नई तकनीक से मत्स्यपालन

भिंड : मत्स्य उद्योग एक ऐसा व्यवसाय है, जिसे गरीब से गरीब व्यक्ति अपना सकता है एवं अच्छी आय प्राप्त कर सकता है और समाज में क्रांतिकारी बदलाव लाया जा सकता है. विभिन्न माध्यमों से मत्स्यपालन व्यवसाय में लग कर मानवेंद्र सिंह अपना आर्थिक स्तर सुधार रहे हैं.

भिंड जिले के दबोह क्षेत्र के मानवेंद्र सिंह यादव द्वारा प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत मत्स्यपालन की नवीन तकनीक बायोफ्लोक यूनिट द्वारा मत्स्यपालन का काम किया जा रहा है.

मानवेंद्र सिंह बताते हैं कि वर्ष 2019-20 में सहायक संचालक मत्स्योद्योग जिला भिंड के अधिकारी की सहायता से बायोफ्लोक पद्धति से 4 मीटर व्यास, 1.5 मीटर ऊंचाई एवं 10 हजार लिटर पानी की क्षमता के 2 टैंकों में मत्स्य उत्पादन किया गया, जिस में 50 हजार की लागत से 1.5 मीट्रिक टन मत्स्योत्पादन किया गया, जिस में एक लाख रुपए का लाभ प्राप्त हुआ.

उन्होंने बताया कि वर्ष 2020-21 में मत्स्य विभाग जिला भिंड से संपर्क कर 7 टैंक 5 मीटर व्यास, 1.5 मीटर ऊंचाई, 20 हजार लिटर पानी की क्षमता एवं 7.5 लाख रुपए की लागत से 7 टैंकों का निर्माण करवाया गया एवं प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना से 3 लाख का अनुदान प्राप्त हुआ.

साथ ही, सभी टैंकों में 20 हजार पंगेशियस मत्स्य बीज का संचयन किया, जिस में एक वर्ष में 2 बार (प्रत्येक 6-6 माह में) मत्स्य उत्पादन का कार्य किया जाता है, जिस में 5 मीट्रिक टन मत्स्य उत्पादन हो चुका है. इस से वर्ष में 5 लाख रुपए का मुनाफा प्राप्त हुआ है. वर्तमान में 5 मीटर व्यास, 1.5 मीटर ऊंचाई, 20 हजार लिटर पानी की क्षमता वाले 14 टैंक हैं, जिन में मछली को  पालने का काम किया जा रहा है.

मछलीपालन (Fish Farming) है आसान

मछलियों में तकरीबन 70-80 फीसदी पानी, 13-22 फीसदी प्रोटीन, 1-3.5 फीसदी खनिज पदार्थ और 0.5-2.0 फीसदी चरबी पाई जाती है. कैल्शियम, पोटेशियम, फास्फोरस, लोहा, सल्फर, मैग्नीशियम, तांबा, जस्ता, मैगनीज, आयोडीन आदि खनिज पदार्थ मछलियों में मौजूद होते हैं. मछली का आहार काफी पौष्टिक माना गया है.

राइबोफ्लोविन, नियासिन, पेंटोथेनिक एसिड, वायोटीन, थाइमिक विटामिन बी-12, बी-6 वगैरह भी मछली में पाए जाते हैं. इस का सेवन सेहत के लिए काफी फायदेमंद है.

मछली में ओमेगा 3 नामक फैटी एसिड पाया जाता है, जो मनुष्य के लिए काफी जरूरी है. इस की कमी से शरीर में मधुमेह, दिल की बीमारी, सूखी चमड़ी के साथसाथ खाजखुजली, चमकीले बाल और खून की कमी, थकावट, जोड़ों में दर्द, नामर्दी, तनाव वगैरह होने की संभावना रहती है. ओमेगा 3 फैटी एसिड साधारण जैविक क्रियाओं के लिए जरूरी है, लेकिन यह और भी कई वजह से मनुष्य के लिए लाभदायक है.

तालाब को ऐसे चुनें

जिस तरह खेती के लिए जमीन जरूरी है, उसी तरह मछलीपालन के लिए तालाब की भी जरूरत होती है.

मछलीपालन के लिए 0.2 हेक्टेयर से 5.0 हेक्टेयर तक के ऐसे तालाबों को चुनना चाहिए जिन में सालभर पानी भरा रहे. साथ ही, ऐसी भी व्यवस्था होनी चाहिए कि तालाबों में सालभर 1-2 मीटर पानी जरूर भरा रहे.

तालाब ऐसी जगह पर हो, जहां बाढ़ का खतरा न हो और आसानी से पहुंचा जा सके. तालाब को सही तरीके से बनाने के लिए अगर बीच में कहीं टीले आदि हों तो उन की मिट्टी निकाल कर एकसमान गहराई रखी जा सकती है. तालाब के तटबंध ऊंचे होने चाहिए. पानी के निकास के लिए जाली का सही इंतजाम होना जरूरी है, ताकि तालाब से मछलियां बाहर न निकलें और बाहरी मछलियां तालाब में न आ सकें.

तालाब में सुधार के काम अप्रैलमई तक जरूर करा लें, जिस से मछलीपालन के लिए सही समय मिल सके.

नया तालाब बनाने के लिए सही जगह का चुनना बहुत ही जरूरी है. तालाब बनाने के लिए मिट्टी की जलधारण कूवत व उर्वरकता को चयन का आधार माना जाना चाहिए. ऊसर व बंजर जमीन पर तालाब नहीं बनाना चाहिए.

मछलीपालन के लिए चिकनी मिट्टी वाली जमीन काफी अच्छी रहती है. इस मिट्टी की जलधारण कूवत ज्यादा होती है. मिट्टी का पीएच मान 6.5 से 8.0, आर्गेनिक कार्बन 1.0 फीसदी और मिट्टी में रेत 40 फीसदी, सिल्ट 30 फीसदी व क्ले 30 फीसदी रहना चाहिए.

तालाब बनाने से पहले मिट्टी की जांच मछली विभाग की प्रयोगशालाओं या फिर दूसरी प्रयोगशालाओं से जरूर करा लेनी चाहिए.

मिट्टी और पानी की जांच

मछली की ज्यादा पैदावार पाने के लिए तालाब की मिट्टी व पानी का सही होना बहुत जरूरी है. मंडल लैवल पर मछली विभाग की प्रयोगशालाओं द्वारा मछलीपालकों के तालाबों की मिट्टीपानी की निशुल्क जांच की जाती है और वैज्ञानिक तरीके से मछलीपालकों को तकनीकी सलाह भी दी जाती है.

तालाब प्रबंध व्यवस्था

मछलीपालन शुरू करने से पहले इस बात पर ध्यान देना जरूरी है कि मछली का बीज डालने के लिए तालाब पूरी तरह से सही हो.

बेकार पौधे उखाड़ दें

तालाब में जरूरत से ज्यादा जलीय पौधों का होना मछली की अच्छी पैदावार के लिए हानिकारक है. जलीय पौधे पानी के काफी बड़े हिस्से में फैले रहते हैं. साथ ही, ये सूरज की रोशनी को भी पानी के भीतर पहुंचने में बाधा पहुंचाते हैं. इस की वजह से मछली को प्राकृतिक भोजन न मिलने से उस की बढ़वार पर असर पड़ता है.

