करना होगा यह काम, तभी मिलेगी किसान सम्मान निधि की अगली किश्त

जयपुर: प्रमुख शासन सचिव, सहकारिता श्रेया गुहा ने कहा कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के लिए 15 जनवरी, 2024 तक पीएम किसान विशेष सेचुरेशन अभियान प्रारंभ किया गया है. इस अभियान के दौरान योजना के लाभ से वंचित पात्र किसानों को योजना से जोड़ने एवं योजना के बारे में जागरूकता बढ़ाई जाएगी.

श्रेया गुहा सोमवार को सहकार भवन में वीसी के माध्यम से योजना की जिलेवार अभियान की प्रगति की समीक्षा कर रही थीं. उन्होंने कहा कि सेचुरेशन अभियान के दौरान पंजीकृत किसानो के शेष रहे कार्यों यथा भूमि सत्यापन, बैंक खाते को आधार से जोड़ कर डीबीटी हेतु अनेबल कराना एवं ई-केवाईसी भी करवाई जा सकेगी.

प्रमुख शासन सचिव ने कहा कि सभी संबंधित जिला अधिकारी एक सप्ताह में ई-केवाईसी का अभियान जिले में चलाएं तथा किसानों को जागरूक करें. उन्होंने निर्देश दिए कि प्रदेश में लगभग 4.50 लाख स्वपंजीकरण कराने वाले किसानों का सत्यापन नहीं हुआ है, जिस में से 3 लाख, 92 हजार, 894 पंजीकरण तहसील स्तर पर तथा 56 हजार, 868 जिला स्तर पर लंबित हैं. उन्होंने आगे कहा कि चुनाव संबंधी कार्य समाप्त हो चुका है. अतः इस कार्य को तत्परता से पूर्ण करें.

उन्होंने आगे कहा कि प्रदेश में 66.92 लाख किसानों में से 61.61 लाख किसानों का भूमि सत्यापन एवं बैंक आधार सीडिंग हो चुका है तथा 49.93 लाख किसानों का ई-केवाईसी हो चुका है, जबकि 11.88 लाख किसानों का ई-केवाईसी एवं 5.30 लाख किसानों का बैंक आधार सीडिंग होना बाकी है. उन्होंने किसानों से भी आग्रह किया कि वे मोबाइल एप, ई-मित्र, आईबीपी के द्वारा ई-केवाईसी एवं बैंक आधार सीडिंग शीघ्र करवाएं, ताकि जनवरी माह में आगामी किश्त का लाभ मिल सके.

श्रेया गुहा ने कहा कि आने वाले समय में विकसित भारत संकल्प यात्रा राजस्थान में प्रत्येक ग्राम पंचायत पर पहुंचेगी. इस दौरान किसानों के पीएम किसान से जुड़े कार्यों को पूर्ण करने में सहयोग प्रदान करें. उन्होंने निर्देश दिए कि प्रत्येक ग्राम पंचायत स्तर पर नोड़ल अधिकारी बनाएं, ताकि किसानों को मदद मिल सके एवं उन के पीएम किसान से संबंधित स्टेटस का पता चल सके.

इस अवसर पर रजिस्ट्रार सहकारिता मेघराज सिंह रतनू, राज्य स्तरीय सहायक नोड़ल अधिकारी पीएम किसान संजय पाठक उपस्थित थे एवं जिलों से अतिरिक्त जिला कलक्टर एवं जिला नोड़ल अधिकारी वीसी से जुड़े हुए थे.

गेहूं स्टाक सीमा में संशोधन,  जमाखोरों पर जुर्माना

नई दिल्ली: भारत सरकार ने समग्र खाद्य सुरक्षा का प्रबंधन और जमाखोरी व बेईमान सट्टेबाजी को रोकने के लिए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए व्यापारियों और थोक विक्रेताओं, खुदरा विक्रेताओं, बड़े चेन रिटेलरों और प्रोसैसरों के लिए लागू गेहूं पर स्टाक सीमा लगा दी है. निर्दिष्ट खाद्य पदार्थों पर लाइसेंसिंग आवश्यकताओं, स्टाक सीमा और आवाजाही प्रतिबंधों को हटाने संबंधी (संशोधन) आदेश, 2023 12 जून, 2023 को जारी किया गया था और सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 31 मार्च, 2024 तक लागू था.

केंद्र सरकार ने गेहूं की कीमतों को नियंत्रित करने के अपने निरंतर प्रयासों के अंतर्गत संस्थाओं के संबंध में गेहूं स्टाक सीमा को संशोधित करने का निर्णय लिया है:

सभी गेहूं स्टाकिंग संस्थाओं को गेहूं स्टाक सीमा पोर्टल पर पंजीकरण करना और प्रत्येक शुक्रवार को स्टाक स्थिति अपडेट करना आवश्यक है. कोई भी संस्था जो पोर्टल पर पंजीकृत नहीं पाई गई या स्टाक सीमा का उल्लंघन करती है, आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 6 और 7 के अंतर्गत उचित दंडात्मक कार्यवाही के अधीन होगी.

यदि उपरोक्त संस्थाओं द्वारा रखे गए स्टाक उपरोक्त निर्धारित सीमा से अधिक हैं, तो उन्हें अधिसूचना जारी होने के 30 दिनों के भीतर इसे निर्धारित स्टाक सीमा में लाना होगा. केंद्र और राज्य सरकारों के अधिकारी इन स्टाक सीमाओं के कार्यान्वयन की निकटता से निगरानी करेंगे, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि देश में गेहूं की कोई बनावटी कमी पैदा न हो.

इस के अलावा सरकार ने ओपन मार्केट सेल स्कीम (घरेलू) यानी ओएमएसएस (डी), के अंतर्गत अनेक कदम उठाए हैं. 101.5 लाख मीट्रिक टन गेहूं 2,150 रुपए प्रति क्विंटल की रियायती दर पर एफसीआई द्वारा साप्ताहिक ईनीलामी के माध्यम से घरेलू खुले बाजार में कैलिब्रेटेड रिलीज के लिए आवंटित किया गया है. आवश्यकता के आधार पर जनवरी से मार्च, 2024 के दौरान ओएमएसएस के तहत अतिरिक्त 25 एलएमटी को बेचा जा सकता है. अब तक एफसीआई ने साप्ताहिक ईनीलामी के माध्यम से प्रोसैसरों को 44.65 लाख मीट्रिक टन गेहूं बेचा है और इस से खुले बाजार में सस्ती कीमतों पर गेहूं की उपलब्धता बढ़ गई है, जिस से देशभर में आम उपभोक्ताओं को लाभ हुआ है.

खुले बाजार में आपूर्ति बढ़ाने के एक और कदम के रूप में एफसीआई द्वारा ईनीलामी के माध्यम से पेश की जाने वाली साप्ताहिक मात्रा को तत्काल प्रभाव से 3 लाख मीट्रिक टन से 4 लाख मीट्रिक टन तक बढ़ाने का निर्णय लिया गया है. इस से खुले बाजार में गेहूं की उपलब्धता में और वृद्धि होगी.

एफसीआई नेफेड, एनसीसीएफ और केंद्रीय भंडार जैसे केंद्रीय सहकारी संगठनों को आटा प्रसंस्करण और उन के फिजीकल व मोबाइल आउटलेट के माध्यम से ‘भारत आटा‘ ब्रांड के तहत बिक्री के लिए 27.50 रुपए प्रति किलोग्राम की किफायती कीमत पर आटा प्रोसैसिंग के लिए गेहूं जारी कर रहा है. उन क्षेत्रों की पहचान की गई है, जहां कीमतें अधिक हैं और एजेंसियां इन क्षेत्रों में लक्षित बिक्री कर रही हैं.

भारत आटे के लिए आपूर्ति की जाने वाली गेहूं की मात्रा को जनवरी, 2024 के अंत तक 2.5 लाख मीट्रिक टन से बढ़ा कर 4 लाख मीट्रिक टन किया जा रहा है. पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए नेफेड व एनसीसीएफ और केंद्रीय भंडार को आवंटन की समयसमय पर समीक्षा की जा रही है.

खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग कीमतों को नियंत्रित करने और देश में सहज उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए गेहूं के स्टाक की स्थिति पर कड़ी नजर रख रहा है.

नैनो उर्वरक पेश करने वाला भारत पहला देश

नई दिल्ली: भारतीय उर्वरक क्षेत्र ने हमारे 14 करोड़ किसान परिवारों को समय पर उर्वरक प्रदान कर के कृषि संबंधी सेवाएं दे कर और एक मजबूत शक्ति के रूप में उभर कर सहायता प्रदान करने के दोहरे उद्देश्यों को प्राप्त किया है. इस प्रकार भारतीय उर्वरक क्षेत्र वैश्विक बाजार को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है.

