प्राणि उद्यानों और अभ्यारण्यों में हीट वेव एक्शन प्लान का प्रभावी क्रियान्वयन किया जाए

लखनऊ : मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने सरकारी आवास पर आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक में प्रदेश में हीट वेव (लू) की स्थिति की समीक्षा की और अधिकारियों को आवश्यक दिशानिर्देश दिए. उन्होंने कहा कि विगत कुछ दिनों से प्रदेश के विभिन्न जनपदों में भीषण गरमी और लू का प्रकोप देखा जा रहा है. ऐसी स्थिति में आमजन, पशुधन एवं वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए प्रत्येक स्तर पर पुख्ता इंतजाम किए जाएं.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि हीट वेव (लू) के लक्षणों और उस से बचाव के लिए आमजन को जागरूक किया जाए. बीमारी की स्थिति में हर किसी को तत्काल चिकित्सकीय सुविधा मुहैया कराएं. अस्पतालों और मैडिकल कालेजों में हीट वेव से प्रभावित लोगों का तत्काल इलाज किया जाए. राहत आयुक्त कार्यालय के स्तर से मौसम पूर्वानुमान का दैनिक बुलेटिन जारी किया जाए.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यह भी कहा कि सड़कों पर नियमित रूप से पानी का छिड़काव कराया जाए, पानी की कमी से अत्यधिक प्रभावित क्षेत्रों में टैंकरों के माध्यम से जलापूर्ति सुनिश्चित कराई जाए, शहरों में पेयजल की आपूर्ति निर्धारित रोस्टर के अनुरूप की जाए. सभी हैंड पंप को क्रियाशील रखा जाए एवं ग्रामीण पाइप पेयजल योजनाओं का सुचारु संचालन किया जाए.

उन्होंने कहा कि भीषण गरमी के बीच पशुधन और वन्य जीवों की सुरक्षा का भी ध्यान रखा जाना आवश्यक है. सभी प्राणि उद्यानों और अभ्यारण्यों में हीट वेव एक्शन प्लान का प्रभावी क्रियान्वयन किया जाए. पशुओं को हीट वेव की स्थिति में सुरक्षित रखने के पुख्ता इंतजाम हों, गोशालाओं में पशुधन के चारे और पानी की उचित व्यवस्था हो.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि तेज गरमी का मौसम है एवं लू चल रही है. ऐसे में गांव हो या शहर, कहीं भी अनावश्यक बिजली कटौती न हो. जरूरत हो तो अतिरिक्त बिजली खरीदने की व्यवस्था करें. ट्रांसफार्मर जलने अथवा बिजली के तार टूटने जैसी समस्याओं का बिना देरी निस्तारण किया जाए.

इस अवसर पर मुख्य सचिव दुर्गा शंकर मिश्र, अपर मुख्य सचिव वन मनोज सिंह, अपर मुख्य सचिव राजस्व सुधीर गर्ग, प्रमुख सचिव स्वास्थ्य पार्थ सारथी सेन शर्मा, प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा आलोक कुमार एवं राहत आयुक्त प्रभु नारायण सिंह उपस्थित थे.

बढ़ते तापमान में मुरगीपालक बरतें सावधानी

बदलते मौसम में जैसेजैसे तापमान बढ़ेगा, मांस व अंडा उत्पादन के प्रभावित होने की संभावना है. वर्तमान समय में मांस और अंडे का उत्पादन प्रभावित न हो सके, इसलिए मुरगीपालकों को मुरगी फार्म में निम्नलिखित उपायों को अपनाना चाहिए :

* मुरगी फार्म में बायोसिक्योरिटी की व्यवस्था करें और फार्म के आसपास चूने का बुरकाव करें.

* यदि शेड में बिछावन पुराना या पपड़ीयुक्त हो, तो उसे तुरंत बदल दें.

* गरमी से बचाव के लिए मुरगी बाड़े में बोरे के परदे लगाएं और आवश्यकता पड़ने पर पानी का छिड़काव भी करते रहें.

* मुरगियों को फफूंदीरहित राशन ही खाने को दें.

* गरमी बढ़ने पर मुरगियों के आहार में प्रोटीन की मात्रा बढ़ा दें. यदि गरमी ज्यादा बढ़ती है तो मुरगियों को विटामिन ए, विटामिन बी कौंप्लैक्स और एंटीबायोटिक दवाओं को स्वच्छ व ताजा पानी में मिला कर दें और बरतनों की संख्या भी बढ़ा दें.

* दाना व पानी के बरतनों को सदैव कीटाणुनाशक से धो कर और धूप में सुखा कर ही प्रयोग करें.

* कम अंडे देने वाली मुरगियों की छंटनी (कलिंग) करें. मुरगियों के पेट में पडे़ कीड़ों की रोकथाम के लिए दवा दें.

गरमी का प्रभाव

*           अंडे का उत्पादन गिर जाता है.

*           अंडे का आकार छोटा हो जाता है.

*           लेयर मुरगी में बढ़वार कम होती है.

*           आहार ग्रहण करने की क्षमता कम होती है.

*           मुरगियों के अंदर बीमारियों से लड़ने की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है.

*           अधिक गरमी से मुरगियों की मौत हो जाती है.

*           अंडे का छिलका पतला हो जाता है.

*           जल ग्रहण करने की क्षमता बढ़ जाती है.

गरमी में प्रबंधन

*           आवास की छत पर छप्पर रख देना चाहिए.

*           आवास की छत दोनों तरफ से कम से कम से कम 3 फुट बाहर निकली होनी चाहिए.

*           छत पर पानी का छिड़काव करते रहें, जिस से अंदर का तापमान 3 डिगरी से 4 डिगरी सैंटीग्रेड तक कम हो जाता है.

*           आवास के बीच में पेड़ लगाना लाभदायक है.

*           आवास की छत पर हरी लताएं चढ़ा देनी चाहिए.

*           खिड़कियों पर बोरी लगा देनी चाहिए और दिन में उस पर पानी का छिड़काव करते रहना चाहिए, जिस से कमरे का तापमान कम हो सके.

*           आवास के अंदर पंखा लगाना जरूरी है. हो सके तो कूलर का इस्तेमाल करें और एग्जास्ट फैन का भी इस्तेमाल करते रहना चाहिए. इस से कमरे के अंदर की गरम हवा बाहर निकल सके.

इन बातों पर मुरगीपालक ध्यान देंगे, तो गरमियों में मुरगियों को मारने से बचाया जा सकता है.

मुरगीपालन में आने वाली चुनौतियों का समाधान

इन दिनों पौल्ट्री बाजार में दानों व राशन कीमतों में भी भारी बढ़ोतरी के कारण ये लाभ की तुलना में घाटे का सौदा साबित हो रहा है, फिर भी कुछ सावधानियों के साथ इस व्यवसाय को फिर से उबारा जा सकता है.

अंडा उत्पादक मुरगियों का राशन, टीकाकरण व अंडा उत्पादन और उन के परिवहन में रखी जाने वाली सावधानियां, जिन को अपना कर किसान अच्छा लाभ कमा सकते हैं.

मुरगियों का राशन

समुचित अंडा व मांस उत्पादन की दृष्टि से जरूरी है कि मुरगियों को उन की आवश्यकतानुसार आहार भी मिलना चाहिए. आहार में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट्स, वसा, खनिज, लवण और विटामिन सभी तत्त्व मौजुद होने चाहिए.

मुरगीपालक को दाना बाजार से खरीदने के बजाय खुद घर पर ही तैयार करना चाहिए. दानो में ऊर्जा का मुख्य स्रोत मक्का है, पर गेंहू, ज्वार आदि भी ऊर्जा के अच्छे स्रोत हैं और थोड़ी मात्रा में मक्का के साथ मिलाए जा सकते हैं.

सामान्यत: एक उन्नत नस्ल की मुरगी को 100-120 ग्राम दाने की प्रतिदिन जरूरत पड़ती है. 0-8 सप्ताह के चूजों के आहार में 21 प्रतिशत प्रोटीन, 9-20 हफ्ते के बड़े चूजों के आहार में 18 प्रतिशत प्रोटीन की आवश्यकता  होती है. मुरगियों को सांद्रता (कांस्टेंऊट) आहार के रूप में मछली का चूरा, सोयाबीन व मूंगफली की खल, विटामिन और लवण आदि खिलाने चाहिए.