मछली पकड़ने के लिए जाल डालते समय यह पौधे उस में रुकावट डालते हैं. खासतौर पर जलीय पौधे 3 तरह के होते हैं. पहले, पानी की सतह वाले जैसे, जलकुंभी व लेमना. दूसरे जड़ जमाने वाले जैसे कमल इत्यादि और तीसरे, जल में डूबे रहने वाले जैसे हाइड्रिला और नजाज आदि.

यदि तालाब में जलीय पौधे कम तादाद में हों तो इन्हें जाल चला कर या मजदूर लगा कर जड़ से उखाड़ा जा सकता है. ज्यादा जलीय वनस्पति होने में कैमिकल का इस्तेमाल जैसे 2,4 डी, सोडियम, लवण, टैफीसाइड हेक्सामार और फरनेक्सान 8-10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पानी में इस्तेमाल करने से जलकुंभी, कमल आदि सड़गल जाते हैं. कुछ जलमग्न पौधे ग्रास कौर्प मछली खाती हैं इसलिए इन की रोकथाम तालाब में ग्रास कौर्प मछली पाल कर की जा सकती है.

मछली की सफाई

मछलीपालन (Fish Farming)

पुराने तालाबों में अनुपयोग जीवों में कछुआ, मेंढक, केकड़े और मछलियों में सिंधरी, पुठिया, चेलवा आदि हैं और भक्षक मछलियों में पढि़न, रैंगन, सौल, गिरई, सिंधी आदि प्रजातियां तालाब में मौजूद पदार्थों को भोजन के रूप में इस्तेमाल करती हैं.

मांसाहारी मछलियां कौर्प मछलियों के बच्चों को खा जाती हैं. इस का मछलीपालन पर बुरा असर पड़ता है. इसलिए इन की सफाई बहुत जरूरी है. इन मछलियों का निबटान समयसमय पर जाल चला कर, पानी निकाल कर या फिर महुए की खली का इस्तेमाल कर के किया जा सकता है.

महुए की खली का इस्तेमाल 1 हेक्टेयर क्षेत्रफल में 1 मीटर पानी की गहराई वाले तालाबों में 25 क्विंटल की दर से किया जाना चाहिए. इस के इस्तेमाल से 6 से 8 घंटे में तालाब की सारी मछलियां मर कर ऊपर तैरने लगती हैं. इन्हें जाल चला कर इकट्ठा कर के बाजार में बेचा जा सकता है. महुए की खली विष के साथसाथ 15-20 दिन बाद खाद का भी काम करती है.

चूने का इस्तेमाल

पानी का हलका क्षारीय होना मछलीपालन के लिए लाभदायक है. पानी अम्लीय या ज्यादा क्षारीय नहीं होना चाहिए. चूना पानी की क्षारीयता को बढ़ाता है और अम्लीयता व क्षारीयता को संतुलित करता है.

चूना मछलियों को दूसरों पर आश्रित रहने वालों के प्रभाव से दूर रखता है. 1 हेक्टेयर के तालाब में 250 किलोग्राम चूने का इस्तेमाल मछली बीज इकट्ठा करने से एक महीने पहले किया जाना चाहिए.

गोबर खाद का इस्तेमाल

तालाब तैयार करने में गोबर की खाद बहुत ही अहमियत रखती है. इस से मछली का प्राकृतिक भोजन पैदा होता है. गोबर की खाद, मछली के बीज इकट्ठा करने से 15-20

दिन पहले सामान्य और 10-20 टन प्रति हेक्टेयर हर साल 10 समान किस्तों में इस्तेमाल किया जाना चाहिए.

कैमिकल खाद का उपयोग

सामान्य तौर पर कैमिकल खाद में यूरिया 200 किलोग्राम, सिंगल सुपर फास्फेट 250 किलोग्राम व म्यूरेट औफ पोटाश 40 किलोग्राम यानी कुल मिश्रण 490 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हर साल 10 समान मासिक किस्तों में इस्तेमाल किया जाना चाहिए.

यों करें मछली बीज जमा

तालाब में अच्छी किस्म की मछलियों के सही बीज का संचय किया जाना चाहिए. लेकिन इस बात का ध्यान रहे कि एक ही जलीय वातावरण में रह कर वे एकदूसरे को नुकसान न पहुंचाते हुए तालाब की अलगअलग सतहों पर मौजूद भोजन का इस्तेमाल करें और तेजी से बढ़ें.

भारतीय कौर्प मछलियों में कतला, रोहू और नैन, विदेशी कौर्प मछलियों में सिल्वर कौर्प, ग्रास कौर्प और कौमन कौर्प का मिलाजुला पालन विशेष लाभकारी है. अच्छी प्रजाति की मछलयों के लिए सही बीज ही मछलीपालन की आधारभूत जरूरत है.

मछली बीज की देखभाल

1 हेक्टेयर पानी में 50 मिलीमीटर से ज्यादा आकार की 5000 मछली बीज डाले जाने चाहिए. यदि 6 तरह की देशी व विदेशी कौर्प मछलियों को एकसाथ पाला जाए तो कतला 20 फीसदी, रोहू 30 फीसदी, सिल्वर 10 फीसदी, ग्रास कौर्प 10 फीसदी, नैन कौर्प 15 फीसदी व कौमन कौर्प 15 फीसदी का अनुपात सही रहता है.

मछलीपालन (Fish Farming)पूरक आहार : मछली की ज्यादा पैदावार पाने के लिए जरूरी है कि उन्हें पूरक आहार दिया जाए. यह प्राकृतिक आहार की तरह पोषक तत्त्वों से भरपूर हो. साधारण तौर पर प्रोटीन से भरपूर कम खर्चीले पूरक आहारों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए.

मूंगफली, सरसों, नारियल या तिल की बारीक पिसी खली और चावल का कना या गेहूं का चोकर दोनों बराबर मात्रा में मिला कर मछलियों के कुल भार का 1-2 फीसदी तक रोजाना दिया जाना चाहिए.

मत्स्य प्रसंस्करण इकाई (Fish Processing Unit) का उद्घाटन

उदयपुर: 28 फरवरी, 2024. महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के संघटक मात्स्यकी महाविद्यालय में दूसरे दिन छोटी मत्स्य प्रसंस्करण इकाई का उद्घाटन मात्स्यकी महाविद्यालय के डा. आरए कौशिक, अधिष्ठाता द्वारा एवं डा. बीके शर्मा, पूर्व अधिष्ठाता, डा. आशीष झा, प्रमुख वैज्ञानिक आईसीएआर-सीआईएफटी और डा. सुमन ताकर की मौजूदगी में संपन्न हुआ.

इस अवसर पर महाविद्यालय के पूर्व अधिष्ठाता डा. बीके शर्मा ने सभी अतिथियों का स्वागत किया. उद्घाटन के दौरान मात्स्यकी महाविद्यालय के समस्त शिक्षक और छात्र समुदाय उपस्थित थे.

मत्स्य प्रसंस्करण इकाई की स्थापना आईसीएआर-सीआईएफटी के द्वारा की गई. इस के लिए डा. आरए कौशिक ने निदेशक आईसीएआर-सीआईएफटी का दिल से धन्यवाद प्रेषित किया. यह इकाई यहां के आदिवासी बहुल क्षेत्र के मत्स्य किसानों के लिए मील का पत्थर साबित होगी. इस के लिए विभिन्न प्रकार मत्स्य सहउत्पादों का प्रशिक्षण आयोजित किया जा सकेगा.

