Paddy Seeds: वर्तमान में धान का सामान्य व हाईब्रिड बीज कई सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों द्वारा किसानों को मुहैया कराया जा रहा है, पर उस की मात्रा इतनी नहीं है कि हर किसान को मिल सके. ऐसे में अगर किसान खुद धान के बीज का उत्पादन करे तो वह तमाम कठिनाइयों से बच सकता है. किसान बीज उत्पादन कर के उसे दूसरे किसानों और संस्थानों को बेच कर ज्यादा लाभ हासिल कर सकता है.
खेत का चयन :
धान के बीज (Paddy Seeds) उत्पादन के लिए ऐसे खेत का चयन करें, जिस में पिछले मौसम में धान की फसल न ली गई हो, क्योंकि धान खेत में काफी झड़ जाता है, जिस से अनचाहे पौधे निकल आते हैं.
किस्मों का चुनाव :
अपने इलाके के मुताबिक बीज फसल की उन्नत किस्मों का चयन करना चाहिए. भरोसेमंद स्रोत से मिलने वाले स्वस्थ व शुद्ध बीजों का ही चुनाव करें ताकि अधिक से अधिक पैदावार मिल सके. 1 हेक्टेयर में पौध रोपने के लिए नर्सरी में पौध तैयार करने के लिए 20-25 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है.
कहां से लें बीज :
बीज उत्पादन करने के लिए हमेशा बीज प्रमाणीकरण संस्था द्वारा प्रमाणित बीज ही लेना चाहिए. विभिन्न राज्यों में अच्छी नस्ल के बीज आमतौर पर बीज विकास निगम, राष्ट्रीय बीज निगम, कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि अनुसंधान संस्थानों से लिए जा सकते हैं.
दूरी :
धान का बीज (Paddy Seeds) उत्पादन दूसरी फसलों से तय दूरी पर किया जाता है, ताकि फूल खिलते समय होने वाले परागण से बीज गुणवत्ता पर असर न पड़े और कटाई के समय एक फसल के बीजों में दूसरी फसल के बीजों की मिलावट न हो और कोई रोग न लगे.
खाद व उर्वरक :
मिट्टी की जांच के आधार पर बताए गए उर्वरकों की मात्रा का इस्तेमाल करना चाहिए.
कृषि क्रियाएं :
धान की बीज (Paddy Seeds) फसल के लिए गरमी की जुताई करने से पहले पलेवा कर लें जिस से खरपतवार उग आएं. पलेवा के 15-20 दिनों बाद खरपतवारों को निकालने के लिए जरूरी कृषि क्रियाएं करनी चाहिए. इस से मिट्टी भी ढीली हो जाती है और कल्ले भी अधिक फूटते हैं.
धान के खरपतवार खत्म करने के लिए खुरपी या पैडीवीडर का इस्तेमाल करें. यदि रसायनों की जरूरत हो तो ध्यान रखें कि खेत में 2-3 सेंटीमीटर पानी खड़ा रहना चाहिए.
फसल सुरक्षा :
धान में कई कीड़ों व बीमारियों का प्रकोप होता है. इन का असर नर्सरी से ही शुरू हो जाता है. इस के लिए समय रहते ही रोकथाम करें. मिट्टी में मिला दें.
फालतू पौधों को निकालना :
धान की बीज (Paddy Seeds) फसल में से फालतू पौधों को छांट कर निकाल देना चाहिए. जिन पौधों में ठीक से फूल, पत्ती व कल्ले वगैरह नहीं निकलते, वे फालतू होते हैं और बीज फसल के लिहाज से बेकार होते हैं.
बीज फल की कटाई व मड़ाई :
बीज फसल को 85-90 फीसदी पकने पर ही कटाई करनी चाहिए. बीज फसल को काटने के बाद थ्रेसिंग फ्लोर पर सुखाना चाहिए. थ्रेसिंग फ्लोर सूखा व साफ होना चाहिए. एक समय में थ्रेसिंग फ्लोर पर केवल एक किस्म का ही बीज सुखाना चाहिए.
बीजों की सफाई व छंटाई :
बीज उत्पादन में यह बहुत महत्त्वपूर्ण चरण है. बीजों की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए उन की सफाई यंत्रों द्वारा की जाती है.
बीज परीक्षण :
सफाई व छंटाई के बाद बीज का नमूना परीक्षण के लिए प्रयोगशाल में भेजा जाता है, जहां बीज की शुद्धता, अंकुरण कूवत, स्वास्थ्य व नमी का परीक्षण किया जाता है. प्रयोगशाला से मानकों के मुताबिक उचित प्रमाणपत्र मिलने के बाद कवकनाशी और कीटनाशी दवाओं से बीजों को उपचारित किया जाता है. बीजोपचार के बाद बीजों को उपचारित थैलों व बोरों में भर कर लेबल लगा कर पैक कर दिया जाता है.
बीज प्रमाणीकरण :
बीज प्रमाणीकरण संस्था द्वारा फसल की विभिन्न अवस्थाओं पर बीज फसल का निरीक्षण कर के सही पाए जाने पर बीजों को प्रमाणित किया जाता है. इस संस्था द्वारा बीज फसल को कटाई, मड़ाई व सफाई के दौरान भी जांचा जाता है. सभी जांचों के बाद बीज प्रमाणीकरण संस्था द्वारा लेबल जारी किए जाते हैं, जिस पर सभी मानक दर्ज होते हैं. इन लेबलों को बोरों के साथ सिल कर बीज फसल को भंडारगृह में रखा जाता है.