घर के पिछवाड़े मुरगीपालन में मुरगियां अपना 40-50 प्रतिशत आहार आंगन, पिछवाड़े और आसपास गिरे हुए अन्न के दाने,  झाड़फूस के बीज, कीड़े, मवेशियों के चिचड़, कोमल घास और घर की जूठन के माध्यम से प्राप्त होती है. लेकिन इस के अलावा मुरगियों में अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए कुछ अतिरिक्त आहार की जरूरत भी पड़ती है.

कुक्कुट के आहार के साथ मुरगियों को कांस्टेऊट आहार भी देना बहुत जरूरी होता है, ताकि मुरगियों का शारीरिक विकास भी अच्छा हो सके और उन के उत्पादन पर भी विपरीत प्रभाव न पड़े. इस के साथ ही मुरगियों को यदि दाने के साथ हरा पालक या रिजका काट कर खिलाया जाए, तो जर्दी का रंग पीला हो जाता व मुरगियों को विटामिंस व खनिजलवण भी मिल जाते हैं.

किसान विभिन्न उम्र की मुरगियों को निम्न प्रकार से संतुलित आहार खिला सकते हैं:

खानापानी के बरतन

मुरगियों के आहार के लिए अलगअलग आयु वर्ग के अनुसार अलगअलग प्रकार के बरतनों की आवश्यकता होती है. इसी प्रकार से पीने के पानी के बरतन भी आयु वर्ग के अनुसार अलगअलग होनी चाहिए. इस के साथ ही दाने व पानी के बरतन इस प्रकार के होने चाहिए कि उन की साफसफाई ठीक से हो सके. दाने का कम से कम नुकसान हो मुरगियां आरामपूर्वक दाना खा सकें और पानी पी सकें और पानी में प्रवेश नहीं कर सकें. इस के लिए अल्यूमीनियम के बरतन ज्यादा सही हैं.

बीमारियां और टीकाकरण

पोषण संबंधित रोग : कुक्कुट आहार पोषक तत्त्वों जैसे विटामिन और खनिज लवणों व अन्य तत्त्वों की कमी से होने वाले रोग इस श्रेणी में आते हैं जैसे रतौंधी, रिकेट्स, डरमेटाइटिस, एविटामिनोसिस इत्यादि.

परजीवी रोग : बाहरी, आंतरिक परजीवी द्वारा होने वाले रोग जैसे जूं, चिचंडी, बगस, पिस्सु द्वारा खुजलीखराश और आंतरिक परजीवी जैसे गोलकृमि, फीताकृमि द्वारा जैसे : फाइल पोक्स, स्पाइरोफिरोसिस आदि.

संक्रामक रोग : जीवाणु और विषाणु से होने वाले रोग जैसे रानीखेत, चेचक, मैरेक्स रोग आदि.

प्रोटोजोअन रोग : कौक्सीडियोसिस, स्पाइरोकिटोसिस, एस्पोराजिलोसिस इत्यादि.

कवक रोग : अफलाटोक्सिकोसिस, एस्पोराजिलोसिस, बु्रडर निमोनिया इत्यादि.

बीमारियों से बचाव संबंधी सावधानियां

* रोगी और सेहतमंद मुरगियों के लिए अलगअलग लोग देखरेख करें.

* समयसमय पर कुक्कुटशाला में कीटाणुनाशक दवा का छिड़काव करें.

* रोगी या मरी हुई मुरगियों या चूजों को जमीन में गाड़ दें.

* रोगी और दुर्लभ चूजों और मुरगियों को अलगअलग रखें.

* मुरगी आवास और उस में प्रयोग होने वाले उपकरण जैसे पानी व दाने के बरतन और बिछावन आदि को साफ  रखें और समयसमय पर जीवाणुनाशक दवा का छिड़काव करें.

* उचित समय पर रोग निरोधक टीके लगवाने चाहिए.

* समयसमय पर दाने और पानी में एंटीबायोटिक दवा, विटामिंस व खनिजलवण देने चाहिए.

* मुरगियों को दूसरे व अन्य पक्षी और जंगली जानवर आदि से दूर रखना चाहिए.

* अंडा देने वाली मुरगियों को साल में 3 बार कृमिनाशक दवा पिलानी चाहिए.

* पशु चिकित्सा अधिकारी से रोग के लक्षण दिखाई देने पर तुरंत संपर्क करना चाहिए.

अंडा उत्पादन व परिवहन में रखी जाने वाली सावधानियां

* अंडे को इकट्ठा करने, पैकेजिंग, परिवहन और बिक्री करते समय पीपीई का उपयोग करें.

* कर्मचारी 1 मीटर की सामाजिक दूरी के अनुपालन की सुविधा के लिए फर्श के चिह्नों का उपयोग करें.

* सामाजिक दूरी बनाए रखने के लिए कर्मचारियों की संख्या को सीमित करें.

* अंडे के रखरखाव करने वाले किसी आदमी को अकसर कम से कम 20 सैकंड के लिए अपने हाथों को साबुन और पानी से धोना चाहिए.

* धोने के बाद, अंडों को क्लोरीन आधारित सेनेटाइजर का उपयोग कर के साफ  करना चाहिए.

* विपणन के लिए परिवहन के दौरान अंडों को एक बंद कंटेनर में रखना चाहिए.

* कर्मचारियों या ग्राहकों द्वारा नियमित रूप से छुए जाने वाली वस्तुओं और सतहों को अकसर साफ और कीटाणुरहित करना चाहिए. साथ ही हाइपोक्लोराइड घोल का उपयोग किया जा सकता है.

ब्याने के बाद मादा गौवंशों में जेर रुक जाना

कभीकभी गाय या भैंस ब्याने के बाद जेर या जड़ समय से नहीं गिराती, जिस से बच्चेदानी में संक्रमण का खतरा बना रहता है और पशुपालकों को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है.

कब कहेंगे कि जेर रुक गई

यदि गाय या भैंस ब्याने के 24 से 36 घंटे के भीतर अपनी जेर खुद नहीं गिराती है

तभी हम कह सकते हैं कि जेर रुक गई है और अब इसे उपचार की जरूरत है. उस से पहले किसी भी प्रकार के उपचार की जरूरत नहीं होती.

किन कारणों से जेर रुक सकती है

* गर्भपात के बाद जेर रुक सकती है.

* असामान्य गर्भकाल यानी या तो गाय या भैंस ने समय से पहले या फिर निर्धारित अवधि के बहुत बाद बच्चा दिया.

* कठिन प्रसव यानी बच्चा खींच कर निकाला गया हो.

* आपरेशन द्वारा बच्चा निकाला गया हो.

* कुछ पशुओं में यह जन्मजात भी हो सकता है.

* कुछ आवश्यक तत्त्वों जैसे विटामिन ई, सैलेनियम, विटामिन ए, कैल्शियम, फास्फोरस वगैरह की कमी.

* अगर गाय या भैंस ने एकसाथ जुड़वां 2 बच्चे दिए हों.

पशुपालकों को क्या करना चाहिए

* ब्याने के 24 से 36 घंटे तक जेर के खुद गिरने का इंतजार करें.

* जेर के लटकते हुए भाग या हिस्से को किसी भी हालत में न काटें या तोड़ें.

* ध्यान रहे कि पशु जेर के लटके हुए हिस्से को चाटने या खाने की कोशिश न करे.

* जेर को बलपूर्वक खींच कर निकालने की कोशिश बिलकुल न करें. जेर को खींच कर या काट कर निकालने से उस का कुछ भाग बच्चेदानी में ही रह जाता है और बाद में उस में संक्रमण हो सकता है और मवाद पड़ सकता है जिस से पशु को बुखार भी आ सकता है व दुग्ध उत्पादन में भी कमी आ सकती है.

* बिना पशु चिकित्सक की सलाह लिए जेर को खींचने की कोशिश बिलकुल न करें. इस से कुछ भी फायदा नहीं होगा, जबकि नुकसान बहुत अधिक होगा.

* यदि पशु को बुखार है तो जेर को खींच कर निकालना एकदम वर्जित है.

रोकथाम व उपचार

* पशुओं को उन की जरूरत के मुताबिक दानाचारा, नमक व खनिज लवण (मिनरल मिक्सचर) प्रचुर मात्रा में दें.

* गर्भावस्था के दौरान ध्यान रहे कि पशुओं के आहार में अतिरिक्त खाद्यपूरकों (फीड सप्लीमैंट्स) जैसे कैल्शियम, फास्फोरस, विटामिन ई, सैनेनियम व दूसरे खनिज लवणों का प्रचुर मात्रा में समावेश हो.