प्रशिक्षण के दूसरे दिन डाया मत्स्य सहकारी समिति के 60 मत्स्यपालकों ने अलगअलग प्रकार के मत्स्य सहउत्पाद बनाने की कला को पूरी जिज्ञासा के साथ सीखा, जिस में मुख्य रूप से फिश फिंगर, फिश कटलेट, झींगा मछली (झींगा के साथ), फिश बाल, फिश समोसा, फिश पकोड़ा, फिश ब्रेड पकोड़ा एवं मत्स्य अचार मत्स्य किसानों ने स्वयं अपने हाथों से बनाए, जिस में आईसीएआर-सीआईएफटी से आए हुए सभी टीम के साथियों एवं महाविद्यालय के डा. बीके शर्मा, डा. एमएल ओझा एंव डा. सुमन ताकर ने इन सहउत्पादों को बनाने में प्रशिक्षणार्थियों को अपना सहयोग प्रदान किया.

महाविद्यालय के तृतीय वर्ष के विद्यार्थियों ने वर्तमान सत्र में चल रहे कोर्सों का प्रायोगिक जानकारी अर्जित की. साथ ही, मत्स्य सहउत्पादों के विभिन्न व्यंजनों को बनाने में अपनी पूरी रुचि भी दिखाई.

एक्वेरियम में ऐसे रखें रंगीन मछलियां

एक्वेरियम में रंगीन मछलियों को रखना और उस का पालन एक दिलचस्प काम है, जो न केवल घर की खूबसूरती बढ़ाता है, बल्कि मन को भी शांत करता है. रंगीन मछलियां व एक्वेरियम व्यवसाय स्वरोजगार के जरीए पैसे बनाने के मौके भी मुहैया कराता है.

दुनियाभर में 10-15 फीसदी वार्षिक वृद्धि दर के साथ रंगीन मछलियों व सहायक सामग्री का कारोबार 8 बिलियन डौलर से ज्यादा का है. इस में भारत की निर्यात क्षमता 240 करोड़ रुपए प्रति वर्ष है. दुनियाभर की विभिन्न जलीय पारिस्थितिकी से तकरीबन 600 रंगीन मछलियों की प्रजातियों की जानकारी हासिल है.

भारत सजावटी मछलियों के मामले में 100 से ऊपर देशी प्रजातियों के साथ बहुत ज्यादा संपन्न है. साथ ही, विदेशी प्रजाति की मछलियां भी यहां पैदा की जाती हैं. शहरों व कसबों में रंगीन मछलियों को एक्वेरियम में रखने का प्रचलन दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है.

रंगीन मछलियों को शीशे के एक्वेरियम में पालना एक खास शौक है. रंगबिरंगी मछलियां बच्चे व बूढ़े सभी का मन मोह लेती हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि रंगीन मछलियों के साथ समय बिताने से ब्लडप्रैशर कंट्रोल में रहता है और दिमागी तनाव कम होता है.

आजकल एक्वेरियम को घर में सजाना लोगों का एक प्रचलित शौक हो गया है. रंगीन मछलियों के पालन व एक्वेरियम बनाने की तकनीकी जानकारी से अच्छी आमदनी हासिल की जा सकती है.

बहुरंगी मछलियों की प्रजातियां

देशी और विदेशी मीठे जल की बहुरंगी मछलियों की प्रजातियों की मांग ज्यादा रहती है. व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए उन का प्रजनन और पालन भी आसानी से किया जा सकता है. व्यावसायिक किस्मों के तौर पर आसानी से उत्पादन की जा सकने वाली रंगीन मछलियों की प्रजातियां निम्न हैं :

बच्चे देने वाली मछलियां

गप्पी (पोयसिलिया रेटिकुलेटा), मोली (मोलीनेसिया स्पीशिज) और स्वार्ड टेल (जीफोफोरस स्पीशिज).

अंडे देने वाली मछलियां

गोल्ड फिश (कैरासियस ओराट्स), कोई कौर्प (सिप्रिनस कौर्पियो की एक किस्म), जैब्रा डेनियो (ब्रेकिडेनियो रेरियो), ब्लैक विडो टैट्रा (सिमोक्रो-सिंबस स्पीशिज), नियोन टैट्रा (हीफेसो-ब्रीकोन इनेसी), सर्पी टैट्रा (हाफेसोब्रीकौन कालिसट्स) व एंजिल वगैरह.

एक्वेरियम तैयार करने के लिए जरूरी सामग्री

एक्वेरियम तैयार करने के लिए निम्न सामग्री की जरूरत होती है :

5-12 एमएम की मोटाई का फ्लोट गिलास नाप के मुताबिक कटा हुआ. एक्वेरियम के सही आकार का ढक्कन, जरूरत के मुताबिक और मजबूत तकरीबन 30 इंच ऊंचाई वाला स्टैंड, सिलिकौन सीलेंट, पेस्टिंग गन, छोटेछोटे रंगबिरंगे पत्थर, जलीय पौधे (कृत्रिम या प्राकृतिक), एक्वेरियम के बैकग्राउंड के लिए रंगीन पोस्टर, सजावटी खिलौने व डिफ्यूजर स्टोन, थर्मामीटर व थर्मोस्टेट, फिल्टर उपकरण, एयरेटर व वायु संचरण की नलिकाएं, क्लोरीन फ्री स्वच्छ जल, रंगीन मछलियां पसंद के मुताबिक, मछलियों का भोजन जरूरत के अनुसार, हैंड नैट, बालटी, मग व साइफन नलिका, स्पंज वगैरह.

एक्वेरियम कहां रखें?

एक्वेरियम रखने की जगह समतल होनी चाहिए और धरातल मजबूत होना चाहिए. लोहे या लकड़ी के बने मजबूत स्टैंड या टेबल का इस्तेमाल किया जा सकता है, जहां एक्वेरियम रखना है, वहां बिजली का इंतजाम भी जरूरी है. ध्यान रहे कि एक्वेरियम पर सूरज की सीधी रोशनी न पड़े, वरना उस में काई जमा हो सकती है.

एक्वेरियम कैसा हो?

एक्वेरियम को खुद बनाने में सावधानी की जरूरत होती है. पौलिश किए हुए शीशे की प्लेट को सीलेंट से जोड़ कर आप एक्वेरियम बना सकते हैं.

बाजार में मुहैया एक्वेरियम विक्रेता से अपनी पसंद का एक्वेरियम भी खरीद सकते हैं. आमतौर पर घरों के लिए एक्वेरियम 60×30×45 सैंटीमीटर लंबाई, चौड़ाई व ऊंचाई की मांग ज्यादा रहती है.  शीशे की मोटाई 5-6 मिलीमीटर होनी चाहिए. इस से बड़े आकार का एक्वेरियम बनाने के लिए मोटे शीशे का इस्तेमाल करना चाहिए.

एक्वेरियम को ढकने के लिए फाइबर या लकड़ी के बने ढक्कन को चुन सकते हैं. ढक्कन के अंदर एक बल्ब व ट्यूबलाइट लगी होनी चाहिए. 40 वाट के बल्ब की रोशनी एक साधारण एक्वेरियम के लिए सही है.

Fishएक्वेरियम को कैसे सजाएं?