यह बात केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डा. मनसुख मांडविया ने नई दिल्ली में भारतीय उर्वरक संघ के 59वें वार्षिक सेमिनार 2023 के उद्घाटन भाषण के दौरान कही. संगोष्ठी का विषय ‘‘उर्वरक और कृषि क्षेत्रों में नवाचार‘‘ था. उन्होंने उर्वरक क्षेत्र में केंद्र सरकार द्वारा किए गए प्रयासों पर प्रकाश डाला.

केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्री डा. मनसुख मांडविया ने कहा, “सरकार छोटे और सीमांत किसानों के लिए अपनी सहायता बढ़ा रही है, उन के कल्याण को प्राथमिकता दे रही है और इस तरह देश के खाद्य सुरक्षा लक्ष्यों को पूरा कर रही है.

भारत सरकार ने पिछले 2-3 वर्षों के दौरान, वैश्विक स्तर पर वस्तुओं की ऊंची कीमतों के प्रभाव को हावी नहीं होने दिया है और स्थिर अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) पर उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित की है. इस के परिणामस्वरूप वैश्विक स्तर पर खपत में गिरावट की तुलना में इन वर्षों के दौरान उर्वरक की खपत स्थिर रही और रिकौर्ड कृषि उत्पादन हुआ.

उन्होंने आगे यह भी कहा कि घरेलू उत्पादन को मजबूत करने और लीकेज और डायवर्जन को रोकने के लिए सरकार द्वारा कई सक्रिय उपाय किए गए हैं, जिन के संयुक्त प्रयासों से रिकौर्ड उत्पादकता प्राप्त हुई है.

 

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मंत्री डा. मनसुख मांडविया ने सरकार द्वारा आत्मनिर्भरता की दिशा में किए गए प्रयासों के बारे में कहा, “3 मिलियन टन से अधिक यूरिया क्षमता को पुनर्जीवित किया गया है और अगले कुछ वर्षों में अतिरिक्त क्षमता के चालू होने की आशा है.”

उन्होंने जोर दे कर कहा कि सरकार फास्फेटिक और पोटाशिक क्षेत्रों में कच्चे माल की सुरक्षा की दिशा में काम कर रही है और भारतीय कंपनियों को विदेशी उद्यमों, दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी और खनन में भागीदारी के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. उन्होंने एकीकृत फसल प्रबंधन को प्रोत्साहन प्रदान करने, संतुलित पोषण के माध्यम से मिट्टी की सेहत में सुधार करने, तकनीकी रूप से बेहतर उत्पाद विकसित करने और टिकाऊ कृषि प्रणालियों को प्रोत्साहन प्रदान करने के लिए प्रयोगशालाओं से किसानों के खेत तक प्रौद्योगिकी पहुंचाने पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता पर भी बल दिया.

डा. मनसुख मांडविया ने बताया कि पीएम प्रणाम पहल के अंतर्गत उर्वरकों के टिकाऊ और संतुलित उपयोग को प्रोत्साहन देने, वैकल्पिक उर्वरकों को अपनाने, जैविक खेती को बढ़ावा देने और संसाधन संरक्षण प्रौद्योगिकियों को लागू कर के धरती की सेहत को बचाने के लिए एक जनआंदोलन शुरू हो गया है.
केंद्रीय मंत्री डा. मनसुख मांडविया ने कृषि क्षेत्र में भारत द्वारा किए गए हालिया तकनीकी हस्तक्षेपों पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय अनुसंधान ईकोसिस्टम के माध्यम से नैनो डीएपी और नैनो यूरिया जैसे नैनो उर्वरकों को पेश करने वाला भारत पहला देश है.

उन्होंने कहा, ‘‘यह दुनिया में अपनी तरह की अनूठी तकनीक में से एक है और पृथ्वी पर पोषक तत्व अनुप्रयोग प्रथाओं में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है.‘‘

उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू की गई ‘‘नमो ड्रोन दीदी‘‘ योजना, ड्रोन छिड़काव सेवाओं को किफायती कीमतों पर किसानों को उपलब्ध कराएगी. भारतीय उद्योगों को धीमी गति से निकलने वाले, लेपित और तरल उर्वरकों जैसे स्मार्ट पोषक तत्वों को बढ़ाने और विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया, जो पोषक तत्वों के उपयोग की दक्षता में सुधार कर सकते हैं.

उन्होंने बताया कि सरकार लागत प्रभावी समाधान विकसित करने और प्रौद्योगिकी पहुंच में सुधार करने के लिए ड्रोन निर्माताओं, सेवा प्रदाताओं और कृषि कंपनियों के साथ मिल कर काम कर रही है. उन्होंने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि केंद्र सरकार ने तकरीबन 2 लाख मौडल रिटेल आउटलेट स्थापित किए हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री किसान समृद्धि केंद्र के नाम से जाना जाता है, जो सभी कृषि गतिविधियों के लिए वन स्टाप शाप के रूप में काम कर रहे हैं.

मंत्री डा. मनसुख मांडविया ने उर्वरक बिरादरी से उर्वरक निर्माण के हरित तरीकों की ओर बढ़ने और वैश्विक खाद्य संकट को कम करने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उचित रूप से संलग्न होने का आग्रह करते हुए अपने भाषण का समापन किया. उन्होंने किसानों, सरकार और उद्योग के बीच संचार और समन्वय को और मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार के समर्थन का आश्वासन दिया.

 

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समारोह के दौरान कंपनियों, वैज्ञानिकों और दूसरे व्यक्तियों को सूक्ष्म पोषक तत्वों, जैव उर्वरकों आदि के उत्पादन, पर्यावरण प्रदर्शन, सुरक्षा, विपणन और प्रचार में उत्कृष्टता को मान्यता देने और अनुसंधान और विकास में उन के योगदान के लिए विभिन्न पुरस्कार वितरित किए गए. इस अवसर पर भारतीय उर्वरक संघ द्वारा प्रकाशित 3 प्रकाशनों, अर्थात फर्टिलाइजर (अकार्बनिक, जैविक या मिश्रित) (नियंत्रण) आदेश, 1985 व उर्वरक सांख्यिकी 2022-23 और विशेष उर्वरक और सूक्ष्म पोषक सांख्यिकी 2022-23 को भी जारी किया गया.

केंद्रीय मंत्री डा. मनसुख मांडविया ने एक प्रदर्शनी का भी उद्घाटन किया, जहां भारत और विदेश के कुल 56 प्रदर्शकों ने उर्वरक और कृषि क्षेत्रों को प्रदान किए गए अपने उत्पादों और सेवाओं का प्रदर्शन किया.

फसल को पाले से बचाएं

सर्दियों में पाले का असर पौधों पर सब से ज्यादा होता है. यही वजह है कि सर्दी में उगाई जाने वाली फसलों को आमतौर पर 80 फीसदी तक का नुकसान हो जाता है, इसलिए समय रहते फसलों का पाले से बचाव करना बेहद जरूरी हो जाता है.

सर्दियों में जब तापमान 0 डिगरी सैल्सियस से नीचे गिर जाता है और हवा रुक जाती है तो रात में पाला पड़ने की आशंका ज्यादा रहती है. वैसे, आमतौर पर पाला पड़ने का अनुमान वातावरण से लगाया जा सकता है.

सर्दियों में जिस रोज दोपहर से पहले ठंडी हवा चलती रहे, हवा का तापमान जमाव बिंदु से नीचे गिर जाए, दोपहर बाद अचानक ठंडी हवा चलनी बंद हो जाए और आसमान साफ रहे या उस दिन आधी रात से हवा रुक जाए तो पाला पड़ सकता है. रात को खासकर तीसरेचौथे पहर में पाला पड़ने की आशंका ज्यादा रहती है.

अध्ययनों से पता चला है कि साधारण तापमान चाहे कितना भी गिर जाए, लेकिन शीत लहर चलती रहे तो फसलों को कोई नुकसान नहीं होता है. पर अगर हवा चलना बंद हो जाए और आसमान साफ हो तो पाला जरूर पड़ेगा जो रबी सीजन की फसलों के लिए ज्यादा नुकसानदायक है.

खेतों में पाला पड़ने से होने वाले बुरे नतीजे जो इस तरह है :

* पौधे की पत्तियों और फूलों का झुलसना.

* पौधे की बंध्यता.

* फलियों और बालियों में दानों का बनना.

* बने हुए दानों के आकार में कमी.