* ब्याने के तुरंत बाद पशु का दूध जरूर दुह लें, जिस से जेर रुकने की संभावना कम हो जाती है.

* योग्य पशु चिकित्सक की ही सलाह ले कर अपने पशुओं का उपचार कराएं.

* ऐसी अवस्था में कैल्शियम, फास्फोरस, विटामिन ई, सैनेनियम व विटामिन ए के इंजैक्शन फायदेमंद होते हैं.

* इस के अतिरिक्त कुछ आयुर्वेदिक हर्बल दवाएं जैसे लिक्विड ऐक्सापार या हिमरोप 100 मिलीलिटर दिन में 2 बार 2-3 दिनों तक पिलाएं या पाउडर रीप्लांटा 100 ग्राम दिन में 2 बार 2-3 दिनों तक खिलाएं.

गर्भवती दुधारू पशुओं की देखभाल

ज्यादातर दुधारू पशु ब्याने के 3 से 4 महीने के अंदर गर्भ धारण कर लेते हैं. गर्भ की शुरुआत के समय में उन को कोई खास अलग से आहार देने की जरूरत नहीं पड़ती है, लेकिन जब गर्भ की अवस्था 5 माह की हो जाती है, तो गर्भ में पल रहा भ्रूण अपने विकास के लिए पोषक तत्त्वों के लिए मां पर ही निर्भर रहता है.

दुधारू पशु को गर्भकाल के 5 महीने के बाद पोषक तत्त्वों की ज्यादा जरूरत पड़ती है. इस के लिए जो उसे दूध उत्पादन के लिए आहार दिया जा रहा था, उस के अतिरिक्त गर्भ के विकास के लिए 2 किलोग्राम अतिरिक्त दाना देना चाहिए. इस से गर्भ में पल रहे बच्चे का भलीभांति विकास होगा एवं जन्म के समय उस का वजन भरपूर होगा. दुधारू पशु से ब्यांत के बाद अच्छा दूध उत्पादन मिलेगा.

पशुपालक को यह भी ध्यान रखना होगा कि अगर आप दुधारू पशु से दूध उत्पादन ले रहे हैं तो ड़ेढ से 2 माह पहले उस के दूध को सुखाना होगा, जिस से कि वह खुद को को फिर से अगले दूध उत्पादन के तैयार कर ले.

दुधारू पशु को कम से कम 5 किलोग्राम भूसे के साथ 20 किलोग्राम से 25 किलोग्राम तक हरा चारा एवं 3 किलोग्राम दाना मिश्रण अवश्य देना चाहिए. दाने में चोकर एवं खली के साथ 50 ग्राम मिनरल मिक्सर, जिस में कैल्शियम फास्फोरस एवं सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की भरपूर मात्रा हो, देना चाहिए. अगर हरा चारा बिलकुल न मिल पा रहा हो तो दाने की मात्रा 3 किलोग्राम से बढ़ा कर 5 किलोग्राम तक कर देनी चाहिए.

गर्भवती पशु को ऊंचीनीची जगह से चढ़नेउतरने से बचाना चाहिए एवं अन्य पशुओं से दूर रखना चाहिए, वरना आपस में लड़ने की अवस्था में गर्भ को नुकसान पहुंचने का खतरा हो सकता है .

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कांटारहित नागफनी पशुओं का उत्तम चारा

पशुओं के लिए सालभर पोषक तत्वों से भरपूर हरे चारे की उपलब्धता पशुपालकों के लिए चुनौती के रूप में बनी रहती है. इस का एक कारण मौसम, मिट्टी और सालभर चारा उपलब्ध कराने वाली फसलों की कमी भी है.

ऐसे में कम पानी वाली जगहों, शुष्क क्षेत्रों, रेतीली भूमि, मेंड़ों, नहरों के किनारों जैसी जगहों पर कांटारहित नागफनी, जिसे अपुंसिया के नाम से भी जाना जाता है की खेती कर पशुओं के लिए सालभर हरा और पौष्टिक चारा उपलब्ध कराया जा सकता है.

पशुओं के चारे के लिए नागफनी की खेती बेकार और खाली पड़ी जमीन को भी उपयोग लायक बना देती है. इस की फसल में अन्य चारा फसलों की अपेक्षा लागत में न केवल कमी आ जाती है, बल्कि उत्पादन भी अच्छा मिलता है, जिस से पशुपालकों को हरे चारे की कमी से नजात मिल सकती है.

उन्नत प्रजातियां

चारे के लिए उपयोग में लाई जाने वाली नागफनी की प्रजातियां कांटारहित होती हैं, जिस से यह न केवल हरे चारे के रूप में अच्छी तरह से तैयार की जा सकती है, बल्कि इस में पोषक तत्वों की मात्रा भी प्रचुर रूप में पाई जाती है. चारे के रूप में जिन प्रजातियों का उपयोग खेती के लिए किया जा सकता है, उसमें कैक्टस 1270, कैक्टस 1271और टेक्सास 1308 प्रमुख हैं.

खेत का चयन

चारे वाली नागफनी की खेती वैसे तो सभी तरह की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन इस के लिए सब से उपयुक्त मिट्टी रेतीली और दोमट होती है. इस के अलावा इसे कंकरीली, पथरीली, तलहटी व ढालन भरी मिट्टी के साथ ही अनुपजाऊ खेत में भी रोपा जा सकता है.

खेत की तैयारी

चारे वाली नागफनी को खेतों में रोपने के पहले खेत को खरपतवारों से मुक्त किया जाना जरूरी हो जाता है. अगर खेत में मोथा, दूब घास, पार्थेनियम जैसी घासें हैं, तो खेत में खरपतवारनाशक के रूप में खरपतवारनाशी का छिड़काव किया जाना लाभप्रद होता है. इस से खेत में स्थित घासें सूख जाती हैं. इस के उपरांत खेत की जुताई हैरो, कल्टीवेटर या रोटावेटर से कर के गोबर की खाद की उपलब्धता की दशा में 15 टन प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में डाल अच्छी तरह से मिला देना चाहिए.

इस के अलावा आखिरी जुताई के दौरान फफूंदी रोग के नियंत्रण के लिए 1.5 किलोग्राम की प्रति हेक्टेयर की दर से ट्राईकोडर्मा विरडी को अच्छी तरह से मिला देना चाहिए.

बोआई का उचित समय और बोआई की विधि

चारे वाली नागफनी की प्रजातियों की रोपाई का सबबीसे उपयुक्त समय जून से अक्तूबर महीने तक का होता है, क्योंकि इस समय रोपे गए पौधों को पनपने के लिए पर्याप्त नमी मिल जाती है. रोपाई के लिए एक वर्ष पुराना क्लैडोड यानी तने से निकला चौड़ा गूदादार पत्तीनुमा भाग या टिश्यु से उगाया गया 7-8 माह पुराना पौधा उपयुक्त होता है.

अगर नागफनी को क्लैडोड वाले भाग को काट कर रोपना है, तो उसे ताजा काट कर बैक्टीरिया और फफूंदी से बचाने के लिए प्रति लिटर पानी में 5 ग्राम की दर से कौपर औक्सीक्लोराइड 50 फीसदी डब्ल्यूपी या कौपर हाइड्रोऔक्साइड 77 फीसदी डब्ल्यूपी में डुबो कर उपचारित किया जाना जरूरी होता है. इस से बारिश के मौसम में जड़ों में फफूदी से होने वाली जड़ों की सड़न को रोका जा सकता है.

फफूदीनाशक से उपचारित किए गए क्लैडोड को खेत में रोपने से पहले बेहतर जमाव के लिए उसे छायादार स्थान पर फैला कर रखा जाता है. इस के बाद इन क्लैडोड को 100 सैंटीमीटर लाइन से लाइन की दूरी पर मेंड़ बना कर उस पर पौधों से पौधों की दूरी 40 सैंटीमीटर रखते हुए रोपा जाता है.

क्लैडोड की रोपाई के दौरान यह ध्यान दें कि उस का एकतिहाई भाग मिट्टी के नीचे और दोतिहाई भाग मिट्टी के ऊपर रखते हैं.

क्लैडोड की रोपाई के बाद उस के अगलबगल की मिट्टी को खूब अच्छी तरह से दबा दिया जाता है.