एक्वेरियम को खरीदने के बाद उसे सजाने से पहले अच्छी तरह साफ  कर लेना चाहिए. साफ करने के लिए साबुन या तेजाब का इस्तेमाल न करें. एक्वेरियम को रखने की जगह तय कर के उसे एक मजबूत स्टैंड पर रखना चाहिए. एक्वेरियम के नीचे एक थर्मोकौल शीट लगानी चाहिए. इस के बाद पेंदे में साफ बालू की 1-2 इंच की मोटी परत बिछा देते हैं और उस के ऊपर छोटेछोटे पत्थर की एक परत बिछा दी जाती है.

पत्थर बिछाने के साथ ही थर्मोस्टेट, एयरेटर व फिल्टर को भी लगा दिया जाता है. एक्वेरियम में जलीय पौधे लगाने से टैंक खूबसूरत दिखता है.

बाजार में आजकल तरहतरह के कृत्रिम पौधे मुहैया हैं. एक्वेरियम को आकर्षक बनाने के लिए तरहतरह के खिलौने अपनी पसंद से लगाए जा सकते हैं.

एक्वेरियम में भरा जाने वाला पानी क्लोरीन से मुक्त होना चाहिए, इसलिए यदि नल का पानी हो तो उसे कम से कम एक दिन संग्रह कर छोड़ देना चाहिए और फिर उस पानी को एक्वेरियम में भरना चाहिए.

एक्वेरियम में कितनी मछलियां रखें?

एक्वेरियम तैयार कर अनुकूलित करने के बाद उस में अलगअलग तरह की रंगबिरंगी मछलियां पाली जाती हैं. रंगीन मछलियों की अनेक प्रजातियां हैं, पर इन्हें एक्वेरियम में एकसाथ रखने के पहले जानना जरूरी है कि यह एकदूसरे को नुकसान न पहुंचाएं. छोटी आकार की मछलियां रखना एक्वेरियम के लिए ज्यादा बेहतर माना जाता है, जिन के नाम निम्नलिखित हैं:

ब्लैक मोली, प्लेटी, गप्पी, गोरामी, फाइटर, एंजल, टैट्रा, बार्ब, औस्कर, गोल्ड फिश.

इन मछलियों के अतिरिक्त कुछ देशी प्रजातियां हैं, जिन को भी एक्वेरियम में रखा जाने लगा है. जैसे लोच, कोलीसा, चंदा, मोरुला वगैरह. आमतौर पर 2-5 सैंटीमीटर औसतन आकार की 5-10 मछलियां प्रति वर्गफुट जल में रखी जा सकती हैं.

एक्वेरियम प्रबंधन के लिए जरूरी बातें

थर्मोस्टेट द्वारा पानी का तापमान 240 सैल्सियस से 280 सैल्सियस के बीच बनाए रखें. 8-10 घंटे तक एयरेटर द्वारा वायु प्रवाह करना चाहिए. पानी साफ रखने के लिए मेकैनिकल व जैविक फिल्टर का इस्तेमाल करना चाहिए.

एक्वेरियम में उपस्थित अनावश्यक आहार, उत्सर्जित पदार्थों को प्रति सप्ताह साइफन द्वारा बाहर निकालते रहना चाहिए. कम हुए पानी के स्थान पर स्वच्छ पानी भरना चाहिए.

यदि कोई मछली मर जाती है, तो उसे तुरंत निकाल दें और यदि कोई मछली बीमार हो, तो उस का उचित उपचार भी करना चाहिए.

एक्वेरियम कारोबार से अनुमानित आमदनी

रंगीन मछलियों के पालन व एक्वेरियम निर्माण से अच्छी आमदनी की जा सकती है. इस के लिए मुख्यत: निम्न आयव्यय का विवरण दिया जा रहा है. समय, जगह व हालात में इस में बदलाव हो सकता है :

स्थायी लागत

शैडनैट (500 वर्गफुट), छायादार जगह (100 वर्गफुट), फाइबर व सीमेंट की टंकियां (10-15), एयर कंप्रैसर और वायु नलिकाएं, औक्सीजन सिलैंडर-1, विद्युत व जल व्यवस्था व अन्य खर्च 1,25,000 रुपए.

कार्यशील पूंजी

शिशु मछलियां (6,000), प्रबंधन खर्च, बिजली, पानी, मत्स्य आहार, एक्वेरियम निर्माण व सहायक सामग्री, स्थायी लागत पर ब्याज व अन्य खर्चे 1,65,000 रुपए.

आय

मछलियां (10,000 × 20 रुपए), एक्वेरियम टैंक व सहायक सामग्री (120 × 2500 रुपए), बेचे गए एक्वेरियम टैंकों की वार्षिक मेंटेनैंस 1200 रुपए टैंक, कुल आय तकरीबन रुपए 5,80,000-6,40,000 रुपए, शुद्ध आय तकरीबन 3,55,000 से 4,15,000 रुपए प्रति वर्ष हासिल की जा सकती.

तिलापिया मछली का करें पालन

तिलापिया मछली दुनिया में दूसरी सब से ज्यादा पाली जाने वाली मछली है, परंतु भारत में इस का व्यावसायिक पालन सीमित है. तिलापिया मछली को पालने के लिए एशियाई देशों का मौसम और पर्यावरण स्थितियां अनुकूल होती हैं. किन्हीं कारणों से 1959 में भारतीय मात्स्यिकी अनुसंधान समिति द्वारा इस मछली के पालन पर रोक लगा दी गई थी.

दरअसल, तिलापिया मछली शीघ्र परिपक्व होने वाली व साल में कई बार प्रजनन करने की क्षमता के कारण किसी भी अनुकूल जलाशय में तेजी से पनपती है, जिस से यह अन्य स्थानीय प्रजातियों से प्रतिस्पर्धा कर उन्हें विस्थापित कर सकती है. लेकिन वर्तमान में कुछ राज्यों की स्थितियों के कारण इस के नियंत्रित वातावरण में पालन से रोक हटा दी गई है.

इस की तेजी से वृद्धि करने की विशेषता के कारण मछलीपालकों और ग्राहकों में इस की काफी मांग है. यह प्रकृति में सर्वआहारी है. स्थानीय किसानों और यहां तक कि इंटरनैशनल मार्केट में इस की रोगरोधक गुणवत्ता के कारण इस की मांग बढ़ती जा रही है.

यह प्रतिकूल परिस्थितियों में जिंदा रह सकती है और इस में प्राकृतिक भोजन खाने की अतुलनीय क्षमता होती है. इस की अच्छी तरह से देखरेख की जाए, तो बेचने के समय इस का भार 500-600 ग्राम होता है. मुख्यत: 20,000-25,000 मछलियां प्रति एकड़ क्षेत्र में पाली जा सकती हैं.

दुनियाभर में तकरीबन 85 देशों में इस का पालन किया जा रहा है और इन देशों में उत्पादित तकरीबन 98 फीसदी तिलापिया उस के मूल निवास के बाहर पाली जा रही है. साल 2020 में तिलापिया मछली जलीय कृषि का वैश्विक उत्पादन 6.0 मीटर टन था.

जलीय कृषि के लिए उपयुक्त प्रजातियां

तिलापिया मछली झील या तालाब के तल में निर्मित घोंसले में अंडों का संरक्षण कर उन्हें सेती है. तिलापिया की तकरीबन 70 प्रजातियां हैं, जिस में से 9 प्रजातियां दुनियाभर में जलीय कृषि में पाली जाती हैं.

