मशहूर फिल्म कलाकार परणीति चोपड़ा और इमरान आम के जूस का प्रचार करते हुए कहते हैं, ‘आम और लव का कोई सीजन नहीं होता है.’ दूसरी ओर अभिनेत्री कैटरीना कैफ बहुत ही रोमांचक अंदाज में ‘आमसूत्र’ से लोगों को रूबरू कराती है. अभिनेता शाहरुख खान भी आम के उत्पाद का प्रचार करते दिखते हैं. इस से आम के महत्त्व को आसानी से सम?ा जा सकता है. इस के बाद भी आम रोजगार का साधन नहीं बन पा रहा है. जिन प्रदेशों में आम पैदा होता है, वहां के बागबान ही नहीं आम रोजगार से जुड़े दूसरे लोग भी बहुत परेशान हैं. Mango Farming

भारत का आम पूरी दुनिया में मशहूर है. इन में मलीहाबाद के दशहरी व महाराष्ट्र के अल्फांसो आम खास हैं. रोजगार के लिहाज से देखें तो सब से खराब हालत लखनऊ के मलीहाबाद इलाके की है. इस का सब से बड़ा कारण यह है कि देश की सब से बड़ी मैंगो बेल्ट लखनऊ में आम की प्रजातियों में सुधार नहीं किया जा सका है. आज भी दुनिया का सब से मशहूर दशहरी आम केवल 15 से 20 दिनों तक ही बाजार में रहता है. उन्नत किस्म के आम का पेड़ तैयार करने में बागबान को 3 साल का समय लग जाता है. इस के बाद ही आम का पेड़ फल देने की हालत में पहुंचता है. Mango Farming

भारत के कुल फल उत्पादन का करीब 22 फीसदी हिस्सा आम का है. आम के मुकाबले केला 33 फीसदी हिस्सेदारी के साथ पहले पायदान पर है. अब केले की खेती और बाजार दोनों बढ़ता जा रहा है. इस की वजह से आम राजा का सिहांसन डोलता नजर आने लगा है.टिकाऊ नहीं होता दशहरीतैयार होने के बाद लखनऊ के दशहरी आम की औसत उम्र 15 से 20 दिनों की होती है. जून की शुरुआत में दशहरी आम पहली बार मंडी पहुंचता है. 1-2 बार बागबान को अच्छा भाव भले ही मिल जाता हो, पर उस के बाद यह भाव एकदम नीचे आ गिरता है. अगर दशहरी की कोई उन्नत प्रजाति तैयार की गई होती जो कुछ समय तक टिक सकती तो शायद दशहरी को मंडी में बेहतर भाव मिलता.

दशहरी की प्रजातियों में सुधार करने के लिए केंद्र सरकार ने मलीहाबाद में रिसर्च इंस्टीट्यूट खोला था, यहां काम कर रहे वैज्ञानिकों ने आम की प्रजातियों के सुधार में कोई खास काम नहीं किया, जिस से दूसरे आमों के मुकाबले दशहरी का बाजार खत्म हो रहा है और बागबान आम की जगह पर दूसरी खेती की ओर बढ़ रहे हैं.‘बाजार बढ़े तो हो बागबानों को मुनाफा’- सुरेश चंद्र शुक्ला (उद्यान रत्न अवार्ड विजेता बागबान)आम के बागबान सुरेश चंद्र शुक्ला ने आम की प्रजातियों को ले कर नया प्रयोग किया है. लखनऊ के माल ब्लाक में स्थित नरौना गांव के रहने वाले सुरेश चंद्र शुक्ला ने बीएससी बौटनी से किया. आज वे आम को नई पहचान देने का काम कर रहे हैं. 42 एकड़ जमीन पर आम की 271 किस्में उन के यहां लगी हैं.

पेश हैं उद्यान रत्न सहित दर्जनों अवार्ड जीत चुके सुरेश चंद्र शुक्ला से बातचीत के खास
अंश :आम रोजगार का जरीया क्यों नहीं बन पा रहा है?एक ही आम का पेड़ कई किस्म के आम दे सकता है. ऐसे दूसरे पेड़ कम दिखते हैं. लखनऊ के आम का स्वाद अनोखा होता है. आम का फल छोटा हो या बड़ा, देशी हो या हाईब्रीड, सभी का इस्तेमाल किया जा सकता है. आम की प्रोसेसिंग का सही तरह से इंतजाम नहीं किया जाता. आम की मार्केटिंग पर भी बहुत ध्यान नहीं दिया जाता. आंध्र प्रदेश में सरकार और वहां के बागबानों ने मिल कर बहुत अच्छे काम किए हैं, जिस से बागबानों को नुकसान नहीं होता. बिजली और दूसरी परेशानियों के चलते लखनऊ में आमों को सही तरह से रखा नहीं जा सकता, इसलिए वहां के बागबानों को उचित मुनाफा नहीं मिलता है. आम का बाजार कम क्यों होता जा रहा है?आम के साथ सब से बड़ी परेशानी यह है कि इसे पकने के बाद अधिक अरसे तक रोका नहीं जा सकता है.

हाल के कुछ सालों में आम की नई प्रजातियां आई हैं, जो ज्यादा दिनों तक चलती हैं. भारत में अल्फांसो
आम जल्दी खराब नहीं होता. इसी कारण अल्फांसो का विदेशों में सब से ज्यादा निर्यात होता है. आम की प्रजाति सुधारने का काम तेजी से होना चाहिए. ऐसे आमों की प्रजातियां तैयार की जानी चाहिए, जो ज्यादा दिनों तक महफूज रह सकें. तभी इन का बाजार बेहतर हो सकेगा और बागबानों का मुनाफा भी बढ़ेगा.आम की प्रजातियों और मार्केटिंगके संबंध में ज्यादा जानकारी के लिए किसान सुरेश चंद्र शुक्ला से उन  मोबाइल नंबर 09838073011 पर बातचीतकर सकते हैं. Mango Farming

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