* पराग कोष के विकास का ठहराव.

* प्लाज्मा झिल्ली की संरचना में यांत्रिक नुकसान.

* पौधों का मरना या गंभीर नुकसान.

* उपज और उत्पाद की क्वालिटी में कमी.

पाले से संरक्षण के कारगर उपाय

आमतौर पर पाले से नुकसान हुए पौधों का संरक्षण प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष दोनों माध्यमों से किया जा सकता है. जब अंकुरण की परिस्थिति हो तब सक्रिय विधियों का उपयोग पाले के अंकुरण की परिस्थिति पैदा होने से पहले किया जाता है जिस के लिए निष्क्रय व सक्रिय विधियों का उपयोग किया जा सकता है.

निष्क्रय विधियां

जगह का चुनना : पाले के प्रति संवेदनशील फसलें उगाने के लिए ऐसी जगह चुनी जानी चाहिए जो पाले के लिए जमाव मुक्त हो. बडे़ जलाशयों के पास की जगह आमतौर पर पाले से कम प्रभावित होती है, क्योंकि पानी के ऊपर की हवा जमीन के ऊपर की हवा की तुलना में तेजी से ठंडी होती है.

ठीक से लगे वायुरोधी पेड़ जलवायु को पौधों के अनुकूल बना देते हैं. इन के चलते फसल समय से पहले ही पक जाती है और पाले का जोखिम कम हो जाता है.

Winter Farmingफसल प्रबंधन : फसलों की ऐसी प्रजातियों और किस्मों को चुना जाना चाहिए जो कि पाले से पहले ही पक कर तैयार हो जाए. जैसे, जब संकर मक्का बोया जाता है तो वह पाला पड़ने से पहले ही पक कर तैयार हो जाता है.

मिट्टी प्रबंधन : मिट्टी की अवस्था फसल के ऊपरी और निचले भागों को पाले से बचाने के लिए एक उत्तरदायी कारक है. ढीली मिट्टी की सतह ताप के चालन में कमी करती है, इसलिए रात के समय ढीली मिट्टी की सतह का तापमान जमी हुई मिट्टी की अपेक्षा कम होता है.

यही वजह है कि  पाले से बचाव के लिए मिट्टी को जोतना नहीं चाहिए. जरूरत से ज्यादा गीली मिट्टी होने पर सूरज की ऊर्जा का अधिकतम भाग नमी वाष्पन में चला जाता है. ऐसी स्थिति में रात में फसल के लिए गरमी कम मिल पाती है.

दूसरी ओर जरूरत से ज्यादा सूखी मिट्टी भी ताप की कम चालक होती है. इस की वजह से ऊर्जा की कम मात्रा को ही संचित कर पाती है. ऐसी स्थिति में सर्दियों की फसलों को पाले का बुरा नतीजा भुगतना पड़ सकता है.

फसल बोआई और कटाई : पाला संवेदनशील फसलों को पाले की जमाव मुक्त अवधि में ही बोना चाहिए ताकि फसल को पाले से होने वाले नुकसान से बचाया जा सके. इस प्रक्रिया को अपनाने से फसल अपेक्षाकृत कम जोखिम अवधि के दौरान अपना जीवनकाल पूरा करती है.

सक्रिय विधियां

फसल के नीचे आवरण : इस विधि का प्रमुख मकसद सतह से ताप की क्षति को कम करना होता है. इस विधि में उपयोग किए जाने वाले आवरण कई तरह के हो सकते हैं. जैसे, भूसे का आवरण, प्लास्टिक का आवरण, काला सफेद चूर्ण का आवरण वगैरह.

* भूसे का आवरण रात में गरमी को जमीन से बाहर जाने से रोकता है, जिस की वजह से फसल के तापमान में कमी आ जाती है.

* पारदर्शी प्लास्टिक 85-95 फीसदी तक सूरज की विकिरणों को संचित कर उन्हें जमीन तक पहुंचा सकती है. उन्हें वापस वातावरण में जाने नहीं देती और इस तरह जमीन के तापमान में बढ़वार होती है. यह पाले से सुरक्षा के नजरिए से बहुत ही महत्त्वपूर्ण है. इस के उलट काली प्लास्टिक सूरज की विकिरणों को अवशोषित करती है. इस वजह से जमीन के कारण तापमान में बढ़ोतरी हो जाती है.

* काला चूर्ण सूरज की विकिरणों को दिन के समय अवशोषित करता है और रात में उत्सर्जित. नतीजतन, रात के समय जमीन के तापमान में बढ़ोतरी होती है जो पाले से पाले की सुरक्षा की नजर से बेहद महत्त्वपूर्ण है. इस के उलट सफेद चूर्ण सूरज की विकिरणों को परावर्तित कर देता है और उन्हें जमीन तक पहुंचने ही नहीं देता.

छिड़काव द्वारा सिंचाई

जब पाला पड़ने की आशंका हो तब खेत की सिंचाई करनी चाहिए क्योंकि नमी वाली जमीन में काफी देर तक गरमी सुरक्षित रहती है क्योंकि जब पानी बर्फ में जम जाता है तो प्रक्रिया में ऊर्जा का उत्सर्जन होता है जो 80 कैलोरी प्रति ग्राम के बराबर होता है. इस वजह से मिट्टी के तापमान में बढ़वार होती है.

इस तरह पर्याप्त नमी होने पर शीत लहर व पाले से नुकसान की आशंका कम रहती है. सर्दी में फसल की सिंचाई करने से 0.5-2.0 डिगरी सैल्सियस तक तापमान बढ़ाया जा सकता है.

पवन मशीन : पवन मशीन का उपयोग फसल की सतह पर उपस्थित ठंडी हवा को गरम हवा की परत में बदलने के लिए किया जाता है. यह विधि तभी कारगर हो सकती है, जब सतह के पास की हवा के मध्यम तापमान अंतर अधिक हो. इस विधि से 1-4 डिगरी सैल्सियस तक तापमान बढ़ाया जा सकता है.

गंधक का छिड़काव : जिन दिनों पाला पड़ने की आशंका हो, उन दिनों फसल पर 0.1 फीसदी गंधक के घोल का छिड़काव करना चाहिए. इस के लिए 1 लिटर गंधक के तेजाब को 1,000 लिटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर प्लास्टिक के स्प्रेयर से छिड़काव करना चाहिए.

इस छिड़काव का असर 2 हफ्ते तक रहता है. अगर इस अवधि के बाद भी शीत लहर व पाले की आशंका बनी रहे तो गंधक के तेजाब को 15 दिन के अंतर पर दोहराते रहें.

गेहूं, चना, सरसों, मटर जैसी फसलों को पाले से बचाने में गंधक के तेजाब का छिड़काव करने से न केवल पाले से बचाव होगा, बल्कि पौधों में लोह तत्त्व की जैविक व रासायनिक सक्रियता में बढ़ोतरी हो जाती है. यह पौधों में रोग रोधिता बढ़ाने और फसलों को जल्दी पकाने में भी मददगार होती है.

अगर हमें मौसम के पूर्वानुमान से न्यूनतम तापमान, हवा की गति, बादलों की स्थिति की जानकारी मिल जाए तो उचित समय पर फसलों में उपयुक्त प्रबंधन कर के हम फसल को पाले से होने वाले नुकसान से आसानी से बचा सकते हैं.

इस के अलावा हम उपयुक्त प्रबंधन द्वारा समयसमय पर फसल को अनुकूल वातावरण दे कर फसल की पैदावार और गुणवत्ता दोनों को बढ़ाने में कामयाब हो सकते हैं. इस तरह से समय पर पाले के बुरे असर से सर्दियों में फसलों को बचा कर किसानों की माली हालत को मजबूत बनाया जा सकता है.

गन्ने की खेती में नवाचार

गन्ने की फसल एक वहुवर्षीय फसल है, जिस में किसान हर साल एक हेक्टेयर रकबे में एक लाख से ले कर डेढ़ लाख रुपए तक का मुनाफा कमा सकते हैं. गन्ना एक प्रमुख व्यावसायिक फसल है. विषम हालात में भी गन्ने की फसल को बहुत अधिक प्रभावित नहीं कर पाती. इन्हीं सब वजहों से गन्ने की खेती अपनेआप में सरक्षित व लाभ की खेती है.

गन्ने की फसल पूरे उत्तर भारत के किसानों के लिए लाभकारी नकदी फसल है, जो किसानों की आमदनी बढ़ाने में कारगर साबित हुई है. यही वजह है कि 3-4 सालों से सोयाबीन की फसल से नुकसान उठा रहे किसान अब गन्ना फसल की ओर आकर्षित हुए हैं. कम लागत और सामान्य देखभाल के चलते गन्ने की 3 वर्षीय फसल ने किसानों की जिंदगी में मिठास घोलने का काम किया.