तिलापिया मछली एक उष्णकटिबंधीय मत्स्य प्रजाति है, जो उथले पानी में रहना पसंद करती है. यह एक सर्वभक्षी मछली है, जो पादप प्लवक, पेरीफाईटौन, जलीय पौधों, छोटे व सूक्ष्म जीवों को खाती है. तालाबों में ये 5-6 महीने के समय में लैंगिक परिपक्वता तक पहुंच जाती हैं. जब जल का तापमान 24 डिगरी सैल्सियस पहुंच जाता है, तो ये अंडे देना शुरू कर देती हैं.

आश्चर्यजनक रूप से मादा मछली अंडों को अपने मुंह में सेती है और उस के बाद जब तक की जर्दी की थैली सूख नहीं जाती, तब तक बच्चों को सेती है. मादा की प्रजनन क्षमता उस के शरीर भार के अनुपात में होती है. एक 100 ग्राम की मादा हर ब्यांत में तकरीबन 100 अंडे देती है, जबकि 100-600 ग्राम भार की मादाएं 1000 से 1500 तक अंडे उत्पादित करती हैं. तिलापिया 10 सालों से ज्यादा जिंदा रह सकती है और 5 किलोग्राम से अधिक भार तक पहुंच सकती है.

तिलापिया की आजादी में मादाओं की तुलना में नर तेजी से और आकार में ज्यादा बढ़ते हैं. मादा मछली की पहचान उस के जननांगों (मूत्र जननांग) पैपिला की जांच कर की जाती है.

Fishजल आधारित पालन प्रणालियां

पिंजरा (केज) पालन: तिलापिया मछली का पालन पिंजरों में ज्यादा प्रजनन की समस्या से बचाता है, क्योंकि अंडे पिंजरे की जाली से गिर जाते हैं. दूसरा खास फायदा यह है कि पालकों के लिए जहां पिंजरे रखे जाने होते हैं, वह जल निकाय खुद का होना होता नहीं है.

पिंजरों को जाल या बांस से या फिर स्थानीय स्तर पर उपलब्ध अन्य सामग्री से बनाया जा सकता है. मछली अपना अधिकांश पोषण चारों ओर के जल से लेती हैं, तथापि उन्हें परिपूरक आहार भी खिलाया जाता है. खासतौर पर पालन की मत्स्य बीज संग्रहण दर अधिकतम 10 किलोग्राम प्रति घनमीटर रखी जाती है.

आजकल सघन पिंजरा पालन तकनीक में तकरीबन 25 किलोग्राम प्रति घनमीटर की संग्रहण दर भी लोकप्रिय हो रही है. औसत उत्पादन स्तर विभिन्न प्रणालियों और देशों में परिवर्तनशील होता है. सघन पिंजरा पालन में 100 से 305 किलोग्राम प्रति घनमीटर तिलापिया मछली का उत्पादन स्तर दर्ज किया गया है.

भूमि आधारित प्रणालियां

तालाब : तालाबों का फायदा यह होता है कि निशेचन के जरीए बहुत ही सस्ते में मछली को बड़ा किया जा सकता है. तिलापिया

मछली को पालने के लिए विभिन्न प्रकार के तालाबों का उपयोग किया जाता है. खास बात यह है कि इन्हें बड़े पैमाने पर निम्न लागत वाले तालाबों में पाला जाता है. इस प्रकार से कम उत्पादन के साथसाथ अनियंत्रित प्रजनन और अनियमित हार्वेस्टिंग की समस्याओं का काफी सामना करना पड़ता है.

इन का उत्पादन 500-2000 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हर साल होता है और मछली असामान्य आकार की होती है. यदि मोनोसैक्स (एकल लिंग) मछली का स्टौक किया जाता है और नियमित खाद व परिपूरक आहार दिया जाता है, तो उत्पादन 8000 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हर साल तक और एकसमान आकार की मछली प्राप्त की जा सकती है.

कई प्रदेशों में मीठे जल के तालाबों में, कृषि व पशुपालन के साथ एकीकृत रूप से तिलापिया का दूसरी देशी मछलियों के साथ पालन भी किया जा रहा है.

टैंक में तिलापिया मछली : टैंक में तिलापिया अत्यधिक प्रजनन की समस्याओं से बचाता है, क्योंकि नर के पास अपना अलग क्षेत्र बसाने के लिए जगह नहीं होती है.

इस प्रकार के टैंक में गुरुत्वीय प्रवाह या पंप के माध्यम से निरंतर जल की आपूर्ति की जाती है. प्राय: टैंक में अधिकतम स्टौकिंग दर (जहां जल प्रत्येक 1-2 घंटे में बदला जाता है), तकरीबन 25-50 किलोग्राम/मीटर के आसपास रखी जाती है.

मछलीपालन : खुद का बिजनैस

भारत जैसे देश में खेतीकिसानी के साथ अनेक काम ऐसे हैं, जिन्हें खेती के साथ ही गिना जाता है. इस तरह के कामों को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार समयसमय पर कई योजनाएं चलाती है, ताकि किसानों को फायदा मिल सके. मछलीपालन भी एक ऐसा ही कारोबार है, जिस में सरकारी मदद भी मिलती है.

ऐसे में यदि किसान के पास अपने खेत के तराई वाले हिस्से में मछलीपालन करने की संभावना है, तो वह केंद्र सरकार की ओर से चलाई जा रही प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना का लाभ ले सकता है.

इस योजना के तहत किसानों और मछुआरों को 60 फीसदी तक सब्सिडी या 2 लाख रुपए तक की छूट दी जा रही है. साथ ही, किसानों व मछुआरों के लिए लोन लेने की भी सुविधा दी गई है.

इस योजना के तहत सवा एकड़ यानी 0.5 हेक्टेयर में मछलीपालन का तालाब बनाने के लिए 3.5 लाख रुपए की लागत प्रावधानित है, जिस में सामान्य किसानों को लागत का 40 फीसदी अर्थात 1.40 लाख रुपए एवं महिला और एससी/एसटी किसानों को लागत का 60 फीसदी अर्थात 2.10 लाख रुपए का अनुदान है.

क्या है मत्स्य संपदा योजना

यह मछलीपालन का रोजगार है. इस काम को शुरू करने के लिए किसान क्रेडिट कार्ड और नाबार्ड की मदद से किसानों को बैंक ऋण, मछलीपालन के लिए ट्रेनिंग और सब्सिडी दी जाती है. केसीसी कार्ड रखने वाले किसानों को बिना गारंटी के 2 लाख रुपए तक का कर्ज लेने की सुविधा दी जाती है, जिस पर सिर्फ 7 फीसदी की दर से ब्याज देना होगा.

इस के अलावा बैंक ऋण को यदि समय से पहले भुगतान कर दिया जाता है, तो ब्याज पर 3 फीसदी की अतिरिक्त छूट भी मिल जाती है.

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना मछलीपालन पर आधारित एक विकास योजना है, जिसे आत्मनिर्भर भारत पैकेज के तहत वित्त वर्ष 2024-25 तक सभी राज्यों में लागू किया जाना है. इस योजना पर 20,050 करोड़ रुपए का निवेश किया जाएगा. यह निवेश मत्स्य क्षेत्र में होने वाला अभी तक का सब से अधिक निवेश है.

योजना का लाभ लेने के लिए ऐसे करें आवेदन

* इस योजना के लिए वैबसाइट https://pmmsy.dof.gov.in/ पर आवेदन कर सकते हैं.