खाद और उर्वरक

चारे के लिए उपयोग में लाई जाने वाली नागफनी की फसल को प्रति हेक्टेयर 90 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस, 30 किलोग्राम पोटाश और 10 किलोग्राम जिंक सल्फेट की जरूरत पड़ती है. इस में से पौध रोपने के पहले ही 30 किलोग्राम नाइट्रोजन और बाकी उर्वरकों को मिट्टी में मिला दिया जाता है. बाकी बचे नाइट्रोजन को हर 4 माह के अंतराल पर 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से फसल में दिया जाता है.

सिंचाई

जैसे ही क्लैडोड की रोपाई की जाए, उस के तुरंत बाद रोपे गए खेत की सिंचाई कर देना उचित होता है. अगर संभव हो तो रोपी गई फसल को ड्रिप के जरीए सिंचाई करें. इस से पौधों की बढ़वार अच्छी होती है और उपज भी अच्छी मिलती है.

आप को जब भी लगे कि खेत में नमी की पर्याप्त मात्रा नहीं है तो सिंचाई कर सकते हैं, लेकिन अधिक पानी से बचाव के लिए जल निकासी की व्यवस्था जरूरी हो जाती है.

नागफनी चारे में पोषक तत्वों की उपलब्धता

नागफनी से बनाया गया हरा चारा पशुओं के लिए अधिक पाचनशील होता है क्योंकि इस में विटामिन ए और जल में घुलनशील कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक पाई जाती है. इस के चारे की शुष्क पाचनशीलता 70 फीसदी तक पाई गई है.

नागफनी के क्लैडोड यानी उस के चौड़े पत्तों में पाई जाने वाली पोषक तत्वों की मात्रा नीचे दी गई तालिका से जानी जा सकती है :

पोषक तत्व मात्रा (फीसदी में)
शुष्क पदार्थ 10-11
कच्चा प्रोटीन 11.81
कच्चा वसा 1.18
रेशा 8.12
अम्ल में अघुलनशील राख 2.55
कैल्शियम 6.05
फास्फोरस 0.30
मैग्नीशियम 3.15
पोटेशियम 1.82
सोडियम 0.05
कॉपर 6.13 मिग्रा प्रति किलोग्राम
जस्ता 24.37 मिग्रा प्रति 100 ग्राम
मैगनीज 98.17 मिग्रा प्रति 100 ग्राम
लौह तत्व 257.54 मिग्रा प्रति 100 ग्राम
कैरोटिनायड 29 माइक्रोग्राम प्रति 100 ग्राम
एस्कार्बिक अम्ल 13 मिग्रा प्रति 100 ग्राम

नागफनी चारा पशुओं को खिलाने योग्य बनाना

नागफनी की पौध जब एक मीटर की हो जाए, तो उस के क्लैडोड यानी तने से निकला चौड़ा गूदादार पत्तीनुमा भाग की पहली कटाई चारे के लिए की जानी शुरू की जा सकती है. शुरुआत में जमीन से सटे हुए और झुके हुए पत्तों की कटाई की जाती है.

जिस पौध से एक बार कटाई कर ली जाए, उस पौधे से फिर 5- 6 माह बाद ही पत्तियों की कटाई करनी चाहिए.

पौधों से क्लैडोड को काटने के बाद उसे चारा काटने वाली मशीन से 2 से 3 इंच के छोटे टुकड़ों में काट लिया जाता है. चूंकि नागफनी में 90 फीसदी तक पानी की मात्रा होती है. पशु गोबर गीला न करें, इस लिए नागफनी के हरे चारे के साथ गेहूं, बाजरा, ज्वार, पुआल की कुट्टी मिला देनी चाहिए.

उत्पादन और अन्य लाभ

कांटारहित नागफनी के फसल से हर साल 40 से 50 मीट्रिक टन हरे चारे का उत्पादन होता है. इस की बोआई करने से न केवल पशुओं के चारे की आवश्यकता की पूर्ति होती है, बल्कि यह मिट्टी के कटाव को रोक कर बंजर भूमि को उपजाऊ भी बनाता है. इस की फसल मिट्टी ऊपर और नीचे दोनों जगहों से कार्बन ग्रहण कर सकती है. कांटारहित नागफनी की खेती पर प्रति बीघा 3,000 रुपए तक की लागत आती है. इस के क्लैडोड या पौधों को प्राप्त करने के लिए (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद), पहूज बांध के पास, ग्वालियर रोड, झांसी – 234003 (उत्तर प्रदेश) फोन नंबर 0510-2730666, 2730158, 2730385 फैक्स नंबर: 0510-2730385 ईमेल: Director.igfri@icar.gov.in, igfri.director@gmail.com से संपर्क किया जा सकता है.

मछुआरों का उत्थान, उन का आर्थिक और सामाजिक विकास यात्रा का प्रमुख मिशन: परशोत्तम रूपाला

भारत के दक्षिणी तटीय राज्य केरल में 590 किलोमीटर की विस्तृत तटरेखा है. देश में मछली उत्पादन में केरल का अहम योगदान है. केरल, समुद्री मत्स्यपालन के अतिरिक्त, अंतर्देशीय मछली पकड़ने की गतिविधियों के लिए भी लोकप्रिय है. सागर परिक्रमा यात्रा सातवां चरण, जो 8 जून 2023 से मडक्करा, केरल से शुरू हुआ और पल्लीकारा, बेकल, कन्हांगडु, कासरगोड जैसे स्थानों से हो कर गुजरा, 9, जून, 2023 को माहे (पुड्डुचेरी), कोझिकोड जिले से होता हुआ 10 जून को केरल के त्रिशूर जिले में पहुंचा और कोचीन और त्रिवेंद्रम होते हुए केरल के पूरे तटीय क्षेत्रों की ओर बढ़ेगा.

केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और डेरी मंत्री पुरुशोत्तम रूपाला, केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और डेरी राज्य मंत्री, डा. एल. मुरुगन, मत्स्यपालन मंत्री केरल सरकार, साजी चेरियान की उपस्थिति में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी, अभिलक्ष लिखी, ओएसडी (मत्स्य), भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी केएस श्रीनिवास, प्रमुख सचिव (मत्स्य), केरल सरकार, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड डा. सुवर्ण चंद्रपरागरी और अन्य सरकारी अधिकारी त्रिशूर के नत्तिका में एसएन सभागार आए और इस कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई.

सागर परिक्रमा के तीसरे दिन के कार्यक्रम की शुरुआत त्रिशूर के नत्तिका में परशोत्तम रूपाला और अन्य गणमान्य व्यक्तियों के गर्मजोशी से स्वागत के साथ हुई.

राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड की मुख्य कार्यकारी अधिकारी डा. सुवर्णा चंद्रपरागरी ने सभी मेहमानों का परिचय दिया. उन्होंने केरल में सागर परिक्रमा के सातवें चरण की यात्रा पर प्रकाश डाला.

इस कार्यक्रम में उपस्थित मछुआरे इस दौरान काफी खुश नजर आए. वे यात्रा के प्रभाव और महत्व से परिचित हुए जो उन के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाएगा.

इस दौरान विभिन्न योजनाओं जैसे प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई), किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) आदि के संबंध में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की गई.

मंत्री पुरुशोत्तम रूपाला ने अपने संबोधन में कहा कि मछुआरों का उत्थान, उन की आवश्यकताओं को समझ कर उन का आर्थिक और सामाजिक विकास इस यात्रा का प्रमुख मिशन है.

इस दौरान यह भी बताया गया कि तटीय राज्यों के दौरे का उद्देश्य मत्स्यपालन क्षेत्र में काम कर रहे अन्य हितधारकों के मुद्दे को समझना भी है.

इस के अलावा उन्होंने मछुआरों, महिला मछुआरों, मछली किसानों और तटीय क्षेत्र के प्रतिनिधियों जैसे लाभार्थियों के साथ बातचीत की. मछुआरों ने भी अपने मुद्दों को उजागर करने में गहरी दिलचस्पी दिखाई और प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई), एफआईडीएफ और किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) आदि जैसी योजनाओं और कार्यक्रमों के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए गणमान्य व्यक्तियों को धन्यवाद दिया.

मंत्री पुरुशोत्तम रूपाला, डा. एल. मुरुगन, साजी चेरियान, केरल के विधायक सीसी मुकुंदन, भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी अभिलक्ष लिखी, ओएसडी (मत्स्य), भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी केएस श्रीनिवास, प्रधान सचिव (मत्स्य), केरल सरकार, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड डा. सुवर्ण चंद्रपरागरी और अन्य सरकारी अधिकारियों ने थिप्परयार के टीएसजीए इंडोर स्टेडियम का दौरा किया. उन्होंने सागर परिक्रमा लाभार्थी के लिए केरल सरकार के एक कार्यक्रम ‘थीरा सदासु’ पहल की सराहना की.