हालांकि आज भी देश के कई किसान गन्ने की परंपरागत खेती को ही अपनाए हुए हैं. गन्ना फसल के उचित दाम न मिलने के कारण किसान ज्यादा फायदा नहीं ले पा रहे हैं.

ऐसे में आज के दौर में गन्ने की खेती में नवाचार कर के ज्यादा से ज्यादा फायदा लेने की ओर ध्यान देना जरूरी हो गया है. गन्ना फसल को मिल मालिकों को औनेपौने

दामों पर बेचने के बजाय उस के अलगअलग उत्पाद तैयार कर बाजार में भेजने से आमदनी बढ़ाई जा सकती है.

उन्नत तकनीक से करें बीज तैयार

गन्ने की फसल बोने के लिए खेत में खड़ी गन्ना फसल को बीज के रूप में इस्तेमाल करने के बजाय किसान नए तौरतरीकों का इस्तेमाल कर बीज तैयार कर अपना उत्पादन बढ़ा सकते हैं.

मध्य प्रदेश के नरसिंहपुरजिले के किसान राकेश दुबे गन्ना उत्पादन करने वाले जागरूक किसानों में से एक हैं. खास बात यह है कि खेती करते समय इन्होंने कई नए तौरतरीकों को खुद ही खोज निकाला है.

गन्ने की पौध के लिए नर्सरी तैयार करने के लिए राकेश दुबे द्वारा ईजाद की गई सैट बंडल तकनीक का उपयोग किया जाता है, जिस में नर्सरी तैयार करने के लिए मिट्टी का उपयोग नहीं किया जाता. एक आंख के टुकड़ों को 200 लिटर पानी और 100 ग्राम शहद के घोल में डुबो कर पौलीथिन बैग में पैक कर के एक अंधेरे कमरे में रख दिया जाता है. तीसरे दिन इस में जडे़ं और अंकुर निकल आते हैं और इन आंखों को 7वें दिन खेत मे रोपित कर दिया जाता है.

इस विधि के अलावा कोकोपिट और पौधशाला ट्रे विधि का प्रयोग भी किया जाता है. सैट बंडल तकनीक से उत्पादन 92 फीसदी तक मिलता है. इस विधि से गन्ना लगाने में ढाई क्विंटल बीज और 1,200 रुपए प्रति एकड़ का मजदूरी का खर्च आता है. इस तरीके से 12,000 से ले कर 20,000 रुपए तक प्रति एकड़ बचत होती है.

खेतों में नर्सरी पौधे लगाने से एक पौधे से कई कंसे निकलते हैं, जिस से गन्ने का उत्पादन 2 से 3 गुना बढ़ जाता है. राकेश दुबे गन्ने की 6 से 7 किस्मों का इस्तेमाल करते हैं. इस में 86032, 3102, 238, 8005, 1001, संकेश्वर 92, 93 खास किस्में हैं.

गन्ने की बोआई में बीज की मात्रा कम करने का तरीका बताते हुए वे कहते हैं कि पिछले 3 साल से वे एक आंख के टुकड़ों की मदद से नर्सरी तैयार कर गन्ने की बोआई कर रहे हैं. प्रति एकड़ खेत में केवल 4,800 पौधों की जरूरत होती है, जिस में केवल ढाई क्विंटल बीज लगता है.

नर्सरी विधि से गन्ना लगाने पर पौध से पौध की दूरी का खास खयाल रखा जाता है. गन्ने के इस खेत में और भी कई तरह की सहफसल ले सकते हैं. इस तरह से एक फसल की लागत में दूसरी फसलें भी ली जा सकती हैं. जहां पर पौधा लगा होता है, वहीं पर खाद दी जाती है, जिस से खाद का उपयोग भी सीमित मात्रा में होता है.

Jaggeryगन्ना के जैविक उत्पाद

देश में कई ऐसे गन्ना किसान हैं, जो अपनी फसल के लिए मेहनत तो बहुत करते हैं, लेकिन गन्ने की परंपरागत खेती कर के ज्यादा आमदनी नहीं ले पाते हैं और गन्ने की खेती को घाटे का सौदा मान लेते हैं. किसान गन्ने की जैविक खेती कर के अच्छी आमदनी ले सकते हैं.

मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले के दोनी गांव के एक प्रगतिशील किसान अभिषेक चंदेल गन्ने की खेती करने वाले अपने इलाके के कामयाब किसानों में एक हैं, जिन्होंने बाजार में सीधे गन्ना न बेच कर उस के जैविक उत्पाद बना कर बेचना शुरू किया और बीते साल 14 एकड़ जमीन में उगाए गन्ने का गुड़ बेच कर लागत निकाल कर 20 लाख रुपए से ज्यादा का मुनाफा कमाया है.

जैविक गुड़ की मार्केटिंग खुद करनी पड़ती है. भाव भी अच्छा मिलने से मुनाफा ज्यादा होता है. जैविक गन्ने की लागत भी कम आती है. अभी सब से ज्यादा इन का गुड़ चंडीगढ़ जाता है. हैदराबाद, जयपुर, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान में भी इस की काफी मांग है. मध्य प्रदेश के इस जैविक गुड़ की मांग दुबई और श्रीलंका जैसे देशों में भी है.

उन्नत खेती में कारगर होगी ड्रोन दीदी

नई दिल्ली: 30 नवंबर, 2023. विकसित भारत संकल्प यात्रा के अंतर्गत प्रधानमंत्री महिला किसान ड्रोन केंद्र का शुभारंभ किया गया. साथ ही एम्स, देवघर में ऐतिहासिक 10,000वें जन औषधि केंद्र का लोकार्पण किया एवं देश में जन औषधि केंद्रों की संख्या बढ़ा कर 25,000 करने का कार्यक्रम भी लौंच किया.

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने स्वागत भाषण दिया. भारत सरकार के विकसित भारत संकल्प यात्रा के इस कार्यक्रम से देशभर में लाखों युवा, महिलाएं, किसानों सहित विभिन्न वर्गों के लोग जुड़े. विभिन्न स्थानों पर राज्यपाल, उपराज्यपाल, मुख्यमंत्री, केंद्र व राज्यों के मंत्री, सांसदविधायक व अन्य जनप्रतिनिधि भी शामिल हुए.

इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि विकसित भारत संकल्प यात्रा को 15 दिन पूरे हो रहे हैं, अब इस ने गति पकड़ ली है. लोगों के स्नेह व भागीदारी को देखते हुए इस का नाम ‘विकास रथ‘ से बदल कर ‘मोदी की गारंटी वाली गाड़ी‘ कर दिया गया. ‘मोदी की गारंटी गाड़ी‘ अब तक 12,000 से अधिक ग्राम पंचायतों तक पहुंच चुकी है, जहां लगभग 30 लाख नागरिक इस से जुड़ चुके हैं. उन्होंने इस में महिलाओं की भागीदारी की भी सराहना की.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह भी कहा कि विकसित भारत का संकल्प मोदी या किसी सरकार का नहीं है, यह सभी को विकास के पथ पर साथ ले कर चलने का संकल्प है. विकसित भारत संकल्प यात्रा का उद्देश्य सरकारी योजनाओं और लाभ को उन लोगों तक पहुंचाना है, जो पीछे रह गए हैं.

उन्होंने यह भी बताया कि वह नमो एप पर विकास की बारीकी से निगरानी कर रहे हैं. उन्होंने युवाओं से मेरा भारत स्वयंसेवक के रूप में पंजीकरण करने व मेरा भारत अभियान में शामिल होने का भी आग्रह किया. साथ ही, उन्होंने कहा कि यह यात्रा विकसित भारत के लिए 4 जातियों पर आधारित है, ये हैं- नारी शक्ति, युवा शक्ति, किसान और गरीब परिवार. इन चारों जातियों की प्रगति होगी, जिस से भारत विकसित देश बनेगा.

सरकार गरीबों का जीवन स्तर सुधारने, गरीबी दूर करने, युवाओं के लिए रोजगारस्वरोजगार के अवसर पैदा करने, महिलाओं को सशक्त बनाने और किसानों की आय बढ़ाने के लिए सतत काम कर रही है. स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए चल रहे अभियान को ड्रोन दीदी से मजबूती मिलेगी, आय के अतिरिक्त साधन उपलब्ध होंगे. इस से किसानों को बहुत कम कीमत पर ड्रोन जैसी आधुनिक तकनीक मिल सकेगी, जिस से समय, दवा, उर्वरक की बचत होगी.