* ऋण सुविधा का लाभ उठाने के लिए नजदीकी सहकारी बैंक में फार्म भरें, जिस के बाद नाबार्ड सब्सिडी योजना के तहत ऋण स्वीकृत किया जाएगा.

* इस योजना के तहत राजस्थान में रहने वाले किसानों को शून्य ब्याज पर ऋण दिया जा रहा है, जिस से किसानों, पशुपालकों और मछलीपालकों की जरूरतों को पूरा किया जा सके.

* अधिक जानकारी के लिए नजदीकी कृषि विभाग कार्यालय से भी संपर्क कर सकते हैं.

ये जरूर ध्यान रखें कि मछली पालने से पहले उस की जानकारी जरूर होनी चाहिए. जैसे, मछली बीज कहां से मिलेगा  कब क्या किस मात्रा में उन्हें आहार खिलाना है  वगैरह.

रोजगार के रूप में समुद्री सजावटी मछली उत्पादन

विझिंजम : मत्स्यपालन विभाग के सचिव डा. अभिलक्ष लिखी ने आईसीएआर-सीएमएफआरआई-विझिंजम क्षेत्रीय केंद्र का दौरा किया. उन्होंने तिरुवनंतपुरम में समुद्री मछली हैचरी का भी दौरा किया और वहां वैज्ञानिकों और मछली किसानों के साथ बातचीत की. उन्होंने नैशनल ब्रूड बैंक औफ सिल्वर पोम्पानो, समुद्री सजावटी और लाइव फीड कल्चर यूनिट और बाइवाल्व हैचरी का दौरा किया. डा. अभिलक्ष लिखी ने सागरिका समुद्री अनुसंधान मछलीघर का भी दौरा किया.

उन्होंने वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं द्वारा किए जा रहे कार्यों की सराहना की. उन्होंने मसल्स हैचरी के तटीय जल में स्थायी उत्पादन के प्रस्ताव पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस महत्वपूर्ण काम को शुरू किया जाना है.

Fishingउन्होंने आगे कहा कि समुद्र में हैचरी उत्पादित सीप के अवशेषों की समुद्री खेती के माध्यम से मोती सीपों के प्राकृतिक आवासों को बचाने और संवर्धित करने से संसाधन संरक्षण और आर्थिक स्थायित्व के बीच संतुलन बनाने में मदद मिलेगी.

उन्होंने यह भी कहा कि इस पहल से मसल्स और सीपों के प्राकृतिक आवास के फिर से जीवंत होने की उम्मीद है, जो अंततः कई मछुआरा परिवारों की आजीविका में सहयोग करेगा.

सजावटी मछली हैचरी का भी दौरा

सचिव ने सागरिका समुद्री अनुसंधान मछलीघर और सजावटी मछली हैचरी का भी दौरा किया और वहां सजावटी प्रजातियों की क्षमता जानने को उत्सुक थे.

डा. अभिलक्ष लिखी ने आजीविका के विकल्प के रूप में सजावटी मछली के महत्त्व पर प्रकाश डाला और मछली किसानों और उद्यमियों को प्रशिक्षण दे कर सजावटी मछलीपालन तकनीक को लोकप्रिय बनाने के सीएमएफआरआई के प्रयासों पर का भी उल्लेख किया.

उन्होंने मछली किसानों और उद्यमियों के साथ बातचीत की और उन्हें सजावटी मछली उत्पादन इकाइयों में पालने के लिए सजावटी मछली के बीज भी वितरित किए.

मछली बीज उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए ‘लाइव फीड हब’

मत्स्य खेती को पिंजरे में मछलीपालन सहित मछुआरा समुदाय की आजीविका के लिए परिवर्तनकारी श्रोत मानते हुए डीओएफ सचिव ने उल्लेख किया कि सीएमएफआरआई की ‘लाइव फीड हब’ की अवधारणा देशभर में समुद्री फिनफिश और शेलफिश हैचरी के लिए लाइव फीड सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण समाधान है.

Fishingउन्होंने जोर देते हुए कहा कि खाद्य मछलियों और सजावटी मछलियों की खेती में हैचरी बीज एक महत्वपूर्ण बाधा है, जैसे कि कोपपोड्स जैसे लाइव फीड लार्वा के जिंदा रहने के लिए आवश्यक हैं और इस का उपयोग विभिन्न प्रकार की मछली के लार्वा को खिलाने के लिए किया जा सकता है.

डा. अभिलक्ष लिखी ने कई महत्वपूर्ण प्रजातियों की स्टाक संस्कृति को विकसित करने के लिए सीएमएफआरआई के प्रयासों की सराहना की. आईसीएआर-सीएमएफआरआई, विझिंजम केंद्र, जिस में लाइव फीड का सब से बड़ा भंडार है और जो मछली और शेलफिश हैचरी संचालन की उत्पादकता और देश में मछली बीज उत्पादन की दक्षता बढ़ाने के लिए लाइव फीड के मुख्य स्रोत के रूप में कार्य कर सकता है.

सचिव ने किसानों, सागरमित्रों के साथ बातचीत की और उन की स्थिति के बारे में जानकारी लेते हुए धैर्यपूर्वक उन की शिकायतों को सुना.

डीओएफ के सचिव तटीय समुदायों की आय और आजीविका को बढ़ाने और मत्स्यपालन क्षेत्र में अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देने वाली महत्वपूर्ण योजनाओं का समर्थन करने के लिए आईसीएआर-सीएमएफआरआई के साथ सहयोग करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

Fishingसीएमएफआरआई के निदेशक डा. ए. गोपालकृष्णन और आईसीएआर-सीएमएफआरआई, क्षेत्रीय केंद्र विझिंजम, के प्रधान वैज्ञानिक और प्रमुख, डा. बी. संतोष ने केंद्रीय सचिव को वहां की गतिविधियों की अवस्थिति की जानकारी दी. अपनी यात्रा के बाद डीओएफ के सचिव ने आईसीएआर-सीएमएफआरआई, विझिंजम क्षेत्रीय केंद्र में किसानों, वैज्ञानिकों, कर्मचारियों, अधिकारियों और मीडियाकर्मियों को संबोधित किया.

केंद्र सरकार देश के तटीय जल क्षेत्र में बीज उत्पादन और बिवाल्व्स-मोसेल (द्विकपाटीय-सीप), खाद्य सीप एवं मोती सीप के विकास पर गंभीरता से विचार कर रही है.

छोटे पैमाने पर मछली चारा मिल स्थापित करने के लिए पहल

चेन्नई : 19 जुलाई, 2023. भाकृअनुप-केंद्रीय खारा जल जीवपालन संस्थान (सीबा), चेन्नई ने लघु कृषि आधारित चारा मिल स्थापित करने के लिए महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के एक उद्यमी राजू भोगिल के साथ एक रणनीतिक साझेदारी की. जलीय कृषि का विविधीकरण सामान्य रूप से भारत में और विशेष रूप से महाराष्ट्र में काफी गति पकड़ रहा है. महाराष्ट्र में अंतर्देशीय और खारे पानी में फिन फिश की विभिन्न प्रजातियों को पालने का प्रयास किया जा रहा है. जलीय कृषि के बड़े पैमाने पर प्रसार के लिए प्रमुख बाधा, लागत प्रभावी और गुणवत्ता वाले फीड की उपलब्धता है, क्योंकि तैयार फीड पूरी तरह से पूर्वी तट से ले जाया जाता है. देश में जलीय कृषि को बढ़ावा देने के प्रयास में सीबा ने विभिन्न प्रजातियों के लिए स्वदेशी रूप से विकसित तैयार फीड के उत्पादन के लिए राज्य सरकार/निजी उद्यमियों के साथ समझौता ज्ञापनों की एक श्रृंखला में प्रवेश किया है. इस संदर्भ में वर्तमान पहल भाकृअनुप-सीबा, मुख्यालय, चेन्नई में एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर कर के उस राज्य में खेती की गई प्रजातियों के लिए उपयोग किए जाने वाले स्वदेशी तैयार किए गए. कार्यात्मक और ग्रोआउट फीड को संसाधित करने के लिए एक फार्म आधारित लघुस्तरीय फीड मिल स्थापित करना है.