कार्यक्रम के प्रारंभ में मुख्य कार्यकारी, राष्ट्रीय मात्स्यिकी विकास बोर्ड, भारत सरकार डा. सुवर्णा चंद्रपरागरी ने एक स्वागत भाषण दिया. उन्होंने यह बताया कि ‘एक्वा किसान’ आगे आए हैं और तटीय समुदाय की स्थानीय अर्थव्यवस्था में योगदान दे रहे हैं.

भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी अभिलक्ष लिखी, ओएसडी (मत्स्य), ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मत्स्य क्षेत्र को दिए गए महत्व पर प्रकाश डाला और बताया कि मत्स्य क्षेत्र के लिए विशेष धनराशि आवंटित की गई है.

उन्होंने यह भी बताया कि केसीसी शिविर शुरू करने, शिकायत निवारण के लिए टीम गठित करने, विभिन्न बुनियादी सुविधाओं के निरीक्षण के लिए तकनीकी अधिकारियों की टीम गठित करने जैसी प्रमुख पहल की गई हैं, साथ ही, 62 केसीसी शिविर आयोजित किए गए, जिन में से 744 केसीसी कार्ड जारी किए गए हैं और 178 पोस्ट हार्वेस्टिंग सुविधाएं स्वीकृत की गई हैं.

साथ ही, उन्होंने यह भी बताया कि मछली पकड़ने के बंदरगाह के विस्तार, बायोफ्लाक इकाई के उन्नयन, सजावटी मछली पकड़ने, गहरे समुद्र में मछली पकड़ने के जहाज, केज वाटर कल्चर जैसी कई परियोजनाओं के साथसाथ आजीविका में सुधार और मत्स्य इकोसिस्टम को मजबूत करने के लिए अर्थुल मछली पकड़ने के बंदरगाह का शुभारंभ किया गया है.

उन्होंने सागर परिक्रमा कार्यक्रम यात्रा, सातवें चरण में समर्थन के लिए तट रक्षकों और केरल सरकार को धन्यवाद दिया.

डा. एल. मुरुगन ने बढ़ती मांग को पूरा करने में मछली किसानों की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार किया और उन्होंने मछुआरों और मछली किसानों के अमूल्य योगदान को भी रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि मछुआरे भोजन और जीविका प्रदान करने के लिए अथक प्रयास करते हैं. दीर्घकालिक मछली पकड़ने का तरीका न केवल उत्पादकता बढ़ाता है, बल्कि पर्यावरणीय प्रभावों को भी कम करता है.

केरल के मत्स्यपालन मंत्री साजी चेरियान ने राज्य की मात्स्यिकी के बारे में प्रकाश डाला, जो देश में समुद्री और अंतर्देशीय मत्स्यपालन दोनों के लिए अच्छी क्षमता रखता है.

उन्होंने मत्स्यपालन क्षेत्र के विकास को बढ़ाने के लिए अपने सुझाव साझा करने के लिए मछुआरों, मछली किसानों, लाभार्थियों, तट रक्षक अधिकारियों को धन्यवाद दिया.

परशोत्तम रूपाला ने स्थानीय जनप्रतिनिधियों के साथ मुद्दों और इस के विकास के अवसरों की चर्चा की.

उन्होंने कहा कि मत्स्य इकोसिस्टम को मजबूत करने के लिए लाभार्थियों से विभिन्न आवेदन प्राप्त हुए हैं. उन्होंने अपनी राय भी साझा की है कि पीएमएमएसवाई योजना की गतिविधियों को संचालित करने से भारत में मत्स्यपालन क्षेत्र पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा. इस का उद्देश्य मछली पकड़ने और जलीय कृषि की आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक तरीकों को अपना कर मछली के उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ाना है. इस पहल से न केवल मछुआरों और मछली किसानों की आय में वृद्धि होगी, बल्कि बाजार में मछली की उपलब्धता भी बढ़ेगी, जिस का खाद्य सुरक्षा और पोषण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा.

उन्होंने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि सागर परिक्रमा यात्रा तटीय समुदायों और मछुआरों को सरकार द्वारा क्रियान्वित मत्स्य संबंधी योजनाओं/कार्यक्रमों के बारे में जानकारी का प्रसार कर के, सर्वोत्तम प्रथाओं का प्रदर्शन, मत्स्यपालन को बढ़ावा देने और सभी मछुआरों और संबंधित हितधारकों के साथ एकजुटता प्रदर्शित कर के सशक्त बनाएगी.

मंत्री परशोत्तम रूपाला ने भास्करीयम कन्वेंशन सेंटर, एलमक्करा, एर्नाकुलम में एफपीओ की बिजनैस मीट -2023 का उद्घाटन किया और वहां उपस्थित लोगों को संबोधित किया. उन्होंने सूचित किया कि देशभर के मछुआरों की आजीविका में सुधार के लिए उन की सहायता करने की उच्च मांग के कारण, प्रधानमंत्री ने मत्स्यपालन के लिए अलग विभाग की स्थापना की.

उन्होंने यह भी कहा कि स्वतंत्रता के बाद से वर्ष 2014 तक, मत्स्य क्षेत्र में निवेश लगभग 3,681 करोड़ रुपए था. वर्ष 2014 से केंद्र सरकार ने मत्स्यपालन क्षेत्र में जमीनी हकीकत को समझ कर पीएमएमएसवाई, एफआईडीएफ और अन्य योजनाओं की शुरुआत की है और लगभग 32,000 करोड़ रुपए की योजनाएं बनाई गई हैं.

सागर परिक्रमा सातवें चरण में विभिन्न स्थानों से लगभग 4,000 मछुआरे, विभिन्न मत्स्य हितधारकों ने भाग लिया, जिन में से लगभग 1300 महिला मछुआरों ने भाग लिया. कार्यक्रमों को यूट्यूब, ट्विटर और फेसबुक जैसे विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर लाइव स्ट्रीम किया गया.

सागर परिक्रमा ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के जीवन की गुणवत्ता और आर्थिक भलाई में सुधार लाने में प्रभाव डालेगी और आजीविका के अधिक अवसर पैदा करेगी. सागर परिक्रमा मछुआरों, अन्य हितधारकों के मुद्दों को हल करने में सहायता करेगी और विभिन्न मत्स्य योजनाओं जैसे प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई), किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) और भारत सरकार द्वारा कार्यान्वित कार्यक्रम के माध्यम से उन के आर्थिक उत्थान की सुविधा प्रदान करेगी. सागर परिक्रमा का सातवां चरण अगले 2 दिनों तक केरल के पूरे तटीय क्षेत्र को कवर करता रहेगा.

आधुनिक बंदरगाहों और मछली लैंडिंग केंद्रों के विकास के लिए 7,500 करोड़ रुपए स्‍वीकृत

कोच्चि : केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और डेरी मंत्री परशोत्तम रूपाला एवं पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने पिछले दिनों केरल के कोचिन पोर्ट अथा एमरिटी विलिंगडन द्वीप थोप्पुमपडी के समुद्रिका हाल में कोचिन फिशिंग हार्बर के आधुनिकीकरण और उन्नयन की परियोजना की आधारशिला रखी.

इस कार्यक्रम में एर्नाकुलम लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के सांसद हिबी ईडन, कोच्चि निर्वाचन क्षेत्र के विधानसभा सदस्य केजे मक्सी, एर्नाकुलम निर्वाचन क्षेत्र के विधानसभा सदस्य टीजे विनोद, कोच्चि नगरनिगम के महापौर, एडवोकेट अनिल कुमार, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेरी मंत्रालय के विशेष कार्य अधिकारी डा. अभिलक्ष लि‍खी, राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड की मुख्य कार्यकारी अधिकारी डा. सुवर्णा चंद्रपरागरी, केरल सरकार के मत्स्यपालन विभाग के प्रमुख सचिव केएस श्रीनिवास और कोचिन बंदरगाह प्राधिकरण की अध्‍यक्ष डा. एम. बीना उपस्थित रहे.