Narendra Modiमोदी की दवा की दुकान:

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10,000वें जन औषधि केंद्र के उद्घाटन का जिक्र करते हुए कहा कि यह गरीबों और मध्यम तबके के लिए सस्ती दरों पर दवाएं खरीदने का केंद्र बन गया है. जन औषधि केंद्रों को अब ‘मोदी की दवा की दुकान‘ कहा जा रहा है. उन्होंने नागरिकों को उन के स्नेह के लिए धन्यवाद देते हुए बताया कि ऐसे केंद्रों पर तकरीबन 2,000 प्रकार की दवाएं 80 से 90 फीसदी छूट पर बेची जाती हैं.

उन्होंने खुशी जताई कि पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना को 5 साल के लिए बढ़ा दिया गया है. प्रधानमंत्री ने इस पूरे अभियान को शुरू करने में पूरी सरकारी मशीनरी व कर्मचारियों के महत्व पर प्रकाश डाला. साथ ही, ग्राम स्वराज अभियान की सफलता को भी याद किया, जो देश के लगभग 60,000 गांवों में 2 चरणों में चलाया गया था और 7 योजनाओं को लाभार्थियों तक पहुंचाया गया था.

योजनाओं को गरीबों तक पहुंचाने के लिए 3,000 वाहन रथ:

गाजियाबाद के एक कार्यक्रम में उपस्थित केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की कल्पना है कि साल 2047 तक देश विकसित भारत के रूप में तबदील हो. यह एक बड़ा व व्यापक अभियान है. इस अभियान से देश का हर आदमी, सभी तबके के लोग जुड़ कर आगे बढ़ने का प्रयास करेंगे, तो आने वाले कल में हमारा देश वैश्विक मानचित्र में श्रेष्ठ भारत के रूप में स्थापित हो सकेगा.

विकसित भारत संकल्प यात्रा को संचालित करने के लिए तकरीबन 3,000 वाहन रथ के रूप में उपलब्ध कराए गए हैं, जो प्रतिदिन 6,000 गांवों में पहुंचेंगे. नवंबर में शुरू हुई यह यात्रा 26 जनवरी तक चलेगी.

गरीबों के जीवनस्तर में बदलाव लाने के लिए बनी योजनाएं आम जनता तक पहुंचे व पात्र लोगों को इन का लाभ मिले. प्रधानमंत्री ने विकास की दौड़ में पिछड़े जिलों का चयन कर आकांक्षी जिले नाम दिया, ताकि वे अन्य की बराबरी पर आ सकें.

महिलाओं को 15 हजार ड्रोन

आदिवासियों को न्याय व मौलिक सुविधाएं उन तक पहुंचाने के लिए योजनाएं शुरू कीं. महिलाओं को 15,000 ड्रोन उपलब्ध कराएंगे. इन ड्रोन दीदी के माध्यम से महिलाओं का सशक्तीकरण होगा, वे आत्मनिर्भर बनेंगी, रोजगार सृजन से उन की आजीविका बेहतर होगी. साथ ही, खेती में ड्रोन का उपयोग बढ़ने से खेती भी उन्नत होगी.

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि देशभर में तकरीबन 90 लाख स्वयं सहायता समूहों से लगभग 10 करोड़ बहनें जुड़ी हुई हैं, जो न सिर्फ अपने जीवन में बदलाव ला रही हैं, बल्कि समाज सेवा और गांवों के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं.

उन की क्षमता बढ़ाने व आजीविका बेहतर करने के लिए ड्रोन दीदी कार्यक्रम की कल्पना अद्भुत है. यूरिया, डीएपी व पेस्टीसाइड का जब खेतों में छिड़काव होता है, तो शरीर पर भी इस का बुरा प्रभाव पड़ता है. साथ ही, कहीं ज्यादा तो कहीं कम छिड़काव जैसा असंतुलन भी बना रहता है, लेकिन जब ड्रोन का उपयोग बढ़ जाएगा तो शरीर पर दुष्प्रभाव कम होगा और उर्वरक की खपत भी कम होगी. विकल्प के रूप में नैनो यूरिया, नैनो डीएपी का उपयोग भी बढ़ेगा.

करोड़ों लोगों तक पहुंची अनेक योजनाएं

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में किसान सम्मान निधि के माध्यम से 2.80 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा राशि 15 किस्तों में देश के तकरीबन 11 करोड़ किसानों के खातों में दी जा चुकी हैं. उज्जवला योजना के माध्यम से 9 करोड़ से अधिक बहनों को मुफ्त में रसोई गैस सिलेंडर देने का काम हुआ है. पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना के माध्यम से देश के 80 करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त खाद्यान्न देने का काम किया जा रहा है, जो दुनिया का सब से बड़ा कार्यक्रम है.

गेहूं बीज : प्राकृतिक आपदा में भी लहलहाएगी फसल

बेमौसम बारिश, आंधी, तूफान, ओला जैसी प्राकृतिक आपदा आने पर सब से पहले इस का फसलों पर बुरा असर पड़ता है. हरीभरी लहलहानी खड़ी फसल तबाह हो जाती है और किसानों की महीनों की मेहनत पर पानी फिर जाता है. लेकिन अब गेहूं फसल लेने वाले किसानों के लिए गेहूं की एक खास विकसित प्रजाति मौजूद है, जिसे राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत किसान प्रकाश सिंह रघुवंशी ने विकसित किया है. गेहूं की यह नई प्रजाति कुदरत-9 है, जिस के बारे में उन का कहना है कि प्राकृतिक आपदा की स्थिति में भी गेहूं की फसल लहलहाती दिखाई देगी. फसल पर न तो आंधीतूफान का असर होगा, न ही अधिक बारिश व पाले से कोई नुकसान. उलटे इतना सब झेलने के बाद भी प्रति एकड़ अधिकतम 28 से 32 क्विंटल तक का उत्पादन होगा. किसानों को यह अजूबा लग सकता है, मगर यह सच है.

उत्तर प्रदेश के छोटे से गांव टडि़या, जिला वाराणसी के प्रगतिशील किसान प्रकाश सिंह रघुवंशी द्वारा तैयार देशी बीज की इन्हीं विशेषताओं के कारण जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर के वैज्ञानिकों ने गेहूं कुदरत-9 देशी बीज को दूसरे प्रचलित बीजों की अपेक्षा बेहतर बता कर अधिक उत्पादन के साथ मानव स्वास्थ्य के लिए सेहतमंद प्रजाति का प्रमाणीकरण भी दिया है. किसानों की तरक्की के रास्ते खोलने वाले किसान प्रकाश सिंह रघुवंशी को पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया है.

पेटेंट प्रजाति कुदरत-9

प्रकाश सिंह रघुवंशी ने इस खास प्रजाति कुदरत-9 बीज का पेटेंट भी करा दिया है. शायद वे देश के पहले ऐसे किसान हैं, जिन के बीज का पेटेंट भारत सरकार ने किया है.

‘अपनी खेती अपनी खाद, अपना बीज अपना स्वाद’ का नारा देने वाले किसान प्रकाश सिंह रघुवंशी महज कक्षा 8वीं जमात तक ही पढ़े हैं. देशभर के किसानों को वे बीते 15 सालों से जागरूक करने के अभियान में लगे हुए हैं. उन का मकसद है कि देश का हर किसान बीज के मामले में आत्मनिर्भर बने.

क्या हैं खासीयतें : गेहूं की नई विकसित प्रजाति कुदरत 9 को जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के प्राचार्य साइंटिस्ट आरएस शुक्ला द्वारा प्रमाणित अनुसंधान रिपोर्ट में गेहूं कुदरत-9 बीज से तैयार हुई फसल के 1,000 दानों का वजन महज 48 ग्राम रहा, जबकि दूसरे स्थान पर सब से प्रचलित बीज जीडब्ल्यू-366 (सी) प्रजाति में इतने ही दानों का वजन 46 ग्राम निकला है. कुदरत शृंखला के बीज कुदरत-5 व कुदरत-8 बीजों का परीक्षण का परिणाम भी दूसरी प्रजाति की अपेक्षा बेहतर है.

उत्पादन में सब से आगे : गेहूं की नई किस्म कुदरत-9 बीज का उपयोग करने पर प्रति हेक्टेयर उत्पादन 6 हजार, 777 किलोग्राम बताया गया है, वहीं दूसरे स्थान पर रहे जीडब्ल्यू-366 (सी) में प्रति हेक्टेयर उत्पादन 6 हजार, 722 किलोग्राम ही रहा है. साथ ही, गेहूं की बालियों की लंबाई प्रतिद्वंदी बीज 98 सैंटीमीटर के मुकाबले 100 सैंटीमीटर रही हैं. बालियों की तादाद भी 20 फीसदी अधिक मिली है.

