Crop Protection : एक ओर तेज धूप फसल को झुलसा देती है, वहीं इस दौरान मौसम में काफी उतारचढ़ाव भी रहता है. ऐसे मौसम में फसल की निगरानी करना काफी अहम माना जाता है, क्योंकि इस सीजन में कीटपतंगों के साथसाथ अनेक रोगों का हमला भी बढ़ जाता है. अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए तो खड़ी फसल को नुकसान हो सकता है.

किसान भाइयों को इस के लिए पहले से ही तैयारी करनी चाहिए ताकि फसल में रोग न लगे. तापमान बढ़ने के बाद रबी की फसलों में कई तरह के बदलाव आते हैं. बदलते मौसम को देख किसान खेती प्रबंधन के लिए कुछ उपाय अपना सकते हैं:

रबी की प्रमुख फसल गेहूं है, जिस का रकबा सब से ज्यादा होता है इसलिए किसानों को गेहूं में जिंक की कमी के लक्षण दिखाई देने पर 5 किलोग्राम जिंक सल्फेट और 16 किलोग्राम यूरिया को 800 लिटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़कें.

अगर यूरिया की टौप ड्रैसिंग कर दी गई है तो यूरिया के बजाय 2.5 किलोग्राम बुझे हुए चूने का पानी यानी 2.5 किलोग्राम बुझे चूने को 10 लिटर पानी में भिगो कर दूसरे दिन पानी छान कर इस्तेमाल करें.

किसान भाई इन तरीकों पर अगर अमल करेंगे तो उन की फसल सुरक्षा (Crop Protection) आसानी से हो जाएगी.

मौसम विभाग भी समयसमय पर किसानों को बता देता है कि आने वाले दिनों में मौसम में क्या बदलाव होंगे, जिस से किसान पहले से तैयारी कर लेते हैं. इस से यह फायदा होता है कि उन्हें कम नुकसान का सामना करना पड़ता है.

मौसम विभाग के मुताबिक, मार्च माह में उत्तर भारत के ज्यादातर इलाकों में दिनरात दोनों का तापमान सामान्य से 5 डिगरी सैल्सियस ऊपर रिकौर्ड किया गया. बढ़ते तापमान के चलते दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों में ठंड का असर कम पड़ा.

तिलहन फसलों की खेती

यदि नाशी जीवों यानी कीटों की तादाद उन के प्राकृतिक शत्रुओं से दोगुनी हो तभी कैमिकल दवाओं का इस्तेमाल करें. देर से बोई गई फसलों में माहू कीट के लगने की आशंका बनी रहती है.

माहू, चित्रित बग व पत्ती सुरंगक कीटों के नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल 125 मिलीलिटर प्रति हेक्टेयर या डाईमेथोएट 30 ईसी या मिथाइल ओ डेमेटान 25 फीसदी ईसी एक लिटर प्रति हेक्टेयर या मोनोक्रोटोफास 36 फीसदी एसएल की 500 मिलीलिटर प्रति हेक्टेयर की दर से 600-700 लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें.

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