मत्स्यपालन, पशुपालन और डेरी मंत्रालय के मत्स्यपालन विभाग ने मार्च, 2022 में सागरमाला योजना के अंतर्गत बंदरगाह नौवहन और जलमार्ग मंत्रालय के साथ कन्वर्जन्स में प्रधानमंत्री मत्‍स्‍य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) के तहत थोप्पुमपडी में कोचिन फि‍शिंग हार्बर के आधुनिकीकरण और उन्‍नयन के लिए कोचिन पोर्ट ट्रस्‍ट के प्रस्‍ताव को स्‍वीकृति दी थी. उन्होंने कुल 169.17 करोड़ रुपए की परियोजना के लिए 100 करोड़ रुपए की केंद्रीय सहायता प्रदान की थी.

700 मछली पकड़ने वाली नौकाओं के नाविकों को मिलेगा सीधा लाभ

इस परियोजना का लाभ कोचिन मछली पकड़ने के बंदरगाह पर 700 मछली पकड़ने वाली नौकाओं के नाविकों को होगा. इन नौकाओं से लगभग 10,000 मछुआरों को प्रत्यक्ष आजीविका मिलेगी और लगभग 30,000 मछुआरों को अप्रत्यक्ष रूप से आजीविका अर्जित करने में सहायता मिलेगी. आधुनिकीकरण परियोजना से इस क्षेत्र में स्वच्छता की स्थितियों में पर्याप्त सुधार होगा और मछली और मत्‍स्‍य उत्पादों के निर्यात से आय में वृद्धि में होगी.

आधुनिकीकरण पर होगा जोर

आधुनिकीकरण के अंतर्गत शुरू की गई मुख्य गतिविधियों में वातानुकूलित नीलामी हाल, मछली ड्रेसिंग इकाई, पैकेजिंग इकाई, आंतरिक सड़कें, लोडिंग और अनलोडिंग प्लेटफार्म, कार्यालय, डारमेट्री और फूड कोर्ट की स्थापना शामिल है.

इस परियोजना में सार्वज‍निक निजी भागीदारी के तहत 55.85 करोड़ रुपए के कोल्ड स्टोरेज, स्लरी और ट्यूब आइस प्लांट, मल्टीलेवल कार पार्किंग सुविधा, रिवर्स औस्मोसिस प्लांट, फूड कोर्ट, खुदरा बाजार आदि की स्थापना की जाएगी.

मत्स्यपालन, पशुपालन और डेरी मंत्री परशोत्तम रूपाला ने कहा कि सरकार ने मस्‍त्‍यपालन और जलीय कृषि अवसंरचना विकास कोष (एफआईडीएफ), सागरमाला योजना और प्रधानमंत्री मत्‍स्‍य संपदा योजना के तहत मछली पकड़ने के आधुनिक बंदरगाहों और मछली लैंडिंग केंद्रों के विकास के लिए सरकार ने 7,500 करोड़ रुपए से अधिक की परियोजनाओं की स्‍वीकृति दी है.

‘मछुआरों की आजीविका’ विषय पर राष्ट्रीय वैबिनार का आयोजन

नई दिल्ली : भारत सरकार के मत्स्यपालन, पशुपालन एवं डेरी मंत्रालय के अंतर्गत मत्स्य विभाग ने आजादी का अमृत महोत्‍सव के तहत ‘सस्‍टेनेबिलिटी औफ फिश मील इंडस्‍ट्री एंड द लाइवलीहुड्स औफ फिशरमैन’ यानी ‘फिश मील उद्योग की निरंतरता एवं मछुआरों की आजीविका’ विषय पर एक राष्ट्रीय वैबिनार का आयोजन किया. इस कार्यक्रम की सहअध्यक्षता मत्‍स्‍यपालन विभाग में संयुक्त सचिव (आईएफ) सागर मेहरा और भारत सरकार के मत्‍स्‍यपालन विभाग में संयुक्त सचिव (एमएफ) डा. जे. बालाजी ने की.

कार्यक्रम में मछुआरा समुदाय के प्रतिनिधियों, निर्यातकों, उद्यमियों, मत्स्य संघों, मत्स्य विभाग के अधिकारियों, भारत सरकार के अधिकारियों और विभिन्न राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के मत्स्य विभाग के अधिकारियों, राज्य कृषि, पशु चिकित्सा एवं मत्स्यपालन विश्वविद्यालयों के शिक्षकों, मत्स्य अनुसंधान संस्थानों के संकायों, मत्स्य सहकारी समितियों के अधिकारियों, वैज्ञानिकों, छात्रों और मत्स्‍यपालन से जुड़े देशभर के हितधारकों ने भाग लिया.

वैबिनार की शुरुआत भारत सरकार के मत्‍स्‍यपालन विभाग में संयुक्‍त सचिव सागर मेहरा के स्वागत भाषण से हुई. उन्होंने बताया कि एक्वाकल्चर के जरीए पैदा होन वाली तकरीबन 70 फीसदी मछलियों और क्रस्टेशियन को प्रोटीनयुक्त भोजन खिलाया जाता है, जिस में फिश मील प्रमुख रूप से शामिल होता है. फिश मील उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन, आवश्यक एमीनो एसिड, विटामिन, आवश्यक खनिज (जैसे फास्फोरस, कैल्शियम एवं आयरन) और मछलियों के विकास के लिए आवश्‍यक अन्य तत्‍वों से भरपूर एक पूरक पौष्टिक आहार है. बेहतरीन पोषण मूल्य के कारण इसे पालतू पशुओं के आहार के लिए पूरक प्रोटीन के तौर पर पसंद किया जाता है.

आमतौर पर यह मछली और झींगा के आहार में प्रोटीन का प्रमुख स्रोत होता है. हर साल लगभग 2 करोड़ टन कच्चे माल के उपयोग से फिश मील एवं फिश औयल का उत्पादन किया जा रहा है. उन्‍होंने तकनीकी चर्चा शुरू करने के लिए सभी पैनलिस्टों का स्वागत किया.

उच्च गुणवत्ता वाले फिश मील के उत्पादन पर जोर

तकनीकी सत्र की शुरुआत सीएलएफएमए के प्रबंध समिति के सदस्‍य निसार एफ. मोहम्मद द्वारा ‘ओवरव्‍यू औफ फिश मील इंडस्‍ट्री’ यानी ‘फिश मील उद्योग का संक्षिप्‍त परिचय’ विषय पर परिचर्चा के साथ हुई. उन्होंने फिश मील के महत्व को उजागर किया और बताया कि उच्च गुणवत्ता वाले फिश मील का उत्पादन कैसे किया जा सकता है.

उन्होंने आगे यह भी बताया कि फिश मील में मछली के कचरे का उपयोग किए जाने से जल प्रदूषण कम होता है. यह पशुओं में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और मेमनों, सूअरों आदि में मृत्यु दर को कम करता है.

दूसरे वक्ता बेंगलुरु के इंडियन मैरीन इनग्रेडिएंट्स एसोसिएशन के अध्‍यक्ष मोहम्मद दाऊद सैत ने फिश मील उद्योग की समस्‍याओं एवं चुनौतियों के बारे में बात की.

उन्होंने मत्स्यपालन उद्योग की उन्नति एवं कल्याण को बढ़ावा देने के उद्देश्‍य से भारत के फिश मील एवं फिश औयल उत्पादकों को साथ लाने के लिए निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में बताया.

फिश मील-फीड उद्योग पर हुई चर्चा

अवंति फीड प्रा. लिमिटेड के अध्‍यक्ष एवं प्रबंध निदेशक ए. इंद्र कुमार ने फिश मील और श्रिंप फीड उद्योग के बारे में बात की, जो साल दर साल लगातार बढ़ रहा है. एक्‍वाकल्‍चर के जरीए उत्‍पादन तकरीबन 95 फीसदी झींगा का निर्यात किया जाता है. इसलिए सभी आयातकों की मांग टिकाऊ एक्‍वाकल्‍चर एवं मैरीटाइम ट्रस्ट से उत्‍पादित मछलियों के लिए होती है.

वरिष्‍ठ वैज्ञानिक एवं वेरावल-आईसीएआर सैंट्रल इंस्टीट्यूट औफ फिशरीज टैक्नोलौजी के प्रभावी वैज्ञानिक डा. आशीष कुमार झा ने ‘फिश मील एंड इट्स अल्‍टरनेटिव टु एक्वा फीड इडस्‍ट्री’ यानी ‘एक्‍वा फीड उद्योग में फिश मील एवं उस का विकल्प’ विषय पर चर्चा की.