किसान ही बने उत्पादक : बातचीत में किसान प्रकाश सिंह रघुवंशी ने बताया कि ‘रघुवंशी एग्रीकल्चर रिसर्च और्गेनाइजेशन’ नाम से गठित संस्था के माध्यम से वे अरहर, धान व सभी प्रकार की दालों के बीज भी तैयार कर रहे हैं. धान के बीज की प्रजाति कुदरत-3 प्रति हेक्टेयर 80 क्विंटल का उत्पादन तक दे रही है.

इस के अलावा वे किसानों के लिए सौसौ ग्राम के बीज के पैकेट बना कर भी किसानों को फ्री में बांटते हैं, जिस से किसान उन बीजों को लगा कर अपना बीज खुद तैयार कर सकें.

अधिक जानकारी के लिए प्रकाश सिंह रघुवंशी के मोबाइन नंबर : 9793153755 पर किसान फोन कर सकते हैं.

भेड़बकरी एवं खरगोशपालन पर प्रशिक्षण

अविकानगर: केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान, अविकानगर में एग्री बिजनैस इनक्यूबेटर सैंटर एवं केड फाउंडेशन, उदयपुर के तत्वावधान में 10 राज्यों, राजस्थान, हरियाणा, गुजरात, मध्य प्रदेश, पंजाब, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश एवं दिल्ली के 45 किसानो (3 महिला एवं 42 पुरुष) का 5वें बैच को व्यावसायिक भेड़बकरी एवं खरगोशपालन पर प्रशिक्षण कार्यक्रम 16 से 22 नवंबर, 2023 तक केड फाउंडेशन द्वारा पांचदिवसीय प्रशिक्षण उदयपुर में और दोदिवसीय प्रशिक्षण अविकानगर में आयोजित किया गया.

संस्थान के निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर ने सभी प्रशिक्षणार्थियों को संबोधित करते हुए बताया कि इस प्रशिक्षण का उद्देश्य आप के भेड़बकरीपालन की जानकारी से पहले से उपलब्ध जानकारी में कुछ नई जानकारी देनी है.

Sheep-Goat Husbandryवर्तमान समय में वैज्ञानिक तरीके से भेड़बकरीपालन व्यवसाय करते हुए आजीविका में बढ़ोतरी की जा सकती है. बढ़ते शहरीकरण के कारण खेती और पशुपालन उद्यमिता का रूप लेता जा रहा है, क्योकि शहरी लोगों की भोजन की हर आवश्यकता आप के द्वारा ही की जा सकती है.

इसलिए आप अपने भेड़बकरीपालन व्यवसाय को पशुपालन उद्यमिता के रूप में विकसित कर के भारत सरकार की मंशा आत्मनिर्भर भारत में अपने परिवार को माली रूप से सशक्त बना कर और लोगों को भी रोजगार दे कर कर सकते हैं.

निदेशक द्वारा किसान के हर तरह के भेड़बकरीपालन के सवाल का जवाब देते हुए भविष्य में भी संस्थान का पूरा सहयोग का आश्वासन दिया गया. अंत में सभी प्रशिक्षण लेने वाले प्रगतिशील किसानों को प्रमाणपत्र दिया गया.

Sheep-Goat Husbandryअविकानगर में प्रशिक्षण कार्यक्रम के समन्वयक डा. विनोद कदम, सहसमन्वयक डा. अजित सिंह महला व डा. अरविंद सोनी द्वारा किया गया. पशु पोषण विभाग के विभागाध्यक्ष डा. रणधीर सिंह भट्ट, केड फाउंडेशन, उदयपुर के निदेशक मुकेश सुथार, डा. अमर सिंह मीना, फिजियोलौजी एवं जैव रसायन विभाग के प्रभारी डा. सत्यवीर सिंह डांगी, डा. दुश्यंत कुमार शर्मा, नरेश बिश्नोई, अविकानगर संस्थान के मीडिया प्रभारी व वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. अमर सिंह मीना आदि द्वारा भी प्रशिक्षण कार्यक्रम को सफल बनाने में पूरा सहयोग दिया गया.

बिरसा कृषि विश्वविद्यालय में कैंसर जागरूकता कार्यशाला

रांची : भारत में कैंसर से प्रतिदिन 1,300 लोगों की मृत्यु होती है, इसलिए इस बीमारी से बचाव के लिए और हो जाने पर इस के सामयिक और प्रभावी इलाज के लिए समुचित कदम उठाना आवश्यक है.

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद यानी आईसीएमआर द्वारा एकत्रित आकंड़ों के अनुसार, देश में वर्ष 2022 में 14.61 लाख लोगों में कैंसर के मामले सामने आए, जिन में लगभग एकतिहाई लोगों की मौत हो गई.

परिषद के अनुसार, प्रत्येक 9 में से एक व्यक्ति को जीवन के किसी चरण में कैंसर होता ही है, इसलिए इस के कारणों के प्रति सतत सचेत रहना जरूरी है.

कांके स्थित टाटा ट्रस्ट द्वारा पोषित रांची कैंसर अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र के चिकित्सा निदेशक डा. (कर्नल) मदन मोहन पांडेय ने बिरसा कृषि विश्वविद्यालय में जागरूकता व्याख्यान देते हुए उक्त बातें कहीं.

उन्होंने आगे कहा कि बीमारी का देर से पता लगना, विशेषज्ञता वाले बड़े अस्पतालों का महानगरों में केंद्रित रहना, विशेषज्ञ डाक्टरों, नर्सों एवं ढांचागत सुविधाओं की कमी, महंगा इलाज, तंबाकू, शराब का उपयोग, भोजन में रेशे की कमी, मोटापा, गतिहीन जीवनशैली, रसायन उद्योगों से निकलने वाला प्रदूषण आदि इस के प्रमुख कारण हैं. जिन लोगों में कैंसर की पारिवारिक पृष्ठभूमि रही है, यानी मातापिता, दादादादी या भाईबहन में से कोई कैंसर का मरीज रहा हो, तो उन में कैंसर होने की संभावना 10-15 फीसदी रहती है, किंतु उन्हें कैंसर होगा ही, यह जरूरी नहीं है.

डा. मदन मोहन पांडेय ने बताया कि सुकुरहुट्टू, कांके में टाटा ट्रस्ट के सहयोग एवं संरक्षण से निर्मित आधुनिकतम सुविधाओं और मशीनों से लैस रांची कैंसर अस्पताल पिछले एक वर्ष से कार्यरत है, जो महानगरों में अवस्थित किसी भी कारपोरेट अस्पताल से कम विशेषज्ञता वाला नहीं है.

यहां केंद्र सरकार स्वास्थ्य योजना (सीजीएचएस) की दर पर इलाज होता है. आयुष्मान भारत कार्ड वालों का इलाज मुफ्त में होता है. अब तक 20,000 टेस्ट, 300 सर्जरी, 4,000 रेडियोथेरेपी और 1,100 कीमोथेरेपी हो चुकी है. टाटा ट्रस्ट का उद्देश्य लाभ कमाना नहीं है, इसलिए यहां जांच और इलाज के लिए काफी कम शुल्क लिया जाता है. ‘अपने स्वास्थ्य को जानिए’ पैकेज के तहत 30 वर्ष तक की उम्र के लोगों को 1,000 रुपए में और 30 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को 1,500 रुपए में कई तरह की जांच कर दी जाती हैं, जिस में कुछ अंगों का कैंसर स्क्रीनिंग भी शामिल है. दूसरे अस्पतालों और डाक्टरों द्वारा अनुशंसित सीटी स्कैन, एमआरआई, मेमोग्राफी, अल्ट्रासाउंड और पैथोलौजिकल जांच भी यहां कम लागत पर की जाती है.

रांची कैंसर अस्पताल की मैडिकल आंकोलोजिस्ट डा. रजनीगंधा टुडू ने कैंसर के कारणों, लक्षण, वार्निंग सिग्नल, विभिन्न स्टेज, इलाज के चरण, बचाव के लिए सावधानियां, निदान के उपायों आदि पर विस्तृत प्रकाश डाला.

इस अवसर पर अस्पताल प्रबंधन की प्रियदर्शिनी और मुकुल कुमार घोष ने भी अपने विचार रखे. बीएयू के निदेशक छात्र कल्याण डा. बीके अग्रवाल ने धन्यवाद ज्ञापन किया.

