Cooperative Institutions : खेती मजबूरी का काम नहीं है. अगर आइडिया उम्दा हो तो एक किसान अपने साथ दूसरों को भी अमीरी का रास्ता दिखा सकता है, बशर्ते वह पढ़ालिखा व जानकार हो.
गेहूं, दाल व चावल वगैरह उगा कर जीवन चलाने वाले किसानों का जमाना खत्म हो चुका है. अब नई तकनीकों के सहारे हर किस्म की भरपूर फसलें उगाई जाती हैं और सहकारी संस्थाएं बना कर उन से कई गुना ज्यादा कमाई की जाती है.
एक उदाहरण यह भी
बहुत से किसान नहीं जानते कि देश में खाने का सामान बनाने वाली सब से बड़ी संस्था खुद किसानों की है. गुजरात कोआपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन के मालिक किसान व पशुपालक ही हैं. यह संस्था दूध से बनी तमाम चीजें अमूल के नाम से बना कर बेचती है.
किसान बना मिल्कमैन
वर्गीज कुरियन ऐसे किसान थे, जिन्होंने पशुपालकों का शोषण रोकने के लिए नई तकनीक से सहकारी डेरी चलाने का सपना देखा था.
जब वर्गीज ने किसानों को एकजुट किया तो उन का खूब मजाक बना, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और एक मकसद का बीज बोया. ईमानदारी के साथ दिनरात मेहनत की. सब की भलाई के उसूलों पर चले और पूरी दुनिया में मिल्कमैन कहलाए और एक बेजोड़ मिसाल बन गए.
मिसालें और भी हैं
अंगरेजी खाद के प्लांट चलाने वाली इफको व कृभको, सुपारी व कोको उगाने वाले किसानों की बनाई चाकलेट बनाने वाली फैक्टरी कैंपको तथा हर्टीकल्चर में सिरमौर होपकोम्स सहित बहुत सी संस्थाएं सहकारी (Cooperative Institutions) हैं.
क्या है सहकारिता
मिल कर माली तरक्की के लिए जायज काम करने वाले एक सोसायटी बना कर उसे सहकारी कानून के तहत रजिस्टर्ड करा लेते हैं. सहकारी संस्थाएं (Cooperative Institutions) अमूमन 4 तरह की होती हैं. गांवकस्बों में प्राइमरी, जिले में सेंट्रल, राज्य स्तर पर संघ या एपेक्स बाडी व राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी संस्थाओं को सहकारी महासंघ कहा जाता है.
कितने तरह के सहकारी बैंक
सहकारी बैंक 5 तरह के होते हैं. ये हैं जिला सहकारी बैंक, राज्य स्तर के सहकारी बैंक, सहकारी भूमि व ग्रामीण विकास बैंक, अरबन कोआपरेटिव बैंक और प्राइमरी कोआपरेटिव बैंक.
किसानों की ढाल सहकारी समितियां
कंपनी व कोआपरेटिव दोनों में पूंजी उन के सदस्यों के हिस्सों यानी शेयरमनी से बनती है, लेकिन कंपनी में पैसा व कोआपरेटिव में इनसान अहम होता है. कंपनी में जितने शेयर्स, उतने वोट्स होते हैं, लेकिन कोआपरेटिव में शेयर्स कितने भी हों, लेकिन 1 जने का 1 ही वोट होता है.
लिहाजा कंपनी की तरह 51 फीसदी शेयर्स रखने वाला कोआपरेटिव में कभी भी उस का सर्वेसर्वा नहीं बन सकता. सहकारी संस्था (Cooperative Institutions) में एक सब के भले के लिए व सब एक के भले के लिए काम करते हैं. इसीलिए सहकारी समितियों को कमजोर किसानों की ढाल कहा जाता है.
संगठन में ताकत
बोझ भारी हो तो मिल कर ही उठाया जाता है. इसी तरह किसान भी यदि आपस में मिल जाएं और अपनी पूंजी जमा कर लें तो वे भी सहायता समूह, सहकारी संस्था (Cooperative Institutions), फर्म या बड़ी कंपनी बना सकते हैं.
बेशक बहुत सी कोआपरेटिव सोसायटियों में सरकारी दखल ज्यादा है. कई कोआपरेटिव सोसाइटियां दबंगों के कब्जे की वजह से भाईभतीजावाद की शिकार हैं और लूटखसोट का अड्डा बन कर डूबने के कगार पर पहुंच गई हैं. लेकिन किसी संस्था को बनाना, चलाना व डुबोना उस के संचालकों की मंशा पर टिका होता है. सहकारिता में सारा दारोमदार आपसी भरोसे पर टिका रहता है, लिहाजा कोआपरेटिव को दुनिया भर में अपनाया जाता है.
आसान है सफर
बहुत से किसान नहीं जानते कि केंद्र व राज्यों की सरकारें कोआपरेटिव सोसायटी बनाने व उसे रजिस्टर कराने में मदद करती हैं. उसे चलाने के लिए माली इमदाद, तकनीकी जानकारी की ट्रेनिंग वगैरह बहुत सी सहूलियतें मुहैया करती हैं. किसान उन का फायदा उठा सकते हैं.
केंद्र सरकार सहकारी संस्थाओं (Cooperative Institutions) को बढ़ावा देने के लिए नेशनल कोआपरेटिव डेवलपमेंट कारपोरेशन, एनसीडीसी के जरीए मदद करती है.
बदलते वक्त के मुताबिक अब सहकारिता के दायरे में कई नई सेवाएं और बढ़ाई गई हैं, लिहाजा जागरूक होना लाजिम है. इच्छुक किसान अपने जिले के कोआपरेटिव रजिस्ट्रार से मिल कर सहकारी संस्था (Cooperative Institutions) बना सकते हैं और खेती से जुड़ी इकाई लगा कर ज्यादा कमाई कर सकते हैं.





