Babycorn Variety: दिनोंदिन मक्का की खेती का दायरा बढ़ रहा हैं क्योंकि अब मक्का का इस्तेमाल अनाज और चारा के लिए ही सीमित नहीं है बल्कि इसका उपयोग आज अनेक उत्पादों में हो रहा है.
महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर द्वारा विकसित Babycorn Variety ‘प्रताप बेबीकॉर्न संकर -7’ किस्म को राष्ट्रीय स्तर पर अनुमोदन हेतु चिन्हित किया गया है. इस उन्नत किस्म को देश के 4 प्रमुख राज्यों पंजाब, हरियाणा, दिल्ली एवं उत्तराखंड के लिए अनुमोदित किया गया है, जो विश्वविद्यालय के लिए गर्व का विषय है.
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली-भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान, लुधियाना के द्वारा बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रांची (झारखंड) में 9 से 11 अप्रैल, 2026 तक आयोजित तीनदिवसीय वार्षिक राष्ट्रीय कार्यशाला में निर्णय लिया गया. इस कार्यशाला में देशभर के मक्का वैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों ने भाग लेकर विभिन्न परीक्षणों, उन्नत किस्मों एवं तकनीकों का मूल्यांकन किया.
मक्का का कहां-कहां होता है इस्तेमाल
विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. प्रताप सिंह ने इस उपलब्धि पर कहा कि वर्तमान समय में मक्का का उपयोग केवल अनाज तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उपयोग अनेक जगह होता है, जैसे :
-स्टार्च उद्योग में
-पोल्ट्री फीड तैयार करने में
-तेल उत्पादन में
-पॉपकॉर्न में
-बेबीकॉर्न में
-एथेनॉल उत्पादन में
ऐसे में उन्नत किस्मों का विकास कृषि क्षेत्र की आवश्यकता है. बेबीकॉर्न की मांग निरंतर बढ़ रही है. अब इसका उपयोग केवल सलाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि होटल उद्योग, रेस्टोरेंट, फास्ट फूड एवं खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में भी तेजी से बढ़ रहा है. इसके चलते यह फसल किसानों के लिए एक लाभकारी विकल्प बनकर उभर रही है.
बेबीकॉर्न की है यह पहली संकर किस्म
महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर द्वारा विकसित यह बेबीकॉर्न की पहली संकर किस्म है, जो अनुसंधान एवं नवाचार के क्षेत्र में विश्वविद्यालय की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि को दर्शाती है
क्या है इसकी खासियत
‘प्रताप बेबीकॉर्न संकर-7’ की प्रमुख विशेषताओं में इसका कम अवधि में तैयार होना शामिल है, जिससे किसान एक वर्ष में अधिक फसलचक्र अपना सकते हैं. इसके अतिरिक्त यह किस्म कम लागत में अधिक उत्पादन देने वाली है, जिससे किसानों को बेहतर लाभ प्राप्त होने की संभावना है.
अखिल भारतीय समन्वित मक्का परियोजना, उदयपुर के अंतर्गत विकसित यह किस्म उच्च उत्पादन क्षमता, बेहतर गुणवत्ता एवं बाजार में बढ़ती मांग के कारण किसानों की आय बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगी.
कार्यशाला में विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक दल ने डॉ. अमित दाधीच (परियोजना प्रभारी एवं पादप प्रजनक) के नेतृत्व में डॉ. आर. एन. बुनकर (पौध व्याधि वैज्ञानिक), डॉ. रमेश बाबू (कीट वैज्ञानिक), डॉ. हरीश कुमार सुमेरिया (सस्य वैज्ञानिक) तथा रामनारायण कुम्हार (सूत्रकृमि वैज्ञानिक) भाग लिया.
राष्ट्रीय स्तर पर अनुमोदन हेतु चिन्हित होने के बाद यह उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में यह किस्म किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय होगी और देश के मक्का उत्पादन में महत्त्वपूर्ण योगदान देगी.