Fish Food
Fish Food

 

 

 

 

 

डा. केके लाल, निदेशक, भाकृअनुप-सीबा ने उत्पादन की लागत के साथसाथ फीड की गुणवत्ता के बारे में जानकारी दी. इस के अलावा उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह कृषि आधारित फीड मिल पहल महाराष्ट्र राज्य में अपनी तरह की पहली पहल है और इस क्षेत्र में जलजीव पालने वाले किसानों के लिए एक वरदान होगी.स्टार्टअप उद्यमी भोगिल ने कहा कि राज्य में जलीय कृषि में उपयोग के लिए गुणवत्तापूर्ण फीड की काफी मांग है और इस पहल से छोटे और मध्यम किसानों को मदद मिलेगी.

बनना है लखपति तो करें उन्नत प्रजातियों की मछली का पालन

देश की बढ़ती आबादी और घटती खेती की जमीनें खाद्यान्न संकट बढ़ाने की ओर अग्रसर है. ऐसे में बेरोजगारी व भुखमरी दोनों के बढ़ने के आसार हैं. इस स्थिति में मत्स्यपालन का व्यवसाय न केवल रोजगार का अच्छा साधन साबित होता है, बल्कि खाद्यान्न समस्या के एक विकल्प के तौर पर भी अच्छा साबित हो सकता है.

देश में दिनोंदिन मछली खाने वालों की संख्या में इजाफा हो रहा है, इसलिए मछली की मांग में तेजी से उछाल आया है. ऐसे में अगर बेरोजगार युवा और किसान मछलीपालन का व्यवसाय वैज्ञानिक तरीके से करें, तो न केवल कम लागत में अधिक मुनाफा कमा सकता है, बल्कि देश के एक छोटे से हिस्से का पेट भरने में अपना महत्वपूर्ण योगदान भी दे सकता है.

मछलीपालन के लिए मुफीद प्रजातियों व उस में अपनाई जाने वाली पालन विधि पर यहां रोशनी डाली जा रही है.

Fish

तालाब का चयन

मछलीपालन के इच्छुक लोगों को सब से पहले मछलीपालन के लिए तालाब का चयन करना पड़ता है, इस के लिए ग्राम पंचायतों, नगरपालिकाओं द्वारा संरक्षित तालाबों को पट्टे पर ले कर पालन शुरू किया जा सकता है और दूसरा, जिन के पास एक बीघा से 2 हेक्टेयर तक जमीन उपलब्ध है. वह तालाब की खुदाई करवा कर मछलीपालन का व्यवसाय शुरू कर सकते हैं.

तालाब का चयन करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि तालाब में वर्षभर 1-2 मीटर पानी जरूर भरा रहे. इस के लिए तालाब में जलापूर्ति का साधन अवश्य रखना चाहिए.

तालाब में मछली के बच्चे डालने से पूर्व यह सुनिश्चित कर लेना जरूरी होता है कि तालाब बाढ़ प्रभावित न हो और न ही उस के किनारे के बंधे कटेफटे हो.

मछलीपालन के पूर्व यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि तालाब का समतलीकरण हो चुका हो. इस के अलावा तालाब में पानी आनेजाने के स्थान पर जाली लगी हो, जिस से मछलियां व जलीय जीवजंतु तालाब में न आने पाए. तालाब के सुधार का कार्य जून महीने में पूरा कर लेना चाहिए.

तालाब की सफाई

मछलीपालन करने के पूर्व ही तालाब की सफाई सुनश्चित कर लेना होना होता है. इस में जलकुंभी, लेमना, अजोला, पिस्टिया, कमल, हाईड्रिला या नजाज को तालाब से निकाल कर विरलीकरण कर लेना चाहिए, क्योंकि यह पौधे तालाब का अधिकांश भाग घेरे रहते हैं, जिस से मछलियों की वृद्धि प्रभावित होती है.

इस बात का जरूर ध्यान दें कि तालाब में खरपतवार नियंत्रण के लिए रसायन का प्रयोग न किया जाए, क्योंकि इस से पानी विषैला हो कर मछलियों के लिए घातक साबित हो सकता है.

तालाब से अवांछनीय मछलियों की सफाई भी आवश्यक होती है. यह अवांछनीय मछलियां उन्नतशील मछलियों की वृद्धि को प्रभावित करती है. इस के लिए मत्स्य बीज को तालाब में छोड़ने से पहले तालाब में महुए की खली डाल देना चाहिए, जिस के प्रभाव से पढ़िन, मांगुर, सौर, सिंधि जैसी मछलियां मर कर ऊपर आ जाती हैं, जिन्हें जाल से छान कर बाहर निकाल देना उपयुक्त होता है. इस के 15 से 20 दिन बाद ही तालाब में मत्स्य बीज का छोड़ा जाना उपयुक्त होता है, क्योंकि तब तक तालाब से महुए की खली के विष का प्रभाव समाप्त हो जाता है.

मछलियों के उच्चतम बढ़वार के लिए मत्स्यपालन विभाग की प्रयोगशालाओं में तालाब की मिट्टी का परीक्षण अवश्य कराएं, जिस से तालाब में निर्धारित मात्रा में कार्बनिक व रासायनिक खादों के उपयोग का निर्धारण किया जा सके.

Fish

चूना एवं उर्वरक का प्रयोग

मछलीपालन वाले तालाब में चूने का प्रयोग जल का क्षारीयता में बढ़ोतरी करता है और अम्लीयता को संतुलित करता है. चूना तालाब में मछलियों को दूसरे जलीय जीव से भी सुरक्षित करता है. इस के लिए 250 किलोग्राम बुझा हुआ चूना प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए. तालाब में कार्बनिक संतुलन के लिए 10 टन गोबर प्रति हेक्टेयर की दर से एक वर्ष में प्रयोग करें. यह मात्रा 10 माह की समान मासिक किस्तों में हो. गोबर की खाद डालने के 15 दिन बाद रासायनिक खादों का प्रयोग करना चाहिए, जिस में यूरिया 200 किलोग्राम, सिंगिल सुपर फास्फेट 250 किलोग्राम व पोटाश 40 किलोग्राम प्रति हेक्टयर होना चाहिए.

मछलियों की प्रजातियों का चयन

मछलीपालन के लिए कभी भी एक तालाब में अकेली एक प्रजाति की मछली का चयन नहीं करना चाहिए, बल्कि उच्च उत्पादकता 2 से 6 प्रजातियों का चयन करना चाहिए, जिस से इन की बढ़वार और उत्पादन अच्छी मात्रा में मिलता है.

