Pulse Crops: भारत की ज्यादातर जनसंख्या दाल प्रोटीन पर निर्भर है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर इंसान को रोजाना दाल की 80 ग्राम मात्रा मिलनी चाहिए, जबकि 1951-56 के बीच महज 64 ग्राम, 1999-2000 में महज 36 ग्राम, 2003-04 में महज 30 ग्राम तथा वर्तमान में महज 18-20 ग्राम दाल प्रति व्यक्ति रोजाना का औसत है.

क्षेत्रफल में इजाफा

फसल चक्रों में मामूली फेरबदल करके फसल विविधीकरण तथा बहुफसली प्रणाली से दलहन के क्षेत्रफल में इजाफा किया जा सकता है. इसके लिए बेकार पड़ी हुई जमीन, सुधरी बंजर जमीन और अन्य खाली जमीनों में कम लाभकारी फसलों की जगह दलहनी फसलें उगाकर दलहनी फसलों (Pulse Crops) के क्षेत्रफल में इजाफा किया जा सकता है.

सहफसली खेती है मुनाफेदार

गन्ने के साथ उड़द व मूंग की सहफसली खेती करके उत्पादन में इजाफा किया जा सकता है.

करें प्रसंस्करण

गांवों में सस्ती दरों पर छोटी-छोटी दाल की चक्कियां लगाकर प्रसंस्करण लागत कम करके दालों को सस्ती दरों पर उपलब्ध कराया जा सकता है. भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान द्वारा मिनी दाल चक्की विकसित की गई है.

सही प्रजाति का चयन जरूरी

दलहनी फसलों (Pulse Crops) की खेती में खास इलाके के लिए मुनासिब उन्नतशील बीजों की समय पर बोआई करने भर से पैदावार में करीब 20-30 फीसदी तक का इजाफा हो जाता है. किसानों को सलाह दी जाती है कि वे बीजों का परंपरागत विधि से परीक्षण करने के बाद ही बोआई करें.

बीज उपचार

उड़द के 15-20 किलोग्राम व मूंग के भी 15-20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से लेकर उन्हें बोने से पहले 2.5 ग्राम थीरम व 1.0 ग्राम कार्बंडाजिम से उपचारित करें. दीमक तथा अन्य जमीन के कीटों से बचाव हेतु बीजों को 4 मिलीलीटर क्लोरोपाइरीफास या 2 मिलीलीटर एमिडाक्लोराइड से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए. इसके अलावा 250 ग्राम राइजोबियम व 250 ग्राम पीएसबी प्रति 10 किलोग्राम बीज की दर से लेकर उसे गुड़ के घोल में मिलाकर (10 किलोग्राम बीजों के लिए 200 ग्राम गुड़ को आधा लीटर पानी में घोलें) उससे भी बीजों को उपचारित करें.

Pulse Cropsसमय पर करें बोआई

उड़द की बोआई जुलाई के अंतिम हफ्ते से अगस्त के दूसरे हफ्ते तक और मूंग की बोआई मार्च के पहले हफ्ते से मार्च के आखिरी हफ्ते
तक सीड बेड प्लांटर की सहायता से मेंड़ों पर करनी चाहिए.

ऐसे करें कीटों की रोकथाम

कमला कीट

ये कीट पत्तियों के ऊपर शुरुआती अवस्था में झुंड में होते हैं. प्रभावित पत्तियों को काटकर जमीन में दबा दें. इस के अलावा कमला कीट से बचाव के लिए इंडोसल्फान 35 ईसी की 1.5 लीटर मात्रा 500-600 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.
मिथाइल पैराथियान धूल (2 फीसदी) की 25 किलोग्राम मात्रा व फेनवलेट धूल (4 फीसदी) की 0.25 किलोग्राम मात्रा को करीब 1 क्विंटल चूल्हे की राख में मिलाकर सुबह के वक्त बुरकाव करें.

फलीभेदक

फलीभेदक कीट से बचाव के लिए इंडोसल्फान 35 ईसी की 1.25 लीटर मात्रा या क्यूनालफास 25 ईसी की 1.25 लीटर मात्रा 500-600 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

बीमारियों की रोकथाम जरूरी

इसमें ज्यादातर पीला या चित्तवर्ण (यलोमोजेक) रोग का प्रकोप होता है. इससे पत्तियों पर पीले-सुनहरे चकत्ते पड़ जाते हैं. इस रोग के विषाणु सफेद मक्खी द्वारा फैलते हैं. इस की रोकथाम के लिए डाइमिलोएट 30 ईसी या एमिडाक्लोप्रिड की 250 मिलीलीटर मात्रा 1 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से 4-5 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए.

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