उन्‍होंने ओवरफिशिंग, बायकैच और प्रदूषण के 3 मुद्दों के बारे में जानकारी दी. साथ ही, उन्होंने यह भी बताया कि कीट, पत्ते, फल, बीज आदि को फिश मील के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.

आईसीएआर- सीएमएफआरआई के प्रधान वैज्ञानिक डा. एपी दिनेश बाबू ने भारतीय समुद्री मत्‍स्‍य उद्योग में किशोर मछलियों को न पकड़ने के बारे में बात की. उन्‍होंने मेश साइज रेग्यूलेशन, जुवेनाइल बाइकैच रिडक्शन डिवाइस (जेबीआरडी) और न्यूनतम कानूनी दायरे (एमएलएस) को लागू करने का सुझाव दिया.

मछलियों की बरबादी को रोकने पर दिया जोर

कर्नाटक सरकार के मत्‍स्‍य निदेशक रामाचार्य ने आग्रह किया कि तरीबन 12 से 18 फीसदी मछलियां बरबाद हो रही हैं, इसलिए उद्योग को मदद दी जानी चाहिए.

उन्होंने माना कि सही नीतिगत उपायों और विनियमन जैसे विभिन्‍न मुद्दों के बारे में तमाम प्‍ लेटफार्म के जरीए जागरूकता पैदा की जा रही है. कर्नाटक सरकार ने बिना नियमन के मछली पकड़ने पर लगाम लगाने के लिए नियम बनाए हैं.

संयुक्त सचिव (एमएफ) डा. जे. बालाजी ने जागरूकता पैदा करने और किशोर मछलियों को पकड़े जाने के कारणों पर ध्यान दिए जाने के महत्व के बारे में बताया. उन्होंने बताया कि मछलियों की दोबारा आूपर्ति में कृत्रिम रीफ स्‍थापित करना काफी महत्‍वपूर्ण होगा. इस से किशोर मछलियों के पकड़े जाने पर भी लगाम लगेगी.

उस के बाद मंच परिचर्चा के लिए खुला और उस का नेतृत्व संयुक्त सचिव (एमएफ) डा. जे. बालाजी ने किया. मत्‍स्‍य किसानों और उद्योग के प्रतिनिधियों द्वारा उठाए गए सवालों एवं शंकाओं पर चर्चा की गई और उन्हें आश्‍वस्‍त किया गया.

उपरोक्‍त व्यावहारिक चर्चाओं के साथसाथ क्षेत्रीय रणनीति एवं कार्ययोजना तैयार करने के उद्देश्‍य से बाद की कार्यवाही के लिए कई बिंदु तैयार किए गए.

वैबिनार का समापन मत्‍स्‍यपालन विभाग में सहायक आयुक्‍त (एफवाई) डा. एसके द्विवेदी द्वारा अध्यक्ष, प्रतिनिधियों, अतिथि वक्ताओं एवं प्रतिभागियों को धन्यवाद प्रस्ताव के किया गया.

पशु की सेहत का रखें खयाल

हमारे देश के ज्यादातर किसान खेती करने के साथसाथ गायभैंस भी पालते हैं, जिस से उन्हें अलग से अच्छीखासी कमाई होती है. गायभैंसों से ज्यादा दूध लेना ही हर किसान का मकसद होता है, लेकिन कुछ किसान ही अपनी गायभैंसों से अच्छा दूध ले पाते हैं. और उन की गायभैंसें भी सेहतमंद नहीं रहती हैं.

गायभैंस के ब्याते समय देखभाल :

आमतौर पर गायभैंसें ब्याने में आधा घंटे से ले कर 3 घंटे तक का समय लेती हैं. अगर गायभैंसें ब्याने में इस से ज्यादा समय लें, तो फौरन पशु चिकित्सक को बुला कर दिखाएं.

अगर गाय या भैंस का नवजात बच्चा (बछिया, बछड़ा या कटिया, कटरा) पैदा होने के 30 सैकंड बाद भी सांस लेना शुरू नहीं करता है तो उसे कृत्रिम सांस (आर्टिफिशियल सांस) दिलाएं. नवजात बच्चे की छाती को धीरेधीरे दबाएं और पिछले हिस्से को उठा लें. ऐसा करने से बच्चा सांस लेना शुरू कर देगा.

नवजात बच्चा पैदा होने के 2-3 घंटे बाद पहला गोबर करता है. अगर नवजात बच्चा पैदा होने के 2-3 घंटे बाद गोबर नहीं करता है, तो उसे 30 मिलीलिटर अरंडी का तेल पिला दें.

नवजात बच्चे के जिस्म पर (ब्याने के फौरन बाद) लगा लसलसा पदार्थ आमतौर पर मां (गाय या भैंस) चाट कर साफ कर देती है. अगर लसलसा पदार्थ नवजात बच्चे की मां चाट कर ठीक से साफ नहीं करती है तो ऐसी हालत में उसे साफ, सूखे कपड़े से पोंछ दें.

आमतौर पर गायभैंसें ब्याने के 2-4 घंटे बाद जेर गिरा देती हैं, लेकिन कभीकभी वे 8-12 घंटे तक का समय जेर गिराने में लेती हैं.

अगर गायभैंसें ब्याने के 8-12 घंटे बाद भी जेर नहीं डालती हैं तो इस का मतलब जेर रुक गई है. ऐसी हालत में फौरन पशुओं के डाक्टर या किसी माहिर से बच्चेदानी में फ्यूरिया जैसी दवा डलवाएं.

अगर गायभैंसें ब्याने के 30 घंटे बाद भी जेर नहीं गिराती हैं, तो पशुओं के डाक्टर से उसे निकलवाएं. ब्याई गई गाय या भैंस को पहले 5 दिनों तक 100 मिलीलिटर बच्चेदानी की सफाई वाली दवा दिन में 2 बार पिलाएं.

बच्चे (बछिया, बछड़ा या कटिया या कटरा) के पैदा होते ही उस की टुंडी यानी नाभि पर एंटीसैप्टिक यानी टिंचर आयोडीन, डेटोल या हलदी पाउडर लगाएं.

पैदा हुए बच्चे को खीस (पेवसी/पहला दूध) जल्द ही पिला दें. खीस की खुराक बच्चे के जिस्म के 1/10वें हिस्से के बराबर रखें यानी 10 किग्रा के बच्चे को 1 लिटर खीस पीने को दें और 30 किग्रा के बच्चे को 3 लिटर खीस पिलाएं.

यह खीस बच्चे के लिए बहुत ही पौष्टिक आहार है. खीस में ऐसी खासीयत होती है, जो बच्चे को बीमारियों से बचाती है. यह बच्चे में बीमारी से लड़ने की कूवत पैदा करती है. खीस पिलाने से बच्चा बचपन से ही तंदुरुस्त रहता है.

बीमार से बचाव :

अक्तूबनवंबर माह में सर्दी पड़ना शुरू हो जाता है, ऐसे में बच्चे और उस की मां को सर्दी से बचाएं. बच्चे को सेहतमंद रखने के लिए और कब्ज से बचाने के लिए समयसमय पर 30-40 मिलीलिटर अरंडी का तेल पिलाते रहें.

जब बच्चे की उम्र 3 महीने की हो जाए तो उसे खुरपकामुंहपका बीमारी से बचाव का टीका लगवाएं. 6 महीने से ज्यादा उम्र वाले पशुओं को खुरपकामुंहपका, गलघोंटू और लंगरिया बीमारियों को रोकने वाला टीका लगवाएं.

चारा और पूरक आहार :

गाय और भैंस को हर 3 लिटर व ढाई लिटर दूध के हिसाब से 1 किलोग्राम राशन दें. जो गायभैंसें दूध नहीं दे रही हैं, उन्हें हर दिन 1 किलोग्राम राशन देना चाहिए.

गायभैंसों को 70 फीसदी हरा चारा और 30 फीसदी सूखा चारा देना चाहिए. तकरीबन 100 किलोग्राम वजन वाली गाय को 2.5 किलोग्राम और भैंस को 3 किलोग्राम सूखी खुराक की जरूरत होती है. इस में दोतिहाई चारा और एकतिहाई दाना देना चाहिए.

हरे चारे में कम से कम 11-12 फीसदी प्रोटीन होना चाहिए और दाने में 18-20 फीसदी प्रोटीन जरूरी है. सभी पशुओं को संतुलित मात्रा में प्रोटीन देना जरूरी होता है.

पशुओं को संतुलित मात्रा में चारादाना दिन में 2 बार 8-10 घंटे के अंतराल पर दें. इस के अलावा 2 बार साफ ताजा पानी पीने को दें.