बीएयू के कुलसचिव डा. एमएस मलिक ने कहा कि अगले चरण में टाटा ट्रस्ट के सहयोग से विश्वविद्यालय के छात्रछात्राओं के लिए कैंसर जागरूकता कार्यशाला आयोजित की जाएगी.

जहांगीरी घंटा साबित हुआ पीएम का ‘शिकायतसुझाव पोर्टल’

कहा जाता है कि, मुगल काल में बादशाह जहांगीर ने लोगों को त्वरित न्याय देने के लिए किले के दरवाजे पर एक बड़ा घंटा लटकवाया था. इसे कोई भी फरियादी दिनरात कभी भी बजा कर सीधे मुल्क के बादशाह से अपनी शिकायत दर्ज कर न्याय प्राप्त कर सकता था.

इसी जहांगीरी घंटे की तर्ज पर प्रधानमंत्री ने खूब तामझाम व प्रचारप्रसार के साथ पीएमओ पोर्टल शुरू किया. सोशल मीडिया के इस प्लेटफार्म पर लोग अपनी जायज शिकायत सीधे प्रधानमंत्री तक पहुंचा सकते थे और उन शिकायतों पर त्वरित कार्यवाही व निराकरण कर उन्हें राहत पहुंचाने का दावा किया गया था.

कहा गया था कि इस पोर्टल पर देश का हर नागरिक अपनी सीधी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अपने उपयोगी सुझाव, योजनाएं सीधे अपने प्रधानमंत्री को भेज सकता है.

प्रधानमंत्री के इस पीएमओ पोर्टल का वास्तविक हश्र क्या हुआ, यह समझने के लिए हमें पहले इन की कार्यप्रणाली समझनी होगी.

मोदी के पिछले लगभग 10 सालों के कार्यकाल की अगर एक वाक्य में व्याख्या करनी हो, तो इसे वादों, नारों, जुमलों और भव्य आयोजनों की सरकार कहा जा सकता है.

मोदी ने देश को भले ही कुछ और दिया हो अथवा न दिया हो, लेकिन निश्चित रूप से इन्होंने कई लोकप्रिय नारे दिए हैं. इन्हीं नारों में इन का एक प्रमुख नारा था: ‘सब का साथ, सब का विश्वास.’

लेकिन यह सरकार और मोदी साथ और विश्वास तो सब का चाहते हैं, परंतु किसी को भी, उस के योगदान के लिए श्रेय देना तो जैसे इन्होंने सीखा ही नहीं, बल्कि इस बात का ध्यान रखा जाता है कि हर काम और उपलब्धियों का श्रेय मोदी और केवल मोदी को ही जाना चाहिए. किसी भी उपलब्धि का श्रेय वो अपनी पार्टी यहां तक कि संबंधित विभाग के मंत्रियों के साथ भी बांटने को तैयार नहीं हैं.

अब आते हैं जहांगीरी घंटे यानी पीएमओ पोर्टल पर. इस पोर्टल पर औनलाइन शिकायत दर्ज होने के बाद शिकायत के बारे में पोर्टल पर और कभीकभी फोन पर आप की शिकायत पर की गई कार्यवाही की जानकारी दी जाती है और शिकायतकर्ता को आशा बंधती है कि शायद उस की शिकायत का अब निराकरण होगा.

लेकिन शिकायत के निराकरण के नाम पर संबंधित विभाग या अधिकारियों से उन का पक्ष पूछ कर, अंततः आप को बता दिया जाता है कि आप की शिकायत निराधार है और आप की शिकायत की फाइल या खिड़की बंद कर दी जाती है.

समझें इन मामलों से

मामला नंबर 1:

अखिल भारतीय किसान महासंघ आईआई के राष्ट्रीय संयोजक किसान नेता डा. राजाराम त्रिपाठी ने उत्तर प्रदेश के लगभग डेढ़ लाख शिक्षाकर्मी और अनुदेशकों को लगभग 20 साल की सेवा के बाद भी नियमित न किए जाने और आज भी उन्हें एक कुशल मजदूर की मजदूरी भी न देते हुए, छुट्टियों, मैडिकल सुविधाएं, पेंशन, बीमा आदि सभी जरूरी सुविधाओं से वंचित रखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के द्वारा किए गए ऐतिहासिक शोषण, अन्याय, पक्षपात की पीएमओ को की गई शिकायत पर कोई कार्यवाही नहीं हुई.

शिकायतकर्ता द्वारा अपील किए जाने के बावजूद बिना शिकायत की जांच किए और उत्तर प्रदेश सरकार से गोलमोल जवाब ले कर शिकायत को बंद कर दिया गया.

मामला नंबर 2:

वरिष्ठ पत्रकार और ऐक्टिविस्ट यशवंत सिंह (भड़ास 4मीडिया) का निजी मोबाइल पुलिस के उच्चाधिकारियों द्वारा छीनने, एवं  दुर्वव्हायवहार  की शिकायत पर भी पीएमओ द्वारा आज तक कोई प्रभावी कार्यवाही नहीं हुई.

वे सोशल मीडिया पर बारबार कह रहे हैं कि उन के खिलाफ की गई शिकायतें पूरी तरह से फर्जी हैं, और वह शिकायत करने वालों को जानतेपहचानते तक नहीं, बावजूद इस के बिना पर्याप्त जांच के ही उन का निजी मोबाइल जब्त कर लिया जाता है और मांगने के बावजूद न तो शिकायत की प्रति दी जाती है और न ही मोबाइल की पावती दी जाती है.

देश के सर्वोच्च जिम्मेदार और शक्तिशाली प्रधानमंत्री के निजी कार्यालय को की गई शिकायत पर भी किसी तरह की जांचपड़ताल किए बिना ही, इस कांड से संबंधित दोषी पुलिस उच्च अधिकारियों से प्राप्त जानकारी के आधार पर शिकायत बंद कर दी जाती है. जाहिर है कि कोई भी गलती करने वाला अधिकारी अपनी गलती भला क्यों कर स्वीकार कर के सजा भुगतना चाहेगा?

बात प्रधानमंत्री द्वारा अपने पोर्टल पर मांगे जाने वाले सुझाव

यह किसी भी देशवासी के लिए बड़े गौरव की बात होती है कि देश की बेहतरी के लिए उस की सलाह, सुझाव, योजनाएं सीधे उन के प्रधानमंत्री द्वारा सुनी जाती है. लेकिन साथ ही वो देशवासी यह भी चाहता है कि प्रधानमंत्री अगर उस की सलाह, सुझाव, योजनाओं पर यदि कोई पहल करते हैं, तो कम से कम उस की सहभागिता का श्रेय भी उसे दें, ताकि वो और उस के जैसे अन्य देशवासी भी उत्साहित हो कर राष्ट्रनिर्माण के काम में बढ़चढ़ कर आगे आएं. आम नागरिक की सक्रिय सहभागिता सफल परिपक्व लोकतंत्र का अहम लक्षण है. परंतु सुझावसलाह के माने में भी पीएमओ पोर्टल वन वे ट्रैफिक बन कर रह गया.

जब वैश्विक महामारी कोविड 19 की वजह से दुनिया के साथसाथ भारत भी इस की चपेट में आया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च, 2020 को राष्ट्रव्यापी लौकडाउन की घोषणा की, तो पूरे राष्ट्र ने उन का समर्थन किया. सब लोग घरों में कैद हो गए.

यह अवाम के अभूतपूर्व अनुसाशन का प्रदर्शन था. लेकिन घरों में रहने के बावजूद लोगों को खाद्य पदार्थों की आवश्यकता तो पड़ती ही है. इसलिए कुछ आपात सेवाएं जारी रखी गई. पर उन में से एक काम ऐसा था कि जिसे भी जारी रखना बहुत जरूरी था. और वह काम था खेतीकिसानी का. जब खेतों से फलसब्जियों का उत्पादन नियमित होता है, तभी सप्लाई चेन द्वारा लोगों के घरों तक आपूर्ति हो पाती है.

इसी बात को ध्यान में रख कर 25 मार्च को मैं ने प्रधानमंत्री कार्यालय को टैग करते हुए सुझाव दिया कि खेती के काम को तत्काल लौकडाउन से मुक्त किया जाए और कैसे केवल फलसब्जी और तत्कालीन खेतों में खड़ी रबी की फसलों को भी सही समय पर कटाई कर के खलिहान और फिर खलिहान से गोदाम तक या किसानों के घरों तक और फिर जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाने के काम को लौकडाउन से मुक्त रखा जाए.