कतला

यह भारतीय मछली, जिसे स्थानीय भाषा में भाकुर कहा जाता है जो बहुत तेजी से बढ़ती है. इस मछली में भोजन को मांस में बदलने में उच्च क्षमता पाई जाती है. इसलिए इस का बाजार भाव हमेशा अच्छा रहा है. यह मछली खाने वालों की पसंदीदा मछली मानी जाती है. इस मछली का सिर बड़ा होता है. इस के मूंछें नहीं होती हैं. यह जल के ऊपरी सतह पर तैरने वाले प्लवकों को भोजन के रूप में खाती है.

यह मछली ज्यादातर तालाब के भोजन को ग्रहण कर लेती है, लेकिन कृत्रिम भोजन भी इन्हें प्रिय होता है. इसलिए तालाब में कृत्रिम भोजन का छिड़काव भी किया जा सकता है.

कतला की वृद्धिदर बहुत तेज है. यह पहले वर्ष में ही 12-14 इंच की लंबाई में बढ़ती है. इस का वजन 1 किलोग्राम से ले कर 1.25 किलोग्राम तक होता है.

एक कतला मछली 1 वर्ष में 1-2 किलोग्राम तक के वजन पर 15 रुपए की लागत लेती है, जबकि इस का बाजार भाव 100 से 150 रुपए प्रति किलोग्राम होता है. इस प्रकार इस में 85 से 135 रुपया तक लाभ लिया जा सकता है.

सिल्वर कार्प

यह मछली मुख्यतः रूस एवं चीन में पाई जाती है. इस का पालन भारतीय किसानों के लिए अच्छी आमदनी का साधन बनी है.

सिल्वर कार्प लंबी व चपटे शरीर वाली मछली है. इस का सिर नुकीला व थूथन गोल होता है. यह मछलियां तालाब के सैवाल व सड़ेगले पदार्थों को खाती हैं. इन्हें अलग से मछलियों का चारा खिलाया जाना भी अच्छा होता है.

सिल्वर कार्प तालाब में बड़ी तेजी से बढ़ती है, जो 12 से 14 इंच तक की लंबाई में हो जाती है. एक वर्ष में इस का वजन 1.5 किलोग्राम से 1.8 किलोग्राम तक होता है, जिस में प्रति मछली मात्र 15 रुपए की लागत आती है.

रोहू

इस मछली का वैज्ञानिक नाम लेबियो रोहिता है. यह भारतीय प्रजाति की सब से तेज बढ़ने वाली प्रजातियों में गिनी जाती है. इस प्रजाति की मछलियां सभी प्रजाति में सब से स्वादिष्ठ मानी जाती है, इसलिए खाने वाले इसे सब से ज्यादा पंसद करते हैं.

यह मछली तालाब के अंदर के शैवाल जलीय पौधों की पत्तियों इत्यादि को खाती है. रोहू की वृद्धि दर कतला से थोड़ी कम है. यह अपने जीवनकाल में 3 फुट की लंबाई तक बढ़ सकती है, जिस का वजन एक किलोग्राम तक पाया जाता है.

उपरोक्त मछलियों का पालन सुनश्चित करने के लिए एक हेक्टेयर तालाब में 5,000 मत्स्य बीज या अंगुलिकाएं डालने की आवश्यकता पड़ती है.

मछलियों का पूरक आहार एवं वृद्धि का निरीक्षण

मछलियों की समुचित वृद्धि के लिए मूंगफली, सरसों या तिल की खरी को चावल के कन या गेहूं के चोकर के साथ बराबर मात्रा में मिला कर मछलियों के भार के 1 से 2 फीसदी की दर से देना चाहिए. अगर ग्रास कार्प मछली का पालन किया गया है, तो पानी की वनस्पतियों जैसे लेमना, हाइड्रिला, नाजाज, सिरेटो फाइलम या स्थलीय वनस्पतियों जैसे नेपियर , बरसीम या मक्के के पत्ते इत्यादि को जितना खाएं, उतनी मात्रा में प्रतिदिन देना चाहिए.

मछलियों के बीज तालाब में डालने के बाद प्रत्येक माह तालाब में जाल डाल कर उन के स्वास्थ्य व वृद्धि की जांच करते रहना चाहिए. अगर मछलियां परजीवी से प्रभावित हों, तो उन्हें पोटेशियम परमैगनेट यानी लाल दवा या नमक के घोल में डुबो कर तालाब में छोड़ें. मछलियों में लाल चकत्ते या घाव दिखाई दे तो अपने नजदीकी मत्स्य विभाग से जरूर संपर्क करें.

मछलियों की निकासी व बिक्री

मछलियों की उम्र जब 12-16 माह की हो जाए और उन का वजन 1-2 किलोग्राम हो, तो उन्हें तालाब से निकाल कर स्थानीय मंडी या बाजार में बेचा जा सकता है, जिस से मत्स्यपालक अच्छा लाभ कमा सकता है.

मात्स्यिकी महाविद्यालय के छात्र थाईलैंड में लेंगे प्रशिक्षण

उदयपुर : 11 जुलाई, 2023. महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के संघटक मात्स्यिकी महाविद्यालय के 2 छात्र मोनिका कुमावत बीएफएससी तृतीय वर्ष एवं अनिल सिंह शेखावत, बीएफएससी द्वितीय वर्ष भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम इंटरनेशनल डवलपमेंट प्रोग्राम, राष्ट्रीय कृषि उच्च शिक्षा परियोजना (आईडीपी/एनएएचईपी) के अंतर्गत 60 दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय प्रशिक्षण के लिए प्रिंस औफ सोंगकला कृषि उद्योग विश्वविद्यालय (पीएसयू), थाईलैंड गए हैं.
यह प्रशिक्षण 10 जुलाई से 10 सितंबर, 2023 तक आयोजित किया जाएगा.

यह प्रशिक्षण अंतर्राष्ट्रीय केंद्र पर समुद्री उत्पाद विज्ञान एवं खोज, प्रिंस औफ सोंगकला कृषि उद्योग विश्वविद्यालय, थाईलैंड में होगा.

परियोजना प्रभारी डा. पीके सिंह ने बताया कि इस प्रशिक्षण के दौरान ये विद्यार्थी मत्स्य प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन के अलावा मत्स्य विज्ञान के अन्य विषयों पर गहन प्रशिक्षण प्राप्त करेंगे, जिस से राजस्थान में उस का लाभ मिल सकेगा.

यहां यह बताना प्रासंगिक है कि छात्रा मोनिका कुमावत एक छोटे से गांव हिंगोनीया, जोबनेर की रहने वाली है, जबकि छात्र अनिल सिंह शेखावत गांव बनगोठड़ी कलां, झुंझुनूं के रहने वाले हैं.

मात्स्यिकी महाविद्यालय के अधिष्ठाता डा. बीके शर्मा ने बताया कि महाविद्यालय के छात्र अंतर्राष्ट्रीय प्रशिक्षण के लिए पहली बार गए हैं एवं प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद इन दोनों विद्यार्थियों से दूसरे छात्रों को भी इस तरह का प्रशिक्षण प्राप्त करने की जिज्ञासा बढ़ेगी एवं वे भी अपनी पढ़ाई के प्रति सजग रह कर अपने मातापिता, समाज, विश्वविद्यालय एवं गांव का नाम रोशन करेंगे. उन्होंने यह भी बताया कि उपरोक्त छात्रों का पूरा खर्च (आईडीपी/एनएएचईपी) के द्वारा वहन किया जाएगा.