6 महीने की गाभिन गाय को 1 किलोग्राम व 6 महीने की गाभिन भैंस को डेढ़ किलोग्राम राशन (दाना) अलग से दें.

दुधारू पशुओं को रोजाना कम से कम 5 किलोग्राम हरा चारा जरूर दें. सर्दी के मौसम में बरसीम सब से अच्छा हरा चारा होता है.

पशु के राशन में 2 फीसदी मिनरल मिक्सचर जरूर मिलाएं.

पशुओं से ज्यादा दूध लेने और उन को लंबे समय तक सेहतमंद बनाए रखने के लिए उन्हें संतुलित मात्रा में चारादाना (राशन) देना जरूरी होता है. संतुलत राशन में खनिज लवण के साथ पोषक तत्त्व, प्रोटीन, विटामिन वगैरह तय मात्रा में रखे जाते हैं.

संतुलित आहार (राशन) बनाने का फार्मूला न्यूट्रीशन ऐक्सपर्ट से संपर्क कर के हासिल करें. संतुलित राशन घर पर भी बना सकते हैं. राशन बनाने में उम्दा क्वालिटी का अनाज (जई, जौ, गेहूं, ज्वार वगैरह), तेल, खली (सरसों, मूंगफली वगैरह की खली), ग्वारमील, शीरा, नमक, मिनरल मिक्सचर व विटामिनों का संतुलित मात्रा में इस्तेमाल किया जाता है.

एडवांस डेरी फार्म पर पूरक आहार (सप्लीमैंट्री राशन) दिया जाता है. पूरक आहार खिलाने से पशु के जिस्म में आई कमियां दूर हो जाती हैं और वह लंबे समय तक सेहतमंद व दुधारू बना रहता है. पूरक आहार में मिनरल मिक्सचर, फीड एडिटिव, बाईपास प्रोटीन, बी कांप्लैक्स वगैरह को शामिल किया जाता है. बहुत सी प्राइवेट कंपनियां पूरक आहार बाजार में बेचती हैं, तो उन की पूरी जानकारी हासिल कर के अपने पशु को पूरक आहार खिलाएं.

पशुओं का कीड़ों से बचाव :

छोटे या जवान पशुओं को बाहरी और अंदरूनी कीड़े काफी नुकसान पहुंचाते हैं. अंदरूनी कीड़े जैसे फीताकृमि, गोलकृमि, वगैरह पशु के पेट में रह कर उस का आहार व खून पीते हैं, वहीं बाहरी कीड़े जैसे जूं, किल्ली, पिस्सू माइट वगैरह पशु के बाहरी जिस्म पर रहते हैं और उस का खून चूसते हैं. बाहरी और अंदरूनी दोनों ही कीड़े पशु को कमजोर बना देते हैं, जिस के चलते पशु की दूध देने की कूवत कम होती जाती है और पशु समय से पहले ही कमजोर व बीमार हो कर मर सकता है.

पशुओं के अंदरूनी कीड़ों को मारने के लिए कीड़ेमार दवा जैसे फेंटास, एल्बोमार, पैनाखुर वगैरह की सही मात्रा पशु चिकित्सक से पूछ कर दें. वहीं बाहरी कीड़ों को मारने के लिए ब्यूटाक्स दवा की 2 मिलीलिटर मात्रा को 1 लिटर पानी में घोल कर पशु के शरीर पर अच्छी तरह से पोंछा लगाएं, पर दवा लगाने से पहले पशु के मुंह पर मुचका जरूर बांध दें, ताकि पशु दवा को चाट न सके.

बनाएं गोबर से खाद :

पशुओं के गोबर का इस्तेमाल उपले यानी ईंधन बनाने में कतई न करें. गड्ढा खोद कर उस में गोबर डालें और गोबर की खाद तैयार करें. जिन पशुपालकों के पास खेती की जमीन नहीं है, वे गोबर की खाद गड्ढे में तैयार कर उसे अच्छे दामों पर बेच सकते हैं. जैविक खेती में गोबर की सड़ी खाद की काफी मांग रहती है.

नस्ल का चुनाव :

दूध उत्पादन के लिए हमेशा दुधारू नस्ल के पशु ही पालें. गाय में साहीवाल, हरियाणा, करनस्विस, करनफ्रिज वगैरह और भैंस में मुर्रा, मेहसाना वगैरह नस्लें माली नजरिए से फायदेमंद साबित होती हैं.

दुधारू पशु (गायभैंस) खरीदने से पहले उस की नस्ल, दूध देने की कूवत वगैरह की जांच जरूर करनी चाहिए. पशु की वंशावली का रिकौर्ड भी जरूर देखना चाहिए यानी उस की मां, नानी, परनानी वगैरह कितना दूध देती थीं. इस के अलावा आप अपने इलाके और सुविधाओं के आधार पर ही पशु का चुनाव करें.

कैसी हो पशुशाला?

पशुशाल हमेशा ऐसी जगह बनाएं, जहां बारिश का पानी नहीं भरता हो. जगह हवादार व साफसुथरी होनी चाहिए. पशुशाला का फर्श पक्का खुरदरा रखें. गोबर को पशुशाला से उठा कर दूर खाद के गड्ढे में डालें. पशुशाला से पानी की निकासी का भी सही बंदोबस्त रखें.

पशुशाला के आसपास गंदा पानी जमा न होने दें. पशुशाला में मक्खीमच्छर से बचाव का भी इंतजाम करें. पशुओं को सर्दी, गरमी व बरसात से बचाने के लिए पशुशाला में पुख्ता इंतजाम करें.

ध्यान रखें कि पशुओं को किसी भी तरह की परेशानी न हो. सर्दी के मौसम में पशुशाला में बिछावन के लिए भूसा, लकड़ी का बुरादा, पेड़ों की सूखी पत्तियां या गन्ने की सूखी पत्तियों का इस्तेमाल करें. बिछावन गीला होने के बाद उसे गोबर के साथ उठा कर खाद के गड्ढे में डाल दें. हर रोज सूखा बिछावन ही इस्तेमाल में लाएं.

इन बातों का खयाल रखें

* पशुओं को अफरा बीमारी से बचाने के लिए 1 लिटर मीठे तेल में 200 ग्राम काला नमक, 100 ग्राम मीठा खाने वाला सोडा, 30 ग्राम अलवाइन व 20 ग्राम हींग मिला कर दें. अफरा से बचाव के लिए जरूरत से ज्यादा बरसीम, खड़ा गेहूं व ज्यादा राशन न खिलाएं.

* पशुओं को थनैला बीमारी से बचाने के लिए पशुशाला को हमेशा साफसुथरा रखें व हवादार रखें. समयसमय पर थनैला के लिए दूध की जांच करते रहें.

* थनैला की जांच के लिए 1 कप पानी में 1 चम्मच सर्फ घोलें व 5 चम्मच दूध में 1 चम्मच यह घोल मिला दें.

अगर दूध जैल बन जाए तो समझ लें कि पशु को थनैला हो गया है. थनैला होने पर फौरन पशुओं के डाक्टर से इलाज कराएं.

* थनैला से बचाव के लिए पशु का दूध निकालने से पहले व बाद में थनों को साफ पानी से धोएं और साफ व सूखे कपड़े से पोंछ दें. दूध दुहने वाले के हाथ के नाखून हमेशा कटे होने चाहिए. पशुशाला आरामदायक होनी चाहिए.

* हमेशा उन्नत नस्ल की गायभैंसें पालें. मादा को गाभिन कराने के लिए अच्छी नस्ल के सांड़ के वीर्य से कृत्रिम गर्भाधान कराएं.

* कटियाबछिया को समय पर गाभिन कराने के लिए उन के खानपान पर खास ध्यान दें, ताकि वे सही वजन हासिल कर सकें.

* समय पर बछिया/कटिया को संक्रामक गर्भपात से बचाने वाला टीका लगवाएं. पशु को पेट के कीड़े मारने के लिए हर 6 महीने में 1 बार कीड़े मारने वाली दवा दें.

* जब कटिया या बछिया का वजन 250 किलोग्राम हो जाए, तो उन को समय पर गाभिन होने के लिए 50 ग्राम खनिज मिश्रण 1 चम्मच कोलायडल आयोडीन और 125 ग्राम अंकुरित अनाज 2 महीने तक दें. कटियाबछिया की सफाई का पूरा ध्यान रखें.