इस सलाह को पंजीकृत कर प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा तुरंत अमल में लाया गया और 27 मार्च, 2020 को गृह मंत्रालय के द्वारा इसी आशय के संशोधित आदेश जारी कर खेती के ज्यादातर कामों को लौकडाउन से मुक्त कर दिया गया.

हालांकि अलगअलग राज्यों ने केंद्र सरकार के उन आदेशों की अपनी समझ और सुविधा के अनुसार अलगअलग व्याख्या करते हुए उन का क्रियान्वयन समुचित ढंग से नहीं किया, जिस से किसानों को भारी नुकसान और तमाम परेशानियां हुईं, स्थानीय प्रशासन ने भी कोरोना को रोकने और खेती के काम को रोकने का अंतर समझने की कोशिश नहीं की और सुदूरवर्ती इलाकों में पुलिस अपना पराक्रम निरीह किसानों पर दिखाती रही. आज भले कोरोना नहीं है, पर 3 साल बाद आज भी देश के किसान उस की मार से उबर नहीं पाए हैं.

केंद्र सरकार द्वारा कोरोना में गरीबों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए और अन्य तबकों के लिए जब विभिन्न प्रकार के राहत की घोषणाएं की गईं, तब देखा गया कि इन घोषणाओं में कृषि और किसानें के लिए कोई बहुत सार्थक पैकेज नहीं था, जिस से लौकडाउन से खेती को हुए नुकसान की भरपाई करते हुए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सके.

इसे ध्यान में रखते हुए, 25 अप्रैल, 2020 को डा. राजाराम त्रिपाठी की अगुआई में 52 किसान संगठनों से सलाहमशवरा कर मैराथन बैठकों के बाद काफी मेहनत कर के 25 सूत्री मार्गदर्शी सुझाव व मांगपत्र प्रधानमंत्री को सौंपा गया. इन अधिकांश सुझावों का स्पष्टदर्शी प्रभाव सरकार के तत्कालीन विशेष पैकेज में दिखाई दिया, पर सरकार ने इन सुझावों का श्रेय देने की बात तो दूर, सुझावों के लिए धन्यवाद देना तक जरूरी नहीं समझा.

कोरोना से जुड़ी एक और बानगी

भारत विश्व के सब से ज्यादा वन क्षेत्र वाले 10 देशों में से एक है. भारत के कुल क्षेत्रफल के लगभग 21.23 फीसदी क्षेत्र पर वन स्थित हैं. देश के कई राज्यों में जैसे कि छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, ओड़िसा, झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र और पूर्वोत्तर राज्यों में जहां आज भी पर्याप्त वन क्षेत्र है, जैसे कि छत्तीसगढ़ में तो तकरीबन 44 फीसदी हिस्सा वन क्षेत्र है और भारत के समूचे 1 क्षेत्रों का 7.7 फीसदी वन छत्तीसगढ़ में ही है. इन वन क्षेत्रों में बहुसंख्यक जनजातीय समुदाय रहता है और इन क्षेत्रों की तकरीबन 70 फीसदी आबादी जंगलों से वनोपज एकत्र कर होने वाली आय से ही अपना जीवनयापन करती है.

छत्तीसगढ़ में तो 425 ऐसे वन राजस्व गांव भी हैं, जिन की आजीविका का साधन केवल जंगल ही है.

छत्तीसगढ़ में इस काम को सुचारु संचालन के लिए 901 प्राथमिक लघु वनोपज सहकारी समितियां काम कर रही हैं, जो पूरी तरह से वनोपज संग्रहण और विपणन पर ही निर्भर है.

भारत में कमोबेश इसी तर्ज पर तकरीबन 250 से अधिक प्रकार की वनोपज संग्रहण किया जाता है, इन सारे वनोपजों में से तकरीबन 70 फीसदी प्रमुख वनोपज मार्चअप्रैल में एकत्र की जाती हैं और यह वनोपज इन दिनों अगर एकत्र नहीं की गई तो या तो यह इन दिनों वनों में प्रायः हर साल लगने वाली आग से जल कर नष्ट हो जाती है, या फिर मईजून की गरमी में यह सूख कर अनुपयोगी जाती है, और इन सब से भी अगर बची भी तो आगे आने वाली मानसून पूर्व की बारिश की बौछारों में तो पूरी तरह से बरबाद हो ही जाती है.

अतः डा. राजाराम त्रिपाठी अखिल भारतीय किसान महासंघ (आइफा) द्वारा सरकार को समर्थन तथ्यों, आंकड़ों के साथ सुझाव देते हुए 4 अप्रैल, 2020 को प्रधानमंत्री कार्यालय विस्तार से वस्तुस्थिति की जानकारी देते हुए मांग की गई थी कि देश में तत्काल लौकडाउन के दरमियान बचाव के साधनों और सुरक्षा के साथ वनोपजों के संग्रहण और उन की खरीदी सुनिश्चित की जाए और संग्राहक परिवारों को इन वनोपजों का उचित मूल्य’ दिलाया जाए.

उक्त पत्र को प्रधानमंत्री कार्यालय के द्वारा आदिवासी मामलों के मंत्रालय को आगे कार्यवाही के लिए तत्काल 4 अप्रैल को ही भेज दिया गया. तत्पश्चात संबंधित राज्यों में 5-6 अप्रैल से वनोपज संग्रहण का काम सुचारु रूप से प्रारंभ हुआ, और 2 मई को केंद्र सरकार के आदिवासी मामलों के मंत्रालय द्वारा 49 वनोपज के जिसे माइनर फारेस्ट प्रोड्यूस (एमएफपी) कहते हैं, उस के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा भी की गई, जो कि भले ही देर से उठाया गया, पर निश्चित रूप से अच्छा कदम था.

इन्हीं महत्वपूर्ण निर्णयों के कारण हम कोरोना से लड़ाई लड़ते हुए भी अपनी अर्थव्यवस्था को काफी हद तक बचा पाए, लेकिन उपरोक्त सभी मामलों में सरकार ने जिन व्यक्ति या संगठनों के सुझाव को आधार पर उपरोक्त निर्णय लिए, उन का जिक्र तक नहीं किया है. यहां तक कि धन्यवाद ज्ञापन का एक मुफ्त ईमेल तक भेजने में सरकार कंजूसी बरतती है.

पिछले लोकसभा चुनाव के पूर्व, भाजपा के चुनावी घोषणापत्र बनाते समय जिन कृषि विशेषज्ञों को आमंत्रित कर उन से सलाह ली गई थी, उन में डा. राजाराम त्रिपाठी भी एक थे.

उल्लेखनीय है कि, वर्तमान में किसानों की मदद के लिए संचालित कृषक पेंशन निधि और किसान सम्मान निधि जैसी केंद्र सरकार की स्टार योजनाओं की आवश्यकता और उस के संभावित स्वरूप के बारे में अपनी परिकल्पना को स्पष्ट करते हुए इन्हें भाजपा के चुनावी घोषणापत्र में शामिल करने के बारे में डा. राजाराम त्रिपाठी ने ही सलाह दी थी, इन सुझावों को भाजपा की तत्कालीन समूची चुनाव घोषणापत्र समिति ने सराहा भी था और इन्हें अपने घोषणापत्र में शामिल भी किया था और इस चुनाव में किसानों के वोटों से अभूतपूर्व सफलता भी प्राप्त की.

इन योजनाओं के दम पर पिछला चुनाव जीतने के बाद भी योजनाओं का सुझाव देने वाले का नाम भी कभी इन के द्वारा नहीं लिया गया. यह दीगर बात है कि इन योजनाओं के निर्माण, क्रियान्वयन और संचालन में इतनी खामियां रह गई हैं कि इन महात्वाकांक्षी योजनाओं का मूल उद्देश्य कहीं खो गया.

आखिर में एक सवाल?

सोचने की बात यह है कि एक ओर तो सरकार यह कहते नहीं थकती है कि वह हर नागरिक की सहभागिता शासन में चाहती है, ऐसे में कोई विशेषज्ञ अगर मेहनत कर के कोई सार्थक सुझाव सरकार को भेजता है, तो उन्हें कोई श्रेय देना तो दूर उस की अभिस्वीकृति तक नहीं की जाती है. ऐसे में सब से पहला लाख टके का सवाल यही है कि ‘सब का साथ, सब का विकास’ जैसे खोखले नारों के भरोसे क्या यह भाजपा सरकार साल 2024 चुनाव की वैतरणी पार कर पाएगी?

-किसान नेता डा. राजाराम त्रिपाठी, अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा) के राष्ट्रीय संयोजक और एमएसपी गारंटी कानून किसान मोरचा के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं.