “ 35 से 40 साल हो गये हैं. इसमें भर्री और पिपरोखर पंचायत विशेष तौर पर फूलगोभी की खेती करते हैं. इन्हीं दो पंचायतों से प्रेरणा लेते हुए आसपास के गांव इस समय फूलगोभी की खेती कर रहे हैं. एक एकड़ में करीब 30 हजार की लागत आती है, लेकिन रेट अच्छा मिल जाए तो दो से ढाई लाख की कमाई हो जाती है.” यानी किसान एक एकड़ से 1.75–2 लाख रुपये तक की शुद्ध आमदनी कमा रहे हैं. Profitable Farming
केशव की सफलता: 25 साल की मेहनत का फल
लगभग 25 साल से फूलगोभी की खेती करने वाले पिपरोखर के किसान केशव प्रसाद कुशवाहा (58 वर्ष) बताते हैं “ मेरे पास 3 एकड़ जमीन है इसमें से 1 एकड़ में फूलगोभी की खेती करता हूँ. बाकी की 2 एकड़ में धान लगा लेता हूँ. फूलगोभी में बीज, दवा एवं खाद मिलाकर 30 से 32 हजार का खर्च आता है. जबकि आमदनी अच्छा रेट मिलने पर निर्भर है. हालांकि पौने 2 लाख से 2 लाख तक की कमाई कहीं नहीं गई. इतना हो ही जाता है. सिर्फ एक एकड़ की फूलगोभी किसान के पूरे साल का बजट संभाल देती है.
कैसे होती है फूलगोभी की हाई-अर्निंग खेती
किराए में खेत लेकर फूलगोभी की खेती करने वाले तुर्री के किसान अरविंद कुशवाहा को 40 से 45 हजार रुपए प्रति एकड़ बतौर लागत लगती है जिसमें किराया भी शामिल है. इसके बाद भी 2 से ढाई लाख तक प्रति एकड़ की कमाई कर लेते हैं. बुवाई से लेकर फसल के उत्पादन तक की प्रक्रिया बताते हुए वे कहते हैं-
- खेत की 2–3 बार जुताई,
- गोबर खाद डालकर मिट्टी को उपजाऊ बनाना,
- नर्सरी तैयार करना,
- 25 दिन बाद पौधों को खेत में रोपना,
- निराई-गुड़ाई, सिंचाई और खाद प्रबंधन,
- ढाई महीने में फूल तैयार,
- तीन महीने में फसल तैयार,
- एक एकड़ से 100 क्विंटल से अधिक उत्पादन.
किसान विजय क्या कहते हैं
फूल ग़ोभी के खेत में बैठे अपनी खेती को निहारते हुए किसान विजय बताते हैं- “भर्री और पिपरोखर के किसानों की आमदनी को देखकर ही अन्य गांव के किसान इसकी खेती करने लगे हैं. भर्री, तुर्री, चकहट, डढ़िया, चकहटा, डाडीनटोला, पिपरोखर, अटरा, कंचनपुर, पटियन टोला, श्यामनगर, सेमरिहा, बरकछा आदि में फूल ग़ोभी की खेती लगभग 200 से ज्यादा हेक्टेयर में हो रही हैं.
सतना जिला: देश के सबसे आगे बढ़ते उद्यानिकी क्षेत्रों में
- मध्यप्रदेश में उद्यानिकी फसलों की उत्पादकता देश के औसत से 2% अधिक
- सतना जिले में अकेले 2225 हेक्टेयर में फूलगोभी
- उत्पादन 55,742 मीट्रिक टन
- अनुमानित कमाई 6 करोड़ रुपये से अधिक
इससे साबित होता है कि उद्यानिकी फसलें पारंपरिक फसलों की तुलना में 5 गुना अधिक लाभकारी हैं.
फूलगोभी ने कवर किया पुराना घाटा
फूलगोभी की खेती कुछ किसानों के लिए यह पारम्परिक खेती में होने वाले घाटे को भी कवर करने का जरिया बना चुकी है. पांच एकड़ में फूल ग़ोभी की खेती करने वाले 58 साल के किसान अखिलेश त्रिपाठी बताते हैं – “धान, गेहूं, चना में सालाना दो लाख का घाटा होता था. अब फूलगोभी सारी भरपाई कर देती है और ऊपर से कमाई भी होती है.”
वहीं अखिलेश की बातों में अपनी बात जोड़ते हुए किसान अरविंद बताते हैं “ मेरे पास अपनी 1 एकड़ जमीन है जिसमें परिवार के भरण पोषण के लिए धान-गेहूं हो जाती है लेकिन इससे आगे नहीं बढ़ पा रहा था. इसी चक्कर में किराये में खेत लेकर फूलगोभी की खेती करने लगा. जो अब जाकर फायदे का सौदा साबित हुई है.”
किसानों की प्रमुख समस्याएँ-
- हाइब्रिड बीज महंगे और मौसम पर अधिक निर्भर
- भूमि जुताई की बढ़ती लागत
- खाद और दवाइयों का खर्च (10–15 हजार प्रति एकड़)
इन चुनौतियों के बावजूद किसान कहते हैं- “खर्चा बढ़ा है, लेकिन आमदनी उससे कई गुना ज्यादा बढ़ी है.”
बागवानी अधिकारी क्या कहते हैं
उपसंचालक (प्रभार) उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण सतना जिला अनिल सिंह बताते हैं “ भर्री और पिपरोखर पंचायत के गांव फूलगोभी की खेती 4 दशक से कर रहे हैं. इन्हीं के सीख लेते हुए आसपास के कई गांव फूलगोभी की खेती करने लगे हैं.” वहीं अनुविभागीय अधिकारी उचेहरा सत्य नारायण सिंगरौल बताते हैं कि – “प्रमुख पंचायतों में 200 हेक्टेयर से भी ज्यादा में फूलगोभी उगाई जाती है. जिससे अनुमानित 6 करोड़ से भी ज्यादा की उत्पादकता यानी कि कमाई हो रही है.”
भारत के किसानों के लिए सीख
भर्री और पिपरोखर की सफलता देश के हर किसान को संदेश देती है-
- जमीन चाहे कम हो, उच्च मूल्य वाली फसलें भी बड़ा मुनाफा दे सकती हैं
- फसल विविधीकरण ही भविष्य की खेती है
- उद्यानिकी फसलें किसानों को स्थिर और अधिक आय देती हैं
- अगर समुदाय मिलकर काम करे, तो पूरा क्षेत्र बदल सकता है
यह कहानी बताती है कि- जब किसान सोच बदलते हैं, तो मिट्टी भी किस्मत बदल देती है. अब यह ‘सफेद सोना’ न सिर्फ खेतों को हरा-भरा कर रहा है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ताकत दे रहा है.
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